Sunday, 30 August 2026

वंदे मातरम् के 150 वर्ष और राष्ट्रचेतना

 वंदे मातरम्आधुनिक भारत की उन विरल सांस्कृतिक रचनाओं में  से एक है  जिनका जीवन साहित्य से आरम्भ होकर इतिहास, राजनीति, संगीत, जन-आंदोलन, संवैधानिक मर्यादा और अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक संवाद तक फैला हुआ है। बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने इसे उन्नीसवीं शताब्दी के उस दौर में रचा, जब औपनिवेशिक शासन के बीच भारतीय समाज अपनी सामूहिक पहचान और आत्मसम्मान की नई भाषा खोज रहा था। इस गीत ने धरती, जल, अन्न, हरियाली, चाँदनी, भाषा और मातृत्व को एक ऐसे बिंब में जोड़ा जिसमें देश कोई निर्जीव भूखंड नहीं, बल्कि जीवन देने वाली उपस्थिति बन गया। यही काव्यात्मक शक्ति आगे चलकर स्वदेशी आंदोलन में प्रतिरोध की आवाज़ बनी। रवीन्द्रनाथ ठाकुर के गायन, श्रीअरविंद के अनुवाद और स्वतंत्रता सेनानियों के सार्वजनिक उच्चारण ने इसे भाषायी एवं प्रादेशिक सीमाओं से बाहर पहुँचाया। स्वतंत्र भारत में 24 जनवरी 1950 को संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने इसके ऐतिहासिक योगदान को रेखांकित करते हुए इसेजन गण मनके समान सम्मान और समान दर्जा देने की घोषणा की। वर्ष 2025–26 में 150वीं वर्षगाँठ का राष्ट्रीय आयोजन, सरकारी समारोहों के लिए विस्तृत गायन-प्रोटोकॉल तथा 2026 का कानूनी संशोधन इसके सार्वजनिक जीवन में एक नया चरण जोड़ते हैं। इसकी दीर्घजीविता केवल राष्ट्रभावना की तीव्रता में नहीं, बल्कि प्रकृति, भाषा, स्मृति, आत्मनिर्भरता और नागरिक उत्तरदायित्व को एक साथ जोड़ने की क्षमता में निहित है।

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वंदे मातरम् के 150 वर्ष और राष्ट्रचेतना

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