Sunday, 14 March 2010

मैं भी चुप था,वो भी चुप थी ,

मैं भी चुप था,वो भी चुप थी  ,
फिर हो गई कैसे ,बात न जानू .
इधर लगन थी,उधर अगन थी,
लग गई कैसे आग ना जानू .

ना जाने कितने फूलों पर,
बन भवरा मैं ,मंडराया हूँ .
पर क्यों ना मिटी,
ये प्यास ना जानू . 

जिस मालिक के हम सब बच्चे,
है राम वही ,रहमान वही.
फिर आपस में खून -खराबा ,
क्यों हो बैठा मै ना जानू .

हिन्दू-मुस्लिम सिख इसाई ,
ये सब हैं भाई-भाई .
फिर झगड़ा मंदिर -मस्जिद का, 
कैसे हुआ ,ये मैं ना जानू .
 
  

बोध कथा-3: तेरा जलना ,मेरा सुलगना

बोध कथा-3: तेरा जलना ,मेरा  सुलगना 
 *****************************************
एक रात  जब शमा  जल रही थी ,तो अचानक उसका ध्यान पिघलते  हुए मोम पे गया.उस मोम  को देख एक मासूम सा सवाल शमा के मन में उठा.उसने  पिघलते हुए मोम से कहा-''हे सखे, मैं तो जल ही रही हूँ,ताकि अँधेरे को कुछ समय तक दूर रख सकूँ.जब सुबह होगी तो मेरा काम खत्म हो जायेगा.लेकिन तुम इसतरह पिघल क्यों रहे हो ?तुम क्यों पिघलना चाहते हो ?
 शमा क़ी बात सुन कर मोम कुछ पल खामोश रहा,फिर धीरे से बोला-''हे शुभे,हमारा साथ विधाता ने सुनिश्चित किया  है.लेकिन ये हमारी नियति है क़ी जब सारी दुनिया के लोग  प्रेम के आलिंगन में मस्त रहते हैं,तो उसी समय तुम अँधेरे से लड़ने के लिए स्वयम जलती रहती हो.ऐसे में मैं एकदम निसहाय बस तुम्हे जलता हुआ देखते रहता हूँ. हे प्रिये, तेरे  जलने पर मेरा पिघलना तो सहज है.तुझे इस बात पर आश्चर्य क्यों है ?''
                                            मोम क़ी बातें सुनकर शमा खामोश रही.लेकिन उसकी ख़ामोशी के शब्दों को मोम समझ रहा था.अचानक ही ये पंक्तियाँ मोम के मुख से फूट पडीं --
                         ''मेरा अर्पण और समर्पण, सब कुछ तेरे नाम प्रिये
                          श्वाश  -श्वाश तेरी अभिलषा ,तू जीवन क़ी प्राण प्रिये.
                          मन -मंदिर का ठाकुर तू है,जीवन भर का साथी तू है 
                         अपना सब-कुछ तुझे मानकर,तेरा दिवाना बना प्रिये .''
                          













(इस तस्वीर पर मेरा कोई कापी राइट नहीं है.ना ही किसी तरह का कोई अधिकार.इस तस्वीर को आप निम्नलिखित लिंक द्वारा प्राप्त कर सकते हैं.)
www.turbosquid.com/.../Index.cfm/ID/247458

Saturday, 13 March 2010

सिर्फ तर्क करे क्या हासिल हो ,

सिर्फ तर्क करे क्या हासिल हो ,
भावों में आत्मीयता शामिल हो ;
हितों के घर्षण से कब कौन बचा है ,
क्यूँ न अपनो का थोडा आकर्षण हो /
झूठे आडम्बर से क्या मिला है
थोड़ी मोहब्बत, थोडा त्याग,
थोड़ी जरूरत ,थोडा परमार्थ ,
क्यूँ न ये अपना जीवन दर्शन हो ,
सिर्फ तर्क करे क्या हासिल हो ,
भावों में आत्मीयता शामिल हो /

जो कहनी थी ,वही मैं बात,यारों भूल जाता हूँ .

जो कहनी थी ,वही मैं बात,यारों भूल जाता हूँ .
किसी क़ी झील सी आँखों में, जब भी डूब जाता हूँ .

नहीं मैं आसमाँ का हूँ,कोई तारा मगर सुन लो
किसी के प्यार के खातिर,मैं अक्सर टूट जाता हूँ . 

 शिकायत सब से है लेकिन,किसी से कह नहीं सकता 
 बहुत गुस्सा जो आता है,तो खुद से रूठ जाता हूँ . 

 किसी क़ी राह का कांटा,कभी मैं बन नहीं सकता 
 इसी कारण से मफिल में,अकेला छूट जाता हूँ .

 मासूम से सपनों क़ी मिट्टी,का घड़ा हूँ मैं,
 नफरत क़ी बातों से,हमेशा फूट जाता हूँ .

Friday, 12 March 2010

विचलित इच्छाएं है ,

विचलित इच्छाएं है ,
समर्पित वासनाएं हैं ;
मन थमता नहीं सिर्फ आशाओं पे ,
संभालती समस्याएँ हैं ;
जीवन में अब चाव नहीं है ,
तकलीफों से छावं नहीं है ,
अपने आंसूं पे रोना कैसा ,
दिल के जख्मो में रिसाव नहीं है /
===================

====================
मोह का बंधन लगता प्यारा ,
माया ने हम सबको पाला ,
कब तक अंगुली पकड़ चलेगा राही,
अब तो पकड़ ले परमार्थ की डाली /
======================

हास्य-व्यंग कवि -सुनील पाठक ''सांवरा''

हास्य-व्यंग कवि -सुनील पाठक ''सांवरा''
 ********************************
       आज-कल आप यह चेहरा अक्सर टी.वी.में देखते होंगे. हास्य-व्यंग कवि के रूप में सुनील आज किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं. टी.वी. के ग्रेट इंडियन लाफ्टर चैलेन्ज से सुनील ने अपनी कामयाबी क़ि जो इबारत लिखनी शुरू क़ि वो बदस्तुर जारी है.
            मैंने सुनील से एक दिन पूछा क़ि भाई आप तो इलाहाबाद के पाठक हो तो फिर,सांवरा नाम क्यों रखा ? इसका जवाब भी सुनील ने मजाकिया  अंदाज में दिया .उन्होंने कहा क़ि -''जब से इलाहबाद के आई.जी. पांडा अपने आप को राधा मानने लगे ,तब से मैं भी सांवरा (कृष्ण ) हो गया हूँ .

Thursday, 11 March 2010

द्वैत कहूँ अद्वैत कहूँ ,

द्वैत कहूँ अद्वैत कहूँ ,
द्वैत कहूँ अद्वैत कहूँ ,
या प्यार तुझे अनिकेत कहूँ ,
दिल में बसता धड़कन में रमता ,
मन का साथी आखों से रिसता ;
पुजित तू है संचित तू है ,
कितनो को आवांछित तू है ,
काम बड़े तो लांछित तू है ;
द्वैत कहूँ अद्वैत कहूँ ,
या प्यार तुझे अनिकेत कहूँ ,
भावों का सरताज रहा तू ;
सपनों का अधिराज रहा तू ;
दिल के धोखो को क्यूँ हम जोड़े ;
दर्दों का स्वराज रहा तू /
द्वैत कहूँ अद्वैत कहूँ ,
या प्यार तुझे अनिकेत कहूँ ,
खुशियों की राहें तकलीफों के पग ,
महके मन मंदिर दहके तन ,
सुंदर बातें पथरीले छन ;
कब पाए तुम कब खोये हम ;
द्वैत कहूँ अद्वैत कहूँ ,
या प्यार तुझे अनिकेत कहूँ ,

बोध कथा -२: अपना ही कोई गद्दार हुआ है

बोध कथा -२: अपना ही कोई गद्दार हुआ है
 ************************************************
        एक गाँव में बड़ा ही प्राचीन बरगद का पेड़ था. उसकी शाखाएं  चारों  तरफ फैली हुई थी.आने -जाने वाले राहगीरों को इस बड़े छायादार पेड़ के नीचे बड़ा आराम मिलता. गाँव के लोग भी बरगद के पेड़ क़ी पूजा करते.उस बरगद क़ी जड़ें बड़ी गहराई तक जमीन में गयीं थी. पेड़ का पूरा वैभव किसी का भी ध्यान अपनी तरफ आकर्षित कर लेता था.
        उस बरगद क़ी सभी शाखाएं,तने ,पत्तियाँ और जड़ें अपना काम बराबर करते थे.उन सब में बड़ी एकता थी.एक दिन अचानक पेड़ के एकदम ऊपरी हिस्से क़ी फुनगी ने देखा क़ि एक लकडहारा पेड़ क़ि दिशा में बढ़ा चला आ रहा है. उस फुनगी ने तने को आवाज देते हुए कहा,''दादा,एक लकडहारा हमारी तरफ तेजी से चला आ रहा है.'' तने ने आने वाले खतरे का आभास कर पूछा ,''क्या उसके हाँथ में कोई काटने वाली चीज़ है ?'' तने की बात सुन कर फुनगी ने लकडहारे की तरफ ध्यान से देखा . उसे लकडहारे के हाथ की कुल्हाड़ी नजर आ गई.उसने तुरंत जवाब दिया ,''हाँ दादा,उसके हाँथ में कुल्हाड़ी है.लोहे की है .''
                              तने ने लम्बी सांस छोड़ते हुए कहा ,'' हे भगवान्. हमे अपनों ने ही धोखा दिया,वरना किसी की क्या मजाल थी की हमपर आँख उठा कर भी देख पाता. अब हमे कोई नहीं बचा पाए गा .'' तने की बात फुनगी को समझ में नहीं आयी.उसने तने से प्रश्न करते हुए कहा,''दादा, में आप की बात समझा नहीं. हमे तो लोहे की कुल्हाड़ी कटेगी ,फिर कोई अपना इसका जवाबदार कैसे हुआ ?'' तने ने फुनगी की बात पर जवाब देते हुए कहा,''ध्यान से देखो ,उस लोहे की कुल्हाड़ी में बेंत लकड़ी का ही लगा होगा.अगर वह लकड़ी का बेंत उस लोहे का साथ ना दे,तो वह लोहा हमारा कुछ भी बिगाड़ नहीं सकता.'' इतना कह कर तना चुप हो गया.थोड़ी देर बाद उसके मुह से सिर्फ ये शब्द निकले -
                   ''जब भी हम पर वार हुआ है,
                    अपना ही कोई गद्दार हुआ है ''

Wednesday, 10 March 2010

इस तरह दूर रहकर-----------

इस तरह दूर रहकर  तुमसे,
खुद से ही दूर हो  रहा  हूँ  .
कोई मजबूरी नहीं है फिर भी,
मैं बड़ा मजबूर हो रहा हूँ .

कोई कहता है पागल तो,
कोई समझता दीवाना है . 
जुडकर सब से भी मैं,
अब बेगाना हो रहा हूँ . 

राह का पत्थर हूँ मैं,
मुसीबत बन गया हूँ सब की.
सब के रास्ते से मैं बस,
मुसलसल किनारे हो रहा हूँ. 

अब कोई सपना कंहा है ?
 मुझे नींद कब आई है ?
 जागती आँखों से अब मैं,
 नींद का रिश्ता खोज रहा हूँ .
 

मैं तो टूटा उतना ही,जितने तोडा गया मुझे

  मैं तो टूटा उतना ही,
  जितना तोडा गया मुझे.
  लेकिन मेरे सपनों का, 
  टूटना लगभग नामुमकिन है .


जितना जादा सज्जन था,
उतने ही दुर्जन मिले मुझे.
लेकिन मुझको बदल पाना ,
उनके लिए ना संभव था .

सच्चाई क़ी राह पे मैं,
यद्यपि बिलकुल तनहा रहा .
लेकिन किसी का कोई डर,
मन में मेरे रहा ना अंदर . 

 अपनी शर्तों पर जीना,
 रहा मेरा जीवन नियम .
 चका-चौंध इस  दुनिया क़ी, 
भरमा ना पाई मुझे कभी .
 

बोध कथा-1 : गुजरे मगर जिस राह से हम

बोध कथा-1 : गुजरे मगर जिस राह से हम
 **************************************
                                   किसी गाँव में सज्जन कुमार नामक एक संत स्वाभाव का व्यक्ति रहता था.उसकी दिनचर्या में एक ख़ास बात यह थी क़ि वह सुबह -शाम समुद्र के किनारे जा कर,वंहा किनारे पर छटपटाती मछलियों को वापस समुद्र में ड़ाल देता था. सज्जन कुमार क़ी इस आदत का कई लोग मजाक भी उड़ाते थे. घर पे भी कई बार उन्हें ताने सुनने पड़ते थे. लेकिन सज्जन कुमार ने कभी भी किसी क़ी परवाह नहीं क़ी.वह सुबह उठकर भगवान् को प्रणाम करते,और समुद्र क़ी तरफ निकल पड़ते.वंहा से वापस आ कर अपने खेतों पे काम करने चले जाते.शाम को खेतों पर से वापस आने के बाद,हल्का जलपान करते और फिर मछलियों क़ी मदद के लिए समुद्र के किनारे क़ी तरफ निकल पड़ते.वंहा से वापस आ कर भगवान को संध्या वंदन कर ,भोजन करने के बाद सो जाते.
                          एक दिन नित्य क़ी तरह सुबह-सुबह जब वे समुद्र के किनारे तड़प रही मछलियों को वापस समुद्र में ड़ाल रहे थे,तो वंहा एक साधू आये.वे काफी देर तक सज्जन कुमार के कार्य को चुप-चाप देखते रहे.फिर वे सज्जन कुमार के पास आ कर बोले ,''हे बालक ,यह तुम क्या कर रहे हो ?'' इस प्रश्न से सज्जन कुमार क़ी एकाग्रता भंग हुई .अपने पास एक साधू को खड़ा देख सज्जन कुमार ने पहले  उन्हें प्रणाम किया फिर विनम्रता पूर्वक बोले ,''हे महात्मा,समुद्र क़ी तेज  लहरों के साथ कई मछलियाँ किनारे आ जाती हैं और जल विहीन होकर तड़पने लगती हैं.उनका जीवन संकट में आ जाता है. मैं अपनी यथा शक्ति उन मछलियों को वापस समुद्र क़ी धारा में प्रवाहित कर उन्हें जीवन दान देता हूँ.''
                       सज्जन कुमार क़ी बाते सुन साधू प्रश्न हुए और उन्होंने कहा,'' यह तो बड़ा ही अच्छा काम है.लेकिन समुद्र के किनारे तो ऐसी लाखों मछलियाँ हैं.तुम कितनों को बचा सकोगे ?'' साधू क़ी बात का जवाब देते हुए सज्जन कुमार ने कहा,''हे महात्मा ,मैं सभी मछलियों को तो नहीं बचा सकता लेकिन जितनों को बचा सकता हूँ ,उनके लिए मैं रोज ही यह काम करता हूँ .'' यह बात सुन साधू अति प्रसन्न हुए. उन्होंने सज्जन कुमार को आशीर्वाद देते हुए कहा ,''हे सज्जन,तुम धन्य हो.तुम्हारी इच्छाशक्ति धन्य है.हम सभी को अपनी यथाशक्ति कार्य करना चाहिए.कार्य के स्वरूप या परिणाम क़ी चिंता हमे कमजोर बना देती है. सुखी रहो .''
                       इस तरह साधू महाराज वंहा से चले गए और सज्जन कुमार फिर से अपने काम में लग गए.काम करते हुए अनायास ही सज्जन कुमार के मुख से ये पंक्तियाँ निकल पड़ीं --
                      '' माना क़ी ना कर सके , गुलजार हम इस चमन को 
                          मगर जिस राह से गुजरे ,खारे तो कम हुए .''     


१-    खारे-कांटे
            

Tuesday, 9 March 2010

खुबसूरत इरादों से शिकायत क्यूँ है ,

खुबसूरत इरादों से शिकायत क्यूँ है ,
हसीन प्यार के लम्हों से अदावत क्यूँ है ;
गले ना लगे तुम तो कोई बात नहीं ,
मेरी मोहब्बत से तुझको बगावत क्यूँ है ?


तेरी जफा की राहों से कब मैंने सवाल पूंछे ,
तेरे पीछे चलते सायों पे कब मैंने जवाब पूंछे ।
तू निभा न सकी कसमे कोई बात नहीं ,
पूरे हुए वादों से तू आहत क्यूँ है ,

मेरे सपनों से तुझे अदावत क्यूँ है ,
मेरी वफ़ा की राहों से शिकायत क्यूँ है ;
नहीं रक्खा मुझे अपनी यादों में कोई बात नहीं ;
मुझे हँसता देख तेरे चेहरे पे राहत क्यूँ है /

Monday, 8 March 2010

क़त्ल न कर मुझे जरा जी लेने दे ,

क़त्ल न कर मुझे जरा जी लेने दे ,
दिल के जख्मों को जरा सी लेने दे ;
तेरे चेहरे की घटाओं को छू लेने दे ,
तेरी आखों के कतरों को पी लेने दे ;
क़त्ल न कर मुझे जरा जी लेने दे ,
इतनी बेरुखी भी क्या मेरे दिलबर ,
तेरे लबों को जी भर के पी लेने दे ,
दुआ देगा मेरे दिल का हर टुकड़ा तेरी जफ़ाओं को ,
तेरी अदाओं पे मुझे मर लेने दे;
क़त्ल न कर मुझे जरा जी लेने दे ,
तेरी बेवफाई का लुत्फ़ जरा ले लूँ कुछ पल ,
तेरी बिखरी हंसी को जरा सी लेने दे ,
यादों को कुछ पल जी लेने दे ,
कातिल तेरी तकलीफों को पी लेने दे ,
आ तू अपने अरमान हसीन कर ले ,
मेरी चाहों को अतीत कर ले ,
जान निकालना जरा धीमे धीमे ,
तू अपने सपनों को रंगीन कर ले /

आज विश्व महिला दिवस पर

आज विश्व  महिला दिवस पर भारत सरकार भारतीय महिलाओं को एक उपहार देना चाहती थी.वह उपहार था-३३% आरक्षण का. लेकिन राज्यसभा में यह काम हो नहीं पाया. कई लोग इस बिल के विरोध में खड़े हो गए.संसद क़ी गरिमा को भी शर्मशार किया गया.लेकिन प्रश्न यह उठता है क़ि यह विरोध कुछ संदर्भों में सही तो नहीं है ?
                      इस देश में आरक्षण की राजनीति  शुरू ही हुई है ''वोट बैंक पालिसी '' के नाम पर. जो लोग औरतों के सशक्ति करण के नाम पर आरक्षण की बात कर रहे हैं,उनसे मैं यह पूछना चाहूँगा क़ि अपनी-अपनी पार्टी का टिकट बाटते वक्त वे क्यों महिलाओं को भूल जाते हैं. उस समय तो बस बाहुबली और पूंजीपति ही नजर आते हैं.साथ ही साथ संगठन में भी क्यों नहीं महत्वपूर्ण जगहों पर महिलाओं को नहीं रखा जाता. खाली ''रबर स्टंप' या ''सम्मान पूर्ण पद'' के ही योग्य महिलाओं को सीमित क्यों किया जा रहा है.एक और बात क़ि आखिर यह आरक्षण क़ी बैसाखी क्यों ? और अगर दी भी जा रही है तो आदिवाशी और पिछड़े वर्ग क़ी महिलाओं को तो इस आरक्षण में भी आरक्षण मिलना ही चाहिए.
                    मैं इस देश क़ी तमाम माताओं ,बहनों से हाथ जोडकर यही निवेदन करना चाहता हूँ क़ि ३३ नहीं ५० % संसद क़ि सीटों पर आपका ही अधिकार है,यह अधिकार आप को मिलना भी चाहिए.लेकिन आजादी के इतने सालों बाद भी यदि अभी तक यह संभव नहीं हो पाया है तो कही ना कही इसके लिए आप लोग भी जिम्मेदार हैं.एक औरत होकर एक औरत के लिए अभी तक आपने क्या किया ? क्या सचमुच आप कुछ कर सकती हैं ?क्या आपको कुछ करने दिया जाएगा ?इस देश क़ी मध्यम वर्गीय महिलाएं आज भी इतनी संकुचित क्यों हैं ? पढ़ी-लिखी होने के बावजूद अपने निर्णय अपने तरीके से क्यों नहीं ले पा रही हैं ? अपने ही कमाए पैसे को अपनी इच्छा से खर्च क्यों नहीं कर पा रही हैं ? सारे अधिकारों से परिचित होने के बावजूद भी इस तरह घुट-घुट कर जीने को क्यों अपना प्रारब्ध मान बैठी हैं ?और अगर यही हालत रही तो ,यह आरक्षण मिल भी गया तो क्या लाभ होगा ? पहले आप लोगों को पर्दे में रखा जाता था ,अब तैयारी है क़ि आप को आगे कर परदे के पीछे से शासन चलाया जाए.क्या यह और भयानक स्थिति नहीं होगी ?
          इन सभी षड्यंत्रों को समझना भी जरूरी है. आशा है आप लोग कुछ तो समझ ही रही होंगी.इस देश की सभी महिलाओं को यह ''सम्मान दिवस ''मुबारक हो.

Sunday, 7 March 2010

दो दिन का राष्ट्रीय सेमिनार :नई कविता पर

दो दिन का राष्ट्रीय सेमिनार :नई कविता पर ************** 
 *****************************************
                             मुंबई के यस.आई.ई.यस. महाविद्यालय सायन में  आगामी १० और ११ मार्च २०१० को हिंदी विभाग क़ी तरफ से दो दिन का राष्ट्रीय सेमिनार आयोजित किया जा रहा है. नई सदी के पहले दशक क़ी कविताओं पे पूरा सेमिनार केन्द्रित रहेगा.इस सेमिनार में देश-विदेश के कई जाने -माने विद्वान सहभागी हो रहे हैं. 
                          यदि आप भी इस सेमिनार में सहभागी होना चाहते हैं तो महाविद्यालय के हिंदी विभाग प्रमुख डॉ.संजीव दुबे से संपर्क कर सकते हैं.सम्पर्क के लिए फ़ोन नंबर और महाविद्यालय का पता इस प्रकार है  
                डॉ.संजीव दुबे -९३२०५२७९११,९८६९८४७३६६ 
 
SIES College of Arts, Science & Commerce
Jain Society, Sion (West),
Mumbai - 400 022. (India).
Telephone: 2407 27 29 (Office)
Fax: 2409 6633
Email: siesascs@siesascs.net
Website: www.siesascs.नेट  
 यदि  आप महाविद्यालय तक जाने के लिए नक्शा चाहते हैं तो आप गूगल मैप क़ी सहायता ले सकते हैं.
 गूगल मैप के लिए इस लिंकhttp://maps.google.com/maps?client=gmail&ie=UTF8&q=s.i.e.s.+college,mumbai&fb=1&hq=s.i.e.s.+college&hnear=,mumbai&cid=0,0,7572555737468622329&ei=WVeTS-LwIc_GrAe--cy4Cw&ved=0CAcQnwIwAA&ll=19.030842,73.017969&spn=0.007688,0.01929&t=h&z=१६ पे क्लिक कर सही रास्ता भी जान सकते हैं.
 
 

पर दिल में ना रह पाए .

जो कहना था पहले ,
वो अब तक ना कह पाए .
संग-संग रहते थे घर में,
पर दिल में ना रह पाए .  

 सात जन्म का वादा करके,
 सात कदम ना चल पाए .
प्यार बना समझौता कैसे ?
ये बात  समझ ना पाए.

साथ सफ़र में दोनों थे पर , 
साथी ना बन पाए .
अंदर ही अंदर घुट कर,
दो-चार कदम चल पाए. 

जिसके बिन जीना मुश्किल था,
साथ उसी के ना जी पाए .
इश्क क़ी राह पे चल  के भी, 
हम इश्क समझ ना पाए . 
                        
                     जो कहना था ----------------------------
 (इस गीत क़ी पहली कड़ी भाई सुनील सावरा ने डी थी. वो इसे पूरा करना चाहते थे. मैंने अपनी तरफ से एक कोसिस क़ी है.शायद उन्हें पसंद आये.)

कोई मेरी है दीवानी.

वही प्यार क़ी  कहानी ,
 हमे भी है दुहरानी .
 मैं दीवाना किसी का,
 कोई मेरी है दीवानी.
                  वही प्यार क़ी ---------------------------

थोड़ी जानी-पहचानी ,
थोड़ी सी है अनजानी .
रब ने मिलाया है तो ,
जोड़ी हमको है बनानी . 
               वही प्यार क़ी --------------------------------- 

ना मैं कोई राजा,नाही  वो है कोई  रानी ,
लगती थोड़ी भोली,थोड़ी सी है वो सयानी .
जिन्दगी के इस सफ़र में,
 हमसफ़र है वो दीवानी .
              वही प्यार क़ी -----------------------------------

यादों के फूलों में चेहरा तेरा , 2

यादों के फूलों में चेहरा तेरा ,
गुलाबी गालों की रंगत ,
आखों में सपना मेरा ;
निगाहों में रंगीनियों के डेरे ,
अभिलाषा रंगीन है मेरी ,
आशाओं के महीन से फेरे ,
फागुनी अंदाज में डूबे,
इरादे संगीन है मेरे ,
मोहब्बत और प्यास के सूबे ,
आ नए प्यार सा खेले,
समर्पण चाह के घेरे ,
इच्छाएं हसीन है मेरी,
वो पहली मुलाकात के डेरे ,
वो पहली रात की बातें,
उलझे बाल के फेरे ,
वो प्यास में डूबे ,
विश्वास के घेरे ;
यादों के फूलों में चेहरा तेरा ,

Friday, 5 March 2010

जितनी शरारत है,नजाकत भी है उतनी ही

उलझी हुई थोड़ी ,
थोड़ी सी सुलझी है.
वो लड़की जो ,मेरे दिल को ,चुरा के ले गयी यारों  
पगली सी है थोड़ी,
थोड़ी सयानी है .
 

तितली सी है चंचल
फूलों सी कोमल है .
वो बोलती है जब,तो मुझको यूं लगता है
मन क़ी मेरी बगिया में
 कोयल कूक भरती है .









                                                                               ख़ामोशी में उसके
                                                                                बादल उमड़ते हैं.
                                                                                जितनी शरारत है,नजाकत भी है उतनी ही
                                                                                बड़ी तो खूब है लेकिन,
                                                                                वो गुडिया छोटी लगती है .

                                                                अदाएं चाँद क़ी सारी ,
                                                                लेकर निकलती है .
                                                                साँसों में बसा चंदन,खजाना रूप का लेकर
                                                               वो राहें भी महकती हैं,
                                                               जंहा से वो गुजरती है .



                                                              राधा सी लगती है,
                                                              कभी सीता सी लगती है .
                                                              जिसका प्यार मैं चाहूँ, सारी जिन्दगी भर को
                                                             वही प्रियतम वो लगती है
                                                             वही साथी वो लगती  है .

Wednesday, 3 March 2010

fir kisi mod per

फिर किसी      

रामदरश मिश्र

राम दरश मिश्र तो वैसे किसी परिचय के मोहताज नहीं है । फिर भी मै उनका परिचय देना चाहूँगी । मिश्र जी प्रेमचंदोत्तर युग के बहुमुखी प्रतिभा संपन्न कलाकार है ।
वे श्रमशक्ति के प्रतिक है । उनकी रचनाए आसाधरण पुरुषार्थ के मनोबल एवम अनुशासित कार्य प्रणाली का परिणाम है । एक मान्यता प्राप्त कवि होने के साथ - साथ एक बहुत अच्छे लेखक भी है ।
उनकी कहानिया और उपन्यास मै इतनी सचाई है कि उसे पढ़नेके बाद किसी भी इंशान का हिर्दय द्रवित हो जाय। उनका उपन्यास पानी के प्राचीर , जल टूटता हुआ और उनके कई उपन्यास है जिसे पढ़ने पर व्यक्ति मजबुर हो जाय सोचने पर कि हमारी गाँव की क्या हालत है। गाँव मे सुधार करने बहुत ही जरुरत है। मिश्र जी ने इतनी गंभीर समस्याओ को पाठको के समक्ष रखा है की शायद ही किसी का ध्यान उन समस्याओं पर जाय ।

Tuesday, 2 March 2010

यादों के फूलों में चेहरा तेरा ,

यादों के फूलों में चेहरा तेरा ,

याद अब भी है तेरी धड़कन औ हसना तेरा ;

गुलाबी गालों की रंगत आखों में सपना सजा ,

पलकें आशा से खिली बातों में मोहब्बत घुली ,

महकते ख्वाबों की लचकन सुहानी रातों की धड़कन ;

वो अहसासों की तरन्नुम वो उमंगों की सरगम ,

नयनो की शिकायत आभासों के रेले ,

वो अरमानो की दुनिया सपनों के मेले ,

वो बंधन की राहें स्वच्छंदता के खेले ,

वो साँसों खुसबू ,बेखुदी में तुझे छुं ले ;

यादों के फूलों में चेहरा तेरा ,

तू ही बता तुझे यार हम कैसे भूले ?

Sunday, 28 February 2010

आशा भरी पिचकारी थामे ,घुमू तेरे द्वार प्रिये ,

छुं लूँ मन के भाव तेरे ,रंगू रक्तिम गाल तेरे ,
आशा भरी पिचकारी थामे ,घुमू तेरे द्वार प्रिये ,
फागुन के मौसम में मन कब थमता है ,
जीवन तेरी अभिलाषा में रमता है ;
डालूँगा रंग कपड़ों पे तेरे ,
शायद दिल तेरा रंग जाय प्रिये ,
आशा भरी पिचकारी थामे ,घुमू तेरे द्वार प्रिये ,
चंचल मन है ,बहकी चितवन है ,
उसपे होली का त्यौहार प्रिये ,
मन को भावों से रंगुंगा ,तन को अहसासों से रंगुंगा ,
लाल ,हरा, पीला, नीला कितना प्यारा प्यार प्रिये ,
आशा भरी पिचकारी थामे ,घुमू तेरे द्वार प्रिये ,

Saturday, 27 February 2010

फिर किसी मोड़ पर -विजय भाई पंडित क़ी तीसरी पुस्तक है

फिर किसी मोड़ पर -विजय भाई पंडित क़ी तीसरी पुस्तक है ,जिसका लोकार्पण २ मार्च को कल्याण में होगा.आप लोगो के लिए किताब का कवर पजे दे रहा हूँ. बताइए आप को यह कैसा लगा ?

Thursday, 25 February 2010

जितने सालों से तुमने,/abhilasha

मन क़ी वीणा के तारों को,
टूटे उतने ही साल हुए हैं . 
जितने सालों से तुमने,
ना क़ी कोई भी बात प्रिये .

इन सालों को उम्र में मेरी ,
शामिल बिलकुल मत करना .
इनका तो मेरे दिल से,
नहीं कोई सम्बन्ध प्रिये.  
                                    -----अभिलाषा

वो जब पास होती है,

वो जब पास होती है,
धडकन तेज होती है.
लब खामोश होते हैं,
आँखों से सारी बात होती है ..

वो सबसे मिलती है ,
हंस  कर बातें करती है.
पर आकर मेरे पास,
जाने क्यों  घबराई  होती है.

 
  

होली का त्यौहार है.

रंगों का सावन ,
प्यार क़ी फुहार है.
गले लग जाओ यारों,
होली का त्यौहार है .
 
 टोली में निकलो ,
 सब  संग खेलो . 
 बुरा मत मानों यारों,
 होली का त्यौहार है .
 
                                               
  कजरी भी गाओ,          
 फगुआ भी गाओ.
 झूमो,नाचो,गाओ यारों,
 होली का त्यौहार है.  
 
चोली भिगाओ,
चुनरी भिगाओ.
भर लो बाँहों में यार याँरो,
होली का त्यौहार है. 
  
 (इस  कविता के साथ  लगे  फोटो पर मेरा कोई  अधिकार नहीं है. यह मुझे मेल के रूप में मिला है.इसका लिंक egreetings.india.gov.in.page-archive.org/user. है. )
 

Wednesday, 24 February 2010

रीति काल पर दो दिन का राष्ट्रीय सेमिनार :डॉ.शशि मिश्रा

रीति काल पर दो दिन का राष्ट्रीय सेमिनार 
      आप को जान कर ख़ुशी होगी कि मुंबई के महर्षि दयानंद महाविद्यालय ,परेल में आगामी ०३ और ०४ मार्च २०१० को महाविद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा दो दिनों का राष्ट्रीय सेमिनार आयोजित किया जा रहा है. यु.ज़ी.सी. द्वारा प्रायोजित इस सेमिनार में देश के कई जाने-माने विद्वान सहभागी हो रहे हैं.  
          आप यदि इस सेमिनार में सहभागी होना चाहते हैं तो आप का स्वागत है. आप अधिक जानकारी के लिए महाविद्यालय क़ी हिंदी विभाग प्रमुख श्रीमती डॉ.शशि मिश्रा जी से उनके मोबाइल  -०९८३३६२१९३८ पे सम्पर्क कर सकते हैं.महाविद्यालय तक पहुँचने के लिए  ttp://maps.google.com/maps?f=d&source=sh_d&saddr=महार्ष  इस गूगल मैप लिंक का सहारा लिया जा सकता है .महाविद्यालय का पता निम्नलिखित है-
Maharshi Dayanand College,Parel, Dr SS Rao Rd, Parel, Mumbai, Maharashtra, India

                                          आपका सेमिनार में स्वागत है ***
                                                                                                          डॉ.शशि मिश्रा

  
                                      

प्यार के रंग में गोरी भीगी.



होली जब भी आती है 
नई सौगात लाती है .
उसे बाँहों में भरने का,
वही एहसास लाती है.

ले के प्यार का गुलाल,
मन में थोड़े से सवाल . 
वो आ के मेरे पास,
मुझको छेड़ जाती है . 

नजर सब क़ी बचाती है 
नजर मुझसे मिलाती है .
इशारों ही इशारों में,
हँसी पैगाम देती है .  

हमजोली क़ी टोली आती .
साथ में नखरे वाली आती .
छू के मेरे गालों को, 
वो हलके से शरमाती है . 

चोली भी भीगी ,चुनरी भी भीगी 
प्यार के रंग में गोरी भीगी.
देख के उसका ऐसा रूप,
मुझको बेचैनी होती है .  
                                           ( इस पोस्ट के साथ लगे सभी  फोटो मुझे मेल के रूप में मिले हैं,इनपे  मेरा कोई अधिकार नहीं है.)



                         होली जब भी -----------------------------------------      

Tuesday, 23 February 2010

सच्चाई का जीना हितकर ,अच्छाई का जीना पुण्य है /

अनुदान की बेला जब आई , आख्यान हमेशा काम आई ;

दान की नीयत बन आई ,जब सम्मान की सूरत दिख पाई;

बिना किये जो मिल जाये ,वो सबको सुख कर होती है

है दौर दिखावे का ये लेकिन , अच्छाई कब खुद को खोती है ;

बंदिश से हो हासिल क्या , स्वतंत्रता से हो गाफिल क्या ?

बिना कर्म कब शांति मिली है ,वासनाओं से कब क्रांति मिली है /

देने से सुख कर कब क्या है ,लेने से दुःख कर कब क्या है ;

बंद हथेली लाख की अब भी ,खुली हथेली ख़ाक की है ;

बिना स्वार्थ के दान पुण्य है ,अपनो का मान पुण्य है /

सच्चाई का जीना हितकर ,अच्छाई का काम पुण्य है /

फिर किसी मोड़े पर :लोकार्पण समारोह

फिर किसी मोड़े पर :लोकार्पण समारोह ****************
आगामी २ मार्च २०१० को कल्याण पश्चिम के बैलबजार स्थित गुरु हिम्मत गुरुद्वारे के प्रांगण में शाम ८.०० बजे भाई विजय नारायण पंडित के ग़ज़ल संग्रह ''फिर किसी मोड़ पर '' का भव्य लोकार्पण समारोह आयोजित किया गया है.इस समारोह क़ी रूप-रेखा इस प्रकार है ---
 लोकार्पण कर्ता-श्री गोविन्द  राठोड जी 
               (आयुक्त क.डो.म.पा.)
                                         अध्यक्ष -डॉ.नरेश चन्द्र जी  
                                                  (प्राचार्य,बिरला कॉलेज ,कल्याण)
                                        स्वागताध्यक्ष -श्री.नन्द कुमार सोनावने जी 
                                                (अध्यक्ष एल.डी.सोनावने कॉलेज ,)
                                       प्रास्ताविकी-श्री .अलोक भट्टाचार्य जी  
                                         (प्रख्यात साहित्यकार )
                                        मुख्य अतिथि-श्री.प्रेम शुक्ल जी 
                                           (कार्यकारी संपादक,दोपहर का सामना )
                                       आशीर्वचन -डॉ.सतीश पाण्डेय जी 
                                                        (अध्यक्ष हिंदी अध्ययन मंडल )
                                                         डॉ.सुनील शर्मा जी 
                                                      (उप प्राचार्य -मॉडल कॉलेज )
                                                          डॉ.राजू वारसी जी    
                      आप सब इस समारोह में सादर  आमंत्रित हैं. इसी दिन भाई विजय पंडित जी का जन्म दिन भी है.           

वो आ जाये तो बेचैनी ,

  वो आ जाये तो बेचैनी                                                    
चली जाये तो बेचैनी 
 हालत पे अपने  ,
 होती  है हैरानी   .  
         
                                                                       
              
                      वो चाँद सी सुंदर ,
                      हिरनी सी है चंचल.
                      एक रोज उसको तो,
                      मेरी ही है होनी . 

                                                               वो फूल सी कोमल ,
                                                                गंगा सी है निर्मल .
                                                              आएगी वो एक रोज  देखो,
                                                              बन  मेरी सजनी .
     
                       

विजय नारायण पंडित क़ी नई पुस्तक ''फिर किसी मोड़ पर

Monday, 22 February 2010

कोई ख्वाबों में आता है

कोई ख्वाबों में आता है   
कोई नीदें चुराता है . 
चुरा के चैन वो मेरा, 
मुझे बेचैन करता है . 

 वहां पे वो अकेली है  
यहाँ पे मैं अकेला हूँ . 
उसे मुझसे मोहब्बत   है,
मुझे उससे मोहब्बत  है . 
  
खामोश रहती है, 
कभी वो कुछ नहीं कहती . 
यहाँ पे मैं तड़पता हूँ,
 वहां पे वो तड़पती है .

बादल जब बरसते हैं,
हम कितना तरसते  हैं ?
यहाँ पे मैं मचलता हूँ, 
वहां पे वो मचलती है . 

 सर्दी क़ी रातों में,
 अकेले ही कम्बल में .
 यहाँ पे मैं सिकुड़ता हूँ,
 वहां पे वो सिकुड़ती है .
               कोई ख्वाबों में ---------------------------------------     

Saturday, 20 February 2010

एक वादा जो निभाने की कोशिस की --------------------

एक वादा जो निभाने की कोशिस की --------------------

अपनी दूसरी पुस्तक ''मन के सांचे की मिट्टी को पिछले साल आप लोंगो को सौपते हुए ,मैंने ये वादा किया था की जल्द ही अपनी गजलों की पुस्तक आप लोगों के सामने लाऊंगा .यह काम मेरे लिए मुश्किल था क्योंकि मुक्त कविताओं की तरह यंहा स्वतंत्रता नहीं थी .रदीफ़ और काफिये का ध्यान रखना था। मैंने अपनी तरफ से इस बात का पूरा ख्याल रखा किमैं ग़ज़ल क़ी कसौटी पे अपनी रचनाओं को सही तरह से रख सकूं.इसमें मैं कहाँ तक सफल हो सका ये तो अब आप लोग ही बता सकते है।
इस काम को करने में पूरे एक साल का वक्त लगा.इन गजलों को लिखने में बड़ा मजा भी आया.कभी-कभी तो ग़ज़ल के एक शेर के आगे दूसरा लिख भी नहीं सका.मशीनों क़ी तरह ग़ज़ल लिखना मेरे बस क़ी बात भी नहीं थी । आज हम जिस समाज में रह रहे हैं,वहां संवेदनाएं कितनी कमजोर पड़ रही हैं ये हम सब देख ही रहे हैं.इन सब के बीच दुःख और बेचैनी से निकलने के लिए कलम उठा लेता था। जो भी समझ सका उसे ग़ज़ल क़ी शक्ल में आप के सामने ला कर अभिव्यक्ति के खतरे उठा रहा हूँ।

किसी ने जिन्दगी क़ि परिभाषा देते हुए लिखा क़ि-''जिन्दगी विकल्पों के बीच से चुनाव का नाम है.''लेकिन आज हालत यह है क़ि -''जिन्दगी प्रायोजित और प्रचारित विकल्पों के बीच आर्थिक क्षमता का प्रदर्शन मात्र है.''हम ऐसी कठपुतली बन गए हैं क़ि जिसकी डोर बड़े-बड़े पूंजीपतियों के हाथ में है.मीडिया और इस मीडिया को चलाने वाला पैसा समाज के सरोंकारों से कोसों दूर जा चुका है. लाभ-हानि के गणित में मानवीयता क़ि कीमत कुछ नहीं है.संवेदनाएं मीडिया का हथियार हैं.मुनाफा कमाने का हथियार .इस मुनाफे के आगे कोई दूसरी बात मायने नहीं रखती. मूल्यों और कीमत क़ि लड़ाई में मानवीय मूल्यों का जो पतन हो रहा है,उसे जितनी जल्दी समझ लिया जाय उतना अच्छा है.

इन सारी स्थितियों के बीच मैंने ग़ज़ल लिखी. ग़ज़ल को लेकर एक बहस हमेशा चलती है कि हम हिंदी वालों को अधिक से अधिक हिंदी के शब्दों का इस्तमाल कर के ग़ज़ल लिखनी चाहिए.लेकिन मैंने कोई कोशिस इस सन्दर्भ में नहीं क़ी.बात जब उर्दू की होती है तो अक्सर लोंगो को यह भ्रम होने लगता है कि बात किसी ऐसी भाषा की हो रही है जो हिंदी से अलग है ,जबकि मेरा यह मानना है कि हिंदी और उर्दू की संस्कृति गंगा-जमुनी संस्कृति है ।जिसका संगम स्थान यही हमारा महान भारत देश है। अगर हम भाषा विज्ञानं की दृष्टि से देखे तो भी यह बात साबित हो जाती है. जिन दो भाषाओँ की क्रिया एक ही तरह से काम करती है ,उन्हें दो नहीं एक ही भाषा के दो रूप समझने चाहिए. हिंदी और उर्दू की क्रिया पद्धति भी एक जैसी ही हैं ,इसलिए इन्हें भी एक ही भाषा के दो रूप मानना चाहिए. हिन्दुस्तानी जितनी संस्कृत निष्ठ होती गयी वह उतनी ही हिंदी हो गयी और इसी हिन्दुस्तानी में जितना अरबी और फारसी के शब्द आते गए वह उतना ही उर्दू हो गई.अंग्रेजों ने इस देश में भाषा को लेकर जो जहर बोया ,वही सारी विवाद की जड़ है. इसलिए हमे हिंदी-उर्दू का कोई भेद किये बिना ,दोनों को एक ही समझना चाहिए,तथा इन भाषाओँ में जो भी अच्छा लिखा जा रहा है,उसकी खुल के तारीफ भी करनी चाहिए.

जंहा तक बात गजलों की है तो ,यह तो साफ़ है की इस देश की फिजा गजलों को बहुत पसंद आयी. हमारे यहाँ गजलों का एक लम्बा इतिहास है,जो की बहुत ही समृद्ध है. ग़ज़ल प्राचीन गीत -काव्य की एक ऐसी विधा है,जिसकी प्रकृति सामान्य रूप से प्रेम परक होती है. जो अपने सीमित स्वरूप तथा एक ही तुक की पुनरावृत्ति के कारण पूर्व के अन्य काव्य रूपों से भिन्न होती है.ग़ज़ल मूलरूप से एक आत्म निष्ठ या व्यक्तिपरक काव्य विधा है.ग़ज़ल का शायर वही ब्यान करता है जो उसके दिल पे बीती हो.इसीलिए तो कहा जाता है क़ि ''उधार के इश्क पे शायरी नहीं होती.''
''फिर किसी मोड़ पे '' ग़ज़ल संग्रह को आप के सामने सही समय पे प्रकाशक और अपने अनुज डॉ.मनीष कुमार मिश्र क़ी वजह से ला सका .आशा है आप लोंगो को यह संग्रह जरूर पसंद आएगा।

आपका
विजयनारायण पंडित
जोशीबाग,कल्याण -पश्चिम




Most trending searches in the world

  The most searched topics in the world change hour by hour, but based on the latest Google Trends and global search activity, these are amo...

Popular Posts