Wednesday, 26 August 2026

डॉ. मनीष कुमार मिश्रा का TSUOS में आगमन

 

ताशकंद स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ ओरिएंटल स्टडीज़ : इतिहास, अकादमिक परंपरा और भारत-अध्ययन

ताशकंद स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ ओरिएंटल स्टडीज़ : इतिहास, अकादमिक परंपरा और भारत-अध्ययन

Tashkent State University of Oriental Studies (TSUOS), Tashkent, Uzbekistan मध्य एशिया में प्राच्यविद्या (Oriental Studies) के अध्ययन, अध्यापन और शोध की सबसे पुरानी संस्थागत परंपराओं में से एक का प्रतिनिधित्व करता है। विश्वविद्यालय का वर्तमान स्वरूप समय के साथ हुए अनेक संस्थागत परिवर्तनों का परिणाम है, किंतु इसकी ऐतिहासिक जड़ें 1918 में स्थापित Turkestan Institute of Oriental Studies तक जाती हैं। विश्वविद्यालय के आधिकारिक इतिहास के अनुसार यह मध्य एशिया में प्राच्यविद्या के क्षेत्र का पहला उच्च शिक्षण संस्थान था।

1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

नवंबर 1918 में ताशकंद में Turkestan Institute of Oriental Studies की स्थापना की गई। इसका उद्देश्य तुर्किस्तान तथा पड़ोसी पूर्वी देशों से संबंधित भाषाओं, इतिहास, संस्कृति और समाज के विशेषज्ञ तैयार करना था। प्रथम शैक्षणिक वर्ष में 234 विद्यार्थियों को प्रवेश दिया गया था। उस समय यहाँ अरबी, फ़ारसी, चीनी, पश्तो, उर्दू और तुर्की जैसी पूर्वी भाषाओं के साथ उज़्बेक, ताजिक, किर्गिज़, तुर्कमेन और तातार जैसी क्षेत्रीय भाषाएँ तथा अंग्रेज़ी, जर्मन और फ्रेंच जैसी यूरोपीय भाषाएँ भी पढ़ाई जाती थीं। इतिहास, नृवंशविज्ञान, भूगोल, स्थानीय इतिहास तथा इस्लाम के इतिहास और कानून जैसे विषय भी पाठ्यक्रम का हिस्सा थे।

बाद के दशकों में प्राच्यविद्या की यह परंपरा ताशकंद के उच्च शिक्षा ढाँचे के भीतर विकसित होती रही। 1990 में Tashkent State University की Faculty of Oriental Studies के आधार पर Institute of Oriental Studies की स्थापना की गई। इसके बाद 15 जुलाई 1991 को इसे पुनर्गठित कर Tashkent State Institute of Oriental Studies बनाया गया।

इस विकास के दौरान संस्थान में अध्ययन का दायरा लगातार बढ़ा। अरबी, फ़ारसी, दारी, हिंदी, उर्दू, पश्तो, चीनी और उइग़ुर जैसी भाषाओं के साथ जापानी, कोरियाई और तुर्की भाषा एवं साहित्य के अध्ययन को भी विस्तार मिला। पांडुलिपियों और प्राचीन लिखित स्रोतों के गहन अध्ययन के लिए Source Studies तथा Textology से संबंधित अकादमिक संरचनाएँ भी विकसित की गईं।

इस प्रकार TSUOS को केवल भाषा-शिक्षण विश्वविद्यालय के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसकी ऐतिहासिक पहचान भाषा, साहित्य, इतिहास, दर्शन, स्रोत-अध्ययन, राजनीति, अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को जोड़ने वाली बहुविषयी प्राच्यविद्या परंपरा से बनी है।

2. वर्तमान अकादमिक संरचना

विश्वविद्यालय की आधिकारिक वेबसाइट पर अगस्त 2026 में उपलब्ध वर्तमान संरचना के अनुसार TSUOS में निम्न प्रमुख अकादमिक इकाइयाँ हैं।

Institute of Languages and Literature of the Peoples of the East

इसके अंतर्गत वर्तमान में कई विशिष्ट Higher Schools सूचीबद्ध हैं:

  • Higher School of Arabic Studies

  • Higher School of Iranian and Afghan Studies

  • Higher School of Turkology

  • Higher School of South Asian Languages

  • Higher School of Japanese Studies

  • Higher School of Korean Studies

  • Higher School of Chinese Studies

  • Higher School of Translation Studies and International Journalism

दक्षिण एशियाई भाषाओं के लिए अलग Higher School की उपस्थिति विशेष रूप से उल्लेखनीय है, क्योंकि भारत और दक्षिण एशिया संबंधी भाषा-अध्ययन विश्वविद्यालय की पुरानी अकादमिक परंपराओं में शामिल रहा है।

Faculty of Eastern Civilization and Philosophy

वर्तमान संरचना में इसके अंतर्गत:

  • Department of History of Eastern Countries and Anthropology

  • Department of Eastern Philosophy and Hermeneutics

  • Department of History of the Peoples of Central Asia

शामिल हैं।

Institute of Foreign Policy and International Economic Relations

इसके अंतर्गत:

  • Department of International Relations

  • Department of Economics and Management

  • Department of Foreign Economic Activity

  • Department of Tourism

कार्यरत हैं।

Faculty of Applied Sciences

इसके अंतर्गत:

  • Department of Western Languages

  • Department of Pedagogy and Psychology

  • Evening and Correspondence Department

सूचीबद्ध हैं।

इस संरचना से स्पष्ट होता है कि आधुनिक TSUOS में पारंपरिक Oriental Philology के साथ-साथ इतिहास, दर्शन, अंतरराष्ट्रीय संबंध, अर्थशास्त्र, प्रबंधन, पर्यटन, अनुवाद और पत्रकारिता जैसे क्षेत्रों को भी सम्मिलित किया गया है।

3. भाषाओं और क्षेत्र-अध्ययन की विशिष्टता

TSUOS की एक प्रमुख विशेषता भाषा-अध्ययन को संबंधित देश या क्षेत्र के साहित्य, इतिहास, दर्शन, संस्कृति, राजनीति और अर्थव्यवस्था से जोड़ना है। विश्वविद्यालय की पुरानी आधिकारिक सामग्री भी यह रेखांकित करती है कि यहाँ विशेषज्ञता के साथ विदेशी भाषाओं का ज्ञान महत्वपूर्ण रहा है।

इस कारण यहाँ Oriental Studies केवल भाषायी दक्षता प्राप्त करने का माध्यम नहीं है, बल्कि किसी देश अथवा सभ्यता को बहुआयामी दृष्टि से समझने की पद्धति है।

4. भारत-अध्ययन और हिंदी की परंपरा

भारत की दृष्टि से TSUOS का महत्व विशेष है। हिंदी और भारतीय अध्ययन इस संस्थान की अकादमिक गतिविधियों का लंबे समय से हिस्सा रहे हैं। विश्वविद्यालय के ऐतिहासिक विवरण में हिंदी को उन प्रमुख पूर्वी भाषाओं में शामिल किया गया है जिनका संस्थागत स्तर पर अध्यापन विकसित किया गया।

विश्वविद्यालय से संबंधित आधिकारिक अकादमिक सामग्री के अनुसार यहाँ हिंदी भाषा, भारतीय साहित्य, इतिहास, दर्शन, अर्थव्यवस्था और विदेश नीति से संबंधित अध्ययन और शोध किए गए हैं। इसी परंपरा में हिंदी शिक्षण हेतु पाठ्यपुस्तकों, अध्ययन-सामग्री, शब्दकोशों और भारत विषयक शोध-साहित्य के विकास का भी उल्लेख मिलता है।

हिंदी अध्ययन का व्यावहारिक पक्ष भी दिखाई देता है। सितंबर 2023 में Mahatma Gandhi Indian Studies Center में हिंदी के विद्यार्थियों और Indian Studies के स्नातकों के बीच एक विशेष संवाद आयोजित किया गया था, जिसमें हिंदी अध्ययन से मिलने वाले व्यावसायिक अवसरों पर चर्चा हुई।

5. महात्मा गांधी भारतीय अध्ययन केंद्र

भारत-उज़्बेकिस्तान अकादमिक संबंधों में Mahatma Gandhi Center for Indian Studies का विशेष महत्व है।

विश्वविद्यालय के International Cooperation Department की आधिकारिक जानकारी Mahatma Gandhi Center for Indian Studies की संस्थागत परंपरा को अप्रैल 2007 से दर्ज करती है। दूसरी ओर, विश्वविद्यालय की समाचार सामग्री बताती है कि 6 अप्रैल 2023 को Department of South and Southeast Asian Languages में “Mahatma Gandhi Center of Indian Studies” के उद्घाटन का एक औपचारिक समारोह आयोजित हुआ, जिसमें विश्वविद्यालय की Rector Gulchehra Rikhsiyeva और तत्कालीन भारतीय राजदूत Manish Prabhat सहित शिक्षक और विद्यार्थी उपस्थित थे।

इन दोनों आधिकारिक अभिलेखों को साथ पढ़ने पर यह कहना अधिक सुरक्षित है कि विश्वविद्यालय में गांधी/भारत-अध्ययन केंद्र की संस्थागत परंपरा पहले से मौजूद थी और 2023 में उसके वर्तमान/पुनर्संगठित स्वरूप से संबंधित उद्घाटन समारोह आयोजित किया गया। उपलब्ध आधिकारिक स्रोतों से आगे कोई अनुमान लगाना उचित नहीं होगा।

यह केंद्र हिंदी, भारतीय संस्कृति, साहित्य और भारत-अध्ययन से संबंधित गतिविधियों के लिए महत्वपूर्ण मंच है।

6. भारत और उज़्बेकिस्तान के बीच सांस्कृतिक सेतु

TSUOS में भारत संबंधी गतिविधियाँ केवल कक्षा तक सीमित नहीं हैं। उदाहरण के लिए, अक्टूबर 2023 में विश्वविद्यालय में “Mahatma Gandhi – Ambassador of Peace” विषय पर कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसमें TSUOS के साथ SCO Public Diplomacy Center in Uzbekistan और भारत के Tagore International School की सहभागिता थी। तत्कालीन भारतीय राजदूत Manish Prabhat भी कार्यक्रम में शामिल हुए और हिंदी निबंध प्रतियोगिता तथा ऑनलाइन क्विज़ के विजेताओं को सम्मानित किया गया।

ऐसी गतिविधियाँ TSUOS में भारतीय अध्ययन के तीन परस्पर संबंधित आयामों को सामने लाती हैं—भाषा एवं साहित्य, अकादमिक शोध और सांस्कृतिक/जन कूटनीति।

7. ICCR और TSUOS के संबंध

भारत के साथ विश्वविद्यालय के वर्तमान संबंधों का एक महत्वपूर्ण नवीन विकास Indian Council for Cultural Relations (ICCR) के साथ सहयोग है।

2026 में TSUOS में भारत के राजदूत के नेतृत्व वाले प्रतिनिधिमंडल के साथ हुई बैठक में हिंदी और संस्कृत शिक्षण, Indology curriculum, भारतीय अध्ययन, अकादमिक शोध, आधुनिक अध्ययन-सामग्री तथा Mahatma Gandhi Indian Cultural Centre की गतिविधियों को मजबूत करने पर चर्चा हुई। विश्वविद्यालय की आधिकारिक सूचना के अनुसार बैठक के अंत में TSUOS और ICCR के बीच Memorandum of Understanding पर हस्ताक्षर किए गए। इसमें शिक्षा, विज्ञान, अकादमिक आदान-प्रदान, Indology तथा सांस्कृतिक एवं मानवीय सहयोग को आगे बढ़ाने की रूपरेखा शामिल है।

यह विकास विशेष महत्व रखता है क्योंकि इससे भारत-अध्ययन और हिंदी शिक्षण को संस्थागत अंतरराष्ट्रीय सहयोग से जोड़ने का आधार मजबूत होता है।

8. अंतरराष्ट्रीय स्वरूप

TSUOS का अंतरराष्ट्रीय सहयोग व्यापक है। विश्वविद्यालय की आधिकारिक जानकारी के अनुसार उसने 150 से अधिक विदेशी संगठनों, विश्वविद्यालयों और शोध केंद्रों के साथ द्विपक्षीय सहयोग समझौते किए हैं। इन सहयोगों में joint/double-degree programmes, faculty और student exchange, academic conferences, internships, collaborative research और cultural exchange जैसी गतिविधियाँ शामिल हैं।

विश्वविद्यालय में अलग-अलग देशों से विशेषज्ञों को आमंत्रित करने की भी परंपरा है। International Cooperation Department की जानकारी में जापान, दक्षिण कोरिया, चीन, तुर्की, ईरान, मिस्र, मलेशिया, सिंगापुर, भारत और पाकिस्तान आदि देशों के विशेषज्ञों के विश्वविद्यालय की शैक्षणिक गतिविधियों से जुड़ने का उल्लेख मिलता है।

वर्ष 2025 की अंतरराष्ट्रीय गतिविधियों के विश्वविद्यालय के आधिकारिक विवरण में जापान, चीन, भारत और दक्षिण कोरिया के भागीदारों के साथ conferences, scientific forums तथा online meetings का भी उल्लेख है।

9. विश्वविद्यालय के अंतरराष्ट्रीय अध्ययन केंद्र

विश्वविद्यालय के International Cooperation Department द्वारा प्रकाशित सूची में विभिन्न देशों/क्षेत्रों से जुड़े केंद्रों का उल्लेख मिलता है। इनमें उदाहरणतः:

  • Central Asian Research Center of the University of Tsukuba – 2006

  • Mahatma Gandhi Center for Indian Studies – 2007

  • Center for Uzbek-Pakistan Partnership – 2009

  • Center for Vietnamese Language and Culture – 2012

  • Center for Indonesian Language and Culture – 2013

  • Center for Korean Studies – 2013

  • Global Japan Office – 2023

  • Center for Malay Language and Culture – 2023

  • Educational and Scientific Center for Korean Studies – 2023

शामिल हैं।

इन केंद्रों की उपस्थिति TSUOS की उस शैक्षणिक अवधारणा को दर्शाती है जिसमें भाषा-अध्ययन को संबंधित देश की संस्कृति और समाज से जोड़ने का प्रयास किया जाता है।

10. शोध और ज्ञान-परंपरा

TSUOS के विकास में स्रोत-अध्ययन और पांडुलिपि-अध्ययन का विशेष स्थान रहा है। विश्वविद्यालय के आधिकारिक इतिहास के अनुसार विद्यार्थियों में manuscripts तथा written sources के गहन अध्ययन और वैज्ञानिक अनुसंधान की क्षमता विकसित करने के उद्देश्य से Source Studies and Textology से संबंधित विभागीय व्यवस्था विकसित की गई थी।

आज विश्वविद्यालय अपनी शोध गतिविधियों को अधिक अंतरराष्ट्रीय बनाने की दिशा में काम कर रहा है। 2024–2027 की रणनीति में Scopus/Web of Science में शोध प्रकाशन, अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक सहयोग, वैज्ञानिक केंद्रों का विकास, विद्यार्थियों को शोध में सम्मिलित करना और विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक journals को अंतरराष्ट्रीय databases की ओर ले जाने जैसे लक्ष्य रखे गए हैं।

11. 2024–2027 की विकास रणनीति

TSUOS की वर्तमान दिशा को समझने के लिए इसकी Strategy for 2024–2027 महत्वपूर्ण दस्तावेज है। इसे 2024 में विश्वविद्यालय के Supervisory Board और University Council द्वारा अनुमोदित किया गया।

इस रणनीति में विश्वविद्यालय ने स्वयं को आधुनिक शिक्षा और शोध केंद्र के रूप में विकसित करने, अंतरराष्ट्रीयकरण बढ़ाने, डिजिटल शिक्षा को विस्तार देने, विदेशी विश्वविद्यालयों के विशेषज्ञों को शैक्षणिक प्रक्रिया में सम्मिलित करने, joint educational programmes विकसित करने तथा QS और THE जैसे अंतरराष्ट्रीय ranking frameworks में अपनी स्थिति मजबूत करने जैसे लक्ष्य निर्धारित किए हैं।

विशेष रूप से विश्वविद्यालय ने स्वयं को specialized universities के बीच Central Asia के educational “hub” के रूप में विकसित करने का रणनीतिक लक्ष्य व्यक्त किया है।

12. भारतीय अध्ययन के संदर्भ में TSUOS का महत्व

भारत के लिए TSUOS का महत्व कई स्तरों पर समझा जा सकता है।

पहला, यहाँ हिंदी और भारतीय अध्ययन की स्थापित अकादमिक परंपरा है।

दूसरा, विश्वविद्यालय भारत को केवल भाषा या साहित्य के माध्यम से नहीं देखता, बल्कि इतिहास, दर्शन, संस्कृति, अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय संबंध जैसे क्षेत्रों के माध्यम से भी अध्ययन की संभावनाएँ प्रदान करता है।

तीसरा, Mahatma Gandhi Center for Indian Studies भारत और उज़्बेकिस्तान के बीच अकादमिक एवं सांस्कृतिक संवाद के लिए संस्थागत मंच उपलब्ध कराता है।

चौथा, ICCR और TSUOS के बीच 2026 का MoU हिंदी, संस्कृत, Indology, academic exchange और collaborative research को और विकसित करने की संभावनाएँ प्रस्तुत करता है।

इसलिए TSUOS को भारत-उज़्बेकिस्तान संबंधों में केवल एक विदेशी विश्वविद्यालय के रूप में नहीं, बल्कि ज्ञान, भाषा, अनुवाद, भारतीय अध्ययन और सांस्कृतिक संवाद के संस्थागत केंद्र के रूप में देखना अधिक उपयुक्त है।

13. मध्य एशिया में TSUOS का स्थान

1918 से विकसित इसकी ऐतिहासिक परंपरा, पूर्वी और एशियाई भाषाओं की व्यापकता, Central Asian Studies, Eastern History and Philosophy, international relations तथा international research centres को देखते हुए TSUOS मध्य एशिया में Oriental Studies की एक महत्वपूर्ण संस्था है। स्वयं विश्वविद्यालय अपने 1918 के पूर्ववर्ती संस्थान को मध्य एशिया का पहला Oriental higher educational institution बताता है।

यहाँ एक महत्वपूर्ण अकादमिक सावधानी आवश्यक है: “मध्य एशिया का सबसे बड़ा”, “विश्व का सर्वश्रेष्ठ” अथवा इसी प्रकार के अतिशयोक्तिपूर्ण दावे स्वतंत्र तुलनात्मक प्रमाण के बिना नहीं किए जाने चाहिए। आधिकारिक स्रोत जिस तथ्य की स्पष्ट पुष्टि करते हैं, वह यह है कि इसकी प्राच्यविद्या की संस्थागत परंपरा 1918 तक जाती है और विश्वविद्यालय आज अपने अंतरराष्ट्रीयकरण तथा Central Asian educational hub बनने की दिशा में रणनीतिक रूप से कार्य कर रहा है।

14. निष्कर्ष

Tashkent State University of Oriental Studies की पहचान तीन प्रमुख विशेषताओं के संगम से निर्मित हुई है—एक शताब्दी से अधिक पुरानी प्राच्यविद्या परंपरा, एशियाई भाषाओं और सभ्यताओं का बहुविषयी अध्ययन तथा व्यापक अंतरराष्ट्रीय अकादमिक सहयोग।

भारत के संदर्भ में इसका महत्व और बढ़ जाता है। हिंदी शिक्षण, भारतीय साहित्य एवं संस्कृति का अध्ययन, Mahatma Gandhi Center for Indian Studies, भारतीय संस्थाओं और राजनयिक प्रतिनिधियों के साथ गतिविधियाँ तथा ICCR के साथ संस्थागत सहयोग इसे भारत और उज़्बेकिस्तान के अकादमिक-सांस्कृतिक संबंधों का एक महत्वपूर्ण केंद्र बनाते हैं।

आज विश्वविद्यालय अपनी ऐतिहासिक Oriental Studies परंपरा को आधुनिक international relations, economics, translation, interdisciplinary research, digital education और global academic cooperation के साथ जोड़ने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। यही ऐतिहासिक निरंतरता और आधुनिक परिवर्तनशीलता TSUOS को मध्य एशिया की प्राच्यविद्या परंपरा में विशिष्ट स्थान प्रदान करती है।

आधिकारिक पता: Amir Temur Street 20, Tashkent 100060, Uzbekistan.

आधिकारिक वेबसाइट: Tashkent State University of Oriental Studies

स्रोत संबंधी टिप्पणी

ऊपर दी गई संस्थागत तिथियाँ, वर्तमान अकादमिक संरचना, अंतरराष्ट्रीय सहयोग, भारत-अध्ययन केंद्र और ICCR सहयोग संबंधी तथ्य मुख्यतः TSUOS की आधिकारिक वेबसाइट और उसके आधिकारिक संस्थागत दस्तावेजों से सत्यापित किए गए हैं। जहाँ विश्वविद्यालय की अलग-अलग आधिकारिक प्रविष्टियों में 2007 और 2023 जैसी अलग तिथियाँ दिखाई देती हैं, वहाँ दोनों को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया गया है; किसी काल्पनिक निष्कर्ष से उन्हें जोड़ने का प्रयास नहीं किया गया है।

मैंने जानबूझकर अपुष्ट आँकड़े—जैसे वर्तमान छात्र संख्या, भारतीय विद्यार्थियों की संख्या, शिक्षकों की कुल वर्तमान संख्या या ऐसी कोई ranking—नहीं जोड़ी है जिनकी नवीन आधिकारिक पुष्टि मुझे नहीं मिली। इससे यह सामग्री शोध-पत्र, पुस्तक, सम्मेलन-स्मारिका या संस्थागत परिचय में अपेक्षाकृत सुरक्षित रूप से इस्तेमाल की जा सकती है।

ICCR HINDI CHAIR पर यहां 2024 में डॉ मनीष कुमार मिश्रा आए और उन्होंने जो कार्य किए उसे प्रमुखता से लिखें और जोड़ें

हाँ। उपलब्ध प्रमाणित स्रोतों के आधार पर ICCR हिन्दी चेयर और डॉ. मनीष कुमार मिश्रा के कार्यकाल को विश्वविद्यालय के परिचय में एक स्वतंत्र और प्रमुख खंड के रूप में जोड़ना उचित होगा। ICCR की अपनी Annual Report भी पुष्टि करती है कि उन्होंने जनवरी 2024 में TSUOS में Indian Studies–Hindi Language Chair पर कार्यभार ग्रहण किया था। 

ICCR हिन्दी चेयर और डॉ. मनीष कुमार मिश्रा का योगदान

ICCR हिन्दी चेयर : भारत–उज़्बेकिस्तान अकादमिक संबंधों की महत्वपूर्ण कड़ी

Tashkent State University of Oriental Studies (TSUOS) में भारतीय अध्ययन और हिन्दी अध्यापन की दीर्घ परंपरा को भारत सरकार की Indian Council for Cultural Relations (ICCR) की हिन्दी चेयर ने अतिरिक्त संस्थागत आधार प्रदान किया है। इस व्यवस्था के अंतर्गत भारत से हिन्दी के विद्वान विश्वविद्यालय में Visiting Professor के रूप में जाकर हिन्दी भाषा, साहित्य और भारतीय संस्कृति के अध्यापन तथा अकादमिक-सांस्कृतिक संवाद में योगदान देते हैं।

ICCR की Annual Report 2023–24 में TSUOS, Tashkent के लिए Indian Studies–Hindi Language विषय की ICCR Chair दर्ज है। इसी आधिकारिक अभिलेख में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि Dr. Manish Kumar Mishra ने जनवरी 2024 में इस Chair पर कार्यभार ग्रहण किया।

इस प्रकार वर्ष 2024 TSUOS में हिन्दी और भारतीय अध्ययन के इतिहास में उल्लेखनीय रहा, क्योंकि इस अवधि में ICCR हिन्दी चेयर के माध्यम से नियमित अध्यापन के साथ अनेक अकादमिक, शोधपरक, साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों को आगे बढ़ाया गया।

डॉ. मनीष कुमार मिश्रा का TSUOS में आगमन

डॉ. मनीष कुमार मिश्रा वर्ष 2024 में Visiting Professor, ICCR Hindi Chair, Tashkent State University of Oriental Studies, Tashkent, Uzbekistan के रूप में ताशकंद पहुँचे। ICCR के आधिकारिक दस्तावेज में उनकी नियुक्ति/कार्यग्रहण का उल्लेख उपलब्ध होने के कारण यह तथ्य संस्थागत रूप से सत्यापित है।

उनका कार्य केवल कक्षा में हिन्दी पढ़ाने तक सीमित नहीं रहा। उपलब्ध प्रकाशित अभिलेख उनके कार्यकाल में हिन्दी शिक्षण, विद्यार्थियों के साथ संवाद, शोध, सम्मेलन, भारतीय संस्कृति के प्रसार, भारत–उज़्बेकिस्तान साहित्यिक संबंधों और डिजिटल माध्यम से हिन्दी एवं भारतीय अध्ययन के दस्तावेजीकरण जैसी गतिविधियों की ओर संकेत करते हैं।

हिन्दी भाषा और साहित्य का अध्यापन

ICCR हिन्दी चेयर का मूल उद्देश्य विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों को हिन्दी भाषा और भारतीय साहित्य का प्रामाणिक भारतीय अकादमिक अनुभव उपलब्ध कराना है। डॉ. मिश्रा ने TSUOS में हिन्दी भाषा के Visiting Professor के रूप में अध्यापन किया। उनके ताशकंद प्रवास से संबंधित प्रकाशित सामग्री में उनकी पहचान निरंतर Visiting Professor (ICCR Hindi Chair), Tashkent State University of Oriental Studies के रूप में दर्ज हुई है।

उनके कार्यकाल का महत्व इस बात में भी था कि भाषा को केवल व्याकरण और पाठ्यक्रम तक सीमित न रखते हुए भारतीय साहित्य, समाज, इतिहास और संस्कृति के व्यापक संदर्भों से जोड़ने का प्रयास किया गया।

हिन्दी को भारतीय संस्कृति से जोड़ने का प्रयास

विदेश में हिन्दी शिक्षण की भूमिका केवल भाषा-संप्रेषण तक सीमित नहीं होती। यह भारतीय संस्कृति को समझने का माध्यम भी बनती है। डॉ. मिश्रा के ताशकंद प्रवास से संबंधित रचनात्मक लेखन में कबीर, रवीन्द्रनाथ टैगोर, शमशेर, अमृता प्रीतम जैसे भारतीय साहित्यकारों के साथ मध्य एशियाई साहित्यिक परंपरा के संवाद की अभिव्यक्ति दिखाई देती है।

इस दृष्टि से उनका कार्यकाल हिन्दी भाषा के माध्यम से India–Uzbekistan cultural dialogue विकसित करने की प्रक्रिया का हिस्सा माना जा सकता है।

हिन्दी और भारतीय अध्ययन को विश्वविद्यालय से बाहर ले जाने का प्रयास

ICCR हिन्दी चेयर की गतिविधियों को TSUOS परिसर से बाहर अन्य शैक्षणिक संस्थानों तक पहुँचाने के प्रमाण भी उपलब्ध हैं। नवंबर 2024 में डॉ. मनीष कुमार मिश्रा ने Alfraganus University, Tashkent में विद्यार्थियों के लिए भारतीय दर्शन और धर्म/भारतीय दार्शनिक परंपरा पर व्याख्यान दिया। उपलब्ध विवरण के अनुसार इस कार्यक्रम में भारत की दार्शनिक विरासत, धार्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक विशिष्टताओं पर चर्चा की गई।

इस प्रकार ICCR हिन्दी चेयर के माध्यम से भारतीय अध्ययन को केवल हिन्दी भाषा की कक्षा तक सीमित न रखते हुए अन्य विश्वविद्यालयों और विषयों के विद्यार्थियों तक पहुँचाने का प्रयास हुआ।

भारत–उज़्बेकिस्तान के भाषायी संबंधों पर ध्यान

डॉ. मिश्रा ने उज़्बेकिस्तान में हिन्दी और भारतीय भाषाओं की उपस्थिति तथा दोनों देशों के ऐतिहासिक भाषायी संपर्क में भी रुचि दिखाई। 2024 की प्रकाशित सामग्री में उनके द्वारा उज़्बेकिस्तान में कुछ समुदायों और उनकी भाषाओं के भारत से संभावित संबंधों के अध्ययन का उल्लेख मिलता है।

यह क्षेत्र अत्यंत विशिष्ट है और इसके निष्कर्षों के लिए विस्तृत भाषावैज्ञानिक अनुसंधान आवश्यक है; इसलिए किसी समुदाय को बिना निर्णायक शोध के भारतीय मूल का घोषित करना उचित नहीं होगा। किंतु यह कहा जा सकता है कि ICCR हिन्दी चेयर के उनके कार्यकाल में भारत–मध्य एशिया भाषायी संबंधों को शोध के विषय के रूप में सामने लाने का प्रयास किया गया।

अकादमिक परिसंवाद और सम्मेलन

डॉ. मिश्रा के कार्यकाल की उल्लेखनीय विशेषता अकादमिक आयोजनों को प्रोत्साहित करना भी रही। सितंबर 2024 के एक प्रकाशित आयोजन-विवरण में उन्हें परिसंवाद के संयोजक के रूप में दर्ज किया गया है। कार्यक्रम में भारत से विद्वान ऑनलाइन माध्यम से जुड़े, शोध-पत्र प्रस्तुत हुए तथा प्रस्तुत शोध-आलेखों की पुस्तक का लोकार्पण भी किया गया।

इस प्रकार हिन्दी चेयर की भूमिका केवल अध्यापन तक सीमित न रहकर teaching–research–conference–publication की एक व्यापक अकादमिक प्रक्रिया से जुड़ी दिखाई देती है।

राज कपूर, हिन्दी सिनेमा और भारत–उज़्बेक सांस्कृतिक संबंध

उज़्बेकिस्तान और मध्य एशिया में भारतीय सिनेमा, विशेष रूप से राज कपूर, की ऐतिहासिक लोकप्रियता भारत–उज़्बेक सांस्कृतिक संपर्क का महत्वपूर्ण अध्याय है। डॉ. मिश्रा के कार्यकाल में इस विषय को भी अकादमिक विमर्श से जोड़ा गया।

उपलब्ध अभिलेखों में “हिन्दी सिनेमा की वैश्विक लोकप्रियता और राज कपूर” विषय पर परिसंवाद का उल्लेख मिलता है। इसी संदर्भ में UGC-CARE सूचीबद्ध शोध पत्रिका अनहद लोक के राज कपूर विशेषांक के लोकार्पण का भी विवरण मिलता है। इस विशेषांक का संपादन डॉ. मनीष कुमार मिश्रा और TSUOS की डॉ. निलुफर खोजाएवा द्वारा संयुक्त रूप से किए जाने का उल्लेख प्रकाशित स्रोत में उपलब्ध है।

इस पहल का महत्व यह है कि लोकप्रिय संस्कृति के विषय को अकादमिक शोध से जोड़ते हुए भारतीय सिनेमा को भारत और मध्य एशिया के सांस्कृतिक संबंधों के अध्ययन के एक गंभीर स्रोत के रूप में सामने लाया गया।

लाल बहादुर शास्त्री और ताशकंद की साझा स्मृति

भारत–उज़्बेकिस्तान संबंधों में पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का ताशकंद से ऐतिहासिक संबंध अत्यंत महत्वपूर्ण है। डॉ. मिश्रा ने अपने ताशकंद प्रवास में इस साझा ऐतिहासिक स्मृति पर भी लेखन किया।

उनकी प्रकाशित रचना में ताशकंद स्थित Shastri Street (Shastri Ko‘chasi), School No. 24 से जुड़ी शास्त्री स्मृति तथा Lal Bahadur Shastri Indian Culture Centre जैसे स्थलों का उल्लेख मिलता है।

इसके अतिरिक्त उनके एक प्रकाशित आलेख में ताशकंद के लाल बहादुर शास्त्री विद्यालय और वहाँ हिन्दी अध्ययन के संदर्भ को भारत–उज़्बेकिस्तान के भाषायी और सांस्कृतिक संबंधों से जोड़ा गया।

इस प्रकार ICCR हिन्दी चेयर के कार्य को समकालीन हिन्दी अध्यापन के साथ भारत–उज़्बेकिस्तान की ऐतिहासिक स्मृतियों से भी जोड़ने का प्रयास दिखाई देता है।

डिजिटल हिन्दी और दस्तावेजीकरण

डॉ. मिश्रा के कार्यकाल की एक अन्य उल्लेखनीय दिशा डिजिटल माध्यम में हिन्दी और उज़्बेकिस्तान संबंधी सामग्री के संरक्षण की रही।

उनके कार्यकाल के उत्तरार्ध से संबंधित प्रकाशित विवरण में ‘ताशकंद संवाद’ नामक हिन्दी ब्लॉग की शुरुआत तथा उज़्बेकी भारतविदों/भारतीय भाषाओं से जुड़े विद्वानों के साक्षात्कारों को डिजिटल रूप में संरक्षित करने की योजना का उल्लेख मिलता है।

इस प्रकार परंपरागत कक्षा-आधारित हिन्दी अध्यापन के साथ डिजिटल दस्तावेजीकरण को जोड़ने का प्रयास किया गया। यह कार्य इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि उज़्बेकिस्तान में हिन्दी और भारतीय अध्ययन की पुरानी पीढ़ी के विद्वानों के अनुभव भविष्य के शोध के लिए प्राथमिक स्रोत का रूप ले सकते हैं।

साहित्यिक सृजन के माध्यम से सांस्कृतिक संवाद

डॉ. मिश्रा का ताशकंद प्रवास उनके साहित्यिक लेखन में भी दिखाई देता है। वर्ष 2024 में प्रकाशित उनकी रचनाओं ‘ताशकंद’, ‘ताशकंद शहर’, ‘नवरोज़ मुबारक’ और ‘शास्त्री कोचासी, ताशकंद’ आदि में उज़्बेक समाज, ताशकंद, नवरोज़, भारत–उज़्बेक सांस्कृतिक स्मृतियों और मध्य एशियाई परिवेश का चित्रण मिलता है। इन प्रकाशित रचनाओं में उनका पदनाम ICCR हिन्दी चेयर, TSUOS के Visiting Professor के रूप में दर्ज है।

इस साहित्यिक सृजन को भी सांस्कृतिक संपर्क का एक रूप माना जा सकता है—जहाँ भारत से आया हिन्दी अध्यापक उज़्बेकिस्तान के समाज और संस्कृति को हिन्दी साहित्य के पाठकों तक पहुँचा रहा था।

ICCR हिन्दी चेयर के इस कार्यकाल का व्यापक महत्व

डॉ. मनीष कुमार मिश्रा के TSUOS स्थित ICCR हिन्दी चेयर कार्यकाल को मुख्यतः निम्न क्षेत्रों से जोड़कर देखा जा सकता है:

  1. हिन्दी भाषा और साहित्य का अध्यापन तथा विद्यार्थी-संवाद।

  2. हिन्दी को भारतीय इतिहास, साहित्य, दर्शन और संस्कृति के व्यापक संदर्भ से जोड़ना।

  3. भारत–उज़्बेकिस्तान के साहित्यिक और सांस्कृतिक संबंधों पर अकादमिक संवाद।

  4. परिसंवाद, शोध-पत्र प्रस्तुति और प्रकाशन जैसी शोध गतिविधियों को प्रोत्साहन।

  5. राज कपूर और भारतीय सिनेमा की मध्य एशिया में लोकप्रियता को अकादमिक अध्ययन से जोड़ना।

  6. लाल बहादुर शास्त्री और ताशकंद की साझा ऐतिहासिक स्मृति पर हिन्दी लेखन।

  7. अन्य उज़्बेक उच्च शिक्षण संस्थानों में भारतीय दर्शन और संस्कृति पर अकादमिक व्याख्यान।

  8. डिजिटल हिन्दी के माध्यम से उज़्बेकिस्तान में भारतविद्या और हिन्दी से संबंधित सामग्री के दस्तावेजीकरण का प्रयास।

  9. रचनात्मक हिन्दी लेखन के माध्यम से समकालीन उज़्बेकिस्तान को भारतीय हिन्दी पाठकों से परिचित कराना।

  10. ICCR हिन्दी चेयर को भाषा-अध्यापन के साथ सांस्कृतिक कूटनीति और people-to-people contact के माध्यम के रूप में सक्रिय करना।

TSUOS के भारत-अध्ययन के इतिहास में स्थान

TSUOS में हिन्दी और भारत-अध्ययन की परंपरा डॉ. मनीष कुमार मिश्रा के आगमन से बहुत पहले की है। अतः उनके कार्यकाल को इस दीर्घ परंपरा के आरंभ के रूप में प्रस्तुत करना ऐतिहासिक रूप से सही नहीं होगा। अधिक तथ्यपरक निष्कर्ष यह है कि उन्होंने विश्वविद्यालय की पहले से स्थापित हिन्दी एवं भारतविद्या परंपरा को ICCR हिन्दी चेयर के माध्यम से अध्यापन, सम्मेलन, प्रकाशन, सांस्कृतिक गतिविधियों, भारतीय सिनेमा संबंधी शोध और डिजिटल दस्तावेजीकरण जैसी दिशाओं में आगे बढ़ाने का प्रयास किया।

इस कार्यकाल में हिन्दी चेयर एक अध्यापन पद से आगे बढ़कर academic and cultural bridge between India and Uzbekistan के रूप में सक्रिय दिखाई देती है। यह गतिविधियाँ भारत की सांस्कृतिक कूटनीति के उस व्यापक उद्देश्य से भी जुड़ती हैं जिसमें हिन्दी, साहित्य, इतिहास, दर्शन, सिनेमा और सांस्कृतिक स्मृति के माध्यम से दीर्घकालीन people-to-people relations को मजबूत किया जाता है।

इस दृष्टि से वर्ष 2024 में डॉ. मनीष कुमार मिश्रा का TSUOS आगमन विश्वविद्यालय की हिन्दी-अध्ययन परंपरा के समकालीन अध्याय में उल्लेखनीय स्थान रखता है।

एक बात विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है: मैंने यहाँ ICCR की Annual Report को नियुक्ति का प्राथमिक आधिकारिक प्रमाण रखा है और अन्य गतिविधियों के लिए उपलब्ध प्रकाशित अभिलेखों का सहारा लिया है। इससे लेख में यह दावा नहीं होगा कि विश्वविद्यालय में हिन्दी का विकास केवल उनके कारण हुआ; बल्कि उनके योगदान को विश्वविद्यालय की पहले से समृद्ध हिन्दी/भारतविद्या परंपरा की निरंतरता और विस्तार के रूप में प्रस्तुत किया गया है। 

यदि इसे TSUOS के पहले वाले विस्तृत इतिहास में जोड़ा जाए, तो मैं इस खंड को भारत-अध्ययन और Mahatma Gandhi Centre के तुरंत बाद रखूँगा—इससे डॉ. मिश्रा और ICCR हिन्दी चेयर का योगदान पर्याप्त प्रमुखता से आएगा।

इस आलेख को वर्ड फाईल लिंक में भेजें

वर्ड फ़ाइल तैयार है। इसमें ICCR हिन्दी चेयर, वर्ष 2024 में डॉ. मनीष कुमार मिश्रा के TSUOS आगमन तथा उनके प्रमुख अकादमिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक और शोध-संबंधी कार्यों को व्यवस्थित रूप से प्रमुखता दी गई है।

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