काला पत्थर : ग्रामीण परिवेश एवं दुर्बोध व्यवस्था
डॉ. मनीष कुमार मिश्रा
डॉ. सुरेश शुक्ल ‘चन्द्र’ लगातार नाटकों का लेखन करते रहे हैं । आप के द्वारा लिखित नाटकों में ‘आकाश झुक गया’ , ‘भस्मासुर अभी जिन्दा है’ , ‘कुरते’ , ‘लड़ाई जारी है’ , ‘अक्षयवट’ , ‘समवेत’ , ‘प्रेरणा’ , ‘बदलते रूप’ , ‘भावना के पीछे’ , ‘शादी का चक्कर’ , ‘बात एक हर्ष की’ , ‘चार प्रयोगशील रंग नाटक’, ‘अर्द्धनारीश्वर’ , ‘चार अंतरंग’ , ‘वतन के तीन सिपाही’ , ‘कैकेयी ने कहा’ , ‘दो सामयिक रंग नाटक’ और विवेच्य नाटक ‘काला पत्थर’ शामिल है । दैनिक भास्कर भोपाल के स्तंभ “मैनेजमेंट फंडा” के अंतर्गत प्रकाशित एक लोककथा से प्रेरित होकर डॉ. सुरेश शुक्ल ‘चन्द्र’ ने इस नाटक को लिखने की प्रेरणा प्राप्त की ।
ग्रामीण समस्याओं पर केन्द्रित यह नाटक इतिहास के मोड़ पर विपदाओं के बीच फंसे हुए उन लोगों की छवियों को उभारता है जो उजड़े और उखड़े रहे । वे लोग जो व्यवस्था के हिंसक अभियानों के बीच भी सार्थक हस्तक्षेप की हिम्मत नहीं जुटा पाये । लेकिन जब यह सकारात्मक हस्तक्षेप या अतिक्रमण उन्होंने किया तो उनके जीवन से बेदख़ल किये गए कितने ही रंग वापस लौट आये । मानवीय संवेदनाओं का सूत दर्द को सहलाता है और वो हिम्मत भी देता है जो सड़ी – गली मान्यताओं और विचारों से लड़ने के लिए जरूरी होता है । बर्बरता से कुचला हुआ सम्मान और बराबरी का भाव, प्रेम से सिंचित एवं पोषित होकर एक दिन अपनी आतंरिक शक्ति से सबकुछ बदल के रख देता है । व्यवस्थाओं के बीच पावनता का पुनर्वास ऐसे ही सुनिश्चित होता है ।
‘भारत गाँवों का देश है।’ यह उक्ति बिलकुल सच है । यदि किसी को भारत की सभ्यता एवम् संस्कृति से परिचित होना हो तो उसके लिए यह आवश्यक है कि वह इस देश की ग्रामीण सभ्यता से परिचित हो । इस देश की सामाजिक व्यवस्था की पूरी जानकारी प्राप्त करने के लिए गाँवों का अध्ययन जरूरी है। आज़ादी के बाद जिस तरह ग्रामों के विकास के लिए विभिन्न सरकारी योजनाएँ कार्यान्वित की जा रही हैं, वे इस बात का प्रमाण हैं कि इस देश की प्रगति गाँवों की ही प्रगति पर आधारित है। अंग्रेजों के शासनकाल के दौरान जब उन्होंने इस देश की आर्थिक व्यवस्था को कमजोर बनाने की योजना बनाई तो उन्होंने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को ही अपना शिकार बनाया। हमारे गाँव आत्मनिर्भर थे। वे परस्पर सहयोग एवम् सहकारिता के सिद्धांत पर कार्य करते थे। अंग्रेजों ने इस बात को समझा और ग्रामीण व्यवस्था पर प्रहार किया। परिणाम स्वरूप भारतीय जीवन का संतुलन बिगड़ा और देश की स्वतंत्रता और स्वावलंबन पर खतरों के बादल छा गये।
समाज व्यक्ति और समूह के संबंधों का संगठन है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उसे समाज पर ही निर्भर रहना पड़ता है। साहित्यकार भी इसी समाज का एक सदस्य होता है। साहित्यिक रचनाकर्म के लिए उसे सामाजिक आधार की आवश्यकता होती है। समाज में रहते हुए वह अपने अनुभवों का विस्तार करता है और इसी अनुभव के आधार पर वह अपना लेखकीय कर्म आगे बढ़ाता है। अपने आस-पास घटित होने वाली घटनाओं से प्रभावित होकर वह अपने लेखन के लिए विषय का चुनाव करता है। किसी लेखक का सामाजिक परिवेश ही उसके साहित्य रचना का मुख्य आधार होता है।
ग्रामीण परिवेश और उससे जुड़ी दुर्बोध व्यवस्था के बीच समाज विशेष की परंपराओं का महत्वपूर्ण योगदान होता है । लेकिन परंपरा क्या है ? यह समझना भी जरूरी है । परंपरा सामान्य रूप से उस आधिकारिक या स्वीकृत व्यवहार के रूप में चित्रित किया जाता है जो कि समय विशेष में किसी समाज विशेष में हो । लेकिन यह स्वीकृति बनती कैसे है ? कब बनती है ? कितने दिन के लिए बनती है ? और बनी हुई स्वीकृति बदलती कैसे है ? ये प्रश्न भी जरूरी हैं । अर्थात यह जानने का प्रयास कि परंपरा का उद्गम स्थान क्या होता है ? इस संदर्भ में रामाश्रय राय जी का यह कथन महत्वपूर्ण है कि - कोई भी विश्वास या व्यवहार शून्य में अविर्भूत नहीं होता । इसलिए वे किसी इतर तत्व को इसका स्रोत मानते हैं ।
जीवन के प्रांजलता,प्रखरता और प्रवाह को निरंतर क्रियाशीलता की आवश्यकता होती है । वैचारिक एवं कार्मिक क्रियाशीलता ही जीवन की प्रांजलता का प्राण तत्व है । जीवन का उत्कर्ष भी इसी निरंतरता में है । यह समन्वय की प्रक्रिया है। यहां संपूरक सिद्धांत भी लागू होता है । पूर्वर्ती और उत्तरवर्ती समन्वय की प्रक्रिया में सहप्रयत्न भी जुड़ा हुआ है । परस्पर विपरीत से दिखने वाले वास्तव में परंपरा की प्रक्रिया में दोनों संपूरक हैं । यह एक तरह की प्रक्रियाबद्ध बंधुता (Homology) है । वैचारिक एवं कार्मिक क्रियाशीलता का यह स्वरूप विवेच्य उपन्यास में पुनिया और प्रभात के माध्यम से अभिव्यक्त हुआ है । पुनिया और प्रभात एक दूसरे से प्रेम करते हैं लेकिन सामाजिक मर्यादाओं के चलते एक नहीं हो पाते । समय के साथ वे समझौता भी नहीं कर पाते और अंदर ही अंदर प्रेम के लिए तड़पते हैं । अंततः वे हिम्मत जुटाते हैं, सूझ-बूझ से काम लेते हैं और अपने लिए उसी समाज के बीच अधिक बेहतर और सम्मानजनक स्थितियों को हासिल करते हैं ।
परंपरा की तरह ही हमें परिवेश पर भी गंभीरता से विचार करना होगा । ‘परिवेश’ शब्द का शाब्दिक अर्थ है ‘आस-पास का स्थान या वातावरण’। इस तरह जब हम किसी लेखक के साहित्यिक परिवेश की बात करते है तो हमारा तात्पर्य उस समस्त जीवन पद्धति से होता है जो लेखक के व्यक्तित्व को प्रभावित करता है। अमृतराय के अनुसार ‘‘हम परिवेश को ऐतिहासिक, भौगोलिक, आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक स्थितियों और गतिविधियों से निर्मित और पुष्ट, एक प्रकार का सम्पूर्ण वातावरण कह सकते हैं, जिसके अन्तर्गत कोई व्यक्ति या समाज किसी समय अपने को पाता है।’’1 निश्चित तौर पर आज विज्ञान ने बहुत प्रगति कर ली है। भौगोलिक दूरियाँ अब कम हो गयी हैं। भूमण्डलीकरण के इस दौर में पूरी दुनिया ‘ग्लोबल विलेज’ बन गयी है। ऐसे में व्यक्ति विशेष के अनुभवों का दायरा भी बढ़ गया है । विश्व की अलग-अलग संस्कृतियाँ आपस में टकरा रही हैं । जिसके परिणाम स्वरूप सांस्कृतिक आदान-प्रदान की प्रक्रिया तेज हो गयी है। पुरानी मान्यताएँ तेजी से टूट रही हैं । बदली हुई सम् सामयिक परिस्थितियों में एक लेखक का दृष्टि फलक भी काफी विस्तृत हो चुका है। आज का साहित्यकार सिर्फ अपने देश या कालखण्ड से प्रभावित नहीं होता, बल्कि पूरी दुनियाँ में हो रहे परिवर्तनों पर उसकी नजर है । इन परिवर्तनों से वह प्रभावित भी है। इसका प्रभाव उसकी रचनाओं पर स्पष्ट रूप से दिखायी पड़ता है । रचनाकार कोई भी हो, वह अपनी युगीन परिस्थितियों से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता ।
यह बात डॉ. सुरेश शुक्ल ‘चन्द्र’ पर भी सामान रूप से लागू होती है । शुक्ल जी ने जो परिवेश देखा उसी को अपने साहित्य में चित्रित किया । यही कारण रहा कि उनके साहित्य में सहजता और विश्वसनियता की कोई कमी दिखाई नहीं पड़ती । कल्लू सेठ के माध्यम से महाजनी शोषण का जो वर्णन नाटक में है वह बड़े व्यापक स्तर पर भारतीय ग्रामीण परिवेश का यथार्थ रहा है । कल्लू सेठ द्वारा अपनी बेटियों को महत्त्व न देना और साठ की उम्र में पुत्र की चाह में विवाह का सोचना उस सामजिक सच्चाई को उद्घाटित करता है जहाँ वंश चलाने के लिए पुत्र का होना अनिवार्य माना जाता रहा है । लड़कियों को लड़कों से कमतर आँका जाता रहा है । लैंगिकता के आधार पर यह असमानता का भाव हमारे समाज की कड़वी सच्चाई रही है ।
कल्लू सेठ की पत्नी विमला अधिक उदार और विचारों में प्रगतिशील दिखाई पड़ती है । वह संतोषी किसान को पांच सौ रुपए न देने के लिए धिक्कारती है । लड़कियों को लेकर कल्लू सेठ की दकियानूसी बातों पर वह फटकारते हुए कहती है कि, “यह तुम्हारा भ्रम है, पुरानी सोच है । लड़के और लड़की में कोई भेद नहीं है । तुम्हारी इसी मानसिकता ने घर को तबाह कर दिया ।’’2 इसी तरह अपनी चार लड़कियों का विवाह द्विजहा लड़कों से करने, एक लड़की के ससुराल के अत्याचारों से तंग आकर आत्महत्या करने, एक लड़की के कुँवारी घर पर पड़े रहने के लिए भी वो कल्लू सेठ की कंजूस मानसिकता को ज़िम्मेदार ठहराती है । वह कहती है, “सच्ची बात कड़वी लगती है ।...पीछे बहुत सारी संपत्ति डाकू लूट ले गए । उसी में तुम्हारी एक आँख भी फूट गयी । वही पैसा यदि लड़कियों को दे देते तो डाका क्यों पड़ता और लड़कियां भी सुखी होतीं । पर सूम का धन तो शैतान ही खाता है ।’’3 पत्नी के मुख से ऐसी बातें सुनकर कल्लू सेठ तिलमिला जाता है और पत्नी को जूतों से मारने की बात करता है । पितृसत्तात्मक भारतीय समाज किसी भी स्तर पर स्त्री को श्रेष्ठ कैसे मान ले? जब वह तर्क से हारने लगता है तो उस पर शारीरिक अत्याचार करने के लिए उतारू हो जाता है । यही भाव कल्लू सेठ में भी दिखाई पड़ता है जब वह उसे जूतों से मारने की बात करते हुए घर के अंदर जाने के लिए कहता है ।
आज हम जिन बदली हुई परिस्थितियों में रह रहे हैं, यहाँ एक व्यक्ति के दूसरे व्यक्ति से संबंधों एवम् व्यवहार की पड़ताल आसान नहीं रह गयी है। सबके अनुभवों का आकाश अलग है। इस तरह सब का अपना-अपना आकाश है । बाज़ारवादी जीवन शैली ने नैतिकता और आदर्श को लगभग समाप्त कर दिया है । एक साहित्यकार भी समाज का ही हिस्सा है। उसके अनुभव एवम् अनुभूति की भी अपनी एक सीमा है । इसलिए किसी भी लेखक को अपना दायरा बढ़ाने के लिए यह आवश्यक है कि वह दुनियाँ देखे, अपने निजी अनुभवों का दायरा बढ़ाने के लिए उसे बाहर निकलना ही होगा । अगर कोई ऐसा नहीं करता तो निश्चित है कि उसका दृष्टि फलक सीमित हो जायेगा और सीमित दृष्टि फलक के साथ कोई लेखक आज के ‘ग्लोबल विलेज’ की समस्याओं को समझ पायेगा, इसमें संदेह है । फिर भी यह समझना होगा कि एक लेखक का दृष्टि फलक, सामान्य व्यक्ति के दृष्टि फलक से कई संदर्भो में अलग होता है । भारत की आत्मा यहाँ के ग्रामीण जीवन में ही बसती है । नाटककार ने जिस ग्रामीण परिवेश और उसकी समस्याओं को चित्रित किया है, वह भारत के बहुत बड़े भौगोलिक फलक का यथार्थ रहा है ।
इस संदर्भ में राजेन्द्र यादव लिखते हैं कि, ‘‘किसी एजेण्ट का टूर पर जाना या सेल्स-रिप्रेजेंटेटिव का बिक्री बढ़ाने के लिए सम्पर्क स्थापित करते बाहर महीनों घूमना एक बात है, और अनुभव का दायरा, स्थानों की जानकारी के लिए लेखक का बाहर निकलना दूसरी बात। लेखक एक व्यक्तिगत पेशा है, इसलिए उसका फील्ड-वर्क क्या हो, हो या न हो, यही तँय नहीं है। यहाँ एक का उदाहरण दूसरे के काम नहीं आता। कोई शोर-शराबे में बैठकर लिख लेता है और किसी को पंखे की आवाज भी विघ्न पहुँचाती है, कोई भीड़ या यात्रा से कतराता है और किसी को इसके बिना लिखने की प्रेरणा ही नहीं मिलती। किसी को पहाड़ों पर जाकर शवरों के बारे में लिखने का उत्साह होता है तो कोई कमरे में बन्द ही पहाड़-नदी सबके विषय में लिख सकता है। लेकिन प्रामाणिकता के आग्रह ने यह प्रवृत्ति जरूर पैदा कर दी है कि चाहे स्थान हो या अनुभव, जब तक उसकी आधिकारिक जानकारी नहीं है, लेखक को उससे कतराना चाहिए। अगर उसे अनुभव बढ़ाना है तो अपने से, अपने वातावरण से, बाहर निकलकर दुनिया को देखना ही होगा, उसके साथ तादाम्य स्थापित करना होगा। अनुभव जड़ दवाओं की तरह शीशियों में बन्द दिया और लिया नहीं जाता, उसे दूसरों के मनोविज्ञान से जुड़कर ही पाया जा सकता है।’’4
इस तरह स्पष्ट है कि बिना अपना दायरा बढ़ाये कोई भी लेखक एक बड़े दृष्टिकोण के साथ साहित्य नहीं रच सकता । अगर करता भी है तो उसकी प्रामाणिकता संदिग्ध ही रहेगी । साथ ही साथ हमें यह भी समझना होगा कि कालजयी साहित्यकार मानवीय चेतना से जुड़कर ही मनुष्य जीवन में निहित सुख-दुख, आशा-निराशा तथा जय और पराजय का चित्रण कर सकता है । यह बात एकदम सही है कि, ‘‘मनुष्य द्वारा जीने के लिए किया गया संघर्ष, रचना में किस हद तक वास्तविक है, इसे साबित करने के लिए हर समर्थ लेखक जीवन की रचना को परिवेश से जोड़कर अपने दायित्व और रचना धर्म का निर्वाह करता है।’’5
नाटककार सुरेश शुक्ल ने जो जीवन स्वयं जिया उसी को अपने साहित्य में चित्रित भी किया । किसान संतोषी की आर्थिक तंगी का वर्णन जिस तरह से उन्होंने किया है वह दर्शाता है कि किसानों के जीवन से जुडी परेशानियों से वे अच्छी तरह परिचित हैं । पैसों के अभाव में वह अपनी बीमार पत्नी का इलाज तक नहीं करवा पाता है । रेहन पर रक्खी अपनी जमीन साहुकार से छुड़ा नहीं पाता, जिसका फायदा उठाकर कल्लू सेठ उसकी बेटी से विवाह का प्रस्ताव तक दे देता है । कल्लू सेठ सोचते हैं कि कर्ज में डूबा संतोषी उसे ना नहीं कर सकेगा,लेकिन स्वाभिमानी संतोषी अपनी बेटी की इच्छा को सर्वोपरि रखता है । भारतीय किसान गरीब हो सकता है लेकिन अपने स्वाभिमान से उसने कभी समझौता नहीं किया । परिस्थितियों के दबाव में वो चुप तो रह सकता है लेकिन अनैतिक बातों को स्वीकार नहीं कर सकता ।
डॉ. आनंद शर्मा के शब्दों में, ‘‘साहित्यकार व्यक्ति रूप में अकले में जो कुछ निजी भावों को लिखित रूप प्रदान करता है, उस पर सामाजिक परिवेश का आवरण लिपटा रहता है। उसकी रचनाएँ सामाजिक मान्यता के परिवेश में रचित और विकसित होती हैं। साहित्य मर्मज्ञ सदैव युग-जीवन से पग मिलाकर चलता है। समय एक गतिशील धारा है जिसकी अभिव्यक्ति युगीन स्थितियों, परिस्थितियों एवं गतिविधियों के माध्यम से हुआ करती है। सृष्टि के आदिम युग से लेकर आधुनिक युग तक यही चला आ रहा है कि आज की परिस्थितियाँ कल की परिस्थितियों से सदैव भिन्न होती हैं। साहित्य समाज का दर्पण है। अतः वह भिन्नता साहित्य के क्षेत्र में भी देखने को मिलती है। सम्सामयिक घटना-चक्रों का वर्णन साहित्य में आता चला जाता है।’’6 डॉ. सुरेश शुक्ल ‘चंद्र’ के संदर्भ में भी यही बात सामने आती है। यहाँ कल्पना, भावुकता, आदर्श, प्रेम, सेक्स, आधुनिकता और शिल्पगत प्रयोगों जैसी बातों के विस्तार के लिए अधिक गुंजाइश नहीं रही। उनके यहाँ विस्तार के साथ कुछ चित्रित हो सकता था तो वह था साधाराण व्यक्ति का यथार्थ, उसके सपने, उसका संघर्ष, उसकी मानसिकता, उसका मोहभंग, उसकी नियती, उसका गाँव-देहात, उसका कस्बा, उसका शहर, उसके संघर्ष का परिवार पर प्रभाव और प्रतिकूल सामाजिक व्यवस्था में उसका हो रहा शोषण।
भारत को धर्म और दर्शन के देश के रूप में जाना जाता रहा है। धर्म की आड़ में इस देश को बाँटने का प्रयास सदैव ही होता रहा है। आज़ादी के पहले धर्म के नाम पर ही इस देश का विभाजन हुआ। धार्मिक आडंबर, कर्मकांड, अंधविश्वास, रूढ़िया, अनुचित परंपरा का पालन, लोगों की आस्था के साथ खिलवाड़ और सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने के लिए धर्म का सहारा राजनेता और स्वार्थी पूँजीपति हमेशा से ही लेते रहे हैं। समाज विरोधी लोग धार्मिक भावनाएँ भड़काने का काम करते रहे हैं। शुक्ल जी ने अपने इस नाटक के माध्यम से दोहरे चरित्रवाले व्यक्तियों, पूँजीपतियों एवम् पंचों को बेनकाब करने का काम किया है । ईश्वर और भाग्य जैसी बातों को समाज का शोषक वर्ग किस तरह अपने पक्ष में भुनाने का काम करता है, इसे भी शुक्ल जी इस नाटक के माध्यम से स्पष्ट करते हैं । सिद्धांत, कर्तव्य, उदारता और आदर्श जैसी बातों को शोषक वर्ग अपने फायदे के लिए ढाल की तरह उपयोग में लाता है ।
इन तमाम बातों को शुक्ल जी ने बड़ी सूक्ष्मता के साथ चित्रित किया है। गाँव का सरपंच कुछ रुपयों और बिरादरी में भोज की हामी भराकर कल्लू सेठ के पक्ष में पंचों का निर्णय कराने की बात करता है । सरपंच स्पष्ट कहता है कि, “उसकी चिंता तुम मत करो । विवाह कराने की ज़िम्मेदारी मेरी । तुम्हें केवल पैसा भर देना है । बाकी सब मैं फिट कर दूगां । ....उसको फ़साने के तरीके हैं मेरे पास । बस मैं जो कहता जाऊं, वह तुम करते जाओ ।’’7 सरपंच बड़ी चतुराई से पहले पुनिया का दुरजन से तलाक सुनिश्चित करवाता है और फ़िर काले-सफ़ेद पत्थरों के धोके में उसका विवाह कल्लू सेठ से करना चाहता । पुनिया अपनी सूझ-बूझ से सरपंच के इरादों पर पानी फेर देती है । वह न केवल अपने पिता की जमीन को कल्लू सेठ से कर्ज मुक्त करवाती है अपितु सरपंच और कल्लू सेठ के षड्यंत्र से अपने आप को भी बचाती है ।
यह नाटक हमें यह स्वीकार करने पर मजबूर कर देता है कि बदलते सामाजिक परिदृश्य में ‘बाज़ारवाद’ अपनी जड़े जमा रहा है। अर्थ प्रधान बन रही सामाजिक व्यवस्था में आदर्श और नैतिकता का धीरे-धीरे पतन हो रहा है। यही कारण है कि सामाजिक मूल्यों में भी लगातार गिरावट आ रही है । भौतिकवादी समाज में भौतिक सुख-सुविधाओं का संग्रह ही हर व्यक्ति का लक्ष्य बनता जा रहा है । ‘आत्मकेन्द्रियता’ का भाव लोगों में बढ़ रहा है। ऐसे में व्यक्ति विशेष के अंदर बढ़ता स्वार्थ, उसके चरित्र का दोहरापन, उसकी संवेदनाओं में आती गिरावट और भौतिकता की अंधी दौड़ में समस्त मानवीय मूल्यों का बिखराव शहरी और ग्रामीण दोनों ही परिवेश को प्रभावित कर रहा है । ‘काला पत्थर’ नाटक में जो मनोवैज्ञानिकता, व्यंग्यात्मकता, बिम्बात्मकता, प्रतीकात्मकता, दोहरा व्यक्तित्व, व्यवस्था में निहित भ्रष्टाचार, शोषित एवम् निरीह पात्र, मध्यवर्गीय और निम्न मध्यवर्गीय संवेदना, कथा का भारतीय स्वरूप, पात्रों की चारित्रिक जटिलता और संबंधों की नियती में अर्थ की भूमिका दिखलायी पड़ती है वह इसी गिरते सामाजिक मूल्यों के ही परिणाम स्वरूप है। डॉ. सुरेश शुक्ल ‘चंद्र’ ने इस नाटक के माध्यम से इन्ही टूटते-बिखरते सामाजिक मूल्यों को सामने लाने का प्रयास किया है ।
निष्कर्ष रूप में हम यह कह सकते हैं कि डॉ. सुरेश शुक्ल ‘चन्द्र’ ने अपने इस नाटक ‘काला पत्थर’ के माध्यम से ग्रामीण जीवन की दुर्बोध व्यवस्था को किसान कर्ज की समस्या, सूदखोरी एवं महाजनी शोषण, लैंगिक असमानता, स्त्रियों के अपमान, भ्रष्टाचार, चरित्रहीनता, अनमेल विवाह, दहेज़ प्रताड़ना, धार्मिक आडंबर, अंध श्रद्धा, पति द्वारा पत्नी की प्रताड़ना, जातीय विवाह, सामाजिक मर्यादाएं, अर्थ का अभाव और खेती की प्रकृति पर निर्भरता जैसे विषयों से जोडते हुए बड़े ही सरल शब्दों में प्रस्तुत किया है । नाटक का मंचन आसन है क्योंकि इसका दृश्य विधान उसके अनुकूल रक्खा गया है । नाटक के कई पात्रों का नाम बड़ा प्रतिकात्मक है । जैसे कि संतोषी, प्रभात और दुरजन इत्यादि । इस नाटक में शब्द कम हैं लेकिन अर्थ का वितान बहुत विस्तृत है । ग्रामीण परिवेश की दुर्बोध व्यवस्था से झुलसे हुए सपनों के पास चुप्पियों का राग है, जो उजाले के कतरे के लिए तरस रहा है । यह ग्रामीण भारत का वह सच है जो सरकारी आकड़ों और विकास के तमाम दावों से मेल नहीं खाता ।
डॉ. मनीष कुमार मिश्रा
हिंदी व्याख्याता
के.एम.अग्रवाल महाविद्यालय
कल्याण (पश्चिम), महाराष्ट्र
9082556682
संदर्भ :
अमृतराय, सहचिंतन, पृष्ठ क्रमांक 146
शुक्ल, डॉ. सुरेश ‘चन्द्र’ – काला पत्थर, अमन प्रकाशन कानपुर, संस्करण 2021, पृष्ठ क्रमांक 13
वही पृष्ठ क्रमांक 13
यादव,राजेन्द्र , कहानी स्वरूप और संवेदना, पृष्ठ क्रमांक 180
शर्मा, डॉ.आनंद, उपन्यासकार कमलेश्वर : समाजशास्त्रीय निकष पर, पृष्ठ क्रमांक 18
वही , पृष्ठ क्रमांक 28
शुक्ल, डॉ. सुरेश ‘चन्द्र’ – काला पत्थर, अमन प्रकाशन कानपुर, संस्करण 2021, पृष्ठ क्रमांक 15
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