Sunday, 30 August 2026

कृत्रिम बुद्धिमत्ता का भविष्य और भाषायी शिक्षा की बदलती दिशाएँ एक मानव-केंद्रित, बहुभाषी और उत्तरदायी दृष्टि

 

भविष्य अध्ययन • भाषा शिक्षा • सार्वजनिक नीति

कृत्रिम बुद्धिमत्ता का भविष्य
और भाषायी शिक्षा की बदलती दिशाएँ

एक मानव-केंद्रित, बहुभाषी और उत्तरदायी दृष्टि

डॉ. मनीष कुमार सी. मिश्रा

एसोसिएट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग

के. एम. अग्रवाल महाविद्यालय, कल्याण (पश्चिम), महाराष्ट्र

पूर्व विज़िटिंग प्रोफेसर एवं ICCR हिन्दी पीठ
ताशकंद स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ ओरिएंटल स्टडीज़, ताशकंद, उज़्बेकिस्तान

अगस्त 2026

सारांश

कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने भाषा और शिक्षा के संबंध को एक नए ऐतिहासिक मोड़ पर ला खड़ा किया है। भाषा-शिक्षण अब केवल कक्षा, पाठ्यपुस्तक, व्याकरण-अभ्यास और शिक्षक के प्रत्यक्ष निर्देश तक सीमित नहीं है; वह संवादात्मक चैटबॉट, स्वचालित वाक्-पहचान, उच्चारण-विश्लेषण, मशीन अनुवाद, अनुकूली अधिगम, बहुभाषी सामग्री-निर्माण तथा तत्काल प्रतिपुष्टि से जुड़ा हुआ एक विस्तृत डिजिटल परिवेश बन रहा है। इस परिवर्तन में बड़ी संभावनाएँ हैं—व्यक्तिगत गति से सीखना, दूरदराज के विद्यार्थियों तक गुणवत्तापूर्ण सामग्री पहुँचाना, दिव्यांग विद्यार्थियों को सहायक तकनीक देना, कम संसाधन वाली भाषाओं का डिजिटल अभिलेखन करना और बहुभाषी समाज में ज्ञान की असमानता घटाना। इसके साथ ही गंभीर जोखिम भी उपस्थित हैं: तथ्यगत त्रुटि, भाषायी और सांस्कृतिक पक्षपात, निजी डेटा का अनुचित उपयोग, साहित्यिक चोरी, विचार और अभिव्यक्ति की एकरूपता, शिक्षक की पेशेवर स्वायत्तता में कमी तथा बड़ी भाषाओं के सामने अल्पसंसाधित भाषाओं का और अधिक हाशियाकरण।

यह आलेख भाषायी शिक्षा के भविष्य को तकनीकी नियतिवाद के बजाय मानव-केंद्रित दृष्टि से देखता है। इसका मूल तर्क है कि एआई शिक्षक का प्रतिस्थापन नहीं, बल्कि शिक्षक-निर्देशित सहायक होना चाहिए; भाषा को केवल सूचना के संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति, स्मृति, पहचान, संवेदना और सामाजिक संबंध की जीवित व्यवस्था समझा जाना चाहिए। आलेख में भाषा-अधिगम के चार कौशलों, मूल्यांकन, अनुवाद, भारतीय भाषाओं, उच्च शिक्षा, शिक्षक-प्रशिक्षण, शैक्षणिक ईमानदारी और नीतिगत शासन पर विस्तार से विचार करते हुए 2030 तथा 2040 के संभावित परिदृश्य प्रस्तुत किए गए हैं। अंततः विद्यालयों, विश्वविद्यालयों और सरकार के लिए चरणबद्ध कार्ययोजना प्रस्तावित की गई है, ताकि कृत्रिम बुद्धिमत्ता भाषायी विविधता और मानवीय सृजनशीलता की सहयोगी बने, उनका स्थानापन्न नहीं।

कुंजी शब्द: कृत्रिम बुद्धिमत्ता, भाषायी शिक्षा, हिन्दी, बहुभाषिकता, जनरेटिव एआई, मशीन अनुवाद, शिक्षक, डिजिटल नैतिकता, भारतीय भाषाएँ, भविष्य की शिक्षा

चयनित प्रामाणिक उद्धरण

UNESCO की जनरेटिव एआई मार्गदर्शिका शिक्षा में तकनीक के लिए “human-centred vision” अर्थात मानव-केंद्रित दृष्टि की माँग करती है। [1] भारतीय राष्ट्रीय शिक्षा नीति प्रारंभिक शिक्षा के लिए “home language/mother tongue/local language/regional language” को महत्त्व देती है। [2] राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा संबंधी आधिकारिक घोषणा विद्यार्थियों से “proficient in at least three languages” होने की अपेक्षा रखती है, जिनमें कम से कम दो भारतीय भाषाएँ हों। [3] UNESCO की एआई नैतिकता अनुशंसा के केंद्र में “human rights and human dignity” हैं। [13] ये छोटे उद्धरण इस आलेख के चार मूल आधार स्पष्ट करते हैं—मानव-केंद्रितता, मातृभाषा, बहुभाषिक क्षमता और मानवीय गरिमा। मूल दस्तावेज़ों के पूर्ण विवरण क्रमांकित संदर्भ-सूची में दिए गए हैं।

आलेख की पद्धति और सीमा

यह आलेख वर्णनात्मक और आलोचनात्मक समीक्षा-पद्धति पर आधारित है। नीतिगत तथ्यों के लिए UNESCO, UNICEF, यूरोपीय संघ, भारत सरकार, शिक्षा मंत्रालय, MeitY, PIB, NCERT और BHASHINI के मूल दस्तावेज़ों को प्राथमिकता दी गई है। भाषा-अधिगम के प्रभाव संबंधी विवेचन में समकक्ष-समीक्षित हस्तक्षेप अध्ययन और व्यवस्थित समीक्षाओं का उपयोग किया गया है। [10–12, 17–19] तकनीक के लाभ को सार्वभौमिक या निश्चित परिणाम नहीं माना गया, क्योंकि शोध का बड़ा भाग अंग्रेज़ी को विदेशी या दूसरी भाषा के रूप में सीखने वाले सीमित समूहों और अपेक्षाकृत छोटी अवधि के प्रयोगों पर आधारित है। निष्कर्षों को हिन्दी तथा भारत की अल्पसंसाधित भाषाओं पर लागू करते समय स्थानीय परीक्षण आवश्यक है।

आलेख में भविष्य के परिदृश्य प्रमाणित वर्तमान प्रवृत्तियों पर आधारित विश्लेषणात्मक अनुमान हैं, तथ्यात्मक भविष्यवाणी नहीं। 2030 और 2040 के उल्लेख का उद्देश्य नीति-निर्णयों के संभावित परिणाम स्पष्ट करना है। IndiaAI के वित्तीय आँकड़े आधिकारिक सरकारी घोषणाओं से लिए गए हैं। [15–16] दस्तावेज़ का चार्ट राशि को ₹ करोड़ में दिखाता है; यह दावा नहीं करता कि पूरा बजट भाषायी शिक्षा के लिए निर्धारित है। वह उस व्यापक राष्ट्रीय एआई अवसंरचना का संदर्भ प्रस्तुत करता है जिससे भारतीय भाषा-प्रौद्योगिकी और शैक्षणिक अनुप्रयोग लाभ ले सकते हैं। UNESCO की वैश्विक मार्गदर्शिकाओं को भी भारतीय संघीय व्यवस्था, स्थानीय भाषाओं, डिजिटल पहुँच और संस्थागत क्षमता के अनुसार अनुकूलित करना होगा। [1, 5–6, 13–14, 20]

जरूरी तकनीकी शब्दों का सरल अर्थ

आलेख में कुछ तकनीकी शब्दों का आना जरूरी है। उनका सरल अर्थ यहाँ दिया जा रहा है। जनरेटिव एआई (Generative AI) निर्देश मिलने पर नया पाठ, आवाज़, चित्र या दूसरी सामग्री बनाता है। बड़ा भाषा मॉडल (Large Language Model—LLM) बहुत अधिक लिखित सामग्री से भाषा के ढाँचे सीखकर उत्तर तैयार करता है। प्राकृतिक भाषा प्रसंस्करण (Natural Language Processing—NLP) कम्प्यूटर द्वारा मानवीय भाषा को पढ़ने, सुनने या बनाने की तकनीक है। व्यक्तिगत सीखना (personalised/adaptive learning) विद्यार्थी की जरूरत और गति के अनुसार अभ्यास बदलना है।

कई माध्यमों वाला एआई (multimodal AI) पाठ, आवाज़, चित्र और वीडियो जैसे एक से अधिक माध्यमों पर काम करता है। कम-संसाधन वाली भाषा (low-resource language) वह भाषा है जिसके लिए डिजिटल पाठ, आवाज़ और जाँचा हुआ डेटा कम उपलब्ध है। कृत्रिम प्रशिक्षण-सामग्री (synthetic data) मशीन द्वारा बनाई गई उदाहरण-सामग्री है। एआई एजेंट (AI agent) किसी लक्ष्य के लिए कई जुड़े काम क्रम से कर सकता है। पक्षपात (bias) किसी भाषा या समूह के साथ बार-बार होने वाला अनुचित फर्क है। गलत लेकिन विश्वासपूर्ण उत्तर (hallucination) वह स्थिति है जिसमें एआई तथ्य या स्रोत गढ़कर भी उसे सही की तरह प्रस्तुत करता है।

1. प्रस्तावना: भाषा, मनुष्य और बुद्धिमान मशीन का नया संबंध

मानव सभ्यता के विकास में भाषा ने केवल विचारों के आदान-प्रदान का कार्य नहीं किया; उसने मनुष्य को स्मृति, इतिहास, ज्ञान, समुदाय और आत्मबोध प्रदान किया। मनुष्य संसार को जिन नामों, अवधारणाओं, कथाओं और रूपकों के माध्यम से समझता है, वे भाषा में निर्मित होते हैं। इसलिए भाषायी शिक्षा का प्रश्न मूलतः यह है कि नई पीढ़ी किस प्रकार संसार को समझेगी, दूसरों से संवाद करेगी, अपने अनुभव को अभिव्यक्त करेगी और भिन्नताओं के साथ सह-अस्तित्व सीखेगी। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के आगमन ने इसी प्रक्रिया के बीच एक ऐसी मशीन को स्थापित कर दिया है जो मानवीय भाषा को पहचान सकती है, उसका सांख्यिकीय विश्लेषण कर सकती है, प्रश्नों के उत्तर दे सकती है, अनुवाद कर सकती है, पाठ और आवाज़ उत्पन्न कर सकती है तथा उपयोगकर्ता के स्तर के अनुसार अभ्यास भी बना सकती है।

यह परिवर्तन मुद्रण, रेडियो, टेलीविजन, भाषा-प्रयोगशाला और इंटरनेट से आए परिवर्तनों से जुड़ा अवश्य है, पर उनसे भिन्न भी है। पूर्ववर्ती माध्यम मुख्यतः पहले से निर्मित सामग्री पहुँचाते थे; जनरेटिव एआई उपयोगकर्ता के निर्देश पर उसी क्षण नया पाठ, संवाद, उदाहरण या स्पष्टीकरण रचता हुआ दिखाई देता है। विद्यार्थी अब किसी अपरिचित शब्द का अर्थ ही नहीं पूछता, बल्कि कह सकता है कि उस शब्द को दसवीं कक्षा के स्तर पर समझाओ, पाँच उदाहरण दो, मराठी से हिन्दी की तुलना करो, फिर एक लघु परीक्षा बनाओ और मेरी त्रुटियों के आधार पर अगला अभ्यास तैयार करो। इस संवादात्मकता के कारण एआई उपकरण शिक्षण-सहायक, अभ्यास-साथी, संपादक, अनुवादक और कभी-कभी आभासी शिक्षक का रूप ग्रहण करने लगे हैं।

फिर भी मशीन की भाषायी दक्षता को मानवीय समझ मान लेना गंभीर भूल होगी। बड़े भाषा मॉडल विशाल पाठ-संग्रहों से शब्दों और वाक्यांशों के संबंध सीखते हैं तथा संभाव्यता के आधार पर उत्तर बनाते हैं। वे प्रभावशाली भाषा में असत्य तथ्य दे सकते हैं, किसी संस्कृति की सूक्ष्मता खो सकते हैं, रूढ़ धारणाओं को दोहरा सकते हैं और स्रोत का काल्पनिक उल्लेख कर सकते हैं। भाषा की तरलता यहाँ विश्वसनीयता का प्रमाण नहीं है। अतः भविष्य की भाषायी शिक्षा को दोहरी चुनौती स्वीकार करनी होगी: विद्यार्थियों को एआई से सीखने योग्य बनाना और साथ ही एआई की सीमाओं को पहचानने, जाँचने तथा प्रश्नांकित करने योग्य बनाना।

2. कृत्रिम बुद्धिमत्ता और भाषायी तकनीक का विकास

कृत्रिम बुद्धिमत्ता एक व्यापक संकल्पना है जिसमें वे संगणकीय प्रणालियाँ शामिल हैं जो सामान्यतः मानवीय बुद्धि से जोड़े जाने वाले कार्य—जैसे पहचान, वर्गीकरण, अनुमान, निर्णय, भाषा-प्रसंस्करण और सामग्री-निर्माण—करती हैं। भाषायी संदर्भ में इसके प्रमुख क्षेत्र प्राकृतिक भाषा प्रसंस्करण, मशीन अनुवाद, वाक्-पहचान, वाक्-संश्लेषण, पाठ-सारांश, भाव-विश्लेषण, संवाद-प्रणाली और जनरेटिव भाषा मॉडल हैं। आरंभिक कम्प्यूटर-आधारित भाषा-शिक्षण में निश्चित नियमों पर बने व्याकरण-अभ्यास और बहुविकल्पीय प्रश्न प्रमुख थे। बाद में कॉर्पस भाषाविज्ञान, सांख्यिकीय अनुवाद, स्वचालित निबंध-मूल्यांकन और मोबाइल अनुप्रयोग आए। गहन अधिगम और ट्रांसफॉर्मर संरचना ने संदर्भ-आधारित भाषा-प्रसंस्करण को कहीं अधिक सक्षम बनाया, जबकि बड़े भाषा मॉडलों ने सामान्य उपयोगकर्ता के लिए स्वाभाविक संवाद संभव किया।

इस विकास को तीन चरणों में समझा जा सकता है। पहले चरण में कम्प्यूटर भाषा-अभ्यास का स्थिर माध्यम था; वह शिक्षक द्वारा बनाए प्रश्न प्रस्तुत करता और पूर्वनिर्धारित उत्तर जाँचता था। दूसरे चरण में डेटा-आधारित प्रणाली विद्यार्थी के प्रदर्शन का विश्लेषण कर अभ्यास की कठिनाई बदलने लगी। तीसरे, वर्तमान चरण में जनरेटिव प्रणाली स्वयं उदाहरण, व्याख्या, कथा, संवाद, प्रश्न, प्रतिक्रिया और अनुवाद बनाती है। आगामी चरण में बहुमाध्यमीय तथा एजेंट-आधारित प्रणालियाँ पाठ, ध्वनि, चित्र, वीडियो और संकेत-भाषा को एक साथ समझकर दीर्घकालिक सीखने की योजना चला सकती हैं।

इस क्रम में तकनीक की शक्ति बढ़ी है, पर शिक्षाशास्त्रीय उत्तरदायित्व भी बढ़ा है। कोई प्रणाली तकनीकी रूप से जितनी स्वाभाविक और सुविधाजनक लगती है, विद्यार्थी उतनी आसानी से उस पर भरोसा करता है। इसलिए भाषा-शिक्षक को केवल उपकरण चलाना नहीं, उसके प्रशिक्षण-डेटा, त्रुटि-प्रकृति, गोपनीयता-नीति, भाषा-समर्थन और शैक्षणिक उद्देश्य का परीक्षण भी सीखना होगा। भविष्य का प्रश्न यह नहीं होगा कि संस्था एआई का उपयोग करती है या नहीं; अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न होगा कि किस उद्देश्य, किस सीमा, किस भाषा, किस प्रमाण और किस मानवीय निगरानी के अंतर्गत उसका उपयोग किया जाता है।

3. भाषायी शिक्षा: कौशल से आगे संस्कृति और चेतना तक

भाषा सीखने को अक्सर सुनना, बोलना, पढ़ना और लिखना—इन चार कौशलों में बाँटा जाता है। यह वर्गीकरण उपयोगी है, किंतु पर्याप्त नहीं। वास्तविक भाषायी क्षमता में प्रसंग पहचानना, सामाजिक संबंध के अनुसार संबोधन चुनना, व्यंग्य और मौन को समझना, सांस्कृतिक संकेत ग्रहण करना, तर्क करना, सहमति-असहमति व्यक्त करना, साहित्यिक सौंदर्य का अनुभव करना और अनेक भाषाओं के बीच सहज रूप से आना-जाना भी शामिल है। बहुभाषी भारत में विद्यार्थी प्रायः घर की बोली, क्षेत्रीय भाषा, विद्यालय की भाषा, हिन्दी या अंग्रेज़ी और डिजिटल संसार की मिश्रित भाषा के बीच जीवन बिताता है। उसकी भाषायी पहचान किसी एक मानकीकृत व्याकरण में बंद नहीं होती।

एआई आधारित भाषा-शिक्षण यदि केवल शुद्ध वर्तनी, मानक उच्चारण और औपचारिक वाक्य पर बल देगा, तो वह इस जीवित बहुभाषिकता को कमी के रूप में देख सकता है। दूसरी ओर, समझदारी से बनाया गया एआई विद्यार्थी की भाषायी पूँजी को स्वीकार कर सकता है: वह उसकी मातृभाषा में जटिल अवधारणा समझाए, स्थानीय उदाहरण दे, दो भाषाओं के व्याकरण की तुलना करे और धीरे-धीरे लक्ष्य भाषा की ओर पुल बनाए। शिक्षाशास्त्र में इसे पारभाषिकता या ट्रांसलैंग्वेजिंग से जोड़कर देखा जा सकता है, जहाँ विद्यार्थी अपनी समस्त भाषायी संपदा का उपयोग सीखने में करता है।

अतः भविष्य की भाषायी शिक्षा का लक्ष्य केवल ‘मशीन को संतुष्ट करने वाला सही उत्तर’ नहीं होना चाहिए। लक्ष्य होना चाहिए कि विद्यार्थी भाषा के माध्यम से स्वतंत्र चिंतन, सहानुभूति, सांस्कृतिक विवेक, नागरिक संवाद और रचनात्मक अभिव्यक्ति विकसित करे। एआई इनमें अभ्यास और संसाधन दे सकता है, पर जीवित अनुभव, सामाजिक उत्तरदायित्व और नैतिक निर्णय का स्रोत मनुष्य और समुदाय ही रहेंगे। यही विभाजन आगे की नीतियों और कक्षा-व्यवहार की आधारशिला होना चाहिए।

4. व्यक्तिगत और अनुकूली भाषा-अधिगम

तालिका 1. भाषायी शिक्षा में एआई: प्रमुख अवसर और आवश्यक मानवीय सुरक्षा

शिक्षण क्षेत्र

एआई की संभावित भूमिका

अनिवार्य मानवीय सुरक्षा

सुनना–बोलना

संवाद अभ्यास, प्रतिलिपि, उच्चारण संकेत

बोधगम्यता को प्राथमिकता; उच्चारण-पक्षपात की जाँच

पठन

सरलीकरण, शब्दार्थ, वैकल्पिक प्रश्न

मूल पाठ का गहन पठन और स्रोत सत्यापन

लेखन

प्रारूप, भाषा-सुधार, पुनर्लेखन प्रतिक्रिया

लेखन-प्रक्रिया, घोषणा और लेखक की अंतिम जिम्मेदारी

अनुवाद

प्रारंभिक अनुवाद और शब्दावली सहायता

विषय एवं भाषा विशेषज्ञ द्वारा पश्च-संपादन

मूल्यांकन

अभ्यास, रूब्रिक और सामान्य त्रुटि विश्लेषण

उच्च-दाँव निर्णय में मानव समीक्षा और अपील

भारतीय भाषाएँ

बहुभाषी सामग्री, ध्वनि और डिजिटल अभिलेखन

समुदाय की सहमति, श्रेय और भाषा-वार परीक्षण

स्रोत: लेखक का विश्लेषण; UNESCO मार्गदर्शिकाओं [1, 5–6, 13] के अनुरूप।

परंपरागत कक्षा में एक शिक्षक को भिन्न स्तरों, रुचियों और गति वाले अनेक विद्यार्थियों के साथ काम करना पड़ता है। परिणामतः एक ही पाठ और अभ्यास सबको दिया जाता है; तेज विद्यार्थी ऊब सकता है और संघर्षरत विद्यार्थी पीछे छूट सकता है। एआई आधारित अनुकूली प्रणाली विद्यार्थी की बार-बार होने वाली त्रुटियाँ, उत्तर देने का समय, शब्दावली की सीमा, उच्चारण की कठिनाइयाँ और पाठ-बोध का स्तर देखकर अलग मार्ग सुझा सकती है। किसी विद्यार्थी को क्रिया-रूप के अतिरिक्त अभ्यास मिलें, दूसरे को संवाद, तीसरे को उन्नत पठन और चौथे को चित्र-सहायता—यह व्यक्तिगतकरण की वास्तविक संभावना है।

व्यक्तिगतकरण का अर्थ केवल कठिनाई घटाना-बढ़ाना नहीं है। भाषा सीखना तभी स्थायी होता है जब सामग्री विद्यार्थी के जीवन से संबंध बनाती है। किसान परिवार के विद्यार्थी के लिए कृषि और बाजार के प्रसंग, शहरी किशोर के लिए सार्वजनिक परिवहन और डिजिटल संस्कृति, प्रवासी विद्यार्थी के लिए नए शहर और पहचान, तथा साहित्य विद्यार्थी के लिए कथा और आलोचना के प्रसंग बनाए जा सकते हैं। एआई शिक्षक को कुछ ही क्षणों में अनेक स्तरों पर पाठ, शब्द-सूची, संवाद और अभ्यास का प्रारूप दे सकता है। शिक्षक उन्हें स्थानीय संदर्भ और पाठ्यक्रम के अनुरूप संशोधित कर सकता है।

लेकिन एल्गोरिद्मिक व्यक्तिगतकरण के दो खतरे हैं। पहला, विद्यार्थी को उसकी पूर्व उपलब्धि के आधार पर स्थायी श्रेणी में बाँध देना; यदि प्रणाली उसे ‘कमज़ोर’ मानकर लगातार सरल सामग्री देती रहे, तो विकास के अवसर कम हो सकते हैं। दूसरा, सीखने को अकेले व्यक्ति और स्क्रीन के बीच सीमित करना। भाषा मूलतः सामाजिक अभ्यास है; सहपाठी की अनपेक्षित प्रतिक्रिया, समूह में अर्थ का समझौता, मंच पर बोलने का साहस और वास्तविक श्रोता की संवेदना मशीन नहीं दे सकती। इसलिए सर्वोत्तम मॉडल ‘व्यक्तिगत डिजिटल अभ्यास + सामूहिक मानवीय संवाद’ का होगा। एआई निदान और अभ्यास में सहायक बने, जबकि शिक्षक चुनौती, सहयोग और व्यापक विकास सुनिश्चित करे।

5. सुनने और बोलने की शिक्षा में परिवर्तन

वाक्-पहचान और वाक्-संश्लेषण ने सुनने-बोलने के अभ्यास को विशेष रूप से बदला है। पहले विदेशी या दूसरी भाषा सीखने वाले विद्यार्थी के पास नियमित संवाद-साथी उपलब्ध नहीं होता था। अब वह एआई से किसी परिस्थिति का अभिनय करा सकता है—रेलवे स्टेशन पर टिकट लेना, नौकरी का साक्षात्कार, चिकित्सक से बातचीत, शैक्षणिक प्रस्तुति या साहित्यिक चर्चा। प्रणाली उसके उत्तर पर आगे प्रश्न कर सकती है, बातचीत की गति बदल सकती है और शब्दावली के स्तर को नियंत्रित कर सकती है। संकोची विद्यार्थी सार्वजनिक गलती के भय के बिना बार-बार अभ्यास कर सकता है। व्यवस्थित समीक्षाएँ संवाद-प्रणालियों और चैटबॉट के ऐसे उपयोग को आशाजनक मानती हैं, यद्यपि दीर्घकालिक प्रमाण अभी विकसित हो रहे हैं। [11–12, 17–18]

उच्चारण-विश्लेषण उपकरण ध्वनि को लिप्यंतरित करके ध्वनियों, बलाघात, गति और प्रवाह पर संकेत दे सकते हैं। यह सहायता उपयोगी है, पर ‘सही उच्चारण’ की अवधारणा सावधानी से अपनानी चाहिए। प्रत्येक भाषा में क्षेत्रीय, सामाजिक और सांस्कृतिक उच्चारण होते हैं। यदि मॉडल मुख्यतः किसी प्रतिष्ठित शहरी या विदेशी मानक पर प्रशिक्षित है, तो वह वैध विविधताओं को त्रुटि मान सकता है। भाषा शिक्षा का लक्ष्य उच्चारण मिटाना नहीं, बोधगम्यता और प्रसंगानुकूल अभिव्यक्ति विकसित करना होना चाहिए। शिक्षक को प्रणाली के स्कोर को अंतिम निर्णय न मानकर एक संकेत की तरह लेना चाहिए।

सुनने के लिए एआई एक ही पाठ को अलग गति, आवाज़ और कठिनाई में प्रस्तुत कर सकता है; साथ में प्रतिलिपि, कठिन शब्द और समझ-प्रश्न दे सकता है। दृष्टिबाधित और श्रवणबाधित विद्यार्थियों के लिए पाठ-से-वाणी, वाणी-से-पाठ, कैप्शन और संकेत-भाषा से जुड़ी तकनीक समावेशन बढ़ा सकती है। फिर भी स्वचालित प्रतिलिपि में नाम, स्थानीय बोली और शोरयुक्त वातावरण की त्रुटियाँ बनी रहती हैं। अतः मानवीय सत्यापन आवश्यक है, विशेषकर परीक्षा, परामर्श या आधिकारिक संवाद में।

6. पठन का भविष्य: सारांश से गहन पाठ तक

डिजिटल युग में विद्यार्थी लंबे पाठ के बजाय छोटे संदेश, दृश्य सामग्री और एल्गोरिद्म द्वारा चुने अंश अधिक पढ़ता है। जनरेटिव एआई किसी कठिन लेख का सारांश, शब्दार्थ, सरल रूप या प्रश्नोत्तरी बना देता है। यह आरंभिक पहुँच के लिए उपयोगी है, विशेषकर दूसरी भाषा के विद्यार्थी के लिए। पर सुविधा का यही गुण गहन पठन को कमजोर कर सकता है। यदि विद्यार्थी मूल रचना पढ़े बिना सारांश पर निर्भर हो जाए, तो शैली, तर्क की बारीकी, अस्पष्टता, विडंबना और सौंदर्य से उसका संबंध टूट जाएगा। साहित्य में अर्थ केवल कथानक-सार नहीं होता; वह भाषा की संरचना, लय, मौन और बहुअर्थकता में भी रहता है।

इसलिए एआई को पठन का विकल्प नहीं, पठन की सीढ़ी बनाना चाहिए। उदाहरणतः विद्यार्थी पहले मूल पाठ का एक अंश पढ़े और अपनी व्याख्या लिखे; फिर एआई से वैकल्पिक व्याख्याएँ पूछे; दोनों की तुलना करते हुए पाठ से प्रमाण चुने; अंत में यह जाँचे कि मॉडल ने क्या अनदेखा किया। कठिन शब्दों के अर्थ पूछना उचित है, पर शब्दकोश और प्रसंग से सत्यापन भी कराया जाना चाहिए। ऐतिहासिक लेख पढ़ते समय एआई से दावे और प्रमाण अलग कराए जा सकते हैं, फिर विद्यार्थी मूल स्रोत की जाँच करे।

भविष्य की पठन-साक्षरता में ‘एआई द्वारा निर्मित पाठ को पढ़ना’ भी शामिल होगा। विद्यार्थी को पहचानना होगा कि प्रवाहपूर्ण उत्तर में अनुमान, पक्षपात या गढ़ा हुआ संदर्भ कहाँ हो सकता है। वह लेखक, तिथि, स्रोत, उद्धरण और आँकड़े की जाँच करे; एक ही प्रश्न अलग ढंग से पूछकर स्थिरता देखे; विरोधी स्रोत से तुलना करे। इस प्रकार आलोचनात्मक पठन अब मनुष्य द्वारा लिखे पाठ के साथ-साथ मशीन द्वारा उत्पादित पाठ पर भी लागू होगा।

7. लेखन, संपादन और सृजनशीलता

एआई लेखन में विचार-सूची, रूपरेखा, उदाहरण, भाषा-सुधार, अनुवाद और प्रतिपुष्टि दे सकता है। शोध से संकेत मिलता है कि शिक्षक-निर्देशित प्रारूप में जनरेटिव एआई की प्रतिक्रिया दूसरी भाषा के विद्यार्थियों के अकादमिक लेखन और पुनर्लेखन को समर्थन दे सकती है। [10] बड़े वर्ग में शिक्षक प्रत्येक मसौदे पर विस्तृत टिप्पणी नहीं दे पाता; एआई आरंभिक स्तर पर व्याकरण, वाक्य-संगति और संगठन की ओर ध्यान खींच सकता है। विद्यार्थी प्रतिक्रिया को स्वीकार या अस्वीकार करते हुए उसका कारण लिखे तो वह संपादकीय निर्णय भी सीखता है।

पर लेखन में सबसे बड़ा संकट ‘उत्पाद’ और ‘प्रक्रिया’ के अंतर का है। यदि विद्यार्थी विषय लिखकर तैयार निबंध जमा कर दे, तो उसे भाषा का अभ्यास, विचार का संघर्ष, संरचना का चुनाव और संशोधन की सीख नहीं मिलती। बाहरी रूप से उत्कृष्ट पाठ भी आंतरिक अधिगम के बिना बन सकता है। इसलिए मूल्यांकन को अंतिम उत्तर से हटाकर प्रक्रिया की ओर जाना होगा—विचार-नोट, स्रोत-संग्रह, प्रथम मसौदा, शिक्षक या एआई प्रतिक्रिया, संशोधित मसौदा, मौखिक विवेचन और आत्म-प्रतिबिंब। विद्यार्थी को यह स्पष्ट बताना चाहिए कि उसने एआई का उपयोग कहाँ और कैसे किया।

सृजनात्मक लेखन में भी एआई संभावनाएँ और जोखिम दोनों लाता है। वह कहानी की वैकल्पिक समाप्ति, चरित्र-संवाद या छंद के उदाहरण दे सकता है, लेकिन लोकप्रिय पैटर्नों की पुनरावृत्ति मौलिकता को सपाट कर सकती है। साहित्यिक शिक्षा का उद्देश्य केवल सुंदर वाक्य बनाना नहीं, व्यक्ति की विशिष्ट अनुभूति और आवाज़ विकसित करना है। अतः ऐसी गतिविधियाँ उपयोगी होंगी जिनमें विद्यार्थी एआई के औसत और रूढ़ उत्तर की आलोचना करे, स्थानीय अनुभव जोड़े, किसी जीवित व्यक्ति से बातचीत करे, स्थल का अवलोकन करे और अपने भाषायी चुनाव का बचाव करे। मौलिकता भविष्य में ‘एआई से दूरी’ से नहीं, बल्कि अनुभव, उत्तरदायित्व और सचेत चयन से पहचानी जाएगी।

8. व्याकरण और शब्दावली की नई पद्धति

व्याकरण-शिक्षण लंबे समय तक नियम याद कराने और रिक्त स्थान भरवाने पर केंद्रित रहा है। एआई किसी नियम को अनेक उदाहरणों, तुलना और संवाद के माध्यम से समझा सकता है। वह विद्यार्थी की मातृभाषा और लक्ष्य भाषा के बीच संरचनात्मक अंतर दिखा सकता है—जैसे लिंग, वचन, काल, कारक, शब्द-क्रम या आदरसूचक रूप। विद्यार्थी अपनी गलती का कारण पूछ सकता है और उसी प्रकार के नए उदाहरण प्राप्त कर सकता है। शब्दावली में आवृत्ति, प्रसंग, समानार्थ, सहप्रयोग और शब्द-परिवार के अनुसार अभ्यास बनाया जा सकता है। अंतराल-आधारित पुनरावृत्ति से प्रणाली भूले जाने की संभावना के अनुसार शब्द दोहरा सकती है।

फिर भी भाषा को नियमों की सूची में बदल देना उचित नहीं। वास्तविक प्रयोग में व्याकरण अर्थ, प्रसंग और सामाजिक संबंध से जुड़ा होता है। ‘तुम’, ‘तू’ और ‘आप’ का चयन केवल सर्वनाम का अभ्यास नहीं; उसमें निकटता, आयु, सम्मान, सत्ता और क्षेत्रीय संस्कृति शामिल है। एआई सामान्य नियम बता सकता है, पर हर प्रसंग की संवेदनशीलता नहीं समझता। इसी प्रकार शब्द का शब्दकोशीय अर्थ पर्याप्त नहीं; उसका भाव, इतिहास और समुदाय-विशेष में प्रयोग अलग हो सकता है। इसलिए व्याकरण को अर्थपूर्ण गतिविधि और शब्दावली को जीवित पाठ, वार्ता तथा क्षेत्रीय अनुभव से जोड़ना आवश्यक है।

भविष्य की प्रभावी पद्धति में विद्यार्थी पहले वास्तविक उदाहरणों से पैटर्न खोजेगा, फिर एआई से अपनी परिकल्पना जाँचवाएगा, कॉर्पस या प्रमाणित व्याकरण से सत्यापन करेगा और अंत में बोलने-लिखने में प्रयोग करेगा। इससे मशीन तत्काल सहयोग देती है, पर ज्ञान का अधिकार किसी अपारदर्शी मॉडल को नहीं सौंपा जाता।

9. अनुवाद-शिक्षा और बहुभाषी मध्यस्थता

मशीन अनुवाद की गुणवत्ता में वृद्धि ने अनुवाद-शिक्षा को गहराई से प्रभावित किया है। सामान्य पत्र, समाचार या निर्देश का आरंभिक अनुवाद कुछ क्षणों में मिल जाता है। इससे यह भ्रम हो सकता है कि अनुवादक की आवश्यकता समाप्त हो जाएगी, जबकि वास्तविकता में उसका कार्य रूपांतरित हो रहा है। भविष्य का अनुवादक केवल शब्द बदलने वाला व्यक्ति नहीं, बल्कि अर्थ, प्रसंग, संस्कृति, विषय-विशेष शब्दावली, नैतिकता और पाठक की आवश्यकता के बीच निर्णय लेने वाला विशेषज्ञ होगा। उसे मशीन के प्रारूप का पश्च-संपादन, त्रुटि-वर्गीकरण, शब्दावली प्रबंधन, डेटा गोपनीयता और गुणवत्ता आश्वासन सीखना होगा।

अनुवाद कक्षा में एक ही पाठ का मानव और विभिन्न मशीनों द्वारा अनुवाद कराकर तुलना की जा सकती है। विद्यार्थी देख सकता है कि मुहावरे, व्यंग्य, लिंग, सम्मानसूचक शब्द, सांस्कृतिक संकेत, कविता और विधिक अस्पष्टता में मशीन कहाँ चूकती है। वह त्रुटि को केवल ‘गलत’ न कहकर अर्थगत, व्याकरणिक, शैलीगत, सांस्कृतिक और व्यावहारिक श्रेणियों में रखे। इससे अनुवाद-सिद्धांत प्रयोगशाला से जुड़ता है।

भारत जैसे देश में एआई अनुवाद उच्च शिक्षा की अंग्रेज़ी-केंद्रित सामग्री को भारतीय भाषाओं में पहुँचाने का साधन हो सकता है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 मातृभाषा, स्थानीय भाषा और द्विभाषी उच्च शिक्षा सामग्री पर बल देती है। [2] BHASHINI जैसी सार्वजनिक डिजिटल पहल 22 से अधिक भारतीय भाषाओं के लिए भाषा-प्रौद्योगिकी और अनुवाद उपलब्ध कराने की दिशा में कार्य कर रही है। [4] पर विषय-विशेष सामग्री—चिकित्सा, कानून, विज्ञान या दर्शन—में बिना विशेषज्ञ जाँच के मशीन अनुवाद जोखिमपूर्ण है। सार्वजनिक हित का सही मॉडल होगा: खुली शब्दावलियाँ, मानकीकृत पारिभाषिक कोश, समुदाय द्वारा सत्यापन, विषय विशेषज्ञ की समीक्षा और संशोधित पाठ को पुनः साझा करने की व्यवस्था।

साहित्यिक अनुवाद में चुनौती और बढ़ जाती है। कविता की ध्वनि, सांस्कृतिक संकेत, लेखक की विशिष्ट शैली और ऐतिहासिक स्मृति का कोई एक यांत्रिक समतुल्य नहीं होता। एआई कई विकल्प देकर अनुवादक की खोज बढ़ा सकता है, पर चयन का सौंदर्यात्मक तथा नैतिक उत्तरदायित्व मनुष्य के पास रहेगा। मशीन से बने अनुवाद को बिना घोषणा प्रकाशित करना कॉपीराइट, श्रेय और गुणवत्ता से जुड़े प्रश्न भी उठाता है। इसलिए अनुवाद पाठ्यक्रम में तकनीक के साथ-साथ अनुवाद-नीति और व्यावसायिक आचार-संहिता अनिवार्य होनी चाहिए।

10. शिक्षक की भूमिका: ज्ञानदाता से अधिगम-रचनाकार तक

एआई के कारण शिक्षक अप्रासंगिक नहीं होगा; उसकी भूमिका अधिक जटिल और महत्वपूर्ण होगी। सूचना और प्रारंभिक अभ्यास आसानी से उपलब्ध होने पर शिक्षक का मूल्य केवल तथ्य बताने में नहीं, बल्कि उपयुक्त प्रश्न चुनने, सीखने का क्रम बनाने, विश्वसनीयता जाँचने, विद्यार्थी को चुनौती देने, सहानुभूति प्रदान करने और सामाजिक अधिगम का वातावरण बनाने में होगा। वह यह निर्धारित करेगा कि किस चरण पर एआई उपयोगी है और कहाँ विद्यार्थी को स्वयं संघर्ष करना चाहिए।

भाषा-शिक्षक को अब पाँच प्रकार की दक्षता चाहिए। पहली, भाषायी और साहित्यिक विषय-ज्ञान; दूसरी, शिक्षाशास्त्रीय समझ; तीसरी, डिजिटल और एआई साक्षरता; चौथी, डेटा तथा नैतिक विवेक; पाँचवीं, स्थानीय संस्कृति और बहुभाषी कक्षा की संवेदनशीलता। UNESCO के 2024 शिक्षक-एआई दक्षता ढाँचे में मानव-केंद्रित दृष्टि, एआई नैतिकता, आधारभूत ज्ञान, एआई शिक्षाशास्त्र और व्यावसायिक विकास के पाँच आयामों में 15 दक्षताएँ बताई गई हैं। [5] यह संकेत देता है कि केवल एक उपकरण का प्रशिक्षण पर्याप्त नहीं; शिक्षक को ‘अर्जन, गहनता और सृजन’ के क्रम में निरंतर विकसित होना होगा।

शिक्षक की पेशेवर स्वायत्तता की रक्षा भी आवश्यक है। यदि संस्थान किसी वाणिज्यिक प्रणाली के स्कोर के आधार पर विद्यार्थी या शिक्षक का मूल्यांकन करने लगे, तो अपारदर्शी एल्गोरिद्म निर्णय पर हावी हो सकता है। शिक्षक को परिणाम पर पुनर्विचार, सुधार और अपील का अधिकार होना चाहिए। एआई से बनी सामग्री पर शिक्षक का अंतिम संपादकीय नियंत्रण रहे। समय बचाने का अर्थ मानवीय निर्णय छोड़ना नहीं; बचा हुआ समय व्यक्तिगत मार्गदर्शन, संवाद और कमजोर विद्यार्थियों की सहायता में लगना चाहिए।

शिक्षक-प्रशिक्षण एक बार की कार्यशाला न होकर विषय-आधारित अभ्यास समुदाय होना चाहिए। हिन्दी शिक्षक को वही उदाहरण नहीं दिए जा सकते जो गणित शिक्षक को मिलते हैं। उसे पाठ-विश्लेषण, विविध हिन्दी रूपों, देवनागरी, अनुवाद, रचनात्मक लेखन और साहित्यिक स्रोत-सत्यापन के प्रयोग चाहिए। प्रशिक्षण में सफल उदाहरणों के साथ विफल उत्तरों का विश्लेषण भी हो, ताकि शिक्षक उपकरण की चमक से प्रभावित होने के बजाय उसके व्यवहार को समझे।

11. विद्यार्थी की भूमिका: उपभोक्ता नहीं, आलोचनात्मक सह-निर्माता

भविष्य का विद्यार्थी तैयार उत्तरों का निष्क्रिय उपभोक्ता बन सकता है या एआई का आलोचनात्मक सह-निर्माता। शिक्षा की दिशा इस चयन से तय होगी। आलोचनात्मक विद्यार्थी समस्या को स्पष्ट करता है, उपयुक्त निर्देश लिखता है, उत्तर की जाँच करता है, स्रोत तलाशता है, पक्षपात पहचानता है, वैकल्पिक दृष्टि माँगता है और अंतिम निर्णय स्वयं करता है। वह अपनी भाषा और स्थानीय ज्ञान को मॉडल के सामने रखता है तथा गलत प्रस्तुति को सुधारता है।

‘प्रॉम्प्ट लिखना’ उपयोगी कौशल है, पर इसे भविष्य की शिक्षा का अंतिम लक्ष्य नहीं माना जाना चाहिए। उपकरण और इंटरफेस बदलते रहेंगे; स्थायी दक्षताएँ हैं—प्रश्न निर्माण, प्रमाण का मूल्यांकन, तर्क, भाषा-जागरूकता, रचनात्मकता और नैतिक उत्तरदायित्व। अच्छा निर्देश भी तभी संभव है जब विद्यार्थी विषय समझता हो। ज्ञान-विहीन व्यक्ति मॉडल की विश्वसनीय लगती त्रुटि नहीं पकड़ सकेगा। इसलिए आधारभूत पठन, व्याकरण, शब्दावली, साहित्य और सांस्कृतिक अध्ययन को एआई के नाम पर कम करना आत्मघाती होगा।

विद्यार्थी को यह भी सीखना होगा कि कब एआई का उपयोग न करना अधिक शिक्षाप्रद है। किसी कविता का प्रथम अनुभव, आत्मकथात्मक लेखन, सहपाठी के प्रति प्रतिक्रिया, मौखिक परीक्षा या मूल भाषा-कौशल के निदान में बिना मशीन का कार्य आवश्यक हो सकता है। ‘सहायता का अधिकार’ और ‘स्वतंत्र क्षमता का प्रमाण’ दोनों बनाए रखने होंगे।

AI साक्षरता में चार प्रश्न हर विद्यार्थी की आदत बनने चाहिए: यह उत्तर किस प्रकार बना होगा? इसके पीछे कौन-सा डेटा और हित हो सकता है? कौन-सी आवाज़ यहाँ अनुपस्थित है? इसे सत्यापित करने के लिए मैं कौन-सा स्वतंत्र प्रमाण खोजूँगा? इन प्रश्नों से तकनीकी उपयोग नागरिक विवेक में बदलता है।

12. मूल्यांकन में क्रांति और संकट

जनरेटिव एआई ने गृहकार्य-आधारित निबंध और सामान्य प्रश्नोत्तर की विश्वसनीयता को चुनौती दी है। केवल अंतिम लिखित उत्तर देखकर यह तय करना कठिन है कि विद्यार्थी ने कितना स्वयं सोचा। एआई-डिटेक्टर भी पूर्णतः विश्वसनीय नहीं हैं और दूसरी भाषा के लेखकों को गलत आरोप का खतरा हो सकता है। इसलिए निगरानी और दंड की दौड़ के बजाय मूल्यांकन की रचना बदलनी चाहिए।

प्रामाणिक मूल्यांकन में विद्यार्थी स्थानीय समस्या, व्यक्तिगत अनुभव, मौखिक प्रस्तुति, कक्षा-चर्चा, स्रोत-आलोचना और क्रमिक पोर्टफोलियो के माध्यम से सीख दिखाए। एक कार्य में एआई निषिद्ध हो सकता है ताकि स्वतंत्र भाषा-कौशल मापा जाए; दूसरे में अनुमति देकर यह देखा जा सकता है कि विद्यार्थी उसकी प्रतिक्रिया की समीक्षा कैसे करता है। नियम कार्य के आरंभ में स्पष्ट हों: कौन-सा उपकरण, किस प्रयोजन से, कितनी सीमा तक और किस प्रकार घोषणा के साथ उपयोग किया जा सकता है।

एआई स्वयं भी मूल्यांकन में सहायता कर सकता है—प्रश्नों के विभिन्न रूप, अभ्यास-क्विज, रूब्रिक का प्रारूप, सामान्य त्रुटियों का समूह और प्रारंभिक प्रतिक्रिया। पर उच्च दाँव वाले निर्णय, जैसे प्रवेश, अंतिम अंक या पदोन्नति, केवल स्वचालित स्कोर पर आधारित नहीं होने चाहिए। यूरोपीय संघ का एआई अधिनियम शिक्षा में प्रवेश या परिणाम निर्धारित करने वाली कुछ प्रणालियों को उच्च जोखिम की श्रेणी में रखता है। [9] इसका व्यापक संदेश है कि शैक्षिक निर्णय में पारदर्शिता, डेटा गुणवत्ता, मानव निगरानी और अपील अनिवार्य हैं।

भाषा-मूल्यांकन में बहुविध प्रमाण अधिक विश्वसनीय होगा: नियंत्रित परिस्थिति में स्वतंत्र लेखन, घर पर प्रक्रिया-आधारित लेखन, मौखिक उत्तर, पठन-व्याख्या, समूह संवाद और आत्म-आकलन। अंक का एक भाग विचार, एक भाग भाषा, एक भाग स्रोत-प्रयोग और एक भाग संशोधन प्रक्रिया को दिया जा सकता है। इससे एआई का उपयोग छिपाने की प्रेरणा घटेगी और विद्यार्थी उपकरण से मिली सहायता को पारदर्शी रूप से दर्ज करना सीखेगा।

13. भारतीय भाषाओं के लिए ऐतिहासिक अवसर

भारत की भाषायी विविधता कृत्रिम बुद्धिमत्ता के लिए चुनौती भी है और विश्व को दिया जा सकने वाला विशिष्ट योगदान भी। संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाएँ हैं, किंतु जनगणना और भाषावैज्ञानिक अध्ययनों में सैकड़ों मातृभाषाएँ तथा असंख्य बोलियाँ सामने आती हैं। अनेक भारतीय नागरिक एक ही दिन में दो या तीन भाषाओं का प्रयोग करते हैं। कोड-मिश्रण, लिपि-परिवर्तन और स्थानीय उच्चारण सामान्य सामाजिक व्यवहार हैं। अधिकांश वैश्विक मॉडल ऐसे जटिल बहुभाषी व्यवहार पर पर्याप्त प्रशिक्षित नहीं हैं। वे मानक हिन्दी को अपेक्षाकृत समझ सकते हैं, पर सामवेदी, बुंदेली, भोजपुरी, कुमाऊँनी, गोंडी या किसी मिश्रित शहरी बोलचाल में उनकी क्षमता अस्थिर हो सकती है।

यह असमानता केवल तकनीकी सुविधा का प्रश्न नहीं; ज्ञान और प्रतिनिधित्व का प्रश्न है। जिस भाषा का डिजिटल पाठ, ध्वनि, शब्दकोश और सत्यापित कॉर्पस कम होगा, एआई उसमें कम सक्षम रहेगा। कम क्षमता के कारण लोग बड़ी भाषा की ओर जाएँगे और स्थानीय भाषा का डिजिटल उत्पादन और घट सकता है। इसे ‘डिजिटल दुष्चक्र’ कहा जा सकता है। इसके विपरीत यदि समुदाय अपने गीत, कथाएँ, शब्दावली, मौखिक इतिहास और समकालीन प्रयोग को सहमति तथा उचित श्रेय के साथ डिजिटाइज़ करे, तो एआई भाषा-संरक्षण और शिक्षा का सहायक बन सकता है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 घर की भाषा या मातृभाषा में प्रारंभिक शिक्षा, बहुभाषिकता, भारतीय भाषाओं में उच्च शिक्षा तथा अनुवाद को महत्व देती है। [2] राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2023 विद्यार्थियों को तीन भाषाओं में दक्ष बनाने और कम से कम दो भारतीय भाषाओं को शामिल करने पर बल देती है। [3] इन लक्ष्यों के क्रियान्वयन में एआई स्थानीय भाषा में पाठ का सरल रूप, द्विभाषी शब्दावली, शिक्षक-सहायक सामग्री, कैप्शन और वाणी सेवाएँ दे सकता है। किंतु नीति को यह सुनिश्चित करना होगा कि तकनीक भाषा-चयन पर दबाव न बनाए। विद्यार्थी की मातृभाषा को केवल लक्ष्य भाषा तक पहुँचने की अस्थायी सीढ़ी न मानकर ज्ञान की वैध भाषा माना जाए।

BHASHINI का उद्देश्य भारतीय भाषाओं के बीच डिजिटल सेवाओं और अनुवाद की बाधा घटाना है। ऐसी सार्वजनिक डिजिटल संरचना का महत्त्व इसलिए है कि भाषा डेटा और आधारभूत सेवाएँ केवल कुछ निजी कंपनियों के नियंत्रण में न रहें। विश्वविद्यालय इसके साथ स्थानीय कॉर्पस, शब्दकोश, पारिभाषिक कोश और गुणवत्ता परीक्षण विकसित कर सकते हैं। समुदाय-आधारित सत्यापन के बिना कोई भी केंद्रीय मॉडल भारत की जीवित भाषायी विविधता को पर्याप्त रूप से नहीं पकड़ पाएगा।

14. हिन्दी भाषा और साहित्य की शिक्षा में संभावनाएँ

हिन्दी शिक्षा का क्षेत्र व्यापक और आंतरिक रूप से विविध है। विद्यालय में हिन्दी मातृभाषा, दूसरी भाषा या संपर्क भाषा के रूप में पढ़ाई जाती है; विदेशों में वह विदेशी भाषा है; विश्वविद्यालय में भाषा, साहित्य, प्रयोजनमूलक हिन्दी, पत्रकारिता, अनुवाद और शोध के रूप में उपस्थित है। एक ही एआई पद्धति इन सभी के लिए उपयुक्त नहीं हो सकती। मातृभाषी विद्यार्थी के लिए आलोचनात्मक पठन और शैली केंद्रीय हो सकते हैं, जबकि विदेशी विद्यार्थी के लिए देवनागरी, ध्वनि, दैनिक संवाद और सांस्कृतिक व्यवहार प्राथमिक होंगे।

एआई देवनागरी पहचान, वर्तनी-सुधार, शब्द-रूप विश्लेषण, उच्चारण अभ्यास और द्विभाषी संवाद में सहायता दे सकता है। कबीर, प्रेमचंद या महादेवी वर्मा के पाठ की कठिन शब्दावली समझाने, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का प्रारूप देने और तुलनात्मक प्रश्न बनाने में भी मदद मिल सकती है। पर साहित्यिक तथ्य, पंक्ति, रचना-तिथि और उद्धरण की जाँच मूल संस्करण या विश्वसनीय आलोचनात्मक स्रोत से ही होनी चाहिए। भाषा मॉडल प्रायः प्रसिद्ध लेखक के नाम से ऐसी पंक्तियाँ बना देते हैं जो उन्होंने लिखी ही नहीं। हिन्दी में डिजिटाइज़्ड प्रमाणिक संस्करणों की कमी इस जोखिम को बढ़ाती है।

हिन्दी विभागों के लिए एक सृजनात्मक संभावना डिजिटल मानविकी है। विद्यार्थी किसी लेखक की रचनाओं में शब्दावली, स्थान, पात्र या विषय-विकास का कॉर्पस-आधारित अध्ययन कर सकते हैं; हस्तलिखित या पुरानी मुद्रित सामग्री के OCR को सुधार सकते हैं; मौखिक इतिहास की प्रतिलिपि तैयार कर सकते हैं; क्षेत्रीय बोलियों का ध्वनि-अभिलेख बना सकते हैं; और अनुवाद के संस्करणों की तुलना कर सकते हैं। एआई प्रारंभिक प्रसंस्करण करेगा, पर व्याख्या, संदर्भ और नैतिक अनुमति विद्यार्थी तथा शोधकर्ता देंगे।

विदेशों में हिन्दी शिक्षण के लिए संवादात्मक प्रणाली समय-अंतर, शिक्षक की कमी और अभ्यास-अवसर की समस्या घटा सकती है। ताशकंद, मॉस्को, टोक्यो या यूरोप के विद्यार्थी अपने देश के संदर्भों में हिन्दी संवाद का अभ्यास कर सकते हैं। फिर भी संस्कृति को केवल पर्यटन, भोजन और त्योहारों के स्थिर चित्र तक सीमित नहीं करना चाहिए। समकालीन भारत की सामाजिक विविधता, शहरी जीवन, युवा भाषा, साहित्य, मीडिया और भारत के अन्य देशों से संबंध भी पाठ्यक्रम में आएँ। एआई द्वारा बने सांस्कृतिक विवरण की भारतीय तथा स्थानीय शिक्षक मिलकर समीक्षा करें।

15. अल्पसंसाधित भाषाएँ, बोलियाँ और भाषायी न्याय

एआई में ‘अल्पसंसाधित’ शब्द उस भाषा के लिए प्रयुक्त होता है जिसके लिए डिजिटल रूप से उपलब्ध, स्वच्छ और लेबलयुक्त डेटा कम है। यह स्थिति भाषा की आंतरिक क्षमता या वक्ताओं की बौद्धिक संपदा का संकेत नहीं, बल्कि ऐतिहासिक निवेश और सत्ता का परिणाम है। अनेक बोलियों में समृद्ध मौखिक साहित्य और सूक्ष्म ज्ञान है, पर वह मुद्रित या डिजिटल कॉर्पस में नहीं आया। यदि एआई का भविष्य केवल उपलब्ध डेटा पर बनेगा, तो अनुपलब्ध समुदाय इतिहास से दूसरी बार गायब होंगे—पहले अभिलेख से, फिर एल्गोरिद्म से।

भाषायी न्याय के लिए डेटा एकत्र करने का तरीका उतना ही महत्वपूर्ण है जितना उसका आकार। किसी आदिवासी या स्थानीय समुदाय की कथा रिकॉर्ड करके मुक्त डेटा घोषित कर देना नैतिक नहीं, यदि वक्ताओं को उद्देश्य, भविष्य के उपयोग, लाभ और वापसी के अधिकार की जानकारी न हो। समुदाय को तय करने का अधिकार होना चाहिए कि कौन-सी सामग्री सार्वजनिक है, कौन-सी पवित्र या सीमित है, किस नाम से श्रेय दिया जाए और व्यावसायिक उपयोग में लाभ कैसे बाँटा जाए। सहमति एक बार का हस्ताक्षर नहीं; दीर्घकालिक संबंध है।

विश्वविद्यालय छोटे भाषा-केंद्र स्थापित कर स्थानीय युवाओं को रिकॉर्डिंग, लिप्यंतरण, शब्दकोश और डिजिटल अभिलेखन में प्रशिक्षित कर सकते हैं। विद्यार्थी समुदाय के साथ मिलकर विद्यालयी कहानी-पुस्तक, ध्वनि-शब्दकोश और द्विभाषी सामग्री बनाएँ। एआई ध्वनि विभाजन, प्रारंभिक प्रतिलिपि और खोज में मदद दे, पर अंतिम रूप मातृभाषी वक्ता सत्यापित करें। इससे तकनीक भाषा को बाहरी शोध की वस्तु नहीं, समुदाय की जीवित संपदा बनाती है।

मॉडल के मूल्यांकन में केवल बड़ी भाषाओं का औसत पर्याप्त नहीं। प्रत्येक भाषा, लिंग, आयु, क्षेत्र और उच्चारण के लिए अलग परीक्षण चाहिए। किसी प्रणाली का हिन्दी स्कोर अच्छा होते हुए भी ग्रामीण महिला वक्ता या गैर-मानक उच्चारण पर कमजोर हो सकता है। सार्वजनिक खरीद से पहले स्वतंत्र बहुभाषी ऑडिट और त्रुटि-रिपोर्ट अनिवार्य की जानी चाहिए।

16. समावेशी शिक्षा और सहायक प्रौद्योगिकी

एआई दृष्टिबाधित विद्यार्थियों के लिए पाठ-से-वाणी, चित्र-वर्णन और नेविगेशन; श्रवणबाधित विद्यार्थियों के लिए लाइव कैप्शन, प्रतिलिपि और संकेत-भाषा समर्थन; डिस्लेक्सिया या अन्य अधिगम कठिनाइयों वाले विद्यार्थियों के लिए सरल पाठ, रंग-संकेत और चरणबद्ध निर्देश उपलब्ध करा सकता है। प्रवासी, शरणार्थी और भाषायी अल्पसंख्यक विद्यार्थी तत्काल अनुवाद से विद्यालयी संवाद में भाग ले सकते हैं। ये प्रयोग शिक्षा के अधिकार को वास्तविक बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण हैं।

फिर भी ‘सुलभता’ को सामान्य उत्पाद में बाद में जोड़ा गया विकल्प न बनाया जाए। दिव्यांग विद्यार्थी और विशेष शिक्षक आरंभिक डिजाइन से सहभागी हों। मशीन द्वारा बनाया कैप्शन यदि विषय-विशेष शब्द गलत लिखता है तो पाठ का अर्थ बदल सकता है; चित्र-वर्णन सांस्कृतिक या भावात्मक संकेत छोड़ सकता है; संकेत-भाषा का अवतार यांत्रिक और अस्वाभाविक हो सकता है। मानव सहायता हटाकर केवल सस्ती स्वचालित सेवा देना समावेशन नहीं, सेवा की गुणवत्ता में भेदभाव होगा।

समावेशी मॉडल में विद्यार्थी अपनी पसंद चुन सके—मानवीय दुभाषिया, एआई कैप्शन, लिखित सामग्री या इनका संयोजन। संस्था त्रुटि सुधारने का तेज मार्ग दे और आवश्यक सहायक उपकरण निःशुल्क उपलब्ध कराए। डेटा संवेदनशीलता विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि किसी विद्यार्थी की विकलांगता, आवाज़ या सीखने के पैटर्न से स्वास्थ्य-संबंधी निष्कर्ष निकल सकते हैं। न्यूनतम डेटा-संग्रह और स्थानीय प्रसंस्करण को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

17. डिजिटल विभाजन और नई असमानताएँ

एआई को अक्सर शिक्षा के लोकतंत्रीकरण का साधन कहा जाता है, किंतु समान अवसर स्वतः उत्पन्न नहीं होता। तेज इंटरनेट, आधुनिक उपकरण, भुगतान वाली सेवा, शांत अध्ययन स्थान और डिजिटल मार्गदर्शन जिन विद्यार्थियों को उपलब्ध है, वे अधिक लाभ लेते हैं। ग्रामीण या निम्न आय वर्ग के विद्यार्थी सीमित डेटा और साझा मोबाइल पर काम कर सकते हैं। श्रेष्ठ मॉडल और विशेष सुविधाएँ शुल्क के पीछे हों तो सीखने की असमानता बढ़ सकती है। भाषा भी विभाजन का हिस्सा है: अंग्रेज़ी में गुणवत्तापूर्ण उत्तर और स्थानीय भाषा में कमजोर उत्तर मिलने से ज्ञान की पुरानी श्रेणी नई तकनीक में दोहराई जाएगी।

समाधान केवल उपकरण बाँटना नहीं। सार्वजनिक विद्यालयों और महाविद्यालयों को साझा कम्प्यूटिंग सुविधा, ऑफलाइन या कम-बैंडविड्थ सामग्री, स्थानीय भाषा इंटरफेस, शिक्षक सहायता और तकनीकी रखरखाव चाहिए। समुदाय पुस्तकालय, पंचायत केंद्र और महाविद्यालय प्रयोगशाला सुरक्षित एआई-अधिगम केंद्र बन सकते हैं। मुक्त शैक्षिक संसाधन और सार्वजनिक मॉडल निजी सदस्यता पर निर्भरता घटा सकते हैं।

डिजिटल विभाजन में ‘उपयोग की गुणवत्ता’ भी शामिल है। संपन्न विद्यार्थी एआई को शोध, कोड, भाषा और सृजन के लिए मार्गदर्शक की तरह उपयोग कर सकता है, जबकि कम सहायता वाला विद्यार्थी केवल तैयार उत्तर नकल करता है। इसलिए सभी विद्यार्थियों को आलोचनात्मक एआई साक्षरता, स्रोत-जाँच और प्रक्रिया-आधारित कार्य का प्रशिक्षण देना समानता की नीति है। शिक्षा में एआई की सफलता का माप कुल उपयोगकर्ता संख्या नहीं, बल्कि यह होना चाहिए कि क्या सबसे कमजोर समूह की भाषा, भागीदारी और सीखने के परिणाम सुधरे।

18. डेटा, गोपनीयता और बाल अधिकार

भाषा-अधिगम प्रणालियाँ असाधारण रूप से संवेदनशील डेटा एकत्र कर सकती हैं: विद्यार्थी की आवाज़, उच्चारण, गलतियाँ, रुचियाँ, बातचीत, भावनात्मक संकेत, स्थान और सीखने की गति। बच्चों के मामले में यह डेटा उनके भविष्य के प्रोफाइल, विज्ञापन या निगरानी में उपयोग नहीं होना चाहिए। भारत का डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम 2023 सहमति, वैध उद्देश्य और डेटा संरक्षण का ढाँचा देता है; शैक्षणिक संस्थानों को इसके अनुरूप स्पष्ट नीति बनानी होगी। [7] UNICEF की बाल-केंद्रित एआई मार्गदर्शिका सुरक्षा, गोपनीयता, निष्पक्षता, पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और सर्वोत्तम हित को केंद्रीय सिद्धांत मानती है। [8]

विद्यालय किसी ऐप को लोकप्रियता के आधार पर न अपनाए। उसे पूछना चाहिए: डेटा कहाँ संग्रहीत होगा? क्या कंपनी विद्यार्थी की बातचीत से मॉडल प्रशिक्षित करेगी? डेटा कब मिटेगा? क्या माता-पिता और विद्यार्थी सहमति वापस ले सकते हैं? क्या सेवा विज्ञापन-मुक्त है? क्या शिक्षक रिकॉर्ड डाउनलोड और सुधार सकता है? उल्लंघन की स्थिति में किसे सूचना मिलेगी? इन प्रश्नों के उत्तर अनुबंध में स्पष्ट होने चाहिए।

‘न्यूनतम आवश्यक डेटा’ सर्वोत्तम सिद्धांत है। यदि व्याकरण अभ्यास बिना विद्यार्थी का पूरा नाम, जन्मतिथि या आवाज़ स्थायी रूप से रखे चल सकता है, तो अतिरिक्त डेटा न लिया जाए। विद्यालय-प्रबंधित खाते, आयु-उपयुक्त इंटरफेस और सीमित प्रवेश उपयोगी हैं। संवेदनशील परामर्श, स्वास्थ्य, अनुशासन या व्यक्तिगत पहचान से संबंधित सूचना खुले उपभोक्ता चैटबॉट में डालने से साफ मना किया जाए।

गोपनीयता का अर्थ केवल कानूनी सूचना पर क्लिक कराना नहीं। सूचना सरल हिन्दी और स्थानीय भाषा में हो, बच्चे को समझ आए और विकल्प वास्तविक हो। एआई से शिक्षा पाने से इनकार करने वाले विद्यार्थी को नुकसान न हो; उसे समान गुणवत्ता का मानवीय या ऑफलाइन विकल्प मिले।

19. पक्षपात, तथ्यगत भ्रम और सांस्कृतिक प्रतिनिधित्व

बड़ा भाषा मॉडल अपने प्रशिक्षण डेटा में उपस्थित असमानताओं और रूढ़ियों को सीख सकता है। वह कुछ भाषाओं, क्षेत्रों, जातियों, लिंगों या पेशों को सीमित छवियों में प्रस्तुत कर सकता है। यदि विद्यार्थी ‘आदर्श परिवार’, ‘सुंदर भाषा’ या ‘सभ्य उच्चारण’ के उदाहरण माँगे, तो उत्तर में सामाजिक पक्षपात छिपा हो सकता है। सांस्कृतिक प्रश्नों पर मॉडल बहुसंख्यक या वैश्विक इंटरनेट दृष्टि को सामान्य सत्य बना देता है। इससे भाषा शिक्षा विविधता बढ़ाने के बजाय समरूपता ला सकती है।

दूसरी समस्या ‘हैलुसिनेशन’ या तथ्यगत भ्रम है—मॉडल आत्मविश्वास से ऐसी पुस्तक, उद्धरण, लेखक, शोध या ऐतिहासिक घटना गढ़ सकता है जिसका अस्तित्व नहीं। साहित्य और शोध में यह विशेष गंभीर है। विद्यार्थी यदि काल्पनिक संदर्भ सूची जमा करे तो शैक्षणिक विश्वसनीयता नष्ट होती है। हर दावे के साथ सत्यापनीय स्रोत माँगना उपयोगी है, पर मॉडल द्वारा दिया लिंक भी जाँचना होगा। प्राथमिक स्रोत, पुस्तकालय सूची, DOI, सरकारी वेबसाइट और मूल पाठ से सत्यापन आवश्यक है।

कक्षा में इन सीमाओं को केवल चेतावनी की तरह नहीं, गतिविधि की तरह पढ़ाया जा सकता है। विभिन्न भाषाओं में एक ही प्रश्न पूछकर उत्तरों की तुलना कराएँ; स्थानीय इतिहास पर मॉडल के दावे जाँचें; लिंग बदलकर पेशे के वर्णन देखें; प्रसिद्ध कविता की पंक्ति पूरी कराने पर मूल पाठ से मिलाएँ। विद्यार्थी त्रुटि-डायरी बनाए और अनुमान लगाए कि गलती डेटा, निर्देश या मॉडल की संरचना से आई। इस अभ्यास से वह एआई से भयभीत नहीं, विवेकपूर्ण उपयोगकर्ता बनता है।

संस्था को त्रुटियों की रिपोर्ट करने और विक्रेता से सुधार माँगने की प्रक्रिया रखनी चाहिए। जिस प्रणाली में भाषायी समूहों के बीच प्रदर्शन-अंतर बड़ा हो, उसे उच्च-दाँव कार्य में न लगाया जाए। निष्पक्षता केवल गणितीय औसत नहीं; प्रभावित समुदाय की अनुभूति और प्रतिनिधित्व भी उसका हिस्सा हैं।

20. शैक्षणिक ईमानदारी, लेखकीयता और कॉपीराइट

जनरेटिव एआई ने लेखकीयता के अर्थ को जटिल बना दिया है। विचार माँगना, वर्तनी सुधारना, अनुच्छेद पुनर्लेखित कराना और पूरा शोधपत्र बनवाना एक ही श्रेणी के कार्य नहीं हैं। इसलिए ‘एआई उपयोग किया या नहीं’ जैसा द्विआधारी प्रश्न अपर्याप्त है। संस्थान को सहायता के स्तर पर आधारित नीति चाहिए। सामान्य भाषा-सुधार कुछ कार्यों में स्वीकार्य हो सकता है; तर्क, विश्लेषण या अंतिम उत्तर बनवाना मूल्यांकन के उद्देश्य के विरुद्ध हो सकता है। हर पाठ्यक्रम अपने अधिगम परिणाम के अनुसार सीमा बताए।

एआई उपयोग की घोषणा संक्षिप्त किंतु स्पष्ट हो: प्रयुक्त उपकरण, तारीख, उद्देश्य, प्रमुख निर्देश और मनुष्य द्वारा किया सत्यापन। विद्यार्थी चाहे तो महत्त्वपूर्ण संवाद का परिशिष्ट रखे। यह घोषणा मशीन को लेखक का दर्जा नहीं देती, क्योंकि मशीन उत्तरदायित्व नहीं ले सकती; अंतिम लेखक वह व्यक्ति है जो पाठ की सत्यता, मौलिकता और प्रभाव की जिम्मेदारी स्वीकार करता है। यदि वह यह जिम्मेदारी नहीं निभा सकता, तो पाठ उसका नहीं माना जा सकता।

कॉपीराइट के स्तर पर प्रशिक्षण डेटा, उत्पन्न सामग्री की समानता और लेखक की शैली की नकल पर विश्वव्यापी बहस चल रही है। भाषा और साहित्य की कक्षा में किसी जीवित लेखक की हूबहू शैली में बड़े पैमाने पर सामग्री बनवाना नैतिक समस्या हो सकती है। बेहतर कार्य यह है कि विद्यार्थी शैलीगत विशेषताएँ पहचाने, छोटे उदाहरण की आलोचना करे और अपनी आवाज़ विकसित करे। प्रकाशन के लिए एआई से बने चित्र, अनुवाद या पाठ के लाइसेंस तथा पत्रिका की नीति जाँची जानी चाहिए।

ईमानदारी केवल चोरी रोकने का अनुशासन नहीं, ज्ञान निर्माण का मूल्य है। यदि विद्यार्थी यह समझे कि स्रोत देना संवाद और उत्तरदायित्व का माध्यम है, तो वह घोषणा को दंड से बचने की औपचारिकता नहीं मानेगा। शिक्षक भी पारदर्शी रहें: एआई से तैयार प्रश्न, सामग्री या प्रतिक्रिया को जाँचें और जहाँ उचित हो, उसके उपयोग की जानकारी दें।

21. भाषा, विचार और मानवीय एजेंसी

एआई का सबसे गहरा प्रभाव सुविधा से आगे मनुष्य की विचार-प्रक्रिया पर हो सकता है। भाषा में विचार बनाते समय व्यक्ति असमंजस, स्मृति, विरोध और अनुभव से गुजरता है। तैयार उत्तर यह कठिनाई घटाता है, पर कठिनाई का कुछ भाग सीखने के लिए आवश्यक है। यदि हर वाक्य मशीन सुझाए तो विद्यार्थी धीरे-धीरे अपने शब्द चुनने का आत्मविश्वास खो सकता है। वह अपनी प्रारंभिक, अपूर्ण आवाज़ को मशीन की चमकदार भाषा से कमतर मानने लगता है।

मानवीय एजेंसी की रक्षा का अर्थ तकनीक त्यागना नहीं, निर्णय का केंद्र मनुष्य में रखना है। विद्यार्थी पहले स्वयं सोचे, फिर सहायता ले; विकल्पों का मूल्यांकन करे; अंतिम पाठ में अपना अनुभव और तर्क जोड़े; और मशीन से असहमति व्यक्त करने का अभ्यास करे। शिक्षक ऐसे प्रश्न बनाए जिनका उत्तर केवल सूचना नहीं, मूल्य-निर्णय, स्थानीय अवलोकन और संवाद माँगता हो।

भाषा की विविधता भी विचार की विविधता है। यदि करोड़ों उपयोगकर्ता कुछ बड़े मॉडलों से समान वाक्य-संरचना, तर्क और रूपक लेने लगें, तो सार्वजनिक भाषा एकरूप हो सकती है। स्थानीय मुहावरे, संकोच, हास्य और अप्रत्यक्ष अभिव्यक्ति धीरे-धीरे ‘सुधारी’ जा सकती है। अतः भविष्य की शिक्षा को भाषायी विशिष्टता का उत्सव मनाना होगा। विद्यार्थी को अपनी बोली, परिवार की कथा और समुदाय के शब्दों का दस्तावेजीकरण करने दें; मशीन से उन्हें मानक रूप में मिटाने के बजाय अर्थ और इतिहास समझने का साधन बनाएँ।

22. राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय नीतिगत परिप्रेक्ष्य

तालिका 2. UNESCO के शिक्षक और विद्यार्थी एआई दक्षता ढाँचों की तुलना

पक्ष

शिक्षक ढाँचा [5]

विद्यार्थी ढाँचा [6]

दक्षताओं की संख्या

15

12

मुख्य आयाम

मानव-केंद्रितता; नैतिकता; आधार व अनुप्रयोग; शिक्षाशास्त्र; व्यावसायिक अधिगम

मानव-केंद्रितता; नैतिकता; तकनीक व अनुप्रयोग; प्रणाली-डिजाइन

प्रगति स्तर

अर्जन • गहनता • सृजन

समझ • प्रयोग • सृजन

भाषा-शिक्षा में उपयोग

पाठ-डिजाइन, सत्यापन, जिम्मेदार प्रतिपुष्टि

आलोचनात्मक उपयोग, सह-निर्माण, सुरक्षित नागरिकता

UNESCO ने जनरेटिव एआई के लिए मानव-केंद्रित, आयु-उपयुक्त और नियामक दृष्टि की अनुशंसा की है। उसकी 2023 मार्गदर्शिका कहती है कि तकनीकी विकास की गति नीतियों से तेज है; इसलिए डेटा संरक्षण, मानवीय क्षमता और शैक्षणिक सत्यापन पर तत्काल कार्य आवश्यक है। [1] 2024 के विद्यार्थी दक्षता ढाँचे में मानव-केंद्रित मानसिकता, नैतिकता, तकनीक और प्रणाली-डिजाइन के चार आयामों में 12 दक्षताएँ हैं। [6] शिक्षक ढाँचा पाँच आयामों में 15 दक्षताओं को ‘अर्जन, गहनता और सृजन’ स्तर पर रखता है। [5] इनका महत्त्व यह है कि एआई साक्षरता को केवल बटन चलाने या निर्देश लिखने तक सीमित नहीं किया गया।

UNESCO की 2021 एआई नैतिकता अनुशंसा मानव गरिमा, अधिकार, पारदर्शिता, निष्पक्षता, पर्यावरणीय स्थिरता और मानवीय निगरानी को आधार बनाती है। वह स्थानीय और आदिवासी भाषाओं में एआई नैतिकता संसाधनों की आवश्यकता भी स्वीकार करती है। [13] 2025 का बहुभाषिक डिजिटल रोडमैप इस विचार को आगे बढ़ाता है कि सभी भाषाओं को डिजिटल संसार में जीवित रहने का न्यायसंगत अवसर मिलना चाहिए। [14] ये सिद्धांत भारतीय भाषायी नीति के लिए उपयोगी वैश्विक आधार देते हैं।

भारत में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 बहुभाषिकता, मातृभाषा-आधारित प्रारंभिक शिक्षा, भारतीय भाषाओं में उच्च गुणवत्ता सामग्री और अनुवाद की आवश्यकता रेखांकित करती है। [2] NCF-SE 2023 कम से कम तीन भाषाओं की दक्षता तथा भारतीय भाषाओं के साहित्यिक स्तर तक विकास पर बल देता है। [3] IndiaAI Mission को 2024 में ₹10,371.92 करोड़ के परिव्यय के साथ स्वीकृति मिली; इसके स्तंभों में कम्प्यूट क्षमता, आधारभूत मॉडल, डेटा मंच, अनुप्रयोग, भविष्य कौशल, स्टार्टअप वित्त और सुरक्षित व विश्वसनीय एआई शामिल हैं। [15–16] 2026 तक सरकारी सूचना के अनुसार स्वदेशी बहुभाषी मॉडल और सार्वजनिक कम्प्यूट संरचना पर कार्य बढ़ा है। [21] भाषायी शिक्षा को इन निवेशों से जोड़ने के लिए शिक्षा मंत्रालय, MeitY, विश्वविद्यालय, राज्यों और भाषा समुदायों के बीच स्थायी समन्वय चाहिए।

नीति का मूल्य घोषणा से नहीं, क्रियान्वयन से तय होगा। स्थानीय भाषा सामग्री की संख्या, गुणवत्ता, शिक्षक-प्रशिक्षण, ग्रामीण पहुँच, दिव्यांग-अनुकूलता और भाषा-वार मॉडल प्रदर्शन जैसे मापदंड सार्वजनिक होने चाहिए। सार्वजनिक धन से बने डेटासेट और शैक्षणिक संसाधन उचित सुरक्षा के साथ व्यापक सार्वजनिक उपयोग के लिए उपलब्ध हों। निजी विक्रेता से खरीद में डेटा स्थानांतरण, मॉडल परिवर्तन, लागत वृद्धि और सेवा बंद होने की स्थिति के प्रावधान हों।

23. उच्च शिक्षा, शोध और भाषा विभागों का पुनर्गठन

चित्र 1. IndiaAI Mission के घटक-वार स्वीकृत वित्तीय आवंटन

स्रोत: भारत सरकार, PIB, 25 मार्च 2026 [16]। राशि ₹ करोड़ में; संपूर्ण मिशन का संदर्भ, केवल भाषायी शिक्षा का बजट नहीं।

विश्वविद्यालयों में एआई का उपयोग केवल प्रशासनिक दक्षता या अंग्रेज़ी शोध-पत्र संपादन तक सीमित नहीं रहना चाहिए। भाषा विभाग डिजिटल पाठ-संपादन, कॉर्पस निर्माण, अनुवाद स्मृति, मौखिक इतिहास, कम्प्यूटेशनल शब्दकोश, भाषा नीति और एआई नैतिकता के अंतर्विषयी केंद्र बन सकते हैं। भाषाविज्ञान, कम्प्यूटर विज्ञान, शिक्षा, मनोविज्ञान, इतिहास और साहित्य के संयुक्त पाठ्यक्रम नई शोध-दिशाएँ खोलेंगे।

शोधार्थी एआई से प्रारंभिक साहित्य-सूची, कोडिंग या सारांश सहायता ले सकता है, पर मूल स्रोत पढ़ना, अनुसंधान प्रश्न बनाना और निष्कर्ष का उत्तरदायित्व उसका है। काल्पनिक संदर्भ, चयनात्मक सारांश और गोपनीय साक्षात्कार डेटा का बाहरी प्रणाली में प्रवेश गंभीर जोखिम हैं। शोध नैतिकता समिति को एआई-विशिष्ट प्रपत्र चाहिए: कौन-सा डेटा किस सेवा में जाएगा, क्या प्रतिभागी सहमत हैं, क्या पहचान हटाई गई है, और परिणाम का मानव सत्यापन कैसे होगा।

भाषा विभागों के पाठ्यक्रम में ‘एआई और भाषा’ का आधार पाठ सभी विद्यार्थियों के लिए हो। उन्नत स्तर पर प्राकृतिक भाषा प्रसंस्करण का परिचय, डिजिटल संपादन, मशीन अनुवाद आलोचना, कॉर्पस पद्धति और डिजिटल मानविकी के विकल्प हों। तकनीकी पाठ को कोडिंग-केंद्रित बनाना आवश्यक नहीं; भाषा विद्यार्थी मॉडल के सामाजिक, भाषायी और सांस्कृतिक मूल्यांकन में विशिष्ट योगदान दे सकता है। इसी तरह कम्प्यूटर विज्ञान विद्यार्थी को समाजभाषाविज्ञान, अनुवाद और भाषा-नैतिकता समझनी चाहिए।

विश्वविद्यालय स्थानीय विद्यालयों और समुदायों के लिए संसाधन केंद्र बनें। वे सत्यापित शब्दावली, शिक्षक मॉड्यूल, खुला कॉर्पस, मॉडल परीक्षण और परामर्श दें। प्रत्येक क्षेत्रीय विश्वविद्यालय कम से कम एक अल्पसंसाधित भाषा या बोली के डिजिटल संरक्षण की दीर्घकालिक जिम्मेदारी ले सकता है। यह परियोजना त्वरित शोधपत्र के बजाय समुदाय के साथ निरंतर साझेदारी पर आधारित हो।

24. रोजगार, पेशेवर कौशल और भाषायी अर्थव्यवस्था

एआई कुछ नियमित भाषायी कार्यों—सामान्य अनुवाद, प्रतिलिपि, प्रारंभिक संपादन और मानक ग्राहक संवाद—को स्वचालित करेगा। इससे शुरुआती स्तर के रोजगार पर दबाव पड़ सकता है। साथ ही नए कार्य उभरेंगे: भाषा डेटा क्यूरेटर, मॉडल मूल्यांकनकर्ता, बहुभाषी संवाद डिजाइनर, एआई अनुवाद संपादक, शब्दावली विशेषज्ञ, सांस्कृतिक सुरक्षा समीक्षक, भाषायी UX शोधकर्ता और शिक्षा-प्रौद्योगिकी प्रशिक्षक। भविष्य का भाषायी पेशेवर भाषा ज्ञान को विषय-विशेष ज्ञान और तकनीकी विवेक से जोड़ेगा।

रोजगार-उन्मुख पाठ्यक्रम केवल उपकरणों के नाम न सिखाए, क्योंकि वे शीघ्र बदलते हैं। मूल कौशल हों: उच्च गुणवत्ता लेखन, स्रोत-जाँच, संपादन, अनुवाद निर्णय, डेटा-सफाई, गुणवत्ता मानदंड, गोपनीयता और परियोजना प्रबंधन। विद्यार्थी मशीन के आउटपुट में त्रुटि ढूँढ़कर उसे सुधारना, विविध उपयोगकर्ता समूहों के साथ परीक्षण करना और गुणवत्ता रिपोर्ट लिखना सीखे। बहुभाषी भारत में स्थानीय भाषा और क्षेत्रीय संस्कृति का गहरा ज्ञान आर्थिक संपदा बन सकता है।

कार्यस्थल में मानव श्रम का अवमूल्यन रोकना भी आवश्यक है। यदि अनुवादक से मशीन का खराब पाठ बहुत कम समय और पारिश्रमिक में सुधरवाया जाए, तो गुणवत्ता और पेशेवर गरिमा दोनों घटते हैं। संस्थानों को पश्च-संपादन के लिए स्पष्ट मानक, उचित पारिश्रमिक और त्रुटि-जोखिम का दायित्व तय करना चाहिए। संवेदनशील साहित्यिक, कानूनी और चिकित्सा कार्य में योग्य मानव विशेषज्ञ अनिवार्य रहें।

25. पर्यावरणीय लागत और टिकाऊ डिजिटल शिक्षा

बड़े एआई मॉडल के प्रशिक्षण और संचालन में ऊर्जा, पानी, डेटा केंद्र और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण लगते हैं। शिक्षा में लाखों छोटे प्रश्न भी सामूहिक रूप से पर्यावरणीय प्रभाव उत्पन्न कर सकते हैं। भाषायी शिक्षा यदि स्थिर पाठ या शब्दकोश के लिए हर बार विशाल मॉडल बुलाती है, तो संसाधन का अनावश्यक उपयोग होगा। टिकाऊ दृष्टि में कार्य के अनुसार तकनीक चुनी जाए: साधारण वर्तनी के लिए छोटा स्थानीय उपकरण, संस्थागत जानकारी के लिए सत्यापित खोज प्रणाली और जटिल संवाद के लिए बड़ा मॉडल।

विद्यार्थियों को डिजिटल तकनीक की भौतिकता समझानी चाहिए। ‘क्लाउड’ कोई निराकार स्थान नहीं; उसके पीछे बिजली, खनिज, सर्वर और श्रम है। उपकरण खरीद, मरम्मत और पुनर्चक्रण की नीति भी एआई शिक्षा का हिस्सा है। UNESCO की मानव-केंद्रित एआई दृष्टि स्थिरता को शिक्षक दक्षता से जोड़ती है। इसलिए संस्था उपयोग के लाभ के साथ ऊर्जा और लागत का आकलन करे, साझा संरचना अपनाए और अनावश्यक सामग्री उत्पादन से बचे।

स्थानीय और छोटे भाषा मॉडल गोपनीयता तथा पर्यावरण दोनों में लाभ दे सकते हैं, यद्यपि उनकी क्षमता सीमित होगी। भविष्य की कुशल प्रणाली अलग कार्यों के लिए अलग आकार के मॉडल चुनेगी। ‘सबसे बड़ा मॉडल ही सर्वोत्तम’ वाली धारणा के बजाय ‘उद्देश्य के लिए पर्याप्त, सत्यापित और कम संसाधन वाला मॉडल’ शिक्षा का सिद्धांत होना चाहिए।

26. 2030 का संभावित भाषायी कक्षा-परिदृश्य

2030 तक अनेक कक्षाओं में विद्यार्थी का डिजिटल भाषा-पोर्टफोलियो उसकी सहमति से पढ़ने, लिखने, बोलने और शब्दावली की प्रगति दिखा सकता है। शिक्षक सुबह डैशबोर्ड में देखेगा कि किस समूह को किस अवधारणा में कठिनाई है, पर उसे विद्यार्थियों की स्थायी लेबलिंग की अनुमति नहीं होगी। कक्षा से पहले एआई तीन स्तरों पर सामग्री का प्रारूप बनाएगा; शिक्षक स्थानीय उदाहरण और विश्वसनीय स्रोत जोड़कर उसे स्वीकृत करेगा। दिव्यांग विद्यार्थी कैप्शन, वाणी और सरल पाठ का विकल्प चुनेंगे।

कक्षा में प्रथम चरण मानव संवाद होगा। विद्यार्थी किसी स्थानीय विषय पर समूह में चर्चा करेंगे, तर्क लिखेंगे और प्रश्न बनाएँगे। दूसरे चरण में एआई से वैकल्पिक दृष्टि और भाषा-सुधार लेंगे। तीसरे चरण में उत्तर की तथ्य-जाँच और पक्षपात-विश्लेषण होगा। अंतिम चरण में विद्यार्थी संशोधित प्रस्तुति देगा और बताएगा कि मशीन की कौन-सी सलाह उसने अस्वीकार की। इस व्यवस्था में एआई हर जगह उपस्थित होगा, लेकिन केंद्र में सीखने वाला समुदाय रहेगा।

मूल्यांकन मिश्रित होगा: कुछ नियंत्रित ‘मानव-केवल’ कार्य आधारभूत क्षमता मापेंगे; कुछ ‘एआई-सहयोगी’ परियोजनाएँ विवेकपूर्ण उपयोग; और कुछ सामुदायिक कार्य वास्तविक संवाद तथा सामाजिक उत्तरदायित्व। प्रमाणपत्र केवल भाषा स्तर नहीं, स्रोत साक्षरता, बहुभाषी मध्यस्थता और एआई नैतिकता भी दर्शा सकता है। यह सकारात्मक परिदृश्य तभी संभव है जब सार्वजनिक नीति, शिक्षक प्रशिक्षण और भाषायी डेटा में अभी निवेश किया जाए।

27. भविष्य उन्मुख एआई शोध और भाषायी शिक्षा पर अपेक्षित प्रभाव

भविष्य के प्रभावों पर विचार करते समय तीन प्रमाण-स्तर अलग रखना आवश्यक है। पहला, नियंत्रित अध्ययन से मिला प्रत्यक्ष परिणाम; दूसरा, तकनीकी प्रयोग से मिला प्रारंभिक संकेत; तीसरा, उन संकेतों पर आधारित नीतिगत अनुमान। इस भेद के बिना नई तकनीक का प्रचार वैज्ञानिक निष्कर्ष का रूप ले सकता है। निम्न शोध-दिशाएँ भाषायी शिक्षा को प्रभावित करने की सर्वाधिक संभावना रखती हैं, पर प्रत्येक दिशा में स्थानीय और दीर्घकालिक परीक्षण आवश्यक है।

27.1 शिक्षाशास्त्रीय सुरक्षा से युक्त एआई ट्यूटर

एआई ट्यूटर पर 2025 के एक यादृच्छिक नियंत्रित अध्ययन में विश्वविद्यालयी भौतिकी विद्यार्थियों ने सावधानी से डिजाइन किए गए एआई ट्यूटर के साथ समान विषय की कक्षा-आधारित सक्रिय शिक्षा की तुलना में अधिक सीखने का लाभ दिखाया और कम समय लगाया। शोधकर्ताओं ने परिणाम को सामान्य चैटबॉट की शक्ति नहीं, शोध-आधारित शिक्षाशास्त्रीय डिजाइन से जोड़ा। [22] यह प्रमाण भाषा-शिक्षा के लिए संभावित दिशा देता है: ट्यूटर विद्यार्थी को तत्काल उत्तर न देकर संकेत, प्रतिप्रश्न, उदाहरण और पुनर्प्राप्ति-अभ्यास दे सकता है।

इसके विपरीत PNAS में प्रकाशित विद्यालयी गणित अध्ययन ने दिखाया कि बिना सुरक्षा वाला जनरेटिव एआई अभ्यास के दौरान प्रदर्शन बढ़ा सकता है, पर सहायता हटने पर स्वतंत्र अधिगम को नुकसान पहुँचा सकता है; संरचित ‘GPT Tutor’ ने इस नकारात्मक प्रभाव को काफी हद तक घटाया। [23] विषय गणित था, इसलिए निष्कर्ष को सीधे हिन्दी कक्षा पर लागू नहीं किया जा सकता। फिर भी मजबूत नीतिगत संकेत यह है कि उत्तर देने वाला चैटबॉट और सीखने में सहायता देने वाला ट्यूटर अलग उत्पाद हैं। अपेक्षित प्रभाव तभी सकारात्मक होगा जब भाषा ट्यूटर कठिन शब्द का तत्काल उत्तर देने के साथ विद्यार्थी से अर्थ का अनुमान, वाक्य-निर्माण और बाद में बिना सहायता पुनःप्रयोग भी कराए।

भविष्य का प्रमुख शोध प्रश्न यह होना चाहिए कि क्या एआई की सहायता हटने के बाद भी सुनने, बोलने, पढ़ने और लिखने की स्वतंत्र क्षमता बनी रहती है। अल्पकालिक कार्य-पूर्णता को सीखने का प्रमाण न माना जाए। हिन्दी और भारतीय भाषाओं में पूर्व-परीक्षण, पश्च-परीक्षण तथा विलंबित परीक्षण वाले नियंत्रित अध्ययन आवश्यक हैं।

27.2 बहुमाध्यमीय और वाणी-आधारित अधिगम

बहुमाध्यमीय मॉडल पाठ, ध्वनि, चित्र और दस्तावेज़ को साथ लेकर काम करते हैं। भारत सरकार की आधिकारिक सूचना के अनुसार BharatGen की दिशा 22 अनुसूचित भारतीय भाषाओं में पाठ, वाणी और दस्तावेज़-दृष्टि क्षमताओं को जोड़ने की है; फरवरी 2026 की सूचना Param-2, Shrutam, Sooktam और DocBodh जैसे घटकों का उल्लेख करती है। [29] इसका संभावित शैक्षणिक प्रभाव यह होगा कि विद्यार्थी किसी स्थानीय वस्तु की तस्वीर लेकर अपनी भाषा में उसका वर्णन सुन सके, बोले हुए उत्तर का पाठ पाए और उसी सामग्री का हिन्दी या दूसरी भारतीय भाषा में रूपांतरण कर सके।

यह प्रभाव अभी ‘अपेक्षित’ है, सार्वभौमिक रूप से सिद्ध नहीं। वाणी मॉडल को आयु, लिंग, क्षेत्र, उच्चारण, शोर और कोड-मिश्रण पर स्वतंत्र रूप से जाँचना होगा। दस्तावेज़-दृष्टि पुरानी पुस्तक, हस्तलेख या खराब मुद्रण में त्रुटि कर सकती है। शोध में केवल औसत शुद्धता नहीं, शिक्षण पर त्रुटि का प्रभाव मापा जाए—क्या गलत प्रतिलिपि विद्यार्थी की वर्तनी बिगाड़ती है, क्या क्षेत्रीय उच्चारण को बार-बार अस्वीकार करने से उसका आत्मविश्वास घटता है, और क्या शिक्षक त्रुटि शीघ्र सुधार सकता है।

27.3 बहुभाषी मॉडल में डेटा-संतुलन और भाषा-परिवार

बहुभाषी मॉडल के लिए केवल कुल डेटा बढ़ाना पर्याप्त नहीं; विभिन्न भाषाओं का अनुपात महत्त्वपूर्ण है। ACL 2025 के एक प्रयोगात्मक अध्ययन ने भाषा-परिवारों के लिए नमूना अनुपात और मॉडल प्रदर्शन के संबंध का विश्लेषण करते हुए बहुभाषी प्रशिक्षण के बेहतर संतुलन की दिशा सुझाई। [24] इसका संभावित प्रभाव यह है कि हिन्दी, मराठी, नेपाली, भोजपुरी या अन्य संबंधित भाषाओं के बीच साझा संरचनाओं से पारभाषिक लाभ मिल सकता है, पर बड़ी भाषा के अत्यधिक डेटा से छोटी भाषा दब भी सकती है।

भविष्य के भारतीय शोध को भाषा-परिवार के भीतर और बाहर दोनों प्रकार के हस्तांतरण का परीक्षण करना चाहिए। परीक्षा केवल अनुवाद पर न हो; व्याकरण, सांस्कृतिक ज्ञान, शिष्टाचार, साहित्यिक उद्धरण और स्थानीय नामों पर अलग बेंचमार्क बने। अपेक्षित लाभ है कि कम डेटा वाली भाषा को संबंधित भाषाओं से समर्थन मिलेगा। संभावित जोखिम है ‘भाषायी निकटता का भ्रम’, जिसमें मॉडल समान दिखने वाले शब्दों या संरचनाओं को गलत अर्थ में मिला दे।

27.4 छोटे, स्थानीय और गोपनीयता-संरक्षक मॉडल

विद्यालय और विश्वविद्यालय को हर कार्य के लिए विशाल बाहरी मॉडल की आवश्यकता नहीं। अल्पसंसाधित भाषाओं पर शोध दिखाता है कि लक्षित डेटा-संग्रह, निरंतर पूर्व-प्रशिक्षण और निर्देश-ट्यूनिंग से छोटे या खुले मॉडल की क्षमता सुधारी जा सकती है। Võro, Livonian और Komi पर 2025 के अध्ययन ने डेटा-संग्रह से मूल्यांकन तक पूरा विकास-चक्र प्रस्तुत किया, जबकि अन्य प्रयोगों ने सीमित उदाहरणों से कम-संसाधित भाषा क्षमता बढ़ाने की संभावना दिखाई। [26–27]

अपेक्षित प्रभाव है कि संस्था पाठ्यक्रम, शब्दावली और स्थानीय भाषा पर केंद्रित मॉडल अपने नियंत्रण में चला सकेगी; विद्यार्थी डेटा बाहर भेजने की आवश्यकता घटेगी; लागत तथा ऊर्जा कम हो सकती है। पर छोटा मॉडल अपने सीमित ज्ञान के कारण अधिक त्रुटि भी कर सकता है। इसलिए स्थानीय मॉडल को ‘सुरक्षित होने के कारण सही’ न माना जाए। सत्यापित ज्ञान-संग्रह, संस्करण-नियंत्रण, नियमित ऑडिट और स्पष्ट अस्वीकरण आवश्यक रहेंगे।

27.5 सिंथेटिक डेटा और अल्पसंसाधित भाषाएँ

जब वास्तविक लेबलयुक्त डेटा कम हो, बड़ा मॉडल कृत्रिम उदाहरण बनाकर छोटे मॉडल को प्रशिक्षित कर सकता है। EACL 2026 के प्रयोगों में थोड़ी मात्रा का सिंथेटिक डेटा कुछ कम-संसाधित स्थितियों में छोटे मॉडलों को बड़े जनरेटर से बेहतर वर्गीकरण प्रदर्शन तक ले गया। [25] इससे भारतीय बोलियों के लिए प्रारंभिक अभ्यास, त्रुटि उदाहरण और प्रश्नोत्तर बनाने की संभावना खुलती है।

फिर भी कृत्रिम डेटा वास्तविक समुदाय का स्थान नहीं ले सकता। यदि जनरेटर में पहले से पक्षपात या गलत व्याकरण है, तो वह हजारों कृत्रिम उदाहरणों में बढ़ सकता है। अपेक्षित सकारात्मक प्रभाव—कम लागत में मॉडल सुधार—तभी विश्वसनीय होगा जब मातृभाषी वक्ता नमूनों की समीक्षा करें, वास्तविक डेटा पर अलग परीक्षण हो और सिंथेटिक सामग्री का अनुपात दर्ज किया जाए। भविष्य का शोध यह मापे कि किस मात्रा के बाद कृत्रिम डेटा भाषा की वास्तविक विविधता को दबाने लगता है।

27.6 एजेंट-आधारित व्यक्तिगत अधिगम

अगली पीढ़ी के एआई एजेंट केवल उत्तर नहीं देंगे; वे लक्ष्य तय करने, अभ्यास चुनने, प्रगति याद रखने, पुनरावृत्ति निर्धारित करने और अन्य डिजिटल साधनों से सामग्री लाने का प्रयास करेंगे। संभावित लाभ निरंतर व्यक्तिगत मार्गदर्शन है। जोखिम यह है कि एक अपारदर्शी प्रणाली विद्यार्थी की क्षमता, रुचि और भविष्य के बारे में अत्यधिक निर्णय लेने लगे। UNESCO का भविष्य-विमर्श अधिकार, समानता और मानवीय सह-निर्माण को ऐसे परिवर्तन के केंद्र में रखने की माँग करता है। [28]

भाषा शिक्षा में एजेंट को सीमित अधिकार दिए जाएँ: वह अभ्यास सुझाए, पर पाठ्यक्रम या अंतिम स्तर स्वयं तय न करे; स्मृति विद्यार्थी देख और मिटा सके; शिक्षक उसकी अनुशंसा बदल सके; और प्रणाली ‘कमज़ोर विद्यार्थी’ जैसी स्थायी पहचान न बनाए। शोध को अधिगम परिणाम के साथ आत्मनिर्भरता, मानसिक कल्याण, शिक्षक-विद्यार्थी संबंध और भाषायी पहचान भी मापनी चाहिए।

27.7 अपेक्षित प्रभावों का प्रमाण-आधारित निष्कर्ष

वर्तमान प्रमाण से यह कहना उचित है कि अच्छी तरह डिजाइन किया एआई ट्यूटर कुछ संदर्भों में सीखने और सहभागिता को बढ़ा सकता है, जबकि बिना सुरक्षा की सहायता स्वतंत्र सीखने को नुकसान पहुँचा सकती है। [22–23] तकनीकी शोध से यह संकेत मिलता है कि संतुलित बहुभाषी प्रशिक्षण, लक्षित छोटे मॉडल और सावधानीपूर्वक सत्यापित सिंथेटिक डेटा कम-संसाधित भाषाओं की क्षमता बढ़ा सकते हैं। [24–27] भारतीय सार्वजनिक परियोजनाएँ बहुमाध्यमीय और बहुभाषी संरचना का आधार बना रही हैं। [29]

लेकिन अभी यह प्रमाण नहीं है कि कोई एक मॉडल सभी भारतीय भाषाओं, आयु समूहों और शिक्षण संदर्भों में समान रूप से प्रभावी है। इसलिए सरकारी नीति को ‘अनुसंधान-सक्षम कार्यान्वयन’ अपनाना चाहिए: सीमित पायलट, पूर्वनिर्धारित मापदंड, स्वतंत्र मूल्यांकन, नकारात्मक परिणामों का प्रकाशन और विस्तार से पहले सार्वजनिक समीक्षा। यही दृष्टि भविष्य के उत्साह को प्रमाण, अधिकार और उत्तरदायित्व से जोड़ सकती है।

28. 2040 के तीन संभावित भविष्य

तालिका 3. भविष्य के एआई शोध, उपलब्ध प्रमाण और भाषा-शिक्षा पर संभावित असर

शोध दिशा

अभी उपलब्ध प्रमाण

संभावित असर

सावधानी

सुरक्षा-युक्त एआई ट्यूटर

नियंत्रित अध्ययन में सीखने का लाभ [22]; बिना सुरक्षा नुकसान का प्रमाण [23]

व्यक्तिगत संकेत और अभ्यास

सहायता हटने के बाद स्वतंत्र क्षमता जाँची जाए

बहुभाषी डेटा-संतुलन

भाषा-परिवार और नमूना अनुपात पर ACL प्रयोग [24]

छोटी भाषाओं को संबंधित भाषाओं से मदद

बड़ी भाषा द्वारा छोटी भाषा दबने का खतरा

कृत्रिम प्रशिक्षण-सामग्री

कम-संसाधन प्रयोगों में छोटे मॉडल का सुधार [25]

कम लागत में अधिक अभ्यास-सामग्री

मातृभाषी वक्ता द्वारा जाँच जरूरी

स्थानीय छोटे मॉडल

Finno-Ugric और अन्य कम-संसाधन भाषाओं पर प्रयोग [26–27]

गोपनीयता, कम लागत, स्थानीय पाठ्यक्रम

सीमित ज्ञान और गलत उत्तर

कई माध्यमों वाला भारतीय एआई

BharatGen के आधिकारिक मॉडल और भाषा-कवरेज [29]

पाठ, आवाज़ और दस्तावेज़ से बहुभाषी सीखना

भाषा-वार स्वतंत्र परीक्षण अभी जरूरी

एआई एजेंट

तेजी से विकसित शोध; व्यापक शिक्षा प्रमाण अभी सीमित [28]

दीर्घकालिक व्यक्तिगत अध्ययन योजना

विद्यार्थी प्रोफाइल और निर्णय पर मानव नियंत्रण

भविष्य पहले से निर्धारित नहीं है। वर्तमान निर्णयों के आधार पर 2040 तक भाषायी शिक्षा तीन अलग दिशाओं में जा सकती है। पहला ‘स्वचालित सुविधा’ का परिदृश्य है। इसमें कुछ वैश्विक कंपनियों के मॉडल लगभग सभी शैक्षणिक सामग्री, अनुवाद और मूल्यांकन नियंत्रित करेंगे। शिक्षक प्रणाली के निर्देश लागू करेगा, विद्यार्थी तैयार उत्तरों का उपभोक्ता होगा और स्थानीय भाषाएँ सीमित इंटरफेस तक रह जाएँगी। दक्षता बढ़ेगी, पर सांस्कृतिक विविधता, गोपनीयता और शैक्षणिक स्वायत्तता घट सकती है।

दूसरा ‘डिजिटल विभाजन’ का परिदृश्य है। संपन्न संस्थान श्रेष्ठ व्यक्तिगत शिक्षक, बहुमाध्यमीय प्रयोगशाला और मानव मार्गदर्शन खरीदेंगे; साधनहीन संस्थानों को विज्ञापन-आधारित या कमजोर स्वचालित सामग्री मिलेगी। बड़ी भाषाओं में समृद्ध शिक्षा और छोटी भाषाओं में त्रुटिपूर्ण अनुवाद होगा। तकनीक उपलब्ध होते हुए भी असमानता बढ़ेगी क्योंकि गुणवत्ता, डेटा और प्रशिक्षित शिक्षक समान नहीं होंगे।

तीसरा ‘मानव-केंद्रित बहुभाषी साझेदारी’ का वांछनीय परिदृश्य है। इसमें सार्वजनिक भाषा संरचना, समुदाय-स्वामित्व डेटा, प्रशिक्षित शिक्षक, स्वतंत्र ऑडिट और स्पष्ट अधिकार होंगे। विद्यार्थी एआई को अभ्यास और खोज में प्रयोग करेगा, किंतु साहित्य, संवाद, नैतिक निर्णय और सामुदायिक अनुभव शिक्षा के केंद्र में रहेंगे। हर भाषा को डिजिटल विकास के लिए न्यूनतम सार्वजनिक निवेश मिलेगा और स्थानीय वक्ता मॉडल निर्माण में भागीदार होंगे। संस्थाएँ उपकरण बदल सकेंगी; डेटा तथा पाठ्य सामग्री किसी एक कंपनी में बंद नहीं होंगे।

इन परिदृश्यों का उद्देश्य भविष्यवाणी नहीं, नीति-चयन स्पष्ट करना है। यदि आज केवल सुविधा और लागत बचत देखी जाएगी तो पहला या दूसरा भविष्य स्वतः मजबूत होगा। तीसरे भविष्य के लिए सार्वजनिक निवेश, लोकतांत्रिक शासन और शिक्षक-समुदाय की सक्रिय भूमिका आवश्यक है।

29. मानव-केंद्रित एआई भाषा-शिक्षण मॉडल

इस आलेख के आधार पर एक छह-चरणीय मॉडल प्रस्तावित किया जा सकता है। पहले चरण में शिक्षक अधिगम परिणाम निर्धारित करे: क्या विद्यार्थी शब्दावली, संवाद, आलोचनात्मक पठन, लेखन या अनुवाद सीख रहा है? दूसरे चरण में आधारभूत मानव कार्य हो, जिससे वास्तविक क्षमता और पूर्वज्ञान सामने आए। तीसरे चरण में उपयुक्त एआई सहायता चुनी जाए—व्याख्या, अभ्यास, प्रतिक्रिया या विकल्प निर्माण। चौथे चरण में उत्तर का स्रोत, पक्षपात, भाषा और सांस्कृतिक उपयुक्तता जाँची जाए। पाँचवें चरण में सहपाठी तथा शिक्षक के साथ संवाद और संशोधन हो। छठे चरण में विद्यार्थी यह लिखे कि उसने क्या सीखा, मशीन की कौन-सी सलाह बदली और आगे स्वतंत्र रूप से क्या कर सकता है।

यह मॉडल ‘पहले मशीन, बाद में जाँच’ की सामान्य आदत को बदलता है। इसमें एआई लक्ष्य नहीं, मध्यवर्ती साधन है। हर चक्र के अंत में कुछ क्षमता विद्यार्थी के भीतर स्थानांतरित होनी चाहिए; यदि वह अगली बार भी उसी सहायता के बिना कार्य न कर पाए, तो उपयोग ने निर्भरता बढ़ाई, अधिगम नहीं।

चार सुरक्षा-वृत्त इस मॉडल को घेरते हैं। पहला, भाषा और संस्कृति: सामग्री स्थानीय प्रसंग तथा विविध भाषायी रूपों का सम्मान करे। दूसरा, प्रमाण और गुणवत्ता: स्रोत सत्यापन तथा मानवीय समीक्षा हो। तीसरा, अधिकार और डेटा: न्यूनतम डेटा, सूचित सहमति और विकल्प उपलब्ध हों। चौथा, समानता और पहुँच: दिव्यांग तथा वंचित विद्यार्थी समान गुणवत्ता से लाभ लें। दस्तावेज़ में दिया गया वैचारिक आरेख इन्हीं तत्वों का संबंध प्रदर्शित करता है।

30. विद्यालय और महाविद्यालय के लिए चरणबद्ध कार्ययोजना

चित्र 2. मानव-केंद्रित एआई-सहायित भाषा-शिक्षण चक्र

स्रोत: लेखक द्वारा विकसित वैचारिक मॉडल; UNESCO के मानव-केंद्रित सिद्धांतों [1, 5–6, 13] से प्रेरित।

संस्था को एआई अपनाने से पहले एक आधार सर्वेक्षण करना चाहिए: उपलब्ध उपकरण, इंटरनेट, शिक्षकों की दक्षता, विद्यार्थियों की भाषाएँ, दिव्यांगता-संबंधी आवश्यकताएँ और मौजूदा डेटा नीति। इसके आधार पर एक वर्ष का सीमित पायलट चुना जाए। पायलट का उद्देश्य ‘सबको एआई देना’ नहीं, किसी स्पष्ट समस्या का समाधान होना चाहिए—जैसे पहली पीढ़ी के विद्यार्थियों को हिन्दी अकादमिक लेखन में प्रतिक्रिया देना या बहुभाषी कक्षा के लिए द्विभाषी शब्दावली बनाना।

संस्थागत कार्ययोजना के बारह बिंदु निम्न हैं:

  1. शिक्षक, विद्यार्थी, आईटी विशेषज्ञ, पुस्तकालयाध्यक्ष और अभिभावक प्रतिनिधि वाली एआई-शिक्षा समिति बनाई जाए।

  2. प्रत्येक पाठ्यक्रम में अनुमत, सीमित और निषिद्ध एआई उपयोग का स्पष्ट उल्लेख हो।

  3. स्वतंत्र क्षमता और एआई-सहयोगी क्षमता के लिए अलग मूल्यांकन तैयार हों।

  4. शिक्षक-प्रशिक्षण विषय-विशेष, व्यवहारिक और निरंतर हो; केवल प्रदर्शन-कार्यशाला न हो।

  5. किसी भी सामग्री को कक्षा में देने से पहले शिक्षक तथ्य, भाषा और सांस्कृतिक उपयुक्तता जाँचे।

  6. विद्यार्थी के व्यक्तिगत तथा संवेदनशील डेटा को खुले उपभोक्ता उपकरण में डालने पर रोक हो।

  7. कम-बैंडविड्थ, ऑफलाइन और गैर-एआई विकल्प उपलब्ध रहें।

  8. भारतीय भाषाओं, बोलियों और दिव्यांग उपयोगकर्ताओं पर उपकरण का स्थानीय परीक्षण हो।

  9. पुस्तकालय सत्यापन, उद्धरण और डिजिटल स्रोत-साक्षरता का प्रशिक्षण दे।

  10. एआई उपयोग घोषणा का सरल, दंड-रहित और सीख-केंद्रित प्रारूप अपनाया जाए।

  11. हर पायलट में सीखने के परिणाम, शिक्षक समय, लागत, त्रुटि, समानता और विद्यार्थी कल्याण मापा जाए।

  12. वार्षिक सार्वजनिक समीक्षा के बाद ही कार्यक्रम का विस्तार किया जाए।

कार्यान्वयन को तीन अवधियों में बाँटा जा सकता है। पहले छह महीनों में नीति, प्रशिक्षण और छोटे प्रयोग; अगले बारह महीनों में चयनित पाठ्यक्रमों में मूल्यांकन; और दो वर्ष बाद प्रमाण के आधार पर विस्तार। त्वरित व्यापक खरीद से संस्था किसी अनुपयुक्त विक्रेता में फँस सकती है। पायलट में भी वैकल्पिक व्यवस्था और डेटा निष्कासन योजना पहले से होनी चाहिए।

शिक्षक के दैनिक उपयोग के लिए ‘चार-जाँच सूत्र’ उपयोगी है: उद्देश्य, प्रमाण, पक्षपात और गोपनीयता। यदि उपकरण अधिगम उद्देश्य स्पष्ट रूप से आगे नहीं बढ़ाता, स्रोत नहीं देता, किसी समूह पर कमजोर है या अनावश्यक डेटा माँगता है, तो उसका उपयोग स्थगित किया जाए। विद्यार्थी के लिए ‘सोचो–पूछो–जाँचो–बदलो–घोषित करो’ सूत्र अपनाया जा सकता है।

31. भारत के लिए नीतिगत अनुशंसाएँ

प्रथम, भारतीय भाषाओं के लिए राष्ट्रीय सार्वजनिक डेटा ट्रस्ट बनाए जाएँ, जिनमें विश्वविद्यालय, भाषा अकादमी और समुदाय भागीदार हों। डेटा का स्तर, लाइसेंस, सहमति और उपयोग इतिहास दर्ज हो। बड़ी भाषाओं के साथ हर वर्ष कुछ अल्पसंसाधित भाषाओं को विशेष निधि मिले। ध्वनि, पाठ और शब्दकोश के साथ बच्चों की आयु-उपयुक्त सामग्री भी विकसित हो।

द्वितीय, शिक्षक-शिक्षा में राष्ट्रीय एआई दक्षता ढाँचा बनाया जाए जो UNESCO के सिद्धांतों को भारतीय बहुभाषी वास्तविकता से जोड़े। B.Ed., M.Ed. और संकाय विकास कार्यक्रम में एआई शिक्षाशास्त्र, डेटा अधिकार, स्रोत सत्यापन, समावेशन और विषय-विशेष प्रयोग अनिवार्य हों। प्रमाणन उपकरण-विशेष के बजाय हस्तांतरणीय दक्षताओं पर आधारित हो।

तृतीय, शैक्षणिक एआई के लिए स्वतंत्र बहुभाषी परीक्षण संस्था या मानक विकसित हों। भाषा-वार शुद्धता, उच्चारण विविधता, सांस्कृतिक पक्षपात, बच्चों की सुरक्षा, दिव्यांग-अनुकूलता और ऊर्जा उपयोग के परिणाम सार्वजनिक हों। उच्च-दाँव वाली प्रणाली को प्रमाणन और नियमित ऑडिट के बिना प्रयोग न किया जाए।

चतुर्थ, BHASHINI, DIKSHA, SWAYAM और विश्वविद्यालयी डिजिटल संसाधनों के बीच मानकीकृत संपर्क बने। शिक्षक सत्यापित पाठ को आसानी से अनुवाद, कैप्शन और सरल रूप में बदल सके, फिर सुधार को साझा संग्रह में वापस भेज सके। ‘मशीन + विषय विशेषज्ञ + भाषा विशेषज्ञ’ त्रिस्तरीय समीक्षा उच्च शिक्षा की सामग्री के लिए अपनाई जाए।

पंचम, सार्वजनिक अनुसंधान निधि केवल मॉडल बनाने पर नहीं, दीर्घकालिक शैक्षिक प्रभाव पर भी लगे। क्या एआई से भाषा दक्षता स्थायी रूप से बढ़ी? क्या ग्रामीण और शहरी अंतर घटा? क्या शिक्षक का अर्थपूर्ण समय बचा? क्या स्थानीय भाषा प्रयोग बढ़ा? इन प्रश्नों पर बहुवर्षीय, स्वतंत्र और भाषा-विशिष्ट अध्ययन चाहिए। नकारात्मक परिणाम भी प्रकाशित किए जाएँ।

षष्ठ, रोजगार संक्रमण के लिए अनुवादक, संपादक और भाषा शिक्षक को पुनःकौशल कार्यक्रम मिले। मशीन पश्च-संपादन को कम मूल्य का यांत्रिक श्रम न मानकर विशेषज्ञ कार्य के रूप में मान्यता दी जाए। सार्वजनिक परियोजनाओं में उचित पारिश्रमिक, श्रेय और गुणवत्ता दायित्व निर्धारित हों।

सप्तम, बच्चों और युवाओं की आवाज़ नीति निर्माण में शामिल हो। वे केवल सुरक्षा के विषय नहीं, शिक्षा के सहभागी हैं। उपयोगकर्ता परिषद और छात्र संसद उपकरणों के अनुभव, दबाव और लाभ पर प्रतिक्रिया दें। स्थानीय भाषाओं में सरल शिकायत तथा सुधार व्यवस्था उपलब्ध हो।

32. एक आदर्श भाषा-पाठ का उदाहरण

मान लें स्नातक स्तर पर विषय है—‘डिजिटल युग में लोकभाषा का भविष्य’। कक्षा से पहले विद्यार्थी अपने परिवार या क्षेत्र से पाँच ऐसे शब्द लाएँ जिनका मानक हिन्दी में ठीक समतुल्य नहीं मिलता। कक्षा में वे अर्थ, प्रसंग और भाव बताएँ। समूह इन शब्दों से छोटी कथा बनाए। यह चरण पूर्णतः मानव और समुदाय-आधारित है।

दूसरे चरण में विद्यार्थी एआई से उन शब्दों का अर्थ और उदाहरण पूछें। वे उत्तर की अपने परिवार या मातृभाषी वक्ता से तुलना करें और त्रुटियों को चिह्नित करें। तीसरे चरण में मॉडल से भाषा-संरक्षण की योजना बनवाएँ, फिर उसकी आलोचना करें: क्या उसने सहमति, श्रेय, डेटा स्वामित्व और पीढ़ियों के अंतर पर विचार किया? चौथे चरण में समूह अपनी संशोधित योजना प्रस्तुत करे और पाँच मिनट की मौखिक प्रतिरक्षा दे।

मूल्यांकन में 20 प्रतिशत स्थानीय डेटा की प्रामाणिकता, 20 प्रतिशत भाषायी विश्लेषण, 20 प्रतिशत एआई-उत्तर की आलोचना, 20 प्रतिशत संशोधित योजना और 20 प्रतिशत मौखिक प्रस्तुति हो। विद्यार्थी एआई उपयोग का विवरण संलग्न करे। इस पाठ में तकनीक स्थानीय ज्ञान को विस्थापित नहीं करती; उसकी सीमा उजागर करके विद्यार्थी की भाषा-जागरूकता बढ़ाती है। यही भविष्य की भाषायी शिक्षा की दिशा हो सकती है।

33. निष्कर्ष

कृत्रिम बुद्धिमत्ता भाषायी शिक्षा के लिए न तो स्वतः मुक्ति है, न अनिवार्य विनाश। वह एक शक्तिशाली सामाजिक-तकनीकी व्यवस्था है जिसका प्रभाव उसकी रचना, स्वामित्व, डेटा, शिक्षाशास्त्र और शासन पर निर्भर करेगा। वह व्यक्तिगत अभ्यास, तत्काल प्रतिपुष्टि, बहुभाषी सामग्री, अनुवाद और सहायक प्रौद्योगिकी से शिक्षा की पहुँच बढ़ा सकता है। वह शिक्षक को प्रारंभिक सामग्री और निदान में समय बचा सकता है। भारतीय भाषाओं को सार्वजनिक निवेश, समुदाय सहभागिता और सत्यापित डेटा मिले तो वह डिजिटल पुनर्जागरण का माध्यम बन सकता है।

साथ ही वही तकनीक तथ्यगत भ्रम, निर्भरता, निगरानी, पक्षपात, साहित्यिक चोरी, सांस्कृतिक एकरूपता और डिजिटल असमानता को बढ़ा सकती है। सबसे बड़ा खतरा शिक्षक का लोप नहीं, शिक्षा के उद्देश्य का संकुचन है—यदि भाषा सीखना तैयार उत्तर प्राप्त करने तक सीमित हो जाए। भाषा मनुष्य को केवल काम के निर्देश नहीं देती; वह स्मृति, संबंध, असहमति, कल्पना और आत्मसम्मान देती है। इन मानवीय आयामों को किसी दक्षता सूचकांक में पूरी तरह नहीं मापा जा सकता।

इसलिए भविष्य का उचित सूत्र है: एआई से समर्थित, शिक्षक द्वारा निर्देशित, विद्यार्थी द्वारा जाँचा गया और समुदाय के प्रति उत्तरदायी अधिगम। तकनीक अभ्यास को व्यक्तिगत बनाए, पर शिक्षा को एकाकी न करे; अनुवाद तेज करे, पर भाषायी अंतर मिटाए नहीं; लेखन सुधारे, पर आवाज़ छीन न ले; मूल्यांकन में सहायता दे, पर निर्णय पर एकाधिकार न करे। भारत के लिए अवसर विशेष है क्योंकि उसकी बहुभाषिकता विश्व को ऐसा एआई मॉडल दे सकती है जो विविधता को समस्या नहीं, ज्ञान-संसाधन मानता हो।

भविष्य की भाषायी शिक्षा का अंतिम प्रश्न यह नहीं होगा कि मशीन कितनी अच्छी भाषा बोलती है। निर्णायक प्रश्न होगा कि मशीन के साथ रहते हुए मनुष्य कितनी स्वतंत्रता से सोचता है, कितनी जिम्मेदारी से बोलता है, कितनी संवेदना से सुनता है और कितनी विविधता के साथ सह-अस्तित्व बनाता है। यदि शिक्षा इन क्षमताओं को केंद्र में रखती है, तो कृत्रिम बुद्धिमत्ता मानवीय भाषा के भविष्य की प्रतिस्पर्धी नहीं, उसकी रचनात्मक सहयोगी बन सकती है।

क्रमांकित संदर्भ

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