साहित्यिक कृतियों पर आधारित हिन्दी फ़िल्में : परंपरा, विकास और सांस्कृतिक महत्त्व
भारतीय सिनेमा और साहित्य का संबंध अत्यंत घनिष्ठ रहा है। हिन्दी सिनेमा के विकास के साथ-साथ साहित्यकारों की कहानियों, उपन्यासों, नाटकों और संस्मरणों ने फ़िल्मों को सशक्त कथानक, गहन चरित्र और सामाजिक संवेदना प्रदान की।
साहित्य और सिनेमा का अंतर्संबंध :
साहित्य मानव जीवन के अनुभवों का शब्दबद्ध रूप है जबकि सिनेमा उनका दृश्य-श्रव्य रूपांतरण है।
प्रमुख साहित्यकार एवं कृतियाँ :
प्रेमचन्द (गोदान, गबन, शतरंज के खिलाड़ी, सद्गति), फणीश्वरनाथ रेणु (तीसरी कसम, पंचलैट), भीष्म साहनी (तमस), अमृता प्रीतम (पिंजर), विजयदान देथा (दुविधा/पहेली), मन्नू भंडारी (रजनीगंधा), राजेन्द्र यादव (सारा आकाश), मोहन राकेश (आषाढ़ का एक दिन, उसकी रोटी), उदय प्रकाश (मोहनदास), महाश्वेता देवी (हज़ार चौरासी की माँ), रवीन्द्रनाथ ठाकुर (काबुलीवाला, नौकाडूबी), बंकिमचन्द्र (आनंदमठ), शरतचन्द्र (देवदास, परिणीता, बिराज बहू), भगवतीचरण वर्मा (चित्रलेखा), गुलशन नंदा (काजल, नीलकमल, पत्थर के सनम, खिलौना, दाग, आराधना, अमर प्रेम, शर्मीली, झील के उस पार, प्रेम कहानी)।
विश्व साहित्य से प्रेरित फ़िल्में
Wuthering Heights से दिल दिया दर्द लिया, Tess of the d'Urbervilles से दुल्हन एक रात की, It Happened One Night से चोरी-चोरी, सुहाना सफर और दिल है कि मानता नहीं।
समानांतर सिनेमा
भूमिका, माया दर्पण, 27 डाउन, उसकी रोटी, आंधी, किनारा, मौसम, घर, कोशिश, लिबास, माचिस, पार, मोहनदास आदि।
उपसंहार
साहित्यिक कृतियों पर आधारित फ़िल्मों ने भारतीय समाज, संस्कृति और इतिहास को व्यापक दर्शकों तक पहुँचाया तथा साहित्य के प्रति नई पीढ़ी की रुचि बढ़ाई।
डॉ मनीष कुमार मिश्रा
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