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मेरी चुप्पी का गाढ़ा, गहराता हुआ रंग ।

डॉ मनीषकुमार सी. मिश्रा असिस्टेंट प्रोफेसर के.एम.अग्रवाल महाविद्यालय, कल्याण – पश्चिम, महाराष्ट्र ।



तुम्हारे बाद सालों से चुप्पी का एक सिरा पकड़े, बीते समय की कतरनों के साथ कुछ अंदर ही अंदर बुनता रहा । इतने सालों बाद भी जाने क्यों लगता है कि अंदर से बहुत बेचैन हूँ । शायद तुम्हारी उन तीख़ी नजरों के यादखाने में मेरा सुकून आज भी कैद है । मेरे आस-पास पसरी हुई गाढ़ी उदासी का रंग, मेरे अंदर के मौसम को किसी बियाबान में बदल रहा है । कोई बात है जो अंधेरे और तनहाई में फैलती और रोशनी में सिमटकर कंही खो जाती । मेरे अंदर कोई बेतहाशा प्यास है, जिसकी गहरी आँखों में दर्द और प्रेम का अजीब सा ग़ुबार दिखता है । वे आँखे बहुत गहरे कंही उतर कर, सारी हदें पार कर देना चाहती हैं । उन प्यासी आँखों की याचना पर मैंने कई ख़त लिखे ।इतने सालों में, इन खतों का एक पहाड़ सा जमा हो गया है । कई बार सोचा कि इन सारे ख़तों पर तुम्हारा पता लिखकर तुम्हारे पास भेज दूँ । मन बहुत होता है लेकिन हिम्मत नहीं होती । तुम्हें लेकर सारी हिम्मत तो तुमसे ही मिलती थी । अब तुम नहीं हो, बस ज़िन्दगी का शोर है और मेरी चुप्पी का गाढ़ा, गहराता हुआ रंग है ।…

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