Wednesday, 5 May 2010

अमरकांत के कथा साहित्य में मूल्य बोध/amerkant

 अमरकांत के कथा साहित्य में मूल्य बोध :-
      जैसे-जैसे समय बदल रहा है वैसे-वैसे सामाजिक मुल्यों में गिरावट आ रही है। अर्थ केन्द्रित सामाजिक व्यवस्था में नैतिकता का धीरे-धीरे पतन होता जा रहा है। व्यक्ति विशेष के लिए भौतिक सुखों को भोगना ही सबसे महत्वपूर्ण हो गया है। आदमी पूरी तरह से आत्मकेन्द्रित हो गया है। नैतिकता और आदर्श उसे सिर्फ तब याद आता है जब वह खुद घोर परेशानी हो, अन्यथा मौका मिलने पर हर व्यक्ति अपनी यथा स्थिति को सामने रख ही देता है।
      आदमी के अंदर का खोखलापन, उसका दोहरा चरित्र, उसकी संवेदनाओं में गिरावट और भौतिकता की अंधी दौड़ में समस्त मानवीय मूल्यों में बिखराव समाज की सबसे बड़ी विडंबना है। अमरकांत ने अपने कथा साहित्य के माध्यम से समाज के इसी गिरते स्तर को चित्रित किया है। अमरकांत के कथा साहित्य में मूल्यों की जो गिरावट दिखायी पड़ती है उसके र्क कारण हैं। एक वर्ग विशेष के लिए निर्धारित मापदंड, आर्थिक परिस्थितियाँ, मानसिक विकृति, मन के अंदर निहित क्षोभ और घृणा, चरित्र की कायरता और दोगलापन, वर्तमान परिस्थितियों से मोहभंग और आधुनिकता और फैशन के नाम पर परंपराअें से घृणा जैसी कितनी ही बाते हैं जिन्हें अमरकांत सामाजिक मूल्यों में गिरावट का कारण मानते हैं।
      'सूख जीवी` उपन्यास का नायक दीपक विवाहित होने के बावजूद रेखा से प्रेम का ढ़ोग करते हुए उसके साथ शारीरिक संबंध स्थापित करता है। जब यह बात उसकी पत्नी जान जाती है तो वह नाटकीय रूप से अपना बचाव करते हुए रेखा को ही बदचलन साबित करने की कोशिश करता है। दीपक नैतिक रूप से गिरा हुआ इंसान है। उसके जीवन में मूल्यों के लिए कोई स्थान नहीं है। अगर उसके लिए कुछ महत्वपूर्ण है तो केवल अपना सुख।
      'आकाश पक्षी` उपन्यास की हेमा, रवि की बातों से प्रभावित होती है। मेहनत और लगन से अपनी जीवन संबंधी दृष्टि को बदलना चाहती है। पर इन नवीन मानवीय मूल्यों से उसके माता-पिता कोई इत्तफ़ाक नहीं रखते हैं। वे अपनी वर्तमान स्थिति को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं है और जात-पात, ऊँच-नीच और अमीर-गरीब के अंतर को तर्कसंगत मानते हुए रवि से हेमा के विवाह के प्रस्ताव को ठुकरा देते है। लेकिन अपने जीवन यापन की चिंता में वे हेमा की बलि देने से भी नहीं कतराते। एक अधेड़ उम्र के रई व्यक्ति से हेमा का विवाह करा देते हैं। इस तरह सामाजिक मान्यताओं की आड़ में हेमा के माता-पिता अपना स्वार्थ सिद्ध करते हैं। सड़ी-गली सामाजिक रूढ़ियाँ और आर्थिक विवशता आदमी को कितना संवेदनहीन बना सकता है, इसे हेमा के माता-पिता के माध्यम से समझा जा सकता है।
      'सुन्नर पाडे की पतोह` उपन्यास में सास-ससुर मिलकर बहू को परेशान करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। सास को यह डर रहता है कि विवाह के बाद अगर बेटे-बहू का मेल हो गया तो लड़का उसके हाँथ से निकल जायेगा। अत: वह बेटे-बहू को एक साथ न रहने देती। पर किसी तरह जब दोनों का मिलन हो गया तो वह हर बात में उन्हें ताना मारती। बेटे के घर से भाग जाने के बाद वह अपने पति को प्रेरित करती है कि वह बहू के साथ शारीरिक सुख उठाये। अपनी बहू के प्रति घृणा से भरी सास किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार रहती है। पवित्र संबंधो के बीच कटुता किस तरह संबंधो के सारे मायने बदल देती है, इसे इस उपन्यास के माध्यम से समझा जा सकता है। मानवीय संवेदनाओं का पतन ही ऐसी मानसिकता का कारण है।
      ''काले-उजले दिन` का नायक शौतेली माँ द्वारा खूब सताया जाता है। विवाह के बाद उसकी रही सही उम्मीद भी चकना चूर हो जाती है। वो किस तरह की पत्नी चाहता था, उसे वह नहीं मिली थी, यद्यपि पत्नी में समर्पण और प्रेम की निष्ठा थी। वह इसी क्षोभ और घृणा से जूझते हुए रजनी से प्रेम करता है। उसके मन को हमेशा यह बात सालती रहती है कि कहीं वह अपनी पत्नी को धोखा तो नहीं दे रहा? पर नियति के हाँथो वह मजबूर विचित्र मानसिकता में जीता रहता है। बीमारी और मानसिक पीड़ा के चलते पत्नी की मृत्यु के बाद वह रजनी से विवाह कर लेता है पर मन के किसी कोने में पत्नी को लेकर उसकी पीड़ा बनी रहती है।
      ''लहरें `` उपन्यास का नायक मोहल्ले की स्त्रियों को देखकर अजीब तरह की भाव-भंगिमा बनाता और उन्हें घूरता। ऐसा करते हुए वह अपनी छवि एक आधुनिक मनचले युवक के रूप में बनाना चाहता है। पत्नी जब उसके अनुरूप ढलने की कोशिश करती है तो वह उस पर आशंका व्यक्त करता है। इस तरह की सोच और दृष्टि व्यक्ति के अंदर निहित कुंठाओं और नैतिक पतन का प्रतीक है।
      इसी तरह अमरकांत ने अपने उपन्यास 'इन्हीं हथियारों` के माध्यम से भी सामाजिक जीवन में आयी गिरावट को बड़ी ही गहराई के साथ चित्रित किया है। 'सदाशयव्रत` जैसे पात्रों के माध्यम से लेखक ने चरित्र का उत्कर्ष दिखाया है तो दूसरी तरफ भोलाराम जैसे लोग हैं जो पैसों के लिए सब कुछ करने की हिम्मत रखते हैं। उपन्यास की पात्र ढेला पेशे से वेश्या है। पर उसकी भी कोई पसंद या नापसंद हो या संभव नहीं है। उसके यहॉ जो भी ग्राहक के रूप में आ जाये उसे उसकी सेवा करनी ही है। अगर कभी वह मना करती तो मॉ उसे ऐसा कहने से मना करती है। मॉ के ऊपर चिढ़कर वह अपनी मॉ से कहती है कि, ''तुम हो पक्की लालची। तुम्हें कायदा, अच्छा-बुरा, सेहत-तन्दुरूस्ती, किसी का कुछ भी ख्याल नहीं। तुम किसी को आराम करते देख नहीं सकती। एक ढेबुला के लिए तुम किसी की भी जान ले सकती हो। इसी लालच की वजह से अच्छा खाना-पीना भी नहीं मयस्सर हो रहा है।``35 ढेला की मनोदशा उसके इस संवाद से समझा जा सकता है। मगर मॉ श्यामदासी जीवन की गहरी समझ रखती है। उसे मालूम है कि वैचारिक मूल्यों से कहीं अधिक आवश्यकता एक वेश्या को अपने शरीर की बाजारू 'कीमत` से है। वह 'मूल्यों` और 'किमत` के इस फर्क को समझती है। इसीलिए वह कहती है कि, ''.....यहॉ रंडी के पेशे में कोई फायदा थोड़े ही है, दोनों जून की रोटी-दाल चल जाती है, यही बहुत समझो।.... गँवार, छोटे दिलवालों के इस शहर में गाने-बजाने का खयाल भूलकर भी दिल में न लाना, नहीं तो भूखों मरोगी ही, हम सभी की हालत वैसी ही हो जाएगी।``36 इसी तरह स्पष्ट करने की कोशिश की है कि व्यक्ति की आर्थिक परिस्थितियों, उसका व्यवसाय और उसकी लालसा किस तरह उसके जीवन में नैतिक पतन का कारण बनता है। लेकिन कई लोग ऐसे भी होते हैं जो विपरीत परिस्थितियों के बावजूद भी अपने आदर्शो से मुँह नहीं मोड़ते। अपने चरित्र की पवित्रता वे बनाये रखते हैं।
      अमरकांत के उपन्यासों की ही तरह उनकी कहानियों में की मूल्य बोध से संबंधित अनेकों महत्वपूर्ण प्रसंगों का चित्रण है। 'गले की जंजीर` कहानी के नायक की समस्या पर सभी सलाह देते हैं पर इन सभी सलाहों के केन्द्र में उसकी समस्या का हल किसी भी तरह दिखायी नहीं पड़ता। इसलिए अपनी समस्याओं पर खुद निर्णय लेना ही अधिक श्रेष्ठकर होता है। 'गगन बिहारी` कहानी का नायक सिर्फ योजनाएँ ही बनाते रहता है, कभी कुछ कर नहीं पाता। इसलिए जीवन का लक्ष्य निर्धारित करके उसके अनुरूप ही कर्म करने वाली बात यहाँ इस कहानी के माध्यम से अमरकांत सामने लाते हैं।
      'शक्तिशाली` कहानी का नायम नरेन्द्र पड़ोसी भोलाराम से लड़ने की हिम्मत जुटा नहीं पाता। पर पत्नी की बार-बार की जानेवाली शिकायत के आगे वह अपनी कमजोरी बतलाना या जताना नहीं चाहता, इसलिए वह आदर्श और नैतिकता का आवरण लोढ़ लेता है। वह पत्नी से कहता है कि, ''....हमारी कमजोरी यह है कि हम दूसरों की असुविधा का ख्याल नहीं करते....।``37 इसी तरह जब नरेन्द्र के बच्चे की पड़ोसी ने पिटायी की तो भी वह पत्नी से कहता है कि, ''....मैं हमेशा खरी बात कहता हूँ, किसी को बुरी लगे या अच्छी, इसकी मुझे परवाह नहीं। मैं अक्सर देखता हॅँ कि सुरेन्द्र लड़कों से मार-पीट करता रहता है....।``38 नरेन्द्र अपनी कमजोरी को नैतिक आचरण शक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है।
      'कलाप्रेमी` कहानी के माध्यम से अमरकांत ने यही बतलाने का प्रयास किया है कि इस बाजारवादी दुनिया में बाजार से जुड़ना ही प्रमुख गुण है। फिर इसके लिए जो भी करना पड़े वह करना चाहिए। जो नहीं करना वह गुमनामी में जीता और कुंठित होते रहता है। समुर वक्त के साथ चलता है इसलिए धीरे-धीरे उसकी पहचान बन रही है। जबकि सुबोध राम जैसे लोग गुमनामी में कुंठित होते रहते हैं।
      'उनका जाना और आना` आज की पढ़ी लिखी और कामयाब पीढ़ी की उस मानसिकता को दर्शाती है जो अपने माता-पिता को वह सम्मान नहीं देना चाहते जिसके वे अधिकारी हैं। क्योंकि पुरानी परंपराओं और विचारधाराओं से जुड़े मॉ-बाप आधुनिक जीवन शैली के कहीं 'फिट` ही नहीं होते। शायद इसी कारण गोपालदास अपने डॉक्टर लड़के की लड़की की शादी में उपस्थित तो रहे पर उनकी उपस्थिति पूरी शादी में कहीं अनिवार्य रूप में महसूस नहीं की गयी। ना ही उन्हें किसी में यह एहशास कराना चाहा कि उनकी उपस्थिति कितनी महत्वर्पूा है?
      'रिश्ता` कहानी जीवन के उदात्त आदर्श के स्वरूप को दिखलाती है। नईम, निरूपमा को बहुत प्यार करता है। पर उसके परिवार के एटशासानों और सामाजिक स्थिति को समझते हुए वह निरूपमा के साथ पवित्र संबंध की मर्यादा और भाव को अपनाता है। जीवन में खुद कामयाब होकर, एक आई.ए.एस. से निरूपमा की शादी भी करवाता है। नईम के माध्यम से उच्च चरित्र और आदर्शो वाले नायम का स्वरूप अमरकांत सामने लाते हैं।
      'हंगामा` कहानी एक ऐसी स्त्री की कहानी है जो अपने जीवन में बच्चों के लिए तरसती है। पर उसे मातृत्व का सुख नहीं मिल पाता है। वह अंदर ही अंदर इस सुख से वंचित होने के कारण परेशान रहती है। वह मोहल्ले की औरतों से कहती फिरती कि, ''ए बहिन जी, दो-ढाई साल हो गये श्रीवास्तवजी के साथ रहते हुए। अब हमें बच्चा न होगा क्या? कल मेडिकल कालेज जायेंगे, जितना लगेगा लगायेंगे, भले लड़का न हो, भगवान लूली-लंगडी ही दे दे....।``39 लेकिन उसके ीवन का यह अभाव बरकरार रहता है। इसी बीच उसके घर के पास एक कुतिया ने चार पिल्लों को जन्म दिया। अब वह इन कुत्ते बच्चों को ही 'राजा बेटा` कहकर उन्हें दूध पिलाती थी।  जल्द ही मोहल्ले के लावारिस गायों, गदहों और कुत्तों से उसे गहरा लगाव हो गया। स्पष्ट है कि अपने जीवन के अभाव और मातृत्व के लिए लालायित हृदय के प्रेम और स्नेह को उड़ेलने के लिए उसे इससे अच्छा बहाना नहीं मिल सकता था।
      'शाम के घिरते अँधेरे मे भटकता नौजवान` एक ऐसे नौजवान की कहानी है जो वर्तमान शिक्षा प्रणाली के बदलते स्तर, महंगी होती तकनीकी उच्च शिक्षा से जूझ रहा है। पारिवारिक समस्याएँ उसे कमाने की जरूरतों की तरफ खींचती हैं तो आगे बढ़ने के लिए उसकी खुद की शिक्षा का जारी रहना भी महत्वपूर्ण है। अपने और परिवार के सपनों के बीच वह झूलता हुआ सा महसूस होता है। ऐसा कई बार होता है कि आदमी की पारिवारिक परिस्थितियाँ उसके अपने सपनों के आड़े आ जाती है। इस स्थिति की निराशा और हताशा आदमी को मोहभंग की मानसिकता में बाँध देती हैं।
      'हार` कहानी के केन्द्र में बृजबिहारी बाबू हैं। वे हमेशा गुस्से में और व्यवस्था के प्रति आक्रोशग्रस्त रहते हैं। दोस्तोऱ्यारों के बीच होनेवाली बहसों में वे बढ़कर भाग लेते और हारने के लिए किसी भी तरह तैयार न होते। लेकिन एक दिन निर्मल बाबू के साथ शादी-विवाह और दहेज को लेकर लंबी-चौड़ी बहस के बाद, जब निर्मल बाबू बिना दहेज के उनकी पुत्री से अपने पुत्र के विवाह की बात करते हैं तो उन्हें यकीन ही नहीं होता। वे कहते हैं कि, ''अब छोड़िये... इस तरह की पाखण्ड भरी बात सुनने का मैं आदी नहीं हूँ।``40 लेकिन विवाह तँय हो जाता है। विवाह पूरी सादगी के साथ बिना दहेज के संपन्न भी होता है। लेकिन, यह सब देखकर बृजबिहारी बाबू की आँखेे डबडबा जाती हैं। आज की इस स्वार्थी और दहेज लोलुप समाज में बृजबिहारी बाबू ने कल्पना भी नहीं की थी कि उनकी लड़की का विवाह इस तरह हो जायेगा। आज वे निर्मल बाबू से हार गये थे। पर इस हार ने उन्हें समाज की इच्छाइयों और इसके नैतिक स्वरूप के प्रति पुन: निष्ठावान बना दिया।  
      इस तरह अमरकांत के कथा साहित्य की संक्षिप्त विवेचना के बाद हम यह स्पष्ट रूप से कह सकते हैं कि अमरकांत ने अपने साहित्य के माध्यम से समाज में व्याप्त मोहभंग, परिस्थिति गत व्यावहारिक जटिलता, आंतरिक घृणा और कुंठा, आधुनिक जीवन शैली से परंपराओं का संघर्ष, व्यक्ति अंदर निहित कायरता पर आदर्शो का आवरा और ऐसे ही कई अन्य संदर्भो के माध्यम से सामाजिक जीवन में हो रहे नैतिक पतन, संबंधों के बदलते अर्थ आधुनिक जीवन की निराशा, और कुंठाओं को बखुबी चित्रित करते है। साथ ही साथ अमरकांत के यहाँ कई ऐसे पात्र भी हैं जिनका नैतिक स्तर, ऊँचा आदर्श और जीवन संबंधी उनकी दृष्टि प्रतिकूल परिस्थितियों में भी टूटने या बिखरने के लिए बिलकुल भी तैयार नहीं है। ऐसे पात्र अपनी नैतिक और सामाजिक दायित्वों के प्रति सजग हैं। इस तरह दोनों ही तरह की स्थितियाँ अमरकांत के कथा साहित्य में मिलती हैं। पर टूटते और बिखरते हुए जीवन मूल्यों से संबंधित चित्रण अधिक है। 
 
 

हमारे तिरंगे का इतिहास


हमारे तिरंगे का इतिहास



 
 
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The flag that was first hoisted on August 7, 1906,
at the Parsee Bagan Square in Calcutta.
 
 
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Called the 'Saptarishi Flag', this was hoisted in Stuttgart
at the International Socialist Congress held on August 22, 1907.
 
 
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Associated with the names of Dr. Annie Besant and
Lokmanya Tilak, this flag was hoisted at
the Congress session in Calcutta during the
'Home Rule Movement'.
 
 
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In the year 1921, a young man from Andhra presented
this flag to Gandhiji for approval. It was only after
Gandhiji's suggestion that the white strip and
the charkha were added.
 
 
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This flag was suggested during the All India Congress
Committee session in 1931. However, the Committee's
suggestion was not approved.
 
 
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On August 6, 1931, the Indian National Congress
formally adopted this flag, which was first hoisted
on August 31.
 
 
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Our National Flag, which was born on July 22, 1947,
with Nehruji's words, "Now I present to you not only the Resolution,
but the Flag itself". This flag was first hoisted at the Council House
on August 15, 1947.
 
 
The man who designed Tiranga versatile genius Lt. Shri Pingali Venkayya.
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Lt .Shri Pingali Venkayya
 
India's flag is a tricolor standard, with bands of saffron, white, and dark green. The    saffron represents courage, sacrifice, patriotism, and renunciation. It is also the color of the Hindu people. The green stands for faith, fertility and the land; it is the color of the Islam religion. The white is in the center, symbolizing the hope for unity and peace. In the center of the white band is a blue wheel with 24 spokes. This is the Ashoka Chakra (or "Wheel of Law"). The Chakra represents the continuing progress of the nation and the importance of justice in life. It also appears on the Sarnath Lion Capital of Ashoka " .
 
जय  हिंद जय  भारत
 
 


 
 

कैसे हो ?

प्यार में अनुनय ,

आवाज में अनुनय ,

पर अहसास से अनुनय,

कैसे हो ;

अधिकार की सीमा ,

ऐतराज की सीमा ,

पर प्यार की सीमा,

कैसे हो ;

हालात से समझौता ,

वारदात से समझौता ,

पर दिल का समझौता ,

कैसे हो ;

राह न भुला ,

चाह न भुला ,

पर विश्वास को भुला ,

कैसे हो ?

Tuesday, 4 May 2010

विरल विरल सा मन है मेरा,

विरल विरल सा मन है मेरा,

ना गम ना खुशियों का फेरा ,

विरल विरल सा मन है मेरा,

विरक्त हूँ भावों से कुछ कुछ ,

विभक्त हूँ अभावों से कुछ कुछ ,

पर मन में संताप नहीं है ,

और हरियाली का भास नहीं है ;

बोझिल है हैं विचार भी मेरे ,

खाली खाली से हैं व्यवहार भी मेरे ,

विरल विरल सा मन है मेरा,

ना गम ना खुशियों का फेरा ,
विरल विरल सा मन है मेरा,

Saturday, 1 May 2010

हम ने इन्हें किया सम्मानित

विजय पंडित कल्याण के ''अभिमान ''

      

Friday, 30 April 2010

बिस्तर की सलवटें तलाशती है ,

बिस्तर की सलवटें तलाशती हैं ,
मै याद नहीं करता मेरी साँसे पुकारती हैं ;
बिस्तर की सलवटें तलाशती हैं ,
नीद में बाहें भीचना चाहती है बदन कोई ,
अधखुली आखें अधजगा सा मन ढूढता बगल में कोई ;
सुबह जल्द अब भी जग जाता हूँ मै ,
दिल चाहता है मचल के लग जाये सिने से कोई ;
मै याद नहीं करता खुश हूँ अपनी रातों से ,
बिस्तर की सलवटें तलाशती है ,
मै याद नहीं करता मेरी साँसे पुकारती हैं ;
उजलाती भोर की किरणों में कुछ पिघले पलों की खुसबू चली आती है ,
तड़पती धड़कने अपनी प्यास को सिने में दबा जाती है ;
अनजाने ही हाथ बड़ते हैं हाथों में भरने को वो गुदाज बदन ,
कानो को याद आती है तेरे ओठों की नमी और चूड़ी की खन खन ;
मै याद नहीं करता करवट बदल सो जाता हूँ ,
बिस्तर की सलवटें तलाशती है ,
मै याद नहीं करता मेरी साँसे पुकारती हैं
;
मेरे ओठों को उन ओठों का उतावलापन याद आती है ,
चेहरे पे उन उफनती सांसों की दहक अब भी कौंध जाती है ;
चाय पिने से पहले अक्सर तेरे मुंह की मिठास भर आती है मुंह में ,
भर आता है तेरे बदन का नमक तन मन में ;
चुमते बदन के भावों से तड़प उठता है कण कण ,
मुंह खुल जाता है पिने को तेरा पुरजोर बदन ;
पर मै खुश हूँ अपनी राहों में ,
याद नहीं करता पर बसता है तू ही अब भी निगाहों में ;
बहुदा चाय बनाते मेरी बाहें भर लेती है बाहों में खुद को ;
बिस्तर की सलवटें तलाशती है ,
मै याद नहीं करता मेरी साँसे पुकारती हैं ;
दीवाल जहाँ तू सट के खड़ी होती थी ;
जहाँ मेरे चुमते वक़्त तेरी पीठ रही होती थी ;
सुनी सुनी सी तेरी राह तकती है ,
बिस्तर का कोना जहाँ तू बैठती और मै सहेजता बदन तेरा ,
रूठा रहता है ,सलवटों से सजा रहता है ,
सुना दर्पण ढूढता है वो हंसी चेहरा बड़ी हसरत से ,
सुना आँगन भी राह तकता है अब भी बड़ी गैरत से ;
बिस्तर की सलवटें तलाशती है ,
मै याद नहीं करता मेरी साँसे पुकारती हैं ;
   

अमरकांत के कथा साहित्य में युग बोध /amerkant

अमरकांत के कथा साहित्य में युग बोध :-




अपने समय के समाज को अमरकांत ने बड़ी ही गहराई के साथ अपने कथा साहित्य में चित्रित किया है। युग विशेष की सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक परिस्थिति को पूरी ईमानदारी और निष्ठा के साथ यथार्थ की ठोस भूमि पर चित्रित करना कोई आसान काम नहीं है। समय परिवर्तनशील है। युगीन परिस्थितियाँ हमेशा एक सी नहीं रहती। युग बदलने के साथ-साथ किसी समाज विशेष की परिस्थितियाँ भी बदल जाती है। इसलिए जिस रचनाकार के पास संवेदनाओं को गहराई से समझने और उसे विश्लेषित करने की समझ नहीं होगी, उसका साहित्य कभी भी कालजयी नहीं हो सकता। अमरकांत का कथा साहित्य अपने समय की वास्तविक तस्वीर पेश करता है, इसमें कोई संदेह नहीं है।



विद्वानों के बीच अमरकांत की रचनाओं को उसकी विश्वसनियता और गहरी संवेदनशीलता के कारण ही सराहा गया है। डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी अमरकांत के कथा साहित्य के संदर्भ में लिखते हैं कि, ''अमरकांत का रचना संसार महान रचनाकारों के रचना संसारों जैसा विश्वसनीय है। उस विश्वसनीयता का कारण है स्थितियों का अचूक चित्रण जिससे व्यंग्य और मार्मिकता का जन्म होता है।``1 आज की पूँजीवादी व्यवस्था में आदमी कितना आत्मकेन्द्रित, संवेदनाहीन, मतलबी और स्वयं की इच्छाओं तक सिकुड़कर रह गया है, इसे अमरकांत के कथासाहित्य से आसानी से समझा जा सकता है।
                                                                                                                              


अमरकांत ने अपने कथा साहित्य में मुख्य रूप से मध्यवर्गीय और निम्न मध्यवर्गीय समाज का चित्रण किया है। पर ऐसा नहीं है कि उच्चवर्ग को केन्द्र में रखकर अमरकांत ने साहित्य नहीं रचा। यह अवश्य है कि जितने विस्तार और गहराई के साथ अमरकांत ने मध्यवर्गीय और निम्न मध्यवर्गीय समाज को चित्रित किया है उतनी गहराई और विस्तार उच्चवर्ग को लेकर उनके साहित्य में नहीं मिलता। 'आकाश पक्षी` जैसा उपन्यास इसी उच्च वर्गीय समाज की मानसिकता को केन्द्र में रखकर लिखा गया है। ठीक इसी तरह सामाजिक रूप से प्रतिष्ठित और संपन्न लोगों की मानसिकता और व्यवहार को केन्द्र में रखकर अमरकांत ने कई कहानियाँ लिखी हैं। पलाश के फूल, दोस्त का गम, आमंत्रण, जन्मकुण्डली और श्वान गाथा जैसी कितनी ही कहानियाँ हैं जहाँ समाज के उच्च वर्ग की मानसिकता तथा विचार और व्यवहार के अंतर को अमरकांत ने चित्रित किया है। साथ ही साथ हमें यह भी समझना होगा कि जब हम यह कहते हैं कि अमरकांत मध्यवर्गीय और निम्नमध्यवर्गीय समाज की विसंगतियों, अभावों और शोषण को चित्रित चित्रित करने वले कथाकार हैं तो हमें यह भी समझना चाहिए कि शोषक और शोषित इन दोनों की स्थितियों का चित्रण किये बिना कोई कथाकार शोषण की तस्वीर किस तरह प्रस्तुत कर सकता है। इसलिए यह कहना सही नहीं लगता कि अमरकांत ने अपने कथा साहित्य के माध्यम से सिर्फ और सिर्फ निम्न मध्यवर्गीय और मध्यवर्गीय समाज का चित्रण किया।



वास्तविकता यह है कि अमरकांत ने उच्चवर्ग की अपेक्षा मध्यवर्गीय और निम्न मध्यवर्गीय समाज का चित्रण अपने साहित्य में अधिक किया है। साथ ही साथ उन्होंने अपने कथा साहित्य के माध्यम से यह भी दिखाने का प्रयास किया है कि शोषण सिर्फ उच्चवर्ग द्वारा निम्नवर्ग या संपन्न द्वारा विपन्न का ही नहीं अपितु एक विपन्न भी अपने जैसे दूसरे व्यक्ति का शोषण करने में बिलकुल नहीं हिचकता। अमरकांत ने 'मूस` जैसी कहानी के माध्यम से यह दिखाया कि पुरूषप्रधान भारतीय समाज में 'मूस` जैसे पुरूष भी हैं जिनका अपना कोई अस्तित्व नहीं है। 'सुन्नर पांडे की पतोह` उपन्यास के माध्यम से अमरकांत ने भारतिय समाज के कई ऐसे भद्दे और नग्न यथार्थ को सामने लाया जो परंपरा और संस्कृति तथा आदर्शो के नाम पर हमेशा ही समाज में दबाये जाते रहे है। जिस घर में ससुर खुद अपनी बेटी की उम्रवाली बहू का शीलभंग करना चाहे और उसका मनोबल उसकी ही धर्मपत्नी बढ़ाये तो ऐसे घर की बहू कौन सी परंपरा और संस्कृति के भरोसे अपने आप को सुरक्षित समझ सकती है और कैसे?



स्पष्ट है कि अमरकांत के विचारों का दायरा संकुचित नहीं है अपितु संकुचित मानसिकता के साथ उनके कथा साहित्य पर विचार करना उचित प्रतीत नहीं होता। साथ ही साथ अमरकांत के संबंध में बात करते अथवा लिखते समय हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि अमरकांत की लेखनी लगातार साहित्य रचने का कार्य कर रही है। पिछले 50-60 वर्षों से अमरकांत का लेखन कार्य सतत जारी है। इसलिए किसी समीक्षक या विद्वान ने आज से 25-30 वर्ष पूर्व उनके रचना संसार के संबंध में जो कुछ कहा या समझा वह अमरकांत के तब तक के उपलबध साहित्य के आधार पर था। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि अमरकांत के पूरे कथा साहित्य को लेकर उस पर नयी समीक्षा दृष्टि प्रस्तुत की जाय।



अमरकांत का कथा साहित्य बड़ा व्यापक और लगातार अपनी वृद्धि कर रहा है। 'सुरंग` और 'इन्हीं हथियारों से` जैसे उपन्यासों में अमरकांत की बदली हुई विचारधारा का स्पष्ट संकेत हमें मिलता है। सन 1977 में 'अमरकांत वर्ष 01` नामक पुस्तक का प्रकाशन अमरकांत का नये सिरे से मूल्यांकन करने के उद्देश्य से हुआ। इस संबंध में रवीन्द्र कालिया ने लिखा भी कि, ''अमरकांत का नये सिरे से मूल्यांकन करने के पीछे हमारा एक प्रयोेजन रहा है। वास्तव में नयी कहानी की आन्दोलनगत उत्तेजना समाप्त हो जाने के बाद हमें अमरकांत का मूल्यांकन और अध्ययन अधिक प्रासंगिक लगा। विजयमोहन सिंह का यह कथन कुछ लोगों को अतिशयोक्तिपूर्ण लग सकता है कि 'अमरकांत की कहानियाँ नयी हिन्दी समीक्षा के लिए एक नया मानदण्ड बनाने की माँग करती हैं, जैसी माँग कभी मुक्तिबोध की कविताओं ने की थी` परन्तु यह सच है कि अमरकांत की चर्चा उस रूप में, उस माहौल में, उन मानदण्डों से संभव ही नहीं थी। ये मानदण्ड वास्तव में तत्कालीन लेखकों-समीक्षकों की महत्वाकांक्षाओं के अन्तर्विरोध के रूप में विकसित हुए थे।``2 अब विचारणीय यह है कि सन् 1977 तक उपलब्ध और लिखे गये अमरकांत के साहित्य के आधार पर जो कुछ बातें सामने आयी वे 2007 तक के अमरकांत के रचे गये साहित्य के आधार पर कहीं-कहीं खटकने लगी है।



उदाहरण के तौर पर 'इन्हीं हथियारों से` उपन्यास के प्रकाशन के बाद कुछ समीक्षक अमरकांत को महाकाव्यात्मक गरिमा वाले उपन्यासकारों की श्रेणी में गिनने लगे है। वेद प्रकाश जी अपने लेख 'स्वाधीनता का जनतान्त्रिक विचार` में प्रश्न करते हैं कि, ''.....व्यास और महाभारत एक युग की देन थे, अमरकांत और उनका यह उपन्यास दूसरे गुक की देन हैं। क्या हमारे युग का महाकाव्य ऐसा ही नहीं होगा?``3 इसलिए अब जब हमारे सामने अमरकांत के कथा साहित्य में युग बोध का प्रश्न उठेगा तो हमें नि:संकोच यह स्वीकार करना पड़ेगा कि अमरकांत ने अपने समय को उसकी पूरी परिधि में न केवल चित्रित किया है अपितु समाज के सामने कुछ ऐसे प्रश्न भी खडे किये हैं जो मानवीय संवेदनाओं को झकझोर कर रख देती हैं।



समग्र रूप से अमरकांत के कथा साहित्य में युग बोध के संदर्भ में हम यही कह सकते है कि पिछले 50-60 वर्षो को तोडा है और विचारों तथा संवेदनाओं के नए स्वरूप को हमारे सामने लाया है। इससे स्पष्ट है कि अमरकांत अपने युग के सामाजिक यथार्थ को प्रगतिशील दृष्टि और आस्था के साथ लगातार चित्रित कर रहे है। यह बात निम्नलिखित बिंदुओं के विवेचन से और अधिक स्पष्ट हो जायेगी।
     

निकलती नहीं खुसबू तेरी सांसों की मन से ,

निकलती नहीं खुसबू तेरी सांसों की मन से ,

खिलती नहीं आखें बिना तेरे तन के ;

डूबा रहता हूँ सपनों में मिलन की घड़ियों का ;

पर तू मिलता नहीं कभी बिना उलझाव और अनबन के ;

कभी तो कहा कर प्यार बिना अहसान के ;

कभी तो मान अपना अधूरापन बिना मेरी प्यास के ;

खुद का मान तुझे मेरी मोहब्बत से प्यारा है ;

ऐ जिंदगी मैंने किसपे अपनी मोहब्बत को वारा है /

Thursday, 29 April 2010

मोहब्बत की जुदाई में भी एक सुकूँ है दिले दिलदार से पूंछो ,

मोहब्बत की जुदाई में भी एक सुकूँ है दिले दिलदार से पूंछो ,

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मोहब्बत की तड़पन में छुपा इक जुनूं है किसी आफताब से पूँछों ;

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चाहते तमन्ना में उम्र गुजर जाये भी तो कम है ,

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इन्तजारे इश्क भी एक खुदाई है अपने प्यार से पूँछों /

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बबूल के पेड़ से छावं का कयास है ;

बबूल के पेड़ से छावं का कयास है ;
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मोहब्बत की यादों से निज़ात की आस है ;
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उनसे मिलने को बेकरार दिल तो है ,
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कौनसा रंग पहनायुं जनाजे इश्क को रंग की तलाश है /
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Tuesday, 27 April 2010

अचानक एक दिन तुने मोहब्बत से इंकार कर दिया ,

अचानक एक दिन तुने मोहब्बत से इंकार कर दिया ,
प्यार की राह में मेरी मोहब्बत को गुनाहगार कर दिया ;
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दौड़ के मिलते थे जों भरे भावों के साथ ,
मुफलिसी की आहट पे पहचानने से इंकार कर दिया /
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अरमानो की दुनिया सजा लिपट जाते थे जों देख कर मुझको तनहा ,
बदले मौसम में मेरी तड़प से खुद को बेपरवाह कर लिया /
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HINDI NOVEL -काले उजले दिन BY AMERKANT

काले उजले दिन :-


163 पृष्ठों के इस उपन्यास का प्रकाशन सन् 2003 से 'राजकमल प्रकाशन` द्वारा हुआ। इस उपन्यास पर अपनी समीक्षा प्रस्तुत करते हुए कमलाप्रसाद पाण्डेय जी लिखते हैं कि, 'काले उजले दिन` आत्मकथात्मक कहानी है। उसका नायक खुद अपने विकास को दुहराता है। वह विमाता की ईर्ष्या और पिता की विमाता द्वारा संचालित कुटिलता के बीच में पलता है। वह देखता है कि विमाता का पुत्र अशोक सम्पन्नता में जीता है और वह दीनता में। प्यार का अभाव उसकी कुण्ठा बनती है। वह अपने पारिवारिक ममताहीन जीवन से छूटना चाहता है और इसी क्रम मंे उसे क्रान्तिकारी वासुदेव सिंह अच्छे लगे। बाद में मामा के घर की याद आई, विवाह में स्त्री से प्यार की आकांक्षा की - पर सब कुछ परम्परा के भीतर होने से औपचारिक बना रहा। सामन्ती आचार में जिंदगी पिसती रही। नायक प्यार के लिए तड़पता रहा, कान्ति पत्नी ने उसे आदर श्रद्धा और यहाँ तक कि जिन्दगी का उत्सर्ग उसके लिये किया, पर उसमें प्यार की क्षमता नहीं थी। प्यार मिला समानधर्मी रजनी में। अत: पत्नी कांति और प्रेयसी रजनी। नामक के कान्ति और रजीनक े बीच व्यक्तित्व का अनुभवाधीन सहज विकास होता रहा। मानसिक धरातल में ही नहीं, संघर्ष यथार्थ की जमीन में झेला गया।30

कमलाप्रसाद जी का उपर्युक्त मंतव्य इस उपन्यास के संदर्भ में एकदम सटीक है। हमारे समाज में जो परिवर्तन होते हैं, जो असंगतियाँ रह जाती हैं, वे किसी न किसी रूप में समाज के हर व्यक्ति को प्रभावित करती हैं। सामाजिक मान्यताओं और आदर्शों के बीच यथार्थ की जमीन अलग होती है। इस भूमि पर संघर्षरत व्यक्ति अपनी इच्छओं के अनुरूप चाह कर भी नहीं जी पाता। ऐसे में वह सही-गलत की परिभाषा को अपने तरीके से व्याख्यायित करने का प्रयत्न करता है। किन्तु व्यक्ति और समाज के बीच संघर्ष निरंतर होते हुए भी 'व्यक्ति` की उम्र समाज की तुलना में बहुत कम होती है। अमरकांत ने इस उपन्यास के माध्यम से व्यक्ति, समाज और परिवर्तन के त्रिकोण में निहित द्वंद्व की वेदना को बड़े ही कलात्मक तरीके से प्रस्तुत किया है। इस उपन्यास की समस्या किसी काल विशेष की न होकर शाश्वत रूप में व्यक्ति और समाज के बीच होने वाले संघर्ष की समस्या है।

हम अपने जीवनम ें जो भी पाते है, जो भी अनुभव करते हैं, उन्हीं से हमारा व्यक्तित्व लगता है। फिर यही व्यक्तित्व समाज में अपनी सशक्तता के आधार उन मूल्यों को उखाड फेकना चहता है जो उसके अपने अनुभव से समाज के लिए घातक हैं। पर व्यक्ति-व्यक्ति का अपना अलग दायरा होता हैं। यही अलगाव अलग सोच को भी जन्म देता है। अत: समाज इन अलग सोच से होनेवाले खतरों को टालने के लिए कुछ सामाजिक नियम बनाता है। इन नियमों की अवहेलना समाज में हटकर करना मुश्किल है। पर इनके बीच छटपटाहट हर व्यक्ति के हंदर होती है। पुन: इन्ही का संयुक्त प्रयास ही मान्य परम्पराओं को तोड़कर नई परम्परा बनाते हैं। पर हर नई के साथ हमेशा संघर्ष की एक नई स्थिति बनी रहती है।

समग्र रूप से हम कह सकते हैं कि अमरकांत का उपन्यास काले उजले दिन वास्तव में व्यक्ति के जीवन चक्र में निहित दुख और सुख के क्षणों के प्रतिफल में निर्मित उसके व्यक्तित्व की पड़ताल का अनुपम प्रयोग है। जीवन का पूरा दर्शन कई खंडों में बिखरे व्यक्तिगत अनुभवों का निचोड़ होता है। ऐसे में किसे के द्वारा किया हुआ कोई कार्य सही है या गलत? इसका निर्णय करना बहुत मुश्किल होता है। अमरकांत निश्चित तौर पर इस उपन्यास के माध्यम से जिन प्रश्नों को उठाने का प्रयत्न करते हैं, वे इस बात को झुठला देते हैं कि अमरकांत छोटे दायरे के लेखक हैं।

आकाश पक्षी / A NOVEL BY HINDI WRITER AMERKANT

आकाश पक्षी :-


राजकमल प्रकाशन द्वारा ही इस उपन्यास का प्रथम संस्करण 2003 में प्रकाशित हुआ। 219 पृष्ठों का यह उपन्यास अमरकांत की एम महत्वपूर्ण कृति है।

आत्मकथात्मक शैली में लिखा गया यक उपन्यास हेमा (हेमवती) नामक लड़की की कहानी है। जो एक बड़े रियासत से 'बड़े सरकार` की बेटी है। पर देश आजाद होने के साथ ही साथ काँग्रेस ने रियासतों का राज खत्म कर दिया। इसका प्रभाव हेमा के परिवार पर भी हुआ। वे अपनी रियासत छोड़कर लखनऊ की अपनी कोठी में रहने के लिए आ जाते हैं। पर हेमा के पिताजी की आदतों के कारण जल्द ही उनकी माली हालत बहुत ही बुरी हो जाती है। हेमा के पिताजी को अपने बड़े भाई 'राजा साहब` से बड़ी उम्मीदें थी, जो कि रियासत खत्म होने के बाद दिल्ली रहने चले गये थे। शुरू में राजा साहब ने हेमा के पिताजी को भरोसा दिलाया था कि घर खर्च के लिए पैसे भेजते रहेंगे। पर बाद में उन्होंने पैसे भेजने बंद कर दिये। हेमा के पिताजी ठेके का काम करना चाहते थे, पर उनकी आदतों ने जल्द ही उन्हें कंगाल बना दिया।

इसी बीच हेमा को पड़ोस मंे रहनेवाले 'रवि` से प्यार हो जाता है। रवि उसे पढ़ाने उसके घर पर आता था। दोनों एक दूसरे को बहुत चाहने लगे थे। पर हेमा की माँ को यह पसंद नहीं आता। अपने उँचे कुल-खानदान और रियासती दिनों की शानो-शौकत के आगे वे रवि को अपने बेटी के लायक नहीं समझती थीं। रवि के पिता इंजीनियर थे। वे रवि और हेमा की शादी का प्रस्ताव हेमा के पिता के सामने रखते हैं। पर हेमा के पिता इस प्रस्ताव को अस्वीकार कर देते हैं। साथ ही साथ वे इंजीनियर साहब के मकान छोड़कर चले जाने की हिदायत भी दे देते हैं।

इंजीनियर साहब ऐसा ही करते हैं। रवि के चले जाने के बाद हेमा उदास हरने लगी। पर हेमा पर उसके घरवालों को बिलकुल भी तरस नहीं आया। उन्होंने कुँअर युवराज सिंह नाम एक पैंतालिस वर्ष के साथ हेमा का विवाह करने का निश्चय कर लिया। कँुअर साहब भी किसी पुरानी रियासत के मालिक रह चुके थे। उम्र में हेमा से बहुत बड़े थे। हेमा उन्हें बिलकुल पसंद नहीं करती थी, पर माँ-बाप और अपनी पारिवारिक परिस्थितियों के कारण वह मजबूर थी। और अंतत: वह अपने माँ-बाप और परिवार के लिए खुद की बलि देने के लिए तैयार हो जाती हैं।

इस तरह अपना शरीर वह कुँअर साहब को समर्पित कर देती है। कुँअर साहब से उसकी शादी हो जाती है। परिवार का झूठा अहंकार और सम्मान बच जाता है। कुँअर साहब से रिश्ता जुड़ जाने के कारण हेमा के परिवार को भी आर्थिक सहायता मिल जाती है। हेमा के माँ-बाप चाहते भी यही थे।

अमरकांत का यह उपन्यास भारतीय सामंतवाद की हताशा, निराशा, कुंठा और उनके झूठ अहम के बीच पिसनेवाली एक निर्दोष लड़की हेमा की बड़ी ही मार्मिक कहानी है। होने वाले सामाजिक परिवर्तन को अपने झूठे अहम के दम पर कोई कब तक दबा सकता है। और इसकी कीमत क्या वह अपने ही बच्चों की खुशियों में आग लगा कर करेगा? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जिनका उत्तर यह उपन्यास बखुबी देता है।

हेमा बदलती हुई परिस्थितियों को समझ रही थी। वह समय के साथ बदलना भी चाहती है, पर उसके माँ-बाप ऐसा नहीं चाहते। खुद हेमा के शब्दों में, ''यह कहना गलत होगा कि हम लोगों के पतन का दायित्व कांग्रेस या देश की स्वतन्त्रता को है, जैसा कि बड़े सरकार कहा करते थे। मैं अब अच्छी तरह समझ गयी थी कि यह धारणा अत्याधिक गलत है। हम लोगों में जो गिरावट आ गयी है वह केवल हमारी ही वजह से। हम न मालूम कितने वर्षो से इस देश के शरीर पर फोड़े की तरह विद्यमान थे जिसको काटकर निकाल फेंकने में ही सारे देश की तरक्की हो सकती थी। परंतु अफसोस की बात तो यह थी कि रियासतें खत्म हो जाने पर भी बहुत से राजा-महाराजा अपनी खोखली उँचाई से नीचे उतरकर जनता में मिलते-जुलते नहीं थे।``29

अमरकांत ने इस उपन्यास के लिए जो कथानक चुना वह सचमुच बड़ा ही संवेदनशील है। रवि और हेमा के प्रेम के माध्यम से उन्होंने भारतीय समाज में हो रहे बहुत बड़े परिवर्तन को रेखांकित करने का प्रयास किया है। कहा जा सकता है कि एक सजग रचनाकार के तौर पर अमरकांत ने इस उपन्यास के माध्यम से समाज में घटित हो रही एक पूरी की पूरी परिवर्तन श्रृंखला को बड़े ही सुंदर तरीके से उपन्यास में पिरोया।
    

सूखा पत्ता /HINDI WRITER AMERKANTS FAMOUS NOVEL

सूखा पत्ता :-


सन 1984 में राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित 202 पृष्ठों का यह उपन्यास खूब चर्चित हुआ। इस उपन्यास की कहानी अमरकांत के एक मित्र की कहानी है। इस उपन्यास को लिखने की प्रेरणा का खुलासा करते हुए अमरकांत स्वयं लिखते हैं कि, ''यह मेरे एक मित्र की कहानी है। बीते दिनों के संस्करणों से भी युक्त उनकी मोटी डायरी पढ़ने के बाद यह उपन्यास लिखने की इच्छा उत्पन्न हुई, जो शीघ्र ही इतनी तीव्र हो गयी कि मेरे दिमाग में स्वत: ही एक खाका उभरता गया और कुछ ही महीनों में मैने इसे लिख लिया।``22

अमरकांत की उपर्युक्त बात से स्पष्ट है कि यह उपन्यास अमरकांत ने मात्र पैसों के लिए नहीं लिखा। साथ ही साथ इसे लिखने में उनकी पूरी एनर्जी भी लगी। यह बात इसलिए स्पष्ट कर रहा हूँ क्योंकि अमरकांत यह कह चुके हैं कि उन्होंने अधिकतर उपन्यास आर्थिक अभाव में दूसरों के आग्रह पर सप्रयास लिखा है। 'सूखा पत्ता` अमरकांत के ऐसे उपन्यासों से अलग है। अत: इसकी प्रतिष्ठा भी उनके अन्य उपन्यासों की तुलना में अलग रही।

चन्द्रगुप्त विद्यालंकार जी अमरकांत के इस उपन्यास को शरत के श्रीकांत से प्रेरित मानते हैं। इस उपन्यास पर अपनी लंबी प्रतिक्रिया देते हुए वे लिखते हैं कि, ''उपन्यास की दृष्टि से 'सूखा पत्ता` सबल रचना है। अमरकांत का यह पहला उपन्यास मैंने पढ़ा और इस रचना के लिए मैं उन्हें बधाई देना चाहता हूँ। यों 'सूखा पत्ता` भी निर्दोष रचना नहीं है। कच्चापन उसमें भी स्पष्ट झलकता है। प्रेरणा-स्त्रोत स्पष्टत: शरत बाबू का 'श्रीकांत` है। उपन्यास का किशोर नायक, कृष्ण कुमार दसवीं जमात में पढ़ते हुए क्रांतिकारी दल की स्थापना करता है और साहस संचय की इच्छा से अपने साथी दीनेश्वर के साथ सरदियों की एक रात गंगा तट पर श्मशान में बिताता है। इस अंश की पूरी प्रेरणा शरत बाबू के 'श्रीकांत` के इंद्रनाथ से ली गई प्रतीत होती है, यद्यपि लेखक ने इस सब में भी मौलिक प्रतीत होने का भरसक प्रयत्न किया है।``23

इस तरह इस उपन्यास को सबल रचना मानते हुए भी विद्यालंकार जी इसके कच्चेपन की चर्चा करना नहीं भूलते। वैसे उपन्यास के पहले अंश को लेकर कही गयी उनकी यह बात सही भी लगती है। अपने वास्तविक जीवन में भी अमरकांत का बचपन ऐसी ही कुछ सच्ची घटनाओंे से युक्त रहा। बचपन में अमरकांत का परिचय जब अपने मोहल्ले के स्थानीय क्रांतिकारियों व उनके क्रांतिकारी साहित्य से हुआ तो कुछ स्थानीय क्रांतिकारी मित्रों के साथ मिलकर उन्होंने राजनीतिक वतर्कता दिखायी थी। पर उनकी वह सतर्कता हास्यास्पद की कही जायेगी। ऐसी ही कुछ घटनाओं को थोड़े परिवर्तन के साथ अमरकांत ने अपने इस उपन्यास 'सूखा पत्ता` में चित्रित किया है। उपन्यास में यह दिखाया गया है कि किस तरह चीनी और बोरे चुकारक युवकोें का एक दल उसे महान क्रांतिकारी घटना मानता है।

चंद्रगुप्त विद्यालंकार जी इस उपन्यास की एक और कमजोरी का जिक्र करते हुए लिखते हैं कि, '' 'सूखा पत्ता` की एक कमजोरी यह भी है कि उपन्यास का नायक कृष्ण कुमार उर्मिला से प्रेम के संबंध में बहुत बड़ी दुर्बलता दिखाता है। मेरी राय में उसे माँ-बाप के विरूद्ध और समाज की जातपातीय व्यवस्था के विरूद्ध विद्रोह करना चाहिए था। ........क्रांति का बार-बार नाम लेने वाले अमरकांत जातपात तोड़ने तक से जैसे घबराते हैं। आखिर वह कोई जीवन चरित्र तो लिख नहीं रहे थे।``24

चंद्रगुप्त विद्यालंकार जी की यह बात हमें भी खटकती है। 'मूस`, 'हत्यारे`, 'दोपहर का भोजन` और 'जिंदगी और जोंक` जैसी सशक्त कहानियों का लिखने वाला लेखक उपन्यासों में इतना संकोच क्यों करता है? यह बात स्पष्ट नहीं हो पाती। ''फिर भी 'सूखा पत्ता` एक शक्तिशाली रचना है। लिखने का ढंग, कहानी का उत्थान और शैली - तीनों प्रथम श्रेणी के हैं और यह इस उपन्यास की बहुत बड़ी विशेषता है।``25

लेकिन इस उपन्यास में ही समलिंगी प्रेम के वर्णन का सहारा अमरकांत के एक नए स्वरूप को हमारे सामने रखता हैं। राजेन्द्र किशोर जी तो अमरकांत को 'निराला` की टक्कर का संयमित साहस रखनेवाला उपन्यासकार मानते हैं। इस उपन्यास की चर्चा करते हुए वे लिखते हैं कि, ''कथा के प्रथम खण्ड में नायक के मित्र तथा आदर्श मनमोहन के चरित्र को बड़े प्रभावशाली ढंग से उभारा गया है। इस चरित्र की कल्पना का साहर और इसकी इतनी प्रभावशाली रचना बहुत बड़ी उपलब्धि है। इसके संबंध के सारे विवरण औपन्यासिक होते हुए भी अपनी प्रामाणिकता से हमंे प्रभावित करते हैं। यह न केवल 'साहसिक` है, बल्कि यह नायक से समलिंगी प्रेम भी करता हैै। इसके चरित्र के इस पक्ष को उभारने के लिए लेखक ने वातावरण का बड़ी बारीकी से चित्रण किया है और सबसे बड़ी बात यह है कि लेखक इसके वर्णन में स्वयं पतित नहीं हुआ। निराला के बाद शायद ऐसा संयमित साहस अमरकान्त ने ही किया है।``26

परमानंद श्रीवास्तव जी इस उपन्यास के संबंध में लिखते हैं कि, ''अमरकांत के इस उपन्यास में कृष्णकुमार के चरिये इसकी कैशोर मानसिक विकृतियों और किसी हद तक इसी के ब्याज से उपरिपक्व राष्ट्रीय मानस की कमजोरियों का आकलन प्रस्तुत किय है। सम्भव है इस सजग आत्म-विश्लेषण से कृष्णकुमार की 'गति` बदले - पर ऐसा कोई सुधारवादी आग्रह लेखक के उद्देश्य पर हावी नहीं है और यह शुभ है।``27

'सूखा पत्ता` उपन्यास के संदर्भ में यह जान लेना भी आवश्यक है कि अमरकांत ने इसे 1956 में ही लिख लिया था। और इसका एकाध संस्करण 1959 में छप भी गया था। पर इसका सही मूल्यांकन 1984 में ही निकाला। इसके बाद ही इसका व्यापक डिस्ट्रीब्युशन हुआ और समीक्षकों तक यह उपन्यास पहुँच पाया। स्वयं अमरकांत इस संदर्भ में लिखते हैं कि, ''सन 1959 में 'सूखा पत्ता` का पहला संस्करण हुआ था। उसी समय कई पत्र-पत्रिकाओं में इसकी समीक्षा छपी, बहुत से लेखकों ने इसे पढ़कर अपनी प्रतिक्रियाएँ भी दी। पर्याप्त स्वागत हुआ था इस उपन्यास का। लेकिन लिस प्रकाशक ने इसे छापा था, उसकी बिक्री व्यवस्था ठीक नहीं थी। फिर भी, 1969 में दूसरा संस्करण छपा, 1984 में राजकमल प्रकाशन ने पेपर बैंक में भी इसे छाप दिया। ..... अपने उपन्यासों में 'सूखा पत्ता` को ही मैं विशिष्ट मानता हूँ, कहानियाँ जरूर कुछ ऐसी हैं जो इससे हटकर हैं और उन्हें कुछ लोग 'सूखा पत्ता` से अधिक प्रौढ़ एवम् सशक्त भी कह सकते हैं।``28

इस तरह स्पष्ट है कि अपने उपन्यासों में अमरकांत 'सूखा पत्ता` को विशिष्ट मानते हैं। समीक्षकों ने इस पर पर्याप्त समीक्षाएँ भी लिखी। हम कह सकतें हैं कि अमरकांत द्वारा लिखा गया यह उपन्यास ही सही मायनों में उपन्यासकार के रूप में उन्हें हिंदी साहित्य जगत में प्रतिष्ठित करता है।

सुखजीवी / AMERKANTS HINDI NOVEL

सुखजीवी :-


228 पृष्ठों का यह उपन्यास 'संभावना प्रकाशन` हापुड़ से 1982 में प्रकाशित हुआ। यह उपन्यास भी रोमान्टिक ऐटीट्याूड को ही व्यक्त करता है। यह उपन्यास दीपक नामक ऐसे व्यक्ति की कहानी है, जिसके संदर्भ में उपन्यास का ही यह वाक्यांश सही लगता है कि, ''दुनिया में ऐसे किस्म के भी व्यक्ति हैं, जिनमें बुद्धि और मौलिकता नहीं होती, जो हर संभावनाओं से हीन होते हैं, जो मन से सर्वथा कमजोर होते हैं, परन्तु उनके मन के भीतर एक ऐसी स्वार्थ परकता, दुष्टता और हीनता होती है, जिसको वे अपनी बातों अस्वीकार करने की चेष्टा करते हुए मालूम होते हैं।``19

उपन्यास के नायक दीपक का यही हाल है। वह अपनी सीधी-सादी पत्नी से बात-बात में झूठ बोलता। उसके घर देर पहुँचने पर जब पत्नी अहल्या कारण पूछती तो वह यह बताता कि उसका एक्सीडेन्ट हो गया था। इसी तरह के झूठ वह हर बात में कहता। ''अहल्या को चिन्तित, दुखित और रोते देखकर उसे सदा यह सन्तोष होता था कि वह एक ऐसी स्त्री का पति है जो उसको अपनी समस्त शक्ति से प्यार करती है और उसके लिए कोई भी कुरबानी कर सकती हैं। वह यह अपना अधिकार समझता था कि अहल्या जैसी पतिव्रता स्त्री उसके कष्ट और मजबूरी की बात सुनकर अपना समस्त अभिमान, शिकवा-शिकायत और तकलीफ भूल जाय। और चूंकि अहल्या ऐसी ही करती थी इसलिये वह अपने दु:ख, पीड़ा और लाचारी की बात करके पत्नी को निरस्त्र करने में सदा सफल होता था।``20

पत्नी के इसी स्वभाव का फायदा उठाकर दीपक पड़ोस में रहनेवाली लड़की रेखा से झूठा प्रेम करने लगता है। वास्तव में उसकी दिलचस्पी सिर्फ रेखा की जवान देह में ही थी। रेखा भी उसके प्रेम जाल में आसानी से फँस जाती है। वह रेखा को यह बताकर सहानुभूति हाँसिल करता है कि वह अपनी पत्नी अहल्या से दुखी है। अहल्या के अंदर कोई गुण नहीं है। वह अपने जीवन में प्रेम के लिए तरस गया है। रेखा दीपक की इन बातों में फँस गयी। उसने अपने आप को पूरी तरह समर्पित कर दिया। दीपक ने उसके शरीर से पूरा सूख उठाया। जैसे चाहा वैसे प्रेम किया। पर जब रेखा ने दीपक को पूरी तरह अधिकार के साथ पाना चाहा तो वह डर गया।

इधर जब धीरे-धीरे अहल्या को दीपक और रेखा के संबंधों के बारे में पता चल जाबा है तो दीपक डर के अहल्या के पैरों पर गिर पड़ता है। उसे समझाते हुए दीपक कहता है कि, ''मैं अपनी गलती मान लेता हूँ। मैंने तुम्हारे साथ धोखा किया। आज मेरी आँखे खुल गई हैं। मैं उस आवारा लड़की से बहुत दिनों से पिंड छुडाना चाहता था, लेकिन वह मेरे पीछे पड गई है। जानती हो, बुरी औरतें किस तरह मर्दो को फंसा लेती हैं? मुझमें बहुत-सी कमजोरियाँ हैं, लेकिन कम-से-कम यह कमजोरी मुझमें नहीं थी। मैं पराई औरतों से कोसों दूर रहता था। फिर यह लड़की आई। यह जान-बूझकर मेरे पास आती, मुझसे छेड़ा-खानी करती, आंखों से कटाक्ष करती। ..... यह लडकी तो यूनिवर्सिटी की बहुत चालू लड़की है। इसका काम ही है। एक मर्द को फांसना, फिर उसको छोड़कर दूसरे मर्द को पकड़ना। तुमने आज बचा लिया, अहल्या, तुमसे और बच्चों से बढ़कर मेरे लिए कोई नहीं। भगवान का शुक्र है कि तुम्हारी-जैसी स्त्री मुझको मिली.... मैं तुम्हारी और बच्चों की कसम खाता हूँ कि मैं आगे से उस आवारा लड़की से कोई मतलब नहीं रखूंगा।``21

इस तरह वह अहल्या को मनाता है। कुछ दिनों तक उसका खयाल भी रखता है। पर वह यह नहीं चाहता था कि रेखा के जवान शरीर का सुख उससे छूट जाये। अत: वह एक दिन रेखा से मिलता है। पर रेखा उसकी वह बातें चुपके से सुन चुकी रहती है जो वह अहल्या से रेखा के संबंध में कहता है। रेखा उसे झिड़क देती है। दीपक को रेखा का यह व्यवहार अच्छा नहीं लगता। वह मन ही मन उसे कोसता है। दीपक फिर यह निर्णय लेता है कि वह अपनी पत्नी और बच्चों का खयाल रखेगा और कानून की पड़ाई करेगा व वकील बन कर देश की सेवा करेगा।

दीपक के इस संकल्प के साथ उपन्यास खत्म हो जाता है। लेकिन दीपक जैसे लोगों के संकल्प कभी भी बदल सकते हैं। अपने सुख और आराम के लिए दीपक हर स्तर पर गिरने के लिए तैयार रहता था। हर बात में वह अपने सुख और लाभ का हिसाब लगाता था। उसका सारा आदर्श, सारी नैतिकता उसके अपने शरीर सुख तक केन्द्रित रहती है। वह सही मायनों में 'सुखजीवी` था। इस तरह उपन्यास के कथानक के आधार पर इस शीर्षक एकदम उचित प्रतीत होता है।
      

दीवार और आंगन /amerkants novel deevar aur aangn

दीवार और आंगन :-


253 पृष्ठों का यह उपन्यास मई 1969 में अभिव्यक्ति प्रकाशन, इलाहाबाद से प्रकाशित हुआ। यही उपन्यास बादम ें 'बीच की दीवार` सामक शीर्षक से भी प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास के केन्द्र में दीप्ति है। जिसकी उम्र संग्रह वर्ष की है। अशोक को लेकर उसमें शारीरिक वासना जागृत होती है। पूरे उपन्यास में प्रेम, वासना और अंत में विवाह के रूप में इसकी परिणति ही दिखायी पड़ता है।

''दिवार और आंगन में रचनाकार की निगाह दिप्ति में हैं किशोर वत्तियाँ दीप्ति और अशोक को पास ला कर शारीरिक भोग की आकांक्षा पैदा करती हैं। अशोक की आकांक्षा दीप्ति से कुंती की ओर चली जाती है। मनफूल और दीप्ति की निकटता मंे दीप्ति का अहं तुष्ट होता है। मनफूल उसकी प्रशंसा करता है। उसमें नई ग्रंथि बनती है, देश में नाम कमाने की। वह भी संगीत और पहलवानी में मनफूल केवल दीप्ति का शरीर सुख चाहता है और इसी के लिए जाल रचता है। यह सम्बन्ध भी टूट जाता है। सम्बन्धों के टूटने से दीप्ति निराश होती है किन्तु अब वह प्रेम की परिभाषा को शरीर सुख से हटाकर मन तक ले जाती है। मोहन और दीप्ति का संबंध अंतर्जातीय प्रेम विवाह तक पहुँचता है। इस तरह दीप्ति की उन्मादी भावनाएँ प्रेम के विचारवान क्षेत्र में परिणति प्राप्त करती हैं।17

अमरकांत द्वारा लिखा गया यह उपन्यास 'रोमान्टिक ऐटीट्याूड` को अधिक व्यक्त करता है। अमरकांत के इस उपन्यास के पात्र प्रेम, घृणा, करूणा और शारीरिक वासना में जब लिप्त रहते है तब भी उनके विचारों में आदर्श के प्रति एक सजग भाव बना रहता है। यहाँ यह स्पष्ट हो जाता है कि लेखक अपने पात्रों से जो चाहता है वही करवाने का प्रयास करता है। फिर चाहे इसके लिए कहानी या उपन्यास के मूल कथानक और शिल्प में घटित परिवर्तन अविस्वशनीक ही क्यों न हो जाये। इस संदर्भ में हम अमरकांत के दूसरे उपन्यास 'सुन्नर पांडे की पतोह` का उदाहरण ले सकते हैं। एक स्त्री जो जवान है वह अपने ससुर की बुरी नीयत ताड़ कर घर से निकल जाती है। सारा जीवन वह बाहर दूसरों के यहाँ काम करके जैसे-तैसे बिता देती है। पर उसके चरित्र पर कभी कोई दाग नहीं लग पाता। आश्चर्य होता है कि 'मूत` जैसी कहानी लिखनेवाले अमरकांत उपन्यास के कथानक में इतने सीमित कैसे हो जाते हैं? उपन्यासों में अमरकांेत अपनी वस्तुवादी स्थिति को छो़ड़ते रूक जाते हैं। इसी संदर्भ में कमला प्रसाद पाण्डेय जी लिखते हैं कि, ''......तँय है कि परिस्थितियाँ एक सुसंगठित वस्तु की तरह उनके अंदर प्रवेश करती हैं और रचनात्मक संदर्भ के साथ बाहर आ जाती है। भीतर जाने और बाहर आने के क्रम में पूरी आत्मीय तटस्थता निभाने की संभावनायें उनमें हैं लेकिन संभावनाओं का उपयोग कहीं कहीं नही कर पाते। असमर्थता के कारण उपन्यासों में कई जगह कथात्मक विराम लगने लगता है।``18

इन सब के बावजूद अमरकांत के उपन्यासों में पात्रों का संघर्ष, संघर्ष की मौलिकता, सामाजिक परिवेश का गहरा विवेचन, और उपन्यास लेखन की प्रक्रिया में अपनी बौद्धिक उपस्थिति अमरकांत बखूबी दर्ज करते है। 'दीवार और आंगन` रोमान्टिक ऐटीट्याूड में लिखा गया एक सफल उपन्यास हैं। यह उपन्यास किसी बड़े प्रकाशक के द्वारा प्रकाशित नहीं हुआ था। अत: प्रारंभ में इसके डिस्ट्रीब्युशन में भी समस्या आयी। इस बात को स्वयं अमरकांत भी स्वीकार करते हैं।

कँटीली राह के फूल ,amerkants novel

कँटीली राह के फूल :-


यह उपन्यास राजकमल प्रकाशन द्वारा दिसम्बर 1963 में प्रकाशित हुआ। लगभग 150 पृष्ठों के इस उपन्यास में अनूप नामक युवक का मधु औ कामिनी नामक दो स्त्रियों को लेकर प्रेम संघर्ष चित्रित है। दोनों स्त्रियों के स्वभाव में बहुत अंतर है। एक के लिए जीवन भोग, विलास और मस्ती का नाम है तो दूसरी प्रेम को भोग से कहीं ऊँचा मानती है।

कमला प्रसाद पाण्डेय जी इस उपन्यास के संबंध में लिखते हैं कि, '' 'कँटीली राह के फूल` के अनुप के सामने मधु और कामिनी लगभग आसपास ही आती है। अनूप शर्मीला खिलाडी, पढ़ने में शिथिल, प्यार करने के मामले में झिझकने वाला किन्तु दूसरों से ईर्ष्यालु के रूप में प्रकट होता है। यह एक स्थिति है जहाँ इसे रूढ़िवादी व्यक्तिवादी व्यवस्था ने मनुष्य को पैदा किया है। अनूप में सबसे बड़ी कमजोरी है शर्म के कारण, सोच और अभिव्यक्ति का फर्क। वह जो कहना चाहता है वह नहीं कह पाता। शब्द उसका साथ नही देते। वह झूठ नही बोलता, क्योंकि अभिव्यक्ति के एक स्तर में लाने का ही काम यह उपन्यास करता है। उसके सामने मधु है जिसके लिए जिंदगी मस्ती, रोमांस, शान-शौकत तथा शरीर भोग है। अनूप उसके साथ घूमता है, उसे खुली किताब के रूप में एकान्त में देखता है पर उसके दिमाग में कामिनी का गंभीर समझदार सम्मानपूर्ण चेहरा है, जिसमें प्रेम भीतरी तह से निकलता है। वासना उसका हल्का संस्पर्श है। वह अनूप से प्यार करती है और अनूप भी उसे प्यार करता है। अनूप को शब्द धोखा देते हैं और अधिकार जताने में उसका स्वभाव आडे आता है। मधु और कामिनी के बीच अनूप का विकास कथा का कार्यक्रम है।``16

'कँटीली राह के फूल` उपन्यास के संबंध में कमला प्रसाद जी का उपर्युक्त विवेचन एकदम सटीक है। इस उपन्यास के माध्यम से अमरकांत ने उस व्यक्ति की मानसिक दशाओं का सुंदर चित्रण प्रस्तुत किया है जो अपने सोचे हुए को कभी भी वास्तविक जीवन में करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। अनूप के विचारों एवम् व्यवहार से यही बात सामने आती है। उसका अपना मानसिक द्वंद्व ही उसे परेशान किया रहता है।

अमरकांत एक सलग और जागरूक लेखक माने जाते है। कथा कहने का उनका अपना तरीका है। वे एक भारतीय व्यक्ति की भावनाओं, संस्कारों, भावुकता और संकोच से अच्छी तरह परचित हैं। समाज का पिछड़ापन, अंधविश्वास, पाखंड और अन्य सामाजिक बुराईयाँ उन्हें सालती हैं। पर इन सब से परेशान होकर वे कोई आदर्श स्थित की कल्पना के साथ समाधान खोजने का प्रयास नहीं करते। बल्कि यथार्थ की ठोस जीवन पर ही उनका व्यवहारिक हल अपनी रचनाओं के माध्यम से प्रस्तुत करते हैं।

उनकी यही विशेषता उनके इस उपन्यास 'कँटीली राह के फूूल` में दिखायी पड़ती हैं।
      

अमरकांत का उपन्यास - ग्राम सेविका ,amerkants novel gramsevika

अमरकांत का उपन्यास - ग्राम सेविका 
'ग्राम सेविका` उपन्यास का प्रथम संस्करण अप्रैल 1962, लोकभारती प्रकाशन, इलाहाबाद से प्रकाशित हुआ। इस उपन्यास के संदर्भ में अमरकांत ने लिखा है कि, ''कुछ ग्राम सेविकाओं से इन्टरव्यू के आधार पर लिखे गये इस उपन्यास का आकार शुरू में काफी छोटा था। इसी रूप में यह 'नयी हवा नयी रोशनी` के नाम से उत्तर प्रदेश सरकार के सूचना विभाग के साप्ताहिक पत्र 'ग्राम्या` में धारावाहिक रूप में छपा था।``13


कमला प्रसाद पाण्डेय जी ने अमरकांत के इस उपन्यास के संदर्भ में लिखा है, '' 'ग्राम सेविका` में कथा स्त्री की ओर से आरंभ होती है। दमयन्ती को अपनी किशोरावस्था में अतुल से मोह हुआ जिसे दोनों ने प्यार कहा। रूढ़िवादी मजबूरियों के कारण मोह भंग हुआ, विवाह न हो सका, दमयन्ती ग्रामसेविका बनी। बद के जीवन में उसे एक बार मोह से निवृत्त हो चुकने का लाभ मिला; अतुल से छूटने कि शिक्षा ने उसके जीवन को साहस, समझ और प्रेम की व्याख्या दी। अंतत: वह गांव के जीवन में सामाजिक रूपान्तरण का कार्य करती बीच से अपनी भाँति मोह के कीचड़ से हरचरण को निकाल लाई। दोनों का विवाह हो गया।``14

'ग्राम सेविका` उपन्यास की यही वस्तु कथा है। जिसे अमरकांत ने लगभग 186 पृष्ठों में लिखा है। इस उपन्यास में ''अमरकांत का समाजवादी आधार गाँधीवादी आधार से पराजित दिखाई देता है।``15 अमरकांत के इस उपन्यास को पढ़ते हुए प्रेमचंद के 'सेवासदन` की याद आ जाती है। हालांकि सेवासदन के रचनात्मक स्तर पर 'ग्रामसेविका` की बराबरी नहीं हो सकती पर 'सुधारवाद` का स्वर दोनों ही उपन्यासों में एक सा प्रतीत होता है।

'सेवासदन` प्रेमचंद का पहला उपन्यास है तो 'ग्राम सेविका` अमरकांत के शुरूआती उपन्यासों में से एक है। 'सेवासदन` की मुख्य समस्या 'वेश्या-जीवन में सुधार` का हल प्रेमचंद सेवासदन की स्थापना में ढूँढते हैं। वास्तविक धरातल पर यह उपाय किसी काम का नहीं है। जबकि 'ग्रामसेविका` उपन्यास में समाधान प्रस्तुत करने की अपनी तरफ से कोई आदर्शवादी चेष्टा अमरकांत नहीं करतें। उनकी पात्र 'दमयन्ती` अपने संघर्ष को उतना ही सहज-सरल तरीके से लड़ती है जितना कि उन परिस्थितियों में घिरी कोई भी स्त्री लड़ सकती है। निश्चित तौर पर उनकी नायिका ग्रामसेविका बनकर आदर्श की नई स्थितियों को छूती है। पर उसमें असंभव जैसी कोई बात नहीं दिखती।

अत: अमरकांत के इस उपन्यास के संदर्भ में कहा जा सकता है कि यह उपन्यास यथार्थ के धरातल पर प्रस्तुत एक सुंदर कृति है। इस उपन्यास के माध्यम से अपने समय, परिवेश, समाज और सामाजिक परिवर्तनों को अमरकांत ने बखूबी प्रस्तुत किया है। 'दमयन्ती` का जवीन संघर्ष उसके जैसी हजारों स्त्रियों के जीवन संघर्ष का आईना है।
    

अमरकांत के उपन्यास /amerkant and novels

 अमरकांत के उपन्यास :

अमरकांत ने कहानियों के अतिरिक्त कई उपन्यास भी लिखे। एक उपन्यासकार के रूप में अमरकांत को उतनी प्रतिष्ठा नहीं मिली जितना की एक कहानीकार के रूप में। अब इसका कारण तय कर पाना बड़ा मुश्किल है। कहानियों के संदर्भ में एक ही लेखक को अच्छा और उपन्यासों के संदर्भ में उसे बुरा कह देना तर्कसंगत नहीं लगता। फिर भी कारणों की पड़ताल आवश्यक है। अत: जब मैंने अमरकांत से साक्षात्कार के दौरान यह प्रश्न किया कि आखिर उनकी कहानियों की तुलना में उनके उपन्यास मशहून क्यों नही हुए तो अमरकांत ने स्वयं कहा कि, ''उपन्यास 'सूखा पत्ता` छोड दे तो, बाकी सभी उपन्यास जल्दी जल्दी में लिखे। उन्हे लिखने में पूरी एनर्जी नहीं लगी। पूरी एनर्जी कहानियों में लगी। उपन्यास पैसों के लिए लिखे। जीवन से संघर्ष के निचोड़ के तौर पर कोई उपन्यास नहीं लिखा। पहले तो लोग स्वीकार ही नहीं करते थे उपन्यासकार के रूप में। लेकिन अब काफी चर्चा हो रही है। एक कारण उपन्यासों के चर्चित न होने का यह रहा कि कुछ हमनें खुद प्रकाशित की। उनका डिस्ट्रीब्युशन नहीं हो पाया। वैसे भी उपन्यासों की समीक्षा दृष्टि उतनी विकसित नहीं हुई है। चर्चा हो रही है। यह कोई टेम्पररी फेज नही है। चर्चाएँ होती रहती हैं। आगे भी होंगी.....।``12


अमरकांत का यह विश्वास सम् सामायिक परिस्थितियों में सही भी लगता है। इधर अमरकांत के उपन्यासों की भी चर्चाएँ हो रही हैं। 'इन्ही हथियारों से` जैसे उपन्यास इसका प्रमाण हैं। उपन्यासकार के रूप में अमरकांत की जाँच पडताल के लिए यह आवश्यक है कि हम उनके उपन्यासों का गहन अध्ययन करें। यहाँ पर हम अमरकांत के सभी उपन्यासों का संक्षेप में परिचय प्राप्त करेंगे। उन उपन्यासों का भी जो किसी पत्रिका विशेष में 'उपहार अंक` के रूप में प्रकाशित हुए। लहरें  उनका ऐसा ही एक उपन्यास है। यह अभी तक स्वतंत्र पुस्तक के रूप में प्रकाशित नहीं हुआ है। किंतु कादम्बिनी पत्रिका के उपहार अंक (अक्टूबर 2005) में यह प्रकाशित हो चुका है। हाल ही में बया नामक पत्रिका में उनका एक और उपन्यास -बिदा क़ी रात   भी प्रकाशित हो चुकी है .

इस तरह अमरकांत के अब तक प्रकाशित कुल ११  उपन्यासों क़ी जानकारी हमारे पास है . 
  

अमरकांत क़ी नवीनतम कहानियाँ

अमरकांत क़ी नवीनतम कहानियाँ 

 'जाँच और बच्चे` अमरकांत का नवीनत कहानी संग्रह। इसका प्रथम संस्करण 2005 में अमर कृतित्व प्रकाशन की तरफ से प्रकाशित हुआ। 93 पृष्ठों की इस पुस्तक में कुल 11 कहानियाँ संग्रहित की गयी हैं। इन्हीं में से कुछ कहानियों की हम संक्षिप्त जानकारी प्राप्त करेंगे


एक निर्णायक पत्र :
'एक निर्णायक पत्र` कुमार विनय नाम आदर्शवादी मास्टर के प्रेम भावनाओं के आस-पास बुनी हुई कहानी है। व्यवस्था के भ्रष्टाचार को चुनौती देने के लिए नौकरी न करते हुए स्वावलम्बन का मार्ग अपनाना और अनिश्चित एवम् अव्यवस्थित जीवन के कारण नारी से दूर रहना; यही उसका दृढ़ निश्चय था।



लेकिन 'नीति` को ट्याूशन पढ़ाते हुए और बाद में उसके प्री-मेडिकल परीक्षा में सफल हो जाने के बाद विनय का नारी से दूर रहने का दृढ़ निश्चय टूट गया। 'नीति` भी उनके प्रेम को स्वीकार कर लेती है। पर जल्द ही वह पढ़ाई करने लखनऊ चली जाती है और कतिपय कारणों से विनय को पत्र लिखना भूल जाती है।



उसके इस व्यवहार से विनय के मन में कई प्रश्न उठते हैं। उसे लगता है कि नीति उसके उपकार को भूल गयी। वह उसके प्रेम को भी भुलाकर शहर में मजे कर रही है। अंतत: परेशान होकर विनय लखनऊ आता है और एक होटल में रूककर 'नीति` से मिलने का प्रयत्न करता है।



नीति से मिलने पर वह उसे अपने साथ होटल लाता है। बातों ही बातों में वह नीति को फटकारते हुए उसे चोट पहुँचाने वाली कई बातें कहता है। वह उसकी इज्जत-आबरू चौपट करने के इरादे से उसे पूरी तरह निर्वस्त्र कर देता है। नीति रोती जाती है और अपनी इज्जत-आबरू, प्राण सब कुछ सहर्ष गुरू-दक्षिणा के रूप में विनय को देने की बात करती है। इससे विनय शर्मिन्दा होता है। उसे लेकर वह कॉलेज जाता है। इससे नीति को जो हुआ वह सब भूलने और बाद में पत्र लिखने का वादा करके वहाँ से लौट आता है।



कई दिनों के इंतजार के बाद नीति को विनय का एक पत्र मिलता है। उस पत्र में नीति की तारीफ के साथ उसके शरीर की भी तारीफ लिखी थी। वह पत्र पढ़कर नीति चुपचाप खड़ी हो जाती है। पत्र उसके हाँथों से छूटकर रद्दी की टोकरी में जा गिरा।



अमरकांत की यह कहानी यहीं पर खत्म हो जाती है। पर पाठक के मन में यह सवाल बना रह जाता है कि उस पत्र के आधार पर नीति क्या निर्णय ले?



 हार :-



'हार` कहानी आदर्श और व्यवहार के बीच फँसे वकील बृहबिहारी बाबू की कहानी है। अंकिता उनकी पाँचवी लड़की है, जिसकी शादी की चिंता अब हमेशा उन्हें सताती रहती है। यही सब कारण है कि वे हमेशा चिढे-चिढे रहते। हर किसी से छोटी सी बात पर बहस करने के लिए तैयार हो जाते।



बार रूम में सरकारी वकील निर्मल बाबू से अक्सर ही उनकी गरम-गरम बहस होती रहती। वे प्राय: हर मुद्दे की बहस में निर्मल बाबू को परास्तर कर देते। एक दिन ऐसे ही बहस के दौरान दहेज की बात को लेकर दोनों में बहस होने लगी। निर्मल बाबू ने कहा कि इस प्रथा का कड़ाई से उन्मूलन करना चाहिए। इस पर बृजबिहारी बाबू ने उनकी बातों को पाखण्ड भरा बतोते हुए कहा कि यही निर्मल बाबू अपने लड़के की शादी में चुपके से लाखों रूपये रहेज लेंगे।



इस पर निर्मल बाबू ने अपने लड़के और बृजबिहारी बाबू की बेटी अंकिता की शादी बिना लेन-देन के करना कबूल कर लेते हैं। शादी के दिन बृजबिहारी बाबू अपनी खुशी से लड़की वालों का फर्ज निभाते हुए कुछ मिठाई और खाने-पीने का इंतजाम करते हैं। पर निर्मल बाबू यह भी नहीं चाहते थे। निर्मल बाबू के इस व्यवहार को देखकर बृजबिहारी बाबू की आँखे डबडबा जाती हैं। वे हमेशा बहस में निर्मल बाबू को हरा देते थे, पर आज वे निर्मल बाबू के व्यवहार के आगे हार जाते हैं। पर इस हार में जीत से अधिक खुशी थी।



 जॉच और बच्चे :-



'जाँच और बच्चे` इस संग्रह की अंतिम कहानी है। इस कहानी के केन्द्र चनरी के पति के मृत्यु की जाँच पड़ताल है। जाननी भी सिर्फ इतना है कि मौत बिमारी से हुई या भूख से?



जाँच अधिकारी पूरे दल-बल के साथ चनरी के घर पहुँचते हैं। चनरी उन्हें बताती है कि सूखे के दिनों मेंं उन्हें कोई काम नहीं देता। वे माँग कर अपना गुजारा कर रहे थे। लेकिन इधर कोई उन्हें कुछ नहीं देता था। इस कारण चनरी का पति एक बाटी का टुकड़ा पेट पर पानी पीकर लेटा हुआ था। रात भर उसे पेट मे दर्द रहा और उल्टी भी हुई। गाँव के डॉक्टर को देने के लिए फीस के 20 रूपये भी नहीं थे चनरी के पास। और इस तरह उसके आदमी की मौत हो गई।



अब उसके लिए यह बताना बड़ा मुश्किल था कि मौर भूख से हुई या बिमारी से? जाँच अधिकारी भी अपना काम खत्म कर जाने को हुए। उन्होंने गाँव के कुछ बच्चों को बातें करते हुए सुना। उन्होंने क्या बातें की इसका जिक्र कहानी में नहीं है। पर जाँच अधिकारी घर आकर पत्नी को अपने मोटे होने की बात बताते हुए कम खाना परोसने के लिए कहते हैं।



अमरकांत की कहानियों के संदर्भ में डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी जी ने लिखा है कि, ''अमरकांत की कहानियाँ द्वन्द्वात्मक दृष्टि से परस्पर विरोधी स्थितियों का समहार कर पाने की शक्ति से रचित हैं। इसी अर्थ में वे 'कफन` की परम्परा में हैं। यह दृष्टि और शक्ति अमरकांत की अधिकांश कहानियों में सुलभ हैं।``11 डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी जी की उपर्युक्त बात एकदम सही है। अमरकांत की कहानियों का अध्ययन करके इसे आसानी से समझा भी जा सकता है।



अमरकांत मोह भंग की स्थिति के रचनाकार हैं। आजादी के बाद इस देश की प्रधान स्थिति मोहभंग की ही रही है। देश की इस मोहभंग स्थिति की सबसे बड़ी विडम्बना यही थी कि यह दिखती कुछ और थी, और होती कुछ और। जो दिखायी पड़ता वह पहचानने में अलग दिखायी पड़ता। तर्कहीनता की सारी स्थितियों समाज के उपस्थित थी। इन परिस्थितियों मंे अपनी रचनाओं के माध्यम से पात्रों को नैतिक बोध के बिन्दु पर ले जाना रचनाकार की जिम्मेदारी भी है और बहुत बड़ी शक्ति थी।



अमरकांत अपनी इस जिम्मेदारी से अवगत थे। यही कारण है कि उनकी कहानियाँ हमारे चर्चा के केन्द्र में रहीं। इसमें कोई आशंका नहीं रह जाती कि अमरकांत आम आदमी की प्रतिबद्धता से जुड़े हुए बेजोड़ रचनाकार हैं। 


     

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