Friday, 28 August 2026

अल-सख़ावी और ‘अल-दौʾ अल-लामिʿ’ ममलूक काल के सामाजिक इतिहास और स्त्री-जीवन का अद्वितीय जीवनी-कोश

 शोधपरक आलेख

अल-सख़ावी और ‘अल-दौʾ अल-लामिʿ’

ममलूक काल के सामाजिक इतिहास और स्त्री-जीवन का अद्वितीय जीवनी-कोश

शम्स अल-दीन मुहम्मद इब्न ʿअब्द अल-रहमान अल-सख़ावी (831–902 हि./1427–1497 ई.)

मुख्य कृति

al-Ḍawʾ al-lāmiʿ li-ahl al-qarn al-tāsiʿ

विषय

नौवीं हिजरी/पंद्रहवीं ईसवी शताब्दी के व्यक्तियों का जीवन-वृत्त

विशेष महत्त्व

बारहवाँ खंड पूर्णतः महिलाओं पर; 1,075 क्रमांकित जीवनियाँ

सारांश

पंद्रहवीं शताब्दी के काहिरा में सक्रिय शम्स अल-दीन मुहम्मद इब्न ʿअब्द अल-रहमान अल-सख़ावी अरबी जीवनी-लेखन, हदीस-अध्ययन और इतिहास-लेखन की परंपरा के अत्यंत महत्त्वपूर्ण विद्वान थे। उनकी बहुखंडी कृति ‘अल-दौʾ अल-लामिʿ लि-अहल अल-क़र्न अल-तासिʿ’ नौवीं हिजरी अर्थात पंद्रहवीं ईसवी शताब्दी के समाज का विस्तृत व्यक्तिचित्र प्रस्तुत करती है। इसका बारहवाँ और अंतिम खंड 1,075 स्त्रियों की क्रमांकित जीवनियों को समर्पित है। इसलिए यह ग्रंथ केवल प्रतिष्ठित पुरुषों का पारंपरिक ‘कौन कौन था’ नहीं, बल्कि शिक्षा, हदीस-परंपरा, परिवार, विवाह, संपत्ति, वक़्फ़, धर्मनिष्ठा, कविता, यात्रा और सामाजिक संपर्कों में महिलाओं की भागीदारी को समझने का दुर्लभ स्रोत भी है। प्रस्तुत आलेख अल-सख़ावी के बौद्धिक व्यक्तित्व, ग्रंथ की संरचना, स्त्री-जीवनियों की ऐतिहासिक उपयोगिता, उसकी पद्धतिगत सीमाओं और रेनाते याकोबी के नवीन अध्ययन के आलोक में उसकी समकालीन प्रासंगिकता का विवेचन करता है।

मुख्य शब्द: अल-सख़ावी, अल-दौʾ अल-लामिʿ, ममलूक काल, अरबी जीवनी-साहित्य, महिला इतिहास, हदीस, वक़्फ़, काहिरा।

प्रस्तावना

मध्यकालीन इस्लामी इतिहास को समझने में ‘तराजिम’, ‘तबक़ात’ और जीवनी-कोशों की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। ये ग्रंथ केवल जन्म-मृत्यु, वंश और पदों का लेखा नहीं देते; इनमें ज्ञान के संचार, गुरु-शिष्य संबंधों, यात्राओं, पारिवारिक नेटवर्क, प्रतिष्ठा, आजीविका और नैतिक मूल्यांकन की सूक्ष्म सूचनाएँ भी सुरक्षित रहती हैं। अल-सख़ावी की ‘अल-दौʾ अल-लामिʿ’ इसी परंपरा की एक विशाल और असाधारण उपलब्धि है। इसका शीर्षक मोटे तौर पर ‘नौवीं [हिजरी] शताब्दी के लोगों पर चमकता प्रकाश’ के अर्थ में समझा जा सकता है। ग्रंथ का काल-क्षेत्र नौवीं हिजरी शताब्दी है, जो लगभग पंद्रहवीं ईसवी शताब्दी से मेल खाता है।

इस कृति का विशेष आकर्षण उसका अंतिम खंड है, जिसे सामान्यतः ‘किताब अल-निसाʾ’ अर्थात महिलाओं का खंड कहा जाता है। इसमें 1,075 स्त्रियों की जीवनियाँ हैं और उनमें से अनेक को लेखक व्यक्तिगत रूप से जानता था। इस प्रत्यक्षता के कारण पाठ में औपचारिक विद्वत्तापूर्ण सूचना के साथ संस्मरण, सामाजिक निकटता और निजी मूल्यांकन भी प्रवेश करते हैं। यही गुण ग्रंथ को जीवंत बनाता है, लेकिन इतिहासकार को लेखक की पसंद, वर्गीय स्थिति और नैतिक दृष्टि की आलोचनात्मक जाँच करने के लिए भी बाध्य करता है।[1]

नाम और पहचान: एक आवश्यक स्पष्टीकरण

कुछ आधुनिक प्रकाशकीय परिचयों में विद्वान का नाम संक्षेप से ‘ʿअब्द अल-रहमान अल-सख़ावी’ दिया गया है, किंतु अरबी ग्रंथ-सूचियों में उनका पूरा नाम शम्स अल-दीन अबू अल-ख़ैर मुहम्मद इब्न ʿअब्द अल-रहमान अल-सख़ावी मिलता है। उनका जन्म 831 हिजरी/1427–28 ई. में काहिरा में हुआ और मृत्यु 902 हिजरी/1497 ई. में हुई। ‘अल-सख़ावी’ nisba उनके परिवार के मिस्र के सखा नामक स्थान से संबंध की ओर संकेत करती है। अतः हिन्दी में उन्हें ‘मुहम्मद इब्न ʿअब्द अल-रहमान अल-सख़ावी’ या संक्षेप में ‘अल-सख़ावी’ लिखना अधिक सटीक है।[2]

अल-सख़ावी का बौद्धिक संसार

अल-सख़ावी उस ममलूक काहिरा के विद्वान थे जहाँ मस्जिदों, मदरसों, निजी घरों, सूफ़ी ख़ानक़ाहों और यात्राओं के माध्यम से ज्ञान का व्यापक संचार होता था। वे महान हदीस-विद्वान और इतिहासकार इब्न हजर अल-असक़लानी के प्रमुख शिष्यों में गिने जाते हैं। हदीस-परंपरा में इस्नाद अर्थात ज्ञान-संचरण की प्रमाणित शृंखला का महत्त्व जीवनी-लेखन को विशेष प्रकार की सूक्ष्मता देता था। किसी व्यक्ति ने किससे पढ़ा, किस ग्रंथ की सुनवाई की, किसे इजाज़ा दी, कहाँ यात्रा की और किन विद्वानों से संपर्क रखा—ये विवरण ज्ञान के सामाजिक भूगोल को सामने लाते हैं।

अल-सख़ावी का लेखन व्यापक था और इतिहास, हदीस, जीवनी तथा अपने गुरु इब्न हजर की विस्तृत जीवन-कथा तक फैला हुआ था। ‘अल-दौʾ अल-लामिʿ’ में उनका लेखक-व्यक्तित्व भी छिपा नहीं रहता। वे परिचितों, प्रतिद्वंद्वियों, गुरुओं, परिवारों और नगर-समाज का वर्णन करते हुए स्वयं अपने संबंधों और मूल्य-निर्णयों को दर्ज करते हैं। रेनाते याकोबी ने इसी कारण ‘जीवनी को आत्म-कथन’ के रूप में पढ़ने की संभावना रेखांकित की है: जीवनीकार दूसरों के बारे में लिखते समय अपने सामाजिक स्थान और बौद्धिक संसार का भी अनायास चित्र खींचता है।[3]

‘अल-दौʾ अल-लामिʿ’ की संरचना और स्वरूप

यह अरबी भाषा का बहुखंडी जीवनी-कोश है। उपलब्ध मुद्रित संस्करण बारह खंडों में जाना जाता है; पुस्तकालय सूची इसे कभी बारह खंड, छह जिल्दों में भी दर्ज करती है।[4] प्रविष्टियाँ नामों के वर्णानुक्रम और पारंपरिक जीवनी-लेखन की पद्धति से संगठित हैं। उनमें वंश, जन्म, परिवार, गुरु, अध्ययन, यात्रा, धार्मिक प्रतिष्ठा, पद, विवाह, संतान, आर्थिक स्थिति और मृत्यु जैसी सूचनाएँ अलग-अलग मात्रा में मिलती हैं। प्रत्येक प्रविष्टि समान विस्तार की नहीं है—कुछ कुछ पंक्तियों की हैं, तो कुछ विस्तृत सामाजिक आख्यान बन जाती हैं।

बारहवाँ खंड पूरी तरह महिलाओं को समर्पित होना इस ग्रंथ को विशिष्ट बनाता है। स्त्रियों को परिशिष्ट की तरह दर्ज करने की परंपरा पहले भी थी, किंतु 1,075 क्रमांकित प्रविष्टियों का यह संग्रह अपने विस्तार और विवरण के कारण असाधारण है। इसमें राजपरिवार अथवा अभिजात वर्ग की महिलाओं के साथ विदुषियों, हदीस की रावियाओं, शिक्षिकाओं, कवयित्रियों, सूफ़ी प्रवृत्ति की महिलाओं, व्यापारिक अथवा संपन्न परिवारों की सदस्यों और लेखक की परिचित तथा संबंधी महिलाओं के जीवन की झलक मिलती है।

महिला जीवनियों का ऐतिहासिक महत्त्व

1. ज्ञान और हदीस-परंपरा में महिलाओं की उपस्थिति

ग्रंथ से स्पष्ट होता है कि ममलूक समाज में कुछ महिलाओं ने धार्मिक ज्ञान अर्जित किया, हदीस-सुनवाई में भाग लिया और इजाज़ा के माध्यम से ज्ञान-संचरण की शृंखलाओं में स्थान पाया। अल-सख़ावी स्वयं अनेक महिला विद्वानों से ज्ञान ग्रहण करने की बात करते हैं; आधुनिक शोध में उनके 68 महिला शिक्षकों का उल्लेख मिलता है।[5] यह तथ्य उस सरल धारणा को चुनौती देता है कि मध्यकालीन ज्ञान-संस्थानों में महिलाएँ पूर्णतः अनुपस्थित थीं। फिर भी उनकी भागीदारी पुरुषों के समान संस्थागत नहीं थी: औपचारिक, वेतनभोगी शिक्षण-पदों तक पहुँच सीमित थी और घर, निजी पाठ-सत्र, मस्जिद अथवा विशिष्ट विद्वत्-नेटवर्क अधिक महत्त्वपूर्ण माध्यम थे।

2. परिवार और सामाजिक नेटवर्क

जीवनियाँ विवाह, मातृत्व, विधवापन, रिश्तेदारी, पड़ोस और संरक्षकता से जुड़ी सूचनाएँ देती हैं। किसी महिला की पहचान प्रायः पिता, पति या पुत्र के संबंध से व्यक्त होती है, जो स्रोत की पितृवंशीय संरचना को दिखाता है; पर उन्हीं विवरणों के भीतर महिलाओं के निर्णय, संपत्ति, प्रतिष्ठा और विद्वत् संपर्कों की स्वतंत्र रेखाएँ भी उभरती हैं। अल-सख़ावी अपनी माता, दादी, पुत्री, चाची, भतीजियों, रिश्तेदारों और परिचित महिलाओं का उल्लेख करते हैं। इसलिए पाठ केवल ‘महान व्यक्तियों’ का नहीं, बल्कि लेखक के आसपास के सामाजिक जाल का भी दस्तावेज बन जाता है।[6]

3. संपत्ति, वक़्फ़ और सार्वजनिक भूमिका

वक़्फ़ अर्थात धार्मिक अथवा परोपकारी प्रयोजन के लिए संपत्ति का स्थायी न्यास ममलूक समाज की महत्त्वपूर्ण संस्था थी। महिला जीवनियों और उनसे संबंधित दस्तावेज़ी संकेतों से यह समझा जा सकता है कि संपन्न महिलाएँ संपत्ति रखती थीं, उसे प्रबंधित करती थीं और धार्मिक-सामाजिक संस्थाओं के लिए वक़्फ़ स्थापित कर सकती थीं। रेनाते याकोबी का अध्ययन ‘Women in the Endowment System of the Mamlūk Period’ इसी क्षेत्र को सामने लाता है। यहाँ ‘सार्वजनिक स्थान’ का अर्थ केवल दरबार या औपचारिक पद नहीं, बल्कि दान, धार्मिक प्रतिष्ठान, शैक्षणिक संरक्षण और पारिवारिक संसाधनों पर प्रभाव भी है।[3]

4. साहित्य, भावनाएँ और व्यक्तित्व

जीवनी-कोश में कविता, प्रशंसा, स्मृति और भावनात्मक संबंधों के संकेत भी मिलते हैं। याकोबी का ‘The Scholar and the Poetess: A Friendship of the Heart in Mamlūk Egypt’ शीर्षक अध्ययन विद्वान और कवयित्री के संबंध को लेकर उस भावनात्मक संसार पर प्रकाश डालता है जिसे राजनीतिक इतिहास प्रायः दर्ज नहीं करता। इस प्रकार ‘अल-दौʾ अल-लामिʿ’ सामाजिक इतिहास के साथ साहित्यिक संस्कृति और भावनाओं के इतिहास के लिए भी उपयोगी है।

स्रोत की सीमाएँ और आलोचनात्मक पठन

किसी जीवनी-कोश को तत्कालीन समाज की पूर्ण जनगणना नहीं माना जा सकता। अल-सख़ावी की चयन-दृष्टि मुख्यतः शिक्षित, धार्मिक, शहरी, मध्य अथवा उच्च वर्ग और अपने सामाजिक नेटवर्क से जुड़े लोगों की ओर झुकती है। निर्धन, ग्रामीण, दास अथवा श्रमजीवी महिलाओं का जीवन अपेक्षाकृत कम दिखाई देता है। सूचना की मात्रा भी प्रतिष्ठा, लेखक की निकटता और उपलब्ध स्रोतों के अनुसार बदलती है।

दूसरी सीमा भाषा और मूल्यांकन की है। लेखक महिलाओं की प्रशंसा अक्सर धर्मनिष्ठा, शील, मातृत्व, वंश अथवा विद्वत्-संबंधों की स्वीकृत श्रेणियों में करता है। अतः आधुनिक इतिहासकार को यह पूछना चाहिए कि कौन-सी महिला शामिल हुई, किसे छोड़ा गया, किस गुण को ‘स्मरणीय’ माना गया और किस व्यवहार पर मौन रखा गया। हुदा लुत्फ़ी ने इस खंड का सामाजिक-आर्थिक इतिहास के स्रोत के रूप में अग्रणी विश्लेषण करते हुए दिखाया कि उसकी समृद्ध सूचनाओं के बावजूद उसमें सामान्य महिलाओं की तुलना में हदीस-संप्रेषक और उच्च सामाजिक वर्ग अधिक दिखाई देते हैं।[6] स्रोत की यही पक्षधरता उसकी कमजोरी मात्र नहीं; वह स्वयं ममलूक समाज की प्रतिष्ठा-व्यवस्था का प्रमाण भी है।

रेनाते याकोबी का योगदान

2024 में अमेरिकन यूनिवर्सिटी ऑफ बेरूत प्रेस से प्रकाशित ‘Al-Sakhāwī: A Biographer from Mamlūk Cairo and His Dictionary of Women’ में रेनाते याकोबी के कई अध्ययनों को किरिल दिमित्रिएव ने संपादित कर एकत्र किया है। 192 पृष्ठों की यह पुस्तक Sheikh Zayed Bin Sultan Al Nahyan Series में प्रकाशित हुई। इसके प्रथम भाग में अल-सख़ावी और उनके परिवार, जीवनी को आत्म-कथन के रूप में पढ़ने तथा विद्वान-कवयित्री संबंध पर विचार है; दूसरे भाग में ममलूक काल की विदुषी महिलाएँ और वक़्फ़-व्यवस्था में महिलाओं की भूमिका केंद्र में है। अंत में चुनिंदा जीवनियाँ दी गई हैं। दो अध्ययनों का अंग्रेज़ी रूप पहली बार इसी संकलन में प्रकाशित हुआ।[3]

याकोबी की विशेषता यह है कि वे ग्रंथ को केवल डेटा-संग्रह नहीं मानतीं। वे लेखक के परिवार, मित्रता, प्रतिस्पर्धा, भावनाओं और आत्म-प्रतिनिधित्व को भी ऐतिहासिक विश्लेषण में शामिल करती हैं। इस दृष्टि से अल-सख़ावी का जीवनी-कोश दो स्तरों पर पढ़ा जाता है—पहला, जिन स्त्री-पुरुषों का वर्णन किया गया है उनका सामाजिक इतिहास; और दूसरा, स्वयं जीवनीकार के चयन, भाषा और संबंधों का बौद्धिक इतिहास।

समकालीन अध्ययन के लिए प्रासंगिकता

आज महिला इतिहास, सूक्ष्म इतिहास, नेटवर्क अध्ययन और डिजिटल मानविकी के लिए ‘अल-दौʾ अल-लामिʿ’ में विशाल संभावनाएँ हैं। 1,075 महिला प्रविष्टियों से नाम, स्थान, गुरु, परिवार, यात्राएँ, वक़्फ़, पेशा और कालक्रम जैसे संकेत व्यवस्थित करके ममलूक समाज के ज्ञान-नेटवर्क का मानचित्र बनाया जा सकता है। पुरुष और महिला प्रविष्टियों की तुलना से यह भी देखा जा सकता है कि दोनों के लिए प्रयुक्त प्रशंसा, आलोचना और सार्वजनिक उपलब्धि के मानदंड किस प्रकार भिन्न थे।

साथ ही, डिजिटल विश्लेषण को अरबी नामों की विविध वर्तनी, एक ही व्यक्ति के अनेक संबोधनों, अधूरी तिथियों और स्रोत की चयनात्मकता से सावधान रहना होगा। मात्र संख्यात्मक उपस्थिति को समान सामाजिक शक्ति का प्रमाण नहीं माना जा सकता। फिर भी ग्रंथ यह दृढ़ता से सिद्ध करता है कि ममलूक काल की महिलाएँ ज्ञान, धर्म, संपत्ति, दान और सामाजिक प्रतिष्ठा की दुनिया में दृश्यमान थीं—भले ही उनकी उपस्थिति सीमित, वर्ग-विशिष्ट और पुरुष जीवनीकार की दृष्टि से छनकर आई हो।

निष्कर्ष

‘अल-दौʾ अल-लामिʿ लि-अहल अल-क़र्न अल-तासिʿ’ पंद्रहवीं शताब्दी के अरबी-इस्लामी संसार का एक महत्त्वपूर्ण स्मृति-भंडार है। अल-सख़ावी ने जीवनी को वंश और पद की सूची से आगे बढ़ाकर ज्ञान, संबंध, प्रतिष्ठा और दैनिक जीवन के विवरणों से जोड़ा। बारहवें खंड की 1,075 महिला जीवनियाँ इस कृति को महिला इतिहास का विशेष स्रोत बनाती हैं। इनमें विदुषियों और हदीस-संप्रेषकों की उपस्थिति, परिवार और नेटवर्क, संपत्ति और वक़्फ़, कविता तथा भावनात्मक संबंध—सभी के संकेत मिलते हैं।

इस ग्रंथ का सबसे संतुलित उपयोग तब संभव है जब उसकी सूचनात्मक समृद्धि और चयनात्मक सीमाओं दोनों को साथ पढ़ा जाए। रेनाते याकोबी का संकलित अध्ययन इसी आलोचनात्मक पद्धति को आगे बढ़ाता है और दिखाता है कि जीवनी-साहित्य अतीत की निष्क्रिय सूची नहीं, बल्कि सामाजिक स्मृति, आत्म-प्रतिनिधित्व और सत्ता-संबंधों का सक्रिय निर्माण है। हिन्दी के इतिहास, तुलनात्मक साहित्य, स्त्री-अध्ययन और इस्लामी अध्ययन के शोधार्थियों के लिए अल-सख़ावी की कृति एक ऐसे स्रोत का द्वार खोलती है जहाँ मध्यकालीन काहिरा की अनेक भूली-बिसरी स्त्री-आवाज़ों की प्रतिध्वनि आज भी सुनी जा सकती है।

संदर्भ

1. अल-सख़ावी, शम्स अल-दीन मुहम्मद इब्न ʿअब्द अल-रहमान. al-Ḍawʾ al-lāmiʿ li-ahl al-qarn al-tāsiʿ, खंड 11–12. काहिरा: Maktabat al-Qudsī, 1934–37. डिजिटल प्रति: NYU Arabic Collections Online

2. University of Wisconsin–Madison Libraries. ‘al-Ḍawʾ al-lāmiʿ li-ahl al-qarn al-tāsiʿ’: 12 volumes in 6; Beirut reprint of the Cairo edition. पुस्तकालय अभिलेख

3. Jacobi, Renate. Al-Sakhāwī: A Biographer from Mamlūk Cairo and His Dictionary of Women. संपादक Kirill Dmitriev. Beirut: American University of Beirut Press, 2024. ISBN 9786144920084. प्रकाशक विवरण

4. American University of Beirut. ‘AUB Press Releases New Work: Al-Sakhawi’, 10 September 2024. प्रेस विज्ञप्ति

5. Baker Institute for Public Policy. ‘Women as Religious Authorities: What a Forgotten History Means for the Modern Middle East.’ ऑनलाइन आलेख

6. Lutfi, Huda. ‘Al-Sakhāwī’s Kitāb al-Nisāʾ as a Source for the Social and Economic History of Muslim Women during the Fifteenth Century A.D.’ The Muslim World 71 (1981): 104–124. DOI: 10.1111/j.1478-1913.1981.tb03432.x. Mamluk Bibliography Online

7. Roded, Ruth. Women in Islamic Biographical Collections: From Ibn Saʿd to Who’s Who. Boulder: Lynne Rienner Publishers, 1994. पुस्तक विवरण

8. Rosenthal, Franz. A History of Muslim Historiography. 2nd revised ed. Leiden: Brill, 1968.

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