Wednesday, 19 August 2026

प्रोफेसर तमारा ख़ोदजायेवा : भारत और उज़्बेकिस्तान के बीच ज्ञान और संस्कृति की जीवंत सेतु

 











प्रोफेसर तमारा ख़ोदजायेवा : भारत और उज़्बेकिस्तान के बीच ज्ञान और संस्कृति की जीवंत सेतु

उज़्बेकिस्तान की वरिष्ठ भारतविद् और भारत–उज़्बेक साहित्यिक संबंधों की संवाहिका

भारत और मध्य एशिया के सांस्कृतिक संबंधों के लंबे इतिहास में विद्वानों की भूमिका कई बार राजनयिकों जितनी ही महत्त्वपूर्ण रही है। राजनीतिक संबंध सरकारें स्थापित करती हैं, लेकिन दो देशों के बीच स्थायी सांस्कृतिक आत्मीयता उन शिक्षकों, अनुवादकों, शोधकर्ताओं और चिंतकों द्वारा निर्मित होती है, जो एक सभ्यता को दूसरी सभ्यता से परिचित कराते हैं। उज़्बेकिस्तान में प्रोफेसर तमारा अलीमोव्ना ख़ोदजायेवा इसी विशिष्ट विद्वत्-परंपरा की प्रतिनिधि हैं। भारतीय भाषाओं, साहित्य और संस्कृति के अध्ययन-अध्यापन में उनका दीर्घकालीन योगदान उन्हें उज़्बेक भारतविद्या तथा भारत–उज़्बेकिस्तान अकादमिक संबंधों की एक महत्त्वपूर्ण विदुषी के रूप में स्थापित करता है।

ताशकंद स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ ओरिएंटल स्टडीज़ (TSUOS) से संबद्ध प्रोफेसर ख़ोदजायेवा उस पीढ़ी की विदुषी हैं, जिसके लिए भारत का अध्ययन केवल एक अकादमिक विशेषज्ञता नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता को समझने और उसे उज़्बेकिस्तान की नई पीढ़ियों तक पहुँचाने की एक दीर्घकालीन बौद्धिक प्रतिबद्धता रही है।

ताशकंद और भारतीय अध्ययन की परंपरा

प्रोफेसर ख़ोदजायेवा के योगदान को समझने के लिए ताशकंद की विशिष्ट बौद्धिक परंपरा को समझना आवश्यक है। भारत और उज़्बेकिस्तान के संबंध केवल आधुनिक राजनयिक संबंध नहीं हैं। दोनों क्षेत्रों के बीच व्यापारिक मार्गों, साहित्य, भाषा, संगीत, दर्शन, सूफी परंपरा और सांस्कृतिक स्मृतियों के माध्यम से सदियों से संवाद होता रहा है।

ताशकंद दक्षिण एशियाई अध्ययन, विशेषकर भारतीय भाषाओं और साहित्य के अध्ययन का मध्य एशिया में एक महत्त्वपूर्ण केंद्र रहा है। आज भी ताशकंद स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ ओरिएंटल स्टडीज़ में दक्षिण एशियाई भाषाओं और साहित्य के अंतर्गत हिंदी और उर्दू सहित विभिन्न भाषाओं का अध्ययन-अध्यापन होता है। विश्वविद्यालय ने भारतीय विश्वविद्यालयों और शैक्षणिक संस्थानों के साथ अकादमिक तथा सांस्कृतिक संबंध भी विकसित किए हैं।

इसी संस्थागत परंपरा के भीतर प्रोफेसर तमारा ख़ोदजायेवा ने विशेष रूप से भारतीय साहित्य तथा भारत–उज़्बेकिस्तान साहित्यिक और सांस्कृतिक संबंधों के अध्ययन में अपना दीर्घ अकादमिक जीवन समर्पित किया है।

इसलिए उनका योगदान केवल भारत के बारे में जानकारी देने तक सीमित नहीं है। अध्यापन, शोध और शोध-निर्देशन के माध्यम से उन्होंने उज़्बेकिस्तान में भारत को समझने की एक गंभीर अकादमिक दृष्टि विकसित करने में योगदान दिया है।

भारतीय साहित्य की गंभीर अध्येता

प्रोफेसर ख़ोदजायेवा की विद्वत्ता का एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र भारतीय साहित्य का इतिहास है।

किसी भी विदेशी अध्येता के लिए भारतीय साहित्य का अध्ययन अत्यंत चुनौतीपूर्ण है। भारतीय साहित्य को किसी एक भाषा अथवा किसी एक ऐतिहासिक कालखंड के माध्यम से नहीं समझा जा सकता। इसकी परंपरा वेदों और प्राचीन संस्कृत साहित्य से प्रारंभ होकर मध्यकालीन साहित्य, भक्ति आंदोलन तथा हिंदी, उर्दू, बांग्ला, पंजाबी, तेलुगु और अन्य अनेक आधुनिक भारतीय भाषाओं के साहित्य तक विस्तृत है।

प्रोफेसर ख़ोदजायेवा के अध्यापन और लेखन में भारतीय साहित्य की इसी व्यापकता को उज़्बेक विद्यार्थियों और पाठकों तक पहुँचाने का प्रयास दिखाई देता है।

इस दिशा में एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण प्रोफेसर तमारा ख़ोदजायेवा और प्रोफेसर उल्फत मुखिबोवा द्वारा तैयार किया गया विस्तृत ग्रंथ ‘हिंदिस्तान अदबियोती’ (भारतीय साहित्य) है। यह कृति भारत की बहुभाषी साहित्यिक विरासत का परिचय प्रस्तुत करती है तथा हिंदी, उर्दू, बांग्ला, पंजाबी और तेलुगु सहित विभिन्न भारतीय साहित्यिक परंपराओं पर विचार करती है। इसका ऐतिहासिक विस्तार प्राचीन वैदिक साहित्य से आधुनिक भारतीय साहित्य तक पहुँचता है।

मध्य एशियाई भारतविद्या की दृष्टि से ऐसी कृति का विशेष महत्त्व है। इससे उन विद्यार्थियों को भारतीय साहित्य के विशाल संसार को समझने का अवसर मिलता है, जिनके लिए भारतीय भाषाओं अथवा अंग्रेज़ी में उपलब्ध व्यापक शोध-सामग्री तक सीधे पहुँचना हमेशा संभव नहीं होता।

भारत और उज़्बेकिस्तान : साहित्य में सुरक्षित सांस्कृतिक स्मृति

प्रोफेसर ख़ोदजायेवा का शोध यह भी रेखांकित करता है कि भारत और उज़्बेकिस्तान को केवल भौगोलिक रूप से अलग दो देशों के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। दोनों देशों का इतिहास अनेक स्तरों पर एक-दूसरे से जुड़ता रहा है।

उनकी विद्वत्ता का यह पक्ष विशेष रूप से उज़्बेकिस्तान–भारत साहित्यिक और सांस्कृतिक संबंधों पर किए गए उनके कार्यों में दिखाई देता है। ताशकंद स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ ओरिएंटल स्टडीज़ में उपलब्ध उनके प्रकाशन-विवरण में 2025 में प्रकाशित उज़्बेकिस्तान और भारत के साहित्यिक-सांस्कृतिक संबंधों के इतिहास से संबंधित उनका एक महत्त्वपूर्ण शोधकार्य भी दर्ज है।

समकालीन मानविकी अनुसंधान की दृष्टि से यह अध्ययन-क्षेत्र अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

सदियों से मध्य एशिया और भारतीय उपमहाद्वीप लोगों, पांडुलिपियों, भाषाओं, कलात्मक परंपराओं और विचारों के आवागमन से जुड़े रहे हैं। फ़ारसी साहित्यिक संस्कृति, तुर्की परंपराएँ, सूफी विचारधारा तथा विद्वानों और साहित्यकारों की यात्राओं ने भारत और मध्य एशिया के बीच साझा सांस्कृतिक क्षेत्र निर्मित किए। मुग़ल काल इसका सबसे प्रत्यक्ष ऐतिहासिक उदाहरण हो सकता है, लेकिन भारत–मध्य एशिया संबंधों का इतिहास किसी एक राजवंश तक सीमित नहीं है।

साहित्य के माध्यम से इन संबंधों का अध्ययन उस पक्ष को सामने लाता है जिसे पारंपरिक राजनीतिक इतिहास कई बार पर्याप्त महत्त्व नहीं देता—सांस्कृतिक आदान-प्रदान का मानवीय इतिहास।

हिंदी का अध्यापन : भारतविदों की नई पीढ़ियों का निर्माण

किसी वरिष्ठ अध्यापक का सबसे स्थायी योगदान केवल उसकी प्रकाशित पुस्तकों से नहीं मापा जा सकता।

उसकी सबसे बड़ी उपलब्धि उसके विद्यार्थी होते हैं।

प्रोफेसर ख़ोदजायेवा लंबे समय से ताशकंद में भारतीय साहित्य और दक्षिण एशियाई अध्ययन की परंपरा से जुड़ी रही हैं। विश्वविद्यालय के अभिलेख उनके शोध-निर्देशन की निरंतरता को भी प्रमाणित करते हैं। उदाहरण के लिए, हिंदी के प्रमुख लेखक निर्मल वर्मा की रचनाओं के वैचारिक और सौंदर्यात्मक पक्ष से संबंधित शोध में उनके अकादमिक निर्देशन का उल्लेख मिलता है।

इस तथ्य का अपना विशेष महत्त्व है।

जब कोई उज़्बेक शोधार्थी निर्मल वर्मा, प्रेमचंद, आधुनिक हिंदी साहित्य अथवा भारतीय भाषा और संस्कृति का अध्ययन करता है, तब भारत और उज़्बेकिस्तान के बौद्धिक संसारों के बीच एक नई कड़ी बनती है। इस प्रकार एक वरिष्ठ अध्यापक केवल विद्यार्थियों को शिक्षित नहीं करता, बल्कि एक अकादमिक परंपरा का निर्माण करता है।

प्रोफेसर ख़ोदजायेवा के योगदान को इसी व्यापक प्रक्रिया के अंतर्गत देखा जाना चाहिए—उज़्बेकिस्तान में ऐसी पीढ़ियों का निर्माण, जो भारत को पढ़ सकें, समझ सकें, उसकी व्याख्या कर सकें और उस पर स्वतंत्र शोध कर सकें।

भारत की सीमाओं से बाहर हिंदी

प्रोफेसर ख़ोदजायेवा का अकादमिक जीवन हमें हिंदी से जुड़ी एक महत्त्वपूर्ण वास्तविकता की याद दिलाता है—हिंदी का बौद्धिक संसार भारत की भौगोलिक सीमाओं पर समाप्त नहीं होता।

मध्य एशिया के विभिन्न देशों में दशकों से हिंदी का अध्ययन और अध्यापन होता रहा है। इस अंतरराष्ट्रीय हिंदी-परंपरा में उज़्बेकिस्तान का विशेष स्थान है। भारतीय साहित्य, सिनेमा और संस्कृति के प्रति वहाँ लंबे समय से आकर्षण रहा है।

लेकिन भारतीय संस्कृति के प्रति लोकप्रिय आकर्षण और भारत का गंभीर अकादमिक अध्ययन दो अलग-अलग बातें हैं।

सिनेमा भारत के प्रति जिज्ञासा उत्पन्न कर सकता है, किंतु विद्वत्ता उस जिज्ञासा को व्यवस्थित ज्ञान में परिवर्तित करती है।

यहीं प्रोफेसर ख़ोदजायेवा जैसी विदुषियों की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो जाती है। वे भाषा और साहित्य का वह आधार निर्मित करती हैं जिसके माध्यम से सांस्कृतिक आकर्षण गंभीर अकादमिक अध्ययन में बदलता है।

उनके प्रकाशनों में नोडिरा सैदनज़ारोवा के साथ तैयार की गई हिंदी भाषा की शिक्षण-सामग्री/पाठ्यपुस्तक भी शामिल है, जो 2024 में प्रकाशित हुई। यह कार्य भारतविद्या के व्यावहारिक पक्ष की ओर संकेत करता है। किसी विदेशी देश में हिंदी को जीवित रखने के लिए केवल शोध पर्याप्त नहीं होता; उसके लिए पाठ्यपुस्तकों, अध्यापन-सामग्री, प्रशिक्षित शिक्षकों और संस्थागत निरंतरता की भी आवश्यकता होती है।

दो सभ्यताओं के बीच एक विदुषी

ताशकंद में किसी वरिष्ठ भारतविद् से मिलना अपने आप में एक विशेष अनुभव है।

एक भारतीय अध्यापक अथवा शोधकर्ता के लिए ऐसी मुलाकात अकादमिक दृष्टि की दिशा को कुछ समय के लिए उलट देती है। हम अक्सर विदेश जाकर यह सोचते हैं कि हमें भारत के बारे में दूसरों को बताना है। किंतु प्रोफेसर तमारा ख़ोदजायेवा जैसी विदुषियों से बातचीत हमें यह समझाती है कि भारत को कई दशकों से भारत के बाहर भी गंभीरता से देखा, पढ़ा, अनूदित और व्याख्यायित किया जा रहा है।

कभी-कभी एक उज़्बेक अध्येता भारतीय साहित्य के ऐसे पक्ष को देख सकता है, जिसकी ओर स्वयं भारतीय पाठकों का ध्यान कम हो गया हो।

यही तुलनात्मक अध्ययन की सबसे बड़ी शक्तियों में से एक है। दूरी कभी-कभी एक नई दृष्टि प्रदान करती है।

ताशकंद स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ ओरिएंटल स्टडीज़ में प्रोफेसर ख़ोदजायेवा के साथ मेरा संवाद इसलिए एक सामान्य अकादमिक भेंट से कहीं अधिक अर्थपूर्ण था। अपने बौद्धिक जीवन का बड़ा हिस्सा भारतीय साहित्य के अध्ययन और अध्यापन में लगाने वाली एक विदुषी के साथ बैठना भारत–उज़्बेकिस्तान संबंधों के मानवीय पक्ष को प्रत्यक्ष रूप से अनुभव करना था।

पुस्तकें, कक्षाएँ, संवाद और स्मृतियाँ—ये सभी औपचारिक दस्तावेजों में ‘सांस्कृतिक कूटनीति’ शब्द लिखे जाने से बहुत पहले से सांस्कृतिक कूटनीति का कार्य करती रही हैं।

महिला विदुषियाँ और उज़्बेक भारतविद्या

उज़्बेकिस्तान में दक्षिण एशियाई अध्ययन की समकालीन परंपरा की एक उल्लेखनीय विशेषता यह भी है कि इसके विकास में महिला विदुषियों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है।

प्रोफेसर तमारा ख़ोदजायेवा उस विद्वत्-परंपरा का हिस्सा हैं जिसमें अनेक महिला अध्यापिकाओं और शोधकर्ताओं ने हिंदी तथा भारतीय अध्ययन को समृद्ध किया है। उनके प्रयासों ने हिंदी अध्ययन को किसी अस्थायी विदेशी भाषा कार्यक्रम के स्थान पर एक सतत संस्थागत परंपरा के रूप में विकसित करने में योगदान दिया है।

यह निरंतरता अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

किसी भाषा की अंतरराष्ट्रीय उपस्थिति तभी बनी रहती है, जब विश्वविद्यालयों में शिक्षक, शिक्षण-सामग्री, शोध-निर्देशन और विद्यार्थियों की नई पीढ़ियाँ निरंतर तैयार होती रहें। ताशकंद स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ ओरिएंटल स्टडीज़ में हिंदी की निरंतर उपस्थिति के पीछे अनेक दशकों का सामूहिक अकादमिक श्रम है।

प्रोफेसर ख़ोदजायेवा का अकादमिक जीवन इसी संस्थागत स्मृति का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है।

वेदों से आधुनिक भारत तक

भारत के बाहर भारतीय साहित्य का गंभीर अध्ययन इसलिए भी प्रभावशाली है क्योंकि इसके लिए अत्यंत व्यापक दृष्टि की आवश्यकता होती है। भारतीय साहित्य का इतिहास लिखने वाले अध्येता को प्राचीन धार्मिक-साहित्यिक ग्रंथों, संस्कृत साहित्य, मध्यकालीन भक्ति परंपराओं, फ़ारसी और उर्दू के साहित्यिक अंतर्संबंधों, औपनिवेशिक आधुनिकता तथा आधुनिक भारतीय भाषाओं के साहित्य—इन सभी से संवाद करना पड़ता है।

प्रोफेसर ख़ोदजायेवा और प्रोफेसर उल्फत मुखिबोवा का संयुक्त कार्य भारतीय साहित्य को इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने का प्रयास करता है। उनके कार्य से संबंधित उज़्बेक विवरणों में भारतीय साहित्य की लगभग चार सहस्राब्दियों में विकसित यात्रा तथा प्राचीन वैदिक विरासत से उसके संबंध की चर्चा मिलती है।

यह केवल कालक्रम प्रस्तुत करने का प्रयास नहीं है।

इसके पीछे भारत को एक बहुभाषी और बहुलतावादी साहित्यिक सभ्यता के रूप में देखने की दृष्टि है।

आज इसका महत्त्व और बढ़ जाता है, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई बार भारतीय साहित्य को लगभग पूरी तरह भारतीय अंग्रेज़ी लेखन के माध्यम से प्रस्तुत कर दिया जाता है। इसके विपरीत उज़्बेक भारतविद्या में हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं पर निरंतर दिया गया ध्यान भारत की अधिक व्यापक साहित्यिक पहचान को सामने लाता है।

विद्वत्ता भी सांस्कृतिक कूटनीति है

भारत–उज़्बेकिस्तान संबंधों की चर्चा सामान्यतः व्यापार, रणनीतिक सहयोग, पर्यटन अथवा राजनयिक समझौतों के संदर्भ में की जाती है। निस्संदेह ये सभी अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। लेकिन सांस्कृतिक संबंधों का अपना एक अलग कालक्रम होता है।

वे धीरे-धीरे विकसित होते हैं।

कोई विद्यार्थी हिंदी सीखता है।

कोई अध्यापक प्रेमचंद अथवा निर्मल वर्मा पढ़ाता है।

किसी भारतीय रचना का अनुवाद होता है।

किसी विषय पर शोध-प्रबंध लिखा जाता है।

कोई भारतीय विद्वान ताशकंद आता है।

कोई उज़्बेक विद्वान भारत जाता है।

एक संवाद आरंभ होता है।

वर्षों बाद वही विद्यार्थी अध्यापक बनकर अगली पीढ़ी को भारत से परिचित कराता है।

यही सांस्कृतिक कूटनीति का सबसे गहरा स्वरूप है।

प्रोफेसर तमारा ख़ोदजायेवा के योगदान को इसी व्यापक संदर्भ में देखने की आवश्यकता है। उनका अकादमिक जीवन इस बात का उदाहरण है कि किस प्रकार एक विद्वान का कार्य दो देशों को जोड़ने वाले सांस्कृतिक आधार का हिस्सा बन जाता है।

वरिष्ठ विद्वानों की स्मृतियों को सुरक्षित करने की आवश्यकता

वरिष्ठ विद्वान अपने आप में जीवित अभिलेखागार होते हैं।

उनकी स्मृतियों में ऐसी अनेक जानकारियाँ सुरक्षित रहती हैं, जो किसी विश्वविद्यालय की वार्षिक रिपोर्ट में कभी दर्ज नहीं होतीं—हिंदी सीखने वाले आरंभिक विद्यार्थियों की कहानियाँ, भारत से आए अध्यापकों और विद्वानों की यात्राएँ, बदलते हुए पाठ्यक्रम, दशकों पहले किए गए अनुवाद, भारतीय साहित्यकारों और राजनयिकों से मुलाकातें तथा सोवियत काल से वर्तमान समय तक भारत के प्रति उज़्बेक समाज की बदलती हुई दृष्टि।

इसी कारण प्रोफेसर ख़ोदजायेवा जैसे वरिष्ठ भारतविदों की बौद्धिक स्मृतियों का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण किया जाना चाहिए।

उज़्बेकिस्तान के वरिष्ठ भारतविदों के विस्तृत साक्षात्कार और मौखिक इतिहास पर आधारित एक अभिलेखागार भविष्य के शोधकर्ताओं के लिए अमूल्य सिद्ध हो सकता है। यह केवल कुछ विद्वानों की व्यक्तिगत जीवन-यात्रा का दस्तावेज नहीं होगा, बल्कि मध्य एशिया में हिंदी और भारतीय अध्ययन के इतिहास को सुरक्षित करने का महत्त्वपूर्ण प्रयास होगा।

उस इतिहास में प्रोफेसर तमारा ख़ोदजायेवा की अकादमिक यात्रा को निश्चित रूप से एक महत्त्वपूर्ण स्थान मिलना चाहिए।

ताशकंद और भारत के बीच एक जीवंत सेतु

इस आलेख के साथ संलग्न तस्वीर उस बात को अभिव्यक्त करती है जिसे संस्थागत इतिहास और सरकारी दस्तावेज हमेशा व्यक्त नहीं कर पाते।

ताशकंद के एक विश्वविद्यालय-कक्ष में दो अध्येता साथ बैठे हैं। सामान्य दृष्टि से यह एक साधारण अकादमिक मुलाकात प्रतीत हो सकती है। लेकिन इसके पीछे एक बहुत लंबा इतिहास उपस्थित है—भारत और मध्य एशिया के बीच भाषाओं और साहित्य की यात्रा, भारत के बाहर हिंदी का अध्यापन, भारतीय सभ्यता पर उज़्बेक विद्वानों का दशकों लंबा शोध और वे व्यक्तिगत संबंध जिनके माध्यम से अंतरराष्ट्रीय अकादमिक सहयोग जीवित रहता है।

प्रोफेसर तमारा ख़ोदजायेवा इसी जीवंत परंपरा की प्रतिनिधि हैं।

भारतीय साहित्य पर उनका कार्य, हिंदी शिक्षण में योगदान, भारत–उज़्बेकिस्तान साहित्यिक-सांस्कृतिक संबंधों पर उनका शोध और सबसे बढ़कर नई पीढ़ियों के निर्माण में उनकी भूमिका उन्हें उज़्बेक भारतविद्या के इतिहास में महत्त्वपूर्ण स्थान प्रदान करती है।

विश्वविद्यालय केवल पुस्तकालयों और अभिलेखागारों के माध्यम से ज्ञान को सुरक्षित नहीं रखते। वे अपने विद्वानों के माध्यम से भी ज्ञान की परंपरा को जीवित रखते हैं।

प्रोफेसर तमारा ख़ोदजायेवा ऐसी ही विदुषी हैं, जिनके बौद्धिक जीवन ने ताशकंद की कक्षाओं, शोध-परंपरा और सांस्कृतिक चेतना में भारत की उपस्थिति को जीवंत बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है।

भारत के लिए ऐसी विदुषियाँ केवल विदेशों में भारतीय अध्ययन करने वाली विशेषज्ञ नहीं हैं। वे भारत की बौद्धिक मित्र और हमारी साझा सांस्कृतिक स्मृति की संवाहक हैं।

और ऐसे समय में, जब अंतरराष्ट्रीय संबंधों को प्रायः अर्थव्यवस्था, राजनीति और भू-रणनीति के पैमानों से मापा जाता है, उनका जीवन और कार्य हमें एक अधिक शांत, किंतु कहीं अधिक स्थायी सत्य की याद दिलाता है—

भारत और उज़्बेकिस्तान के बीच साहित्य सदियों से संवाद का एक लंबा मार्ग रहा है, और प्रोफेसर तमारा ख़ोदजायेवा जैसे विद्वानों ने उस मार्ग को निरंतर जीवित और गतिशील बनाए रखा है।


चित्र परिचय: ताशकंद स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ ओरिएंटल स्टडीज़, ताशकंद में प्रोफेसर तमारा ख़ोदजायेवा के साथ एक अकादमिक संवाद के अवसर पर।

चित्र स्रोत: डॉ. मनीष कुमार मिश्रा का व्यक्तिगत संग्रह।

No comments:

Post a Comment

Share Your Views on this..

प्रोफेसर तमारा ख़ोदजायेवा : भारत और उज़्बेकिस्तान के बीच ज्ञान और संस्कृति की जीवंत सेतु

  प्रोफेसर तमारा ख़ोदजायेवा : भारत और उज़्बेकिस्तान के बीच ज्ञान और संस्कृति की जीवंत सेतु उज़्बेकिस्तान की वरिष्ठ भारतविद् और भारत–उज़्बेक ...

Popular Posts