Friday, 28 August 2026

भारतीय साहित्य का सनातन सारांश

 भारतीय साहित्य का सनातन सारांश  

       

        एक अखंड राष्ट्र के रूप में  भारत का स्वरूप बहुवचनात्मक है । बाह्य विविधताओं से परिपूर्ण इस देश में कुछ आंतरिक मूल तत्व हैं जो इसकी अखंडता के लिए कवच के समान हैं । भारतीयता जैसी अवधारनाएं इन्हीं प्रांजल तत्वों की खोह में सुरक्षित रहती हैं । पूरे विश्व में इस तरह का दूसरा उदाहरण नहीं है । ये तत्व ही प्रकाश के वे अंतःकेंद्र हैं जो पवित्र,निर्मल विचारों और मानवीय मूल्यों की स्थापना के लिये साहित्य और संस्कृति के माध्यम से सच्चा बयान प्रस्तुत करते हैं । एक राष्ट्र के रूप में हमें ऊर्जावान, प्रज्ञावान और अग्रगामी बनाते हैं । यह भी सिखाते हैं कि दृष्टि के विस्तार में हम एक हैं । अथर्ववेद के पृथ्वी सूक्ति में लिखा गया है कि  

“जनं बिभ्रती बहुधा विवाचसं नाना धर्माणं पृथिवी यथौकसम्”

                                         (अथर्ववेद १२-१-४५ )

 अर्थात बहुत से लोग कई भाषायें बोलते हैं और उनके कई धर्म हैं । अर्थात हजारों सालों से यह भूमि बहुभाषी और बहुधर्मी रही है । रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथों में अनेकों संस्कृतियों के लोगों एवं उनकी भौगोलिक परिस्थितियों का वर्णन है । मध्यकालीन कवियों और संतों ने लंबी यात्राएं की और अपने विचारों का प्रचार-प्रसार किया । गुरुग्रंथ साहब में अनेकों संतों की वाणी संग्रहित है । मीरा बाई राजस्थानी, गुजराती और हिंदी के बीच सेतु का काम कर रहीं थी । यही काम विद्यापति बिहारी और बंगाली के बीच कर रहे थे । मैथिली विद्यापति की मातृभाषा थी लेकिन बांग्ला वाले भी उन्हें ब्रजबुलि अर्थात बंगला भाषा के रचनाकार मानते हैं । रहीम और रसखान की बृजभाषा पर कौन मोहित नहीं हुआ ।  

         फादर थॉमस स्टीफन्स (1549-1619) ने मराठी में क्रिस्तपुराण / क्रिस्टा पुराण मसीह की कहानी (1614 में पूर्ण और 1616 में प्रकाशित) कम्पोज़ किया । महर्षि दयानंद गुजरात से थे लेकिन काम हिंदी में कर रहे थे । सखाराम गणेश देउसकर(1869-1912) मराठी भाषी थे जो बंगाली में लिखते थे । आप प्रसिद्ध क्रांतिकारी लेखक, इतिहासकार और पत्रकार थे । आप को ‘बंगाल का तिलक’ भी कहा जाता है । अरविंद घोष ‘स्वराज’ के पहले प्रयोग का श्रेय भी देउसकर को देते हैं । आप की प्रमुख रचनाओं में महामती रनाडे, झासीर राजकुमार, बाजीराव, आनन्दी बाई, शिवाजीर महत्व, शिवाजीर शिक्षा, शिवाजी, देशेर कथा, कृषकेर सर्वनाश इत्यादि शामिल हैं। स्वाथि थिरूनल केरल से  गीत हिंदुस्तानी में भी लिख रहे थे । स्वाथि थिरूनल का जन्म सन 1883 में हुआ था। तेरह वर्ष की अल्पायु में ही उन्होंने मलयालम, संस्कृत, फारसी, अंग्रेजी, तेलुगू, मराठी, कन्नड़ और हिंदुस्तानी भाषा में विशेष योग्यता प्राप्त कर ली थी। राजा सरफोजी द्वितीय हिंदुस्तानी और पश्चिमी संगीत के संलयन का प्रयोग कर रहे थे । वे ओपेरा तमिल में कम्पोज़ कर रहे थे, विंड बैंड की तर्ज पर तंजोर बैंड बना रहे थे । राजा सरफोजी द्वितीय 1798 से 1832 तक तंजोर के शासक रहे । इस तरह हम पाते हैं कि देश के कई राज्यों में अनेकों लोग हैं जो एक से अधिक भाषा में लिखते रहे हैं ।


         भारतीय क्षेत्रीय साहित्य किसी एक मूल तत्व को लेकर सबसे अधिक आंदोलित भक्तिकाल में दिखाई पड़ता है । सभी सगुण-निर्गुण संतों ने मानवता को जीवन के सबसे बड़े सत्य के रूप में स्वीकार किया है । आसाम में शंकरदेव, बंगाल में चंडीदास, उत्तर में सूरदास, तुलसीदास, कबीर और मीराबाई इत्यादि । कर्नाटक में पुरंदरदास, तमिलनाडु में कंबन, चेरुशशेरी केरला में, त्यागराज आंध्रा, तुकाराम महाराष्ट्र, नरसी मेहता गुजरात और बलरामदास उड़ीसा में इसी मानवीय भाव के गीत गा रहे थे । इनके पहले के रासो ग्रंथ, आल्हा गीत, पोवाड़ा इत्यादि के अंदर भी ऐसे ही राष्ट्रीय भाव थे । ठीक इसी तरह आगे चलकर पूरा भारत एक स्वर में आज़ादी के तराने बुन रहा था । नवीनचंद्र सेन द्वारा लिखित ‘बैटल ऑफ प्लासी’ का हिंदी अनुवाद मैथिलीशरण गुप्त ने किया । काजी नज़रुल इस्लाम ने हिंदी में ‘अग्निवीणा’ लिखी । ऐसे कई रचनाकार रहे जिन्होंने क्षेत्रीय दायरे में अपने को समेटे नहीं रक्खा । कन्नड के पुटप्पा, गुजराती के नर्मदाशंकर दवे, असमिया के अंबिकागिरी रामचौधरी और सावरकर, इक़बाल इसके उदाहरण हैं । 


         जमीदारों द्वारा गरीबों, वंचितों के शोषण की कहानी भी भारतीय भाषाओं में प्रमुखता से चित्रित हुई । प्रेमचंद का ‘गोदान’, जसवंत सिंह का पंजाबी उपन्यास ‘सूरजमुखी’, व्यंकटेश दिगम्बर माडगुलकर का मराठी उपन्यास ‘बनगरवाडी’, फणीश्वरनाथ रेणु का ‘मैला आंचल’, उर्दू में राजेंद्र सिंह बेदी की ‘एक चादर मैली सी’, बंगाली में शरतचंद्र चटर्जी का ‘पल्ली समाज’, ताराशंकर बंदोपाध्याय की ‘गणदेवता’, आसाम के चाय बगानों पर केंद्रित बिरंचि कुमार बरुआ का उपन्यास ‘सेउजी पटर कहनी’(1955)  उड़िया में फ़कीर मोहन सेनापति का ‘छह माण आठ गुंठ’, तेलगू में उन्नवा लक्ष्मीनारायण का मालापल्ली, तमिल के अकिलन/ पेरुंगळूर वैद्य विंगम अखिलंदम ( पी. वी. अखिलंदम) की 'पावै विलक्कु’, कन्नड़ के शिवराम कारंत / कोटा शिवराम कारंत का 'मरलि मण्णिगे’, मलयालम के तकजि शिवशंकर पिल्लै /टी.एस.पिल्लै की 'रंटि टंगषी' (दो सेर धान) और गुजराती के पन्नालाल पटेल लिखित ‘मलाला जीव’(मैला जीवन) इसके श्रेष्ठ उदाहरण हैं । 


       ऋतुओं के संदर्भ में कालिदास का ‘ऋतुसंहार’ , गुरुनानक देव की ‘तुखारी राग’ तथा राजस्थानी, अवधी की बारहमासा एक ही परंपरा का निर्वहन करते हैं । गुरु नानक देव ने  तुखारी राग के बारहमाहा में वर्ष के बारह महीनों का सुंदर चित्रण प्रस्तुत किया है। मलिक मोहम्मद जायसी भी इस परंपरा का निर्वहन पद्मावत में करते हैं । कार्तिक मास में नागमती की विरह –वेदना का वर्णन करते हुए वे लिखते हैं कि-

कातिक सरद चंद उजियारी। जग सीतल,हौं बिरहै जारी।।

चौदह करा चाँद परगासा। जनहुँ जरै सब धरति अकासा।।

सेक्स और हिंसा को किसी भी क्षेत्रीय साहित्य में उस तरह जगह नहीं मिली जैसे यूरोप में पिछले बड़े युद्धों के बाद मिला । ऐसा इसलिए क्योंकि भारतीय दर्शन जीवन की संपूर्णता में विश्वास करता है । 

             श्वेताश्वतरोपनिषद(4/6) में वर्णन मिलता है कि दो सुन्दर पंखों वाले पक्षी, घनिष्ठ सखा, समान वृक्ष पर ही रहते हैं; उनमें से एक वृक्ष के स्वादिष्ट फलों को खाता है, अन्य खाता नहीं अपितु अपने सखा को देखता है। हमारा शरीर एक पीपल के वृक्ष समान है । आत्मा तथा परमात्मा सनातन सखा अर्थात् दो पक्षी हैं जो शरीर रूपी वृक्ष पर हृदय रूपी घोसलें में एक साथ निवास करते हैं । उनमें से एक तो कर्मफल का भोग करता है और दूसरा भोग न करके केवल देखता रहता है।)

द्वा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते।

तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्त्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति ॥

मानवीय उदारता का श्रेष्ठ साहित्य महाभारत को माना जा सकता है । अलग-अलग भारतीय भाषाओं में भिन्नता के बाद भी कुछ सूक्ष्म सूत्र ज़रूर हैं जो इसे जोड़ता है । देवताओं और मनुष्यों के बीच पुल बनानेवाले भारतीय ऋषियों,मुनियों,संतों एवं कवियों ने दिव्य और पावन के अवतरण की संभावनाओं को हमेशा जिंदा रखा । राम और कृष्ण के रूप में इन्होंने समाज को एक आदर्श,प्रादर्श और प्रतिदर्श दिया ।  


       महाश्वेता भट्टाचार्य झाँसी की रानी पर बंगाली में उपन्यास लिखती हैं । निराला शिवाजी पर उपन्यास लिखते हैं । टैगोर गुरु गोबिन्द सिंह पर कविता लिखते हैं । सुब्र्मण्यम भारती लोकमान्य तिलक पर कविता लिखते हैं । शांतिरंजन मुखर्जी गालिब को बंगाली में अनुदित करते हैं । यह सब एक राष्ट्रीय छवि के निर्माण में महत्वपूर्ण कारक के रूप में देखा जा सकता है । समानता, मनुष्यता, सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय एकात्मता जैसे तत्व इन सभी भाषाओं के साहित्य में समान रूप से मिलते हैं । जब हम भारतीय साहित्य कहते हैं तों इसका अभिप्राय भारत में बोली जानेवाली सभी भाषाओं एवं बोलियों से है । संथाल और मुंडा साहित्य के साथ - साथ फ़ारसी में लिखित खुसरो,गालिब और इक़बाल के साहित्य को भारतीय साहित्य का ही हिस्सा समझा जाये । इसीतरह अँग्रेजी में लिखित भारतियों का साहित्य एवं प्रवासी भारतीय साहित्य को भी उदारतापूर्वक स्वीकार करना होगा । कई विदेशियों ने भी भारतीय सभ्यता,संस्कृति और इतिहास इत्यादि को लेकर महत्वपूर्ण लेखन कार्य किया है, उनके प्रति भी हमें एक समझ विकसित करनी होगी । सिस्टर निवेदिता का “The Web of Indian Life”(1904) इसीतरह का एक महत्वपूर्ण कार्य है । 



           दरअसल भारतीय भाषाओं में लिखित साहित्य में जितनी भिन्नता है, वह विश्व का इकलौता उदाहरण है । शिल्प में इतनी भिन्नता के बाद भी संवेदना के स्तर पर इनमें बड़ी समरूपता है । यह एकरूपता आंतरिक है । इस देश में बाहरी रंग रूप से कहीं अधिक महत्व आंतरिक गुणों को दिया गया है । अगर बाहरी रंग रूप की समरूपता को महत्व दिया जाता तो राष्ट्रीय पशु के रूप में शेर को नहीं अपितु भैंसे को चुना जाता । भारतीय होने का अर्थ है मानवीय होना, कृतज्ञतर होना । इस देश के अंदर रचा बसा सबकुछ इस देश का है । माईकल मधुसुदन दत्ता , बंकीमचंद चटर्जी , मुल्क राज आनंद, आर.के. नारायण, मनोहर मलगाँवकर, अनीता देसाई, नयनतारा सहगल, तोरु दत्त , विक्रम सेठ, एलन सेली, अमिताव घोष, झुम्पा लाहिड़ी, चित्रा बनर्जी, अरुंधति रॉय, विक्रम चंद्रा, जैसे साहित्यकारों को उनकी अँग्रेजी भाषा की वजह से कमतर भारतीय समझना अनुचित है । ऐसे विचारों का परिमार्जन आवश्यक है । 


           मिथक और लोकसाहित्य को भारतीय साहित्य के दो अनिवार्य तत्व माने जा सकते हैं।  भारतीय संस्कृति की दो प्राचीनतम भाषायें संस्कृत और तमिल में भी आंतरिक आदान-प्रदान के सूत्र मिलते हैं । कई वैदिक देवी देवताओं का उल्लेख तमिल साहित्य में भी मिलता है । ‘संगम साहित्य’ में भी ये समानतायें परिलक्षित होती हैं । इंद्र और अग्नि जैसे देवताओं के नाम यहाँ भी मिलते हैं । कई संदर्भों में रामायण और महाभारत का उल्लेख भी मिलता है । देवी अहिल्या और ऋषि गौतम की कथा का उल्लेख भी यहाँ मिलता है । तोण्डरडिप्पोड़ियालवार  ने अपने प्रबंध साहित्य में उस गिलहरी का वर्णन किया है जो सेतु समुद्रम में योगदान देती है । रामायण से जुड़ी ऐसी कई घटनाओं का भी उल्लेख है, जिनका वर्णन वाल्मिकी रामायण में नहीं मिलता । तोंडरडिप्पोड़ियालवार का जन्म विप्रकुल में हुआ। इनका दूसरा नाम विप्रनारायण है।  

    

       तमिल ग्रंथों में उडियनजेरल / उदियमजेराल नामक राजा की कहानी भी मिलती है जिन्होंने महाभारत के युद्ध के दौरान कौरव और पांडव दोनों ही सेनाओं को भोजन कराया ।  अहनानरु नामक तमिल ग्रंथ में सर्वप्रथम दक्षिण भारत में मौर्य आक्रमण का उल्लेख मिलता है । 6वीं शताब्दी में पल्लव साम्राज्य के समय तमिल साहित्य संस्कृत के अधिक निकट आया । दीनानाग, कालिदास, भारती, वराहमिहिर पल्लव शासन में प्रसिद्ध साहित्यकार थे । संस्कृत, प्राकृत और तमिल भाषा का जैनों ने भरपूर उपयोग किया । मदुरई और कांची में उन्होने बड़े- बड़े शैक्षणिक केंद्र स्थापित किये । तमिल साहित्य की एक श्रेष्ठ रचना के रूप में हम कंबन रामायण से परिचित ही हैं । चोल राजा कुलोतुंग तृतीय (1178-1202 ई.) के दरबार से जुड़े कंबन ने  रामावतारम् (तमिल रामायण)/ कंबन रामायण की रचना की । इसी तरह अद्वैत सिद्धांत पर कैवल्य नवनीतम एक महत्वपूर्ण मौलिक कार्य है । 


         इसी तरह संस्कृत के ‘शिवभक्ति विलास’ का मूल स्रोत तमिल भाषा में लिखित ‘पेरिया पूरनम’ (सेक्किझर ,12वीं शताब्दी) है । सेक्किझर ने इसे संकलित करने का महत्वपूर्ण कार्य किय । राजा कृष्णदेव राय के समय में उनके अष्टदिग्गजों ने जो प्रबंध लिखे उनकी प्रेरणा संस्कृत साहित्य ही रहा । इसी तरह मलयालम साहित्य में संस्कृत के कई तत्सम शब्द मिलते हैं । यहाँ के निरानम कवियों ने तमिल और संस्कृत शब्द संपदा के साथ उत्तम साहित्य रचा । कूकासांडसम जैसी रचनाएँ कालिदास के मेघदूतम से प्रेरित हैं । साहित्यिक भाषा के रूप में मलयालम तमिल भाषा से प्रभावित था। चिरमन का रामचरितम (12 वीं शताब्दी) इसका उदाहरण है। निरानम कवियों में यह प्रभाव कम हुआ । निरानम कहे जाने वाले कवि थे माधव पणिकर, शंकर पणिकर और रमा नायक। इनका समय 1350 से 1450 ई. के बीच रहा । 


            मराठी भाषा की बात करें तो 1188 ई. के आस-पास नाथपंथीय मुकुंदराज के ‘विवेकसिंधु’ की चर्चा सबसे पहले होती है, जो अद्वैत भक्ति से संबन्धित है । इन्हें मराठी का आदिकवि भी माना जाता है । 1128 से 1200 ई. के बीच इनका जीवनकाल माना जाता है । "विवेकसिंधु" और "परमामृत" नामक इनके दो ग्रंथों की चर्चा मिलती है ।  ज्ञानेश्वर की ‘ज्ञानेश्वरी’ को कैसे भुलाया जा सकता है ? जो कि 1290 ई. के आस-पास की रचना मानी जाती है । कृष्ण पर केंद्रित वामन पंडित की रचना यथार्थदीपिका भी बहुत महत्वपूर्ण है । नारायनदास कृत ‘नारायण किर्ति’ और रत्नाकर कृत ‘रत्नाकर’ भी महत्वपूर्ण रचनाएँ हैं । मुगलकाल के संत एकनाथ के साहित्य से सभी परिचित हैं । रामायण पर केंद्रित सबसे अधिक ग्रंथ बांग्ला और मराठी में लिखे गये हैं । कवि गिरिधर के सात अलग संस्करण, माधव स्वामी का एक और मोरेश्वर रामचंद्र पराड़कर / मोरोपंत(1729-1794) के 108 संस्करण की बात अद्भुद हैं । वैसे मोरेश्वर रामचंद्र पराड़कर / मोरोपंत के लिखे 94-95 संस्करण मिलते हैं । बाकी के बारे में अधिक जानकारी नहीं मिलती । लेकिन एक ही व्यक्ति द्वारा रामायण को केंद्र बनाकर इतने संस्करण लिखना विलक्षण है ।   


           19वीं शती के अंत तक मराठी भाषा में भी राष्ट्रीय गौरव का भाव अधिक प्रबल हुआ । विष्णू शास्त्री चिपलूंकर निबंधमाला में अपने लेख शुरू करने से पहले संस्कृत की कोई सूक्ति लिखते थे । प्राचीन कथाओं को समकालीन समस्याओं से जोड़ते हुए उपन्यास लिखने की परंपरा महाराष्ट्र से ही शुरू हुई । साने गुरुजी, जी.एन. दांडेकर और वी.एस.खांडेकर कुछ ऐसे ही उपन्यासकार थे । पांडुरंग सदाशिव साने (24 दिसम्बर 1899 – 11 जून 1950) मराठी भाषा के प्रसिद्ध लेखक, शिक्षक, सामाजिक कार्यकर्ता एवं कर्मठ स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। वे साने गुरूजी के नाम से प्रसिद्ध हुए । आप ने ‘कुरल’ नामक तमिल ग्रंथ का मराठी अनुवाद किया । ‘आंतरभारती’ नामक संस्था की स्थापना साने गुरुजी ने  प्रांत-प्रांत के मध्य चल रही घृणा को कम करने हेतु की । क्षेत्रवाद और प्रांतवाद भारत की अखंडता के लिए घातक है, इस बात को वे अच्छे से समझते थे । ‘आंतरभारती’ का उद्देश्य ही था कि विभिन्न राज्यों के लोग एक-दूसरे की भाषा और संस्कृति को सीखें, उनकी प्रथा,परंपरा और मान्यताओं को समझें ।


            गोपाल नीलकंठ दांडेकर / जी.एन. दांडेकर (1916- 1998) ने सौ से अधिक पुस्तकें लिखीं जिनमें 26 उपन्यास थे ।‘स्मरणगाथा’ के लिए आप को साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला । वी.एस.खांडेकर / विष्णु सखाराम खांडेकर (1898-1976 ) ने ‘ययाति’ सहित कुल16 उपन्यास लिखे। जिनमें  हृदयाची हाक, कांचनमृग, उल्का, पहिले प्रेम, अमृतवेल, अश्रु  शामिल हैं। नाटकों के क्षेत्र में भी ऐसा ही प्रयोग हुआ । विष्णुदास भावे (1819-1901) ऐसे ही नाटककार थे । आप को मराठी रंगभूमि के जनक के रूप में भी जाना जाता है । आप ने ही  1843 में "सीता स्वयंवर" नामक मराठी का पहला नाटक रंगमंच पर प्रस्तुत किया । रामायण को आधार बनाकर आप ने विविध विषयों पर दस नाटक लिखे । "इंद्रजीत वध" , "राजा गोपीचंद" और "सीता स्वयंवर" जैसे नाटकों का लेखन और दिग्दर्शन आप ने सफलतापूर्वक 

 किया।


          समग्र रूप में हम यह कह सकते हैं कि हमें अपनीय मानवीय उदारता और  विस्तार देना होगा,ताकि विस्तृत दृष्टिकोण हमारी थाती रहे ।  निरर्थकता में सार्थकता का रोपण ऐसे ही हो सकता है । स्वीकृत मूल्यों का विस्थापन और विध्वंश चिंतनीय है । विश्व को बहुकेंद्रिक रूप में देखना, देखने की व्यापक,पूर्ण और समग्र प्रक्रिया है । समग्रता के लिए प्रयत्नशील हर घटक राष्ट्रीयता का कारक होता है । जीवन की प्रांजलता, प्रखरता और प्रवाह को निरंतर क्रियाशीलता की आवश्यकता होती है । वैचारिक और कार्मिक क्रियाशीलता ही जीवन की प्रांजलता के प्राणतत्व हैं । जीवन का उत्कर्ष इसी निरंतरता में है । भारतीय संस्कृति के मूल में समन्वयात्मकता प्रमुख है । सब को साथ देखना ही हमारा सही देखना होगा । अँधेरों की चेतावनी और उनकी साख के बावजूद हमें सामाजिक न्याय चेतना को आंदोलित रखना होगा । खण्ड के पीछे अख्ण्ड के लिये सत्य में रत रहना होगा । सांस्कृतिक संरचना में प्रेम, करुणा और सहिष्णुता को निरंतर बुनते हुए इसे अपना सनातन सत्य बनाना होगा । 



डॉ. मनीष कुमार मिश्रा 

हिन्दी व्याख्याता 

के.एम.अग्रवाल महाविद्यालय 

कल्याण पश्चिम, महाराष्ट्र


डॉ. उषा आलोक दुबे 

हिन्दी व्याख्याता 

एम.डी. महाविद्यालय 

परेल, महाराष्ट्र

संदर्भ ग्रंथ : 

1. IDENTIFICATION OF COMMONNESS AMONG LETTER SETS OF VARIOUS LANGUAGES AND NUMERIC SYSTEMS FROM SANSKRIT. K.S.Vishwanath. Assistant Professor, Department of Aerospace Engineering, IIAEM, Jain University, Bangalore-562112. ISSN: 2320-5407 Int. J. Adv. Res. 6(11), 1060-1068.

2.Postcolonial Indian Literature Towards a critical framework – Satish C. Aikant, Indian Institute of Advanced Study, Shimla, first published 2018.

3.Social Awareness in Modern Indian Literature – R.K.Kaul and Jaidev. Indian Institute of Advanced Study, Shimla, first published 1993. 

4.Literature and Infinity – Franson Manjali, Indian Institute of Advanced Study, Shimla, first published 2001.  

5.भाषा का समाजशास्त्र – राजेन्द्र प्रसाद सिंह, राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली । तृतीय संस्करण 2019

6. King Serfoji II of Thanjavur and European Music by Professor Indira Viswanathan Peterson, Mount Holyoke College, U.S.A, Journal of the Music Academy of Madras, Dec 2013. 



  


        

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