Saturday, 29 August 2026

मोदी की उज़्बेकिस्तान यात्रा: मध्य एशिया में भारत की साझेदारी का नया अध्याय व्यापार, शिक्षा, संस्कृति और जन-संपर्क के रास्ते भारत–उज़्बेकिस्तान संबंधों को नई गति देने का अवसर डॉ. मनीष कुमार सी. मिश्रा

 मोदी की उज़्बेकिस्तान यात्रा: मध्य एशिया में भारत की साझेदारी का नया अध्याय

व्यापार, शिक्षा, संस्कृति और जन-संपर्क के रास्ते भारत–उज़्बेकिस्तान संबंधों को नई गति देने का अवसर

डॉ. मनीष कुमार सी. मिश्रा


प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 29–30 अगस्त 2026 की उज़्बेकिस्तान राजकीय यात्रा केवल दो देशों के बीच एक और उच्चस्तरीय कूटनीतिक संवाद नहीं है। यह उस रिश्ते को आगे बढ़ाने का अवसर है जिसकी जड़ें इतिहास, संस्कृति और जन-संपर्क में बहुत गहरी हैं और जिसकी वर्तमान संभावनाएँ व्यापार, निवेश, ऊर्जा, डिजिटल संपर्क, रक्षा, शिक्षा तथा मानव-केंद्रित सहयोग तक फैली हुई हैं। प्रधानमंत्री की यह चौथी उज़्बेकिस्तान यात्रा है। ऐसे समय में जब मध्य एशिया वैश्विक राजनीति, संपर्क और आर्थिक सहयोग के लिहाज से अधिक महत्वपूर्ण हो रहा है, ताशकंद में होने वाली बातचीत भारत की ‘विस्तारित पड़ोस’ की सोच को ठोस दिशा दे सकती है।

भारत और उज़्बेकिस्तान का संबंध केवल आधुनिक राजनय से शुरू नहीं होता। मध्य एशिया और भारतीय उपमहाद्वीप सदियों से व्यापारिक मार्गों, भाषाओं, साहित्य, संगीत, सूफी परंपराओं और सांस्कृतिक आदान-प्रदान से जुड़े रहे हैं। आधुनिक दौर में भी भारतीय सिनेमा और हिन्दी ने उज़्बेक समाज में भारत के प्रति आत्मीयता बनाए रखने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई है। राज कपूर और भारतीय फिल्मों की लोकप्रियता से बनी सांस्कृतिक स्मृति आज नई पीढ़ी के लिए शिक्षा, पर्यटन, डिजिटल माध्यम और समकालीन भारतीय संस्कृति के जरिए नए रूप ग्रहण कर सकती है। यही वह आधार है जिस पर राजनीतिक और आर्थिक साझेदारी को अधिक मानवीय गहराई मिलती है।

प्रधानमंत्री कार्यालय के अनुसार, ताशकंद में प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति शावकत मिर्ज़ियोयेव प्रतिनिधिमंडल स्तर की वार्ता करेंगे। इसमें व्यापार और निवेश, रक्षा, डिजिटल कनेक्टिविटी, ऊर्जा, शिक्षा तथा दोनों देशों के लोगों के बीच संबंध प्रमुख विषय होंगे। दोनों नेता ‘विकसित भारत 2047’ और ‘उज़्बेकिस्तान–2030’ जैसी विकास दृष्टियों के बीच संभावित तालमेल पर भी विचार करेंगे। उज़्बेक राष्ट्रपति कार्यालय ने ऊर्जा, रसायन उद्योग, भूविज्ञान, स्वास्थ्य, औषधि, कृषि और मशीन निर्माण जैसे क्षेत्रों में ठोस कार्यक्रमों और परियोजनाओं पर ध्यान दिए जाने की बात कही है। यात्रा के बाद द्विपक्षीय समझौतों के एक महत्वपूर्ण पैकेज पर हस्ताक्षर की भी योजना है।

इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह होना चाहिए कि राजनीतिक निकटता को आर्थिक परिणामों में कैसे बदला जाए। भारत के लिए उज़्बेकिस्तान मध्य एशिया का एक महत्वपूर्ण बाजार और साझेदार है, जबकि उज़्बेकिस्तान भारत की विशाल अर्थव्यवस्था, प्रौद्योगिकी, औषधि उद्योग, शिक्षा और सेवा क्षेत्र से लाभ उठा सकता है। फार्मास्यूटिकल्स, स्वास्थ्य सेवा, आईटी, स्टार्टअप, कृषि-प्रसंस्करण और कौशल विकास ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ सहयोग को सीधे नागरिकों तक पहुँचाया जा सकता है। संपर्क की भौगोलिक चुनौती बनी हुई है; इसलिए वैकल्पिक परिवहन गलियारों, डिजिटल कनेक्टिविटी और क्षेत्रीय संपर्क पर निरंतर काम दोनों देशों के आर्थिक रिश्ते के लिए निर्णायक होगा।

शिक्षा और भाषा इस साझेदारी का अपेक्षाकृत कम चर्चित, लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण आयाम है। उज़्बेकिस्तान में रहने और वहाँ हिन्दी शिक्षण तथा अकादमिक गतिविधियों से जुड़ने के दौरान मैंने अनुभव किया कि भारत के प्रति आकर्षण केवल फिल्मों या इतिहास तक सीमित नहीं है। विद्यार्थियों में हिन्दी, भारतीय साहित्य, संस्कृति और समकालीन भारत को जानने की वास्तविक जिज्ञासा है। इसी तरह भारतीय विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों को भी मध्य एशिया के इतिहास, भाषाओं, समाज और समकालीन परिवर्तन के अध्ययन को अधिक महत्व देना चाहिए। छात्र एवं शिक्षक विनिमय, संयुक्त शोध, अनुवाद परियोजनाएँ, डिजिटल कक्षाएँ और विश्वविद्यालयों के बीच दीर्घकालीन साझेदारी दोनों देशों के संबंधों को ऐसी सामाजिक नींव दे सकती हैं जो किसी एक सरकारी यात्रा या समझौते से कहीं अधिक स्थायी होती है।

इस संदर्भ में प्रधानमंत्री का ताशकंद स्थित लाल बहादुर शास्त्री स्मारक और ताशकंद स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ ओरिएंटल स्टडीज़ के महात्मा गांधी केंद्र जाने का प्रस्ताव विशेष प्रतीकात्मक महत्व रखता है। ताशकंद भारत की राष्ट्रीय स्मृति में लाल बहादुर शास्त्री के कारण एक विशिष्ट स्थान रखता है, जबकि महात्मा गांधी केंद्र शिक्षा, भारतीय अध्ययन और सांस्कृतिक संवाद की जीवित परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है। कूटनीति केवल बंद कमरों में होने वाली वार्ताओं से नहीं बनती; विश्वविद्यालय, विद्यार्थी, भाषा, साहित्य, सिनेमा और सांस्कृतिक संस्थान भी दीर्घकालीन विदेश संबंधों के महत्वपूर्ण वाहक होते हैं।

भारत और उज़्बेकिस्तान आतंकवाद, कट्टरता, क्षेत्रीय स्थिरता और अफगानिस्तान से जुड़े प्रश्नों से भी समान रूप से प्रभावित होते हैं। रक्षा और सुरक्षा सहयोग इसलिए द्विपक्षीय संबंधों का स्वाभाविक हिस्सा है। परंतु मध्य एशिया के साथ भारत की नीति को केवल सुरक्षा दृष्टि से देखना पर्याप्त नहीं होगा। व्यापार, संपर्क, ऊर्जा, तकनीक और शिक्षा को समान महत्व देकर ही भारत इस क्षेत्र में दीर्घकालीन और विश्वसनीय भागीदार की भूमिका मजबूत कर सकता है। प्रधानमंत्री की उज़्बेकिस्तान यात्रा के तुरंत बाद किर्गिज़ गणराज्य में शंघाई सहयोग संगठन के शिखर सम्मेलन में भागीदारी इसी व्यापक क्षेत्रीय संदर्भ को रेखांकित करती है।

इस यात्रा को एक और दृष्टि से देखना चाहिए। आज विश्व व्यवस्था बहुध्रुवीयता की ओर बढ़ रही है और मध्य एशियाई देश अपनी विदेश नीति में विविध साझेदारियों को महत्व दे रहे हैं। भारत के पास इस क्षेत्र में एक विशेष पूँजी है—उसके प्रति ऐतिहासिक सद्भाव, सांस्कृतिक स्वीकार्यता और विकास सहयोग की सकारात्मक छवि। इस पूँजी को केवल भावनात्मक स्मृति बनाकर रखने के बजाय व्यापार, पर्यटन, विश्वविद्यालय सहयोग, हिन्दी और भारतीय भाषाओं के अध्ययन, अनुवाद, सिनेमा तथा डिजिटल सांस्कृतिक संपर्क में बदलने की आवश्यकता है।

प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति मिर्ज़ियोयेव के बीच विकसित व्यक्तिगत और राजनीतिक संवाद ने पिछले वर्षों में द्विपक्षीय संबंधों को गति दी है। अब अगला चरण ‘घोषणाओं से क्रियान्वयन’ का होना चाहिए। जो समझौते हों, उनके लिए समयबद्ध कार्ययोजना बने; विश्वविद्यालय सहयोग केवल समझौता ज्ञापन तक सीमित न रहे; व्यापारिक समुदायों को नियमित मंच मिले; पर्यटन और सांस्कृतिक यात्राएँ आसान हों; और युवा पीढ़ी को दोनों देशों के संबंधों का सक्रिय भागीदार बनाया जाए।

भारत और उज़्बेकिस्तान के संबंधों की सबसे बड़ी शक्ति यह है कि इनमें रणनीतिक हित और सांस्कृतिक आत्मीयता एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। ताशकंद की यह यात्रा यदि व्यापार और निवेश को गति देती है, शिक्षा एवं डिजिटल सहयोग को विस्तार देती है और दोनों देशों के लोगों को और निकट लाती है, तो यह केवल सफल राजकीय यात्रा नहीं होगी; यह भारत और मध्य एशिया के संबंधों में एक नए चरण की शुरुआत हो सकती है। इतिहास ने दोनों समाजों को कई बार जोड़ा है। अब आवश्यकता है कि उस ऐतिहासिक निकटता को इक्कीसवीं सदी की व्यावहारिक, तकनीकी और मानवीय साझेदारी में बदला जाए।

लेखक परिचय

डॉ. मनीष कुमार सी. मिश्रा, एसोसिएट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, के. एम. अग्रवाल महाविद्यालय, कल्याण (प.), महाराष्ट्र। पूर्व में भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (ICCR) हिन्दी चेयर के अंतर्गत ताशकंद स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ ओरिएंटल स्टडीज़, उज़्बेकिस्तान में कार्य कर चुके हैं।

तथ्य-स्रोत

1. भारत सरकार, प्रधानमंत्री कार्यालय/पीआईबी, “Visit of Prime Minister Shri Narendra Modi to Uzbekistan and Kyrgyz Republic (29 August–1 September 2026),” 28 August 2026.

2. President of the Republic of Uzbekistan, “Prime Minister of India to pay a state visit to Uzbekistan,” 28 August 2026.

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