Friday, 28 August 2026

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उज़्बेकिस्तान यात्रा: भारत–मध्य एशिया संबंधों में एक नया अध्याय

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उज़्बेकिस्तान यात्रा: भारत–मध्य एशिया संबंधों में एक नया अध्याय

डॉ. मनीषकुमार सी. मिश्रा

भारत और मध्य एशिया के संबंध केवल आधुनिक कूटनीति की देन नहीं हैं। प्राचीन व्यापार मार्गों, बौद्ध धर्म, सूफी परंपरा, साहित्य, भाषा, कला और सांस्कृतिक आदान-प्रदान ने भारत को मध्य एशिया से सदियों से जोड़े रखा है। इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 29–30 अगस्त 2026 की उज़्बेकिस्तान राजकीय यात्रा विशेष महत्त्व रखती है। प्रधानमंत्री उज़्बेकिस्तान के राष्ट्रपति शवकत मिर्ज़ियोयेव के निमंत्रण पर ताशकंद जा रहे हैं। यह प्रधानमंत्री मोदी की उज़्बेकिस्तान की चौथी यात्रा होगी। इससे पहले वे 2015, 2016 और 2022 में उज़्बेकिस्तान की यात्रा कर चुके हैं।

उज़्बेकिस्तान क्यों महत्त्वपूर्ण है?

मध्य एशिया के केंद्र में स्थित उज़्बेकिस्तान भारत की मध्य एशिया नीति का एक महत्त्वपूर्ण स्तंभ है। लगभग साढ़े तीन करोड़ से अधिक आबादी वाला यह देश ऐतिहासिक सिल्क रूट, समरकंद, बुखारा और ताशकंद जैसे प्रसिद्ध सांस्कृतिक केंद्रों तथा प्राकृतिक संसाधनों के कारण विशिष्ट स्थान रखता है।

भारत और उज़्बेकिस्तान के संबंधों में इतिहास की गहरी छाप दिखाई देती है। बाबर का फरगना से भारत आना हो, अमीर खुसरो की मध्य एशियाई सांस्कृतिक विरासत हो अथवा भारतीय और मध्य एशियाई भाषाओं, संगीत, खान-पान और स्थापत्य के बीच समानताएँ—दोनों क्षेत्रों के बीच संपर्क राजनीतिक सीमाओं से कहीं पुराना है।

आधुनिक समय में यही ऐतिहासिक निकटता रणनीतिक साझेदारी का आधार बनी है।

मोदी–मिर्ज़ियोयेव संवाद

प्रधानमंत्री मोदी की इस यात्रा का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष राष्ट्रपति शवकत मिर्ज़ियोयेव के साथ होने वाली प्रतिनिधिमंडल स्तर की वार्ता होगी। दोनों नेता भारत–उज़्बेकिस्तान रणनीतिक साझेदारी की समीक्षा करने के साथ भविष्य के सहयोग की दिशा तय करेंगे।

आधिकारिक जानकारी के अनुसार वार्ता में विशेष रूप से व्यापार एवं निवेश, रक्षा, डिजिटल कनेक्टिविटी, ऊर्जा, शिक्षा और दोनों देशों के नागरिकों के बीच संपर्क जैसे क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। दोनों नेता भारत के ‘विकसित भारत 2047’ और उज़्बेकिस्तान के ‘Uzbekistan–2030’ विकास दृष्टिकोण के बीच संभावित साझेदारी पर भी विचार करेंगे।

यह तथ्य इस यात्रा को सामान्य राजनयिक यात्रा से आगे ले जाता है। दोनों देश अब अपने संबंधों को दीर्घकालीन विकास लक्ष्यों से जोड़ना चाहते हैं।

व्यापार और निवेश की नई संभावनाएँ

भारत–उज़्बेकिस्तान संबंधों में आर्थिक सहयोग तेजी से महत्त्वपूर्ण होता जा रहा है। जून 2026 में हुई भारत–उज़्बेकिस्तान अंतर-सरकारी आयोग की 14वीं बैठक में दोनों देशों ने अगले तीन वर्षों में द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना करने की दिशा में काम करने पर सहमति व्यक्त की थी। उज़्बेकिस्तान द्वारा प्रस्तुत आँकड़ों के अनुसार वर्ष 2025 में दोनों देशों का व्यापार लगभग 1.3 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँच गया था, जो पिछले वर्ष की तुलना में 33.3 प्रतिशत अधिक था।

फार्मास्यूटिकल्स, स्वास्थ्य सेवाएँ, सूचना प्रौद्योगिकी, कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण, इंजीनियरिंग, शिक्षा और डिजिटल सेवाएँ ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ भारतीय कंपनियों के लिए उज़्बेकिस्तान में व्यापक संभावनाएँ हैं।

विशेष रूप से डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर, फिनटेक, साइबर सुरक्षा, डिजिटल शिक्षा और भुगतान प्रणालियों में भारतीय अनुभव उज़्बेकिस्तान के आधुनिकीकरण कार्यक्रम के लिए उपयोगी हो सकता है। जून 2026 की द्विपक्षीय आर्थिक वार्ता में इन क्षेत्रों पर दोनों पक्षों ने विशेष चर्चा भी की थी।

मध्य एशिया से संपर्क की चुनौती

भारत की मध्य एशिया नीति के सामने सबसे बड़ी व्यावहारिक चुनौती प्रत्यक्ष स्थल संपर्क का अभाव है। भारत और उज़्बेकिस्तान के बीच मजबूत राजनीतिक संबंध होने के बावजूद व्यापार की संभावनाओं का पूरा उपयोग नहीं हो पाया है।

ऐसे में ईरान के चाबहार बंदरगाह, अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे और अन्य बहुपक्षीय परिवहन व्यवस्थाओं के माध्यम से मध्य एशिया तक भारत की पहुँच अत्यंत महत्त्वपूर्ण हो जाती है। भारत–उज़्बेकिस्तान आर्थिक संवाद में भी परिवहन और लॉजिस्टिक्स कनेक्टिविटी को आर्थिक संबंधों की पूरी क्षमता प्राप्त करने के लिए आवश्यक माना गया है।

इसलिए प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा में ‘कनेक्टिविटी’ केवल परिवहन का प्रश्न नहीं, बल्कि व्यापार, ऊर्जा, पर्यटन और रणनीतिक पहुँच से जुड़ा विषय है।

शिक्षा और हिन्दी की भूमिका

भारत–उज़्बेकिस्तान संबंधों का सबसे आकर्षक पक्ष शिक्षा और संस्कृति है। उज़्बेकिस्तान में भारतीय संस्कृति, हिन्दी भाषा, भारतीय फिल्मों, योग और भारतीय परंपराओं के प्रति लंबे समय से रुचि रही है।

ताशकंद सहित उज़्बेकिस्तान के शैक्षणिक संस्थानों में भारतीय भाषाओं और भारतीय अध्ययन की उपस्थिति दोनों देशों के सांस्कृतिक संबंधों को संस्थागत आधार देती है। आज आवश्यकता इस बात की है कि विश्वविद्यालयों के बीच संयुक्त शोध, छात्र एवं शिक्षक विनिमय, हिन्दी और उज़्बेक भाषा अध्ययन, अनुवाद परियोजनाओं तथा डिजिटल शिक्षण कार्यक्रमों को और विस्तार दिया जाए।

यदि राजनीतिक और आर्थिक संबंधों के साथ अकादमिक संबंध भी समान गति से आगे बढ़ते हैं, तो भारत–उज़्बेकिस्तान साझेदारी अधिक स्थायी और जन-केंद्रित बन सकती है।

भारतीय सिनेमा—सांस्कृतिक कूटनीति का सशक्त माध्यम

भारत और उज़्बेकिस्तान के बीच संबंधों की चर्चा भारतीय सिनेमा के बिना अधूरी है। सोवियत काल से ही राज कपूर और अन्य भारतीय कलाकारों की लोकप्रियता ने मध्य एशिया में भारत की एक आत्मीय सांस्कृतिक छवि निर्मित की। बाद के दशकों में हिन्दी फिल्मों, संगीत और भारतीय टेलीविजन ने इस सांस्कृतिक संपर्क को जीवित रखा।

आज जब विश्व राजनीति में ‘सॉफ्ट पावर’ और सांस्कृतिक कूटनीति का महत्त्व बढ़ रहा है, तब सिनेमा, साहित्य, भाषा, संगीत और पर्यटन भारत के लिए मध्य एशिया में अत्यंत प्रभावी माध्यम बन सकते हैं।

दोनों देशों के फिल्म संस्थानों के बीच सहयोग, संयुक्त फिल्म निर्माण, फिल्म महोत्सव, साहित्यिक अनुवाद और कलाकारों के आदान-प्रदान जैसी पहल भारत–उज़्बेकिस्तान संबंधों को सरकारी स्तर से निकालकर समाज के व्यापक स्तर तक पहुँचा सकती हैं।

सुरक्षा और रणनीतिक सहयोग

अफगानिस्तान की स्थिति भारत और उज़्बेकिस्तान दोनों के लिए महत्त्वपूर्ण है। आतंकवाद, कट्टरपंथ, मादक पदार्थों की तस्करी और क्षेत्रीय अस्थिरता जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए मध्य एशियाई देशों के साथ भारत का सहयोग आवश्यक है।

उज़्बेकिस्तान भौगोलिक रूप से अफगानिस्तान से जुड़ा है और मध्य एशिया की सुरक्षा व्यवस्था में उसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका है। यही कारण है कि भारत–उज़्बेकिस्तान रणनीतिक संवाद केवल द्विपक्षीय हितों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि व्यापक यूरेशियाई सुरक्षा से भी जुड़ जाता है।

मोदी की चौथी यात्रा का संदेश

प्रधानमंत्री मोदी की यह चौथी उज़्बेकिस्तान यात्रा अपने आप में दोनों देशों के बढ़ते राजनीतिक संपर्क का संकेत है। उनकी पहली उज़्बेकिस्तान यात्रा जुलाई 2015 में हुई थी। उस यात्रा के दौरान पर्यटन, विदेश मंत्रालयों के बीच सहयोग और सांस्कृतिक सहयोग सहित विभिन्न क्षेत्रों में समझौते हुए थे।

सितंबर 2022 में प्रधानमंत्री मोदी शंघाई सहयोग संगठन के राष्ट्राध्यक्षों की परिषद की बैठक में भाग लेने समरकंद पहुँचे थे।

अब 2026 की ताशकंद यात्रा इस संबंध को अगले चरण में ले जाने का अवसर प्रदान करती है। इसकी विशेषता यह है कि बातचीत का एजेंडा पारंपरिक कूटनीति से आगे बढ़कर डिजिटल प्रौद्योगिकी, ऊर्जा, शिक्षा और भविष्य की अर्थव्यवस्था तक विस्तृत हो चुका है।

मध्य एशिया की ओर भारत की बढ़ती दृष्टि

भारत के लिए मध्य एशिया केवल पाँच देशों का भौगोलिक क्षेत्र नहीं है। यह भारत को यूरेशिया से जोड़ने वाला रणनीतिक और सांस्कृतिक सेतु है। ऊर्जा सुरक्षा, बाजार, आतंकवाद विरोधी सहयोग, अफगानिस्तान, परिवहन गलियारे और सांस्कृतिक कूटनीति—सभी दृष्टियों से यह क्षेत्र भारत के लिए महत्त्वपूर्ण है।

इन पाँच मध्य एशियाई गणराज्यों में उज़्बेकिस्तान की स्थिति विशेष है। उसकी जनसंख्या, भौगोलिक केंद्रीयता, ऐतिहासिक विरासत और क्षेत्रीय राजनीतिक प्रभाव उसे भारत के लिए स्वाभाविक साझेदार बनाते हैं।

इस यात्रा के बाद प्रधानमंत्री मोदी ताशकंद से बिश्केक जाएंगे, जहाँ वे 31 अगस्त को होने वाले 26वें शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन में भाग लेंगे। वहाँ भारत की प्राथमिकताओं—सुरक्षा, कनेक्टिविटी और अवसर—को सामने रखने की योजना है। इस प्रकार ताशकंद की द्विपक्षीय यात्रा और बिश्केक का बहुपक्षीय संवाद भारत की व्यापक मध्य एशिया नीति के दो परस्पर जुड़े हुए आयाम हैं।

निष्कर्ष

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगस्त 2026 की उज़्बेकिस्तान यात्रा को केवल एक और विदेश यात्रा के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह भारत की उस व्यापक विदेश नीति का हिस्सा है जिसमें मध्य एशिया को रणनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक साझेदार के रूप में अधिक महत्त्व दिया जा रहा है।

भारत के पास उज़्बेकिस्तान को देने के लिए तकनीक, शिक्षा, स्वास्थ्य, औषधि, डिजिटल व्यवस्था, उद्यमिता और विशाल बाजार का अनुभव है; वहीं उज़्बेकिस्तान भारत के लिए मध्य एशिया के द्वार, संसाधनों, बाजार और यूरेशियाई संपर्क की संभावनाएँ प्रस्तुत करता है। इन सबके ऊपर दोनों देशों को जोड़ने वाली सदियों पुरानी सांस्कृतिक आत्मीयता है।

यदि इस ऐतिहासिक निकटता को आधुनिक व्यापार, तकनीक, शिक्षा, परिवहन और सांस्कृतिक कूटनीति से प्रभावी ढंग से जोड़ा जाता है, तो भारत और उज़्बेकिस्तान केवल अच्छे मित्र ही नहीं, बल्कि बदलती विश्व व्यवस्था में महत्त्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार बन सकते हैं।

प्रधानमंत्री मोदी की ताशकंद यात्रा इसी संभावना को ठोस रूप देने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है।

No comments:

Post a Comment

Share Your Views on this..

प्रधानमंत्री मोदी की उज़्बेकिस्तान यात्रा: मध्य एशिया में भारत की बढ़ती भूमिका और पुरानी दोस्ती का नया अध्याय

 प्रधानमंत्री मोदी की उज़्बेकिस्तान यात्रा: मध्य एशिया में भारत की बढ़ती भूमिका और पुरानी दोस्ती का नया अध्याय  प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की...

Popular Posts