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संदेश

अभिलाषा-८

जीवन की सारी तन्हाई , खो कर तुझमे ही बिसराई । तुझसे पहले तेरे बाद , हर हाल मे तेरा ध्यान प्रिये ।

अभिलाषा -७

मन-मन्दिर का ठाकुर तू है , जीवन भर का साथी तू है । तेरी आँखों का सम्मोहन , मेरे चारो धाम प्रिये ।

अभिलाषा-६

तू प्रेम नयन मे जैसे अंजन , तू चाहत का प्रेमी खंजन । लक्ष्य अलक्षित इस जीवन का , तू ही मेरे बना प्रिये । अभिलाषा

अभिलाषा -५

मेरी जीवन वीणा मे , सारे स्वर तुझसे ही हैं । छेड़ूँ जिस भी तार को मैं , सब मे तेरा संगीत प्रिये ।

अभिलाषा-१

मेरा अर्पण और समर्पण सब कुछ तेरे नाम प्रिये । श्वास- श्वास तेरी अभिलाषा, तू जीवन की प्राण प्रिये ।

अभिलाषा-2

तू जीवन सरिता का सरगम संस्कृति का सोपान है तू । सारी सृष्टि समाहित तुझमे , धरा का तू आधार प्रिये । -अभिलाषा

आज तुझे फिर जीने का दिल चाहा है /

आज तुझे फिर जीने का जी चाहा है ; आज फिर यादों ने दिल ललचाया है ; बारिश की फुहारों में तन भीगा है ; तेरी यादों में मन भीगा है ; भाव मचले हैं कितनी तमन्नाओं के साथ ; याद आ रहे हैं गुजरे वाकयात / क्या खूब घटा छाई थी ; भीगी जुल्फों ने मासुकी फैलाई थी ; बारिश की बौछारों ने , बहती बहारों ने , हमारे तन की आतुरता बडाई थी ; मन पे मदहोशी छाई थी ; मखमली बदन के बड़ते अहसास ; मेरे शरारती हाथों के बड़ते प्रयास ; लरजते होठों का तपते होठों से गहराता विस्वास ; बेकाबू जजबातों का ,दो बदनों के बिच मचाया वो उत्पात ; बारिश का मौसम और वो तूफानी रात ; आज तुझे फिर जीने का जी चाहा है ; आज फिर यादों ने दिल मचलाया है /