Tuesday, 24 February 2026

स्वच्छंदतावाद की संकल्पना

 

1. भूमिका : स्वच्छंदतावाद की संकल्पना

स्वच्छंदतावाद (Romanticism) अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में विकसित एक सशक्त साहित्यिक, कलात्मक और बौद्धिक आंदोलन था। यह आंदोलन प्रबोधन युग (Enlightenment) और नवशास्त्रवाद (Classicism) की कठोर नियमबद्धता, तर्कप्रधानता तथा कृत्रिमता के विरुद्ध एक सृजनात्मक प्रतिक्रिया के रूप में उभरा।

‘रोमांटिक’ शब्द की उत्पत्ति ‘रोमांस’ से हुई, जो मध्यकालीन वीरगाथाओं, प्रेम-कथाओं, साहसिक यात्राओं और अलौकिक घटनाओं से संबंधित था। प्रारंभ में इसका अर्थ काल्पनिक, विचित्र या असंभावित माना जाता था, परंतु कालांतर में यह शब्द प्रकृति–प्रेम, कल्पनाशीलता, व्यक्तिवाद और भावनात्मक स्वतंत्रता का पर्याय बन गया।


2. रोमांटिसिज़्म के अर्थ और परिभाषाएँ

आधुनिक अंग्रेज़ी प्रयोग में रोमांटिसिज़्म के चार प्रमुख अर्थ माने गए हैं—

  1. सामान्य के विपरीत – कल्पनाशील और आदर्शवादी प्रवृत्ति

  2. अपेक्षित के विपरीत – असाधारण या स्वप्निल अनुभूति

  3. शाब्दिक के विपरीत – प्रतीकात्मक और रहस्यमय अभिव्यक्ति

  4. परंपरागत के विपरीत – उग्र, भावनापूर्ण और चित्रात्मक शैली

आलोचक W. J. Long के अनुसार रोमांटिक आंदोलन नियमों की दासता के विरुद्ध विद्रोह, प्रकृति की ओर पुनरागमन, मध्यकालीन रोमांस में रुचि तथा व्यक्तिगत प्रतिभा पर बल देने वाला आंदोलन था।

Lascelles Abercrombie ने इसे बाहरी अनुभव से हटकर आंतरिक अनुभव की ओर मुड़ने की प्रवृत्ति बताया।

अतः सरल शब्दों में कहा जाए तो स्वच्छंदतावाद नियमों और कृत्रिमता के विरुद्ध विद्रोह, प्रकृति और मानवीय हृदय की ओर वापसी तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता का उद्घोष है।


3. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और उद्भव

इंग्लैंड में रोमांटिक आंदोलन का औपचारिक आरंभ 1798 में Lyrical Ballads के प्रकाशन से माना जाता है, जिसे William Wordsworth और Samuel Taylor Coleridge ने संयुक्त रूप से प्रकाशित किया। इस कृति ने अंग्रेज़ी कविता को नवशास्त्रीय बंधनों से मुक्त कर प्रकृति और सामान्य जीवन की ओर उन्मुख किया।

हालाँकि रोमांटिक प्रवृत्तियों के बीज एलिज़ाबेथीय साहित्य में पहले से विद्यमान थे। Albert Béguin ने तो यहाँ तक कहा कि “एलिज़ाबेथन हमारे पहले रोमांटिक थे।”


4. नवशास्त्रवाद के विरुद्ध विद्रोह

अठारहवीं शताब्दी का साहित्य, विशेषकर ऑगस्टन युग, तर्क, शिष्टता, संतुलन और शहरी जीवन तक सीमित था। Alexander Pope जैसे कवि बुद्धि और विवेक को प्रधानता देते थे।

फ्रांसीसी आलोचकों François de Malherbe और Nicolas Boileau-Despréaux ने सादगी, संयम और नियमबद्धता को साहित्य का आदर्श माना।

इसके विपरीत रोमांटिक कवियों ने भावना, कल्पना और आत्म-अनुभूति को केंद्र में स्थापित किया। साहित्य सामाजिक अनुकरण से हटकर व्यक्तिगत अनुभूति का माध्यम बन गया।


5. ‘प्रकृति की ओर वापसी’ (Return to Nature)

औद्योगिक क्रांति और शहरीकरण के कारण मनुष्य का जीवन यांत्रिक और कृत्रिम हो गया था। परिणामस्वरूप प्रकृति की ओर लौटने की तीव्र आकांक्षा जागी।

James Thomson की कृति The Seasons में प्रकृति पहली बार केंद्रीय विषय बनी।

आगे चलकर Thomas Gray, Robert Burns, William Cowper आदि ने प्रकृति और सामान्य जनजीवन के प्रति गहरी संवेदना व्यक्त की।

वर्ड्सवर्थ ने प्रकृति को जीवंत आत्मा के रूप में देखा—एक ऐसी सत्ता जो मनुष्य और ईश्वर से एकात्म है।


6. फ्रांसीसी और अमेरिकी क्रांति का प्रभाव

French Revolution (1789) ने ‘Liberty, Equality, Fraternity’ के आदर्शों के माध्यम से स्वतंत्रता और लोकतंत्र की चेतना को जन्म दिया।

इसी प्रकार American Revolution ने भी स्वाधीनता और मानवाधिकारों की भावना को प्रबल किया।

इन क्रांतियों ने Lord Byron, Percy Bysshe Shelley और John Keats जैसे कवियों के क्रांतिकारी आदर्शवाद को प्रेरित किया।


7. जर्मन आदर्शवाद और रहस्यवाद

जर्मन दार्शनिक विचारधारा ने मनुष्य, प्रकृति और ईश्वर के बीच एकात्म संबंध स्थापित किया। यह विचार मुख्यतः कोलरिज के माध्यम से इंग्लैंड पहुँचा।

William Blake ने रहस्यवाद और कल्पनाशीलता को काव्य में सशक्त रूप दिया। उनकी कृतियाँ Songs of Innocence और Songs of Experience रोमांटिक चेतना की आधारशिला हैं।


8. मध्यकालीन पुनरुत्थान (Medieval Revival)

रोमांटिक आंदोलन का एक महत्वपूर्ण पक्ष मध्यकालीन साहित्य का पुनरुत्थान था।

Thomas Percy की कृति Reliques of Ancient English Poetry ने लोकगाथाओं और बैलेड साहित्य में नई रुचि उत्पन्न की।

इसी प्रकार James Macpherson की Ossian तथा Thomas Chatterton की ‘Rowley Poems’ ने मध्ययुगीन चेतना को पुनर्जीवित किया।


9. रोमांटिक कविता की पीढ़ियाँ

प्रथम पीढ़ी के कवि— वर्ड्सवर्थ, कोलरिज, साउथी— ने रोमांटिक आंदोलन की आधारशिला रखी।

द्वितीय पीढ़ी— बायरन, शेली और कीट्स— को “Second Flowering of English Romanticism” कहा जाता है। इन कवियों को अपने जीवनकाल में पर्याप्त मान्यता नहीं मिली, परंतु मरणोपरांत उनकी कीर्ति विश्वव्यापी हुई।


10. स्वच्छंदतावाद की प्रमुख प्रेरणा–भूमियाँ

स्वच्छंदतावाद की प्रेरणा–भूमियाँ बहुआयामी थीं—

  1. प्रबोधन युग का अति-तर्कवाद

  2. फ्रांसीसी एवं अमेरिकी क्रांतियों से उत्पन्न लोकतांत्रिक चेतना

  3. औद्योगिक क्रांति से उत्पन्न यांत्रिक जीवन

  4. जर्मन आदर्शवादी दर्शन

  5. मध्यकालीन साहित्य और एलिज़ाबेथीय परंपरा का पुनरुत्थान

  6. व्यक्तिवाद और आत्म-अनुभूति की उभरती चेतना


11. निष्कर्ष

स्वच्छंदतावाद केवल एक साहित्यिक आंदोलन नहीं था, बल्कि यह एक व्यापक सांस्कृतिक और दार्शनिक चेतना का उभार था। इसने साहित्य को नियमबद्ध अनुकरण से मुक्त कर व्यक्तिगत अनुभूति, कल्पना और स्वतंत्रता का माध्यम बनाया।

तर्क के स्थान पर भावना, बंधन के स्थान पर स्वतंत्रता और परंपरा के स्थान पर नवीनता को प्रतिष्ठित कर स्वच्छंदतावाद ने आधुनिक साहित्य की दिशा बदल दी। यह मनुष्य की अंतःचेतना और प्रकृति–अनुराग का उत्सव है—एक ऐसा आंदोलन जिसने साहित्य को नई संवेदना और नई मानवीय दृष्टि प्रदान की।

Thursday, 19 February 2026

भारतीय ज्ञान परम्परा और पर्यावरण चिंतन '

 🕉️ *सादर अभिवादन* 🙏


दिनांक 24 फरवरी, 2026 को हिंदी विभाग ,इंदिरा गांधी विश्वविद्यालय मीरपुर, रेवाड़ी (हरियाणा)द्वारा आयोजित *एक दिवसीय*  बहुविषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी ( *हाइब्रिड मोड़* ) में सहभागिता के लिए सादर आमंत्रित किया जाता है।

👉 संगोष्ठी का मुख्य विषय : 

         *'भारतीय ज्ञान परम्परा और पर्यावरण चिंतन '* 

👉 संगोष्ठी के विचारणीय *उपविषय* इस प्रकार होंगे–


1.​भारतीय ज्ञान परंपरा की समकालीन प्रासंगिकता

2.​वेद, उपनिषद और दर्शन : पर्यावरण चेतना

3.​पुराण, भगवद्गीता, रामायण, महाभारत : पर्यावरण चेतना

4.​बौद्ध और जैन साहित्य में पर्यावरण चेतना

5.​भारतीय ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक संरक्षण

6.​भारतीय ज्ञान परंपरा का वर्तमान में पर्यावरण, शांति और सतत विकास में योगदान

7.​भारतीय ज्ञान परंपरा और भक्ति साहित्य में पर्यावरण चिंतन

8.​कथा साहित्य, हिंदी कविता, उपन्यास, नाट्य साहित्य,

​कथेतर साहित्य में पर्यावरण चिंतन

9.​भारतीय ज्ञान परंपरा: पर्यावरण, योग, वैश्विक चिंतन

10.​भारतीय ज्ञान परंपरा: प्राकृतिक चिकित्सा और आयुर्वेद

11.​भारतीय ज्ञान परंपरा और प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व

12.​भारतीय ज्ञान परंपरा :  पर्यावरण चिंतन और भारतीय सिनेमा

13.वैदिक वाङ्मय में पर्यावरण चेतना: पृथ्वी सूक्त के विशेष संदर्भ में।

14.​भारतीय लोक पर्व और प्रकृति संरक्षण: हरियाणा के लोक गीतों और परंपराओं का अध्ययन।

15.​रामचरितमानस में प्रकृति चित्रण: एक पारिस्थितिकीय (Ecological) विश्लेषण।

16.​आधुनिक हिंदी कविता और पर्यावरण

17.​NEP 2020 और पर्यावरण साक्षरता: प्राथमिक से उच्च शिक्षा तक प्रकृति बोध का एकीकरण।

18.​भारतीय ज्ञान परंपरा और 'लाइफस्टाइल फॉर एनवायरनमेंट' (LiFE): वैश्विक संकटों का भारतीय समाधान।

​19.​लोक कलाओं में प्रकृति पूजा: मांडणा, मधुबनी और चौक-पूर्णा जैसी परंपराओं में पारिस्थितिकी।

20.​मंदिर स्थापत्य और जल प्रबंधन: भारत के प्राचीन मंदिरों की बावड़ी और तालाब संरक्षण तकनीकें।

21.​ विभिन्न संस्कृतियों में राम के 'मर्यादा' और 'प्रकृति प्रेम' के आदर्श।

​22. ​प्राचीन भारतीय विमानिकी एवं खगोल विज्ञान: पर्यावरण के अनुकूल ऊर्जा स्रोतों की खोज।

23.​आयुर्वेद और 'प्रिवेंटिव हेल्थकेयर': प्राकृतिक जड़ी-बूटियों का औषधीय एवं आर्थिक महत्व।

24.​डिजिटल इंडिया और पेपरलेस वर्क कल्चर: पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक आधुनिक कदम।

​25.​भारतीय संविधान और पर्यावरण संरक्षण: मौलिक कर्तव्यों (Article 51A) के आलोक में नागरिक भूमिका।

26.​​ईको-मार्केटिंग और उपभोक्तावाद: 'भोग' के स्थान पर 'त्याग' की भारतीय अवधारणा।

27.​​प्राचीन भारतीय ग्रंथों में पर्यावरण बोध: वेदों और उपनिषदों के विशेष संदर्भ में।

28.​NEP 2020: शिक्षा के माध्यम से पर्यावरण मूल्यों का बीजारोपण।

​29.​हिंदी साहित्य में प्रकृति चित्रण : आदिकाल से आधुनिक काल तक की यात्रा।

30.​लोक जीवन और पर्यावरण: हरियाणा की लोक-संस्कृति और प्राकृतिक उत्सव।

31.​​योगिक जीवन पद्धति: आंतरिक शांति और बाह्य पर्यावरण का संतुलन।

32.​वनस्पति एवं जीव विज्ञान: जैव-विविधता संरक्षण की भारतीय पद्धतियां।

33.​कंप्यूटर विज्ञान: हरित तकनीकी (Green Tech) और ई-कचरा प्रबंधन।

34.​​पर्यावरण समाजशास्त्र : सामुदायिक भागीदारी और जल संरक्षण की परंपराएं।

35.​राजनीति विज्ञान और वैश्विक नीतियां: पर्यावरण न्याय और भारत की भूमिका।

36.​भूगोल और जीआईएस (GIS): क्षेत्रीय विकास और पारिस्थितिकीय मानचित्रण।

​37.​ग्रीन बिजनेस: वाणिज्य में सतत् विकास (Sustainable Development) के सूत्र।

38.​होटल प्रबंधन: ईको-टूरिज्म और शून्य अपशिष्ट (Zero Waste) की अवधारणा 

👉उपरोक्त उपविषयों के अतिरिक्त मुख्य विषय से सम्बन्धित अन्य किसी शोध विषय पर भी शोध आलेख प्रस्तुत किया जा सकता है।

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डॉ. जागीर नागर  - 9671242990

डॉ. अर्चना यादव  - 9416343568

Sunday, 1 February 2026

बुखारेस्ट में संपन्न क्षेत्रीय हिंदी सम्मेलन

बुखारेस्ट में संपन्न क्षेत्रीय हिंदी सम्मेलन 

बुखारेस्ट, रोमानिया | 28–29 जनवरी

रोमानिया की राजधानी बुखारेस्ट स्थित रोमानियन–अमेरिकन यूनिवर्सिटी के सभागार में 28–29 जनवरी को भारतीय दूतावास के तत्वावधान में एक क्षेत्रीय हिंदी सम्मेलन का सफल आयोजन किया गया। इस सम्मेलन का उद्देश्य भारत के बाहर हिंदी शिक्षण की वास्तविक चुनौतियों, भाषा-विज्ञान से जुड़ी समस्याओं तथा उनके व्यावहारिक समाधानों पर केंद्रित संवाद स्थापित करना था।

इस आयोजन के मेज़बान भारतीय उच्चायोग, बुखारेस्ट के श्री सीतेश सिन्हा रहे। सम्मेलन में यूरोप, अमेरिका और भारत से हिंदी भाषा एवं साहित्य से जुड़े प्रतिष्ठित शिक्षाविदों, अध्यापकों एवं शोधकर्ताओं ने सहभागिता की।





सम्मेलन का उद्घाटन रोमानियन–अमेरिकन यूनिवर्सिटी के रेक्टर प्रो. कोस्टेल नेग्रिसिया ने किया। उन्होंने भारत–रोमानिया सांस्कृतिक संबंधों को रेखांकित करते हुए रोमानिया में हिंदी को एक सशक्त और सम्मानजनक मंच प्रदान करने का आश्वासन दिया।

भारत के राजदूत महामहिम श्री मनोज कुमार महापात्र ने हिंदी शिक्षण एवं प्रशिक्षण की भावी योजनाओं पर प्रकाश डालते हुए विदेश मंत्रालय का आभार व्यक्त किया, जिसने विश्वभर के हिंदी विद्वानों को एक साझा मंच प्रदान किया।

भारत से पधारीं श्रीमती अंजु रंजन (संयुक्त सचिव, विदेश मंत्रालय) ने इतने कम समय में वैश्विक स्तर के हिंदी प्रेमियों की उपस्थिति पर संतोष व्यक्त किया तथा विदेशों में हिंदी शिक्षण को सुदृढ़ बनाने हेतु मंत्रालय की प्रतिबद्धता दोहराई।

इस सम्मेलन में स्वीडन, डेनमार्क, नीदरलैंड, यू.के., जर्मनी, बुल्गारिया, स्पेन, आर्मेनिया, पोलैंड, तुर्की, हंगरी, रोमानिया, मोल्दोवा, क्रोएशिया, कज़ाख़स्तान, अमेरिका, सर्बिया तथा भारत से कुल 20 से अधिक प्रतिनिधियों ने भाग लिया

स्वच्छंदतावाद की संकल्पना

  1. भूमिका : स्वच्छंदतावाद की संकल्पना स्वच्छंदतावाद (Romanticism) अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में विकसित एक सशक्त साहित्यिक, कलात्मक और...