Friday, 28 August 2026

प्रधानमंत्री मोदी की उज़्बेकिस्तान यात्रा: मध्य एशिया में भारत की बढ़ती भूमिका और पुरानी दोस्ती का नया अध्याय

 प्रधानमंत्री मोदी की उज़्बेकिस्तान यात्रा: मध्य एशिया में भारत की बढ़ती भूमिका और पुरानी दोस्ती का नया अध्याय 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उज़्बेकिस्तान यात्रा को केवल एक नियमित राजनयिक यात्रा के रूप में देखना इसके व्यापक अर्थ को सीमित कर देना होगा। भारत और उज़्बेकिस्तान के बीच संबंध सरकारों और समझौतों से कहीं पुराने हैं। इतिहास, साहित्य, भाषा, व्यापार, सूफी परंपरा और सिल्क रूट से लेकर भारतीय सिनेमा तक एक लंबी सांस्कृतिक यात्रा दोनों देशों को जोड़ती रही है। आज जब विश्व व्यवस्था तेजी से बदल रही है, तब प्रधानमंत्री की यह यात्रा भारत की मध्य एशिया नीति को नई गति देने का अवसर भी है।

मेरे लिए उज़्बेकिस्तान केवल विदेश नीति के मानचित्र पर स्थित एक मध्य एशियाई देश नहीं है। मुझे वहाँ रहकर पढ़ाने और वहाँ के अकादमिक एवं सांस्कृतिक जीवन को निकट से देखने का अवसर मिला है। ताशकंद में रहते हुए मैंने बार-बार अनुभव किया कि भारत के प्रति उज़्बेक समाज में एक सहज आत्मीयता मौजूद है। यह आत्मीयता केवल सरकारी संबंधों का परिणाम नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें इतिहास और जनस्मृतियों में बहुत गहरी हैं।

उज़्बेकिस्तान में किसी भारतीय के लिए सबसे सुखद अनुभवों में एक यह है कि वहाँ भारत को परिचय की बहुत अधिक आवश्यकता नहीं पड़ती। कई बार बातचीत राज कपूर, मिथुन चक्रवर्ती, अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान या किसी लोकप्रिय भारतीय गीत से शुरू हो जाती है। पुरानी पीढ़ी की स्मृतियों में भारतीय सिनेमा की एक अलग जगह है, जबकि नई पीढ़ी आधुनिक भारत, उसकी शिक्षा, तकनीक, पर्यटन और रोजगार की संभावनाओं को जानना चाहती है।

यही भारत की वह सांस्कृतिक पूँजी है जिसे कूटनीति की भाषा में ‘सॉफ्ट पावर’ कहा जाता है, लेकिन मेरे अनुभव में यह शब्द भी उस आत्मीयता को पूरी तरह व्यक्त नहीं कर पाता जो उज़्बेक समाज में भारत के लिए दिखाई देती है।

भारत को इस सांस्कृतिक विरासत को केवल अतीत की उपलब्धि मानकर संतुष्ट नहीं होना चाहिए। इसे नई पीढ़ी तक पहुँचाने के लिए हिन्दी, भारतीय साहित्य, सिनेमा, अनुवाद, योग, पर्यटन और विश्वविद्यालयी आदान-प्रदान के नए कार्यक्रम विकसित करने होंगे।

मध्य एशिया का केंद्र है उज़्बेकिस्तान

भारत के लिए उज़्बेकिस्तान का महत्त्व उसकी सांस्कृतिक निकटता तक सीमित नहीं है। मध्य एशिया के केंद्र में स्थित यह देश क्षेत्रीय राजनीति, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। ताशकंद, समरकंद और बुखारा जैसे शहर केवल इतिहास के स्मारक नहीं हैं; वे उस भूभाग का प्रतिनिधित्व करते हैं जिसने सदियों तक दक्षिण एशिया, मध्य एशिया, चीन, ईरान और यूरोप को जोड़ने का काम किया।

आज भारत जब मध्य एशिया के साथ अपने आर्थिक और रणनीतिक संबंधों को विस्तार देना चाहता है, तब उज़्बेकिस्तान उसका स्वाभाविक साझेदार बनकर सामने आता है।

प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति शवकत मिर्ज़ियोयेव के बीच विकसित संवाद ने पिछले वर्षों में इस साझेदारी को निरंतर आगे बढ़ाया है। व्यापार, निवेश, ऊर्जा, रक्षा, स्वास्थ्य, फार्मास्यूटिकल्स, सूचना प्रौद्योगिकी, शिक्षा और डिजिटल कनेक्टिविटी जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों के लिए व्यापक संभावनाएँ मौजूद हैं।

भारत और उज़्बेकिस्तान के आर्थिक संबंध लगातार बढ़ रहे हैं, लेकिन दोनों देशों की वास्तविक क्षमता की तुलना में व्यापार अभी भी अपेक्षाकृत कम है। इसका एक प्रमुख कारण प्रत्यक्ष स्थल संपर्क का अभाव है।

यही कारण है कि चाबहार बंदरगाह और अंतरराष्ट्रीय परिवहन गलियारों के माध्यम से मध्य एशिया तक भारत की पहुँच केवल व्यापारिक आवश्यकता नहीं, बल्कि रणनीतिक आवश्यकता भी है। बेहतर कनेक्टिविटी होने पर भारतीय दवाइयों, तकनीकी सेवाओं, मशीनरी, शिक्षा और अन्य उत्पादों के लिए मध्य एशियाई बाजार अधिक सुलभ हो सकते हैं। दूसरी ओर मध्य एशिया के ऊर्जा संसाधन और अन्य उत्पाद भारत तक अधिक प्रभावी ढंग से पहुँच सकते हैं।

प्रधानमंत्री की यात्रा से यदि व्यापार के साथ परिवहन और कनेक्टिविटी को भी नई गति मिलती है, तो इसका प्रभाव भारत–उज़्बेकिस्तान संबंधों से आगे पूरे मध्य एशिया पर पड़ेगा।

उज़्बेकिस्तान में रहते हुए मुझे सबसे अधिक संभावनाएँ शिक्षा और भाषा के क्षेत्र में दिखाई दीं। वहाँ भारत के विषय में जानने की उत्सुकता है और भारतीय भाषाओं तथा संस्कृति के प्रति आकर्षण भी है। इस रुचि को संस्थागत सहयोग में बदलने की आवश्यकता है।

भारत और उज़्बेकिस्तान के विश्वविद्यालय संयुक्त शोध परियोजनाएँ शुरू कर सकते हैं। विद्यार्थियों और शिक्षकों के लिए विनिमय कार्यक्रम बढ़ाए जा सकते हैं। हिन्दी और उज़्बेक साहित्य का परस्पर अनुवाद होना चाहिए। दोनों देशों के युवा शोधार्थियों को एक-दूसरे के इतिहास, साहित्य और समाज पर काम करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

हिन्दी इस सांस्कृतिक कूटनीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। हिन्दी के माध्यम से उज़्बेक विद्यार्थियों को आधुनिक भारत के साहित्य और समाज से सीधे जोड़ने की अपार संभावना है। इसी प्रकार उज़्बेक साहित्य के श्रेष्ठ लेखकों और कवियों को हिन्दी अनुवाद के माध्यम से भारतीय पाठकों तक अधिक व्यापक रूप से पहुँचाया जाना चाहिए।

भारतीय सिनेमा की असाधारण सांस्कृतिक शक्ति

उज़्बेकिस्तान और व्यापक मध्य एशिया में भारतीय सिनेमा की लोकप्रियता अपने आप में सांस्कृतिक कूटनीति का एक रोचक अध्याय है। सोवियत काल में भारतीय फिल्मों ने जिस भावनात्मक संबंध का निर्माण किया था, उसका प्रभाव आज भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।

राज कपूर की लोकप्रियता इसका सबसे प्रसिद्ध उदाहरण है, लेकिन कहानी केवल राज कपूर तक सीमित नहीं है। भारतीय फिल्मों ने परिवार, प्रेम, संघर्ष, संगीत और सामाजिक संबंधों के माध्यम से भारत की एक ऐसी छवि बनाई जिसे मध्य एशियाई समाज ने सहजता से स्वीकार किया।

अब आवश्यकता इस विरासत को नई दिशा देने की है। भारत और उज़्बेकिस्तान के बीच फिल्म महोत्सव, संयुक्त फिल्म निर्माण, फिल्म अध्ययन, कलाकारों के आदान-प्रदान और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर सहयोग की व्यापक संभावनाएँ हैं।

जिस काम को कभी भारतीय सिनेमा ने बिना किसी औपचारिक कूटनीतिक योजना के कर दिखाया था, उसे आज सुविचारित सांस्कृतिक कूटनीति का हिस्सा बनाया जा सकता है।

बदलती दुनिया में मध्य एशिया

यूक्रेन युद्ध के बाद बदली भू-राजनीतिक परिस्थितियाँ, अफगानिस्तान की स्थिति, चीन की बढ़ती आर्थिक उपस्थिति और यूरेशिया में नए व्यापारिक मार्गों की तलाश ने मध्य एशिया का रणनीतिक महत्त्व और बढ़ा दिया है।

भारत के लिए यह आवश्यक है कि मध्य एशिया को केवल सुरक्षा या ऊर्जा की दृष्टि से न देखा जाए। यह क्षेत्र भारत की ऐतिहासिक स्मृति का भी हिस्सा है और भविष्य की आर्थिक संभावनाओं का भी।

उज़्बेकिस्तान इस पूरी प्रक्रिया में केंद्रीय भूमिका निभा सकता है।

भारत के पास सूचना प्रौद्योगिकी, डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर, फार्मास्यूटिकल्स, स्वास्थ्य, उच्च शिक्षा, कौशल विकास और स्टार्टअप के क्षेत्रों में अनुभव है। उज़्बेकिस्तान तेजी से आर्थिक और सामाजिक आधुनिकीकरण की दिशा में आगे बढ़ रहा है। दोनों देशों की विकास संबंधी प्राथमिकताओं के बीच अनेक ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ व्यावहारिक साझेदारी विकसित की जा सकती है।

कूटनीति से आगे लोगों की दोस्ती

किसी भी अंतरराष्ट्रीय संबंध की वास्तविक शक्ति केवल संयुक्त वक्तव्यों में नहीं होती। उसकी परीक्षा इस बात से होती है कि दोनों देशों के नागरिक एक-दूसरे को किस दृष्टि से देखते हैं।

उज़्बेकिस्तान में रहते हुए मैंने महसूस किया कि भारत के पास वहाँ एक ऐसी सांस्कृतिक सद्भावना पहले से उपलब्ध है, जिसे दुनिया के बहुत से देशों को दशकों के प्रयास के बाद भी हासिल करना कठिन होता है।

भारत को इस पूँजी को संभालना होगा।

हमें अधिक छात्रवृत्तियाँ, विश्वविद्यालयी सहयोग, हिन्दी अध्ययन केंद्र, अनुवाद परियोजनाएँ, साहित्यिक आयोजन, पर्यटन कार्यक्रम, फिल्म समारोह और युवा संवाद विकसित करने चाहिए। भारत और मध्य एशिया के विद्वानों, लेखकों, कलाकारों और विद्यार्थियों को सीधे एक-दूसरे से जोड़ना होगा।

ताशकंद से दिखाई देता है एक बड़ा अवसर

ताशकंद में बिताए अपने समय को याद करते हुए मुझे लगता है कि भारत–उज़्बेकिस्तान संबंधों की सबसे बड़ी संभावना उनकी सहजता में छिपी है। यहाँ मित्रता को शून्य से शुरू करने की आवश्यकता नहीं है। इतिहास ने उसकी नींव पहले ही तैयार कर दी है। आवश्यकता केवल उस नींव पर इक्कीसवीं सदी की नई साझेदारी खड़ी करने की है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उज़्बेकिस्तान यात्रा इसी दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है। व्यापार और निवेश बढ़ें, सुरक्षा सहयोग मजबूत हो, कनेक्टिविटी बेहतर हो—ये सभी आवश्यक हैं। लेकिन इसके साथ हिन्दी, साहित्य, सिनेमा, शिक्षा, पर्यटन और सांस्कृतिक संवाद को भी समान प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

कूटनीति के दस्तावेज समय के साथ अभिलेखागार में चले जाते हैं, लेकिन लोगों के मन में बनी मित्रता पीढ़ियों तक जीवित रहती है।

उज़्बेकिस्तान में भारत के पास ऐसी ही एक मित्रता पहले से मौजूद है। प्रधानमंत्री की यह यात्रा उस पुरानी आत्मीयता को नई सदी की रणनीतिक साझेदारी में बदलने का अवसर है।

— डॉ. मनीषकुमार सी. मिश्रा

एसोसिएट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, के. एम. अग्रवाल महाविद्यालय, कल्याण (प.), महाराष्ट्र; 

पूर्व विजिटिंग प्रोफेसर, आईसीसीआर हिन्दी चेयर, ताशकंद स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ ओरिएंटल स्टडीज, ताशकंद, उज़्बेकिस्तान

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