Friday, 17 April 2026

चिरोयली कहानी

 चिरोयली



       मैं ताशकंद, उज़्बेकिस्तान में सन 2024 की फ़रवरी के पहले सप्ताह में पहुंचा था, ताशकंद स्टेट यूनिवर्सिटी के विजिटिंग प्रोफ़ेसर के रूप में ।  मुझे यहाँ लगभग डेढ़ साल का समय बिताना था । एक अजनबी देश में अकेले इतना लंबा समय बिताने का यह पहला अनुभव था ।  मन में कई तरह के विचार थे जो परेशान किए हुए थे। ताशकंद मेरे लिए एक नई किताब जैसा था, जिसके पृष्ठों को मुझे इन डेढ़ सालों में धीरे-धीरे पलटने थे। लाल बहादुर शास्त्री भारतीय संस्कृति केंद्र के निदेशक भाई सितेश कुमार ने बताया था कि ड्राइवर शाहरुख मुझे एयरपोर्ट पर मिलेंगे और उन्हें अंग्रेज़ी बोलने आती है। अपना  सामान लेकर जैसे ही मैं एयरपोर्ट से बाहर निकला ठंडी हवा के तेज़ झोके से मेरी रूह कांप गयी । अभी ओवर कोट पहन ही रहा था कि एक लंबे चौड़े व्यक्ति ने मुझसे पूछा " प्रोफ़ेसर मनीष फ़ॉर्म इंडिया ?"  मैंने हां में सिर हिलाते हुए कहा " यस,बट हाऊ यू हैव रिकॉग्नाइज्ड मी ?"


        उसने मुस्कुराते हुए कहा," मिस्टर सितेश कुमार हैज गिवेन मी योर फ़ोटो। कैन वी गो?" इतना कहकर उन्होंने समान की ट्राली पकड़ ली और मुझे अपने पीछे आने का इशारा किया। मैं पहली बार किसी अजनबी देश की मिट्टी पर उतरा था। कदमों के नीचे की बर्फ़ चरमरा रही थी, जैसे कोई अनकही भाषा स्वागत कर रही हो। शाहरुख ने सामान कार में रखा और हम मेरे नए आशियाने की तरफ़ निकल पड़े । वह आशियाना जिसे मैं खुद पहली बार देखनेवाला था । इस नए परिंदे के लिए ताशकंद में आशियाना और आबोदाना सुनिश्चित थे,बस आगाज़ और अंज़ाम बाकी था । 


       बाहर हल्की बर्फ़ गिर रही थी, नर्म रुई की फ़ाहों की तरह । गिरती हुई बर्फ़ कई बार शिमला में देख चुका था लेकिन वो मौसम किसी के संग-साथ वाला था । लेकिन यहाँ मैं अकेला था । संग-साथ की स्मृतियाँ और वर्तमान की निःसंगता  के बीच कार धीरे-धीरे मेरे नए आशियाने यक्का चिनार, मीराबाद की ओर बढ़ रही थी । ऐसा लग रहा था कि समय के धूसर पल धीरे-धीरे मेरे भीतर उतर रहे हों। कार के अंदर की ऊष्मा और बाहर की ठंड के बीच मैं फँसा हुआ था, जैसे स्मृतियों और वर्तमान के बीच कोई अदृश्य दरार थोड़ी और चौड़ी हो गई हो। वह पूरा शहर जैसे बर्फ़ की चादर में लिपटा हुआ था। दूर-दूर तक सफ़ेद परतें, जैसे किसी ने धरती को नए सिरे से रंग दिया हो । इस धरती के हर पत्थर, हर पेड़, हर बर्फ़ के कण को मुझे अब धीरे-धीरे पहचानना था, आख़िर कितने दिन अजनबी रहूंगा ? ताशकंद की वह ढलती हुई साँझ चुपचाप बर्फ़ में लिपटी थी। और मैं, उसकी बाहों में एक नए सफ़र की शुरुआत करने जा रहा था।


         अभी कोई पाँच, साढ़े पाँच ही बजे थे पर शहर जैसे सोया हुआ था। सड़कें शांत थीं, पर मुझे महसूस हो रहा था कि यह नींद अस्थायी है। यह शहर सुबह होते ही अपना सुर्ख़ चेहरा दिखाएगा, और मैं उसकी आँखों में झाँक सकूँगा। एयरपोर्ट से यक्का सराय की दूरी मुश्किल से 20 मिनट की रही होगी । अली शेर नवाई पार्क की परिक्रमा कर के हम अपने गंतव्य पर पहुँचते हैं और शाहरुख कार रोक देता  है। वह इमारत, जहाँ मुझे ठहरना था, वह नौ मंजिला इमारत अब मेरे सामने  थी। चारों ओर बर्फ़ की चादर, और बीच में पीली रोशनी से जगमगाता लोहे का मुख्य दरवाज़ा। दरवाजा नंबर कोड से शाहरुख ने खोला और हम लिफ्ट से नौवीं मंज़िल के 65 नंबर फ्लैट के सामने आ गए  । फ्लैट का दरवाज़ा खोलकर शाहरुख ने सामान एक तरफ़ रखा और मुझे फ्लैट दिखाने लगा । 


          पानी कैसे आयेगा, गैस कैसे चालू होगी, दरवाज़ा बंद कैसे होगा, रूम हीटिंग, मुख्य दरवाजे का कोड, वाईफाई कोड इत्यादि । मैंने सब कुछ ध्यान से सुना। एक-एक बात मानो जीवन की डोर से बँधी हुई थी। नए देश में रहना केवल भाषा और लोगों से परिचित होना नहीं होता, बल्कि हर छोटे यंत्र, हर साधन, हर कोड को समझना भी ज़रूरी हो जाता है। यही वे सूत्र होते हैं जो किसी अनजान घर को ‘अपना’ बनाने की ओर पहला कदम होते हैं । अपार्टमेंट के नीचे ही ‘फिश लैंड’ और ‘जाहिद कबाब’ नाम के दो होटल थे । ‘स्मार्ट सेंटर’ नाम की एक बड़ी दुकान भी जहां सब्जियां, फल, दूध और किराने का लगभग सब सामान मिल जाता था। मेडिकल स्टोर, कॉस्मेटिक, चौबीस घंटे खुली रहनेवाली दो वाइन शॉप,  हॉस्पिटल और अली शेर नवाई पार्क भी पास ही था । नया आशियाना मुझे पसंद आया। मुझे ज़रूरी सारी बातें नोट करा और मोबाइल के लिए यूसेल नामक कंपनी का नया उज़्बेकी सिम्कार्ड देकर, शाहरुख रूखसत हुए ।


         शाहरुख के जाने के बाद उस फ्लैट में एक गहरी चुप्पी फैल गई। फ्लैट मानो अचानक अपनी साँस रोककर खामोश हो गया हो । मैं अकेला था, बर्फ़ के शहर में, एक नए घर में, अनजान दीवारों के बीच। उस चुप्पी और उस घर को अब मेरी स्मृतियों का हिस्सा बनना था। बाहर बर्फ़ अब भी गिर रही थी, पर भीतर का कमरा धीरे-धीरे गर्म हो रहा था। सेंट्रल हीटिंग की बहुत हल्की-सी गुनगुनाहट मुझे यह एहसास दिला रही थी कि अब मैं सुरक्षित हूँ। तभी याद आया कि रात के खाने का क्या ? शाम के सवा छ  ही तो हुए थे फ़िर बाहर ही तो होटल था, पर भीतर एक झिझक थी । क्या अभी बाहर जाना चाहिए? क्या मैं राह भटक जाऊँगा? भाषा न समझ पाने पर क्या होगा? उज़्बेकी के कुछ शब्द सीखे थे लेकिन क्या उनसे काम बन जाएगा ? थोड़ा विचार करने के बाद मैंने धीरे से कोट उठाया, दस्ताने चढ़ाए और दरवाज़े का कोड दोहराया, ताकि लौटते वक्त भूल न जाऊँ। पहले ही दिन अधिक रात को बाहर जाने से अभी चले जाना मुझे उचित निर्णय लगा । 


         ‘फिश लैंड” होटल पहुँचकर भीतर मैं एक मेज़ पर बैठा, थोड़ी-सी थकान, थोड़ी-सी भूख और अजनबीपन की मिलीजुली बेचैनी के साथ। मेनू उज़्बेकी के साथ अंग्रेजी में भी उपलब्ध था । उस  होटल में एक ग्रिल सैंडविच और तुर्की चाय से काम बन गया। शाकाहारी लोगों के लिए अधिक कुछ वहां था नहीं । वैसे भी परदेश में रहते हुए अपनी आदतों, अपने स्वादों को बार-बार समझौते की आग में झोंकना ही पड़ता है। लगभग एक लाख सोम का बिल चुका मैं वहां से चलता बना । खाने का इतना बड़ा बिल चुकाकर हंसी आ रही थी। वहां एक भारतीय रुपया लगभग डेढ़ सौ उज़्बेकी सोम के बराबर था। वहाँ पैसे का भारतीय मुद्रा में हिसाब का मेरा फार्मूला था कि आप सोम में जितना भुगतान करें उसमें से दो शून्य पहले निकाल दीजिये । जैसे एक लाख सोम में से दो शून्य निकालने के बाद होंगे एक हजार फ़िर जो बचे उसमें से भी तीस प्रतिशत कम कर दीजिये । अब जो राशि हुई वह लगभग वह भारतीय रुपए के बराबर होगी । इस हिसाब से मैंने लगभग सात सौ रुपये खर्च किए थे । 


        वहां से अपार्टमेंट वापस आने के लिए अली शेर नवाई पार्क की बाहरी सड़क से आना होता था , जिसके बायीं तरफ़ पुरानी किताबों की दर्जनों दुकाने थीं । वहां अधिकांश किताबें उज़्बेकी और रूसी में ही थीं, पर आदतन किताबें देखकर रुक गया । सजी हुईं वे  किताबें किसी बर्फ़ीले  बियाबान में खिले फूलों जैसी लगीं, सुंदर पर समझी न जा सकने वाली । उस समय यह यक़ीन हो गया कि भाषा ज्ञान से अधिक संपर्क की चीज़ है । किसी अक्षर को समझना, उसकी धड़कन को छू लेने जैसा है। फ़िर वह अक्षर केवल भाषा नहीं, बल्कि मनुष्य, संस्कृति और स्मृति का भी प्रतीक बन जाता है। अक्षर का धड़कन होना यह बताता है कि भाषा वाक प्रतीकों या निर्जीव चिह्नों की शृंखला भर नहीं, बल्कि एक जीवित प्राणी की तरह है,जिसके भीतर संवेदनाएँ बहती हैं जो हमें अनकही निकटताओं से जोड़ देती है। ठंड बढ़ रही थी तो मैं ने भी आगे बढ़ना ठीक समझा । सेंट्रल पैलेस होटल से बायी तरफ़ मुड़कर मैं सीधे स्मार्ट सेंटर नामक दुकान में दाखिल हुआ । शेल्फ़ पर सजी बोतलों और पैकेटों के बीच मैं ऐसे घूम रहा था, जैसे किसी अनजान भाषा की किताब पढ़ रहा हूँ । सारी चीजें उज़्बेकी या रूसी में लिखी थीं। फ़िर भी  दूध, ब्रेड, कुछ फल और पानी का ज़ार लेने में मुझे कोई कठिनाई नहीं हुई । वैसे भी उज़्बेक संस्कृति में आत्मीय भाव से मिलना, सहायता के लिए तत्पर रहना जैसी बातें सहज थीं । अंततः मैं सारा सामान लेकर फ़्लैट पर वापस आ गया, बिना किसी परेशानी के फ़्लैट पर पहुंच कर लगा जैसे कोई बहुत बड़ी जंग जीत कर लौटा हूं।


            यात्रा की थकान तो थी लेकिन आंखों में नींद नहीं थी । बंद कांच की खिड़की से ‘ताशकंद सिटी’ की नीली ईमारत ऐसे जगमगा रही थी मानो बर्फ़ की इस विशाल निस्तब्धता में वह अकेली सांस ले रही हो । बर्फबारी बंद हो चुकी थी लेकिन उसके आगोश में सारा शहर था । किसी तरह का कहीं कोई शोर नहीं, बस बर्फ़ और पसरी हुई शांति चारों तरफ। उस मौन में फ्लैट के भीतर चुपचाप लेटे हुए मैं अपने भीतर की धड़कन सुन पा रहा था। शायद उसी धड़कन की लय पर, जाने कब, आँखें धीरे-धीरे बोझिल हुईं और नींद एक अनकहे सपने की तरह उतर आई। सुबह 6 बजे का अलार्म बजा तो नींद खुली । मैं उठकर खिड़की के पास गया और परदे को सरकाया। सामने का दृश्य देखकर मन जैसे ठिठक गया । पूरा शहर बर्फ़ से ढका हुआ था। पेड़-पौधे, सड़कें, छतें सब पर सफ़ेद चादर बिछी हुई। धूप अभी पूरी तरह निकली नहीं थी, लेकिन आसमान पर की हल्की गुलाबी और सुनहरी किरणें नीचे बर्फ़ को चमका रही थीं। कमरे के भीतर तो गर्माहट थी, लेकिन खिड़की खोलते ही ठंडी हवा का एक झोंका अंदर आया और चेहरे को छू गया। उस स्पर्श में ठंडक तो थी, मगर साथ ही एक ताजगी भी।  


          उस क्षण मुझे ख़्याल आया कि आख़िर ऐसे मौसम में कोई काम पर कैसे जाता होगा ? ये कोई काम पर जाने का मौसम है ?  फिर याद आया कि मुझे भी नौ बजे विश्वविद्यालय पहुंचना है जो कि मेरे अपार्टमेंट के करीब ही था, कोई एक या डेढ़ किलोमीटर की दूरी थी  । अतः मैं तैयार होकर साढ़े आठ तक अपार्टमेंट के नीचे आ गया। अपार्टमेंट के मुख्य गेट से बाहर निकलते ही बर्फ़ की ठंडी हवा चेहरे से टकरायी, ऐसा लगा कि यह शहर अपने मौन और श्वेत विस्तार से मेरा स्वागत कर रहा है।आज पहला दिन था ऊपर से बर्फ़, इसीलिए पैदल जाने की बजाय यनडेक्स से कैब बुला ली । यनडेक्स ताशकंद में वैसी ही सेवा है जैसी भारत में ओला या उबर की है । अभी तीन चार मिनट ही बीते थे कि एक सुंदर सी चमचमाती हुई काले रंग की कार मेरे पास आकर रुकी । मैंने कार का नंबर देख कंफर्म किया कि वो मेरे लिए ही आयी थी ।


                 मैंने आदतन आगे की ओर बायीं तरफ़ का दरवाज़ा खोला तो दंग रह गया। वह ड्राइवर सीट थी और उस पर सत्ताईस-अट्ठाईस साल की सुंदर सम्भ्रांत उज़्बेकी लड़की बैठी हुई थी। क्षणभर को लगा कि शायद मैंने किसी की निजी कार का दरवाज़ा खोल दिया है । लेकिन फ़िर ध्यान आ गया कि  उज्बेकिस्तान में  गाड़ियाँ दायीं ओर चलती हैं इसलिए यहाँ ड्राइवर की सीट बायीं तरफ होती है। हल्के से झेंपते हुए मैंने चुपचाप पीछे वाली सीट का दरवाज़ा खोला और बैठ गया। मुझे देखकर वह उज़्बेकी सुंदरी हल्के से मुस्कुराई। उसकी मुस्कान वैसी थी जैसे बर्फ़ से ढकी शाख़ों के बीच अचानक धूप का एक टुकड़ा उतर आया हो। उसकी कत्थई आँखें गहरी और चमकती हुईं । नाक नक्श एकदम तराशे हुए । उसके  गालों पर हल्की लाली थी, गोया  गुलाब की पंखुड़ियों ने  उसे अपना रंग उधार दे दिया हो। वह सुंदर युवती मुझे इस अजनबी देश की जीवंत प्रतीक सी लगी ।  संस्कृति और इतिहास की तरह सम्मोहक, और वर्तमान की तरह सहज। अतः इतिहास के ख़ून खराबे से सीख़ लेते हुए मैंने भी वर्तमान में सहज़ रहना ही ठीक समझा । 


          सोच ही नहीं सकता था कि ताशकंद में कैब ड्राइवर ऐसे भी हो सकते हैं । भारत में ओला-उबर वाले ड्राइवर प्रायः ‘भैया’ या ‘चचा’ ही मिलते हैं। और यहाँ ताशकंद में सुबह-सुबह ही बर्फ़ की सफ़ेदी के बीच एक परी जैसी ड्राइवर मिल गई। लगता है, ये शहर मुझे कुछ ज़्यादा ही पसंद आयेगा। जैसे ही कार चली, मैं सोच ही रहा था कि अब क्या बात करूँ? कुछ कहूँ या बस चुपचाप खिड़की से बाहर देखता रहूँ? लेकिन उसकी आँखों में वो चमक थी कि चुप्पी बोझिल हो जाती। इसके पहले मैं कुछ बोलता उसके ओंठो से शब्द फूट पड़े। उसने पूछा," हिंदुस्तान ?" मैंने कहा,"यस, हिंदुस्तान । फ़्रोम मुंबई।" मुंबई का नाम सुनते ही वो बच्चों की तरह चहक गई और बोली," शाहरुख खान, सलमान खान, अमिताभ बच्चन, प्रीती ज़िंटा!!" उसके मुस्कुराते हुए चेहरे पर वो खुशी, वो बचपना देख बहुत अच्छा लगा। लगा जैसे कि उसकी आँखों में बॉलीवुड की रंगीनियाँ चमक रही थीं, और होंठों पर कोई हिन्दी गीत बस सजने ही वाला हो। इतने में उसने "कुछ कुछ होता है" गाना बजाते हुए फ़िर पूछा," यू लाईक इट ?" मैंने कहा," यस, थैंक्स ।" ज़बाब में उसने रहमत कहा और गाड़ी धीरे धीरे बढ़ाती रही ।

      

        मकतब 110 के पास ट्रैफिक अधिक थी सो गाड़ी वहाँ देर तक रोकनी पड़ी । जीवन में पहली बार ट्रैफ़िक में गाड़ी रुकी रहने पर कोई खीझ नहीं बल्कि प्रसन्नता का अनुभव हो रहा था । जैसे ठहराव भी अपने भीतर कोई संगीत रखता हो। उस समय बाहर बर्फ़ की सफ़ेदी थी, भीतर संवाद की हल्की-सी गरमी। बाहर रुकावट थी, भीतर प्रवाह ।यह भी समझ आया कि सारे मौसम बाहर नहीं कुछ हमारे अंदर भी होते हैं । बातचीत के सिलसिले को आगे बढ़ाने के लिए मैंने पूछा,” डू यू नो हिन्दी ?” यह सवाल केवल भाषा के ज्ञान का नहीं, बल्कि एक पुल बनाने का था, मेरे भीतर और उसकी दुनिया के बीच। थोड़ा रुककर उसने ज़वाब दिया,” नो, उज़्बेक एंड रूसी । इंग्लिश लिटिल ।” इतना कहकर उसने फ़िर अपनी वही जादूई मुस्कान बिखेर दी। “ यू उज़्बेकी, रूसी ?” उसने मासूमियत से पूछा । “ नो, हिन्दी, इंग्लिश। उज़्बेकी लिटिल।” मैंने उसी की तरह ज़बाब दिया, और हम दोनों ही खिलखिला पड़े । 


        उस हँसी से जैसे दो अलग-अलग धुनें अचानक एक संगति में बदल गईं । हमारी खिलखिलाहट ने उज़्बेक, रूसी, हिन्दी और अंग्रेज़ी की दीवारों को पार कर दिया। दो अनजाने लोग, दो अलग दुनिया, दो अलग संस्कृतियाँ, केवल कुछ शब्दों और मुस्कान के माध्यम से एक दूसरे के अनुभवों के भीतर प्रवेश कर रहे थे। बाहर ट्रैफिक और बर्फ़ की ठंडक ने जैसे समय को ठहराकर हर चीज़ को स्थिर कर दिया था। सड़कें ठंडी, शहर सुन्न, और गाड़ियाँ स्थिर थीं। पर गाड़ी के भीतर, इस हँसी के कारण समय बह रहा था, धीमा, मधुर और सुखद प्रवाह की तरह । यह हँसी बाहरी स्थिरता और भीतर की गतिशीलता के बीच एक सेतु का काम कर रही थी। मैं चाहता था कि कुछ और बोलूं ,इतने में कार फ़िर चल पड़ी । 


      हम सरकारी संग्रहालय  के पास पहुंचे तो मैंने अनुमान लगा लिया कि हम यूनिवर्सिटी के पास ही हैं। गूगल लोकेशन से मैंने यह सरकारी संग्रहालय देखा था ।  अचानक कार नीले रंग की बील्डिंग के सामने रुक गई। हम ताशकंद स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ ओरिएंटल स्टडीज के गेट पर थे । मैंने सोचा काश ! यह रास्ता थोड़ा और लंबा होता… क्योंकि उसके साथ की बातें समय की तरह नहीं, किसी गाने की धुन की तरह लग रही थीं, जिसे कोई खत्म करना न चाहे। उसके साथ का हर क्षण धड़कन की एक लय में तब्दील हो चुका था । इतने में उसने फिर पूछा," टूरिस्ट?" मैंने कहा," नो, उस्ताद । हिन्दी टिल्ली/ भाषा उस्ताद ।" मेरे इतना बोलते ही उसकी आँखें बड़ी हो गईं। जैसे किसी बंद खिड़की पर अचानक उजाले का पर्दा खींच दिया जाए। अपनी आँखें नचाते हुए उसने कहा," ओह! उस्ताद, सुपर । सी यू अगेन। रहमत, नमस्ते ।" यह उसका पहला वाक्य था जिसमें एक से अधिक शब्द थे । 


        मन तो कर रहा था कि उसके साथ कुछ और बातें करूं, थोड़ा और समय बिताऊं लेकिन भाषा की समस्या थी और परदेश में पहले ही दिन कोई अनधिकृत पाठ्यक्रम पढ़ाना शुरू करना उस्ताद को सही नहीं लगा । फ़िर भी चलते चलते मैने कहा," थैंक यू । रहमत । योर गुड नेम ?" वो चिरपरिचित मुस्कान बिखेरते हुए बोली," नेम, माय नेम दिलरुह, बाय ।"  यह नाम मुझे उस रहस्य का प्रतीक सा लगा, जो इंसान को उसकी सीमाओं से परे ले जाकर किसी अनजानी रोशनी तक पहुँचा देता है। 


       " बाय दिलरुह, यू आर चिरोयली ।" मेरे यह कहते ही उसकी मुस्कान उसके कानों तक फैल गई। उसने एक ख़ास अदा से मेरी ओर देखा, जैसे कोई रहस्य अपनी आँखों से कह रही हो, शब्दों से नहीं। उसने कहा," हुम.. चिरोयली, थैंक यू उस्ताद, रहमत ।" और उसकी कार धीरे से आगे बढ़ गई। जैसे कोई सपना धीरे-धीरे आँखों से ओझल हो जाए, पर स्मृतियों के आकाश में हमेशा चमकता रहे। या फिर  किसी कविता की अंतिम पंक्ति ,जो पढ़ने के बाद भी समाप्त नहीं होती, बल्कि भीतर गूँजती रहती है। उसे हिन्दी नहीं आती थी और मुझे उज़्बेकी, सिवाय कुछ शब्दों के। थोड़ी अंग्रेजी, थोड़ी उज़्बेकी के साथ काम चल गया लेकिन उसके चेहरे पर खिली मुस्कान किसी भी भाषा से ज़्यादा स्पष्ट थी ।


        दिलरुह से  वह छोटी सी मुलाकात पहली और आख़िरी रही । मैं लगभग डेढ़ साल ताशकंद रहा पर वह दुबारा कभी नहीं मिली । लेकिन उसकी मुस्कान अब भी मेरे भीतर कहीं बर्फ़ की तरह जमी है । उसकी आँखों का झील-सा विस्तार हर बार स्मृति में लौट आता है । शायद जीवन की सबसे कीमती मुलाक़ातें अक्सर अधूरी होती हैं। जीवन की सबसे सुंदर अर्थात चिरोयली स्मृति के रूप में। 


डॉ. मनीष कुमार मिश्रा 

प्रभारी- हिन्दी विभाग 

के.एम.अग्रवाल महाविद्यालय 

कल्याण पश्चिम – 421301

महाराष्ट्र । 

manishmuntazir@gmail.com 


चिरोयली कहानी

 चिरोयली        मैं ताशकंद, उज़्बेकिस्तान में सन 2024 की फ़रवरी के पहले सप्ताह में पहुंचा था, ताशकंद स्टेट यूनिवर्सिटी के विजिटिंग प्रोफ़ेसर ...