सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

मुअज़्ज़मख़ोन का काव्य-संसार: स्त्री-अनुभव, विरह और आत्माभिव्यक्ति का नारीवादी पाठ

 मुअज़्ज़मख़ोन का काव्य-संसार: स्त्री-अनुभव, विरह और आत्माभिव्यक्ति का नारीवादी पाठ

प्रस्तावना

उन्नीसवीं शताब्दी का मध्य एशियाई साहित्यिक परिदृश्य बहुभाषिकता, शास्त्रीय काव्य-परंपरा और गहरे सांस्कृतिक आदान-प्रदान से निर्मित हुआ था। इस साहित्यिक संसार में स्त्री रचनाकारों की उपस्थिति अपेक्षाकृत कम दर्ज की गई, किंतु उपलब्ध रचनाएँ प्रमाणित करती हैं कि महिलाओं ने न केवल शास्त्रीय काव्य-परंपरा को आत्मसात किया, बल्कि उसके भीतर अपने निजी अनुभवों, संवेदनाओं और अस्तित्वगत प्रश्नों के लिए भी स्थान निर्मित किया। मुअज़्ज़मख़ोन मीरसईद क़िज़ी (1833–1917) इसी परंपरा की एक महत्त्वपूर्ण उज़्बेक–फ़ारसी द्विभाषी कवयित्री हैं।


मुअज़्ज़मख़ोन की कविता को केवल प्रेम और विरह की पारंपरिक शास्त्रीय अभिव्यक्ति मानना उनके काव्य के महत्त्व को सीमित करना होगा। उनकी रचनाओं में प्रेम, प्रतीक्षा, वियोग, अकेलापन, मातृत्व, संतान-वियोग, भाग्य, सामाजिक विवशता, धार्मिक आडंबर और आत्मिक मुक्ति जैसे अनेक अनुभव एक-दूसरे से जुड़े हुए दिखाई देते हैं। नारीवादी साहित्यिक दृष्टि से पढ़ने पर उनकी कविता एक ऐसी स्त्री की आवाज़ बनकर सामने आती है जो अपनी पीड़ा को छिपाती नहीं, बल्कि उसे भाषा देती है। यही भाषिक अभिव्यक्ति निजी वेदना को साहित्यिक और सामाजिक अनुभव में परिवर्तित करती है।


जीवन और साहित्यिक परिवेश


मुअज़्ज़मख़ोन मीरसईद क़िज़ी का जन्म 1833 में ख़ुजंद में हुआ और 1917 में जिज़्ज़ाख में उनका निधन हुआ। उनके व्यक्तिगत जीवन से संबंधित विस्तृत दस्तावेज़ उपलब्ध नहीं हैं। यह अभाव स्वयं स्त्री साहित्य के इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण समस्या की ओर संकेत करता है। साहित्य के इतिहास में पुरुष रचनाकारों के जीवन, यात्राओं और रचनात्मक विकास का अपेक्षाकृत विस्तृत अभिलेखन मिलता है, जबकि अनेक प्रतिभाशाली स्त्री रचनाकारों के संबंध में उनकी रचनाएँ ही उनके अस्तित्व की प्रमुख साक्षी बन जाती हैं।


मुअज़्ज़मख़ोन के संदर्भ में उनकी छोटी बहन मुअत्तरख़ोन द्वारा तैयार किया गया ‘बयाज़’ विशेष महत्त्व रखता है। इस हस्तलिखित काव्य-संग्रह में उनकी अनेक कविताएँ सुरक्षित रह सकीं। इस तथ्य को स्त्री साहित्यिक परंपरा के संदर्भ में देखा जाए तो एक स्त्री द्वारा दूसरी स्त्री की रचनात्मक विरासत को संरक्षित करने का यह कार्य अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रतीत होता है। साहित्यिक इतिहास के औपचारिक संस्थानों से बाहर स्त्रियों के बीच विकसित यह संरक्षण-परंपरा स्त्री-साहित्य की वैकल्पिक स्मृति का उदाहरण मानी जा सकती है।


ख़ुजंद का उज़्बेक–फ़ारसी सांस्कृतिक वातावरण उनकी द्विभाषी प्रतिभा के विकास में सहायक रहा। उन्होंने उज़्बेक और फ़ारसी दोनों भाषाओं में काव्य-रचना की। उनकी उपलब्ध रचनाओं से शास्त्रीय साहित्य, धार्मिक-दार्शनिक चिंतन और अरूज़ छंद के उनके गंभीर ज्ञान का परिचय मिलता है। उनके दीवान-क्रम में एक हज़ार से अधिक काव्य-पंक्तियाँ उपलब्ध होना उनकी व्यापक रचनात्मक सक्रियता का प्रमाण है।


स्त्री-अनुभव की केंद्रीयता


मुअज़्ज़मख़ोन की कविता की सबसे उल्लेखनीय विशेषता स्त्री के निजी भावनात्मक अनुभवों की निर्भीक अभिव्यक्ति है। उनकी कविता में बोलने वाली स्त्री प्रेम करती है, प्रतीक्षा करती है, शिकायत करती है, रोती है, स्मरण करती है और अपने अस्तित्व की पीड़ा को स्वयं व्यक्त करती है। वह केवल किसी पुरुष कवि की कल्पना में निर्मित ‘प्रेयसी’ नहीं है; वह स्वयं प्रेम करने वाली चेतना है।


यह अंतर नारीवादी पाठ की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। शास्त्रीय प्रेम-काव्य में स्त्री प्रायः सौंदर्य की वस्तु या पुरुष प्रेमी की कामना का केंद्र बनती रही है। मुअज़्ज़मख़ोन के यहाँ स्त्री स्वयं इच्छा और अनुभूति की कर्ता बन जाती है। वह प्रिय को संबोधित करती है और अपने प्रेम की तीव्रता को सार्वजनिक काव्यात्मक भाषा प्रदान करती है। इस प्रकार उनकी कविता स्त्री की भावनात्मक स्वायत्तता को स्थापित करती है।


उनकी कविता में ‘मैं’ का बार-बार उपस्थित होना इसी आत्म-अभिव्यक्ति का संकेत है। यह ‘मैं’ केवल व्यक्तिगत नहीं रह जाता, बल्कि उस व्यापक स्त्री-अनुभव का प्रतिनिधि बन जाता है जिसमें प्रेम के साथ प्रतीक्षा, सामाजिक अकेलापन और भावनात्मक असुरक्षा जुड़ी हुई है।


विरह: प्रेम से आगे स्त्री-अस्तित्व की पीड़ा


मुअज़्ज़मख़ोन की कविता में विरह एक केंद्रीय भाव है। किंतु उनका विरह केवल प्रिय से दूरी की पारंपरिक काव्यगत स्थिति नहीं है। वह धीरे-धीरे स्त्री के अस्तित्वगत अकेलेपन का रूप ग्रहण कर लेता है। उनकी कविता में बार-बार आने वाला रोना, जागना, प्रतीक्षा करना, तड़पना और दुर्बल होना उस मानसिक संसार को अभिव्यक्त करता है जिसे सामाजिक इतिहास प्रायः दर्ज नहीं करता।


उनकी एक ग़ज़ल में कवयित्री कहती हैं कि फ़लक के अत्याचार से उनके हृदय को प्रत्येक क्षण असंख्य पीड़ाएँ पहुँचती हैं। गुलाब की आशा में उनके हिस्से काँटे आते हैं। यहाँ गुलाब और काँटे का शास्त्रीय प्रतीक स्त्री-अनुभव से जुड़कर नया अर्थ ग्रहण करता है। स्त्री प्रेम और सौंदर्य की आकांक्षा करती है, लेकिन सामाजिक और नियतिगत परिस्थितियाँ उसके हिस्से में पीड़ा रखती हैं।


“विरह ने मुझे पागल बना दिया” जैसी अभिव्यक्ति भावनात्मक विघटन का अत्यंत सशक्त चित्र प्रस्तुत करती है। कवयित्री स्वयं की तुलना मजनूँ से करती हैं। यह तुलना विशेष रूप से उल्लेखनीय है। शास्त्रीय प्रेम-परंपरा में मजनूँ पुरुष प्रेमी और चरम प्रेम-विक्षिप्तता का प्रतीक है। मुअज़्ज़मख़ोन स्वयं को मजनूँ की स्थिति में रखकर प्रेम के उस अधिकार को स्त्री के लिए भी अर्जित करती हैं। यहाँ स्त्री केवल लैला नहीं है जिसकी ओर प्रेम किया जाता है; वह मजनूँ भी हो सकती है—अर्थात प्रेम करने वाली, तड़पने वाली और अपने प्रेम को संसार के सामने घोषित करने वाली स्वतंत्र भाव-सत्ता।


स्त्री की इच्छा और प्रेम की सक्रियता


“मेरा दिलबर याद आते ही” से आरंभ होने वाली कविता मुअज़्ज़मख़ोन के काव्य में स्त्री की सक्रिय प्रेम-चेतना का सुंदर उदाहरण है। प्रिय के स्मरण से शरीर, प्राण और चेतना में उत्पन्न उल्लास को कवयित्री अत्यंत जीवंत बिंबों के माध्यम से व्यक्त करती हैं। तोता, हुदहुद, बुलबुल, गुलिस्तान, सरू, हिरन, मोती और स्वर्ग—समूची प्रकृति प्रिय के सौंदर्य से आंदोलित दिखाई देती है।


नारीवादी दृष्टि से इस कविता का महत्त्व इसलिए बढ़ जाता है कि यहाँ स्त्री अपनी इच्छा को दबाती नहीं है। वह प्रिय के सौंदर्य का वर्णन करती है। पारंपरिक पुरुष-केंद्रित काव्य में पुरुष दृष्टि स्त्री-सौंदर्य का वर्णन करती रही है; मुअज़्ज़मख़ोन के यहाँ दृष्टि का यह संबंध उलट जाता है। स्त्री स्वयं देखने वाली और सौंदर्य का मूल्यांकन करने वाली चेतना बन जाती है।


यहाँ स्त्री की दृष्टि निष्क्रिय नहीं, बल्कि सृजनात्मक है। वह प्रिय के सौंदर्य को देखकर केवल प्रभावित नहीं होती; अपनी भाषा के माध्यम से उसे एक विराट सौंदर्यात्मक घटना में बदल देती है। इस प्रकार कवयित्री की वाणी स्त्री की इच्छा और सौंदर्यबोध को वैधता प्रदान करती है।


पुनरावृत्ति की काव्य-भाषा और स्त्री की व्यथा


“कमज़ोर ही, लगातार कमज़ोर” कविता अपनी विशिष्ट पुनरावृत्तिमूलक संरचना के कारण अत्यंत प्रभावशाली है। ‘हृदयव्यथिता’, ‘इंतिज़ार’, ‘हर बहार’, ‘जान निसार’, ‘बेक़रार’ और ‘रिहा करो’ जैसे पदों की पुनरावृत्ति कविता को गीतात्मक लय प्रदान करती है, किंतु यह केवल अलंकारिक प्रयोग नहीं है। पुनरावृत्ति यहाँ पीड़ा की निरंतरता का रूपक बन जाती है।


जब कवयित्री बार-बार “रिहा करो” कहती हैं, तब यह अभिव्यक्ति प्रेम-विरह की सीमा से आगे जाती हुई प्रतीत होती है। इसे स्त्री की व्यापक मुक्ति-कामना के रूप में भी पढ़ा जा सकता है। वह किससे रिहाई चाहती है—विरह से, निर्धनता से, अकेलेपन से, भाग्य से या सामाजिक बंधनों से? कविता इसका कोई एक निश्चित उत्तर नहीं देती। यही अनिश्चितता उसके नारीवादी अर्थ को विस्तृत करती है।


स्त्री के जीवन में कई प्रकार की पराधीनताएँ एक-दूसरे से जुड़ी हो सकती हैं। इसलिए “रिहा करो” व्यक्तिगत पुकार होते हुए भी सामूहिक स्त्री-अनुभव की प्रतिध्वनि बन सकती है।


मातृत्व और संतान-वियोग


मुअज़्ज़मख़ोन के काव्य में संतान-वियोग का संकेत उनकी कविता को विशेष रूप से मार्मिक बनाता है। “ऐ मुअज़्ज़म, तेरी दो संतान...” जैसी पंक्ति कवयित्री के निजी जीवन की किसी गहरी त्रासदी की ओर संकेत करती प्रतीत होती है, यद्यपि पर्याप्त जीवनीपरक प्रमाण के अभाव में इसे निश्चित ऐतिहासिक तथ्य के रूप में स्वीकार करना उचित नहीं होगा।


फिर भी काव्यगत स्तर पर यह पंक्ति मातृत्व की पीड़ा को सामने लाती है। यहाँ स्त्री का अनुभव केवल प्रेयसी के रूप में सीमित नहीं है; वह माँ भी है। प्रेमिका का विरह और माँ का संतान-वियोग एक ही भाव-संसार में मिलकर स्त्री-पीड़ा की बहुस्तरीय संरचना निर्मित करते हैं।


नारीवादी साहित्यिक आलोचना के लिए यह विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है क्योंकि स्त्री-अनुभव को किसी एक सामाजिक भूमिका में सीमित नहीं किया जा सकता। मुअज़्ज़मख़ोन की काव्य-नायिका प्रेमिका, विरहिणी, माँ, साधिका और चिंतनशील मनुष्य—सभी रूपों में उपस्थित होती है।


‘फ़लक’ और पितृसत्तात्मक नियति का प्रश्न


मुअज़्ज़मख़ोन के काव्य में ‘फ़लक’ बार-बार उपस्थित होने वाला महत्त्वपूर्ण प्रतीक है। शास्त्रीय काव्य-परंपरा में फ़लक समय, भाग्य और नियति की कठोरता का प्रतीक रहा है। मुअज़्ज़मख़ोन भी अपने दुःख के लिए फ़लक से शिकायत करती हैं।


नारीवादी पाठ में ‘फ़लक’ को केवल दार्शनिक भाग्य के रूप में पढ़ना पर्याप्त नहीं है। वह उन अदृश्य संरचनाओं का भी रूपक बन सकता है जो स्त्री के जीवन को नियंत्रित करती हैं। स्त्री की पीड़ा का कारण कई बार किसी एक व्यक्ति में नहीं, बल्कि सामाजिक व्यवस्था, पारिवारिक अपेक्षाओं और ऐतिहासिक परिस्थितियों में निहित होता है। ऐसी परिस्थितियाँ व्यक्ति को ‘नियति’ की तरह अपरिवर्तनीय प्रतीत होती हैं।


मुअज़्ज़मख़ोन फ़लक से शिकायत करती हैं, लेकिन उनकी कविता केवल समर्पण की कविता नहीं है। शिकायत करना स्वयं प्रतिरोध की पहली भाषिक अवस्था है। मौन रहने के स्थान पर पीड़ा को नाम देना सत्ता और नियति के सामने अपनी उपस्थिति दर्ज करना है।


देह, मन और स्त्री की भावनात्मक सत्ता


मुअज़्ज़मख़ोन की कविता में स्त्री का शरीर भी महत्त्वपूर्ण है। विरह केवल मानसिक अवस्था नहीं रहता; वह शरीर पर प्रभाव डालता है। शरीर कमज़ोर होता है, काँपता है, नींद खो देता है और आँसुओं में डूब जाता है। इस प्रकार कवयित्री मन और शरीर को अलग-अलग नहीं देखतीं।


स्त्री के शरीर की यह अभिव्यक्ति सौंदर्य-प्रदर्शन से भिन्न है। यहाँ शरीर पुरुष-दृष्टि के लिए प्रस्तुत वस्तु नहीं, बल्कि अनुभव करने वाला शरीर है। वह प्रेम, पीड़ा और स्मृति का वाहक है। नारीवादी आलोचना में इसे स्त्री-देह की विषयपरकता के रूप में देखा जा सकता है—अर्थात स्त्री अपने शरीर के बारे में स्वयं बोलती है।


“मेरा तन सदा बूँद की तरह थरथराता है” जैसी अभिव्यक्ति इस देहगत अनुभव को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से सामने लाती है। स्त्री की भावनात्मक पीड़ा अमूर्त नहीं रहती; वह शरीर में दर्ज होती है।


नैतिक दर्शन और आत्म-शासन


मुअज़्ज़मख़ोन की रचनात्मकता केवल प्रेम और विरह तक सीमित नहीं है। उनकी नैतिक-दर्शनपरक कविताएँ उनके व्यापक चिंतन का प्रमाण हैं। हृदय को शरीर का राजा, बुद्धि को मंत्री और अन्य अंगों को प्रजा मानने वाला रूपक उनके नैतिक चिंतन की परिपक्वता को व्यक्त करता है।

इस रूपक में आत्म-शासन की एक महत्त्वपूर्ण अवधारणा निहित है। यदि हृदय राजा है तो उसे बुद्धि के परामर्श से न्यायपूर्ण शासन करना चाहिए। मनुष्य का आंतरिक संसार भी एक राज्य है और उसकी नैतिकता इस बात पर निर्भर करती है कि इच्छा, बुद्धि और कर्म के बीच कैसा संतुलन स्थापित होता है।

स्त्री कवयित्री द्वारा नैतिक और दार्शनिक विषयों पर अधिकारपूर्वक विचार करना स्वयं महत्त्वपूर्ण है। यह उस धारणा को चुनौती देता है जिसमें स्त्री-लेखन को केवल निजी भावुकता तक सीमित करके देखा जाता है। मुअज़्ज़मख़ोन निजी अनुभव से दार्शनिक चिंतन की ओर बढ़ती हैं और इस प्रकार अपनी बौद्धिक सत्ता स्थापित करती हैं।


धार्मिक पाखंड और स्त्री की आध्यात्मिक चेतना

मुअज़्ज़मख़ोन की कविता में धार्मिक-नैतिक चेतना के साथ बाहरी आडंबर की आलोचना भी दिखाई देती है। उनकी दृष्टि में वास्तविक आध्यात्मिकता बाहरी प्रदर्शन में नहीं, बल्कि हृदय की शुद्धता और नैतिक आचरण में निहित है। यह विचार सूफ़ी परंपरा के उस मूल भाव से जुड़ता है जिसमें ईश्वर तक पहुँचने के लिए आंतरिक प्रेम और आत्मशुद्धि को प्राथमिकता दी जाती है।

नारीवादी दृष्टि से यह आध्यात्मिकता स्त्री के लिए एक वैकल्पिक आत्मिक क्षेत्र भी निर्मित करती है। सामाजिक संस्थाएँ भले ही स्त्री की स्वतंत्रता को सीमित करें, लेकिन उसकी आंतरिक चेतना और ईश्वर से उसका व्यक्तिगत संबंध किसी बाहरी मध्यस्थता पर निर्भर नहीं है। इस प्रकार आध्यात्मिक अनुभव स्त्री के लिए आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता का एक माध्यम बन सकता है।


निजी पीड़ा से सार्वभौमिक अनुभव तक


मुअज़्ज़मख़ोन की सबसे बड़ी काव्यगत उपलब्धियों में एक यह है कि वे व्यक्तिगत पीड़ा को व्यापक मानवीय अनुभव में बदल देती हैं। उनकी कविता में एक विशिष्ट स्त्री का जीवन बोलता है, किंतु उसकी पीड़ा केवल उसी तक सीमित नहीं रहती। प्रेम में असफलता, प्रतीक्षा, अकेलापन, मातृत्व की वेदना और मुक्ति की आकांक्षा सार्वभौमिक मानवीय अनुभवों से जुड़ जाते हैं।

फिर भी इस सार्वभौमिकता को स्त्री-अनुभव की विशिष्टता मिटाकर नहीं समझना चाहिए। मुअज़्ज़मख़ोन का महत्त्व इसी में है कि वे सार्वभौमिक मानवीय भावनाओं को एक स्त्री की अपनी आवाज़ में व्यक्त करती हैं। उनकी कविता यह स्थापित करती है कि स्त्री का निजी संसार भी साहित्य, दर्शन और इतिहास का वैध विषय है।


काव्य-भाषा और शिल्प

मुअज़्ज़मख़ोन की ग़ज़लों में भाषा की प्रवाहपूर्णता, भाव की स्पष्टता और अभिव्यक्ति की सटीकता उल्लेखनीय है। वे शास्त्रीय प्रतीकों—गुलाब, काँटा, बुलबुल, चमन, सबा, सरू, हिरन, फ़लक, साक़ी और शराब—का प्रयोग करती हैं, किंतु इन्हें अपने निजी अनुभवों से जोड़कर नया भावात्मक अर्थ प्रदान करती हैं।

उनकी पुनरावृत्ति-प्रधान कविताओं में लोकगीत जैसी सहजता दिखाई देती है। लगातार दोहराए जाने वाले शब्द पीड़ा की तीव्रता को बढ़ाते हैं और पाठक को कवयित्री की मनःस्थिति के निकट ले जाते हैं। यह शिल्प स्त्री की ऐसी आवाज़ निर्मित करता है जो मानो बार-बार अपनी बात कहकर सुने जाने की माँग कर रही हो।

उनकी द्विभाषिकता भी महत्त्वपूर्ण है। उज़्बेक और फ़ारसी दोनों भाषाओं में रचना करके उन्होंने दो साहित्यिक परंपराओं के बीच संवाद स्थापित किया। उनकी कविता मध्य एशिया के बहुभाषिक साहित्यिक संसार और उसमें स्त्रियों की सक्रिय भागीदारी का महत्त्वपूर्ण प्रमाण है।


निष्कर्ष

मुअज़्ज़मख़ोन मीरसईद क़िज़ी का काव्य उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के आरंभिक मध्य एशियाई स्त्री-लेखन की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। उनकी कविता शास्त्रीय ग़ज़ल की परंपरा में रहते हुए भी स्त्री के निजी अनुभवों को अभिव्यक्ति का केंद्रीय स्थान प्रदान करती है। प्रेम, विरह, अकेलापन, प्रतीक्षा, मातृत्व, संतान-वियोग और मुक्ति की आकांक्षा उनके काव्य में स्त्री-अस्तित्व के विविध आयामों को उद्घाटित करते हैं।


नारीवादी साहित्यिक दृष्टि से उनकी सबसे महत्त्वपूर्ण उपलब्धि स्त्री को काव्य की वस्तु से काव्य की वक्ता में परिवर्तित करना है। उनकी स्त्री प्रेम किए जाने की प्रतीक्षा मात्र नहीं करती; वह स्वयं प्रेम करती है। वह प्रिय को देखती है, उसके सौंदर्य का वर्णन करती है, अपनी इच्छा व्यक्त करती है और अपने विरह की कथा स्वयं लिखती है। वह नियति से शिकायत करती है और अपनी पीड़ा को मौन में विलीन नहीं होने देती।

विशेष रूप से “रिहा करो” जैसी पुकार उनके काव्य में व्यापक अर्थ ग्रहण करती है। यह विरह से मुक्ति की कामना है, लेकिन इसे स्त्री-अस्तित्व की उन अनेक अदृश्य सीमाओं से मुक्ति की आकांक्षा के रूप में भी पढ़ा जा सकता है जिन्होंने ऐतिहासिक रूप से स्त्री के जीवन और उसकी अभिव्यक्ति को नियंत्रित किया।

इस दृष्टि से मुअज़्ज़मख़ोन की कविता केवल एक कवयित्री की निजी भावनाओं का दस्तावेज़ नहीं है। वह स्त्री की स्मृति, इच्छा, पीड़ा और आत्मचेतना का साहित्यिक अभिलेख है। उनकी छोटी बहन मुअत्तरख़ोन के बयाज़ में सुरक्षित उनकी कविताएँ इस बात का भी प्रतीक हैं कि स्त्रियों की साहित्यिक स्मृति अनेक बार औपचारिक इतिहास से बाहर स्त्रियों द्वारा ही बचाई गई है।

अतः उज़्बेक महिला साहित्य के इतिहास में मुअज़्ज़मख़ोन का मूल्यांकन एक शास्त्रीय द्विभाषी कवयित्री के साथ-साथ ऐसी स्त्री-स्वर की प्रतिनिधि के रूप में किया जाना चाहिए जिसने व्यक्तिगत पीड़ा को काव्यात्मक गरिमा, दार्शनिक गहराई और मानवीय सार्वभौमिकता प्रदान की। उनका काव्य इस सत्य की पुष्टि करता है कि स्त्री का निजी अनुभव भी इतिहास है, उसका विरह भी ज्ञान है और उसकी अपनी आवाज़ साहित्यिक परंपरा के निर्माण में उतनी ही महत्त्वपूर्ण है जितनी किसी स्थापित पुरुष रचनाकार की।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

Trafficking and india

Factbook on Global Sexual Exploitation India Trafficking As of February 1998, there were 200 Bangladeshi children and women awaiting repatriation in different Indian shelters. ("Boys, rescued in India while being smuggled to become jockeys in camel races," www.elsiglo.com, 19 February 1998) India, along with Thailand and the Philippines, has 1.3 million children in its sex-trade centers. The children come from relatively poorer areas and are trafficked to relatively richer ones. (Soma Wadhwa, "For sale childhood," Outlook, 1998) In cross border trafficking, India is a sending, receiving and transit nation. Receiving children from Bangladesh and Nepal and sending women and children to Middle Eastern nations is a daily occurrence. (Executive Director of SANLAAP, Indrani Sinha, Paper on Globaliation and Human Rights" India and Paksitan are the main destinations for children under 16 who are trafficked in south Asia. (Masako Iijima, "S. Asia ...

kathadesh on internet

साहित्य, संस्कृति और कला का समग्र मासिक कवि‍तायें 1.  मधुवेश: 2.  सेर्गेई एसेनिन: रूसी कविता का अमर लोकगायक : उमा         आलेख 3  हुसैन प्रसंग : प्रभु जोशी 4. सब कुछ पूछो यह मत पूछो आम आदमी कैसा है : अविनाश . उपन्‍यास वजह बेगानगी नहीं मालूम : विनोद कुमार श्रीवास्तव संस्मरण 5. अज्ञेय के तीन पत्र राजेन्द्र मिश्र के नाम कहानि‍यां 6. साक्षी : संजीव कुमार 7. नाइजीरियाई कहानी : नाम में क्या धरा है: काची ए. ओजुम्बा 8. अपने-अपने डर : नवरत्न पांडे 9. साड़ू : : हरदर्शन सहगल 10 सन् 1945 का एक रविवार :  प्रभाकर चौबे 11 तल-घर :  दीपक शर्मा 12 शहादत दिलाने वाले : सआदत हसन मंटो दलित प्रश्न 13. केरल में दलित, दलित आन्दोलन और दलित साहित्य : बजरंग बिहारी तिवारी रंगमंच 14. महाभोज की पहली प्रस्तुति :  देवेन्द्र राज अंकुर 15. लोक से सम्बन्धों की पड़ताल : हृषीकेश सुलभ प्रसंगवश व्यक्तिगत और राजन...

अमरकांत : संक्षिप्त जीवन वृत्त

       कथाकार अमरकांत : संवेदना और शिल्प   कथाकार अमरकांत पर शोध प्रबंध अध्याय - 1   क) अमरकांत : संक्षिप्त जीवन वृत्त 1. जन्म 2. परिवार 3. शिक्षा-दीक्षा 4. रहन-सहन और स्वभाव 5. सेवा मार्ग 6. संघर्ष 7. व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताएँ 8. पुरस्कार एवम् सम्मान ख) अमरकांत : विचारधारा एवम् साहित्यिक दृष्टि 1. तरुण कवि के रूप में 2. साहित्यिक वातावरण 3. साहित्यिक प्रेरणा स्रोत 4. प्रभावित करने वाली विचार धाराएँ 5. कथा लेखन क) कहानी ख) उपन्यास 6. साहित्यिक दृष्टि  अमरकांत : संक्षिप्त जीवन वृत्त 1. जन्म :        उत्तर प्रदेश के सबसे पूर्वी जिले बलिया में एक तहसील है - 'रसड़ा`। इस रसड़ा तहसील के सुपरिचित गाँव 'नगरा` से सटा हुआ एक छोटा सा गाँव और है। यह गाँव है - 'भगमलपुर`। देखने में यह गाँव नगरा गाँव का टोला लगता है।        भगमलपुर गाँव...