शिक्षा और हिन्दी की भूमिका
भारत–उज़्बेकिस्तान संबंधों का सबसे आकर्षक पक्ष शिक्षा और संस्कृति है। उज़्बेकिस्तान में भारतीय संस्कृति, हिन्दी भाषा, भारतीय फिल्मों, योग और भारतीय परंपराओं के प्रति लंबे समय से रुचि रही है।
ताशकंद सहित उज़्बेकिस्तान के शैक्षणिक संस्थानों में भारतीय भाषाओं और भारतीय अध्ययन की उपस्थिति दोनों देशों के सांस्कृतिक संबंधों को संस्थागत आधार देती है। आज आवश्यकता इस बात की है कि विश्वविद्यालयों के बीच संयुक्त शोध, छात्र एवं शिक्षक विनिमय, हिन्दी और उज़्बेक भाषा अध्ययन, अनुवाद परियोजनाओं तथा डिजिटल शिक्षण कार्यक्रमों को और विस्तार दिया जाए।
यदि राजनीतिक और आर्थिक संबंधों के साथ अकादमिक संबंध भी समान गति से आगे बढ़ते हैं, तो भारत–उज़्बेकिस्तान साझेदारी अधिक स्थायी और जन-केंद्रित बन सकती है।
भारतीय सिनेमा—सांस्कृतिक कूटनीति का सशक्त माध्यम
भारत और उज़्बेकिस्तान के बीच संबंधों की चर्चा भारतीय सिनेमा के बिना अधूरी है। सोवियत काल से ही राज कपूर और अन्य भारतीय कलाकारों की लोकप्रियता ने मध्य एशिया में भारत की एक आत्मीय सांस्कृतिक छवि निर्मित की। बाद के दशकों में हिन्दी फिल्मों, संगीत और भारतीय टेलीविजन ने इस सांस्कृतिक संपर्क को जीवित रखा।
आज जब विश्व राजनीति में ‘सॉफ्ट पावर’ और सांस्कृतिक कूटनीति का महत्त्व बढ़ रहा है, तब सिनेमा, साहित्य, भाषा, संगीत और पर्यटन भारत के लिए मध्य एशिया में अत्यंत प्रभावी माध्यम बन सकते हैं।
दोनों देशों के फिल्म संस्थानों के बीच सहयोग, संयुक्त फिल्म निर्माण, फिल्म महोत्सव, साहित्यिक अनुवाद और कलाकारों के आदान-प्रदान जैसी पहल भारत–उज़्बेकिस्तान संबंधों को सरकारी स्तर से निकालकर समाज के व्यापक स्तर तक पहुँचा सकती हैं।
सुरक्षा और रणनीतिक सहयोग
अफगानिस्तान की स्थिति भारत और उज़्बेकिस्तान दोनों के लिए महत्त्वपूर्ण है। आतंकवाद, कट्टरपंथ, मादक पदार्थों की तस्करी और क्षेत्रीय अस्थिरता जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए मध्य एशियाई देशों के साथ भारत का सहयोग आवश्यक है।
उज़्बेकिस्तान भौगोलिक रूप से अफगानिस्तान से जुड़ा है और मध्य एशिया की सुरक्षा व्यवस्था में उसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका है। यही कारण है कि भारत–उज़्बेकिस्तान रणनीतिक संवाद केवल द्विपक्षीय हितों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि व्यापक यूरेशियाई सुरक्षा से भी जुड़ जाता है।
मोदी की चौथी यात्रा का संदेश
प्रधानमंत्री मोदी की यह चौथी उज़्बेकिस्तान यात्रा अपने आप में दोनों देशों के बढ़ते राजनीतिक संपर्क का संकेत है। उनकी पहली उज़्बेकिस्तान यात्रा जुलाई 2015 में हुई थी। उस यात्रा के दौरान पर्यटन, विदेश मंत्रालयों के बीच सहयोग और सांस्कृतिक सहयोग सहित विभिन्न क्षेत्रों में समझौते हुए थे।
सितंबर 2022 में प्रधानमंत्री मोदी शंघाई सहयोग संगठन के राष्ट्राध्यक्षों की परिषद की बैठक में भाग लेने समरकंद पहुँचे थे।
अब 2026 की ताशकंद यात्रा इस संबंध को अगले चरण में ले जाने का अवसर प्रदान करती है। इसकी विशेषता यह है कि बातचीत का एजेंडा पारंपरिक कूटनीति से आगे बढ़कर डिजिटल प्रौद्योगिकी, ऊर्जा, शिक्षा और भविष्य की अर्थव्यवस्था तक विस्तृत हो चुका है।
मध्य एशिया की ओर भारत की बढ़ती दृष्टि
भारत के लिए मध्य एशिया केवल पाँच देशों का भौगोलिक क्षेत्र नहीं है। यह भारत को यूरेशिया से जोड़ने वाला रणनीतिक और सांस्कृतिक सेतु है। ऊर्जा सुरक्षा, बाजार, आतंकवाद विरोधी सहयोग, अफगानिस्तान, परिवहन गलियारे और सांस्कृतिक कूटनीति—सभी दृष्टियों से यह क्षेत्र भारत के लिए महत्त्वपूर्ण है।
इन पाँच मध्य एशियाई गणराज्यों में उज़्बेकिस्तान की स्थिति विशेष है। उसकी जनसंख्या, भौगोलिक केंद्रीयता, ऐतिहासिक विरासत और क्षेत्रीय राजनीतिक प्रभाव उसे भारत के लिए स्वाभाविक साझेदार बनाते हैं।
इस यात्रा के बाद प्रधानमंत्री मोदी ताशकंद से बिश्केक जाएंगे, जहाँ वे 31 अगस्त को होने वाले 26वें शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन में भाग लेंगे। वहाँ भारत की प्राथमिकताओं—सुरक्षा, कनेक्टिविटी और अवसर—को सामने रखने की योजना है। इस प्रकार ताशकंद की द्विपक्षीय यात्रा और बिश्केक का बहुपक्षीय संवाद भारत की व्यापक मध्य एशिया नीति के दो परस्पर जुड़े हुए आयाम हैं।
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