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हिन्दी : पक्ष – प्रतिपक्ष

            हिं दी के पक्ष में जिस भावुकता के साथ तर्क रखे जाते हैं उन्होंने हिंदी का कोई भला नहीं किया अपितु नुकसान ही अधिक हुआ । हिंदी की पक्षधरता में ही व्यापक दोष रहा है । आजादी के बाद भाषाई आधार पर राज्यों के निर्धारण के बाद भी अगर कोई देशज / क्षेत्रीय भाषाओं के वर्चस्व को नहीं समझ पा रहा है तो निश्चित ही यह विचार उसे निष्पक्षता से आकलन नहीं करने देगा । इस देश की संरचना ही बहुवचनात्मक है । इस संरचना के बीच अगर किसी एक भाषा को व्यापक स्तर पर स्वीकार्यता दिलानी है तो वह इन तमाम भारतीय भाषाओं के बीच समन्वय और आदान - प्रदान की व्यापक श्रृंखला के माध्यम से ही हो सकता है । क्योंकि जिस भाषा को भी आप "राष्ट्र भाषा" का ताज देना चाहते हैं , उस भाषा का प्राण तत्व इन्हीं भारतीय भाषाओं में निहित होना चाहिए । अगर ऐसा नहीं हुआ तो विरोध , संघर्ष और अस्मिता मूलक विचारधाराओं के बोझ के नीचे "राष्ट्र भाषा" का सपना टूट या बिखर जायेगा । शायद आज तक यही हुआ भी । बावजूद इसके कि आप के पास वो सारे आंकड़े हैं जो ये बताते हैं कि हिंदी विश्व में सबसे अधिक बोली...

जाता हुआ साल

  जाता हुआ साल किसी पुराने कैलेंडर की तरह दीवार से उतर रहा है और कीलों पर हमारी उम्मीदें टँगी रह जाती हैं।  नया वर्ष आ गया है पर तुम मेंरे गए नहीं  पर मिट्टी अब भी बीजों की नींद सँभाले हुए है कुछ प्रश्न उत्तर बनने से पहले आदत बन गए— जैसे शाम की थकान, जिसे हम नाम नहीं देते। धीरे से आदतें बदलीं— यही उसका सबसे गहरा हस्तक्षेप था। Dr Manish Kumar Mishra 

प्रेम और संवेदना के जैविक कवि : मनीष

    प्रेम और संवेदना के जैविक कवि : मनीष डॉ. चमन लाल शर्मा प्रोफेसर ' हिन्‍दी ' शासकीय कला एवं विज्ञान स्‍नातकोत्‍तर महाविद्यालय , रतलाम ( विक्रम विश्‍वविद्यालय , उज्‍जैन) मध्‍य प्रदेश               आजकल कविता में जो कुछ लिखा जा रहा है वह सब समकालीन है , यह पूरी तरह सच नहीं है। दरअसल समकालीनता एक रचना दृष्टि है , जहां कवि अपने समय का आकलन करता है , अपने अनुभव , अपने चिंतन और अपनी दृष्टि से वह कविता में जीवन का नया विन्यास गढ़ता है। कवि होने के अपने खतरे भी हैं , अपनी चुनौतियां भी हैं , क्योंकि कई बार कविता में   वैयक्तिकता हावी हो जाने की संभावना बनी रहती है। यकीनन कविता का आशय या उद्देश्य इतना भर नहीं है कि समाज में जो कुछ भी घटित हो रहा है या जैसा दिखाई दे रहा है उसे ज्यों का त्यों लिखकर प्रस्तुत कर दिया जाय , इससे कविता के खत्म होने का खतरा बढ़ जाता है। एक कविता पाठक को कई अर्थ देती है। कविता एक वैचारिक फलक के साथ-साथ एक कला रूप भी है , इसलिए कविता में भाषा , भाव और शैली का एक संतुलन भी जरूरी ...