Friday, 1 May 2026

प्रेम और संवेदना के जैविक कवि : मनीष

 


 

प्रेम और संवेदना के जैविक कवि : मनीष

डॉ. चमन लाल शर्मा

प्रोफेसर 'हिन्‍दी'

शासकीय कला एवं विज्ञान स्‍नातकोत्‍तर महाविद्यालय, रतलाम

(विक्रम विश्‍वविद्यालय, उज्‍जैन) मध्‍य प्रदेश


 

            आजकल कविता में जो कुछ लिखा जा रहा है वह सब समकालीन है, यह पूरी तरह सच नहीं है। दरअसल समकालीनता एक रचना दृष्टि है, जहां कवि अपने समय का आकलन करता है, अपने अनुभव, अपने चिंतन और अपनी दृष्टि से वह कविता में जीवन का नया विन्यास गढ़ता है। कवि होने के अपने खतरे भी हैं, अपनी चुनौतियां भी हैं, क्योंकि कई बार कविता में  वैयक्तिकता हावी हो जाने की संभावना बनी रहती है। यकीनन कविता का आशय या उद्देश्य इतना भर नहीं है कि समाज में जो कुछ भी घटित हो रहा है या जैसा दिखाई दे रहा है उसे ज्यों का त्यों लिखकर प्रस्तुत कर दिया जाय, इससे कविता के खत्म होने का खतरा बढ़ जाता है। एक कविता पाठक को कई अर्थ देती है। कविता एक वैचारिक फलक के साथ-साथ एक कला रूप भी है, इसलिए कविता में भाषा, भाव और शैली का एक संतुलन भी जरूरी है। इधर नई पीढ़ी के  जो रचनाकार कविता लेखन में सक्रिय हैं उनमें मनीष मिश्र का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है, उनकी कविताओं में वैचारिकता की सपाट बयानी की मजबूरी नहीं है, नाही चिल्लाकर अपनी बात को दूर तक फैलाने की जुगत है। मनीष संवेदनाओं की शक्ल में कविता के माध्यम से पाठकों से सीधे संवाद करते हुए दिखाई देते हैं। छप्‍पन कविताओं वाले उनके पहले काव्य संग्रह 'अक्टूबर उस साल' की पहली कविता 'आत्मीयता' में वे सीधे पाठक से बात कर रहे हैं - 'क्षमा की शक्ति / और / विवेक का आराधन / यह अनुभव की / साधना से / संचित / शक्तिपीठ है / आत्मीयता से भरे / आत्मीय मित्रो /

सवागत है / आपका /'  

                जिन पाठकों ने मनीष की कविताओं को ठीक से पढ़ा होगा उनको मालूम होगा कि मनीष की कविताएं कला की सीमाओं से परे जाकर भी पाठक के मन को झकझोरती हैं और मन के अंदर एक उत्प्रेरण  के भाव को जन्म देती हैं। मनीष की कविताओं का अलहदापन  संवेदना, भाव, विचार, दर्शन एवं भाषा के स्तर पर ही नहीं है बल्कि उनकी शैली में भी नवीनता है। बिंबों और प्रतीकों से कैसे यथार्थ को लिबास पहनाकर वे अपनी कविता रचते हैं, यह वस्तुतः मनीष की अपनी शैली है-  'जब तुम्हें लिखता हूँ / तो जतन से लिखता हूँ / हर शब्द को चखकर लिखता हूँ / जब तुम्हें लिखता हूँ / तो बसंत लिखता हूँ / होली के रंग में / तुम्हें रंग कर लिखता हूँ / 'जब तुम्हें देखता हूँ' कविता की इन पंक्तियों में मनीष न केवल गहरी संवेदना को कविता के केन्‍द्र में रखते हैं बल्कि कविता को शब्‍दों की जुगाली से मुक्‍त कर जीवनानुभव से भी जोड़ते हैं। आजकल जीवन के रिश्तों में भी बाजारवाद हावी होता दिखाई दे रहा है। फलतः मनुष्य के बीच सम्बन्धों की ऊष्मा भाप बनकर खत्म होती जा रही है। मनीष की कविताएं रिश्तों के उधड़ने-बुनने की कविताएं हैं। मनुष्य के दोहरे चरित्र को उजागर करती उनकी कविताएं सच को मरते नहीं देखना चाहतीं। मनीष कभी नितान्त निजी अनुभवों की कविताई करते प्रतीत होते हैं तो कभी कठोर व्यंग्य से सामाजिक यथार्थ को उघाड़ते हुए दिखाई देते हैं। जीवन की आपाधापी के बीच मनुष्य अपने मन के भीतर कहीं कमजोर भी है, भविष्य को लेकर चिंतित भी है, घबराया हुआ भी है और रिश्तों को निभाने की उसके अंदर  अकुलआहट भी है, पर आधुनिक जीवन शैली को अपनाने की होड़ में और आगे बढ़ने के दबाव के कारण उसे रिश्ते दरकते हुए दिखाई देते हैं। ऐसे में मनीष रिश्तों की गरमाहट को महसूस करते हुए कहते हैं - 'जीवन की जटिलताओं / और प्रपंचों से दूर / अपनी सहजता / और संवेदना के साथ / तुम जब भी मिलती हो / भर देती हो / तृप्ति का भाव / तुम जब भी मिलती हो / तो मिलता है / विश्वास / सौभाग्य / और / जीवन के लिए / ऊष्मा, ऊर्जा और संकल्प भी /'

           

 

युवा कवि मनीष न किसी वाद के  चौखट्टे में फिट बैठने के लिए लिखते हैं, और ना ही किसी विचारधारा के साथ सामंजस्य बैठाने की उठापटक के लिए कविताई करते हैं, बल्कि वे आत्म चेतना के स्तर पर पाठक को टहलाते  हुए वहां ले जाना चाहते हैं, जहां सीखने और टकराने दोनों की जरूरत है। वस्‍तुत: तिमिर के शिकंजे में रमणीयतम लावण्य है मनीष की कविताई। स्त्री-पुरुष के संबंधों के व्याकरण से उनकी कविताएं जीवन के मायनों को तलाशती हुई दिखाई देती हैं -   'और तुम / वन लताओं सी / कुम्‍हलाती / अपनी दिव्य आभा के साथ / घुलती हो चंद्रमा में / ज्योति के कलश में / आरती की गूंज में / और देती हो मुझे / नक्षत्रों के लबादे में / अनुराग का व्याकरण /  आचरण के शुभ रंग / तथा / त्याग के / आत्मीय प्रतीक चिन्ह /'  'प्रतीक्षा की स्थापत्य कला' कविता में मनीष जीवन में अनुराग के व्याकरण को अनिवार्य मानते हैं। अनुराग के बिना जीवन लगभग व्‍यर्थ है। संभावनाओं के कवि मनीष अपने पहले कविता संग्रह 'अक्टूबर उस साल' में अनुभूति,  जीवनानुभूति और कलात्मक अनुभूति का बेहद जरूरी संयोजन कर अपनी उत्पाद्य प्रतिभा का परिचय दे देते हैं। कवि और कविता के लिए महत्वपूर्ण है अनुभव, जिसे सामाजिक व्यवहार से अर्जित किया जा सकता है। यह अनुभव ही काव्य में संवेदना बनकर पाठक तक पहुंचता है। 'गंभीर चिंताओं की परिधि' कविता में युवा कवि मनीष आज के तथाकथित विमर्शों पर प्रासंगिक टिप्पणी करते हैं - 'अप्रासंगिक होना / उसके हिस्से की / सबसे बड़ी त्रासदी है / तकलीफ और विपन्नता / से क्षत-विक्षत / उसकी उत्सुक आंखें / दरअसल / यातना की भाषा में लिखा / चुप्पी का महाकाव्य है /'    दरअसल यह भाड़े पर या उधार ली हुई संवेदना नहीं है, बल्कि अनुभव से अर्जित की हुई है। 'यूं तो संकीर्णताओं को' कविता में कवि एक और जहां अपनी परम्‍परा और संस्‍कृति की जड़ों से उखड़े लोगों की मज़म्मत करते हैं, वहीं दूसरी ओर भारतीय राजनीति के चरित्र को बेनकाब करने में युवा कवि ने जरा भी संकोच नहीं किया है, बल्कि तल्ख लहजे में सियासतदानों की असलियत को बड़ी बेवाकी से पाठकों के सामने रखने की ईमानदार कोशिश की है, और नेताओं के भाषणों से सम्मोहित जनता की यथास्थिति वादी सोच पर चिंता प्रकट की है। दरअसल मनीष की कविता छीजती मनुष्‍यता के बीच आशा का एक सुन्‍दर विहान है। सामाजिक सन्‍दर्भों को तलाशती मनीष की कविता मेहनतकशों और मजदूरों के पक्ष में खड़ी हुई दिखाई देती है। कार्पोरेट कल्‍चर में जहां मजदूरों की चिंता करने वाला कोई नहीं है, ऐसी स्थिति में मनीष पक्षधरता के साथ मजदूरों के सवालों को उठाते हैं - 'उन मजदूरों के / हिस्से में / क्यों कुछ भी नहीं /   जो मेहनत से / एक धरा और गगन कर रहे हैं /'

            कविता को सफल बनाने के लिए कवि का ईमानदार होना अत्यंत आवश्यक है। वह विषय स्थिति को स्पष्ट करने के लिए अपनी निजी अनुभूतियों का इस्तेमाल करता है। मनीष की कविताओं से गुजरते हुए यह आभास सहज ही हो जाता है। जब सामयिक सामाजिक परिस्थितियां जीवन में इतनी अधिक प्रभावी हो जाएं कि समय का एक पल भी भारी लगने लगे, कविताएं वहीं से आकार लेना शुरू करती हैं। कवि की आवश्यकता समय और समाज को वहीं से अधिक महसूस होने लगती है। मां पर लिखी कविता में मनीष मां के उस शाश्वत रूप के दर्शन कराते हैं जो हर पाठक को अपना सा लगता है। दरअसल कविता की खासियत ही यह है कि वह कवि की होती हुई भी सबकी हो। हर पाठक को वह अपनी ही रचना लगे।  नई पीढ़ी के कवियों में मनीष अलग विशेषता बनाए हुए हैं। उनकी कविता सकारात्मक मूल्यों के साथ ही मनुष्य को समग्रता में आत्मसात कर चलती है। उनकी कविताओं में जहां एक ओर सकारात्मक हस्तक्षेप का स्वर है, वहीं दूसरी ओर लोकतांत्रिक जीवन मूल्यों की संवेदना भी है, जिससे पाठक के ज्ञान के क्षितिज का विस्तार होता है। मैं बहुत प्रामाणिकता के साथ कह सकता हूं कि मनीष की कविताएं इंसानियत की रक्षा के लिए एक संवेदनशील धरातल तैयार करती हैं, जिसमें प्राकृतिक उपादानों को भी वे शामिल करते हैं -  'प्रेम से अभिभूत / ममता से भरी / वह गीली चिड़िया / शीशम की टहनियों के बीच / उस घोंसले तक /  पहुंचती है / जहां / प्रतीक्षा में है / एक बच्चा / मां के लिए / भूख / अन्न के लिए / और प्राण / जीवन के लिए /'

             मनीष की कविताओं में  वायवीय भावों, विचारों एवं कल्पनाओं का कौतूहल नहीं है, बल्कि वे जीवन के टूटे- विखरे पलों को भी आत्मीय बनाकर कविता में अपनी विनम्र उपस्थिति दर्ज करा देते हैं। उनके यहां निषेधवादियों की तरह सब चीजों का नकार नहीं है, बल्कि वे सृजनात्मक बीजों की तलाश कर अपने परिवेश के उहा-पोह को भी सहजता के साथ मानवीय संदर्भों से जोड़ देते हैं। वह भरोसे की ऊष्मा और संबंधों के ताप से हर हाल में मनुष्य होने की संभावनाओं को बचाना चाहते हैं - 'मैं / बचाना चाहता हूं / दरकता हुआ / टूटता हुआ / वह सब / जो बचा सकूंगा /  किसी भी कीमत पर /'

             इस संकलन की अधिकांश कविताएं मानवीय रिश्तों, स्त्री-पुरुष के संबंधों और प्रेम पूर्ण संवेदनाओं के इर्द-गिर्द ही घूमती हैं। कविता के बारे में कोई भी संतुलित निर्णय तभी दिया जा सकता है जब हम भाषा, कथ्य और संदर्भ को एक साथ प्रस्तुत करें। भाषा के तत्वों द्वारा ही हम कविता में उपस्थित कवि के अनुभव की सही व्याख्या कर सकते हैं। आजकल की कविताओं की एक सीमा यह भी है कि अक्सर पुराने अनुभवों को दोहराकर सुविधाजनक ढंग से कविता बना ली जाती है। इससे नया अर्थलोक पैदा होने की संभावनाएं भी कम हो जाती हैं।  मनीष की कविताओं की भाषा में नया रंग भरता है। कविता में भाषा के अभिनव प्रयोग का अर्थ यह नहीं है कि बिल्कुल अलग दिखाई देने वाली भाषा का उपयोग किया जाए या जबरदस्ती शब्द ठूंसकर नवीनता का बोध कराया जाए। दरअसल कोई एक शब्द भी कविता को नए भावान्‍वेषण की ओर ले जा सकता है, बशर्ते कवि को उस शब्द के परिप्रेक्ष्य का भान हो और वह उसे सर्जनात्मक रूप देने मे समर्थ हो।  मनीष के इस पहले कविता संग्रह में भाषा बोध के स्तर को बनाए रखने में समर्थ दिखाई देती है।

            2019 में प्रकाशित मनीष का दूसरा कविता संग्रह 'इस बार तेरे शहर में' में कुल साठ  कविताएं हैं,  और इसकी भूमिका हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार रामदरश मिश्र जी ने लिखी है। इस संग्रह की अधिकांश कविताएं प्रेम की द्वन्‍द्वात्मक संवेदनाओं के बीच उभरी हैं, लेकिन कवि की युवा वाणी यहां कविता की सोद्देश्‍यता पर स्पष्ट अभिमत प्रस्तुत करती है -  मुठ्ठियां जहां / बंध दी गई हों   /  शोषण के खिलाफ / वहां रूंधे गले को / वाणी देते हुए / उपस्थित हों /  मेरी भी / कविताओं के शब्द /' मनीष का कवि हृदय युगों से चली आ रही पुरुष की सामंतवादी सोच पर सवाल खड़े करता है, तथा स्त्री को रचना का प्रेरणा स्रोत,  सूर्य की ऊष्मा,  ऊर्जा का उद्गम, जीवन का हर्ष और उल्लास का निर्द्वंद सर्जक मानता है -  'तुम औरत हो / और / और होकर औरत ही / तुम कर सकती हो / वह सब / जिनके होने से ही /  होने का कुछ अर्थ है / अन्यथा / जो भी है / सब का सब / व्यर्थ है/'  छद्म राष्ट्रवाद पर प्रहार करते हुए कवि मनीष कविता में व्यंग्य को नए स्तर पर ले जाते हुए कहते हैं -  'यहां अब देश नहीं / प्रादेशिकता महत्वपूर्ण होने लगी है / प्रादेशिक भाषा में / गाली देने से ही / हम अपने सम्मान की / रक्षा कर पाते हैं / पराये नहीं / अपने समझे जाते हैं / '

            बिगड़ते पर्यावरण की चिंता भी उनकी रचना के मूल में है।  हम अपने आने वाली पीढ़ी के लिए क्या छोड़कर जा रहे हैं? इसकी बानगी देखनी हो तो दिल्ली के बच्चों से पूछें।  किस्तों में मरते हमारे पर्यावरण को बचाने के लिए मनीष कोई बड़ा दर्शन या कोई बड़ा बोझिल तर्क प्रस्‍तुत नहीं करते, बल्कि बहुत ही सादी लिबास की कविता में सीधे दिल को छू लेने वाली बात कह देते हैं - 'इतने दिनों बाद आ रहा हूं / बोलो / तुम्हारे लिए क्या लाऊं? /  उसने कहा / वो मौसम / जो हमारा हो / हमारे लिए हो / और हमारे साथ रहे / हमेशा /'

            मनीष दरअसल परिवेश में बिखरी हुई प्राकृतिक एवं सामाजिक शक्तियों को जगाने में विश्वास करते हैं। इनकी कविताएं वास्‍तव में मानवीय संवेदनाओं की गहनतम अभिव्यक्ति हैं,  तुकबाजी़ और नारेबाजी से मुक्त।  इनकी कविताएं संवेदना से ही रसग्रहण करती हैं। तभी तो  मनीष की चयन दृष्टि अभीष्ट को ग्रहण कर त्याज्य को छोड़ना चाहती हैं - 'नाखूनों को / काटते हुए/  सोचने लगा कि / अनावश्यक और अनचाही / हर बात के लिए / मेरे पास / एक नेल कटर / क्यों नहीं है? /'  वर्तमान जिंदगी में बनावटीपन ज्यादा है। दिखावे की संस्कृति ने व्यक्ति को बहुरूपिया बना दिया है। उसके जीवन में न तो सहजता है और ना सरलता। इसलिए मनीष संबंधों के अनुबंधों से, जन्म-जन्म के वादों से और रीति-नीति के धागों से रिश्तों का ताना-बाना बुनते हुए दिखाई देते हैं। इनकी कविताओं में सामाजिक, राजनीतिक, वैश्विक एवं धार्मिक जीवन के कटु यथार्थ भी हैं।  जन आकांक्षाओं के कवि मनीष की भाषा ढंकी-छुपी राजनीतिक और सामाजिक बुराइयों को उघाड़ कर रख देने में जरा भी संकोच नहीं करती है। इससे मनीष की चेतना की व्यापकता का अंदाजा लगाया जा सकता है। लोकतांत्रिक मूल्यों और मानवीय संवेदनाओं के ऊपर जहां भी खरोच आती है वहीं मनीष मुखर हो जाते हैं - 'राम / तुम्हारा धर्म-दर्शन / संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता में / अपराध हो गया / हे राम ! / हे राम ! ! / अयोध्या / मानो शेष हों / अवशेष सिर्फ / पर यह नि:शेष नहीं/'          मनीष की कविताओं में आस्था, विश्वास एवं आत्म संबल का विस्तार है। श्यामा, वसंता और कस्तूरिका की इस देवभूमि में वे प्रकृति के साथ जीवन का राग गाते हैं। पहाड़ी चिड़ियों, फूलों और पेड़ों को देखना उन्हें ईश्वर को देखने जैसे लगता है। कवि मनीष का अनुभव परिपक्व और दृष्टि संपन्न है। वे अपने परिवेश के प्रति गंभीर और संवेदनशील हैं। परिवेश और प्राकृतिक सौंदर्य इनकी कविताओं को अलग ही पहचान दिलाता है -  'देवदार और  पाम / के यह घने जंगल / मानो लंगर हों / स्वच्छन्ता उत्सुकता और / आकाश धर्मिता के / व्यास रावी चिनाव / सतलुज और कालिंदी के कल कल से / इठलाती बलखाती / सजती और संवरती देवभूमि / सौंदर्य की / विश्राम स्थली है /'         प्रेम का हर एक स्‍तर मूल्यवान होता है। प्रेम का आकर्षण अंतस् चेतना को अनुराग की ऊष्मा से भर देता है - 'उसी का होकर / उसी में खोकर / उसी के साथ / जी लूंगा तब तक / जब तक कि / वह देती रहेगी अपने प्रेम और स्नेह का जल / अपनेपन की / उष्मा के साथ /'  इसी तरह एक अन्य कविता 'उसे जब देखता हूं'  में कवि कहता है - 'उसे जब देखता हूं / तो बस देखता ही रह जाता हूं / उसमें देखता हूं / अपनी आत्मा का विस्तार / अपने सपनों का / सारा आकाश /'

            कंटेंट और भाषा की अपनी तमाम सीमाओं के बावजूद मनीष की कविताएं अच्छेपन और इंसानियत का एहसास कराती हैं। 'इस बार तेरे शहर में' ऐसा लघु काव्य संग्रह है, जिसकी लगभग सभी कविताएं पठनीय हैं। इन कविताओं में गुंथे गए भाव धीरे-धीरे शब्दों के जरिए पाठक के अंदर उतरते जाते हैं। मनीष वस्तुतः संवेदनाओं के ऐसे जैविक कवि हैं जिनमें मिलावट का नकार और मौलिकता का स्वीकार है। चाहे भाषा के स्तर पर हो या भाव के स्तर पर अथवा कथन की शैली के स्तर पर 'इस बार तेरे शहर में' में संकलित उनकी सभी कविताएं आश्‍वस्‍त करती हैं। इसी संग्रह की 'झरोखा' कविता की इन पंक्तियों के साथ आपको मनीष की काव्य यात्रा पर चलने का निमंत्रण देता हूं - 'कभी / वक्त मिले तो / पढ़ना / झांकना / इन कविताओं को / यह यकीनन / लौटायेंगी / तुम्हारे चेहरे की / वो गुलाबी मुस्कान / मुझे यकीन है /'

कवि मनीष : हिंदी कविता के कैनवास का नया रंगरेज़ ।

 

कवि मनीष : हिंदी कविता के कैनवास का नया रंगरेज़ ।

 


                डॉ. गजेन्द्र भारद्वाज

हिंदी सहायक प्राचार्य

 

                  काव्य संग्रह ‘अक्टूबर उस साल’ साल 2019 में प्रकाशित मनीष मिश्रा जी के कृतित्व का वह इतिहास है जो उनके उत्तरोत्तर मँझते हुए लेखन और उनकी कविताओं के भाव गांभीर्य की विकास यात्रा को न केवल संकलित कविताओं के शीर्षक अपितु उनकी भाव संपदा की तन्मयता की गाथा सुनाता है। आज अभिव्यक्ति के विभिन्न माध्यमों से जो भी कविताएँ पढ़ने को मिलती हैं उनमें से अधिकांश को पढ़कर ऐसा लगता है मानो उन्हें एक ढाँचा निर्मित करके सायास लिखा गया है ऐसी कविताओं के लेखन के बीच से ऐसी कविता जो अनायास बन जाए इस संग्रह में दिखाई दी हैं जिन्हें पढ़कर यह लगता है कि आज भी कविता शब्दों और भावनाओं के परे जाकर हमारी चैतन्यता से जुड़ी है। मनीष इस संग्रह और इसमें संकलित कविताओं के प्रस्तुतिकरण के लिए बधाई के पात्र हैं जिनका प्रयास इतने कम समय में भी परिपक्वता की ओर अग्रसर दिखाई पड़ रहा है।

               इस संग्रह में कुल 56 कविताएँ संकलित हैं जिनमें पहली कविता ‘आत्मीयता’ से लेकर संग्रह की अंतिम कविता ‘बचाना चाहता हू’ तक की विभिन्न कविताओं में कवि की जिस वैचारिक चिंतनशीलता को महसूस किया जा सकता है उसको संप्रेषित करने के लिए यदि स्वयं कि शब्दों का प्रयोग किया जाए तो एक अन्य ग्रंथ लिखा जा सकता है। फिर भी संग्रह में संग्रहित कविताओं के आलोक में यदि कवि के ही शब्दों में यदि कवि की चिंतनधारा को समझने का प्रयास किया जाए तो उसके लिए इस संग्रह   की विभिन्न कविताओं के शीर्षकों को संयोजित करने पर कवि की विचार संपदा का थोड़ा परिचय मिल सकता है। यथा ‘जब कोई याद किसी को कारता है/बहुत कठिन होता है/  उसके संकल्पों का संगीत / पिछलती चेतना और तापमान से / अनजाने अपराधों की पीड़ा / गंभीर चिंताओं की परिधि / दो आँखों में अटकी / मैं नहीं चाहता था / इतिहास मेरे साथ / पिछली ऋतुओं की वह साथी / जैसे कि तुम / तुम से प्रेम / जाहिर था कि / लंबे अंतराल के बाद / आगत की अगवानी में / स्थगित संवेदनाएँ / बचाना चाहता हूँ।’ उपरोक्त कविताओं की परोक्ष गहनता की ओर संकेत करता है। जिसके कई गहरे अर्थ निकलकर सामने आते हैं जैसे केवल कविताओं के शीर्षकों को मिलाकर ही कवि के उस भाव का पता चलता है जिसमें वह अपनी मीठी यादों से जुड़े किसी भी अविस्मरणीय प्रसंग को इतिहास बनते देखना नहीं चाहता। कवि मानता है कि उसका मन किसी याद को चिरजीवित रखना चाहता है, उस प्रेम और प्रेम से जुड़ी वे सभी संवेदनाएँ जो उसने वर्तमान व्यतताओं के कारण स्थगित कर रखी हैं उन्हें बचाते हुए अपने भीतर के उस राग तत्व को सदा बनाए रखना चाहता है जिसके कारण इस सृष्टि में और स्वयं उसके जीवन में सृजन की प्रक्रिया निरंतर चल रही है।

 

 

            हिन्दी कविता में फैण्टेसी के महारथी गजानन माधव मुक्तिबोध की कविताओं में जो अप्रस्तुत का प्रस्तुत उनकी कविताओं के अंतस में छिपा दिखाई देता है, उसी परोक्ष की प्रत्यक्षता  मनीष मिश्र के इस संग्रह की कविताओं में भी परिलक्षित होती है। इनकी कविता सरल होते हुए भी एकाधिक बार पढ़े जाने की मांग करती है। इन कविताओं को पहली बार पढ़ने से लगता है कि यह एक प्रेमी के द्वारा अपनी प्रेमिका के लिए उद्भाषित होते उद्गार हैं पर ध्यान देकर दोबारा पढ़ने पर लगता है कि ये कवि की एक भावना का दूसरे भाव से आत्म संवाद है, चिंतन करते हुए तीसरी बार पढ़ते हुए महसूस होता है कि ये तो प्रत्येक व्यक्ति के हृदय में बसने वाले एक नादान बालक की अपने भीतर बसने वाले समझदार व्यक्ति से बातचीत है। संक्षेप में कहा जा सकता है कि इस संग्रह की कविताएँ जितनी बार पढ़ी जाएँ उतनी बार नया और आह्लादकारी अर्थ देती हुई मन को रोमांचित करती हैं।

                 मुझे मनीष जी की कविताओं में उनका वही शालीन, सौम्य और शांत व्यक्तित्व दिखाई देता है जो उनको नितांत सरल और आत्मीय बना देता है। इस संग्रह की कविताओं को एक बार पढ़ने के बाद बरबस ही दोबारा अध्ययन करते हुए पढ़ने की इच्छा हुई। अध्ययन के दौरान इन कविताओं से जो आनंद प्राप्त हुआ उससे पढ़कर कवि की वह सूक्ष्म दृष्टि पता चलती है जो आज के व्यस्ततम जीवन में भी मन की ओझल प्रतीत होने वाली गतिविधियों को भी देख लेती है। जब कवि कहता है कि ‘सुनन में/थोड़ा अजीब लग सकता है/लेकिन/सच कह रहा हूँ/यदि आप/धोखा देना पसंद करते हैं/या यह/आपकी फितरत में शामिल है/तो आप/मुझे अपना/निशाना बना सकते हैं/यकीन मानिए/मैं/आपको/निराष नहीं करूँगा/सहयोग करूँगा।’ इसी से मिलती जुलती एक अन्य कविता ‘जैसे कि तुम’ भी है जिसमें धोखे के एक अन्य प्रकार से पाठकों को रूबरू कराया गया है। इस कविता की प्रारंभिक पंक्तियाँ पाठकों को एक मजबूत भावनात्मक बंधन में बाँधने की क्षमता रखती है । जब कवि कहते हैं कि ‘ऐसा बहुत कुछ था/जो चाहा/पर मिला नहीं/वैसे ही/जैसे कि तुम।’ पाठक इन पंक्तियों के साथ कवि के साथ आत्मीय संबंध स्थापित कर लेता है और फिर कवि लिखता है ‘धोखा/बड़ा आम सा/किस्सा है लेकिन/मेरे हिस्से में/किसके बदले में/दे गई तुम।’

                   यह कविता स्वयं में व्यष्टि से समष्टि और वैयक्तिकता से सामाजिकता का वह पूरा ऐतिहासिक लेखा जोखा प्रस्तुत कर देती है ।  जिसमें समाज की उस विचारधारा पर व्यंग्य की चोट की गई है जिसे अनगिनत कवियों ने प्रस्तुत करने के लिए वर्षों साधना करते हुए अनेक ग्रंथ रच डाले हैं , पर फिर भी खुलकर उस बात पर चोट नहीं कर पाए । जिसके सम्मोहन में आकर हम इस नश्वर देह और अस्थायी संबंधों को ही अपने जीवन का लक्ष्य मानकर मोहपाष में बँधे हुए जीवन व्यतीत करते चले जा रहे हैं। इस भवसागर के प्रपंच में फँसे मानव को जीवन दर्शन का कठिन फलसफा बताते हुए कवि संकेत भी करता है कि ‘‘शिक्षित होने की/करने की/पूरी यात्रा/धोखे के अतिरिक्त/कुछ भी नहीं।/मित्रता, शत्रुता।/लाभ-हानि/पुण्य-पाप/मोक्ष और अमरता/सिर्फ और सिर्फ/धोखाधड़ी है।’’ वह लिखता है ‘‘आत्मीय संबंधो का/भ्रमजाल/धोखे के/सबसे घातक/हथियारों में से एक हैं।’’

                         इस कविता में अनुभूति और अभिव्यक्ति की जो तीखी धार पाठक को महसूस होती है, उसे स्वयं अज्ञेय ने भी महसूस किया था । जिसे उन्होंने अपनी एक कविता में बताते हुए लिखा था कि ‘‘साँप तुम सभ्य तो हुए नहीं/शहर में रहना भी तुम्हें नहीं आया/एक बात पूछूँ उत्तर दोगे/फिर कैसे सीखा डसना/विष कहाँ से पाया।’’ अज्ञेय द्वारा प्रयुक्त ‘डसना’ और कवि मनीष मिश्र द्वारा प्रयुक्त ‘धारदार हथियार’ दोनों ही उस धोखे की ओर संकेत करते हैं। जिसका अनुभव पाठक को अपने जीवन के प्रारंभ से ही हो जाता है। यही कारण अज्ञेय और मनीष मिश्र जी में साम्य के रूप में उभरकर आता है। इतना ही नहीं कवि इस कविता में सांकेतिक रूप से इस समस्या का एक हल भी प्रस्तुत करता है ।  जिसको समझने के लिए इस कविता को पूरा पढ़े बिना मन नहीं मानता। इस हल को ढूँढने की जिज्ञासा पाठक को कविता पूरी पढ़ने के लिए बाध्य करती है। पाठक की यह बाध्यता कवि की उस परिपक्वता को इंगित करती है जो उसने इस अल्पवय में अपने लेखन की अवस्था में ही प्राप्त कर ली है।

                  मनीष मिश्र जी के ‘अक्टूबर उस साल’ की कविताओं को पढ़कर लगता है कि वे जानते हैं कि पाठक को अपनी भावनाओं के ज्वार में किस प्रकार ओतप्रोत करना है। जिसके कारण वे पाठकों को कविता दर कविता अपने साथ बहाए लिए जाते हैं। संग्रह की दूसरी ही कविता ‘जब कोई किसी को याद करता है’ भी एक ऐसी प्रस्तुति है जो प्रत्येक पाठक को उसकी गहरी संवेदनाओं के पाश में बाँधकर पाठक को अपने इतिहास की एक मानसयात्रा के लिए बाध्य कर देती है। पाठक कविता के शीर्षक मात्र से अपने जीवन के सर्वाधिक प्रिय व्यक्ति को अनायास ही याद कर बैठता है ।  फिर आगे की कविता पाठक और पाठक के प्रिय के साथ पढ़ी जाती है। अपने प्रिय के साथ मानसयात्रा के दौरान पाठक स्वयं को और अपने प्रिय को यह याद दिलाने का प्रयास करता है कि उसने अपने प्रिय को अपने हृदय की गहराइयों में एक विषिष्ट स्थान दिया है। वह शीर्षक में लिखी मान्यता को झुठलाना चाहता है और कह उठता है कि ‘‘अगर सच में/ ऐसा होता तो/अब तक/सारे तारे टूटकर/जमीन पर आ गए होते/आखिर/इतना तो याद/मैंने/तुम्हें किया ही है।’’ इस संग्रह की कविता ‘रक्तचाप’ भी अपने प्रिय की याद करने और उसके साथ बिताये नितांत निजी और ऐसे अनुभूतिपूर्ण क्षणों से मिली गरमाहट की बात करता है जिससे आज भी पाठक भूल नहीं पाया है। मनीष जी की यह कविता भी उनकी अन्य कविताओं की तरह इतनी छोटी तो है किंतु गहरी भी इतनी है कि पाठक अपने प्रिय के सानिध्य को कविता की चंद पंक्तियों को एक साँस में पढ़ तो जाता है पर एक क्षण में पढ़ ली गई इन लाइनों के बाद बाहर निकलने वाली साँस वर्षों के इतिहास को प्रत्यक्ष कर जाती है। एक बात और है जो मनीष जी की कवितओं को विषेष बनाती है वह यह कि पाठक मनीष जी की कविताओं को स्वयं के जीवन में निभाई जिस भूमिका की भावभूमि में पढ़ता है वे उसे उसी के अनुरूप झँकृत कर देती हैं। यदि पाठक एक बार प्रेमी की तरह इन कविताओं को पढ़ता है तो उसे अपनी प्रेमिका की निकटता का अहसास होता है। यदि पाठक एक पुत्र की तरह इन कविताओं को पढ़ता है तो उसे अपनी माँ के ममत्व की गरमाहट भरी निकटता महसूस होती है, यदि मित्र की तरह पढ़ता है तो उसे एक अन्यतम मित्र की निकटता का आभास होता है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने इसी बात को इंगित करके लिखा था कि ‘जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत तिन्ह देखी तैंसी।’ मनीष मिश्र जी की कविताएँ भी पाठक को बार-बार पढ़ने के लिए प्रेरित करेंगी और प्रत्येक बार पाठक को एक नये रस का आस्वादन प्राप्त होगा ऐसा मेरा मानना है।

तुम्हारी एक मुस्कान के लिए’ कविता भी कुछ ऐसी ही तासीर की कविता है जिसमें पाठक देशकाल के बंधनों से परे जाकर जीवन के प्रत्येक क्षण में अपने प्रिय के साथ बिताए पलों को उसी ताजगी से याद करता है, जिस ताजगी से वे घटित हुए थे। इस कविता में जब कवि कहता है कि ‘तुम्हारी एक मुस्कान के लिए/जनवरी में भी/हुई झमाझम बारिश/और अक्टूबर में ही/खेला गया फाग।’ तब वह वर्तमान में होते हुए भी अपने प्रिय के साथ समययात्रा करता हुआ सूक्ष्म समायांतराल में एक पुनर्जीवन को जी लेता है। मनीष जी की कविताएँ पाठक की संवेदनाओं को भी संबोधित करती हैं। ‘जब तुम साथ होती हो’ में ऐसा ही संबोधन सुनाई पड़ता है मानो व्यक्ति अपनी आशा को संबोधित करते हुए कह रहा हो कि ‘तुम जब साथ होती हो/तो होता है वह सब/कुछ जिसके होने से/खुद के होने का/एहसास बढ़ जाता है।’ इस कविता का पहला भाव नायक द्वारा नायिका के प्रति उद्गार के रूप में सामने आता है पर एक अन्य अर्थ में ऐसा प्रतीत होता है कि कवि अपनी आशा के होने के महत्व का वर्णन करते हुए कह रहा है कि आशा के कारण ही कवि का अस्तित्व और पहचान है।

             

 

 

 

वह साल, वह अक्टूबर’ कविता इस संग्रह की मुख्य कविता प्रतीत होती है । जिसके इर्दगिर्द इस संग्रह का तानाबाना रचा गया लगता है। इस कविता में कवि ने अपने और प्रिय के व्यक्तिगत अनुभवों को शब्दबद्ध करने का प्रयास किया है। जब वह कहता है कि ‘इस/साल का/यह अक्टूबर/याद रहेगा/साल दर साल/यादों का/एक सिलसिला बनकर।’ तो इन पंक्तियों में कवि की नितांत व्यक्तिगत किंतु महत्वपूर्ण ऐतिहासिक क्षणों की एक श्रृंखला ध्वनित होती दिखाई देती है। ‘बहुत कठिन होता है’, ‘अवसाद’, ‘कच्चे से इष्क में’, ‘विफलता के स्वप्न’ ‘भाषा के लिबास में’, ‘इतिहास मेरे साथ’, ‘पिछली ऋतुओं की वह साथी’ आदि इसी श्रेणी की कविताएँ है। इन कविताओं में बीते जीवन की जो सुखद अनुभूतियों की गूँज है उसी का इतिहास इस संग्रह में दिखाई देता है जिसके कारण इस संग्रह का शीर्षक ‘अक्टूबर उस साल’ बहुत उपर्युक्त प्रतीत होता है। इस संग्रह की कविता ‘जीवन यात्रा’ की निम्न पंक्तियाँ इसी तथ्य का साक्ष्य भी देती हैं ‘ऐसी यात्राएँ ही/जीवन हैं/जीवन ऐसी ही/यात्राओं का नाम है।’ एक अन्य कविता ‘चाँदनी पीते हुए’ में भी कवि प्रिय के अनुराग को व्यक्त करते हुए न जाने कितनी ही बिसरी बातें याद कर जाता है वह कहता है ’याद आता है/मुझे वह साल/जिसमें मिटी थी/दृगों की/चिर-प्यास।’ इस कविता की इन प्रारंभिक पंक्तियों को पढ़ते ही पाठक की अपनी बीती अनुरक्ति की यादें ताजा हो जाती हैं उसकी आँखों के झरने में एक-एक करके अनगिनत मीठे लम्हे भीग जाते हैं। इस कविता में जब कवि लिखता है कि ‘यह/तुम्हारे भरोसे/और/मेरे बढ़ते अधिकारों की/एक सहज/यात्रा थी।’ तब तक पाठक इस कविता के शब्दों के साथ अपना तादात्म्य स्थापित कर लेता है और कवि के शब्दों के अनुरूप अपने बीते जीवन को एक बार फिर से अपने भावदेष में जीने लगता है और तब कवि पाठक की अनुभूतियों को कुरेदता हुआ उन बातों की तह तक पहुँच जाता है जिसमें कवि और पाठक एक-दूसरे से अपनी अंतरंग बातें साझा करते हैं कवि लिखता है ‘तुम्हारे बालों में/घूमती/मेरी उंगलियाँ/निकल जाती/सम्मोहन की/किसी लंबी यात्रा पर।’ कवि की इस कविता के साथ पाठक अपने मन की गइराइयों में छुपे उस अनुराग की तान छेड़ देता है जिसके कारण उसे प्रेम का उदात्त आभास हुआ है। इस भाव को शब्द देते हुए कवि लिखता है ‘जहाँ से तुम/मेरी सर्जनात्मक शक्ति की/आराध्या बन/रिसती रहोगी/मिलती रहोगी/उसी लालिमा/और आत्मीयता के साथ।’ कवि की कविता इन शब्दांे के साथ पूरी हो जाती है किंतु इस तरह की कविताओं के पाठ से पाठक के हृदय में जो स्पंदन शुरु हो जाता है वह पाठक को न केवल पूरी कविता को दोबारा पढ़ने के लिए विवष करता है बल्कि वह पाठक को प्रेरित करता है कि इसी प्रकार उसके मन की उन सभी बातों को इस संग्रह की अन्य कविताओं में ढूँढे जिनको पाठक ने स्वयं से भी साझा नहीं किया है। पाठक उत्प्रेरित होता है और इस संग्रह की अन्य कविताओं में अपने निजी क्षणों की तलाष करता है।

                          हर व्यक्ति के जीवन में कोई ऐसा प्रिय व्यक्ति अवष्य होता है जिसके प्रति उसका व्यवहार एक अतिरिक्त सावधानी या सुरक्षा के चलते कुछ ऐसा हो जाता है कि उस प्रिय व्यक्ति के कुछ निजी पलों का हमसे अतिक्रमण हो जाता है। ‘मुझे आदत थी’ कविता की पंक्तियाँ ‘मुझे आदत थी/तुम्हें रोकने की/टोकने की/बताने और/समझाने की।’ ऐसे ही प्रिय व्यक्ति के प्रति पाठक द्वारा किए गए अतिक्रमण की क्षमायाचना करती है तथा प्रायष्चित स्वरूप पाठक को ‘अब/जब नहीं हो तुम/तो इन आदतों को/बदल देना चाहता हूँ/ताकि/षामिल हो सकूँ/तुम्हारे साथ/हर जगह/तुम्हारी आदत बनकर।’ के माध्यम से समाधान करने का प्रयास करती है जिससे उसके मन की टीस समाप्त हो सके। ‘कब होता है प्रेम’, ‘रंग-ए-इष्क में’ कविता की निम्न पंक्तियाँ भी पाठक को अपने रंग मंे रंगने में सफल हो जाती है ‘जहाँ बार-बार/लौटकर जाना चाहूँ/वह प्यार वाली/ऐसी कोई गली लगती।’

                    इस संग्रह में कुछ अन्य कविताएँ जैसे ‘चुप्पी की पनाह में’, ‘कुछ उदास परंपराएँ’, ‘इन फकीर निगाहों के मुकद्दर में’, ‘प्रतीक्षा की स्थापत्य कला’, ‘पिघलती चेतना और तापमान से’, ‘गंभीर चिंताओं की परिधि’ आदि पाठक को अपने स्वप्नलोक से वापस लाकर यथार्थ का आभास कराती हैं और बताती हैं कि वह जिस भावभूमि में था वह उसको नास्टेल्जिया मात्र है पर ‘दो आँखों मंे अटकी’ जैसी कविता पाठक को आष्वस्त भी करती है कि उसके मन की गइराइयों में जो निष्छल और निर्मल प्रेम छुपा है वही उसकी अनमोल निधि है जो उसे उसके संबंधों के निर्माण के लिए प्रेरित करती है। जब कवि लिखता है ‘यकीन मानों/मेरे पास/और कुछ भी नहीं/मेरे कुछ होने की/अब तक कि/पूरी प्रक्रिया में।’

                 एक अन्य कविता ‘यूँ तो संकीर्णताओं को’ भी उस सामाजिक एकता की ओर संकेत करती है जिसकी मजबूती से आज हम अपनी जी जाति को विनाष की ओर ढकेल रहे हैं। कवि लिखता है ‘हम/आसमान की/ओर बढ़ तो रहे हैं/पर अपनी/जड़ों का हवन कर रहे हैं।’ मेरे विचार से कवि मनीष की यह कविता इनके इस संग्रह की सबसे सषक्त कविता है जो तीखे शब्दों में हमारे समाज के यथार्थ और सामाजिक संबंधों की वर्तमान स्थिति की दयनीयता को स्पष्ट रूप से न केवल सामने रखती है बल्कि पाठक को सोचने यह सोचने के लिए विवष करती है कि क्या मनुष्य जाति के विकास का लक्ष्य यही था जो कवि मनीष जी ने लिख दिया है। पाठक कवि से सहमत भी होता है तथा सृष्टि और समाज मंे अपनी भूमिका की समीक्षा पर मनन भी करता है। इस कविता के अंतिम पद की पंक्तियाँ ‘भगौड़े/भाग रहे हैं विदेश, देश को लूटकर/हमारे रहनुमा हैं कि/भाषण भजन कर रहे हैं।’ कवि को दुष्यंत कुमार जैसे उन शीर्ष कवियों की पंक्ति में लाकर खड़ा कर देती हैं जो हमारे समाज की बुराइयों को अपनी कलम की तलवार से काटने के लिए किये जाने वाले युद्धघोष की प्रथम पंक्ति में रहते हुए यह कहते हैं कि ‘हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोषिष है कि यह सूरत बदलनी चाहिए। ‘दौर-ए-निजाम’ कविता की ये पंक्तियाँ ‘विष्व के सबसे बड़े/सियासी लोकतंत्र में/आवाम की कोई भी मजबूरी/सिर्फ एक मौका है।’ अनायास ही हिंदी के हस्ताक्षर गजानन माधव ‘मुक्तिबोध’ की याद दिला देती हैं।

                 कवि मनीष की कविताओं में यथा स्थान बिम्ब, प्रतीक एवं मिथकों को प्रयोग भी किया गया है जो युवा कवि होने पर भी अपने कार्य में दक्षता को दर्षाता है। इसी कविता में उनका यह लिखना कि ‘रावण के पक्ष में/खुद को/खड़ा करके/ये हर साल/किसका दहन कर रहे हैं?’ मनीष जी की कविता मंे इसी कलात्मकता की ओर संकेत करता है। इस संग्रह में मनीष जी की अनुभूतियों का सबसे सषक्त रूप उनकी ‘माँ’ कविता में उभरकर सामने आता है। शायद यह कविता इस संग्रह की सबसे लंबी कविता भी है। हो भी क्यों न, व्यक्ति के समस्त जीवन की एकमात्र संभावना इस कविता के शीर्षक में छिपी हुई है। यदि इस कविता की भाव संपदा की व्याख्या की गई तो शायद अन्य किसी कविता के लिए अवकाष ही न मिले। कवि मनीष जी द्वारा अपनी माँ को समर्पित यह कविता उनके सहज, सरल और शांत व्यक्तित्व के निर्माण कर कहानी कहती है। इस कविता के तुरंत बाद की कविता में अपने पर हावी हो जाने के द्वंद्व में पददलित की हुई इच्छाओं का जैसा संक्षिप्त और सटीक प्रस्तुतिकरण कवि ने किया है उससे ‘तुम से प्रेम’ कविता कवि की प्रस्तुति का अंदाज ही बदल देती है। जो कवि अभी तक सरल शब्दों में अपनी बात रखता जा रहा था इस कविता से उसके शब्द अचानक अत्यंत गंभीर और गहरे अर्थों वाले दार्षनिक हो जाते हैं जिससे ऐसा लगता है मानो कवि वर्षों की काव्य साधना की चिर समाधि का अनुभव साथ लिए हुए धीरे-धीरे अपना पद्यकोष खोल रहा है।

                     इस संग्रह में इस कविता से आगे की लगभग समस्त कविताएँ तीक्ष्ण कटाक्ष और पैनी दृष्टि के साथ एक ऐसे विद्वान पाठक का आग्रह करती हैं जिन्हें पढ़ने वाले के पास अपना स्वयं के अनुभव का एक इतिहास हो। ‘तुमने कहा’ कविता की पंक्तियाँ ‘मैं वही हूँ/जिसे तुमने/अपनी सुविधा समझा/बिना किसी/दुविधा के।’ बताती हैं कि केवल दान करना ही प्रेम की इति नहीं होती, प्रतिदान का भी प्रेम के व्यापक संसार में बहुत गहरा महत्व है। प्रतिदान के अभाव में प्रेम के दूषित भाव का भी जन्म हो सकता है जिसके कारण प्रेम के दीर्घायु होने में संषय उत्पन्न हो जाता है। ‘लंबे अंतराल के बाद’ कविता की ये पंक्तियाँ इसी की ओर संकेत करती हैं ‘सालते दुःख से/आजि़्ाज आकर/वह मौन संधि/ग़्ौरवाजि़्ाब मानकर/मैंने तोड़ दी’। इस कविता में मनीष जी ने अत्याधुनिक और तकनीकी युग में जीवन को यथार्थ की कसौटी पर परखते हुए जीने वाले आज के युग के लोगों के उस तनाव को प्रस्तुत करने का प्रयास किया है जो प्रतिदान के अभाव में उत्पन्न हो जाता है। इस अभाव को दूर करने का प्रयास संग्रह की अगली कविता ‘कुछ कहो तुम भी’ की निम्न प्रारंभिक पंक्तियों में ही दिखाई दे जाता है ‘यूँ खामोषी भरा/मुझसे/इंतकाम न लो/तुम/ऐसा भी नहीं कि/तुम्हें/किसी बात का/कोई/मलाल न हो/दूरियाँ कब नहीं थीं/हमारे बीच?/लेकिन/ये तनाव/ये कष्मकष न थी’ मनीष जी के इस संग्रह में प्रेम का जो रूप दिखाई देता है वह एक के बाद एक आने वाली कविताओं में व्यक्तिगत से समष्टिगत विस्तार तो पाता ही है उसमें आलंबन का तिरोभाव भी होता चला जाता है। ‘जैसे होती है’ कविता की निम्न पंक्तियाँ एक प्रेमी में दूसरे प्रेमी के इसी विलय की ओर संकेत करती हैं ‘जैसे होती है/मंदिर/में आरती/सागर/में लहरें/आँखों/में रोषनी/फूल/में खुषबू/षरीर/में ऊष्मा/षराब/में नषा/और किसी मकान/में घर/वैसे ही/क्यों रहती हो?/मेरी हर साँस/में तुम।’ मनीष जी की यह कविता कबीर के उस दोहे की बरबस ही याद दिला देती है जिसमें उन्होंने भी आलंबन के तिरोभाव का उल्लेख किया है। कबीर कहते हैं ‘जब मैं था तब गुरु नहीं, अब गुरु हैं हम नाय, प्रेम गली अति सांकरी, जा में दो न समाय।’ प्रेम के विस्तार में स्वयं का विलय कर देने का यह भाव कबीर और मनीष जी के भाव में नितांत समानता दर्षाता है।

                         प्रेम ओर समर्पण’ कविता प्रथमदृष्टया इस संग्रह के प्रतिकूल दिखाई देने पर भी इस संग्रह के लिए निहायत ही अनुकूल है पर इस कविता को इस संग्रह में जो स्थान दिया गया है वह अनुकूल जान नहीं पड़ता। इस कविता को इस संग्रह की कविताओं ‘अवसाद’ और ‘मतवाला करुणामय पावस’ के बीच कहीं होना चाहिए था। इसी तरह ‘आगत की अगवानी में’, ‘स्थगित संवेदनाएँ’, ‘जो लौटकर आ गया’ इस संग्रह की ऐसी कविताएँ हैं जिनकी गहराई को समझने के लिए वांछित परिपक्वता अभी मुझमें नहीं है ऐसा मुझे प्रतीत होता है। इस संग्रह की अंतिम कविता ‘बचाना चाहता हूँ’ को पढ़कर ऐसा महसूस होता है कि लेखक ने इस संग्रह की अंतिम कविता के रूप में इसको बहुत पहले ही लिख लिया होगा क्योंकि यह कविता हर लिहाज़्ा से संग्रह की अंतिम कविता के रूप मंे ही फिट बैठती है। इस संग्रह की कविताओं को पढ़ते हुए पाठक अपने बीते हुए नितांत व्यक्तिगत और सुखदायी वैचारिक जगत् मंे विचरण करता है उससे पाठक को यह समाधान हो जाता है कि उसके प्रेम के ये ही निजी क्षण उसकी ऐसी अक्षय निधि हैं जो उसके अकेलेपन को भावों के परिवार से भर देती हैं और पाठक विवष हो जाता है कि यदि उसे अपने अस्तित्व और अपने व्यक्तित्व की रक्षा करनी है तो उसे इन सुखद स्मृतियों को बचाना ही होगा। ऐसे निष्चय के साथ यह अंतिम कविता पाठक को अपने इस निर्णय पर अटल होने के लिए प्रेरित करती हैं जिसमें कवि कहता है ‘मैं/बचाना चाहता हूँ/दरकता हुआ/टूटता हुआ/वह सब/जो बचा सकूँगा/किसी भी कीमत पर’ कवि ने बचाने वाली इस संपत्ति के कोष में जिस टूटते हुए मन, भरोसे की ऊष्मा, आँखों में बसे सपने की बात की है उनके लिए पाठक को लगता है कि ये तो स्वयं पाठक के मन में उठने वाले विचार हैं। इस प्रकार कवि मनीष की यह कविता भी पाठक के साथ तारतम्य स्थापित कर लेती है।

                            इस अंतिम कविता को पढ़ने के बाद इस बात की तसल्ली होती है कि अपने दूसरे ही संग्रह की कविताओं में कवि मनीष ने पाठक की रुचि के अनुरूप ऐसी कविताओं की रचना की है जो पहली कविता से लेकर अंतिम कविता तक पाठक को बाँधे रखने में सफल होती है। यद्यपि इन कविताओं में ध्यानस्थ पाठक की चेतना भंग नहीं होती तथापि कुछ कविताओं का स्थान यदि इधर-उधर कर दिया जाता तो मेरे जैसे अल्पज्ञ किंतु भावुक पाठक को और भी अधिक आनंद आता। फिर भी कम शब्दों में रची हुई छोटी छोटी कविताएँ होने के बावजूद कवि ने अपनी अनुभूति की अभिव्यक्ति जिस प्रकार से की है उसका रसास्वादन करते हुए साहित्य के बड़े-बड़े कवियों का अनायास स्मरण हो जाना कवि की कवितओं की सफलता और काव्य चेतना की गहराई की ओर संकेत करता है। इन कविताओं को पढ़कर ऐसा लगता है कि यह कवि केवल लिखने लिए ही कविताएँ नहीं लिखता बल्कि इसकी सूक्ष्म चैतन्य दृष्टि आज के आपाधापी भरे समय में भी मनुष्य को विश्राम देकर स्वयं के बारे में विचार करने के लिए बाध्य करती है। डाॅ. मनीष मिश्रा जी को उनके काव्य संग्रह ‘अक्टूबर उस साल’ की छोटी, सुंदर और गहरी कविताओं की रचना के लिए बहुत बधाई।

 

 

डॉ गजेन्द्र भारद्वाज,

 हिंदी

सहायक प्राचार्य

सी.एम.बी. कालेज डेवढ़

(ललित नारायण मिथिला विष्वविद्यालय

दरभंगा का अंगीभूत महाविद्यालय)

घोघरडीहा, जिला- मधुबनी, बिहार

ईमेल- हंददन9483/हउंपसण्बवउ

संपर्क- 7898227839

Poetry of Self Revelation: Appreciation of Manish Kumar Mishra’s Poems

 

Poetry of Self Revelation: Appreciation of Manish Kumar Mishra’s Poems

Name : Dr. Manisha Patil

Designation : Asst. Professor (English)

 

Poetry of Self Revelation: Appreciation of Manish Kumar Mishra’s Poems

 

What is poetry?

Nothing but words.

But not just words.

Special words with special meanings.

Special because both words and meanings are loaded with emotions and personal experiences.

 

 

That’s why poetry is different from prose.

It touches the heart and overwhelms the intellect.

It makes one feel somebody else’s experience as one’s own.

It creates the bridges of understanding and transcends the valleys of incomprehension.

It generates empathy and thereby unites the people across all the artificial divisions of civilization.

 

 

The above rumination is the spontaneous product of accidental reading of the poem Aatmiyata i.e. Affinity by the poet called Manish Kumar Mishra.

It may seem strange to head

But it’s true that I speak

If you like to mislead

I’ll be your willing target meek.

The poem goes on to list how all the concepts like friendship, enmity, gain, loss, virtue, sin, salvation, eternity, religion & society, state & nation are just the swindles of language. However, the deadliest deceit is nothing but the trap of affinity. Most often people are deceived by those who claim affection for them. According to the poet, the only solutions to such betrayals are the power of forgiveness & the practice of conscience. He has experienced the strength of these means before & now is ready to experience it once again. The opportunity that is offered to him to judge himself on the scale of affinity, makes him welcome those who might hoax him in the name of affection.

In his next poem, the poet describes the intensity of his affection for his beloved using the scale of stars. He says,

I have heard that

When someone remembers somebody

A star falls from the sky.

But now I don’t believe it at all,

Because if it had been true

Then by now all the stars would have fallen on earth,

As I have remembered you at least this much!

The uniqueness of these poems lies in the integrity of expression, implication & the underlying passion. The poet does not write mere words. As he himself says,

When I write to you

I write to preserve,

Tasting each word

To you, I serve.

His each & every expression is poignant. It states less but suggests more. Its ardour lends order to disorder such as,

The way, there is worship in a temple,

There are waves in an ocean,

There is vision in an eye,

There is fragrance in a blossom,

There is warmth in a body,

There is intoxication in a wine,

And there is home in a house…

Why, are you there, in my every breath?

A poet’s personality (for that matter like any other person), lies at the intersection of inner forces & the outer forces. The inner forces comprise of one’s own emotions, thinking, beliefs, longings & philosophy of life. The outer forces consist of socio-economic-political system in which one lives. Generally, outer forces are considered to be more important than the inner forces. While discussing the creation of any artist, invariably his/her cultural milieu is used as a backdrop against which the drama of artistic creation unfolds. Such a historical method, deemed to be objective, is preferred to the subjectivity of an individual. However, seldom does such objectivity do justice to an individual genius. The layers of complexity which arise due to the interaction of one’s inner forces and outer forces cannot be captured in simplistic historic accounts. The poet says,

History cannot do justice to me,

Because I have buried under

(Gog knows, how many layers)

My own side & truth as well…

Art on the other hand focuses on the inner forces of an individual which drives him/her to challenge the oppressive outer forces & in turn change them. In the words of the poet,

I wish the words of my poems

Should become useful

To voice the protest against oppression

I wish the words of my poems

Should become useful

To sharpen the weapons against domination

Such an expression is the hallmark of not only a poetic genius but also the trustworthy human heart which dares to care. Can any other words explain the self-revealed truth?

कवि मनीष : नई संभावनाओं का पुंज ।

 

कवि मनीष : नई संभावनाओं का पुंज । - श्रीमती रीना सिंह



                         
श्रीमती रीना सिंह
                           
सहायक प्राध्यापिका
                           
हिन्दी विभाग
                           
आर के तलरेजा महाविद्यालय
                           
उल्हासनगर, महाराष्ट्र ।

 

मनीष के दो कविता संग्रह आ चुके हैं । वर्ष 2018 में प्रथम कविता संग्रह , अक्टूबर उस साल और 2019 में इस बार तुम्हारे शहर में । इन्हीं दो कविता संग्रहों के आधार पर मैं मनीष की कविताओं के संदर्भ में अपनी राय इस आलेख के माध्यम से प्रस्तुत करूंगी ।
 ‘
जब कोई किसी को याद करता है’ कविता  में कवि अपनी प्रियतमा के वियोग में विह्वल है । उसने सुन रखा है कि किसी को याद करने पर आसमान से एक तारा टूट जाता है लेकिन अब इस बात पर उसे बिल्कुल भी यकीन नहीं है क्योंकि विरह में अपनी प्रेयसी को जितना याद उसने किया है अब तक तो सारे तारे टूटकर जमीन पर आ जाने चाहिए -

अगर सच में              

  ऐसा होता तो                                                               
अब तक                                                                     
सारे तारे टूटकर    

  जमीन पर आ गए होते                                              

      आखिर    इतना तो याद          

        मैंने                                                                           

   तुम्हे किया ही है ।


रक्तचाप’ कविता में कवि अपने बढ़े रक्तचाप को नियंत्रित करना चाहता है  लेकिन प्रेमिका की यादें उसकी हर गहरी और लंबी साँसों में घुसकर उसके रक्तचाप को और बढ़ा देती है । प्रेमिका की यादें रक्तचाप को नियंत्रित करने का हर प्रयास असफल कर देती हैं । ‘ जब तुम्हें लिखता हूँ  ’ काव्य में कवि प्रेयसी को पत्र लिखते समय अपने भावों को वयक्त करता है 
कवि अपने सारे भावों को चुने हुए शब्दों में बड़ी जतन से लिखता है । बसंत के मौसम में होली के रंगों से प्रियतमा को सराबोर करके लिखता है । कवि को अपने प्रियतमा को पाने की जो आस है उसकी प्यास को वह उसे दिल खोलकर लिखता है । अपनी भावनाओं को व्यक्त करते समय कवि के मन में कोई सांसारिक भय नहीं होता । वह अपने प्रेम को सारे बंधन तोड़कर प्रकट करता है –

जब तुम्हें लिखता हूँ                                             
तो दिल खोलकर लिखता हूँ                                              न जाने कितने सारे                                                          बंधन तोड़कर लिखता हूँ ।

कवि अपने सारे गम भुलाकर या कह सकते हैं छिपाकर प्रेयसी को अपनी खुशी लिखता है क्योंकि वह उसे हमेशा खुश देखना चाहता है -

आँख की नमी को                                                          तेरी कमी लिखता हूँ ।

वो संतरा’ काव्य निश्छल प्रेम की एक गहन अभिव्यक्ति है । इस काव्य में कवि ने त्याग की भावना को सर्वोपरि बताया है । अपने हिस्से के संतरे को कागज में लपेटकर सबकी निगाहों से छिपाकर कवि की प्रेयसी चुपचाप उसे थमा देती है । यह  पहली बार नहीं है इसी तरह बहुत बार उसने अपने हिस्से का बचाकर कवि को दिया है । जितने समर्पण से प्रेयसी सब कुछ देती रही उतना ही समर्पित होकर प्रेम में पगा हुआ वह सबकुछ लेता रहा –

और मैं भी                                                                     चुपचाप लेता रहा                                                            तुम्हारे हिस्से से                                                              बचा हुआ                                                                         वह
सबकुछ जो                                                                  प्रेम से /  प्रेम में                                                              पगा रहता ।

जब भी कवि की मुलाकात उसकी प्रेयसी से होती है वह उसे जीवन की जटिलताओं और प्रपंचों से दूर अत्यंत सहज और संवेदनशील नजर आती है और जाते – जाते कुछ यादें और नए किस्से जोड़कर अपने प्रेम को और दृढ़ बना जाती है –

हर बार                                                                                                 
अपने हिस्से से बचाकर                                                                                                                 
 
कुछ देकर ।                                                                   कुछ स्मृतियाँ                                                                 छोड़कर                                                                       कुछ नए किस्से जोड़कर ।

प्रेयसी जब भी कवि से मिलती है , वह उसके भीतर एक विश्वास , सौभाग्य और उसके जीवन को एक उष्मीय उर्जा तथा संकल्प से भर देती है । कवि कहता है यह सारी अनुभूतियाँ उस संतरे से भी मिल जाती है जिसे उसकी प्रेयसी चुपचाप सबकी नजरों से बचाकर दे देती है ।
एक और प्रेम से सराबोर कविता ‘जब थाम लेता हूँ’ में कवि अपनी प्रेमिका की समीपता में सब कुछ भलाकर उसे अपना हृदय सौंप देता है । अपनी प्रेयसी के नर्म हाथों को जब वह अपने हाथों में ले लेता है तब छल , कपट आदि बुराइयों से भरी इस दुनिया को छोड़कर वह उसमें एकात्म हो जाता है -

तो                                                                               छोड़ देता हूं                                                                   वहाँ का                                                                        सब कुछ                                                                       जिसे                                                                           दुनियाँ कहते हैं ।

बहुत कठिन होता है’ काव्य में कवि कहना चाहता है कि चलाचली की बेला में प्रेयसी को ‘गुड बॉय’ कहना अर्थात अलविदा कहना बड़ा ही कठिन होता है । कवि ऐसे अवसरों को निभाने में अक्सर असफल हो जाता है । इसलिए वह याद करता करता है कि किस तरह उसकी प्रेयसी सर्दियों की खिली हुई धूप की तरह आई थी और अपनी सम्पूर्ण गरिमा तथा ताप के साथ उस गुलाबी ठंड में कवि के हृदय पर छा गई थी । अपनी प्रेयसी के चेहरे की चमक और साँसों की खुश्बू का वर्णन करते हुए कवि कहता है -
तुम्हारे                                                                           चेहरे की चमक उतर                                                     
 
आयी थी                                                                    मेरी आँखों में                                                                तुम्हारी                                                                        कच्ची सौंफ और जाफरान सी खूश्बू                                  बस गई थी                                                                 
 
मेरी साँसों में ।

प्रेयमी के चेहरे को पढ़कर कवि का आत्मविश्वास और बढ़ने लगता है । जब कभी साथ चलते - चलते वह अपनी गर्म गोरी हथेली में कवि का हाथ थाम लेती है तो दूर पहाड़ी के मंदिर में जल रही दीये की लौ कवि को और अधिक प्रांजल और प्रखर लगने लगती है । अर्थात ईश्वर पर कवि का विश्वास और बढ़ जाता है ।
इन सबके बीच जाती हुई अपनी प्रेयसी को ‘गुड बाय’ कहना कवि को बड़ा ही कठिन जान पड़ता है । वह चाहता है कि अपनी प्रेयसी  से वह कह दे कि अचानक से तुम फिर मेरे पास आ जाना जैसे इन पहाड़ों पर कोई मौसम अचानक आ जाता है ।

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कवि इस काव्य के माध्यम से कहना चाहता है कि ‘ गुड बाय ’ कहना ऐसा लगता है जैसे कोई अपने साथी से हमेशा के लिए विदा ले रहा हो । इसलिए जाते समय वह गुड बाय नहीं कह पाता । वह चाहता है कि जाता हुआ व्यक्ति पहाड़ों के मौसम की तरह अचानक आ जाए क्योंकि प्रिय व्यक्ति के अचानक आ जाने से उस क्षण की खुशी कई गुना अधिक बढ़ जाती है ।
अतः कहा जा सकता है ‘ अक्टूबर इस साल ’ काव्य संग्रह में कवि ने बड़े ही सरल और सहज शब्दों में अपने भावों को अभिव्यक्त किया है । कवि  ने कविता के वाक्य विन्यास को आरोपित सजावट से मुक्त कर सहज वाक्य विन्यास से बद्ध किया है । अपने भावों को व्यक्त करने के लिए कवि ने रचनात्मक शैली का प्रयोग किया है । प्रेम की सूक्ष्म अभिव्यक्ति के लिए कवि ने नवीन उपमानों का प्रयोग किया है जिससे काव्य की रोचकता में विविथ आयाम जुड़ गए हैं ।

संदर्भ ग्रंथ :
1.
अक्टूबर उस साल - मनीष, शब्दसृष्टि नई दिल्ली, 2018
2.
इस बार तुम्हारे शहर में - मनीष, शब्दसृष्टि नई दिल्ली 2019

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