Saturday, 29 August 2026

फ़ारसी संसार में कौटिल्य का प्रवेश



डॉ. मनीष कुमार सी. मिश्रा

भारत और ईरान के संबंधों का इतिहास केवल राजनय, व्यापार और राजनीति तक सीमित नहीं है। इन दोनों प्राचीन सभ्यताओं के बीच भाषा, साहित्य, दर्शन, कला और ज्ञान की आवाजाही की एक लंबी परंपरा रही है। इसी परंपरा में 13 फ़रवरी 2025 को तेहरान में एक उल्लेखनीय अध्याय जुड़ा, जब आचार्य कौटिल्य—जिन्हें चाणक्य और विष्णुगुप्त के नाम से भी जाना जाता है—के महान ग्रंथ अर्थशास्त्र के प्रथम अधिकरण के संस्कृत से फ़ारसी अनुवाद का लोकार्पण किया गया। यह आयोजन भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद (ICCR) के स्वामी विवेकानंद सांस्कृतिक केंद्र, तेहरान ने Centre for the Great Islamic Encyclopaedia के सहयोग से आयोजित किया था। ICCR की 2024–25 की वार्षिक रिपोर्ट भी 13 फ़रवरी को हुए इस फ़ारसी अनुवाद के लोकार्पण को भारत की प्राचीन ज्ञान-परंपराओं के साथ अकादमिक संवाद बढ़ाने वाली गतिविधि के रूप में दर्ज करती है। 

फ़ारसी संसार में कौटिल्य का प्रवेश

इस अनुवाद का विशेष महत्त्व इसलिए है क्योंकि यह केवल एक प्राचीन संस्कृत पुस्तक का दूसरी भाषा में रूपांतरण नहीं है। यह दो महान बौद्धिक परंपराओं—भारतीय और ईरानी—के बीच सीधा संवाद स्थापित करता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार अर्थशास्त्र के प्रथम अधिकरण का फ़ारसी अनुवाद ईरानी विदुषी नाज़नीन ख़लीलीपूर (Nazanin Khalilipoor) ने किया है। उनका संबंध प्राचीन भाषाओं और संस्कृति के अध्ययन से रहा है और उन्होंने कौटिल्य के अर्थशास्त्र तथा निज़ाम अल-मुल्क तुसी की प्रसिद्ध सियासत-नामा का तुलनात्मक अध्ययन भी किया है। उनके पहले के अध्ययन में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया था कि अर्थशास्त्र फ़ारसी में उपलब्ध नहीं था और उसका परिचय फ़ारसी पाठकों से कराना आवश्यक था। 

इस दृष्टि से 2025 का यह प्रकाशन एक लंबे अकादमिक प्रयास की परिणति जैसा दिखाई देता है। जिस भारतीय राजनीतिक चिंतन का अध्ययन नाज़नीन ख़लीलीपूर पहले तुलनात्मक शोध के माध्यम से कर रही थीं, वही अब अनुवाद के माध्यम से फ़ारसी भाषी पाठकों तक अधिक प्रत्यक्ष रूप में पहुँच रहा है।

‘अर्थशास्त्र’ केवल अर्थव्यवस्था का ग्रंथ नहीं

आज ‘अर्थशास्त्र’ शब्द सुनते ही सामान्यतः Economics का बोध होता है, लेकिन कौटिल्य के अर्थशास्त्र का क्षेत्र इससे कहीं व्यापक है। यह शासन, प्रशासन, अर्थव्यवस्था, न्याय, सुरक्षा, कूटनीति, युद्ध, गुप्तचर व्यवस्था, विदेश नीति और राज्य के संगठन जैसे विषयों का विस्तृत विवेचन करता है।

ग्रंथ में कुल पंद्रह अधिकरण हैं। आधुनिक प्रकाशकीय परिचयों में भी इसे प्राचीन भारत के सर्वाधिक व्यापक शासन-ग्रंथों में माना गया है, जिसमें राजा, कानून, विदेश नीति, प्रशासन और रणनीति सहित अनेक विषयों की चर्चा है। 

कौटिल्य की दृष्टि में राज्य का उद्देश्य केवल सत्ता की रक्षा करना नहीं, बल्कि सुव्यवस्थित शासन और प्रजा के कल्याण को सुनिश्चित करना भी है। इसलिए अर्थशास्त्र को केवल राजाओं के लिए लिखी गई रणनीतिक पुस्तक समझना उसके बौद्धिक विस्तार को सीमित कर देना होगा। उसमें कर-व्यवस्था, व्यापार, कृषि, प्रशासनिक अधिकारियों की जिम्मेदारियाँ, राज्य की आय, सुरक्षा और अंतरराज्यीय संबंधों तक पर विचार मिलता है।

ईरान के लिए इसका विशेष महत्त्व

फ़ारसी में अर्थशास्त्र का प्रवेश इसलिए और रोचक हो जाता है क्योंकि ईरान की अपनी अत्यंत समृद्ध राजनीतिक-नैतिक चिंतन परंपरा रही है। विशेष रूप से सेल्जुक काल के प्रसिद्ध विद्वान और वज़ीर ख़्वाजा निज़ाम अल-मुल्क तुसी की सियासत-नामा फ़ारसी राजनीतिक चिंतन की महत्त्वपूर्ण कृति मानी जाती है।

नाज़नीन ख़लीलीपूर ने अपने शोध में अर्थशास्त्र और सियासत-नामा की विषयगत तुलना भी की है। दोनों ग्रंथ अलग-अलग ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परिवेश में निर्मित हुए, फिर भी शासन, शासक, प्रशासन और राज्य-संचालन जैसे अनेक प्रश्न उन्हें संवाद की साझा भूमि प्रदान करते हैं। 

यही कारण है कि फ़ारसी अनुवाद भविष्य में तुलनात्मक राजनीतिक चिंतन के एक नए क्षेत्र को विकसित कर सकता है—कौटिल्य और निज़ाम अल-मुल्क, भारतीय राजधर्म और फ़ारसी सियासत, तथा प्राचीन भारतीय राज्य-चिंतन और ईरानी शासन-विचार की तुलनात्मक समीक्षा।

संस्कृत–फ़ारसी संवाद की ऐतिहासिक निरंतरता

भारत और फ़ारसी संसार का बौद्धिक संवाद नया नहीं है। मध्यकाल में अनेक संस्कृत ग्रंथों का फ़ारसी में अनुवाद हुआ। भारतीय दर्शन, नीति, कथा-साहित्य, चिकित्सा और धर्मग्रंथ फ़ारसी विद्वानों तक पहुँचे। इसी प्रकार फ़ारसी भाषा ने भारतीय साहित्य, इतिहासलेखन और प्रशासन पर गहरा प्रभाव डाला।

उदाहरण के लिए संस्कृत नीति-साहित्य के प्रसिद्ध हितोपदेश का फ़ारसी रूप मुफ़र्रिह अल-क़ुलूब के नाम से पंद्रहवीं शताब्दी में सामने आया था। बाद में इसी अनुवाद-परंपरा ने भाषाओं के बीच ज्ञान के आवागमन के और मार्ग खोले। 

इस व्यापक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में अर्थशास्त्र का संस्कृत से फ़ारसी में पहुँचना अतीत की उसी बौद्धिक यात्रा का आधुनिक विस्तार माना जा सकता है।

भारतीय ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक कूटनीति

इस आयोजन का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष भारत की सांस्कृतिक कूटनीति से भी जुड़ा है। ICCR के स्वामी विवेकानंद सांस्कृतिक केंद्र जैसे संस्थान विदेशों में भारतीय संस्कृति, भाषा और बौद्धिक परंपराओं के परिचय का माध्यम हैं। तेहरान स्थित केंद्र भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद और भारत सरकार के विदेश मंत्रालय से संबद्ध सांस्कृतिक केंद्र है। 

भारत की सांस्कृतिक शक्ति केवल योग, संगीत, नृत्य या सिनेमा तक सीमित नहीं है। संस्कृत साहित्य, बौद्ध दर्शन, वेदांत, आयुर्वेद, भारतीय भाषाएँ और प्राचीन राजनीतिक एवं आर्थिक चिंतन भी भारत की बौद्धिक विरासत के महत्त्वपूर्ण अंग हैं। अर्थशास्त्र जैसे ग्रंथों का विदेशी भाषाओं में अनुवाद इस बौद्धिक विरासत को वैश्विक विमर्श का हिस्सा बनाता है।

विशेष रूप से ईरान जैसे देश में इसका महत्त्व अधिक है, जहाँ दर्शन, इतिहास, साहित्य और राजनीतिक चिंतन की अपनी प्राचीन और समृद्ध परंपरा मौजूद है। यहाँ भारतीय ग्रंथ का अनुवाद एकतरफा सांस्कृतिक प्रचार नहीं, बल्कि सभ्यताओं के बीच संवाद की संभावना उत्पन्न करता है।

फ़ारसी से मध्य एशिया तक खुलता रास्ता

इस अनुवाद का प्रभाव केवल ईरान तक सीमित मानना भी उचित नहीं होगा। फ़ारसी भाषा ऐतिहासिक रूप से मध्य एशिया, अफ़ग़ानिस्तान और भारतीय उपमहाद्वीप के विशाल सांस्कृतिक भूगोल को जोड़ने वाली प्रमुख भाषाओं में रही है। इसलिए अर्थशास्त्र का फ़ारसी संस्करण भविष्य में व्यापक फ़ारसीभाषी अकादमिक संसार में भारतीय राजनीतिक विचार के अध्ययन को प्रोत्साहित कर सकता है।

इसके आधार पर ईरान और भारत के विश्वविद्यालयों में तुलनात्मक शोध, संयुक्त संगोष्ठियाँ और अनुवाद परियोजनाएँ विकसित की जा सकती हैं। कौटिल्य के साथ फिरदौसी, सादी, निज़ाम अल-मुल्क और अन्य ईरानी चिंतकों को रखकर शासन, नैतिकता, शक्ति और लोककल्याण की अवधारणाओं पर नए अध्ययन संभव हैं।

अनुवाद से आगे की यात्रा

अभी प्रथम अधिकरण का अनुवाद सामने आना शुरुआत है। स्वाभाविक रूप से अगली अपेक्षा संपूर्ण अर्थशास्त्र के फ़ारसी अनुवाद की होगी। साथ ही ऐसा संस्करण भी उपयोगी होगा जिसमें संस्कृत मूल, फ़ारसी अनुवाद, विस्तृत टिप्पणियाँ, पारिभाषिक शब्दावली तथा ऐतिहासिक भूमिका सम्मिलित हों। इससे यह केवल सामान्य पाठकों के लिए पुस्तक नहीं रहेगी, बल्कि ईरान और अन्य फ़ारसीभाषी क्षेत्रों के विश्वविद्यालयों में भारतीय इतिहास, संस्कृत, राजनीति विज्ञान और तुलनात्मक सभ्यता अध्ययन के लिए एक महत्त्वपूर्ण अकादमिक स्रोत बन सकती है।

13 फ़रवरी 2025 का तेहरान आयोजन इसीलिए सामान्य पुस्तक-लोकार्पण से कहीं अधिक महत्त्व रखता है। एक ओर लगभग दो सहस्राब्दियों से अधिक पुरानी भारतीय राज्य-चिंतन की परंपरा है और दूसरी ओर फ़ारसी संसार की समृद्ध राजनीतिक और दार्शनिक विरासत। अनुवाद ने इन दोनों के बीच एक नया सेतु बनाया है।

कौटिल्य का अर्थशास्त्र जब संस्कृत की सीमाओं से निकलकर फ़ारसी में बोलता है तो वह केवल भाषा नहीं बदलता—वह अपना बौद्धिक भूगोल विस्तृत करता है। भारत और ईरान जैसी प्राचीन सभ्यताओं के संबंधों का भविष्य शायद ऐसे ही प्रयासों में अधिक मजबूती से दिखाई देता है, जहाँ कूटनीति के साथ-साथ पुस्तकें, विचार और ज्ञान भी सीमाएँ पार करते हैं। यही इस फ़ारसी अनुवाद की सबसे बड़ी उपलब्धि है।

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