Saturday, 29 August 2026

क्या हम पढ़ना भूल रहे हैं? AI और डिजिटल युग में बदलती पाठकीय संस्कृति डॉ. मनीष कुमार सी. मिश्रा

 

क्या हम पढ़ना भूल रहे हैं?

AI और डिजिटल युग में बदलती पाठकीय संस्कृति

डॉ. मनीष कुमार सी. मिश्रा

कभी किसी व्यक्ति के घर में रखी पुस्तकों से उसकी बौद्धिक रुचियों का अनुमान लगाया जाता था। रेल की यात्रा हो, प्रतीक्षालय हो या शाम का खाली समय—किताब, पत्रिका और अखबार हमारे स्वाभाविक साथी हुआ करते थे। आज दृश्य तेजी से बदल रहा है। पुस्तक हाथ में कम और मोबाइल लगभग हर समय हमारे हाथ में है। हम पहले से कहीं अधिक शब्दों से घिरे हुए हैं, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या हम वास्तव में पहले से अधिक पढ़ रहे हैं?

28 अगस्त 2026 को The Daily Star में प्रकाशित Faridul Alam का विचारोत्तेजक आलेख “End of Reading? A Post-Literate Society in the Making” इसी गंभीर प्रश्न की ओर ध्यान खींचता है। इसमें भविष्य के ऐसे समाज की संभावना पर विचार किया गया है जिसमें पढ़ना समाप्त तो नहीं होगा, लेकिन ज्ञान प्राप्त करने के प्रमुख माध्यम के रूप में उसकी भूमिका बदल सकती है।

दरअसल आज समस्या पढ़ने के लिए सामग्री की कमी की नहीं है। मानव इतिहास में शायद ही कभी इतनी अधिक लिखित सामग्री इतनी आसानी से उपलब्ध रही हो। एक मोबाइल फोन पर हजारों पुस्तकें, लाखों शोध आलेख, समाचार पत्र और दुनिया भर की सूचनाएँ उपलब्ध हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने इसमें एक नया आयाम जोड़ दिया है। अब मशीनें स्वयं इतनी तेजी से लिखित सामग्री तैयार कर रही हैं कि मनुष्य के लिए उसे पूरा पढ़ पाना संभव ही नहीं है।

विडंबना देखिए—पाठ बढ़ रहा है, लेकिन पाठक का ध्यान घट रहा है।

सोशल मीडिया ने हमें छोटे-छोटे हिस्सों में सूचना ग्रहण करने का अभ्यस्त बना दिया है। लंबे समाचार की जगह हेडलाइन, लंबे वीडियो की जगह रील, पुस्तक की जगह उसका सारांश और शोध आलेख की जगह उसके प्रमुख बिंदु हमें अधिक सुविधाजनक लगने लगे हैं। कुछ मिनट तक लगातार किसी एक विषय पर ध्यान बनाए रखना भी नई पीढ़ी के लिए चुनौती बनता जा रहा है।

अब इस परिवर्तन में कृत्रिम बुद्धिमत्ता भी शामिल हो गई है।

किसी विद्यार्थी के सामने पचास पृष्ठ का शोध आलेख हो तो वह उसे पढ़ने के बजाय AI से कह सकता है—“इसे पाँच बिंदुओं में समझा दो।” किसी पुस्तक को पढ़े बिना उसका सारांश प्राप्त किया जा सकता है। कठिन कविता की व्याख्या, कहानी का केंद्रीय भाव और उपन्यास का चरित्र-चित्रण कुछ ही सेकंड में सामने आ सकता है।

यह सुविधा अद्भुत है और इससे इनकार नहीं किया जा सकता। AI कठिन विषय को सरल बना सकता है। भाषाओं की दीवार तोड़ सकता है। अंग्रेजी में उपलब्ध ज्ञान को हिन्दी में समझने में सहायता कर सकता है। शिक्षक नई अध्ययन सामग्री तैयार कर सकते हैं और विद्यार्थी अपनी जिज्ञासाओं के उत्तर तत्काल प्राप्त कर सकते हैं।

लेकिन यहीं एक प्रश्न पैदा होता है—यदि हमें हर चीज का सारांश मिलने लगे तो क्या हम मूल पाठ पढ़ना छोड़ देंगे?

प्रेमचंद के गोदान को बीस पंक्तियों में समझाया जा सकता है, लेकिन क्या वे बीस पंक्तियाँ होरी के पूरे जीवनानुभव का विकल्प हो सकती हैं? कबीर के दोहे का अर्थ AI बता सकता है, लेकिन कबीर तक पहुँचने के लिए केवल शब्दार्थ पर्याप्त नहीं है। साहित्य सूचना नहीं, अनुभव भी है। उसे पढ़ते हुए पाठक पात्रों के साथ चलता है, प्रश्न करता है, असहमत होता है और कभी-कभी स्वयं को भी खोजता है।

इसीलिए AI के युग में सबसे बड़ी चिंता मशीन के लिखने की क्षमता नहीं, बल्कि मनुष्य के गहराई से पढ़ने की क्षमता होनी चाहिए।

इसका सबसे सीधा संबंध हमारी शिक्षा व्यवस्था से है। अब विद्यार्थी को केवल यह सिखाना पर्याप्त नहीं होगा कि किसी प्रश्न का सही उत्तर क्या है। क्योंकि उत्तर तो AI भी दे सकता है। भविष्य की शिक्षा को यह सिखाना होगा कि उपलब्ध उत्तर सही है या गलत, उसकी विश्वसनीयता कैसे जाँची जाए, स्रोत क्या है और उसके पीछे कौन-सा तर्क काम कर रहा है।

शिक्षक की भूमिका भी बदलनी तय है। शिक्षक अब केवल सूचना देने वाला व्यक्ति नहीं रह सकता। उसे विद्यार्थी को प्रश्न करना, तुलना करना, विश्लेषण करना और प्राप्त सूचना पर संदेह करना सिखाना होगा।

इसे एक छोटे सूत्र में समझा जा सकता है—

पुरानी साक्षरता = पढ़ना + लिखना

नई साक्षरता = पढ़ना + लिखना + डिजिटल समझ + AI साक्षरता + आलोचनात्मक चिंतन

यह परिवर्तन हिन्दी और दूसरी भारतीय भाषाओं के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। इंटरनेट के शुरुआती वर्षों में डिजिटल दुनिया पर अंग्रेजी का वर्चस्व था। आज स्थिति तेजी से बदल रही है। AI आधारित अनुवाद, वाणी पहचान और text-to-speech जैसी तकनीकों के कारण व्यक्ति अपनी भाषा में मशीन से संवाद कर सकता है।

कल्पना कीजिए कि किसी गाँव का विद्यार्थी हिन्दी में बोलकर दुनिया के किसी विश्वविद्यालय की अध्ययन सामग्री समझ सके। कोई किसान अपनी स्थानीय बोली में प्रश्न पूछकर उपयोगी जानकारी प्राप्त कर सके। हिन्दी का विद्यार्थी विदेशी भाषा में प्रकाशित शोध को अपनी भाषा में समझ सके। यह ज्ञान के लोकतंत्रीकरण की दिशा में बड़ी छलांग हो सकती है।

लेकिन इसके साथ एक दूसरी जिम्मेदारी भी आती है। यदि भविष्य में हिन्दी की अधिकांश डिजिटल सामग्री मशीनें तैयार करने लगें और मनुष्य केवल उसका उपभोग करने लगे, तो भाषा की मौलिक सृजनात्मकता प्रभावित हो सकती है। इसलिए हमें AI से हिन्दी में सामग्री बनवाने के साथ-साथ हिन्दी में मौलिक लेखन, शोध, साहित्य और गंभीर पठन को भी प्रोत्साहित करना होगा।

क्या पुस्तक का भविष्य समाप्त हो रहा है? शायद नहीं।

जब रेडियो आया था तब भी पुराने माध्यमों के समाप्त होने की आशंकाएँ थीं। टेलीविजन आया, फिर इंटरनेट और अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता। प्रत्येक नई तकनीक ने पुराने माध्यम को समाप्त करने के बजाय उसके स्वरूप और उपयोग को बदला है।

भविष्य का मनुष्य शायद एक ही विषय को कई माध्यमों से समझेगा। वह कुछ पढ़ेगा, कुछ सुनेगा, कुछ वीडियो में देखेगा और कुछ AI से बातचीत करके समझेगा। इसलिए भविष्य को ‘पढ़ने के अंत’ के रूप में देखने के बजाय पढ़ने की बदलती प्रकृति के रूप में समझना अधिक उचित होगा।

फिर भी हमें एक बात याद रखनी चाहिए। तकनीक हमें सूचना बहुत तेजी से दे सकती है, लेकिन हर ज्ञान गति से प्राप्त नहीं किया जा सकता।

कुछ विचारों को समझने के लिए उनके साथ समय बिताना पड़ता है। कुछ कविताएँ बार-बार पढ़नी पड़ती हैं। कुछ उपन्यासों के पात्र हमारे भीतर धीरे-धीरे उतरते हैं। कुछ प्रश्नों के उत्तर तुरंत मिल जाने के बजाय उन्हें खोजने की यात्रा ही हमें अधिक समझदार बनाती है।

AI के युग में इसलिए पुस्तक पढ़ना पुरानी आदत नहीं, बल्कि शायद पहले से भी अधिक आवश्यक बौद्धिक अभ्यास बन जाएगा।

क्योंकि जिस दुनिया में मशीनें हमारे लिए पढ़ सकती हैं, लिख सकती हैं और सारांश बना सकती हैं, उस दुनिया में स्वयं गहराई से पढ़ना मनुष्य की विशिष्ट बौद्धिक शक्ति बन सकता है।

— डॉ. मनीष कुमार सी. मिश्रा

संदर्भ: Faridul Alam, “End of Reading? A Post-Literate Society in the Making,” The Daily Star, 28 August 2026.

No comments:

Post a Comment

Share Your Views on this..

मोदी की उज़्बेकिस्तान यात्रा: मध्य एशिया में भारत की साझेदारी का नया अध्याय व्यापार, शिक्षा, संस्कृति और जन-संपर्क के रास्ते भारत–उज़्बेकिस्तान संबंधों को नई गति देने का अवसर डॉ. मनीष कुमार सी. मिश्रा

  मोदी की उज़्बेकिस्तान यात्रा: मध्य एशिया में भारत की साझेदारी का नया अध्याय व्यापार, शिक्षा, संस्कृति और जन-संपर्क के रास्ते भारत–उज़्बेकि...

Popular Posts