रिश्तों की भाषा और अनुवाद की सांस्कृतिक चुनौती नीलूफ़र ख़ोदजाएवा के ‘Semantics of Kinship Terms as a Form of Address in Uzbek Translations of Premchand’ का आलोचनात्मक अध्ययन
रिश्तों की भाषा और अनुवाद की सांस्कृतिक चुनौती
नीलूफ़र ख़ोदजाएवा के ‘Semantics of Kinship Terms as a Form of Address in Uzbek Translations of Premchand’ का आलोचनात्मक अध्ययन
मूल आलेख: Nilufar Khodjaeva (2019), Theoretical & Applied Science, 76(08), 107–110. DOI: 10.15863/TAS.2019.08.76.16
प्रस्तावना
अनुवाद में सबसे कठिन वस्तु कई बार कोई जटिल दार्शनिक अवधारणा नहीं, बल्कि अत्यन्त सामान्य दिखाई देने वाला एक सम्बोधन होता है—‘माँ’, ‘अम्माँ’, ‘अम्माँजी’, ‘बाबा’, ‘भैया’ या ‘यार’। शब्दकोश इन शब्दों के अर्थ बता सकता है, किंतु वह हमेशा यह नहीं बता सकता कि वक्ता ने किसी विशेष क्षण में इन्हीं में से एक शब्द का चुनाव क्यों किया। सम्बोधन में रिश्ते के साथ आयु, वर्ग, धर्म, क्षेत्र, आत्मीयता, सम्मान, दूरी और भावनात्मक मुद्रा भी निहित होती है। इसी जटिल भाषिक-सांस्कृतिक क्षेत्र को नीलूफ़र ख़ोदजाएवा का आलेख अपना विषय बनाता है।
2019 में प्रकाशित यह अध्ययन हिन्दी से उज़्बेक में साहित्यिक अनुवाद के दौरान सम्बोधन-इकाइयों के lexical, semantic और stylistic हस्तांतरण का विश्लेषण करता है। लेखिका प्रेमचन्द के उदाहरणों के माध्यम से यह दिखाती हैं कि kinship terms का अनुवाद केवल शब्दार्थ का प्रश्न नहीं है, बल्कि सामाजिक संबंधों और सांस्कृतिक संकेतों के पुनर्निर्माण का प्रश्न भी है। इस छोटे-से अध्ययन का महत्त्व उसके आकार से कहीं अधिक है, क्योंकि यह हिन्दी और उज़्बेक—दो अलग भाषिक-सांस्कृतिक संसारों—के बीच ‘रिश्ते की भाषा’ को समझने की कोशिश करता है।
1. अध्ययन की केंद्रीय समस्या: रिश्ते का शब्द या सामाजिक संकेत?
ख़ोदजाएवा का मूल प्रतिपादन है कि kinship terms को केवल पारिवारिक संबंध बताने वाली lexical units मानना पर्याप्त नहीं है। भारतीय भाषिक व्यवहार में रिश्तेदारी-सूचक शब्द वास्तविक रक्त-संबंध से बाहर निकलकर सामाजिक सम्बोधन बन जाते हैं। लेखिका ‘father’ के लिए pitā, bāp, bābā, abbā, abbājān, vālid, bābūjī, bāpū और papā जैसे रूपों का उल्लेख करती हैं। ये शब्द समान referent की ओर संकेत कर सकते हैं, लेकिन उनका सांस्कृतिक इतिहास, register और emotional colouring समान नहीं है।
इसलिए इस आलेख की अंतर्धारा को एक सूत्र में व्यक्त किया जा सकता है: शब्दार्थ ≠ सम्बोधनार्थ ≠ सांस्कृतिक अर्थ। किसी kinship term का referential meaning सुरक्षित रह जाने मात्र से उसका पूरा communicative meaning सुरक्षित नहीं होता। यही बिंदु आलेख को साधारण शब्दार्थ-अध्ययन से आगे ले जाता है।
2. भारतीय सम्बोधन-व्यवस्था की बहुभाषिकता
आलेख का एक उपयोगी पक्ष भारतीय भाषिक व्यवहार के क्षेत्रीय उदाहरण हैं। लेखिका बताती हैं कि अपरिचित स्त्री को अलग-अलग भाषिक-सांस्कृतिक क्षेत्रों में khala, mausi, amma, ben, behn अथवा didi जैसे रिश्तेदारी-सूचक शब्दों से सम्बोधित किया जा सकता है। इनका चयन biological relationship से नहीं, बल्कि वक्ता और सम्बोधित व्यक्ति की आयु, सामाजिक स्थिति, धर्म और क्षेत्र से भी निर्धारित होता है।
इसी संदर्भ में dada का उदाहरण उल्लेखनीय है। एक ही ध्वन्यात्मक रूप अलग भारतीय भाषाओं में grandfather, elder brother अथवा father जैसे अलग अर्थ ग्रहण कर सकता है। इससे स्पष्ट होता है कि kinship terminology relational semantics है: शब्द का अर्थ केवल शब्द में स्थिर नहीं रहता; वह speaker–addressee relationship में सक्रिय होता है। इस अर्थ में यह आलेख sociolinguistics, pragmatics और translation studies के संगम पर स्थित है।
3. प्रेमचन्द का चयन: अध्ययन की शक्ति
प्रेमचन्द को corpus के केंद्र में रखना अध्ययन का महत्त्वपूर्ण निर्णय है। प्रेमचन्द के कथा-संसार में भाषा केवल कथानक को आगे बढ़ाने का माध्यम नहीं है; वह पात्रों के सामाजिक स्थान, निकटता, दूरी और पारस्परिक संबंधों को भी निर्मित करती है। इसलिए सम्बोधन का परिवर्तन character relationship के सूक्ष्म परिवर्तन का संकेत हो सकता है।
लेखिका मुख्यतः ‘ग़बन’ और ‘वरदान’ तथा उनके उज़्बेक रूपों से उदाहरण लेती हैं। अध्ययन की पद्धति की विशेषता यह है कि मूल हिन्दी पाठ और उज़्बेक अनुवाद को आमने-सामने रखकर lexical और contextual बदलाव को पहचाना गया है। इससे समीक्षा अनुमान पर नहीं, textual evidence पर आधारित रहती है।
4. ‘अम्माँ’ से ‘ओयी’ तक: अर्थ बचा, शैली कितनी बची?
आलेख का अत्यन्त प्रभावी विश्लेषण mother-address forms का है। प्रेमचन्द के पाठ में ammā, ammājī और mātājī जैसे अलग-अलग रूप दिखाई देते हैं, जबकि उद्धृत उज़्बेक अनुवादों में ये प्रायः oyi में समाहित हो जाते हैं। यहाँ referential equivalence मौजूद है—पाठक समझता है कि सम्बोधन माँ के लिए है—लेकिन stylistic differentiation संकुचित हो जाती है।
लेखिका स्वयं संकेत करती हैं कि ammājī के लिए oyijān लेने से मूल अभिव्यक्ति का भाव अधिक सुरक्षित रह सकता था। यही translation loss की सूक्ष्म समस्या है: अनुवाद कभी-कभी अर्थ को बचाकर भी सम्बोधन की सामाजिक ध्वनि खो देता है। ‘जी’ जैसे सम्मानसूचक घटक का लोप केवल morphology का परिवर्तन नहीं, बल्कि interpersonal relation की तीव्रता में परिवर्तन भी हो सकता है।
5. ‘बाबा’: आलेख का सबसे सशक्त case study
यदि पूरे आलेख को किसी एक शब्द के माध्यम से समझना हो, तो वह ‘बाबा’ है। ख़ोदजाएवा दिखाती हैं कि bābā एक स्थिर lexical unit नहीं, बल्कि context-sensitive address form है। आलेख में इसके कई कार्य सामने आते हैं—पिता/दादा के लिए पारिवारिक सम्बोधन, वृद्ध व्यक्ति के प्रति आदरसूचक सम्बोधन, तथा आत्मीय या भावात्मक सम्बोधन। अलग प्रसंगों में इसका उज़्बेक रूप dadajon या bobo मिलता है।
और भी रोचक वह स्थिति है जहाँ मूल हिन्दी के bābā का उज़्बेक में कोई प्रत्यक्ष lexical equivalent नहीं दिया गया। कानों पर हाथ रखने की भारतीय सांस्कृतिक मुद्रा और ‘ना बाबा!’ जैसी अभिव्यक्ति को translator ने literal transfer के बजाय दृश्यात्मक/व्याख्यात्मक रूप में प्रस्तुत किया। लेखिका इसे compensation की तरह देखती हैं। यह उदाहरण अध्ययन की बड़ी उपलब्धि है, क्योंकि यहाँ translation को substitution नहीं बल्कि cultural negotiation के रूप में समझा जाता है।
6. सैद्धान्तिक महत्त्व
अध्ययन की bibliography से स्पष्ट है कि लेखिका ने Uzbek address studies के साथ Vlahov और Florin, Safarmo Tolibi, Kiran S. V., Neelakshi Suryanarayan–Tatiana Larina तथा R. R. Mehrotra जैसे अध्येताओं को आधार बनाया है। विशेष रूप से Mehrotra का Sociolinguistics in Hindi Context इस समस्या के लिए प्रासंगिक आधार प्रदान करता है।
आलेख का व्यापक प्रश्न है: क्या अनुवाद में semantic equivalence पर्याप्त है, या pragmatic और cultural equivalence भी आवश्यक है? अध्ययन का उत्तर दूसरी दिशा में जाता है। सम्बोधन के सफल अनुवाद के लिए केवल dictionary meaning नहीं, बल्कि सामाजिक संबंध, cultural connotation, emotional register और तत्काल context को भी ध्यान में रखना पड़ता है।
7. अध्ययन की सीमाएँ
आलेख की उपलब्धियों के साथ उसकी सीमाओं पर विचार आवश्यक है। पहली सीमा corpus का आकार है। चार पृष्ठों में मुख्यतः mother और bābā जैसे कुछ सम्बोधनों के आधार पर व्यापक हिन्दी–उज़्बेक kinship system पर निष्कर्ष निकालना प्रारम्भिक अध्ययन तो बनाता है, लेकिन comprehensive contrastive study नहीं।
दूसरी सीमा methodology की अपर्याप्त व्याख्या है। यह स्पष्ट नहीं होता कि corpus में कुल कितनी address occurrences थीं, selection criteria क्या था, कौन-से सम्बोधन बाहर रखे गए और translation shifts की frequency क्या रही। तीसरी सीमा theoretical categories की है। lexical, semantic, stylistic और contextual equivalence का उल्लेख है, लेकिन उनकी operational definitions अधिक स्पष्ट होतीं तो analysis अधिक reproducible होता।
कुछ linguistic generalisations को भी अधिक सूक्ष्म framework की आवश्यकता थी। भारत की भाषिक जटिलता का संकेत उचित है, किंतु Indo-Aryan, Dravidian, Hindi–Urdu registers और क्षेत्रीय address practices के अंतर को अधिक व्यवस्थित ढंग से रखा जा सकता था। अंग्रेज़ी अभिव्यक्ति में grammatical तथा stylistic असंगतियाँ भी दिखाई देती हैं। इससे मूल शोध-विचार का महत्त्व कम नहीं होता, पर international academic presentation के लिए language editing आवश्यक थी।
8. आलेख से विकसित होने वाला व्यापक मॉडल
ख़ोदजाएवा के उदाहरणों को आगे बढ़ाते हुए सम्बोधन-अनुवाद की प्रक्रिया को इस क्रम में समझा जा सकता है:
Kinship Word → Literal Meaning → Social Relationship → Cultural Connotation → Emotional Register → Contextual Meaning → Translation Strategy
इस मॉडल में ammājī → oyi केवल दो शब्दों का संबंध नहीं है; प्रश्न यह भी है कि ‘जी’ से उत्पन्न respect कहाँ और कैसे संरक्षित हुआ। इसी प्रकार bābā → bobo/dadajon/Ø में lexical omission आवश्यक रूप से translation failure नहीं है। यदि cultural effect किसी दूसरी linguistic या descriptive strategy से निर्मित हो जाए, तो वह compensation हो सकता है।
यहीं यह छोटा आलेख translation studies के बड़े प्रश्न को छूता है—क्या अनुवाद शब्द का होना चाहिए या संबंध का? इस अध्ययन के प्रमाण बताते हैं कि सफल अनुवाद को दोनों के बीच संतुलन बनाना होगा।
9. भारत–उज़्बेक सांस्कृतिक अध्ययन की दृष्टि से महत्त्व
इस आलेख को केवल भाषाविज्ञान तक सीमित करके देखना उचित नहीं होगा। प्रेमचन्द का उज़्बेक अनुवाद स्वयं भारतीय साहित्य के मध्य एशियाई reception का प्रमाण है। यह शोध बताता है कि साहित्य का दूसरे समाज में प्रवेश केवल कथा के स्थानांतरण से पूरा नहीं होता; पात्रों के रिश्ते और सामाजिक व्यवहार भी दूसरी संस्कृति में पुनर्निर्मित होते हैं।
इस दृष्टि से oyi, bobo, dadajon और otaxon जैसे शब्द भारतीय कथा और उज़्बेक पाठक के बीच सांस्कृतिक सेतु बनते हैं। इसीलिए अध्ययन हिन्दी–उज़्बेक तुलनात्मक अनुवाद अध्ययन के साथ-साथ भारत–मध्य एशिया साहित्यिक संपर्क के लिए भी उपयोगी आधार प्रस्तुत करता है।
निष्कर्ष
नीलूफ़र ख़ोदजाएवा का आलेख आकार में संक्षिप्त, किंतु विषय की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण शोध है। इसकी सबसे बड़ी उपलब्धि यह दिखाना है कि रिश्तेदारी-सूचक शब्दों का अनुवाद dictionary equivalence द्वारा नहीं समझा जा सकता। अम्माँ, अम्माँजी, माताजी या बाबा जैसे शब्द अपने भीतर संबंध के अतिरिक्त सम्मान, निकटता, आयु, सामाजिक hierarchy, क्षेत्रीयता और सांस्कृतिक स्मृति रखते हैं।
विशेषतः bābā के अलग-अलग उज़्बेक रूपों और कुछ प्रसंगों में उसके omission/compensation का विश्लेषण उल्लेखनीय है। बड़े corpus, स्पष्ट methodology, व्यवस्थित pragmatic framework और अधिक परिष्कृत academic English के साथ यही अध्ययन हिन्दी–उज़्बेक comparative translation studies का कहीं अधिक निर्णायक शोध बन सकता था।
इस आलेख का सबसे मूल्यवान निष्कर्ष उसकी लिखी हुई पंक्तियों से आगे निकलता है: सम्बोधन मनुष्य को केवल पुकारता नहीं, उसके साथ हमारे संबंध की परिभाषा भी करता है। इसलिए सम्बोधन का अनुवाद वस्तुतः एक शब्द का नहीं, एक सामाजिक संबंध और सांस्कृतिक संवेदना का अनुवाद है।
संदर्भ
Khodjaeva, Nilufar. 2019. ‘Semantics of Kinship Terms as a Form of Address in Uzbek Translations of Premchand’. Theoretical & Applied Science 76 (8): 107–110. DOI: 10.15863/TAS.2019.08.76.16.
Mehrotra, R. R. 1985. Sociolinguistics in Hindi Context. New Delhi: Oxford & IBH Publishing Company.
Premchand. 2015. Gaban. Delhi: Rajpal. [मूल आलेख में प्रयुक्त संस्करण।]
Premchand. 1976. Najot. Translated by A. Fayzullaev. Toshkent: G‘afur G‘ulom nomidagi Adabiyot va san’at nashriyoti.
Premchand. 2011. Vardān. New Delhi: Bhartiya Granth Niketan.
Premchand. 2009. ‘Sevgi in’omi’. Translated by A. Fayzullaev. Jahon Adabiyoti, no. 2.
Suryanarayan, Neelakshi, and Tatiana Larina. 2012. ‘English and Hindi Address Forms in a Bilingual Context’. LAUD, Series A: General & Theoretical Papers, Paper No. 777.
Vlahov, S. I., and S. P. Florin. 1986. Neperevodimoe v perevode. Moscow: Vysshaya Shkola.
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