Wednesday, 11 April 2018

पिघलती चेतना और तापमान से ।

नंगेपन की नियमावली
के साथ
शिखरों से संचालित
अभियोग की साजिश
नाटकीय सिद्धांत और सीमाएं
कुलबुला देती हैं
गर्म और गाढ़ा ख़ून
और फ़िर
अंदरुनी व्यवस्था
भनभनाती है
लपकती है
आखेट करती है
निहत्थे,नगण्य,मामूली
पथराई आँखों का
और खरोचती है
न्यायसंगत ढ़ंग से
उनकी चेतना,
पसलियों और सहिष्णुता को ।

भयातुर रंग में
विजेता
स्वाद लेता है
नंगी औरतों का
उधेड़े हुए माँस का
टुकड़े हुए सामुहिक उड़ान का
दबोचते हुए
आत्माधिकार और संविधान ।

अफवाहों की मुंडेर पर
कौवे रोमांचित हैं
पिघलती चेतना और तापमान से
उनकी व्यूह रचना में
रेते जा रहे हैं
सिद्धांतों के दाँत
निचोड़ा जा रहा है
सामोहिक उजाला
और
कुचला जा रहा है
विकल्प और संकल्प का
कोई भी प्रयास ।

मर्मस्थलों की
जासूसी और टोह
पक्षियों के झुंड और
अंडों पर झपट्टा
भीरु और अपाहिज़
मस्तिष्क पर राजतिलक
नाटकीय विज्ञापन
जंतुओं की तरह
चिपके,लिजलिजे
लोगों का अभिभाषण
फुनगियों की कपोलों पर
जलवायु के हवाले से
हलफनामा तैयार ।

ऐसे समय में
अपने डैने को
अपनी काँख में दबाये
माँस के लोथड़ों के टीले पर
मैं रोमांचित हूँ
प्रेम की उत्तेजक उड़ान और
आप की
शुभकामनाओं के लिए
ताकि एक उड़ान
क्षितिज के
उस पार हो जहां
परिदृश्य बदला हो
या फिर
इसकी उम्मीद हो ।

    ----------मनीष कुमार मिश्रा ।

Tuesday, 10 April 2018

अनजान अपराधों की पीड़ा ।

लीचड़ और लद्धड़
प्यार के बारे में
पीछे की कोई बात
पीड़ा,भरम और मोह
और उदासियों से गुँथे हुए
निपट - निचाट
अंदेशाओं / आशंकाओं से
धूसर
उस पृष्ठभूमि को
उघाड़कर
अगर सामने रख भी दूँ
तो क्या
किसी पुरानी पहचान
के संबंधों की
घुन लगी
तृण और तिनकों की
यह जुगाली
रोशनी का कोई फ़व्वारा
दिखा सकेगी
उसे जो
नाउम्मीदी की झुर्रियों से लदा
किसी भरम के कोटर में
अनजान अपराधों की पीड़ा को
पूरे अनुशासन में
जी रहा है
एक दुर्लभ हँसी के साथ ।

जिसकी कैद में
घिस-घिसकर
प्यार भरी गर्मी
तरसती है
किसी खुली हवा के लिए ।

उसकी
अदम्य लालसा
तितलियों और बुलबुलों से
गलबहियाँ भूल चुकी हैं
और तफ़सील में
पता चला है कि
सार्थक/ रचनात्मक
खेत की उस मिट्टी ने
उमस और गर्मी के बावजूद
किसी बादल की
प्रतीक्षा से
इंकार कर दिया है ।

अतः
अब इस ज़मीन में
बीज बोने का प्रस्ताव
तर्क से परे है ।

        --------- मनीष कुमार मिश्रा ।

दो आँखों में अटकी

निश्छल आदतों
और मामूलीपन के साथ
एक सरल पंक्ति
कि तरह
कितना कठिन हूँ ?

विपदाओं में बंद
प्रियजनों में किटकिटाता
ज़रूरी वेदना के
ताब के साथ
आश्वस्त हूँ
अपने शेष अभिनय पर ।

स्मृतियों की
नदी के तल में
फ़िर भी दबा रखें हैं
कुछ रहस्य
जिनमें दबे हैं -
बचकाने प्रेम के चुंबन
किसी कोमल देह की गंध
दो आँखों में अटकी
अथाह रात
और
धीमी आंच पर
पकती हुई
प्रेम की अमरता ।

यकीन मानों
मरे पास
और कुछ भी नहीं
मेरे कुछ होने की
अब तक कि
पूरी प्रक्रिया में ।

        -------- मनीष कुमार मिश्रा ।

Monday, 9 April 2018

मुझे आदत थी ।



मुझे आदत थी
तुम्हें रोकने की
टोकने की
बताने और
समझाने की ।

मुझे आदत थी
तुम्हें डाँटने की
सताने की
रुलाने और
मनाने की ।

मुझे आदत थी
तुम्हें कहने की
बिगड़ने की
तुम्हारा हूँ
यह जताने की ।

लेकिन
यह सब करते हुए
भूल गया कि
तुम
इनसब के बदले
नाराज़ भी हो सकती हो
वो भी इतना कि
छोड़ ही दो
मुझे
मेरी आदतों के साथ
हमेशा के लिए ।

अब
जब नहीं हो तुम
तो इन आदतों को
बदल देना चाहता हूँ
ताकि
शामिल हो सकूँ
तुम्हारे साथ
हर जगह
तुम्हारी आदत बनकर ।

      ------  मनीष कुमार मिश्रा ।

Tuesday, 6 March 2018

तुम्हारी एक मुस्कान के लिए ।


तुम्हारी एक मुस्कान के लिए
कितना बेचैन रहता ?
मन का बसंत 
मनुहारों की लंबी श्रृंखलाओं में
समर्पित होते
न जाने कितने ही
निर्मल,निश्छल भाव ।
तुम्हारी एक मुस्कान के लिए
गाता
अनुरागों का राग
बुनता सपनों का संसार
और छेड़ता
तुम्हारे हृदय के तार ।
तुम्हारी एक मुस्कान के लिए
अनगिनत शब्दों से
रचता रहता महाकाव्य
अपनी चाहत को
देता रहता धार ।
तुम्हारी एक मुस्कान के लिए
जनवरी में भी
हुई झमाझम बारिश और
अक्टूबर में ही
खेला गया फ़ाग ।
तुम्हारी एक मुस्कान के लिए
उतर जाता इतना गहरा
कि डूब जाता
उस रंग में जिसमें
कि निखर जाता है प्यार ।
तुम्हारी हर एक मुस्कान
मानों प्रमाणित करती
मेरे किसी कार्य को
ईश्वर के
हस्ताक्षर के रूप में ।
तुम्हारी एक मुस्कान के लिए
मेरे अंतिम शब्दों में भी
एक प्रार्थना होगी
जो तुम सुन सकोगी
अपने ही भीतर
मौन के उस पर्व में
जब तुम खुद से मिलोगी
कभी जब अकेले में ।
--------- मनीष कुमार मिश्रा

यूँ तो संकीर्णताओं को वहन कर रहे हैं

यूँ तो संकीर्णताओं को वहन कर रहे हैं
और शोर है परिवर्तन गहन कर रहे हैं ।
हम आसमान की ओर बढ़ तो रहे हैं
पर अपनी जड़ों का हवन कर रहे हैं ।
रावण के पक्ष में खुद को खड़ा कर के
ये हर साल किसका दहन कर रहे हैं ?
जब कुछ करने का वक़्त है आज तो
हम हाँथ पर हाँथ धरे मनन कर रहे हैं ।
देश के घायल सैनिकों पर आरोप है कि
वे मानवाधिकारों का हनन कर रहे हैं ।
ग़ुलामी की जंज़ीरें जब तोड़ दी गई हैं तो
ये किस मानसिकता का जतन कर रहे हैं ?
उन मजदूरों के हिस्से में क्यों कुछ भी नहीं
जो मेहनत से एक धरा और गगन कर रहे हैं ।
भगौड़े भाग रहे हैं विदेश,देश को लूटकर
हमारे रहनुमा हैं कि भाषण भजन कर रहे हैं ।
------------- मनीष कुमार ।

पिछली ऋतुओं की वह साथी ।


पिछली ऋतुओं की वह साथी
मुझको कैसे तनहा छोड़े
स्मृतियों में तैर-तैर कर
वो तो अब भी नाता जोड़े ।
सावन की बूंदों में दिखती
जाड़े की ठंडक सी लगती
अपनी सांसों का संदल
मेरी सांसों में भरती ।
मेरे सूखे इस मन को
अपने पनघट पर ले जाती
मेरी सारी तृष्णा को
तृषिता का भोग चढ़ाती ।
इस एकाकी मौसम में
वह कितनी अकुलाहट देती
मेरे प्यासे सपनों को
अब भी वो सावन देती ।
पिछली ऋतुओं की वह साथी
आँखों का मोती बनती
मेरी सारी झूठी बातों को
केवल वो ही सच्चा कहती ।
----------मनीष कुमार मिश्रा ।

रंग-ए-इश्क़ में

वह सर्दियों की धूप सी भली लगती
मुझे मेरे रंग-ए-इश्क़ में ढली लगती ।
जहाँ बार-बार लौटकर जाना चाहूँ
वह प्यार वाली ऐसी कोई गली लगती ।
कहने को कोई रिश्ता तो नहीं था पर
मेरे अंदर मेरी रूह की तरह पली लगती ।
जब बंद दिखायी पड़ते सब रास्ते तब
वह उम्मीद की खिड़की सी खुली लगती ।
दुनियादारी की सारी उलझनों के बीच
वही एक थी कि जो हमेशा भली लगती ।
कोई अदा थी या कि मासूमियत उसकी
मौसम कोई भी हो वह खिली खिली लगती ।
जितना भी पढ़ पाया उसकी आँखों को
वो हमेशा ही मुझे मेरे रंग में घुली लगती ।
--------- मनीष कुमार ।

Wednesday, 28 February 2018

इस दौर ए निज़ाम में ।


तेरी आँखों से मेरा एक ख़ास रिश्ता है
एक सपना है जो यहीं से हौंसला पाता है ।
शिकार हो जायेंगे हर हाल में सवाल सारे
इस दौर ए निज़ाम में यह व्यवस्था पुख्ता है ।
तोड़ दिये गये हैं सब दाँत निरर्थक बताकर
क्योंकि चाटने की परंपरा में काटना समस्या है ।
विश्व के इस सबसे बड़े सियासी लोकतंत्र में
आवाम की कोई भी मजबूरी सिर्फ़ एक मौक़ा है ।
अपराधियों की श्रेणी में अब वो सब शामिल हैं
जिनका कि खून व्यवस्था के ख़िलाफ़ खौलता है ।
जब कोई आख़री पायदान से चीख़ता-चिल्लाता है
तो यक़ीनन वह उम्मीद की नई मशाल जलाता है ।
तुम्हें अब तक जितनी भी शिकायत रही है मुझसे
वो तेरे इश्क़ का अंदाज़ है जो मुझे बहुत भाता है ।
----------------- मनीष कुमार मिश्रा

Tuesday, 27 February 2018

जब तुम्हें लिखता हूँ ।

जब तुम्हें लिखता हूँ
तो मन से लिखता हूँ
तुम्हारे मन में
बैठकर लिखता हूँ  ।

जब तुम्हें लिखता हूँ
तो जतन से लिखता हूँ
हर शब्दों को
चखकर लिखता हूँ ।

जब तुम्हें लिखता हूँ
तो बसंत लिखता हूँ
होली के रंग में
तुम्हें रंगकर लिखता हूँ ।

जब तुम्हें लिखता हूँ
तो पुरवाई लिखता हूँ
तुम्हारी आस में
अपनी प्यास लिखता हूँ ।

जब तुम्हें लिखता हूँ
तो दिल खोलकर  लिखता हूँ
न जाने कितने सारे
बंधन तोड़कर लिखता हूँ ।

जब तुम्हें लिखता हूँ
तो खुशी लिखता हूँ
आँख की नमी को
तेरी कमी लिखता हूँ ।

              -------मनीष कुमार मिश्रा ।











Sunday, 25 February 2018

पद्मावत फ़िल्म



                 पद्मावत / पद्मावती फ़िल्म को लेकर शुरू से जब हंगामा बरप रहा था, तभी से उत्सुकता थी कि फ़िल्म देखनी चाहिये । आख़िर पता तो चले कि यह हंगामा बरपा क्यों ? वह भी फ़िल्म को बिना देखे । आरोप यह भी लगा कि यह सब “पब्लीसिटी स्टंट” है । अगर यह सब “पब्लीसिटी स्टंट” था भी तो इसके नैतिक पक्ष को लेकर बहस हो सकती है पर व्यावसायिक दृष्टि से तो यह स्टंट कामयाब रहा । राजपूती आन-बान-शान की दुहाई देने वाली आंदोलनकारी करणी सेना परिदृश्य से जिस तरह गायब हुई वह भी स्टंट वाली बातों को बल देती हैं । बहरहाल फ़िल्म प्रदर्शित हो चुकी है और अपनी कामयाबी की इबारत भी लिख चुकी है । फ़िल्म की अभी तक कि कमाई लगभग 500 करोड़ बतायी जा रही है,जो की अभी जारी है ।
              संजय लीला भंसाली को इस शानदार फ़िल्म के लिये बधाई । अगर तथाकथित  “पब्लीसिटी स्टंट” में भंसाली जी शामिल भी रहे हों तो भी जितनी कटु आलोचना उन्होंने झेली, झपड़ियाए गये, माँ-बहन तक की गलियाँ सार्वजनिक रूप से सोशल मीडिया द्वारा प्रचारित-प्रसारित की गयी यह सब दुखद ही कहा जा सकता है । विरोध का स्वर इतना अमर्यादित था कि स्वस्थ मानसिकता का कोई भी व्यक्ति उसे स्वीकार नहीं कर सकता । बॉलीवुड को कई विद्वानों ने “राजपत्रित वेश्यालय”तक कहने में गुरेज़ नहीं किया । चार इंच के कपड़ों में फ़िल्मी पर्दे पर नाच चुकी,फ़िल्म की नायिका दीपिका पादुकोण माँ पद्मावती कैसे बन सकती है ?,यह भी धर्म के ठेकेदारों कों समझ में नहीं आ रहा था । जहाँ तक मेरी समझ है, नायिका दीपिका पादुकोण एक कुशल अभिनेत्री के रूप में सिर्फ़ अपने सिनेमायी पात्र के साथ पूरा न्याय करना चाहती होंगी । और वह उन्होंने किया भी । इस फ़िल्म को देखने के बाद दीपिका की अदाकारी को श्रेष्ठ श्रेणी में ही गिना जाना चाहिये । उनकी भाव -भंगिमाएँ, नृत्य, डायलॉग डिलेवरी सब बहुत उम्दा रहे । संजय लीला भंसाली अपने रंग बोध के लिये सराहे जाते रहे हैं । फ़िल्म में राजस्थानी भाषा और रंगबोध को जिस तरह दिखाया गया वह भी उम्दा रहा । आधी आबादी की अस्मिता और सम्मान को भी फ़िल्मी संवादों में एक ऊँचाई प्रदान की गयी है । अतः फ़िल्म को स्त्री अस्मिता और सम्मान के खिलाफ़ भी नहीं कहा जा सकता ।
          इस फ़िल्म के प्रारंभ में ही फ़िल्म को जायसी के पद्मावत के आधार पर फ़िल्माने की घोषणा होती है और एक नये विरोध का स्वर यहाँ से भी उभरा । कई हिंदी साहित्य के विद्वानों ने अपना विरोध दर्ज़ भी किया । लेकिन हमें यह समझना होगा कि भंसाली महोदय जायसी के पद्मावत को आधार बना रहे थे ना कि जायसी के पद्मावत को केंद्र में रखकर उसका फ़िल्मी रूपांतरण कर रहे थे । दरअसल रानी पद्मावती और उनके जौहर से जुड़ी हुई जितनी भी साहित्यिक,ऐतिहासिक और काल्पनिक कहानियाँ मिलती हैं, उनका एक मिश्रित या संलयित रूप इस फ़िल्म में दिखाई पड़ता है । यह फ़िल्म देखने के बाद स्पष्ट है कि यह फ़िल्म जायसी के पद्मावत के दृष्टिकोण से नहीं बनी है । इस फ़िल्म को  जायसी के “पॉइंट ऑफ व्यू” से नहीं अपितु  फ़िल्म निर्देशक भंसाली के “व्यू पॉइंट” से समझना और देखना होगा ।
                    यह फ़िल्म दो विरोधी ध्रुव निर्मित करती है अलाउद्दीन खिलजी और पद्मावती के चरित्र रूप में । ये दोनों चरित्र धर्म और अधर्म का प्रतिकात्मक रूप भी हैं । पद्मावती अपनी प्रतिबद्धता,दृढ़ता, धर्म परायणता और प्रेम की एकनिष्ठता की वजह से माँ भवानी का रूप हैं तो अलाउद्दीन खिलजी एक अति महत्वाकांक्षी,अइयास,आततायी है जो नैतिकता विहीन है । लेकिन फ़िल्मी किरदार के रूप में दोनों ही कलाकारों का अभिनय सराहनीय है ।
                     पूरी फ़िल्म में जो एक बात मुझे खटकती है वह यह कि जायसी के पद्मावत के आधार पर पद्मावती को सिंघल द्वीप की राजकुमारी दिखाया गया पर उनके तेवर राजपुतानी राजकुमारियों जैसे । फ़िल्मी सिंघल द्वीप में राजकुमारी एक तरफ हिरन का शिकार कर रही हैं, घुड़सवारी कर रही हैं तो दूसरी तरफ कुछ दृश्यों  में भगवान बुद्ध की प्रतिमा और प्रतिकों को भी दिखाया जाता है । भगवान बुद्ध के अस्तित्व और प्रतिकों के साथ हिरन का शिकार करनेवाली राजकुमारी खटकती है ।  किसी अन्य राजपूताना राज्य की राजकुमारी के रूप में ही जो कुछ वर्णन राजकुमारी पद्मावती को लेकर मिलते हैं उसे आधार बनाकर पद्मावती को चित्रित करना उनके फ़िल्मी तेवर और संवादों के अधिक अनुकूल होता । लेकिन हो सकता है घायल राजा के प्रति राजकुमारी की दया,करुणा और प्रेम के भाव के संदर्भ में भगवान बुद्ध की प्रतिमा और प्रतिकों को दिखाया गया हो । लेकिन फ़िर वही प्रश्न उठता है कि दया,करुणा और प्रेम के भाव से भरी बौद्ध धर्म के केंद्र सिंघल द्वीप की राजकुमारी निरीह हिरन का शिकार कैसे कर सकती है ? जबकि एक राजपूताना राजकुमारी के रूप में यह चित्रण अधिक सहज दिखता । सिंघल द्वीप तक जाने की आवश्यकता नहीं थी ।
                   कुल मिलाकर यह एक शानदार फ़िल्म है । जिस राजपूती अस्मिता और आन-बान-शान की दुहाई देकर फ़िल्म का शुरुआती विरोध हुआ वह फ़िल्म देखने के बाद निरर्थक लगता है । इस फ़िल्म को देखने के बाद मुझे आपत्तिजनक कहने जैसा और कुछ विशेष नहीं लगा । असहमतियाँ दर्ज़ कराने वालों को असहमति का विवेक नहीं छोड़ना चाहिये ।

                                                                                  डॉ मनीष कुमार मिश्रा ।

Tuesday, 12 December 2017

मानवता को सिंचित करती महाराष्ट्र की वंचित स्त्रियाँ । ( संदर्भ : ज़िंदा कहानियाँ – शशिकला राय )



                           वर्तमान में सावित्रीबाई फुले विश्वविद्यालय, पुणे, महाराष्ट्र के हिंदी विभाग में प्राध्यापिका के रूप में कार्यरत डॉ. शशिकला राय हिंदी महिला लेखिकाओं की उस परिपाटी से आती हैं जिनमें नीलम कुलश्रेष्ठ, रजनी गुप्त, अनीता भारती, गरिमा श्रीवास्तव, हेमलता, कंचन शर्मा और शरद सिंह जैसी लेखिकाओं के नाम लिए जा सकते हैं । आप मूल रूप से उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के अंतर्गत आनेवाले सिरवां गाँव से हैं । आप की अबतक प्रकाशित पुस्तकों में समय के साक्षी निराला, इस्पात में ढलती स्त्री, कथासमय : सृजन और विमर्श तथा ज़िंदा कहानियाँ प्रमुख हैं । हिंदी की प्रमुख पत्र – पत्रिकाओं में आप लगातार छपती रहती हैं । वर्ष 2015 से वर्ष 2017 तक आप विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) की तरफ से रिसर्च अवार्डी ( R.A.) के रूप में जयपुर विश्वविद्यालय, राजस्थान में कार्यरत रहीं ।
                         यह शोध पत्र डॉ. शशिकला राय की प्रकाशित पुस्तक ज़िंदा कहानियाँ पर केंद्रित है । इस पुस्तक का प्रथम संस्करण वर्ष 2013 में वाणी प्रकाशन,नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित किया गया । पुस्तक की भूमिका जानीमानी हिंदी लेखिका अनामिका  ने लिखी है । अनामिका इन कहानियों को ग्लासी पत्रिकाओं की “ सक्सेस सागा” और अख़बारों के पेज़ थ्री का हँसमुख प्रतिपक्ष मानती हैं । रक्त और यौन संबंधों से परे जाती पारिवारिकता को भारतीय स्त्रीवाद की सबसे महत्वपूर्ण संकल्पना मानती हुई अनामिका को इन कहानियों से “एक मशाल यात्रा सी” उम्मीद है । 
                         अपने मनोगत में डॉ. शशिकला राय स्पष्ट करती हैं कि कथाक्रम के विशेषांक (साठ पार जीवन ) ने इस पुस्तक के स्वरूप को जन्म दिया । आप सिर्फ़ स्त्रियों को केंद्र में रखकर यह पुस्तक नहीं लिखना चाहती थीं लेकिन यह हुआ “अय्यर सर” के कारण जिन्होंने निष्ठुरता पूर्वक लेखिका से अपने ऊपर ना लिखने के लिए कहा और वहीं से लेखिका ने निर्णय लिया कि वे ज़िंदा कहानियाँ के लिए किसी अन्य पुरुष के पास नहीं जायेंगी । इस तरह 60 वर्ष की आयु पूर्ण कर चुकी महाराष्ट्र की 12 स्त्रियों के जीवन संघर्ष और उनके द्वारा किये गये कार्यों को केंद्र में रखकर यह पुस्तक लेखिका ने पूर्ण की ।
                         लेकिन विश्वविद्यालय की नौकरी करते हुए आप सहज ही कोई काम पूरा कर लें यह संभव नहीं होता, विशेष रूप से यदि आप किसी भारतीय विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग से जुड़ें हों । ऐसा इसलिए क्योंकि यहाँ जड़ों से नहीं जड़ताओं से जुड़े कुंठित,आत्ममुग्ध,हताश, निकम्मे और निराश गिरोहबाज़ प्राध्यापकों की एक  बड़ी भारी फौज रहती है । जिनकी वजह से ही देश के अधिकांश हिंदी विभाग अजायबघर से अधिक कुछ और नहीं लगते । यद्यपि इसतरह का एक सामान्य वक्तव्य देश के सभी हिंदी विभागों के लिये देना तर्क संगत तो नहीं पर तर्कपूर्ण ज़रूर है । लेखिका के साथ भी कई तरह के षड्यंत्र रचे गये । फ़र्जी छात्र के रूप में राजेन्द्र यादव को लंबा पत्र, चारित्रिक हनन और साहित्यिक चोरी जैसे अनेकों हथकंडों को आज़माया गया लेकिन इनसब के बीच से निकलते हुए लेखिका ने अपना कार्य पूर्ण किया । लेखिका ख़ुद लिखती भी हैं कि “.......इन सारी स्त्रियों ने मुझे अजेय और अभय भी बनाया है ............. जब कोई स्त्री थक कर हताश होकर बेजार होकर ज़िंदगी की अधराह में घुटनों में मुँह ढाँपकर बैठ जाएगी तब कर्मों की रोशनी का काफ़िला लिए चुपचाप ये जिंदगियाँ पाँतबद्ध खड़ी हो जाएँगी ।’’1
                                     जिन 12 स्त्रियों की चर्चा इस पुस्तक में की गई है, वे निम्नलिखित हैं ।
1.  सिंधुताई सपकाल ।
2.  नसीमा हुरजूक ।
3.  लक्ष्मी त्रिपाठी ।
4.  राजश्री काले नगरकर ।
5.  सुनीता ताई अरडीकर ।
6.  कुसुम कर्णिक ।
7.  शोभा सालुंखे ।
8.  गौराबाई ।
9.  गुरुमाई ।
10. करुणा फुटाने ।
11. नजूबाई गावित ।
12. रुपाताई सालवे ।
                        ये वो स्त्रियाँ हैं जिन्होंने अपने भोगे हुए कटु यथार्थ के आगे झुकने की बजाय, उनका पूरे साहस और विश्वास के साथ सामना किया और ऐसी ही परिस्थितियाँ अन्य लोगों को न झेलनी पड़ें इसबात के मद्दे नज़र एक ईमानदार कोशिश शुरू की । इनकी कोशिशें रंग लायी और आज़ ये स्त्रियाँ सफल सामाजिक कार्यों की ज़िंदा मिसाल बनकर एक आदर्श,प्रादर्श और प्रतिदर्श ( Ideal, Model & Sample ) के रूप में हमारे सामने हैं । समाज इनके द्वारा किये गए कार्यों के आगे नतमस्तक होते हुए कृतज्ञ है । आज़ समाज में इनका भी “सेलेब्रिटी स्टेटस” है । इसीलिए अनामिका जी इन स्त्रियों की कहानी को ग्लासी पत्रिकाओं की “ सक्सेस सागा” और अख़बारों के पेज़ थ्री का हँसमुख प्रतिपक्ष मानती हैं ।
                      इन सभी स्त्रियों की कहानियों को विस्तार से इस शोध पत्र में चित्रित करना संभव नहीं हैं इसलिए निम्नलिखित चार्ट के माध्यम से इनके बारे में संक्षिप्त जानकारी देने का प्रयास कर रहा हूँ जिससे इनके जीवन संघर्ष और कार्यों की एक सामान्य समझ बन सके ।

अनुक्रम
व्यक्तित्व विशेष
किये गये महत्वपूर्ण कार्य एवं जीवन संघर्ष
1.   
सिंधुताई सपकाल ।

10 साल की उम्र में 30 साल के व्यक्ति से विवाह । लगभग 20 वर्ष की उम्र में नौ महीने की गर्भवती सिंधु पर चरित्रहीनता का आरोप लगाकर पति ने घर से निकाल दिया । ख़ुद की माँ ने भी शरण नहीं दी तो अपनी दुधमुंही बच्ची के साथ रेल्वे स्टेशन पर भीख माँगने के लिये अभिशप्त । भीख में मिले पैसों में से अपनी ज़रूरत  भर का निकाल के शेष राशि साथी भिखारियों में वितरित कर देना । पुणे के दगड़ू सेठ हलवाई के अनाथालय में अपनी ख़ुद की बेटी को रखकर अनाथ बच्चों को पालने-पोसने के बड़े कार्य की शुरुआत । “माई” के रूप में प्रसिद्ध । हजारों लड़कियाँ जो आज़ माई के संरक्षण पलते हुए अपना सुनहरा भविष्य सँजो रहीं हैं, वे इस माई के बिना शायद किसी रेल्वे स्टेशन पर भीख माँगते हुए अल्पायु में वेश्या बनने के लिए अभिशप्त होतीं । 172 से अधिक पुरस्कारों से सम्मानित सिंधुताई अपने सनमती बाल निकेतन, पुणे के माध्यम से एक जाना-माना नाम । हजारों बच्चों को पालने और उन्हें उच्च शिक्षित करने का अनुकरणीय कार्य ।
2.   
नसीमा हुरजूक ।

कमर के निचले हिस्से की संवेदना हाई स्कूल के दिनों से ही धीरे-धीरे लुप्त होती रही । आंपरेशन ने हमेशा के लिए अपाहिज बना दिया । पिता की मृत्यु से आर्थिक परेशानियों की भी शुरुआत । बाबू काका दीवान की प्रेरणा से 1972 में अपंग पुनर्वसन संस्था के गठन का काम शुरू किया । व्हील चेयर पर ही - व्हील चेयर,गोला फेंक,टेबल टेनिस जैसी प्रतियोगिताओं में प्रथम । इंगलैंड भी गयी । अपनी जिद्द से कोल्हापुर में अपाहिजों के लिए खेल प्रतियोगिता का आयोजन कराया । कस्टम विभाग में क्लर्क की नौकरी मिली । सहायता के लिए व्हील चेयर पकड़ने वाले कुछ हांथ गर्दन और पीठ तक सहलाने लगते । लेकिन स्वार्थहीन समर्पण वाले लोग भी मिले जिनकी सहायता से 274 से अधिक बच्चों का सफल आंपरेशन करा उनकी ज़िंदगी नसीमा सँवार चुकी हैं । हेंडिकेप हेलपर्स (कोल्हापुर) इसी संस्था से अनेकों डॉक्टर,इंजीनियर और सी.ए. बनकर निकले । कोल्हापुर और सिंधुदुर्ग में संस्था का विशेष कार्य ।
3.   
लक्ष्मी त्रिपाठी ।

लक्ष्मीनारायण त्रिपाठी उर्फ़ राजू बायोलाजिकल मेल पैदा हुआ था । कक्षा 6-7 तक घोषित रूप से “गे”मुंबई के मिठीबाई कालेज से बी.काम. की पढ़ाई । भरत नाट्यम में पोस्ट ग्रेजुएट ।  यह युवक स्वेछा से हिजड़ा समुदाय में गया बिना बधियाकरण । बचपन से ही पारिवारिक लोगों द्वारा शारीरिक शोषण 4 साल 11 महीने तक बार डांसर के रूप में काम ।  लेकिन पार्टी और सेक्स ही जीवन का लक्ष्य नही हो सकता अतः आजन्म हिजड़ों के अधिकारों के लिये लड़ने का संकल्पशबीना को अपना गुरु मानकर जोग जनम की साड़ी लेकर विधिवत हिजड़ा समाज में शामिल । पेअर येजुकेटर दाई वेलफ़ेयर के अध्यक्ष के रूप में काम । एड्स कंट्रोल सोसायटी के लिये काम ।  “अस्तित्व” की स्थापना । “एक्स डाई फ़ैस्टिवल” में भारत का प्रतिनिधित्व युरोप में करने गयी । आत्मकथा ऑक्सफोर्ड द्वारा प्रकाशित ।
4.   
राजश्री काले नगरकर ।

महाराष्ट्र की प्रसिद्ध लोककला लावणी को सहेजने वाली कोल्हाटी समाज़ की एक जिद्दी लावणीसाम्राज्ञी । माँ “संगीत बारी” की पार्टी चलाती । राजश्री ख़ुद पाँच बहनें । बाबा साहेब मिरजकर (कोल्हापुर) से नृत्य सीखा । अहमदनगर के पास कलिका लोककला केंद्र की स्थापना । आज महाराष्ट्र की एक प्रसिद्ध अभिनेत्री ।  
5.   
सुनीता ताई अरडीकर ।

महाराष्ट्र के लातूर जिले की एक कर्मठ,ऊर्जावान एवं ईमानदार राजनेता के रूप में लोकप्रिय । एक दलित परिवार से बड़े संघर्ष के साथ आगे आना । पैदा होते ही पिता ने जिंदा जमीन में दफ़न किया पर नाना ने जान बचाई । सौतेली माँ ने ज्वारी की रोटी में काँच का बूरा मिला के खिला दिया । दिलीपराव नामक ब्राह्मण युवक से अंतर्जातीय विवाह । यूक्रान्द दल से जुड़ना । नगरपालिका चुनाव जीतना । बेटा आज सफल डॉक्टर । सम्मानपूर्ण जीवन ।
6.   
कुसुम कर्णिक ।

नर्सिंग का कोर्स करने के बाद ढाई साल तक अस्पताल में नर्स की नौकरी करके छोड़ देना । 35 साल की उम्र में मनोविज्ञान में एम.ए. । विवाह के 20 साल बाद 44-45 की उम्र में पति को छोडकर आनंद कपूर के साथ भीमा शंकर के जंगलों में आदिवासियों के लिए काम । पहाड़ी झरने की पतली धारा का पानी संचय करके 99 क्विंटल गेहूँ की पैदावार करना । लैंडशेपिंग का काम । नार्वे और स्वीडन की संस्थाओं के सहयोग से आदिवासी बच्चों के लिए स्कूल चलाना । ड़िभे बाँध के माध्यम से मत्स्य खेती का काम, जिनमें 136 नावें लगी रहती हैं । पड़कई पद्धति द्वारा नये खेतों का निर्माण ।
7.   
शोभा सालुंखे ।

अहमदनगर जिले के रेडलाइट इलाके में त्रासदी भरा जीवन । पति ने ही देह व्यापार में झोंकादेह व्यापार से जुड़ी स्त्रियों के अधिकारों के लिए संघर्ष । स्नेहालय नामक संस्था के लिए काम । आशा, मीना शिंदे और मीना पाटिल ऐसी ही अन्य स्त्रियाँ ।
8.   
गौराबाई ।

देवदासियों के अधिकारों की महत्वपूर्ण लड़ाई लड़नास्वयं देवदासी के रूप में जीवन संघर्ष करना । कोल्हापुर से 60 किलो मीटर दूर गढ़हिंगलज में निवास । सात साल की उम्र में चचेरे दादा –दादी ने येलम्मा  मंदिर में ले गए । पाँच गाँव घूमकर जोग माँगना । जुलवा स्वीकार करने की बजाय मज़दूरी करती । लेकिन मजबूरन करना पड़ा । 25-26 की उम्र में 5 पुरुष जीवन में आए और 02 बच्चे देकर चले गए । दादा-दादी के लिए वह बेटी नहीं रोटी थी । एक दिन हिम्मत करके एक हमाल और पुलिश वाले को तमाचा जड़ा और देवदासियों के अधिकारों की लड़ाई में कूद पड़ना ।  
9.   
गुरुमाई ।


असली नाम विमल लिंग्या स्वामी जंगम । जाति से ब्राह्मण । भीख मांगकर अथवा मृतक से जुड़ी पूजा विधियाँ सम्पन्न करा के जीवन यापन की पारिवारिक पृष्ठिभूमि । आर्थिक तंगी के बीच अपनी माँ के साथ मुंबई आना । धारावी के गणेश मंदिर में शरण । कई तरह के कार्य करने के बाद अंततः श्राद्ध और शव पूजन से जुड़ी विधियों को कराने का कार्य प्रारंभ करनापुरुष पुजारियों द्वारा विरोध झेलना लेकिन अपने काम में आज 30 सालों से लगे रहना ।
10.  
करुणा फुटाने ।


वर्धा के पवनार जिले में आचार्य विनोबा भावे के संरक्षण में कृषि, गो सेवा, शराब बंदी और आदिवासियों के कल्याण के लिए कार्य । वर्धा जिले को दारू मुक्त बनाने का महत्वपूर्ण कार्य ।
11.  
नजूबाई गावित ।

दस भाई-बहनों वाले गरीब आदिवासी परिवार में जन्म। चौथी तक शिक्षा । महाराष्ट्र भर के आदिवासियों के संघर्ष में सदैव आगे । “भिवाफ़रारी”, “तृष्णा” जैसे उपन्यासों के अतिरिक्त कई कहानियों का लेखन । कामरेड शरद पाटिल के साथ आदिवासियों के अधिकारों की लड़ाई में सहभाग ।
12.  
रुपाताई सालवे ।

महाराष्ट्र के एक गरीब दलित परिवार से आना । आर्थिक तंगी के बावजूद उच्च शिक्षित होना । दलित समाज की लड़कियों के लिए छात्रावास निर्माण । उनके अधिकारों की लड़ाई में हमेशा आगे । आंबेडकर को मनुष्य धर्म की तरह आत्मसाथ किया, अवसर की तरह नहीं ।

                इन बारह स्त्रियों के माध्यम से शशिकला जी ने देह व्यापार, भीख माँगने वाली, दलित, आदिवासी, ट्रांसजेंडर, देवदासी, तमाशा, अपंग, मुस्लिम, कर्मकांडी, राजनीति, कृषि कार्य और शराब बंदी से जुड़ी स्त्रियों के जीवन संघर्ष को बड़ी ही गहराई,सच्चाई और मार्मिकता के साथ प्रस्तुत किया है । इन सभी स्त्रियों की कहानियों के बीच से गुजरते हुए पता चलता है कि इस पुस्तक में बारह नहीं तेरह स्त्रियों का संघर्ष अभिव्यकत है । वह तेरहवीं स्त्री कोई और नहीं अपितु लेखिका ख़ुद हैं । लेखिका के ही शब्दों में कहूँ तो – यातना को अभिव्यक्त करना भी यातना है ।2

                            
             इस पुस्तक में वर्णित जितनी भी स्त्रियाँ हैं वे आज के हमारे समाज के डार्क फ़ेस को हमारे सामने लाकर खड़ा कर देती हैं । लेकिन ये इनकी विशेषता नहीं है । विशेषता यह है कि ये सभी स्त्रियाँ अपने जीवन की गंभीर समस्याओं के बीच जूझती हुई श्रम,साहस और संघर्ष की पराकाष्ठा से ऐसा काम कर जाती हैं कि वे अपने जैसी अन्य स्त्रियों के लिए एक अनुकरणीय मार्ग प्रसस्त कर देती हैं । सामाजिक जीवन में श्रम और संघर्ष के महत्व को ये अपने कर्म से प्रस्तुत करती हैं । यथार्थ की ठोस और कठोर जमीन पर अपने श्रम के पसीने से जीवन को अर्थ देनेवाले बीज़ बो रहीं हैं । लैब टू लैंड  वाले सिद्धांत के संदर्भ में देखूँ तो 60 पार की इन स्त्रियों ने अपने जीवन को ही सामाजिक बदलाओं की प्रयोगशाला बना डाली । सामाजिक-साहित्यिक विमर्शों से लदे,पटे और कटे इस दौर में बिना जाति,भाषा,लिंग,क्षेत्र और उम्र का भेद माने औरत को उसके संघर्ष और कामयाबी के बीच गूथना और साहित्यिक कृति के रूप में प्रस्तुत कर देना लेखिका का बहुत बड़ा काम है ।  हिंदी में इस तरह का प्रयोग इसे नयी ताज़गी से भरता है । साहित्यिक विधाओं में इस तरह के प्रयासों की सराहना होनी चाहिए ।
            इस पुस्तक को पढ़ते हुए एक जो बाते मुख्य रूप से उभर कर आती हैं उन्हें निम्नलिखित बिदुओं के माध्यम से स्पष्ट किया जा सकता है ।
·         हिंदी साहित्य में भी लेखन और शोध के परंपरागत ढर्रे के बीच पार अनुशासनिक दृष्टिकोण ( Cross Disciplinary Perspective ) को ध्यान में रखते हुए अंतरविषयी / बहुविषयी शोधकार्यों को महत्व देना पड़ेगा । 

·         साहित्यिक विमर्शों के इस दौर में जहाँ अनुरूपता पर समरूपता भारी पड़ रही है, वहाँ सोच और चिंतन के दायरे को ख़ेमेबाजी / गुटबाजी और गिरोहबाजी से आगे ले जाना होगा ।


·         उत्तर आधुनिकता के बाद जिस मानवतावाद और मानवीय चिंतन की वकालत की जा रही है उस दिशा में लेखनी के फ़लक को विस्तार देना होगा ।

·         उत्तर मानवतावादी सिद्धांत / Post- Humanist Theory जिस तरह सिर्फ़ मनुष्यों ही नहीं अपितु सभी प्राणियों के प्रति उदारता की बात करती है उसे हमें अपने चिंतन का हिस्सा बनाना होगा ।


·         किसी के आत्मसम्मान की लड़ाई किसी और के आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाकर नहीं लड़ी जा सकती इसलिए सहिष्णुता और उदारता को चिंतन का मुख्य तत्व बनाना होगा ।

·         भूमंडलीकरण और बाजारवाद के इस युग में क़ीमत (Price) और मूल्यों (Value)  के बीच जो लड़ाई है उसमें मूल्यों को बचाना कठिन लेकिन बहुत ज़रूरी है ।


·         स्त्रियों, दलितों , आदिवासियों, बच्चों , विकलांगों सहित समाज के हर गरीब और शोषित के अधिकारों की लड़ाई व्यक्तिगत, जातिगत या समूह विशेष की लड़ाई न होकर उस पूरे समाज की लड़ाई होनी चाहिये जो अपने आप को प्रगतिशील और सभ्य मानता है ।

·         व्यवहार और चिंतन में ईमानदारी एक सहज प्रवाह के रूप में होनी चाहिये न कि गुण विशेष के रूप में उसका महिमा मंडन ।


              शशिकला राय जी की यह पुस्तक आनेवाले दिनों में उनकी पहचान का एक केंद्र बिंदु होगा । उनके साहस, संयम, श्रम, प्रतिबद्धता और मानवीय सोच के साथ-साथ जिस एक चीज की सराहना होनी चाहिये वह है मानविकी और समाज विज्ञान के सिद्धांतों को बड़ी सहजता और सूक्ष्मता से अपनी बातों के ताने-बाने में इस तरह पिरो देना कि वो सिद्धांत, साहित्य का ही एक रूप/ हिस्सा बन जाये ।
              कविता की इन पंक्तियों के साथ अपनी बात ख़त्म करना चाहूँगा कि -
                 “ पुल पार करने से, नदी नहीं पार होती
                   उसके लिए पानी में उतरना पड़ता है,
                   धंसना पड़ता है ।’’



                                                डॉ. मनीषकुमार सी. मिश्रा
असोसिएट – भारतीय उच्च अध्ययन केंद्र, शिमला।
प्रभारी – हिंदी विभाग, के.एम.अग्रवाल महाविद्यालय,  कल्याण (पश्चिम), महाराष्ट्र ।
ई मेल : manishmuntazir@gmail.com