Sunday, 21 March 2010

बोध कथा ८ :कछुए और खरगोश क़ी आगे क़ी कहानी

बोध कथा ८ :कछुए और खरगोश क़ी आगे क़ी कहानी
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 आप में से शायद ही कोई हो जिसे कछुए और खरगोश क़ी कहानी मालूम ना हो .लेकिन वह कहानी जंहा ख़त्म होती है ,वँही से मैं यह नई कहानी शुरू कर रहा हूँ.आशा  है आप लोंगों को पसंद आएगी .
 --------------तो जैसा क़ी आप जानते हैं क़ि कछुए और खरगोश क़ी दौड़ में कछुआ विजयी होता है.यह बात जब जंगल में फैलती है तब खरगोश का बड़ा मजाक उड़ाया जाता है. हर कोई खरगोश को ताने देने लगता है. बेचारा खरगोश बहुत दुखी होता है. उसे समझ में नहीं आता क़ि वह क्या करे? अंत में वह निर्णय लेता है क़ि  वह शांतिपूर्वक अपनी हार का कारण समझने क़ी कोशिस करेगा.बहुत चिन्तन-मनन करने के बाद उसे यह बात समझ में आ गयी क़ि ,''शत्रु या प्रतिस्पर्धी को कभी भी कमजोर नहीं समझना चाहिए .साथ ही साथ अति आत्मविश्वाश से भी हमे नुकसान उठाना पड़ता है.''इस बात को अच्छी तरह समझ कर वह फिर से कछुए से शर्त लगाने क़ी योजना बनता है. इसी संदर्भ में बात करने के लिए वह कछुए के घर जाता है. कछुआ उसका ह्रदय से स्वागत करता है. थोड़े अल्पाहार के बाद कछुए ने खरगोश से पूछा -''कहो मित्र कैसे  आना हुआ ?'
 खरगोश बोला,''भाई ,मैं तो आप को पिछली जीत क़ी बधाई और नई दौड़ प्रतियोगिता के लिए आमंत्रित करने के लिए आया हूँ.आशा है तुम इनकार नहीं करोगे.'' कछुए ने मन ही मन सोचा क़ि वह तो खरगोश को एक बार हरा ही चुका है,दुबारा दौड़ लगाने में मेरा क्या नुकसान .और बिना कुछ सोचे समझे अति उत्साह में वह हाँ  बोल देता है. और दूसरे दिन फिर दौड़ शुरू होती है.इस बार भी खरगोश बहुत आगे निकल आता है. कछुआ बहुत पीछे छूट  गया रहता है. खरगोश ने इस बार पक्का निर्णय लिया था क़ि जब तक वह दौड़ जीत नहीं जाता ,वह कंही रुकेगा नहीं.परिणामस्वरूप इस बार दौड़ खरगोश जीत जाता है.और अपने अपमान का बदला लेने में कामयाब हो जाता है.
 लेकिन इस घटना से कछुआ बड़ा दुखी होता है. उसे लगता है क़ि नाहक ही उसने दुबारा दौड़ के लिए हाँ किया.जंगल में उसकी कितनी इज्जत बढ़ गयी थी,लेकिन सब किये कराये पर पानी फिर गया. वह चुप -चाप घर पर पड़े-पड़े सोचने लगा क़ि आखिर वह इस बार हार क्यों गया ? .और बहुत सोचने के बाद उसे समझ में आया क़ि,''हर व्यक्ति के अंदर कुछ प्रकृति दत्त क्षमताएं हैं.वह उसी के अंदर हो सकती हैं. खरगोश जमीन पर हर हाल में मुझसे दौड़ में जीत जाएगा.मैं जमीन पर उसका मुकाबला नहीं कर सकता.यह उसकी प्रकृति है.मैं पानी में तेज चल सकता हूँ,जब क़ि खरगोश नहीं.यह मेरी प्रकृति है.''यह सोचते हुवे ही कछुए के मन में एक बात आती है. वह सोचता है क़ि अगर दौड़ नदी के उस पार तक लगायी जाए तो मेरी जीत सुनिश्चित है,क्योंकि खरगोश नदी पार नहीं कर पायेगा .बस फिर क्या था ,कछुआ खरगोश के पास जाकर बोला,''खरगोश भाई,आप को जीत मुबारक हो.आप के कहने पर मैंने दुबारा शर्त लगाई.अब मेरी इच्छा है क़ि कल एक बार फिर हम दोनों दौड़ लगाएं.लेकिन इस बार हम नदी के उस पार आम के पेड तक जायेंगे.बोलो,मंजूर है ?'' खरगोश कुछ समझ नहीं पाया.उसने भी शर्त के लिए हाँ कर दिया .
                                                     एक बार फिर दौड़ शुरू हुई. नदी तट तक तो खरगोश आगे रहा ,पर वह नदी पार नहीं कर सकता था.नदी का प्रवाह तेज था और नदी गहरी थी.परिणामस्वरूप वह वँही रुक गया.जब क़ि कछुआ आसानी से नदी पार कर,आम के पेड तक पहुँच गया.और इस तरह इस बार की दौड़ कछुआ जीत गया.इस जीत से वह खुश हुआ .उधर खरगोश अपनी हार से निराश था.वह समझ गया था क़ि कछुए ने चालाकी से काम लिया है.
 बहुत दिनों बाद दोनों फिर मिले और अपनी हार-जीत पर बातें करने लगे.बहुत लम्बी चर्चा के बाद दोनों इस निष्कर्ष पर पहुंचे क़ि,
 ''हर व्यक्ति क़ि क्षमता अलग-अलग होती है.अगर हम परस्पर सहयोग और सहकारिता क़ी नीति पर चलते हुए कार्य करें,तभी हम आगे बढ़ सकते हैं.सच्ची शक्ति इस आपसी सहयोग में ही है.आपसी प्रतिस्पर्धा में नहीं.एकता ही हमे अलौकिक शक्ति प्रदान कर सकती है.इसलिए हमे एक होकर काम करना चाहिए.''
 अपनी इसी बात को जंगल में सभी को समझाने के लिए दोनों एक बार फिर से नदी के उस पार तक दौड़ लगाते हैं. इस बार जब तक जमीन पर दौड़ना था,तब तक कछुआ ,खरगोश क़ी पीठ पर बैठा रहा.और जब नदी पार करने क़ी बात आयी तो खरगोश ,कछुए क़ी पीठ पर बैठ गया. इसतरह परस्पर सहयोग से दोनों ने दौड़ पूरी क़ी और दोनों ही संयुक्त विजेता घोषित किये गए.सारा जंगल उनकी बुद्धिमानी क़ी चर्चा कर रहा था.दोनों का ही सम्मान जंगल में बढ़ गया था.
             इस तरह इस नई कहानी से हमे सीख मिलती है क़ि ताकत जोड़ने से बढती है ,और आपसी सहयोग से नामुमकिन कार्य भी मुमकिन हो जाता है. इसलिए हमे हर किसी क़ि क्षमता के अनुरूप उसका सम्मान करना चाहिए.किसी को भी कमजोर नहीं समझना चाहिए.किसी ने लिखा भी है क़ि 
                           '' हाँथ पकडकर एक-दूजे का,
                     आगे ही आगे बढो .
                  एकता क़ी शक्ति के दम पर,
                  मुमकिन सब तुम काम करो ''   
                                                                                                  डॉ.मनीष कुमार मिश्रा 
                                                                                        onlinehindijournal.blogspot.com
 
  
 



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Saturday, 20 March 2010

मुफलिसी के जख्मों से लहलुहान ,

मुफलिसी के जख्मों से लहलुहान ,

जिन्दा है मानों बिना प्राण ,

मुफलिसी के जख्मों से लहलुहान ;

बड़ा जीवट है ,खूं में उसके ,

स्वाभिमान है मन में उसके ;

मुफलिसी के जख्मों से लहलुहान ;

सांसों का भावों से रिश्ता ,

तिरस्कार से धन का नाता ;

वो मुफलिसी और उसका रास्ता ;

किस्से तो दुनिया बुनती है ,

उसको सिर्फ उलाहना ही मिलती है ;

रक्तिम आखें हाथों में छाले ,

ढलती काया पैरों को ढाले ;

संघर्ष से वो कब भागा है ;

स्वार्थ नहीं उसने साधा है ;

साधारण लोग किसे दिखते हैं ;

सब पैसे और ताकत को गुनते हैं ;

मुफलिसी के जख्मों से लहलुहान ,
जिन्दा है मानों बिना प्राण
/

बोध कथा -७ : माँ

बोध कथा -७ : माँ
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                                          बहुत पुरानी बात है. एक जंगल के करीब एक छोटा सा गाँव था. उस गाँव में  व्योमकेश नामक एक  बड़ा ही प्रतिभा शाली मृदंग वादक रहता था. उसकी कीर्ति चारों तरफ फ़ैल रही थी. वह मृदंग वादक सुबह -सुबह जंगल क़ी  तरफ निकल जाता,और एक छोटी सी पहाड़ी पर बैठकर अपना रियाज शुरू कर देता  था. 
                                       वह मृदंग इतनी खूबसूरती के साथ बजाता क़ी जंगल के कई प्राणी उसके आस-पास आकर खड़े हो जाते और उसे मृदंग क़ी थाप देते हुए घंटो देखते रहते. इन्ही जंगली जानवरों में एक छोटा सा हिरन का बच्चा भी था.वह भी रोज सभी जानवरों के साथ आता.लेकिन जब वह मृदंग वादक मृदंग बजाना शुरू करता तो , वह हिरन का बच्चा  ना जाने क्यों रोना शुरू कर देता .और जब मृदंग बजाना बंद हो जाता तब वह चुप-चाप वंहा से जंगल क़ी तरफ चला जाता.
                                      जंगल के सभी जानवर उस नन्हे हिरन शावक के व्यवहार को समझ नहीं पा रहे थे.खुद मृदंग वादक भी इस बात को समझ नहीं पा रहा था.आखिर एक दिन उस मृदंग वादक ने  फैसला किया क़ि वह इस बात का पता लगा कर रहेगा क़ि आखिर वह हिरन शावक मृदंग बजता देख रोता क्यों है ? अगले दिन जब सभी जानवरों के साथ वह हिरन शावक आया तो मृदंग वादक ने धीरे से उसे पकड़ लिया.वह शावक घबरा गया.सभी जानवर उसे  छोड़ के जंगल क़ी तरफ भाग गए.
                                  उस मृदंग वादक ने उस शावक को गोंद  में उठा कर कहा,'' हे हिरन शावक ,क्या मैं इतना बुरा मृदंग बजाता हूँ क़ी तुम्हे रोना आता है ?'' इस पर उस शावक ने कहा,'' नहीं,ये बात नहीं है.''  इस पर उसने फिर प्रश्न किया,'' तो तुम्हारे रोने का कारण क्या है ?'' इस बात का जवाब देने से पहले ही उस शावक क़ी आँखों से फिर आंसूं बहने लगे.वह रोते हुवे ही बोला,'' आप मुझे गलत ना समझें, दरअसल बात ये है कि आप के मृदंग पे जो हिरन की खाल चढ़ी है,जिससे इतनी सुंदर ध्वनि निकलती है.वो खाल मेरी माँ क़ी है.जिस दिन मैं पैदा हुआ था उसी दिन एक शिकारी ने उसका शिकार कर लिया था.फिर वही खाल आपने खरीदी थी. आप जब इस खाल को बजाते हैं तो मुझे लगता है कि मेरी माँ-------'' इतना कहते ही उस नन्हे शावक का गला भर आया. मृदंग वादक की  आँखों में भी आंसूं थे. वह उस शावक को वँही छोड़ कर अपने घर की  तरफ चला गया.वह मृदंग वँही पड़ा था.नन्हा शावक उस मृदंग क़ी खाल को प्रेम से चाट रहा था. मानों कह रहा हो-
                              '' तेरे बिना बहुत अकेला हो गया हूँ माँ , 
                                तुझ सा ना जग में कोई प्यारा है माँ .''  

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Friday, 19 March 2010

तुझे याद नहीं मै करता ,

तुझे याद नहीं मै करता ,

तू रोज मुझे सपनों में दिखता ;

तुझे याद नहीं मै करता ;

दिन भर उलझा रहता हूँ कामों में ,

थम जाता हूँ राहों में ,

पत्नी बच्चों की आकान्छाओं को ,

पूरा करना है अपनो की आशाओं को ;

सो जाता हूँ इसी उधेड़बुन में ,

और तू आ जाता है ख्वाबों में ;

तुझे याद नहीं मै करता ,

तू रोज मुझे सपनों में मिलता;

वक़्त मिले तो परिवार की उलझन ,

कभी बीमारी कभी पैसों का क्रंदन ;

बहुधा तेरी विधी से चलता हूँ ,

पर याद नहीं तुझे करता हूँ ;

अनजान पलों में नाम तेरा मुंह पे आता है ,

एक पल को हाथ तेरी छाया छू जाता है ;

पर याद नहीं तुझको करता हूँ ;

दिल पे मै पत्थर रखता हूँ ;

तुझे याद नहीं मै करता ,

तू सपनों में मुझपे हँसता ;

तुझे याद नहीं मै करता ,

तू मेरे हर सपनों में रहता ,

तुझे याद नहीं मै करता /

Thursday, 18 March 2010

गर्दिशों का दौर कुछ इस कदर आता है ,

तक़दीर जब बिगड़ जाती है ,
तकलीफें हर रोज नया रास्ता तलाश आती हैं ;
दुविधाएं हर ओर बिखर जाती है ,
इल्जामों की बहार छा जाती है ;
जो कायल थे तेरी मासूमियत के ,
उन्हें भी बातों में सियासत नजर आती है ;
तक़दीर जब बिगड़ जाती है ,
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गर्दिशों का दौर कुछ इस कदर आता है ,
अपनो को भी तेरे रिश्तों में चोर नजर आता है ;
लोगों के अंदेशों की सीमा नहीं बचती है ,
कितनो को तेरी अच्छाई भी बुराई सी दिखती है /
तक़दीर जब बिगड़ जाती है /
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बिगड़ा नसीब भी बड़ा गुल खिलाता है ,
दर्द हर मोड़ पे मिल जाता है ;
जब भी कोई जिंदगी में गिरता नजर आता है ;
शक का कीड़ा कईयों को काट जाता है ,
भाग्य जब रूठे तो आछेपो की बन आती है ;
अपनो को भी तेरी नीयत में खोट नजर आती है ;
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तक़दीर जब बिगड़ जाती है ,
तकलीफें हर रोज नया रास्ता तलाश आती हैं ;

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वक़्त काट ये वक़्त भी गुजर जायेगा ,
तेरी सच्चाई का चांटा कितनो के चेहरे पे नजर आएगा ;
जिनके दिल में कालिख उनके बातों की परवा क्यूँ हो ,

अपने का नकाब पहने दुश्मन की खुदाई क्यूँ हो ;
तुझपे उछाले कीचड़ का दाग उनपे नजर आएगा ;

वक़्त काट ये वक़्त भी गुजर जायेगा /

तेरी कमियों की खोज सबब हो जिसका ,
तुझे गिराना ही सारा चरित्र हो जिनका ;
उनका व्यवहार भी सबको समझ आएगा ,
वक़्त काट ये वक़्त भी गुजर जायेगा ,;

मनुष्य का भाग्य जब बदल जाता है ,
मुंशिफ बन जाये राजा ज्ञानी धूल खाता है;
वर्षों की मेहनत पल में खाक बन जाती है ;
राह चलते को मिटटी में दौलत नजर आ जाती है ;
वक़्त काट ये वक़्त भी गुजर जायेगा ,
तेरी सच्चाई का चांटा कितनो के चेहरे पे नजर आएगा /
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बोध कथा-६: भौतिकता

बोध कथा-६: भौतिकता 
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                                         कविता अभी ४ साल क़ी ही है. लोगों को यह लगता है क़ि वह बड़ी खुशनसीब है. उसके पिताजी किसी बड़ी विदेशी कंपनी में मैनेजर हैं. माँ भी कॉलेज में अध्यापिका हैं. घर में पैसे क़ी कोई कमी नहीं है. फिर कविता अपने माँ-बाप क़ी इकलौती संतान है.वह जो चाहती है,वह वस्तु उसे तुरंत दिला दी जाती. उसकी देख -रेख  करने के लिए घर में आया भी थी. माँ-पिताजी दोनों घर से बाहर रहते.ऐसे में अकेले ही कविता बोर हो जाती. उसे घर से बाहर भी जाने क़ी इजाजत नहीं थी.सिर्फ रविवार को माँ-पिताजी दोनों ही घर पे रहते.लेकिन उनका घर पर रहना भी ना रहने क़ी ही तरह था.वे दोनों अपने ऑफिस और महाविद्यालय क़ी ही बातों में उलझे रहते.कविता क़ी तरफ ध्यान देने का उन्हें मौका ही नहीं मिलता.
                                     ऐसे ही एक रविवार को जब दोनों लोग घर पे थे,कविता पहले दौड़ कर माँ के पास गई और बोली,''माँ ,आज तो छुट्टी है ना ? फिर मेरे साथ खेलो ना ." कविता क़ी बात सुनकर माँ बोली,'' अरे बेटा,बहुत काम है.मुझे बच्चों के पेपर चेक करने हैं.एक काम करो, तुम पापा के साथ जा कर खेलो .'' इसतरह माँ ने कविता को टाल दिया और वापस अपना काम करने लगी.
              माँ के पास से कविता पिताजी के पास आ गई. उसके पिताजी भी अपने   
 लैपटॉप  पर कुछ  जरूरी काम  कर रहे थे. कविता ने उनसे भी वही बात कही. इस पर उसके पिताजी मुस्कुराते हुए बोले,'' अगर मैं आप के साथ खेलूंगा  तो पैसे कौन  देगा ? आप जाओ ,मुझे जरूरी काम है. परेशान मत करो.''कविता चुप-चाप उलटे पाँव अपने कमरे में चली आयी. थोड़ी देर रोती रही .फिर अचानक उसका ध्यान अपने पैसों के गुल्लक पर गया. वह उस गुल्लक को लेकर अपने पिताजी के पास गई और बोली,''पापा, मेरे पास जितने पैसे हैं आप सब ले लो.पर मेरे साथ खेलो ना ,प्लीज़ .''
              मासूम कविता क़ी बातें सुनकर उसके पिता अवाक रह गए .उन्होंने कविता को अपनी गोंद में उठा लिया.और बोले,''बेटा ,मुझे माफ़ कर दो.इस पैसे और भौतिकता क़ी दौड़ में  अपने पिता होने क़ी जिम्मेदारी को भूल गया था.आज तुम ने मेरी आँखें खोल दी .''
                                                        इस तरह कविता के पिता को अपनी गलती समझ में आयी.कविता जैसे बच्चों के लिए ही शायद किसी ने कहा है कि--------- 
                                         '' सब के साथ है,मगर अनाथ है.
                              आज का बचपन बहुत बेहाल है .''        

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Wednesday, 17 March 2010

रहता है मेरे दिल में

रहता है मेरे दिल में,
मगर उसे मिलूं कैसे ;
खिले कमल की पंखुड़ियों को छुयूं कैसे ,
तेरे सपनों को आगोस में भर लूँ ,
तेरा झिझगता विश्वास है,
मै उसको छुयूं कैसे ;
तेरी उलझन सुलझा मै दूँ
तेरी दुविधाओं को मान भी लूँ ,
तेरा इकरार जिऊ कैसे ?

मुंबई क़ी महालक्ष्मी देवी

 नवरात्री के इस पावन अवसर पे मुंबई क़ी महालक्ष्मी देवी क़ी यह तस्वीर आप लोंगो के दर्शनार्थ यंहा ब्लॉग पर ड़ाल रहा हूँ.                                    
********* जय माता दी *********

 

बोध कथा-५ : विश्वाश

बोध कथा-५ : विश्वाश
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      आज शाम जब मीमांसा अपनी माँ के साथ घूमने निकली,तो रास्ते में चलते हुए छोटी मीमांसा बार-बार पीछे छूट जा रही थी. ५ साल क़ी मीमांसा के लिए यह मुमकिन नहीं  हो रहा था क़ि वह अपनी माँ के साथ कदम ताल कर सके. आज माँ भी कुछ अधिक ही जल्दी-जल्दी चल रही थी. दरअसल वे जिस अस्पताल में काम करती थी,वंहा उन्हें जल्दी पहुंचना था.अस्पताल से फ़ोन आया था. अस्पताल में किसी मरीज क़ी तबियत अचानक खराब हो गई थी .
          माँ बार-बार मीमांसा से जल्दी -जल्दी चलने के लिए कह रही थी. मीमांसा क़ी हर कोशिश ना काफी साबित हो रही थी. अंत में हार कर उसने माँ से कहा,''माँ,आप मेरा हाथ पकड़ लो, आगे नदी भी है.मुझे डर लगता है.'' माँ ने मीमांसा क़ी तरफ देखा और हस्ते हुए बोली,''बेटा,डर तुम्हे लगता है.तो फिर तुम ही मेरा हाँथ क्यों नहीं पकड़ लेती ?'' माँ क़ी बात सुनकर मीमांसा ने उनका हाँथ तो पकड़ लिया ,मगर वह मन में कुछ सोच रही थी.अचानक ही वह फिर बोली,''माँ ,जब मैं तुम्हारा हाँथ पकडती हूँ तो अपने डर के कारण पकडती हूँ.इसलिएआपका हाँथ पकड़ने के बावजूद , मेरे मन का डर बना रहता  है.लेकिन जब आप मेरा हाँथ पकड़ लेती हो तो मुझे विश्वाश हो जाता है क़ि अब मुझे कुछ नहीं होगा.मैं डर के साथ नहीं विश्वाश के साथ आगे तेजी से चल पाउंगी,इसलिए आप मेरा हाँथ पकड़ लीजिये .''
                                  अपनी छोटी सी बेटी के मुह से इतनी समझदारी भरी बातें सुनकर माँ का दिल भर आया.माँ ने मीमांसा को गोंद में उठा कर उसे कई बार चूमा.और उसे गोंद में लेकर आगे बढती रही . कितनी सच्चाई थी उस छोटी सी बच्ची क़ि बातों में.अनायास ही किसी क़ि ये पंक्तियाँ याद आ जाती हैं क़ि ----
                           '' विश्वाश जंहा पे कायम है, 
                              जीत वँही पे रहती है.
                              विश्वाश जंहा पे टूटा है, 
                              इंसान वही पे हारा है .''  

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Tuesday, 16 March 2010

बोध कथा-४ : मासूम सवाल

बोध कथा-४ : मासूम सवाल 
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                         रोहन आज सुबह से अपने पिताजी से जिद कर रहा था क़ि उसे आइसक्रीम खानी है. रोज-रोज क़ी जिद पिताजी को पसंद नहीं आई और गुस्से में उन्होंने एक झापड़ रोहन को लगा  दिया.पिताजी के इस व्यवहार से मासूम रोहन अंदर तक काँप गया.वह चुप-चाप रोता हुआ अपने कमरे में दाखिल हो गया.रोते-रोते उसे कब नीद आ गयी ,यह वह खुद भी ना समझ पाया.
                    इधर पिताजी को भी अपना व्यवहार कुछ अधिक ही कड़क लगा.रोहन अभी सिर्फ ५ साल का मासूम बच्चा है.मुझे उसे प्यार से समझाना चाहिए था.उस पर  हाँथ उठा कर मैंने अच्छा नहीं किया. इसी तरह के विचारों में खोये हुए रोहन के पिताजी भी अपनी आराम कुर्सी पर सो गए.अचानक जब आँख खुली तो देखा कि दिन ढल चुका था. रोहन भी सब भूल कर घर के सामने दुसरे बच्चों के साथ खेल रहा था. उसकी मासूम सूरत पर नजर पड़ी तो पिताजी को अपना वह झापड़ याद आ गया,जो आइसक्रीम क़ी जिद्द क़ी वजह से उन्होंने रोहन के गाल पर लगाया था.रोहन तो सब भूल गया था पर पिताजी का मन अंदर ही अंदर कचोट रहा था.
              वे उठकर अपने कमरे में गए और बटुवे में से २० रुपये निकाल कर ले आये.उन्होंने धीरे से रोहन को अपने पास बुलाया.उसे पैसे देते हुए बोले ,''जाओ आइसक्रीम खरीद लो .'' पिताजी क़ी बात सुनकर रोहन का चेहरा खिल गया.और पैसे ले कर वह दुकान क़ी तरफ दौड़ पड़ा.दुकान पर जा कर उसने दुकानदार को पैसे देते हुए कहा,'' अंकल,आइसक्रीम देना .'' दुकानदार ने पैसे ले कर आइसक्रीम दे दी. रोहन  आइसक्रीम लेते हुए बोला ,''कितना पैसा बचा ?'' उसकी बात पर दुकानदार बोला,''कुछ नहीं बचा .२० रुपए क़ी ही आइसक्रीम है. इससे कम वाली नहीं है .''
        दुकानदार क़ी बात सुनकर रोहन हतप्रभ सा खड़ा रहा.उसे समझ नहीं आ रहा था क़ी वह क्या करे.उसे इस तरह देख कर दुकानदार बोला,''क्या हुआ ? आइसक्रीम चाहिए क़ी नहीं ?'' इस प्रश्न से रोहन क़ी एकाग्रता भंग हुई.उसने कहा,''आइसक्रीम तो चाहिए ,लेकिन-------और--पैसे -------'' दुकानदार कुछ समझ नहीं पा रहा था. उसने झल्लाते हुए कहा,''वाह,नवाब साहब को आइसक्रीम भी चाहिए और पैसे भी.'' यह सुनकर रोहन बोला,'' अगर मैं पूरे पैसे क़ी आइसक्रीम ले लूँगा तो आप को टिप देने के लिए मेरे पास एक भी पैसे नहीं बचेंगे.मेरे पास इतने ही पैसे हैं.अगर आप थोड़ी सस्ती आइसक्रीम देते ,तो मै आप को टिप भी दे पाता .लेकिन------.''
      मासूम रोहन क़ी बातें सुनकर दुकान दार क़ी आँखें भर आयीं.और उसने आइसक्रीम रोहन क़ी तरफ बढ़ाते हुए कहा,''बेटा,तुम आइसक्रीम ले लो.मैं भूल गया था,यह १५ रूपए क़ी ही है.क्या मैं बाक़ी के ५ रुपए टिप रेख लूं ?'' रोहन क़ी खुशी का ठिकाना ना रहा. उसने हाँ में सर को हिलाया और आइसक्रीम को लेकर घर क़ी तरफ बेतहाशा दौड़ गया. दुकानदार के चेहरे पर हंसी और आँखों में आंसू थे.पास ही खड़े एक फ़कीर ने शांति के साथ यह सब देखा .अचानक ही उसके मुह से ये शब्द निकल पड़े------ 
                  ''  उसका अंदाज सबसे  जुदा होता है,
                    मासूम खयालों में खुदा होता है.'' 




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आखें मींच के सो के उठना ,

आखें मींच के सो के उठना ,

उठते ही वो चेहरा ढूढ़ना ;

दिन में उसकी यादों से यारी ,

रातों को आखों में वारी ;

---

सोचों में अब भी वो रहती ,

सपनों में अब भी वो दिखती ;

उसकी झलक को आखें तरसी ,

दिल में मेरे अब भी वो बसती ;

---

राह न दिखती चाह की कोई ,

आभास नहीं है आस ना कोई ;

पागल मन उन्मुक्त सा खोजे ;

डोर न मिलती प्यार की कोई ;

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खोजूं मै निगाहें वही ,

जानू केवल बाहें वही ;

अँधियारा कितना भी फैले ,

चाहूँ मै आभासें वही /

---

आखें मींच के सो के उठना ,
उठते ही वो चेहरा ढूढ़ना ;
दिन में उसकी यादों से यारी ,
रातों को आखों में वारी ;

Monday, 15 March 2010

जो तू न स्वीकार कर सकी वो तेरा अतीत हूँ , 5

अवधरण हूँ ,आवरण हूँ ,
अतिक्रमण हूँ ,अनुकरण हूँ ;
जिसे तू ना सँवार सकी ,
वो तेरा आचरण हूँ /
----
अनिमेष हूँ , अवधेश हूँ ,
अभिषेक हूँ ,अवशेष हूँ ;
जिसे ना तू सहेज सकी ,
वो तेरा अधिवेश हूँ /
---
---
अमान्य हूँ ,अवमान्य हूँ ,
अरीति हूँ ,अप्रीति हूँ ,
जो तू ना स्वीकार कर सकी ,
वो तेरा अतीत हूँ /


जब दिल का मसला होता है.

निर्णय लेना कठिन बहुत है ,
जब दिल का मसला होता है.
हर हालत में चुपके-चुपके,
छिप कर रोना पड़ता है .  

Sunday, 14 March 2010

मैं भी चुप था,वो भी चुप थी ,

मैं भी चुप था,वो भी चुप थी  ,
फिर हो गई कैसे ,बात न जानू .
इधर लगन थी,उधर अगन थी,
लग गई कैसे आग ना जानू .

ना जाने कितने फूलों पर,
बन भवरा मैं ,मंडराया हूँ .
पर क्यों ना मिटी,
ये प्यास ना जानू . 

जिस मालिक के हम सब बच्चे,
है राम वही ,रहमान वही.
फिर आपस में खून -खराबा ,
क्यों हो बैठा मै ना जानू .

हिन्दू-मुस्लिम सिख इसाई ,
ये सब हैं भाई-भाई .
फिर झगड़ा मंदिर -मस्जिद का, 
कैसे हुआ ,ये मैं ना जानू .
 
  

बोध कथा-3: तेरा जलना ,मेरा सुलगना

बोध कथा-3: तेरा जलना ,मेरा  सुलगना 
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एक रात  जब शमा  जल रही थी ,तो अचानक उसका ध्यान पिघलते  हुए मोम पे गया.उस मोम  को देख एक मासूम सा सवाल शमा के मन में उठा.उसने  पिघलते हुए मोम से कहा-''हे सखे, मैं तो जल ही रही हूँ,ताकि अँधेरे को कुछ समय तक दूर रख सकूँ.जब सुबह होगी तो मेरा काम खत्म हो जायेगा.लेकिन तुम इसतरह पिघल क्यों रहे हो ?तुम क्यों पिघलना चाहते हो ?
 शमा क़ी बात सुन कर मोम कुछ पल खामोश रहा,फिर धीरे से बोला-''हे शुभे,हमारा साथ विधाता ने सुनिश्चित किया  है.लेकिन ये हमारी नियति है क़ी जब सारी दुनिया के लोग  प्रेम के आलिंगन में मस्त रहते हैं,तो उसी समय तुम अँधेरे से लड़ने के लिए स्वयम जलती रहती हो.ऐसे में मैं एकदम निसहाय बस तुम्हे जलता हुआ देखते रहता हूँ. हे प्रिये, तेरे  जलने पर मेरा पिघलना तो सहज है.तुझे इस बात पर आश्चर्य क्यों है ?''
                                            मोम क़ी बातें सुनकर शमा खामोश रही.लेकिन उसकी ख़ामोशी के शब्दों को मोम समझ रहा था.अचानक ही ये पंक्तियाँ मोम के मुख से फूट पडीं --
                         ''मेरा अर्पण और समर्पण, सब कुछ तेरे नाम प्रिये
                          श्वाश  -श्वाश तेरी अभिलषा ,तू जीवन क़ी प्राण प्रिये.
                          मन -मंदिर का ठाकुर तू है,जीवन भर का साथी तू है 
                         अपना सब-कुछ तुझे मानकर,तेरा दिवाना बना प्रिये .''
                          













(इस तस्वीर पर मेरा कोई कापी राइट नहीं है.ना ही किसी तरह का कोई अधिकार.इस तस्वीर को आप निम्नलिखित लिंक द्वारा प्राप्त कर सकते हैं.)
www.turbosquid.com/.../Index.cfm/ID/247458

Saturday, 13 March 2010

सिर्फ तर्क करे क्या हासिल हो ,

सिर्फ तर्क करे क्या हासिल हो ,
भावों में आत्मीयता शामिल हो ;
हितों के घर्षण से कब कौन बचा है ,
क्यूँ न अपनो का थोडा आकर्षण हो /
झूठे आडम्बर से क्या मिला है
थोड़ी मोहब्बत, थोडा त्याग,
थोड़ी जरूरत ,थोडा परमार्थ ,
क्यूँ न ये अपना जीवन दर्शन हो ,
सिर्फ तर्क करे क्या हासिल हो ,
भावों में आत्मीयता शामिल हो /

जो कहनी थी ,वही मैं बात,यारों भूल जाता हूँ .

जो कहनी थी ,वही मैं बात,यारों भूल जाता हूँ .
किसी क़ी झील सी आँखों में, जब भी डूब जाता हूँ .

नहीं मैं आसमाँ का हूँ,कोई तारा मगर सुन लो
किसी के प्यार के खातिर,मैं अक्सर टूट जाता हूँ . 

 शिकायत सब से है लेकिन,किसी से कह नहीं सकता 
 बहुत गुस्सा जो आता है,तो खुद से रूठ जाता हूँ . 

 किसी क़ी राह का कांटा,कभी मैं बन नहीं सकता 
 इसी कारण से मफिल में,अकेला छूट जाता हूँ .

 मासूम से सपनों क़ी मिट्टी,का घड़ा हूँ मैं,
 नफरत क़ी बातों से,हमेशा फूट जाता हूँ .

Friday, 12 March 2010

विचलित इच्छाएं है ,

विचलित इच्छाएं है ,
समर्पित वासनाएं हैं ;
मन थमता नहीं सिर्फ आशाओं पे ,
संभालती समस्याएँ हैं ;
जीवन में अब चाव नहीं है ,
तकलीफों से छावं नहीं है ,
अपने आंसूं पे रोना कैसा ,
दिल के जख्मो में रिसाव नहीं है /
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मोह का बंधन लगता प्यारा ,
माया ने हम सबको पाला ,
कब तक अंगुली पकड़ चलेगा राही,
अब तो पकड़ ले परमार्थ की डाली /
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हास्य-व्यंग कवि -सुनील पाठक ''सांवरा''

हास्य-व्यंग कवि -सुनील पाठक ''सांवरा''
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       आज-कल आप यह चेहरा अक्सर टी.वी.में देखते होंगे. हास्य-व्यंग कवि के रूप में सुनील आज किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं. टी.वी. के ग्रेट इंडियन लाफ्टर चैलेन्ज से सुनील ने अपनी कामयाबी क़ि जो इबारत लिखनी शुरू क़ि वो बदस्तुर जारी है.
            मैंने सुनील से एक दिन पूछा क़ि भाई आप तो इलाहाबाद के पाठक हो तो फिर,सांवरा नाम क्यों रखा ? इसका जवाब भी सुनील ने मजाकिया  अंदाज में दिया .उन्होंने कहा क़ि -''जब से इलाहबाद के आई.जी. पांडा अपने आप को राधा मानने लगे ,तब से मैं भी सांवरा (कृष्ण ) हो गया हूँ .

Thursday, 11 March 2010

द्वैत कहूँ अद्वैत कहूँ ,

द्वैत कहूँ अद्वैत कहूँ ,
द्वैत कहूँ अद्वैत कहूँ ,
या प्यार तुझे अनिकेत कहूँ ,
दिल में बसता धड़कन में रमता ,
मन का साथी आखों से रिसता ;
पुजित तू है संचित तू है ,
कितनो को आवांछित तू है ,
काम बड़े तो लांछित तू है ;
द्वैत कहूँ अद्वैत कहूँ ,
या प्यार तुझे अनिकेत कहूँ ,
भावों का सरताज रहा तू ;
सपनों का अधिराज रहा तू ;
दिल के धोखो को क्यूँ हम जोड़े ;
दर्दों का स्वराज रहा तू /
द्वैत कहूँ अद्वैत कहूँ ,
या प्यार तुझे अनिकेत कहूँ ,
खुशियों की राहें तकलीफों के पग ,
महके मन मंदिर दहके तन ,
सुंदर बातें पथरीले छन ;
कब पाए तुम कब खोये हम ;
द्वैत कहूँ अद्वैत कहूँ ,
या प्यार तुझे अनिकेत कहूँ ,

बोध कथा -२: अपना ही कोई गद्दार हुआ है

बोध कथा -२: अपना ही कोई गद्दार हुआ है
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        एक गाँव में बड़ा ही प्राचीन बरगद का पेड़ था. उसकी शाखाएं  चारों  तरफ फैली हुई थी.आने -जाने वाले राहगीरों को इस बड़े छायादार पेड़ के नीचे बड़ा आराम मिलता. गाँव के लोग भी बरगद के पेड़ क़ी पूजा करते.उस बरगद क़ी जड़ें बड़ी गहराई तक जमीन में गयीं थी. पेड़ का पूरा वैभव किसी का भी ध्यान अपनी तरफ आकर्षित कर लेता था.
        उस बरगद क़ी सभी शाखाएं,तने ,पत्तियाँ और जड़ें अपना काम बराबर करते थे.उन सब में बड़ी एकता थी.एक दिन अचानक पेड़ के एकदम ऊपरी हिस्से क़ी फुनगी ने देखा क़ि एक लकडहारा पेड़ क़ि दिशा में बढ़ा चला आ रहा है. उस फुनगी ने तने को आवाज देते हुए कहा,''दादा,एक लकडहारा हमारी तरफ तेजी से चला आ रहा है.'' तने ने आने वाले खतरे का आभास कर पूछा ,''क्या उसके हाँथ में कोई काटने वाली चीज़ है ?'' तने की बात सुन कर फुनगी ने लकडहारे की तरफ ध्यान से देखा . उसे लकडहारे के हाथ की कुल्हाड़ी नजर आ गई.उसने तुरंत जवाब दिया ,''हाँ दादा,उसके हाँथ में कुल्हाड़ी है.लोहे की है .''
                              तने ने लम्बी सांस छोड़ते हुए कहा ,'' हे भगवान्. हमे अपनों ने ही धोखा दिया,वरना किसी की क्या मजाल थी की हमपर आँख उठा कर भी देख पाता. अब हमे कोई नहीं बचा पाए गा .'' तने की बात फुनगी को समझ में नहीं आयी.उसने तने से प्रश्न करते हुए कहा,''दादा, में आप की बात समझा नहीं. हमे तो लोहे की कुल्हाड़ी कटेगी ,फिर कोई अपना इसका जवाबदार कैसे हुआ ?'' तने ने फुनगी की बात पर जवाब देते हुए कहा,''ध्यान से देखो ,उस लोहे की कुल्हाड़ी में बेंत लकड़ी का ही लगा होगा.अगर वह लकड़ी का बेंत उस लोहे का साथ ना दे,तो वह लोहा हमारा कुछ भी बिगाड़ नहीं सकता.'' इतना कह कर तना चुप हो गया.थोड़ी देर बाद उसके मुह से सिर्फ ये शब्द निकले -
                   ''जब भी हम पर वार हुआ है,
                    अपना ही कोई गद्दार हुआ है ''

Wednesday, 10 March 2010

इस तरह दूर रहकर-----------

इस तरह दूर रहकर  तुमसे,
खुद से ही दूर हो  रहा  हूँ  .
कोई मजबूरी नहीं है फिर भी,
मैं बड़ा मजबूर हो रहा हूँ .

कोई कहता है पागल तो,
कोई समझता दीवाना है . 
जुडकर सब से भी मैं,
अब बेगाना हो रहा हूँ . 

राह का पत्थर हूँ मैं,
मुसीबत बन गया हूँ सब की.
सब के रास्ते से मैं बस,
मुसलसल किनारे हो रहा हूँ. 

अब कोई सपना कंहा है ?
 मुझे नींद कब आई है ?
 जागती आँखों से अब मैं,
 नींद का रिश्ता खोज रहा हूँ .
 

मैं तो टूटा उतना ही,जितने तोडा गया मुझे

  मैं तो टूटा उतना ही,
  जितना तोडा गया मुझे.
  लेकिन मेरे सपनों का, 
  टूटना लगभग नामुमकिन है .


जितना जादा सज्जन था,
उतने ही दुर्जन मिले मुझे.
लेकिन मुझको बदल पाना ,
उनके लिए ना संभव था .

सच्चाई क़ी राह पे मैं,
यद्यपि बिलकुल तनहा रहा .
लेकिन किसी का कोई डर,
मन में मेरे रहा ना अंदर . 

 अपनी शर्तों पर जीना,
 रहा मेरा जीवन नियम .
 चका-चौंध इस  दुनिया क़ी, 
भरमा ना पाई मुझे कभी .
 

बोध कथा-1 : गुजरे मगर जिस राह से हम

बोध कथा-1 : गुजरे मगर जिस राह से हम
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                                   किसी गाँव में सज्जन कुमार नामक एक संत स्वाभाव का व्यक्ति रहता था.उसकी दिनचर्या में एक ख़ास बात यह थी क़ि वह सुबह -शाम समुद्र के किनारे जा कर,वंहा किनारे पर छटपटाती मछलियों को वापस समुद्र में ड़ाल देता था. सज्जन कुमार क़ी इस आदत का कई लोग मजाक भी उड़ाते थे. घर पे भी कई बार उन्हें ताने सुनने पड़ते थे. लेकिन सज्जन कुमार ने कभी भी किसी क़ी परवाह नहीं क़ी.वह सुबह उठकर भगवान् को प्रणाम करते,और समुद्र क़ी तरफ निकल पड़ते.वंहा से वापस आ कर अपने खेतों पे काम करने चले जाते.शाम को खेतों पर से वापस आने के बाद,हल्का जलपान करते और फिर मछलियों क़ी मदद के लिए समुद्र के किनारे क़ी तरफ निकल पड़ते.वंहा से वापस आ कर भगवान को संध्या वंदन कर ,भोजन करने के बाद सो जाते.
                          एक दिन नित्य क़ी तरह सुबह-सुबह जब वे समुद्र के किनारे तड़प रही मछलियों को वापस समुद्र में ड़ाल रहे थे,तो वंहा एक साधू आये.वे काफी देर तक सज्जन कुमार के कार्य को चुप-चाप देखते रहे.फिर वे सज्जन कुमार के पास आ कर बोले ,''हे बालक ,यह तुम क्या कर रहे हो ?'' इस प्रश्न से सज्जन कुमार क़ी एकाग्रता भंग हुई .अपने पास एक साधू को खड़ा देख सज्जन कुमार ने पहले  उन्हें प्रणाम किया फिर विनम्रता पूर्वक बोले ,''हे महात्मा,समुद्र क़ी तेज  लहरों के साथ कई मछलियाँ किनारे आ जाती हैं और जल विहीन होकर तड़पने लगती हैं.उनका जीवन संकट में आ जाता है. मैं अपनी यथा शक्ति उन मछलियों को वापस समुद्र क़ी धारा में प्रवाहित कर उन्हें जीवन दान देता हूँ.''
                       सज्जन कुमार क़ी बाते सुन साधू प्रश्न हुए और उन्होंने कहा,'' यह तो बड़ा ही अच्छा काम है.लेकिन समुद्र के किनारे तो ऐसी लाखों मछलियाँ हैं.तुम कितनों को बचा सकोगे ?'' साधू क़ी बात का जवाब देते हुए सज्जन कुमार ने कहा,''हे महात्मा ,मैं सभी मछलियों को तो नहीं बचा सकता लेकिन जितनों को बचा सकता हूँ ,उनके लिए मैं रोज ही यह काम करता हूँ .'' यह बात सुन साधू अति प्रसन्न हुए. उन्होंने सज्जन कुमार को आशीर्वाद देते हुए कहा ,''हे सज्जन,तुम धन्य हो.तुम्हारी इच्छाशक्ति धन्य है.हम सभी को अपनी यथाशक्ति कार्य करना चाहिए.कार्य के स्वरूप या परिणाम क़ी चिंता हमे कमजोर बना देती है. सुखी रहो .''
                       इस तरह साधू महाराज वंहा से चले गए और सज्जन कुमार फिर से अपने काम में लग गए.काम करते हुए अनायास ही सज्जन कुमार के मुख से ये पंक्तियाँ निकल पड़ीं --
                      '' माना क़ी ना कर सके , गुलजार हम इस चमन को 
                          मगर जिस राह से गुजरे ,खारे तो कम हुए .''     


१-    खारे-कांटे
            

Tuesday, 9 March 2010

खुबसूरत इरादों से शिकायत क्यूँ है ,

खुबसूरत इरादों से शिकायत क्यूँ है ,
हसीन प्यार के लम्हों से अदावत क्यूँ है ;
गले ना लगे तुम तो कोई बात नहीं ,
मेरी मोहब्बत से तुझको बगावत क्यूँ है ?


तेरी जफा की राहों से कब मैंने सवाल पूंछे ,
तेरे पीछे चलते सायों पे कब मैंने जवाब पूंछे ।
तू निभा न सकी कसमे कोई बात नहीं ,
पूरे हुए वादों से तू आहत क्यूँ है ,

मेरे सपनों से तुझे अदावत क्यूँ है ,
मेरी वफ़ा की राहों से शिकायत क्यूँ है ;
नहीं रक्खा मुझे अपनी यादों में कोई बात नहीं ;
मुझे हँसता देख तेरे चेहरे पे राहत क्यूँ है /

Monday, 8 March 2010

क़त्ल न कर मुझे जरा जी लेने दे ,

क़त्ल न कर मुझे जरा जी लेने दे ,
दिल के जख्मों को जरा सी लेने दे ;
तेरे चेहरे की घटाओं को छू लेने दे ,
तेरी आखों के कतरों को पी लेने दे ;
क़त्ल न कर मुझे जरा जी लेने दे ,
इतनी बेरुखी भी क्या मेरे दिलबर ,
तेरे लबों को जी भर के पी लेने दे ,
दुआ देगा मेरे दिल का हर टुकड़ा तेरी जफ़ाओं को ,
तेरी अदाओं पे मुझे मर लेने दे;
क़त्ल न कर मुझे जरा जी लेने दे ,
तेरी बेवफाई का लुत्फ़ जरा ले लूँ कुछ पल ,
तेरी बिखरी हंसी को जरा सी लेने दे ,
यादों को कुछ पल जी लेने दे ,
कातिल तेरी तकलीफों को पी लेने दे ,
आ तू अपने अरमान हसीन कर ले ,
मेरी चाहों को अतीत कर ले ,
जान निकालना जरा धीमे धीमे ,
तू अपने सपनों को रंगीन कर ले /

आज विश्व महिला दिवस पर

आज विश्व  महिला दिवस पर भारत सरकार भारतीय महिलाओं को एक उपहार देना चाहती थी.वह उपहार था-३३% आरक्षण का. लेकिन राज्यसभा में यह काम हो नहीं पाया. कई लोग इस बिल के विरोध में खड़े हो गए.संसद क़ी गरिमा को भी शर्मशार किया गया.लेकिन प्रश्न यह उठता है क़ि यह विरोध कुछ संदर्भों में सही तो नहीं है ?
                      इस देश में आरक्षण की राजनीति  शुरू ही हुई है ''वोट बैंक पालिसी '' के नाम पर. जो लोग औरतों के सशक्ति करण के नाम पर आरक्षण की बात कर रहे हैं,उनसे मैं यह पूछना चाहूँगा क़ि अपनी-अपनी पार्टी का टिकट बाटते वक्त वे क्यों महिलाओं को भूल जाते हैं. उस समय तो बस बाहुबली और पूंजीपति ही नजर आते हैं.साथ ही साथ संगठन में भी क्यों नहीं महत्वपूर्ण जगहों पर महिलाओं को नहीं रखा जाता. खाली ''रबर स्टंप' या ''सम्मान पूर्ण पद'' के ही योग्य महिलाओं को सीमित क्यों किया जा रहा है.एक और बात क़ि आखिर यह आरक्षण क़ी बैसाखी क्यों ? और अगर दी भी जा रही है तो आदिवाशी और पिछड़े वर्ग क़ी महिलाओं को तो इस आरक्षण में भी आरक्षण मिलना ही चाहिए.
                    मैं इस देश क़ी तमाम माताओं ,बहनों से हाथ जोडकर यही निवेदन करना चाहता हूँ क़ि ३३ नहीं ५० % संसद क़ि सीटों पर आपका ही अधिकार है,यह अधिकार आप को मिलना भी चाहिए.लेकिन आजादी के इतने सालों बाद भी यदि अभी तक यह संभव नहीं हो पाया है तो कही ना कही इसके लिए आप लोग भी जिम्मेदार हैं.एक औरत होकर एक औरत के लिए अभी तक आपने क्या किया ? क्या सचमुच आप कुछ कर सकती हैं ?क्या आपको कुछ करने दिया जाएगा ?इस देश क़ी मध्यम वर्गीय महिलाएं आज भी इतनी संकुचित क्यों हैं ? पढ़ी-लिखी होने के बावजूद अपने निर्णय अपने तरीके से क्यों नहीं ले पा रही हैं ? अपने ही कमाए पैसे को अपनी इच्छा से खर्च क्यों नहीं कर पा रही हैं ? सारे अधिकारों से परिचित होने के बावजूद भी इस तरह घुट-घुट कर जीने को क्यों अपना प्रारब्ध मान बैठी हैं ?और अगर यही हालत रही तो ,यह आरक्षण मिल भी गया तो क्या लाभ होगा ? पहले आप लोगों को पर्दे में रखा जाता था ,अब तैयारी है क़ि आप को आगे कर परदे के पीछे से शासन चलाया जाए.क्या यह और भयानक स्थिति नहीं होगी ?
          इन सभी षड्यंत्रों को समझना भी जरूरी है. आशा है आप लोग कुछ तो समझ ही रही होंगी.इस देश की सभी महिलाओं को यह ''सम्मान दिवस ''मुबारक हो.

Sunday, 7 March 2010

दो दिन का राष्ट्रीय सेमिनार :नई कविता पर

दो दिन का राष्ट्रीय सेमिनार :नई कविता पर ************** 
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                             मुंबई के यस.आई.ई.यस. महाविद्यालय सायन में  आगामी १० और ११ मार्च २०१० को हिंदी विभाग क़ी तरफ से दो दिन का राष्ट्रीय सेमिनार आयोजित किया जा रहा है. नई सदी के पहले दशक क़ी कविताओं पे पूरा सेमिनार केन्द्रित रहेगा.इस सेमिनार में देश-विदेश के कई जाने -माने विद्वान सहभागी हो रहे हैं. 
                          यदि आप भी इस सेमिनार में सहभागी होना चाहते हैं तो महाविद्यालय के हिंदी विभाग प्रमुख डॉ.संजीव दुबे से संपर्क कर सकते हैं.सम्पर्क के लिए फ़ोन नंबर और महाविद्यालय का पता इस प्रकार है  
                डॉ.संजीव दुबे -९३२०५२७९११,९८६९८४७३६६ 
 
SIES College of Arts, Science & Commerce
Jain Society, Sion (West),
Mumbai - 400 022. (India).
Telephone: 2407 27 29 (Office)
Fax: 2409 6633
Email: siesascs@siesascs.net
Website: www.siesascs.नेट  
 यदि  आप महाविद्यालय तक जाने के लिए नक्शा चाहते हैं तो आप गूगल मैप क़ी सहायता ले सकते हैं.
 गूगल मैप के लिए इस लिंकhttp://maps.google.com/maps?client=gmail&ie=UTF8&q=s.i.e.s.+college,mumbai&fb=1&hq=s.i.e.s.+college&hnear=,mumbai&cid=0,0,7572555737468622329&ei=WVeTS-LwIc_GrAe--cy4Cw&ved=0CAcQnwIwAA&ll=19.030842,73.017969&spn=0.007688,0.01929&t=h&z=१६ पे क्लिक कर सही रास्ता भी जान सकते हैं.
 
 

पर दिल में ना रह पाए .

जो कहना था पहले ,
वो अब तक ना कह पाए .
संग-संग रहते थे घर में,
पर दिल में ना रह पाए .  

 सात जन्म का वादा करके,
 सात कदम ना चल पाए .
प्यार बना समझौता कैसे ?
ये बात  समझ ना पाए.

साथ सफ़र में दोनों थे पर , 
साथी ना बन पाए .
अंदर ही अंदर घुट कर,
दो-चार कदम चल पाए. 

जिसके बिन जीना मुश्किल था,
साथ उसी के ना जी पाए .
इश्क क़ी राह पे चल  के भी, 
हम इश्क समझ ना पाए . 
                        
                     जो कहना था ----------------------------
 (इस गीत क़ी पहली कड़ी भाई सुनील सावरा ने डी थी. वो इसे पूरा करना चाहते थे. मैंने अपनी तरफ से एक कोसिस क़ी है.शायद उन्हें पसंद आये.)

कोई मेरी है दीवानी.

वही प्यार क़ी  कहानी ,
 हमे भी है दुहरानी .
 मैं दीवाना किसी का,
 कोई मेरी है दीवानी.
                  वही प्यार क़ी ---------------------------

थोड़ी जानी-पहचानी ,
थोड़ी सी है अनजानी .
रब ने मिलाया है तो ,
जोड़ी हमको है बनानी . 
               वही प्यार क़ी --------------------------------- 

ना मैं कोई राजा,नाही  वो है कोई  रानी ,
लगती थोड़ी भोली,थोड़ी सी है वो सयानी .
जिन्दगी के इस सफ़र में,
 हमसफ़र है वो दीवानी .
              वही प्यार क़ी -----------------------------------

यादों के फूलों में चेहरा तेरा , 2

यादों के फूलों में चेहरा तेरा ,
गुलाबी गालों की रंगत ,
आखों में सपना मेरा ;
निगाहों में रंगीनियों के डेरे ,
अभिलाषा रंगीन है मेरी ,
आशाओं के महीन से फेरे ,
फागुनी अंदाज में डूबे,
इरादे संगीन है मेरे ,
मोहब्बत और प्यास के सूबे ,
आ नए प्यार सा खेले,
समर्पण चाह के घेरे ,
इच्छाएं हसीन है मेरी,
वो पहली मुलाकात के डेरे ,
वो पहली रात की बातें,
उलझे बाल के फेरे ,
वो प्यास में डूबे ,
विश्वास के घेरे ;
यादों के फूलों में चेहरा तेरा ,

Friday, 5 March 2010

जितनी शरारत है,नजाकत भी है उतनी ही

उलझी हुई थोड़ी ,
थोड़ी सी सुलझी है.
वो लड़की जो ,मेरे दिल को ,चुरा के ले गयी यारों  
पगली सी है थोड़ी,
थोड़ी सयानी है .
 

तितली सी है चंचल
फूलों सी कोमल है .
वो बोलती है जब,तो मुझको यूं लगता है
मन क़ी मेरी बगिया में
 कोयल कूक भरती है .









                                                                               ख़ामोशी में उसके
                                                                                बादल उमड़ते हैं.
                                                                                जितनी शरारत है,नजाकत भी है उतनी ही
                                                                                बड़ी तो खूब है लेकिन,
                                                                                वो गुडिया छोटी लगती है .

                                                                अदाएं चाँद क़ी सारी ,
                                                                लेकर निकलती है .
                                                                साँसों में बसा चंदन,खजाना रूप का लेकर
                                                               वो राहें भी महकती हैं,
                                                               जंहा से वो गुजरती है .



                                                              राधा सी लगती है,
                                                              कभी सीता सी लगती है .
                                                              जिसका प्यार मैं चाहूँ, सारी जिन्दगी भर को
                                                             वही प्रियतम वो लगती है
                                                             वही साथी वो लगती  है .

Wednesday, 3 March 2010

fir kisi mod per

फिर किसी      

रामदरश मिश्र

राम दरश मिश्र तो वैसे किसी परिचय के मोहताज नहीं है । फिर भी मै उनका परिचय देना चाहूँगी । मिश्र जी प्रेमचंदोत्तर युग के बहुमुखी प्रतिभा संपन्न कलाकार है ।
वे श्रमशक्ति के प्रतिक है । उनकी रचनाए आसाधरण पुरुषार्थ के मनोबल एवम अनुशासित कार्य प्रणाली का परिणाम है । एक मान्यता प्राप्त कवि होने के साथ - साथ एक बहुत अच्छे लेखक भी है ।
उनकी कहानिया और उपन्यास मै इतनी सचाई है कि उसे पढ़नेके बाद किसी भी इंशान का हिर्दय द्रवित हो जाय। उनका उपन्यास पानी के प्राचीर , जल टूटता हुआ और उनके कई उपन्यास है जिसे पढ़ने पर व्यक्ति मजबुर हो जाय सोचने पर कि हमारी गाँव की क्या हालत है। गाँव मे सुधार करने बहुत ही जरुरत है। मिश्र जी ने इतनी गंभीर समस्याओ को पाठको के समक्ष रखा है की शायद ही किसी का ध्यान उन समस्याओं पर जाय ।

Tuesday, 2 March 2010

यादों के फूलों में चेहरा तेरा ,

यादों के फूलों में चेहरा तेरा ,

याद अब भी है तेरी धड़कन औ हसना तेरा ;

गुलाबी गालों की रंगत आखों में सपना सजा ,

पलकें आशा से खिली बातों में मोहब्बत घुली ,

महकते ख्वाबों की लचकन सुहानी रातों की धड़कन ;

वो अहसासों की तरन्नुम वो उमंगों की सरगम ,

नयनो की शिकायत आभासों के रेले ,

वो अरमानो की दुनिया सपनों के मेले ,

वो बंधन की राहें स्वच्छंदता के खेले ,

वो साँसों खुसबू ,बेखुदी में तुझे छुं ले ;

यादों के फूलों में चेहरा तेरा ,

तू ही बता तुझे यार हम कैसे भूले ?

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