स्वच्छंदतावाद की विशेषताएँ
डॉ. मनीष कुमार मिश्रा
असोसिएट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग
के. एम. अग्रवाल महाविद्यालय, कल्याण (पश्चिम), महाराष्ट्र
प्रस्तावना
स्वच्छंदतावाद आधुनिक साहित्य और कला के इतिहास की एक महत्त्वपूर्ण प्रवृत्ति है, जिसने मनुष्य की अनुभूति, कल्पना, स्वतंत्र चेतना, प्रकृति-प्रेम और आत्माभिव्यक्ति को साहित्य के केंद्र में प्रतिष्ठित किया। अंग्रेज़ी के Romanticism के लिए हिन्दी में प्रचलित ‘स्वच्छंदतावाद’ शब्द अपने भीतर स्वतंत्रता और रूढ़ बंधनों से मुक्ति की भावना समेटे हुए है। यह केवल एक साहित्यिक शैली अथवा काव्य-प्रवृत्ति नहीं था, बल्कि मनुष्य, प्रकृति, समाज और कला को देखने वाली एक नई सांस्कृतिक चेतना का उदय था।
यूरोप में लंबे समय तक साहित्य पर शास्त्रीय और नवशास्त्रीय मान्यताओं का प्रभाव रहा। साहित्य में नियम, अनुशासन, तर्क, संतुलन और रूप-सौष्ठव को विशेष महत्त्व दिया जाता था। अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में इस दृष्टि के विरुद्ध ऐसी चेतना विकसित हुई, जिसने घोषित किया कि मनुष्य केवल तर्कशील प्राणी नहीं है; उसके अस्तित्व में भावना, कल्पना, स्मृति, स्वप्न, रहस्य और संवेदना की भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण भूमिका है। यही चेतना आगे चलकर स्वच्छंदतावाद की आधारभूमि बनी।
1789 की फ्रांसीसी क्रांति ने ‘स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व’ का उद्घोष कर यूरोपीय समाज और चिंतन को गहराई से प्रभावित किया। दूसरी ओर औद्योगिक क्रांति और वैज्ञानिक प्रगति ने भौतिक विकास की नई संभावनाएँ उत्पन्न कीं, किंतु इनके परिणामस्वरूप मनुष्य और प्रकृति के बीच दूरी भी बढ़ने लगी। स्वच्छंदतावाद ने इस यांत्रिकता और अत्यधिक बुद्धिवाद के विरुद्ध मनुष्य की संवेदना, स्वतंत्रता तथा प्रकृति से उसके आत्मीय संबंध को पुनः प्रतिष्ठित किया।
व्यक्तिवाद और आत्मानुभूति
स्वच्छंदतावाद का केंद्रीय तत्त्व व्यक्तिवाद है। इसमें समाज और परंपरा की अपेक्षा व्यक्ति की निजी अनुभूति और आंतरिक संसार को अधिक महत्त्व प्राप्त हुआ। स्वच्छंदतावादी कवि अपने सुख-दुःख, प्रेम, पीड़ा, स्मृति, द्वंद्व और स्वप्न को साहित्य की विषय-वस्तु बनाता है। इस दृष्टि से व्यक्तिवाद केवल ‘मैं’ की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि आत्म-खोज की एक रचनात्मक प्रक्रिया है।
William Wordsworth की काव्य-दृष्टि इसका महत्त्वपूर्ण उदाहरण है। उनके लिए कविता प्रबल भावनाओं का स्वाभाविक उद्रेक है। Tintern Abbey में स्मृति, प्रकृति और निजी अनुभूति के माध्यम से कवि अपने अस्तित्व को समझने का प्रयास करता है। यहाँ बाहरी संसार अंतर्मन से जुड़कर नया अर्थ ग्रहण करता है। इसी प्रकार John Keats के काव्य में सौंदर्य की अनुभूति अत्यंत व्यक्तिगत होते हुए भी व्यापक मानवीय अर्थ प्राप्त करती है।
भावुकता और संवेदनशीलता
स्वच्छंदतावाद ने बुद्धि की कठोरता के स्थान पर हृदय की संवेदना को प्रतिष्ठित किया। प्रेम, करुणा, विरह, वेदना, आशा, निराशा और आनंद जैसी मानवीय अनुभूतियाँ इसके साहित्य की आधारभूमि बनीं। मनुष्य को केवल विवेकशील सत्ता मानने के बजाय उसे संवेदनशील अस्तित्व के रूप में स्वीकार करना स्वच्छंदतावादी दृष्टि का महत्त्वपूर्ण परिवर्तन था।
Wordsworth की कविताओं में साधारण अनुभव भी गहरी संवेदना ग्रहण कर लेते हैं। Lucy Poems में स्मृति और वियोग की कोमल अनुभूति दिखाई देती है। Percy Bysshe Shelley की कविता में मानवीय करुणा, स्वतंत्रता और आदर्श की तीव्र आकांक्षा मिलती है। Ode to the West Wind में पश्चिमी पवन प्राकृतिक शक्ति होने के साथ कवि की आशा, संघर्ष और परिवर्तन की आकांक्षा का प्रतीक बन जाती है।
प्रकृति के साथ आत्मीय संबंध
प्रकृति-प्रेम स्वच्छंदतावाद की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषताओं में है। स्वच्छंदतावादी कवि के लिए प्रकृति मात्र दृश्य-सौंदर्य अथवा कविता की पृष्ठभूमि नहीं है। वह जीवंत सहचरी, शिक्षक, प्रेरक और आत्मिक अनुभूति का माध्यम है। पर्वत, नदी, वन, बादल, पवन, चाँद और तारे कवि की संवेदना से जुड़कर मानवीय अर्थ ग्रहण करते हैं।
Wordsworth ने प्रकृति को आध्यात्मिक और नैतिक मार्गदर्शक के रूप में देखा। Tintern Abbey में प्रकृति स्मृति और आत्मबोध का माध्यम बनती है। Samuel Taylor Coleridge की The Rime of the Ancient Mariner में समुद्र, पक्षी और प्राकृतिक शक्तियाँ मानव-जीवन के नैतिक एवं रहस्यमय आयामों से जुड़ती हैं। इस प्रकार स्वच्छंदतावाद ने मनुष्य और प्रकृति के संबंध को पुनः आत्मीय बनाया।
कल्पना की सृजनात्मक शक्ति
स्वच्छंदतावाद में कल्पना को अत्यंत ऊँचा स्थान प्राप्त है। कल्पना यहाँ वास्तविकता से पलायन नहीं, बल्कि उसे नए रूप और नए अर्थ में देखने की रचनात्मक शक्ति है। तर्क जहाँ वस्तुओं को निश्चित सीमाओं में समझता है, कल्पना उन्हीं सीमाओं को पार कर संभावनाओं के नए संसार का निर्माण करती है।
Coleridge ने कल्पना को सृजनात्मक शक्ति के रूप में विशेष महत्त्व दिया। उनकी Kubla Khan स्वप्न, रहस्य और कल्पना से निर्मित विशिष्ट काव्य-जगत प्रस्तुत करती है। Shelley की काव्य-दृष्टि में भी कल्पना परिवर्तनकारी ऊर्जा है। इस दृष्टि से स्वच्छंदतावादी कल्पना केवल सौंदर्य-सृष्टि नहीं करती, बल्कि वर्तमान से भिन्न और अधिक मानवीय भविष्य की संभावना भी निर्मित करती है।
रहस्यबोध और अज्ञात की खोज
दृश्य संसार के पीछे विद्यमान अदृश्य सत्ता अथवा रहस्य को जानने की इच्छा स्वच्छंदतावाद की महत्त्वपूर्ण प्रवृत्ति है। यह रहस्यवाद आवश्यक रूप से किसी धार्मिक संप्रदाय अथवा साधना-पद्धति से जुड़ा नहीं है; बल्कि अस्तित्व के अज्ञात और अलौकिक पक्ष के प्रति आकर्षण है।
William Blake की Songs of Innocence and of Experience में दृश्य संसार के पीछे गहरे आध्यात्मिक संकेत दिखाई देते हैं। Coleridge की रचनाओं में भी अलौकिक घटनाएँ केवल रोमांच उत्पन्न करने के लिए नहीं आतीं, बल्कि वे जीवन के नैतिक और आध्यात्मिक रहस्यों की ओर संकेत करती हैं। इस प्रकार रहस्यबोध स्वच्छंदतावादी काव्य को दृश्य यथार्थ से आगे ले जाता है।
अतीत, इतिहास और लोक-स्मृति
आधुनिक औद्योगिक जीवन की यांत्रिकता से असंतुष्ट स्वच्छंदतावादी रचनाकारों ने इतिहास, मध्यकालीन संस्कृति, मिथकों, लोककथाओं और पुरानी गाथाओं की ओर विशेष आकर्षण व्यक्त किया। अतीत उनके लिए केवल बीता हुआ समय नहीं, बल्कि सौंदर्य, वीरता, रहस्य और सांस्कृतिक स्मृति का स्रोत था।
Walter Scott ने अपने ऐतिहासिक उपन्यासों में मध्यकालीन जीवन और वीरता को पुनर्जीवित किया। John Keats की La Belle Dame sans Merci में मध्यकालीन रोमांस और रहस्य का वातावरण निर्मित होता है। स्वच्छंदतावादी अतीत-प्रेम इस अर्थ में वर्तमान से पलायन नहीं, बल्कि आधुनिक सभ्यता की सीमाओं की समीक्षा का माध्यम भी बनता है।
विद्रोह और स्वतंत्रता की चेतना
स्वच्छंदतावाद का एक मूल स्वर विद्रोह है। यह विद्रोह साहित्यिक नियमों के साथ सामाजिक रूढ़ियों और मानसिक जड़ता के विरुद्ध भी है। स्वच्छंदतावादी रचनाकार ने सृजन को निर्धारित नियमों का अनुचर मानने से इनकार किया और रचनात्मक स्वतंत्रता की प्रतिष्ठा की।
फ्रांसीसी क्रांति के स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के आदर्शों ने इस चेतना को व्यापक सामाजिक संदर्भ प्रदान किया। Shelley की रचनाओं में अन्याय और दमन के विरुद्ध तीव्र स्वर मिलता है। Lord Byron के नायक भी अनेक बार सामाजिक मर्यादाओं और परंपरागत नैतिकता को चुनौती देते हुए व्यक्तिगत स्वतंत्रता का प्रतिनिधित्व करते हैं।
सौंदर्य की व्यापक अवधारणा
स्वच्छंदतावाद में सौंदर्य केवल बाहरी रूप और दृश्य आकर्षण तक सीमित नहीं है। वह आंतरिक अनुभूति और आध्यात्मिक चेतना से भी संबंधित है। Keats का काव्य सौंदर्य की इसी गहन अनुभूति का प्रतिनिधित्व करता है। Ode on a Grecian Urn में सौंदर्य को शाश्वतता और सत्य के प्रश्न से जोड़ा गया है।
हिन्दी साहित्य में सुमित्रानंदन पंत के काव्य में प्रकृति-सौंदर्य चेतना के विस्तार का माध्यम बनता है, जबकि महादेवी वर्मा के यहाँ करुणा और विरह भी सौंदर्यात्मक तथा आध्यात्मिक अनुभूति में रूपांतरित हो जाते हैं। इस प्रकार स्वच्छंदतावादी सौंदर्य-बोध बाह्य और आंतरिक जगत के बीच सेतु निर्मित करता है।
मानवतावाद और मनुष्य की गरिमा
स्वच्छंदतावाद व्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ उसकी मानवीय गरिमा को भी प्रतिष्ठित करता है। पीड़ित, उपेक्षित और सामान्य मनुष्य के प्रति सहानुभूति इस चेतना का महत्त्वपूर्ण पक्ष है। मनुष्य को किसी व्यवस्था के साधन के रूप में नहीं, बल्कि अपने आप में मूल्यवान सत्ता के रूप में देखने की प्रवृत्ति स्वच्छंदतावादी मानवतावाद का आधार है।
फ्रांसीसी क्रांति द्वारा प्रसारित समानता और स्वतंत्रता के विचारों ने इस मानवीय दृष्टि को शक्ति प्रदान की। साहित्य का विषय-क्षेत्र भी अभिजात वर्ग से निकलकर सामान्य जनजीवन तक विस्तृत हुआ।
राष्ट्रीय और सांस्कृतिक चेतना
स्वच्छंदतावाद ने राष्ट्रीय अस्मिता के निर्माण में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। यूरोप में राष्ट्र, भाषा, लोकसंस्कृति और इतिहास के प्रति नया अनुराग विकसित हुआ। लोकगीतों, लोककथाओं और ऐतिहासिक गाथाओं के पुनर्स्मरण ने सांस्कृतिक पहचान को मजबूत किया।
Johann Wolfgang von Goethe और Friedrich Schiller जैसे रचनाकारों ने जर्मन सांस्कृतिक चेतना को स्वर दिया, जबकि Walter Scott ने स्कॉटलैंड के ऐतिहासिक अतीत को साहित्यिक रूप में पुनर्जीवित किया। इस राष्ट्रीय चेतना में राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ सांस्कृतिक स्वाभिमान का प्रश्न भी निहित था।
लोक-जीवन की प्रतिष्ठा
स्वच्छंदतावाद का साहित्य सामान्य मनुष्य, ग्रामीण जीवन, लोकगीत, लोककथा और लोकसंस्कृति की ओर भी लौटा। औद्योगीकरण और नगरीकरण के बीच गाँव का जीवन रचनाकारों को प्रकृति और समुदाय से निकट संबंध वाला प्रतीत हुआ।
Wordsworth और Coleridge की Lyrical Ballads ने सामान्य मनुष्य और ग्रामीण जीवन को काव्य की प्रतिष्ठित विषय-वस्तु बनाया। Wordsworth ने कविता की भाषा को भी सामान्य मनुष्य की भाषा के निकट लाने पर बल दिया। इस परिवर्तन ने साहित्य को अभिजात्य सीमा से बाहर निकालकर अधिक व्यापक सामाजिक आधार प्रदान किया।
आत्मसंघर्ष और विषाद
स्वच्छंदतावादी साहित्य केवल प्रकृति, प्रेम और सौंदर्य का साहित्य नहीं है। उसके भीतर गहरा आत्मसंघर्ष, अकेलापन, विषाद और अस्तित्वगत प्रश्नाकुलता भी विद्यमान है। व्यक्ति जब अपनी स्वतंत्रता और आत्मचेतना के प्रति अधिक सजग होता है, तब उसके भीतर संसार और स्वयं के बीच द्वंद्व भी तीव्र हो सकता है।
इसी कारण स्वच्छंदतावादी रचनाओं में कई बार उदासी और निराशा दिखाई देती है। किंतु यह निराशा केवल निष्क्रिय हताशा नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और जीवन के अर्थ की खोज से जुड़ी हुई है।
शैली और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
स्वच्छंदतावाद ने साहित्य की विषय-वस्तु के साथ उसकी भाषा और शैली में भी परिवर्तन किया। निर्धारित नियमों, निश्चित संरचनाओं और अभिजात्य भाषा के स्थान पर सहज, स्वाभाविक और अनुभूति-अनुकूल अभिव्यक्ति को महत्त्व मिला।
Wordsworth ने Lyrical Ballads की भूमिका में कविता की भाषा को सामान्य मनुष्य की भाषा के निकट लाने का समर्थन किया। हिन्दी साहित्य में सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की मुक्त छंद संबंधी प्रयोगशीलता इस स्वतंत्र अभिव्यक्ति की उल्लेखनीय मिसाल है। जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा की भाषा में भी आत्मीयता, लाक्षणिकता और सांकेतिकता के नए रूप दिखाई देते हैं।
नारी के प्रति परिवर्तित दृष्टि
स्वच्छंदतावादी चेतना ने नारी के साहित्यिक चित्रण में भी परिवर्तन की संभावनाएँ निर्मित कीं। नारी केवल बाह्य सौंदर्य अथवा प्रेम की निष्क्रिय वस्तु न रहकर संवेदना, प्रेरणा, करुणा और आध्यात्मिक शक्ति से जुड़ी सत्ता के रूप में सामने आती है। इससे साहित्य में नारी के व्यक्तित्व और आंतरिक संसार की अभिव्यक्ति के लिए नई भूमि निर्मित हुई।
आदर्श और स्वप्न
स्वच्छंदतावाद यथार्थ को स्वीकार करते हुए भी उसे अंतिम सत्य नहीं मानता। उसकी दृष्टि मनुष्य और समाज की बेहतर संभावनाओं की ओर रहती है। इसीलिए आदर्शवाद और स्वप्नशीलता उसकी महत्त्वपूर्ण विशेषताएँ हैं। कवि वर्तमान की सीमाओं और विडंबनाओं के बीच स्वतंत्रता, सौंदर्य, प्रेम और अधिक मानवीय जीवन का स्वप्न देखता है।
यह आदर्शवाद केवल पलायन नहीं है। Shelley के यहाँ भविष्य और परिवर्तन का स्वप्न सामाजिक प्रतिरोध से जुड़ता है। इस प्रकार स्वच्छंदतावादी आदर्शवाद वर्तमान की आलोचना करते हुए बेहतर भविष्य की कल्पना करता है।
हिन्दी साहित्य और छायावाद
हिन्दी साहित्य में स्वच्छंदतावादी चेतना का सबसे निकट संबंध छायावाद से दिखाई देता है। जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ और महादेवी वर्मा की कविता में आत्मानुभूति, प्रकृति-प्रेम, रहस्यबोध, कल्पनाशीलता, सौंदर्य-चेतना, व्यक्तित्व और स्वतंत्र अभिव्यक्ति जैसे तत्त्व प्रमुख हैं।
फिर भी हिन्दी छायावाद को यूरोपीय Romanticism की साधारण प्रतिलिपि मानना उचित नहीं होगा। भारतीय नवजागरण, राष्ट्रीय मुक्ति की आकांक्षा तथा भारतीय दार्शनिक और सांस्कृतिक परंपराओं ने इन प्रवृत्तियों को अपना विशिष्ट स्वरूप प्रदान किया। इसलिए दोनों के बीच समानताओं के साथ उनके सामाजिक और ऐतिहासिक अंतरों को समझना भी आवश्यक है।
उपसंहार
स्वच्छंदतावाद ने साहित्य को नियम और अनुशासन की कठोर सीमाओं से निकालकर व्यक्ति के अंतर्मन, प्रकृति, कल्पना, स्मृति, स्वप्न, रहस्य, लोकजीवन और स्वतंत्रता के विस्तृत संसार से जोड़ा। उसने साहित्य को यह विश्वास प्रदान किया कि मनुष्य का सत्य केवल तर्क से नहीं जाना जा सकता; उसकी भावनाएँ, स्मृतियाँ, कल्पनाएँ और स्वप्न भी सत्य के महत्त्वपूर्ण स्रोत हैं।
व्यक्तिवाद, भावुकता, प्रकृति-प्रेम, कल्पनाशीलता, रहस्यबोध, अतीत-प्रेम, विद्रोह, सौंदर्य-बोध, मानवतावाद, राष्ट्रीय चेतना, लोक-जीवन, आत्मसंघर्ष, शैलीगत स्वतंत्रता, नारी के प्रति नवीन दृष्टि और आदर्शवाद—इन सभी विशेषताओं ने मिलकर स्वच्छंदतावाद को आधुनिक साहित्य के इतिहास की परिवर्तनकारी चेतना बनाया।
इसका स्थायी महत्त्व इसी तथ्य में है कि उसने साहित्य को बाहरी अनुशासन से अधिक मनुष्य की आंतरिक संभावनाओं से जोड़ा। यूरोप में विकसित यह चेतना अलग-अलग भाषाओं और संस्कृतियों में नए रूप ग्रहण करती हुई हिन्दी साहित्य तक पहुँची। हिन्दी छायावाद में उसका रूप भारतीय सांस्कृतिक और ऐतिहासिक परिस्थितियों के अनुरूप परिवर्तित हुआ। इस अर्थ में स्वच्छंदतावाद किसी एक कालखंड तक सीमित आंदोलन नहीं, बल्कि मनुष्य की स्वतंत्र कल्पना, संवेदना और सृजनात्मक आत्माभिव्यक्ति की व्यापक साहित्यिक चेतना है।
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