Wednesday, 22 July 2026

समय, स्मृति और मनुष्य की तलाश : ‘अक्टूबर उस साल’ का आलोचनात्मक पुनर्पाठ

 









समय, स्मृति और मनुष्य की तलाश : ‘अक्टूबर उस साल’ का आलोचनात्मक पुनर्पाठ

समकालीन हिंदी कविता का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि उसने जीवन के तथाकथित छोटे और निजी अनुभवों को भी व्यापक सामाजिक यथार्थ से जोड़कर देखने की दृष्टि विकसित की है। प्रेम, बिछोह, स्मृति, परिवार, माँ, अकेलापन, विश्वासघात और आत्मीयता जैसे विषय कविता में नए नहीं हैं; किंतु किसी कवि की विशिष्टता विषयों के नए होने में उतनी नहीं होती, जितनी इस बात में होती है कि वह परिचित अनुभवों को किस निजी ताप, भाषिक संरचना और वैचारिक दृष्टि से अभिव्यक्त करता है। डॉ. मनीष कुमार मिश्रा का कविता-संग्रह ‘अक्टूबर उस साल’ इसी दृष्टि से पढ़े जाने की माँग करता है। संग्रह में 56 कविताएँ हैं और उनका भाव-संसार प्रेम तथा निजी स्मृति से लेकर भाषा, इतिहास, व्यवस्था, सामाजिक विषमता, माँ और मनुष्य की संवेदना तक विस्तृत है। 

इस संग्रह को पढ़ते हुए पहली बात जो स्पष्ट होती है, वह यह कि यहाँ कविता किसी एक सुनिश्चित वैचारिक खाँचे में बंद नहीं है। कवि कभी प्रेमी है, कभी पुत्र, कभी आहत मनुष्य, कभी सामाजिक आलोचक और कभी अपने ही जीवन तथा समय का आत्मपरीक्षण करने वाला व्यक्ति। इसलिए ‘अक्टूबर उस साल’ को केवल प्रेम-कविताओं का संग्रह कहना उचित नहीं होगा, यद्यपि प्रेम इसकी केंद्रीय संवेदनाओं में से एक है। इसे केवल सामाजिक सरोकार की कविता कहना भी अधूरा होगा। वास्तव में संग्रह की आधारभूमि है—मनुष्य और उसके भीतर लगातार घटती हुई आत्मीयता की खोज।

कवि के लिए प्रेम केवल रोमानी अनुभव नहीं, स्मृति केवल अतीत का संग्रहालय नहीं, माँ केवल पारिवारिक संबंध नहीं और राजनीति केवल सत्ता की गतिविधि नहीं है। ये सभी अनुभव अंततः इस प्रश्न से जुड़ते हैं कि बदलती हुई दुनिया में मनुष्य के भीतर कितना मनुष्य बचा है। इसी कारण संग्रह की अंतिम कविता का ‘बचाना चाहता हूँ’ जैसा भाव पूरे संग्रह के लिए एक प्रकार का काव्यात्मक घोष बन जाता है।

1. संग्रह का शीर्षक : एक महीने से अधिक एक स्मृति-प्रदेश

‘अक्टूबर उस साल’ शीर्षक में पहली दृष्टि में एक निजी स्मृति की ध्वनि है। ‘अक्टूबर’ कैलेंडर का एक महीना है, किंतु ‘उस साल’ जुड़ते ही वह सामान्य समय से निकलकर विशिष्ट निजी समय में बदल जाता है। प्रत्येक मनुष्य के जीवन में कुछ महीने, कुछ ऋतुएँ, कुछ तारीखें ऐसी होती हैं जो कैलेंडर से बाहर अपना स्वतंत्र अस्तित्व बना लेती हैं। वे बीत जाने के बाद भी नहीं बीततीं।

संग्रह की शीर्षक-कविता में अक्टूबर प्रेम और उत्सव की सम्मिलित स्मृति बनकर उपस्थित होता है। पहाड़, देवदार, पराग, गाल, होली, दिवाली और दशहरा—इन सबको कवि एक ही प्रेमानुभव में जोड़ देता है। प्रेम के कारण एक महीना अनेक उत्सवों में बदल जाता है। यहाँ प्रेम जीवन के सामान्य समय को असामान्य बना देता है।

यह कविता संग्रह के सबसे सहज और सफल बिंबों में से एक रचती है। अक्टूबर में होली नहीं होती, लेकिन प्रेम में होती है; उसी अक्टूबर में दिवाली और दशहरा भी संभव हैं। इसका अर्थ यह है कि प्रेम का अपना कैलेंडर होता है। प्रेम सामाजिक समय को निजी समय में बदल देता है।

शीर्षक की सार्थकता इस बात में भी है कि पूरे संग्रह में स्मृति बार-बार लौटती है। कहीं पिछली ऋतुओं की साथी है, कहीं कोई मुस्कान, कहीं किसी की आँखें, कहीं पहाड़, कहीं चाँदनी, कहीं बिछोह और कहीं माँ। इसलिए ‘अक्टूबर’ अंततः एक प्रतीक बन जाता है—उस समय का जिसे जीवन पीछे छोड़ देता है, लेकिन स्मृति पीछे नहीं छोड़ पाती।

2. ‘आत्मीयता’ : संग्रह की वैचारिक प्रस्तावना

संग्रह की पहली कविता ‘आत्मीयता’ है। यह चयन महत्त्वपूर्ण है। सामान्यतः आत्मीयता को सकारात्मक मूल्य माना जाता है, लेकिन कविता इसे विडंबना के साथ खोलती है। कवि धोखा देने वालों को स्वयं को निशाना बनाने का निमंत्रण देता है। यह आरंभ आत्मव्यंग्यपूर्ण है, लेकिन कविता आगे बढ़ते हुए निजी विश्वासघात से कहीं व्यापक धरातल पर पहुँचती है।

कवि की दृष्टि में धोखा केवल दो व्यक्तियों के बीच घटित घटना नहीं रह जाता। भाषा, धर्म, समाज, शिक्षा, मित्रता, शत्रुता, लाभ-हानि, पुण्य-पाप, मोक्ष, राज्य और राष्ट्र तक उसकी आलोचना के घेरे में आते हैं। विशेष रूप से आत्मीय संबंधों को वह छल की संभावना वाले सबसे प्रभावशाली क्षेत्रों में देखता है। 

यह कविता संग्रह के कवि-व्यक्तित्व को समझने की कुंजी देती है। यहाँ एक ऐसा व्यक्ति है जो आहत है, लेकिन अपनी पीड़ा को केवल निजी शिकायत नहीं बनने देता। वह निजी अनुभव को सभ्यता की संरचनाओं तक विस्तृत करता है।


हालाँकि इसी कविता में संग्रह की एक सीमा भी प्रारंभ से दिखाई देती है। कविता कई स्थानों पर विचार को काव्यात्मक संकेत के बजाय सीधे कथन में बदल देती है। जब कवि लगभग समूची सामाजिक संरचना को ‘धोखा’ घोषित करता है, तब विचार की तीव्रता तो बढ़ती है, लेकिन उसकी जटिलता कुछ कम हो जाती है। कविता यदि इस विचार को कुछ अधिक दृश्यात्मक प्रसंगों, बिंबों और अनुभवों से खोलती, तो प्रभाव अधिक बहुस्तरीय हो सकता था।


फिर भी कविता का अंत महत्त्वपूर्ण है। धोखे का उत्तर प्रतिशोध नहीं, बल्कि ‘क्षमा’ और ‘विवेक’ में खोजा गया है। यहीं कवि की नैतिक संरचना स्पष्ट होती है। वह व्यवस्था और संबंधों से आहत होकर भी निहिलिस्ट नहीं होता। उसके भीतर मनुष्य को बचाने की इच्छा बनी रहती है।


यही इच्छा आगे संग्रह की अंतिम कविता तक पहुँचती है।


3. प्रेम : संग्रह का केंद्रीय भाव, लेकिन एकरेखीय नहीं

संग्रह का सबसे विस्तृत भावक्षेत्र प्रेम है। अनुक्रमणिका में ही ‘जब तुम्हें लिखता हूँ’, ‘तुम्हारी एक मुस्कान के लिए’, ‘तुम जब साथ होती हो’, ‘जब थाम लेता हूँ’, ‘तेरी आँखों का जंगल’, ‘दो आँखों में अटकी’, ‘जैसे कि तुम’, ‘कब होता है प्रेम?’, ‘रंग-ए-इश्क में’, ‘तुम से प्रेम’, ‘प्रेम और समर्पण’ जैसे शीर्षक इसकी पुष्टि करते हैं। 



लेकिन इस संग्रह का प्रेम एक स्थिति में स्थिर नहीं रहता। उसके कम-से-कम चार रूप दिखाई देते हैं—प्रेम का उत्सव, प्रेम की स्मृति, प्रेम की अनुपस्थिति और प्रेम से उत्पन्न आत्मपीड़ा।


प्रेम का उत्सव

‘वह साल, वह अक्टूबर’ में प्रेम उत्सव है। प्रेमिका के गालों पर देवदार के पराग सजाना होली बन जाता है; उसकी बातों और हँसी में दिवाली घटित होती है और हृदय जीतना दशहरा हो जाता है। यहाँ कवि की भाषा सहज, दृश्यात्मक और प्रसन्न है।


इसी तरह ‘रंग-ए-इश्क में’ में प्रिय की उपस्थिति को सर्दियों की धूप, प्रेम की गली, रूह और उम्मीद की खिड़की जैसे परिचित लेकिन प्रभावी बिंबों से रचा गया है। इन कविताओं की शक्ति उनकी संप्रेषणीयता में है। कवि जटिल भाषा का प्रदर्शन नहीं करता।


प्रेम की अनुपस्थिति

इसके विपरीत ‘बहुत कठिन होता है’ विदाई की कविता है। ‘गुड बाय’ कहना कवि के लिए कठिन है क्योंकि किसी व्यक्ति की उपस्थिति उसके जीवन में मौसम की तरह आई थी। कविता का सबसे सुंदर भाव उसका अंतिम आग्रह है—फिर अचानक चले आना, जैसे पहाड़ों पर कोई मौसम आता है।


यहाँ कवि प्रेम को अधिकार में बदलने से बचता है। वह प्रिय को रोकता नहीं; लौट आने की संभावना बचाए रखता है। इस तरह प्रेम स्मृति और प्रतीक्षा में रूपांतरित होता है।


प्रेम और आघात

‘जैसे कि तुम’ में प्रेम की दूसरी छाया दिखाई देती है। यहाँ प्रिय का बदल जाना, रूठना, बिखेरना और धोखा देना केंद्रीय है। कविता का भाव अत्यंत निजी है और भाषा गीतात्मकता की ओर बढ़ती है। ‘जैसे कि तुम’ का पुनरावर्तन कविता को लय देता है।


यह कविता लोकप्रिय संवेदना के निकट है। इसकी भाषा सहज है और भाव तुरंत पाठक तक पहुँचता है। लेकिन आलोचनात्मक दृष्टि से देखें तो यहाँ कुछ बिंब—आँख से लहू टपकना, टूटना-बिखरना, धोखा—हिंदी-उर्दू प्रेम-कविता की परिचित अभिव्यक्तियों से बहुत दूर नहीं जाते। कवि की विशिष्टता उन स्थानों पर अधिक उभरती है जहाँ वह अपने विशिष्ट अनुभव-प्रदेश—अक्टूबर, पहाड़, देवदार, माँ, इतिहास या व्यवस्था—से बिंब ग्रहण करता है।


प्रेम : आत्मविनाश का अनुभव

‘तुम से प्रेम’ जैसी कविता प्रेम को अत्यंत कठोर रूपक देती है। यहाँ प्रेम आकांक्षाओं के ‘रक्तरंजित शवों’ और आत्महत्यारी घटनाओं की विवेचना जैसा दिखाई देता है। प्रेम का यह रूप संग्रह के रोमानी पक्ष को तोड़ता है।


इसलिए संग्रह का प्रेम केवल सुंदरता का आख्यान नहीं है। वह सुख, पीड़ा, प्रतीक्षा, वियोग, स्मृति, आत्मसमर्पण और कभी-कभी आत्मविनाश तक फैला हुआ है।


4. प्रेमिका की आँखें : एक आवर्ती काव्य-प्रतीक

इस संग्रह में ‘आँख’ अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रतीक है। ‘तेरी आँखों का जंगल’, ‘दो आँखों में अटकी’, ‘रंग-ए-इश्क में’ और अन्य कई कविताओं में आँखें बार-बार आती हैं।


आँखें यहाँ केवल सौंदर्य का अंग नहीं। वे पढ़ी जाने वाली भाषा भी हैं। कवि कई बार चेहरे और आँखों को ‘पढ़ता’ है। यह रोचक है क्योंकि कवि का बुनियादी स्वभाव भाषिक है। वह व्यक्ति को भी एक पाठ की तरह ग्रहण करता है।


लेकिन आँखों का यह बारंबार प्रयोग कभी-कभी पुनरावृत्ति भी उत्पन्न करता है। प्रेम-कविताओं के बड़े समूह में कुछ निश्चित शब्दावलियाँ—आँखें, मन, रूह, साँस, मौसम, स्मृति, इंतजार, सपना, इश्क—बार-बार आती हैं। यह संग्रह की भावात्मक एकता तो बनाती हैं, पर कुछ स्थानों पर काव्य-भाषा को अनुमानित भी कर देती हैं।


भविष्य की कविता के लिए कवि की सबसे बड़ी संभावना शायद यहीं है—अपनी निजी संवेदना को और अधिक अप्रत्याशित वस्तु-जगत से जोड़ना।


5. प्रकृति : बाहरी दृश्य नहीं, मन का विस्तार

संग्रह में प्रकृति का संसार पर्याप्त समृद्ध है। अक्टूबर, देवदार, पहाड़, बर्फ, बारिश, वसंत, चाँदनी, ऋतुएँ, पलाश, बेला, कोयल, चकवी, बादल और समुद्र जैसे प्राकृतिक उपादान बार-बार उपस्थित होते हैं।


‘कब होता है प्रेम?’ में पलाश, बेला, कोयल और चकवी प्रेम की अलग-अलग मनःस्थितियों के संकेत बनते हैं। धरा का जलना, बादलों का उमड़ना, पराग का झरना और फूलों का खिलना प्रेम की आंतरिक ऋतु को व्यक्त करते हैं।


यहाँ प्रकृति छायावादी रहस्यलोक नहीं बनाती। वह अधिकतर भावों की समानांतर संरचना है। मन में जो घट रहा है, उसका कोई दृश्य प्रकृति में मौजूद है।


संग्रह की प्रकृति-कविताओं में पहाड़ी परिवेश विशेष उल्लेखनीय है। पहाड़ और बर्फ से जुड़े बिंब संग्रह को विशिष्ट दृश्यात्मकता देते हैं। ‘बहुत कठिन होता है’ में सर्दियों की धूप और गुलाबी ठंड केवल वातावरण नहीं बनाते; वे प्रिय की उपस्थिति का स्वभाव बताते हैं।


यहाँ कवि तब अधिक प्रभावी है जब वह प्रकृति को केवल उपमा नहीं बनाता, बल्कि उसे अनुभव की वास्तविक जगह बनने देता है।


6. स्मृति : जो बीतकर भी वर्तमान में रहती है

संग्रह की सबसे गहरी अंतर्धाराओं में स्मृति है। शीर्षक से लेकर अनेक कविताओं तक अतीत लगातार वर्तमान में हस्तक्षेप करता है।


‘पिछली ऋतुओं की वह साथी’ में स्मृति किसी निष्क्रिय तस्वीर की तरह नहीं आती। वह वर्तमान को सक्रिय रूप से प्रभावित करती है। बीती हुई साथी सावन, जाड़े, साँसों और प्यासे सपनों में लौटती रहती है।


कवि के यहाँ स्मृति का स्वभाव प्रायः ऋतु-संबंधी है। लोग मौसमों से जुड़े हैं। कोई सर्दियों की धूप है, कोई सावन है, कोई अक्टूबर है। इसीलिए समय रैखिक नहीं रहता। ऋतु लौटती है तो स्मृति भी लौटती है।


यह संग्रह का सुंदर पक्ष है।


किंतु स्मृति हमेशा सुखद नहीं। कई बार वही स्मृति वर्तमान के अकेलेपन को अधिक तीखा करती है। अतीत इसलिए सुंदर लगता है क्योंकि वर्तमान में उसकी कमी है। इस अर्थ में ‘अक्टूबर उस साल’ का काव्य-संसार मूलतः अनुपस्थिति का काव्य-संसार है।


जो उपस्थित है, उससे अधिक प्रभावशाली वह है जो अब उपस्थित नहीं है।


7. ‘माँ’ : संग्रह का भावात्मक शिखर

यदि इस संग्रह से कुछ प्रतिनिधि कविताएँ चुननी हों तो ‘माँ’ को उनमें अवश्य रखा जाना चाहिए। यह केवल इसलिए नहीं कि माँ का विषय स्वभावतः मार्मिक है, बल्कि इसलिए कि इस कविता में कवि अपनी भावुकता को जीवन के ठोस विवरणों से जोड़ता है।


कविता 5 सितंबर 2017 की एक सुबह से आरंभ होती है। माँ की मृत्यु को किसी अमूर्त दार्शनिक भाषा में नहीं, बल्कि घरेलू जीवन के अचानक रुक जाने से व्यक्त किया गया है—सुबह चाय न आना, पूजा-घर में माँ का न होना, उसका निष्प्राण पड़े होना।


कविता का एक अत्यंत प्रभावी बिंदु है—माँ को तपस्या की आवश्यकता क्यों होगी, वह स्वयं ही एक तपस्या थी।


यहाँ कवि का भाव अपने सबसे स्वाभाविक रूप में आता है।


माँ की स्मृति बड़े-बड़े प्रतीकों से नहीं बनती। वह बच्चे को गोद में लेकर कई कोस पैदल चलने, झाड़-फूँक कराने, अस्पताल ले जाने, वर्णमाला सिखाने, पसंद का भोजन बनाने, फटे कपड़े और टूटी बटन ठीक करने, दरवाजे पर इंतजार करने और सोते हुए चादर ओढ़ाने जैसी छोटी क्रियाओं से बनती है।


यहीं कविता असाधारण मानवीय विश्वसनीयता प्राप्त करती है।


विशेष रूप से वह प्रसंग अत्यंत मार्मिक है जहाँ कवि उन बातों को याद करता है जिन्हें माँ बार-बार बताती थी और जिन्हें सुनने में कभी उसकी रुचि नहीं थी—घर-गाँव की मामूली बातें, गाय-बछिया, खराब हुआ अचार, शादी-ब्याह। जीवित माँ की बातें कभी अनावश्यक लगती थीं; मृत्यु के बाद वही बातें सबसे दुर्लभ हो जाती हैं।


यह अनुभव सार्वभौमिक है, लेकिन उसकी प्रस्तुति निजी है।


कविता का सबसे गहरा स्तर अपराधबोध है। कवि स्वीकार करता है कि वह माँ से कभी लिपटकर यह नहीं कह पाया कि वह उससे कितना प्रेम करता है। मृत्यु के बाद यह असंभव संवाद कविता बन जाता है।


‘माँ’ की शक्ति इसी असंपादित भावुकता में है। तकनीकी दृष्टि से कविता लंबी है और कुछ स्थानों पर संपादन से अधिक सघन हो सकती थी; लेकिन अत्यधिक संपादन शायद उसकी आत्मस्वीकृतिपरक प्रामाणिकता को कम भी कर देता।


संग्रह की कई प्रेम-कविताओं में प्रेमिका की अनुपस्थिति है, लेकिन ‘माँ’ में अनुपस्थिति का अर्थ कहीं अधिक अस्तित्वगत है। प्रेमिका के लौटने की कल्पना संभव है; माँ की नहीं। इसलिए यह कविता संग्रह के समूचे वियोग-बोध को एक निर्णायक गहराई देती है।


8. निजी से सामाजिक की ओर यात्रा

‘अक्टूबर उस साल’ का एक महत्त्वपूर्ण गुण यह है कि कवि निजी भावुकता में पूरी तरह बंद नहीं रहता। संग्रह में अनेक कविताएँ अपने समय की राजनीतिक और सामाजिक संरचना से संवाद करती हैं।


‘यूँ तो संकीर्णताओं को’ में आधुनिक समाज के विरोधाभासों पर सीधी टिप्पणी है। परिवर्तन का शोर है, लेकिन मनुष्य अपनी जड़ों का हवन कर रहा है। रावण-दहन के प्रतीक के माध्यम से कवि नैतिक पाखंड पर प्रश्न उठाता है। मजदूर, सैनिक, भगोड़े आर्थिक अपराधी और भाषण देते रहनुमा कविता के सामाजिक परिदृश्य में आते हैं।


यह कविता प्रतिरोध की कविता है, लेकिन इसका स्वर घोषणात्मक है। यहाँ कवि विचार को छिपाता नहीं।


इसी प्रकार ‘दौर-ए-निज़ाम’ सत्ता-व्यवस्था पर तीखा व्यंग्य करती है। ‘चाटने की परंपरा में काटना समस्या है’ जैसी पंक्ति व्यवस्था की चापलूसी-संस्कृति को तीक्ष्ण व्यंग्य में बदल देती है। कविता यह भी कहती है कि व्यवस्था के विरुद्ध खौलता हुआ खून ही व्यक्ति को अपराधियों की श्रेणी में डाल सकता है।


इन कविताओं में कवि की लोकतांत्रिक बेचैनी स्पष्ट है।


लेकिन यहाँ एक आलोचनात्मक प्रश्न आवश्यक है। सामाजिक कविता में केवल सही पक्ष ग्रहण कर लेना पर्याप्त नहीं होता; काव्यात्मक जटिलता भी आवश्यक है। संग्रह की कुछ सामाजिक कविताएँ अपनी बात इतनी सीधे कहती हैं कि वे कविता और वक्तव्य की सीमा पर पहुँच जाती हैं। जहाँ ‘दाँत’, ‘चाटना’, ‘आखिरी पायदान’ या ‘मशाल’ जैसे ठोस प्रतीक आते हैं, कविता प्रभावशाली होती है; जहाँ वह केवल सामाजिक निष्कर्ष बताती है, वहाँ उसकी कलात्मक शक्ति अपेक्षाकृत कम हो जाती है।


यह संग्रह की एक वास्तविक सीमा है, जिसे उसकी प्रतिबद्धता के सम्मान के साथ स्वीकार किया जाना चाहिए।


9. ‘भाषा के लिबास में’ : संग्रह की जटिल कविताओं में एक

‘भाषा के लिबास में’ संग्रह की उन कविताओं में है जहाँ कवि की भाषा अधिक सांकेतिक और जटिल हो जाती है। यहाँ दरख्त, कुल्हाड़ी, औरत का इतिहास, फफूँद लगी गौरव-गाथाएँ, पैबंद, लहूलुहान इतिहास और सलाखें—इन सबके माध्यम से इतिहास और भाषा के संबंध पर प्रश्न उठाया गया है।


यह कविता संकेत करती है कि इतिहास केवल घटनाओं का निष्पक्ष लेखा नहीं होता। भाषा इतिहास को ढँक भी सकती है। विशेषतः स्त्री के वास्तविक इतिहास को गौरव-गाथाओं की भाषा छिपाती रही है।


यहाँ कवि की सामाजिक चेतना अधिक कलात्मक रूप ग्रहण करती है। सीधे घोषणा करने के बजाय वह बिंबों की संरचना बनाता है।


यद्यपि कुछ बिंबों के पारस्परिक संबंध तुरंत स्पष्ट नहीं होते और कविता कहीं-कहीं अत्यधिक बिंब-सघन हो जाती है, फिर भी यही जोखिम इसे संग्रह की अधिक महत्त्वाकांक्षी कविताओं में रखता है।


कवि की भावी काव्य-दिशा के लिए यह कविता विशेष संकेत देती है। यदि ‘माँ’ जैसी अनुभव की प्रामाणिकता और ‘भाषा के लिबास में’ जैसी सांकेतिक संरचना एक-दूसरे से अधिक गहरे जुड़ें, तो कवि की कविता और अधिक विशिष्ट हो सकती है।


10. इतिहास और सत्य का संकट

‘इतिहास मेरे साथ’ एक छोटी लेकिन विचारोत्तेजक कविता है। इसमें कवि कहता है कि इतिहास उसके साथ न्याय नहीं कर सकेगा, क्योंकि उसने स्वयं अपने वर्तमान में अपने पक्ष और सत्य को अनेक परतों के नीचे दबा दिया है।


यह दृष्टि रोचक है।


आमतौर पर हम इतिहास से शिकायत करते हैं कि उसने सत्य को दबाया। यहाँ कवि स्वयं स्वीकार करता है कि व्यक्ति भी अपने सत्य को छिपाता है। तब इतिहास उस तक कैसे पहुँचेगा?


कविता का केंद्रीय प्रश्न इतिहास की विश्वसनीयता से अधिक मनुष्य की आत्म-छलना का है।


इतिहास वही दर्ज कर सकता है जो उसे उपलब्ध कराया जाता है। यदि वर्तमान स्वयं अपने ऊपर झूठ की परतें चढ़ा रहा है तो भविष्य का इतिहास भी उन परतों से धोखा खा सकता है।


यहाँ ‘धोखा’ फिर लौटता है—वही शब्द जो ‘आत्मीयता’ में था।


इस प्रकार संग्रह के भीतर कुछ आंतरिक सूत्र निर्मित होते हैं: धोखा, स्मृति, इतिहास, भाषा और सत्य एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं।


11. व्यवस्था-विरोध और मनुष्य के पक्ष की कविता

कवि के सामाजिक सरोकार का मूल राजनीतिक विचारधारा से अधिक मनुष्य-केंद्रित नैतिकता में है। वह किसी विशिष्ट राजनीतिक सिद्धांत की व्यवस्थित स्थापना नहीं करता; उसकी आपत्ति वहाँ शुरू होती है जहाँ मनुष्य की गरिमा, संवेदना और न्याय संकट में पड़ते हैं।


‘कृतघ्न यातना’ में वंचितों की पीठ पर लदे सरोकारों का उल्लेख हो या ‘दौर-ए-निज़ाम’ में अंतिम पायदान से उठती चीख—कवि की सहानुभूति हाशिये की ओर है।


यह पक्ष महत्त्वपूर्ण है क्योंकि संग्रह का प्रेम और उसकी राजनीति पूरी तरह अलग नहीं हैं। दोनों की जड़ में संवेदना है।


जो कवि निजी संबंध में आत्मीयता की कमी से आहत है, वही समाज में संवेदनहीनता देखकर भी बेचैन होता है।


इसीलिए इस संग्रह की सामाजिक चेतना को उसकी प्रेम-कविताओं से अलग करके नहीं पढ़ना चाहिए। दोनों का मूल संकट एक है—मनुष्य का मनुष्य से दूर होते जाना।


12. आत्मकथात्मकता और कविता

इस संग्रह की अनेक कविताएँ अत्यंत निजी अनुभवों से निर्मित लगती हैं। स्थान, मौसम, तारीख और संबंधों की विशिष्टता उन्हें आत्मकथात्मक विश्वसनीयता देती है।


लेकिन कविता और आत्मकथा के बीच एक अंतर है। निजी अनुभव जब तक केवल कवि का रहता है, तब तक वह संस्मरण है; जब पाठक उसमें अपने अनुभव को पहचानने लगता है, तभी वह व्यापक कविता बनता है।


‘अक्टूबर उस साल’ की श्रेष्ठ कविताएँ इस सीमा को पार करती हैं।


‘माँ’ कवि की माँ की कविता होते हुए भी पाठक को अपनी माँ तक ले जाती है। ‘बहुत कठिन होता है’ किसी एक विदाई से शुरू होकर प्रत्येक कठिन विदाई की कविता बन सकती है। ‘बचाना चाहता हूँ’ निजी संबंध से शुरू होकर मनुष्य की संवेदना बचाने की आकांक्षा तक पहुँचती है।


लेकिन कुछ प्रेम-कविताएँ निजी संदर्भ से पूरी तरह बाहर नहीं निकल पातीं। उनमें भाव की सच्चाई तो है, लेकिन अनुभव का कलात्मक रूपांतरण सीमित रह जाता है। यह संग्रह के असमान काव्य-स्तर का एक कारण है।


13. भाषा : सहजता इसकी शक्ति भी, सीमा भी

कवि की भाषा मूलतः संप्रेषणधर्मी है। वह कठिन शब्दावली से पाठक को आतंकित नहीं करता। प्रेम-कविताओं में हिंदी-उर्दू की मिली-जुली भाषा सहज रूप में आती है—इश्क, रूह, रंग, दौर-ए-निज़ाम जैसे शब्द कविता के भावानुकूल हैं।


सामाजिक कविताओं में बोलचाल और व्यंग्य की भाषा आती है। ‘माँ’ में भाषा लगभग घरेलू बातचीत की भाषा बन जाती है।


यह विविधता संग्रह की उपलब्धि है।


लेकिन सहज भाषा और सपाट भाषा के बीच बहुत महीन अंतर होता है। संग्रह की कई कविताएँ इस सीमा के दोनों ओर जाती हैं। जहाँ अनुभव स्वयं शक्तिशाली है, वहाँ साधारण वाक्य भी मार्मिक हो जाता है। माँ का चाय न लाना इसका उदाहरण है। वहाँ किसी अलंकरण की आवश्यकता नहीं।


इसके विपरीत जहाँ विचार अमूर्त है, वहाँ सीधे कथन कविता को गद्यात्मक बना देते हैं।


इसलिए संग्रह की भाषिक शक्ति मुख्यतः वहाँ दिखाई देती है जहाँ कवि बताता कम और दिखाता अधिक है।


14. मुक्तछंद और पंक्ति-विन्यास

संग्रह की अधिकांश कविताएँ मुक्तछंद में हैं। छोटी-छोटी पंक्तियाँ इसकी प्रमुख शैलीगत विशेषता हैं। कई बार एक शब्द भी स्वतंत्र पंक्ति बन जाता है।


इस शैली का लाभ यह है कि कविता में ठहराव और भावात्मक जोर पैदा होता है। पाठक को प्रत्येक शब्द पर रुकने का अवसर मिलता है।


लेकिन इसका अत्यधिक उपयोग एक समस्या भी पैदा करता है। हर वाक्य को कई छोटी पंक्तियों में तोड़ देना अपने-आप कविता नहीं बनाता। कुछ स्थानों पर वाक्य का स्वाभाविक प्रवाह अनावश्यक रूप से टूटता है।


कवि की सफल मुक्तछंद कविताओं में पंक्ति-विभाजन अर्थ पैदा करता है; कमजोर स्थानों पर वह केवल मुद्रण-विन्यास बनकर रह जाता है।


यदि संग्रह का नया संस्करण तैयार हो तो पंक्ति-विन्यास का पुनर्संपादन उपयोगी होगा। जहाँ विराम अर्थ और तनाव पैदा करता है, उसे बनाए रखा जाना चाहिए; जहाँ वह केवल वाक्य को टुकड़ों में बाँटता है, वहाँ अधिक स्वाभाविक संरचना कविता को मजबूत करेगी।


15. बिंब और प्रतीक

संग्रह का बिंब-संसार मुख्यतः पाँच क्षेत्रों से निर्मित है—प्रकृति, ऋतु, शरीर, घर और सामाजिक संरचना।


प्रेम की कविताओं में धूप, बर्फ, पहाड़, देवदार, आँखें, साँसें और मौसम आते हैं। सामाजिक कविताओं में सलाखें, कुल्हाड़ी, दाँत, जंजीर, आखिरी पायदान और मशाल जैसे प्रतीक हैं। माँ की कविता में घर की साधारण वस्तुएँ और गतिविधियाँ स्वयं बिंब बन जाती हैं।


इनमें सबसे सफल बिंब वे हैं जो कवि के निजी अनुभव से आए हैं।


‘सर्दियों की धूप’ का बिंब परिचित है, लेकिन पहाड़ी परिवेश में वह जीवंत हो उठता है। ‘उम्मीद की खिड़की’ सुंदर है, लेकिन अपेक्षाकृत प्रचलित है। ‘चाटने की परंपरा में काटना समस्या है’ अधिक मौलिक और तीखा है।


इस तुलना से संग्रह के भीतर ही कवि की वास्तविक शक्ति का पता चलता है।


कवि जब तैयार काव्य-शब्दावली से बाहर निकलकर अपनी जिंदगी और समय की ठोस वस्तुओं को कविता में लाता है, तब उसकी आवाज सबसे अलग सुनाई देती है।


16. रोमानी भावुकता : उपलब्धि और जोखिम

इस संग्रह में भावुकता बहुत है और इसे नकारात्मक अर्थ में देखना उचित नहीं होगा। कविता का जन्म ही संवेदना से होता है। समस्या भावुकता नहीं, अनियंत्रित भावुकता हो सकती है।


डॉ. मनीष कुमार मिश्रा की कविता का मूल स्वभाव भावप्रधान है। वे अपने अनुभव को बौद्धिक दूरी बनाकर नहीं देखते। वे उसमें पूरी तरह शामिल रहते हैं।


इस कारण उनकी कविताएँ पाठक से तत्काल संबंध बनाती हैं।


लेकिन इसी प्रवृत्ति के कारण कभी-कभी कविता उस स्थान पर भी बोलती रहती है जहाँ उसे समाप्त हो जाना चाहिए था। कुछ कविताओं में अंतिम प्रभाव पहले ही निर्मित हो चुका होता है, फिर भी भाव की पुनरावृत्ति जारी रहती है।


एक अधिक कठोर आत्मसंपादन इन कविताओं को अधिक सघन बना सकता था।


यह टिप्पणी विशेष रूप से प्रेम-कविताओं के बड़े समूह पर लागू होती है। संग्रह में प्रेम के अनेक रूप हैं, लेकिन कुछ कविताओं के भाव और शब्दावली एक-दूसरे के बहुत निकट हैं। चयन अधिक कठोर होता तो संग्रह का समग्र प्रभाव संभवतः और तीव्र होता।


17. स्त्री की उपस्थिति

संग्रह में स्त्री अनेक रूपों में आती है—प्रेमिका, स्मृति, साथी और माँ के रूप में। ‘भाषा के लिबास में’ स्त्री इतिहास के संदर्भ में भी आती है।


प्रेम-कविताओं की स्त्री प्रायः कवि की दृष्टि से निर्मित है। उसकी आँखें, मुस्कान, हाथ, उपस्थिति और अनुपस्थिति कवि की अनुभूति के केंद्र हैं। यहाँ स्त्री की स्वतंत्र आंतरिक दुनिया अपेक्षाकृत कम खुलती है।


यह समकालीन आलोचना की दृष्टि से विचारणीय सीमा है।


लेकिन ‘माँ’ में स्त्री एक अधिक पूर्ण जीवन के साथ सामने आती है। वह केवल कवि की माँ नहीं; उसकी अपनी बोलने की आदतें, विश्वास, घरेलू संसार और चिंताएँ हैं।


यदि प्रेम-कविताओं में भी स्त्री के स्वतंत्र व्यक्तित्व और उसकी दृष्टि को अधिक स्थान मिलता, तो संग्रह का प्रेम-संसार अधिक बहुआयामी हो सकता था।


18. ‘बचाना चाहता हूँ’ : पूरे संग्रह का नैतिक निष्कर्ष

संग्रह की अंतिम कविता ‘बचाना चाहता हूँ’ को पूरे संग्रह के निष्कर्ष की तरह पढ़ा जा सकता है।

कवि सबसे पहले अपने टूटते हुए मन को बचाना चाहता है—स्नेह, संवेदना, भरोसे और संबंधों की ऊष्मा से।

यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

संग्रह ‘आत्मीयता’ में धोखे से शुरू होता है और ‘बचाना चाहता हूँ’ में संबंध बचाने की इच्छा पर समाप्त होता है।

अर्थात यात्रा निराशा से विनाश की ओर नहीं जाती।

कवि आहत है, लेकिन संबंध-विरोधी नहीं। वह प्रेम में विफल हो सकता है, लेकिन प्रेम को अस्वीकार नहीं करता। वह व्यवस्था से निराश है, लेकिन मनुष्य से उम्मीद नहीं छोड़ता। वह इतिहास पर प्रश्न उठाता है, लेकिन सत्य की संभावना समाप्त नहीं करता।

अंतिम कविता में ‘बेनाम रिश्तों’ को बचाने और प्रिय के पास उसकी शर्तों पर लौटने की इच्छा है। सबसे महत्त्वपूर्ण विचार यह है कि किसी के पास लौटना कवि को ‘मनुष्य होने की संभावनाओं’ से भर सकता है।

यही इस संग्रह का मूल मानवीय विश्वास है।

मनुष्य संबंधों से घायल भी होता है और संबंधों से ही बचता भी है।

यह विरोधाभास ‘अक्टूबर उस साल’ की आत्मा है।

19. संग्रह की प्रमुख उपलब्धियाँ

इस संग्रह की पहली बड़ी उपलब्धि उसकी भावात्मक प्रामाणिकता है। कवि बनावटी बौद्धिकता के पीछे नहीं छिपता। वह अपनी कमजोरी, प्रेम, आघात, अपराधबोध और असुरक्षा स्वीकार करता है।

दूसरी उपलब्धि निजी और सामाजिक संसार के बीच आवाजाही है। प्रेम से राजनीति तक की यह यात्रा हमेशा समान रूप से सफल नहीं, लेकिन कवि की संवेदना के विस्तार को प्रमाणित करती है।

तीसरी उपलब्धि स्मृति और ऋतु का संबंध है। अक्टूबर, बर्फ, सावन, सर्दियों की धूप और पिछली ऋतुएँ संग्रह को एक विशिष्ट वातावरण प्रदान करती हैं।

चौथी उपलब्धि ‘माँ’ जैसी कविता है, जहाँ निजी शोक व्यापक मानवीय अनुभव बन जाता है।

पाँचवीं उपलब्धि संग्रह का नैतिक आधार है। तमाम धोखों और निराशाओं के बावजूद कविता मनुष्य-विरोधी नहीं होती। अंतिम लक्ष्य बचाना है—मन, संबंध, संवेदना और मनुष्यता।

20. संग्रह की सीमाएँ : जहाँ अधिक कठोर संपादन आवश्यक था

गंभीर समीक्षा का अर्थ केवल प्रशंसा नहीं है। ‘अक्टूबर उस साल’ में कुछ स्पष्ट सीमाएँ भी हैं।

सबसे पहली सीमा अतिवक्तव्य की है। कई स्थानों पर कवि पाठक को अर्थ खोजने का अवसर देने के बजाय निष्कर्ष स्वयं बता देता है।

दूसरी सीमा भाव और शब्दावली की पुनरावृत्ति है। प्रेम की बड़ी संख्या में कविताएँ होने के कारण आँख, मन, इश्क, रूह, स्मृति, मौसम, सपना, बिछोह और इंतजार जैसे शब्द बार-बार आते हैं।

तीसरी सीमा कुछ सामाजिक कविताओं की नारात्मकता है। सही राजनीतिक चिंता अपने-आप श्रेष्ठ कविता नहीं बनती। कविता को विचार का कलात्मक रूपांतरण भी करना होता है।

चौथी सीमा असमानता है। ‘माँ’, ‘आत्मीयता’, ‘इतिहास मेरे साथ’, ‘भाषा के लिबास में’, शीर्षक-कविता और ‘बचाना चाहता हूँ’ जैसी कविताओं के बीच कुछ ऐसी कविताएँ भी हैं जो अपेक्षाकृत सामान्य प्रेम-अभिव्यक्ति तक सीमित रहती हैं।

पाँचवीं सीमा मुक्तछंद के पंक्ति-विन्यास से संबंधित है। अत्यधिक छोटी पंक्तियाँ कई बार कविता की लय बनाने के बजाय स्वाभाविक वाक्य-संरचना को बाधित करती हैं।

लेकिन ये सीमाएँ कवि की संभावनाओं को कम नहीं करतीं; बल्कि उनकी अगली काव्य-यात्रा की दिशा स्पष्ट करती हैं। सबसे अधिक आवश्यकता है—कठोर चयन, अधिक संपादन, कम कथन और अधिक बिंबात्मकता की।


21. समकालीन हिंदी कविता के संदर्भ में

‘अक्टूबर उस साल’ को समकालीन हिंदी कविता के किसी एक आंदोलन या वैचारिक खेमे में रखना कठिन है। यह उसकी कमजोरी नहीं है।

इसकी कविता एक ऐसे व्यक्ति की कविता है जो अकादमिक और सामाजिक संसार में सक्रिय रहते हुए भी अपने निजी भावलोक को बचाए रखना चाहता है।

यहाँ उत्तर-आधुनिक जटिलता का प्रदर्शन नहीं है, न ही किसी निश्चित राजनीतिक विचारधारा का घोषणापत्र। इसका केंद्र अनुभूत मनुष्य है।

कवि की कविता नागार्जुन जैसी राजनीतिक आक्रामकता, मुक्तिबोध जैसी बौद्धिक जटिलता या केदारनाथ सिंह जैसी बिंब-संयमित भाषा का अनुसरण नहीं करती—और उससे ऐसी अपेक्षा करना भी उचित नहीं। उसकी अपनी भूमि आत्मीय अनुभव और सहज संप्रेषण की है।

फिर भी समकालीन कविता में विशिष्ट पहचान के लिए केवल अनुभव की सच्चाई पर्याप्त नहीं होती; भाषा की ऐसी निजी पहचान भी आवश्यक होती है जिससे कुछ पंक्तियाँ पढ़ते ही कवि पहचाना जा सके।

‘अक्टूबर उस साल’ में ऐसी भाषा बनने की संभावनाएँ स्पष्ट हैं—विशेषतः वहाँ जहाँ निजी भूगोल, सामाजिक व्यंग्य और आत्मस्वीकृति एक साथ आते हैं।


22. कवि की मूल संवेदना : घायल होकर भी आत्मीय बने रहना

पूरे संग्रह को एक सूत्र में बाँधना हो तो कहा जा सकता है कि यह घायल आत्मीयता की कविता है।

कवि को धोखा मिला है, फिर भी वह आत्मीयता की संभावना नहीं छोड़ता।

प्रेम में बिछोह है, फिर भी वह लौटने की कामना करता है।

माँ चली गई है, फिर भी वह उससे बात करता है।

इतिहास न्याय नहीं करेगा, फिर भी वह सत्य की चिंता करता है।

व्यवस्था क्रूर है, फिर भी आखिरी पायदान से उठती आवाज में उम्मीद की मशाल देखता है।

मन टूट रहा है, फिर भी उसे बचाना चाहता है।

यही निरंतरता संग्रह को भीतर से जोड़ती है।

इस दृष्टि से ‘अक्टूबर’ केवल प्रेम की स्मृति नहीं रहता। वह उस समूचे समय का प्रतीक बन जाता है जिसमें मनुष्य ने कुछ पाया, बहुत कुछ खोया और खोने के बाद जाना कि जो चला गया था, उसका वास्तविक मूल्य क्या था।


निष्कर्ष

डॉ. मनीष कुमार मिश्रा का ‘अक्टूबर उस साल’ एक ऐसे कवि का संग्रह है जिसके लिए कविता जीवन से अलग कोई सौंदर्यवादी अभ्यास नहीं, बल्कि स्मृतियों, संबंधों, आघातों और सामाजिक बेचैनियों को समझने की प्रक्रिया है।

इस संग्रह की सबसे बड़ी शक्ति उसकी संवेदनात्मक ईमानदारी है।

यह कविता कई बार अत्यधिक बोलती है, लेकिन झूठ कम बोलती है।

कई बार वह शिल्प की अपेक्षा भाव पर अधिक निर्भर करती है, लेकिन उसका भाव अनुभवहीन नहीं है।

कई बार वह विचार को सीधे वक्तव्य में बदल देती है, लेकिन उसके पीछे अपने समय के प्रति वास्तविक चिंता है।

कई प्रेम-कविताओं में परिचित रोमानी शब्दावली मिलती है, लेकिन उन्हीं के बीच अक्टूबर, पहाड़, देवदार, बर्फ, माँ की रसोई, टूटे बटन, खराब हुआ अचार और आखिरी पायदान से उठती आवाज जैसे दृश्य कवि की अपनी दुनिया निर्मित करते हैं।

संग्रह की सर्वाधिक प्रभावी कविताएँ वे हैं जहाँ कवि अपने अनुभव को बिना अलंकरण के सामने रखता है और वस्तुओं को स्वयं बोलने देता है। ‘माँ’ इसका सबसे सशक्त उदाहरण है। दूसरी ओर ‘भाषा के लिबास में’ और ‘इतिहास मेरे साथ’ जैसी कविताएँ बताती हैं कि कवि निजी संवेदना से आगे जाकर इतिहास और भाषा के जटिल प्रश्नों को भी छू सकता है।

इस संग्रह का आरंभ धोखे से होता है और अंत बचाने की इच्छा से।

यह संरचना आकस्मिक नहीं लगती।

‘आत्मीयता’ का कवि संसार के छल से परिचित है; ‘बचाना चाहता हूँ’ का कवि उसी संसार में स्नेह, संवेदना, भरोसा और संबंध बचाना चाहता है। दोनों कविताओं के बीच फैली 56 कविताओं की यात्रा वास्तव में एक मनुष्य की अपने भीतर की मनुष्यता को बचाए रखने की यात्रा है।

और संभवतः इस संग्रह का सबसे मूल्यवान साहित्यिक निष्कर्ष भी यही है—

मनुष्य होने का अर्थ केवल प्रेम करना नहीं है; प्रेम में घायल होने के बाद भी प्रेम, विश्वास और संवेदना की संभावना को पूरी तरह समाप्त न होने देना है।

‘अक्टूबर उस साल’ की कविताएँ इसी कठिन संभावना की कविताएँ हैं।

वे एक ऐसे अक्टूबर को याद करती हैं जो कैलेंडर में समाप्त हो चुका है, लेकिन कवि के भीतर अब भी चल रहा है। उस अक्टूबर में प्रेम है, उत्सव है, बिछोह है, माँ की अनुपस्थिति है, इतिहास का संदेह है, व्यवस्था से असहमति है और संबंधों के टूटते जाने की चिंता है। लेकिन इन सबके बीच एक जिद भी है—जो कुछ मनुष्य को मनुष्य बनाता है, उसे यथासंभव बचाए रखा जाए।

इसीलिए इस संग्रह को केवल स्मृति या प्रेम का संग्रह कहना उसके काव्य-संसार को सीमित करना होगा। अधिक उपयुक्त होगा कि इसे स्मृति से मनुष्यता तक की यात्रा का काव्य-दस्तावेज कहा जाए—एक ऐसा दस्तावेज जिसमें निजी जीवन की दरारों से अपने समय की बड़ी दरारें भी दिखाई देती हैं।

इस संग्रह की कमियाँ उसकी काव्य-यात्रा के अगले चरण की संभावनाएँ भी बताती हैं। यदि कवि अपनी स्वाभाविक संवेदना को अधिक कठोर संपादन, अधिक सघन बिंब-विधान, अनावश्यक पुनरावृत्तियों से मुक्ति और वक्तव्य के स्थान पर अनुभव की दृश्यात्मकता से जोड़ता है, तो उसकी कविता कहीं अधिक प्रभावशाली रूप ग्रहण कर सकती है।

फिर भी ‘अक्टूबर उस साल’ की साहित्यिक सार्थकता निर्विवाद रूप से इस बात में है कि वह संवेदना को कमजोरी नहीं मानता। आज के ऐसे समय में, जब आत्मीयता स्वयं संदेह के घेरे में है, संबंध उपयोगिता से संचालित हो रहे हैं और सार्वजनिक जीवन की भाषा लगातार अधिक आक्रामक होती जा रही है, यह संग्रह बार-बार मनुष्य के भीतर लौटता है।

और अंततः वही प्रश्न छोड़ जाता है—

हम अपने समय में क्या बचाना चाहते हैं?

कवि का उत्तर स्पष्ट है: टूटता हुआ मन, स्नेह, संवेदना, भरोसा, संबंध और मनुष्य होने की संभावना।

यही ‘अक्टूबर उस साल’ की केंद्रीय काव्य-चिंता है, उसकी सबसे बड़ी शक्ति है और उसकी साहित्यिक पहचान बनने की सबसे प्रबल संभावना भी।


डॉ. गरिमा जोशी 

No comments:

Post a Comment

Share Your Views on this..

समय, स्मृति और मनुष्य की तलाश : ‘अक्टूबर उस साल’ का आलोचनात्मक पुनर्पाठ

  समय, स्मृति और मनुष्य की तलाश : ‘अक्टूबर उस साल’ का आलोचनात्मक पुनर्पाठ समकालीन हिंदी कविता का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि उसने जीवन के ...