Thursday, 2 April 2009

अनेकता मे एकता :भारत के विशेष सन्दर्भ मे

अनेकता मे एकता : भारत के विशेष सन्दर्भ मे
हमारा भारत देश धर्म और दर्शन के देश के रूप मे जाना जाता है यहाँ अनेको धर्म को मानने वाले सदियों से एक साथ रह रहे हैं हमारा देश विविधतावो से भरा हुआ है यह विविधता कई स्तरों पर देखी जा सकती है भाषा ,धर्म.जाती ,खान-पान ,रहन-सहन ,रीति-रिवाज और ऐसी ही जाने कितनी विविधता है इस देश मे। भौगलिक ,सामाजिक ,आर्थिक .धार्मिक ,सांस्कृतिक और निःसंदेह वैचारिक विविधता ही इस देश की सबसे बड़ी शक्ति है इन तमाम विविधतावो के बीच जो एक सूत्र हमे एक बनता है ,वह है एक भारत देश के रूप मे हमारी साकार कल्पना .एक भारतीय के रूप मे ही हमारी सही पहचान हो सकती है यह भारत देश अपने आप मे एक विश्व है ,क्योंकि विश्व मे निहित सभी विविधतायें कुछ अपवादों को छोड़कर भारत मे मिल जाती हैं हमारे यहाँ धरती का स्वर्ग कश्मीर है तो रेतीला राजस्थान भी है सुजलाम -सुफलाम वाली बंगाल की धरती है तो सूखा कच्छ भी है नैनीताल -शिमला -हिमांचल और आसाम के ठंडे क्षेत्र हैं तो केरल और भुवनेश्वर जैसे गर्म स्थान भी मैदानी,पठारी ,पहाडी और समुद्री किनारों से लगा हुआ यह देश पूरी दुनिया मे अनूठा है इस देश की तुलना मे भौगोलिक दृष्टी से कोई दूसरा देश इस पूरी पृथ्वी पर तो नही है .प्रकृति ने भारत को इस धारा पे सब से अधिक संपन्न बनाया है शायद यही वजह रही होगी जो "हड़प्पा -मोहन्जोदडो " की प्राचीनतम संस्कृति इस देश मे ही पाई गई ,दुनिया का प्राचीनतम ग्रन्थ "ऋग्वेद " इसी धरती पर लिखा गया भाषा विज्ञानिक दृष्टि से सबसे समृद्ध संस्कृत भाषा इसी धरती पर अस्तित्व मे आई इस देश की संस्कृति ही थी जो "वसुधैव कुटुम्बकम " की बात सबसे पहले करती है यह देश रामायण और महाभारत जैसे महाकाव्य एक साथ देता है मनुष्य के रूप मे पैदा है लोंगो को मनुष्यता का अर्थ बताता है भौतिकता की तुलना मे आध्यात्म का महत्त्व प्रतिपादित करता है जब पूरी दुनिया अंको के गणित मे उलझी हुई थी तब यह देश शून्य की खोज करता है और सारी दुनिया के गणित को सही दिशा देता है युद्ध करके अधिकारों की लडाई लड़ने की परम्परा मे एक गाँधी इसी देश से अहिंसा की बात करता है ,सत्याग्रह करता है और बिना किसी हथियार के इस देश को गुलामी की जंजीरों से मुक्त करता है यह भारत देश ही है जहा औरतो को सदियों से बराबरी का अधिकार दिया गया यहाँ देवी को आदिशक्ति कहा गया यह देश भारत ही है जहा ३६ करोड़ देवी देवता आज भी पूजे जाते है इस देश की मिट्टी मे दुनिया के राजतिलक की शक्ति है यह अनायास नही है की पूरी दुनिया मंदी की चपेट मे है और हमारे नैनो मे "नैनो कार " का सपना साकार हो रहा है ."२१वी सदी भारत की सदी है " दुनिया भर के विद्वान यह बात हवा मे नही कर रहे हैं यह देश सारे जहा से अच्छा था ,है और रहे गा इस देश की जड़े बहुत गहरी हैं ,हमे मिटाने की सोचने वाला ख़ुद ही मिट जाऐगा आज हमारे पड़ोसी देश की जो हालत है ,उससे यह बात आसानी से समझी जा सकती है सच कहा है किसी ने जो दूसरो के लिये खड्डा खोदता है वह उसमे ख़ुद ही गिरता है "अनेकता मे एकता एक सूत्र है जो समाज के विभिन्न समूहों मे रहने वाले लोगो तथा भौतिक व् मानसिक रूप से विभिन्न होते हुवे एक होने के ज्ञान को देने वाले तत्वज्ञान के मध्य सहयोग का निर्माण करता है " सच कहें तो यह सूत्र पूरी दुनिया को इसी भारत देश से मिला है
भारत एक लोकतान्त्रिक देश है जहा लोकनायक वही बनेगा जो समन्वय की बात करेगा ,जो जोड़ने की बात केरेगा ,जो सब को साथ मे लेकर आगे बढ़ने की बात करेगा इसके विपरीत आचरण करने वाला भोली -भाली जनता को अल्प समय के लिये बरगला सकता है पर अधिक समय तक उसकी चाल कामयाब नही हो सकती भूमंडलीकरण और वैश्वीकरण के साथ -साथ बाजारीकरण की स्थितियों ने मनुष्य के संस्कार को भी बदल दिया है आत्मकेन्द्रित होता हुआ मनुष्य अवसरवादी हो गया है उसकी संवेदनायें ख़त्म होती जा रही हैं इस कारण भारत जैसे देश मे भी भाई-भतीजावाद ,लालफीताशाही ,और आचरण की पवित्रता ख़त्म होते हुवे देखी जा सकती है अपने निजी फायदे के लिये लोग हर तरह की चाल चलने के लिये तैयार रहते हैं भाषा .प्रान्त ,शिक्षा और धर्म को हथियार बनाकर लोगो की भावनावो को भड़काया जाता है और उसी पे सियासत की रोटियां सेंकी जाती है साम्प्रदायीक दंगे कराये जाते हैं सब सियासत का खेल है जो इसी देश मे खेला जाता है यह सब सिक्के का दूसरा पहलू है जिसे समझना बहुत जरूरी है .

देश की जो दूसरी तस्वीर है ,वह खतरनाक हैहसन जमाल अपने एक लेख में लिखते हैं की -जन्हा तक हिंदुस्तानियत पर फक्र करने का सवाल है ,तो बतावो में किस किस बात पर फक्र करू ? कीडो की तरह कुलबुलाती आबादी पर ?दरहम-बरहम हो चुके निजाम पर ? अपने आप को आका और जनता को गुलाम समझनेवाली सरकार पर ? जानवरों से भी बत्तर जिंदगी बिता रहे हिन्दुस्तानियों पर ? चंद लोगो की खुशहाली और करोडो की बदहाली पर ? सिविक सेंस की धज्जियाँ उडाते हर खासो आम पर ? बदतमीज ,खुदगर्ज और बेहूदा नई नस्ल पर ? हरामखोर मुलाजिमो पर ?जिमेदारियों से गाफिल समाज पर ? किस -किस पर फक्र करू ? मैने जिस वतन का ख्वाब देखा था ,वह यह नही है

हसन जमाल इस देश की जो तस्वीर पेश कर रहे हैं ,वह भी एक सच्चाई ही हैपर प्रश्न यह उठाता है की क्या सिर्फ़ यही सच्चाई है ?यह ठीक है की भारत गरीबी का MAHASAGAR है और ISMAY AMEERI के कई TAAPO UBHER आये हैंपर इन TAAPO का UPYOG भी तो भारत के ही लोग कर रहे हैं बाजारीकरण में लाख BURAIYAN हो पर इस बाजारीकरण के युग माय भारत एक MAHASHAKTI के रूप में UBHARA हैHAMAREE १०० करोड़ से भी अधिक JANSANKHYA ही हमारी ताकत बन गई हैइन सब BATO को भी हमे समझना होगासिर्फ़ AADARSH से नही हमे अपने YADHARTH से भी JUDNA होगा जो साथ चलने के लिये तैयार हो USAY साथ में LAIKAR ,जो ना CHALAY JUSAY छोड़कर और जो RASTAY के बीच MEY आये USAY TODKAR आगे BADHNA होगा

किसी के UPER सिर्फ़ ILJAAM LAGADANAY से हमारे JIMAYDAARIYAN पूरी नही होंगीहमे अपने ANDER एक आत्म ANUSHASHAN लाना होगाCHUP रहने से काम नही चलने वाला ,हमे अपने ADHIKARON के लिये LADNA होगाअन्याय ,शोषण और BHRASTACHAAR के ख़िलाफ़ AAVAJ UTHANI होगीAATANKVAAD जैसी GAMBHEER SAMASYAVO से लड़ने के लिये POOREE SAJAGTAA के SATH अपने PARIVAIESH पर नजर REKHNI होगीव्यवस्था MEY SAAMIL होकर इसे BADALNAY का काम करना होगा

एक बात यह भी SAMAJHNEE होगी की आख़िर आज HER व्यक्ति इतना आत्म केन्द्रित क्यों है ? उसका AACHARN इतना BRASHT क्यों है ? किसी SAAYAR ने ठीक ही कहा है -

आज के JAMANAY MEI IMAANDAAR VHI है

जिसे BAIMAANEE का अवसर नही मिला है

विनम्रता की साकार प्रतिमा :डॉ.सुरेश जैन

डॉ.सुरेश जैन जी से मेरी पहली मुलाकात आज से ४-५ साल पहले शिरूर मे ही हुई । शिरूर मे एक राष्ट्री संगोष्टी का आयोजन था ,जिसमे मुझे भाग लेना था । डॉ। सरेश जैन जी के प्रयासों से ही यह आजोयन उनके महाविद्यालय ''चाँद मल ताराचंद बोरा महाविद्यालय '' मे हो रहा था । आप उस समय महाविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष के रूप मे कार्यरत थे ।
जब मै शिरूर बस अड्डे पर पहुँचा तो महाविद्यालय के कुछ छात्र हमारे इंतजार मे खडे थे । मै ख़ुद उनके पास पहुँचा और वे मुझे निर्धारित निवास स्थान पे ले गये । मै रात १० के आस -पास शिरूर पहुँचा था । सेमीनार अगले दिन शुरू होना था । रात के खाने पे डॉक्टर जैन जी से पहली मुलाकात हुई । एक सामान्य सा दिखने वाला विनम्र व्यक्ति मेरे सामने था । सब के पास जा-जा कर उनकी खोज -खबर लेता हुआ । अव्यवस्था के लिये माफी मांगता हुआ । यद्यपि अव्यवस्था जैसी कोई स्थितिती नही थी । मगर यह डॉक्टर जैन जी का स्वभाव था ,उनका बड़प्पन था ।
अचानक डॉक्टर जैन मेरे पास आये और बोले ,''आप कल्याण से मनीष कुमार मिश्रा जी हैं ?'' मैं आश्चर्य चकित हो गया । मैने कहा ,"जी सर ,लेकिन आप ने मुझे कैसे पहचाना ?'' जैन साहब मुस्कुराते हुवे बोले ,''मनीष जी आप हमारे मेहमान है ,आप की खोज-खबर तो रखनी ही पड़ेगी ना । '' मै कुछ समझ नही पाया ,फ़िर जैन साहब ने ही कहा ,''आप जब रात बस अड्डे पर आये तभी बच्चो ने मुझे सुचना दी । '' मै यह सोच कर हैरान था की इतने बडे आयोजन मे जहा २५० से ३०० प्रतिभागी देश भर से आये हो ,वंहा हर प्रतिभागी के बारे मे ध्यान जैन साहब कैसे रख सकते हैं ? लेकिन यही तो जैन साहब का व्यक्तित्व है ,जो उन्हे खास बनता है ।
पूरा सेमीनार अच्छी तरह संपन्न हुआ । जाने का समय हुआ तो मै जैन साहब के पास पहुँचा । जैन सर को प्रणाम कर मैने जाने की अनुमति मांगी । जैन साहब ने प्रमाणपत्र ,आने जाने के खर्च आदि की जानकारी लेकर अपनी कुछ संकावो का समाधान किया । फ़िर धीरे से मेरा हाथ पकड़कर बोले ,'' बेटा आप का शोधपत्र बहुत ही अच्छा है । जल्द ही वाणी प्रकाशन से मै हिन्दी साहित्य के सन्दर्भ मे यंहा पढे गये कुछ चुनिन्दा लेख प्रकाशित करूँगा , और आप का लेख मैने चुन लिया है । '' मुझे बहुत खुशी हुई की इतने सारे हिन्दी के विद्वानों मे जैन साहब ने मेरे लेख को महत्त्व दिया । आज वह पुस्तक प्रकाशित भी हो गई है ,''हिन्दी साहित्य का इतिहास : नए विचार नई दृष्टि " नाम से ।
डॉ.सुरेश जैन जी साधार व्यक्तित्व के असाधारण व्यक्ति हैं । आप ने अपना पूरा जीवन अध्ययन -अध्यापन को समर्पित किया । रचनात्मक कार्यो से सदा जुडे रहे । अपने विद्यार्थियों से जुडे रहे । ३० वर्ष से भी अधिक का समय इन कार्यो मे लगा चुके जैन साहब अपने विद्यार्थियों को ही अपनी पूजी समझते हैं ।
आज जब जैन साहब के सभी शोध छात्रो ने उनका गौरवग्रंथ निकलना चाह तो ,मै भला बिना लिखे कैसे रह सकता था । जैन सर जैसे कद्दावर व्यक्तित्व के बारे मे मै क्या लिख सकता हूँ ? लेकिन अपने लिखने के प्रयासों से उनके प्रति अपनी भावनाये तो व्यक्त कर ही सकता हूँ । जैन सर आप दीर्घायु हों और आप का आशीष हम सब पर बना रहे यही इश्वर चरणों मे मेरी प्रार्थना है ।

Wednesday, 1 April 2009

हिन्दी की नई पत्रिका -बया

हिन्दी मे आज की तारीख़ मे कई पत्रिकायें निकल रही हैं । ऐसी ही एक महत्त्व पूर्ण पत्रिका है -बया । गौरीनाथ जी के संपादन मे निकलने वाली यह पत्रिका पहले छमाही प्रकाशित होती थी ,लेकिन अब यह त्रैमासिक हो गयी है । जुलाई-सितम्बर अंक २००९ "बंगाल:पलासी से नंदीग्राम " पर केन्द्रित है । अब यह पत्रिका "अंतिका प्रकाशन " से जुड़ गई है ।
पत्रिका के लिये ०१२०-६४७५२१२ \०९८६८३८०७९७ पे संपर्क किया जा सकता है । इसकी वार्षिक सदस्यता १२० रुपये है । आजीवन ५००० रुपये है । आप को यह पत्रिका जरूर पसंद आयगी । इसे आप जरूर पढ़े ।

रात अकेले सागर तट पर हम दोनों ----------------------------

रात अकले सागर तट पर ,लहरों मे हम खोय थे
एक-दूजे के कन्धों पर ,प्यार से कितने सोय थे ।

इधर-उधर के जाने कितने ,किस्से तुमने सुनाये थे
वही बात ना कर पाये,करने जो तुम आये थे ।

एक साँस मे कह डाले ,सपने जो भी संजोये थे
फ़िर आँखों मे मेरी देखकर,कितना तुम मुस्काये थे ।

नर्म रेत पर पास बैठकर ,कितना तुम इतराये थे
प्रथम प्यार के चुम्बन पे,बच्चों जैसे शरमाये थे ।

गहर के अंदर मेरी भी --------------------

घर के अंदर मेरी भी ,इज्जत थी अच्छी-खासी
प्यार किया है जब से मैने,कहते हैं सब सत्यानासी ।

बडे नमाजी उसके अब्बा,पिताजी मरे चंदनधारी
लगता है गरमायेगा ,मुद्दा फ़िर से मथुरा-काशी ।

अच्छा है की लोकतंत्र है ,नही चलेगी तानाशाही
बस इनका यदि चलता तो ,मिलकर देते हमको फाँसी ।

Tuesday, 31 March 2009

पकिस्तान के हालात --------

  1. कल ही पकिस्तान मे एक और आतंकवादी हमला हुआ जिसने पूरे पकिस्तान को हिला के रेख दिया। भारत का पड़ोसी होने के कारण पकिस्तान की आतंरिक स्थितियां हमारे लिये भी चिंता विषय हैं । अफगानिस्तान के बाद तालिबान की पकड़ पकिस्तान पे मजबूत होती जा रही है .तालिबान को अलकायदा का समर्थन मिलता ही रहता है । भारत कट लिये समय आ गया है की वह अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी को साथ लेकर आतंकवाद के ख़िलाफ़ एक नई पहल करे ।

    पकिस्तान को भी अब यह समझना हो गा की जी आतंकवाद के दम पे वह भारत को आँख दिखता था ,वाही अब भास्मा सुर की तरह उसे ही तबाह कर डालने की कोसिस कर रहा है ।
    आज से जी २० के सिखर सम्मलेन मे प्रधानमंत्री मनमोहनसिंह जा रहे हैं । उन्हे जो दो मुद्दे पुरी ताकत से उठाना चाहिये वो निम्नलिखित हैं ।

१.भारत का जो पैसा काले धन के रूप मे बाहरी बैंकों मे है ,उसे वापस लाना

२.आतंकवाद की समस्या पर पकिस्तान और अफगानिस्तान के हालत पे विश्व व्यापी कारगर उपाय खोजना ।



Monday, 30 March 2009

क्या -क्या किया जवानी मे -----------------------------

पूछो ना क्या क्या किया जवानी मे
नदी थे ,सो बह गये थे रवानी मे

हम तो शांत झील की तरह थे
आग तुम्ही ने लगा दी पानी मे

मेहमान से आये थे ,चले गये
करके इजाफा हमारे खर्चे मे

वो तो खुशबू थे ,बिखर गये
पड़ गये हम तो परेशानी मे

इश्क करना कब था हमे
हो गया यह काम नादानी मे

Sunday, 29 March 2009

JUST TO SAY HI

DEAR FRIENDS,
I AM JAI PANDEY WORKING AS A MECHANICAL ENGINEER IN MUMBAI. FROM TODAY ONWARDS YOU CAN READ MY ARTICLES RELATED TO MINERAL PROCCESING,TEHNOLOGY AND INDUSTRIAL ETP.

WITH HOPE THAT YOU WILL LIKE IT.

Saturday, 28 March 2009

दिन करीब चुनाव के आने लगे हैं ------------

जोड़ कर हाँथ वे लुभाने लगे हैं


दिन चुनाव के करीब आने लगे हैं


गली के गुंडों को टिकट मिल गया है


तहजीब मे अब वे बतियाने लगे हैं




पार्टी का जो भी रूठा था अपना


उसको नेता बडे सब मनाने लगे हैं




अनुबंधों मे गठबंधन का


नेता लुफ्त उठाने लगे हैं




सियासत है यंहा कुछ पक्का नही


एक-दूजे के घर मे लोग झाकने लगे हैं




इसके पीछे भी साजिस है गहरी


जो मुफ्त मे वो पीने-पिलाने लगे हैं

Friday, 27 March 2009

दिनकर की मृत्यु चन्द्रास्वामी की गोंद मे .........

अगर बाल कवि बैरागी की बात को सच मान लिया जाय तो यह भी मानना पड़ेगा की महाकवि दिनकर की मृत्यु चंद्रास्वामी की गोंद मे हुआ था ।
बैरागी जी बताते हैं कि सुन ७४ मे एक दिन दिनकर जी ने अचानक कहा कि वे तिरुपति जा रहे हैं । श्री गोपाल प्रसाद व्यास ने कारण पूछा तो वे बोले -यह देश जीने लायक नही रहा ,मैं मरने जा रहा हूँ ।
और रामनाथ जी गोयनका के गेस्ट हाउस मे चंद्रास्वामी की गोंद मे उन्होने अपने प्राण त्याग दिये । हिन्दी का दिनकर दक्षिण मे अस्त हो गया । सत्ता अगर सम्मान देती है तो , अपमानित भी करती है । इस बारे मे जादा नही कहना चाहता पर दिनकर की राजनितिक स्थितयों को जानने वाले मेरा मतलब समझ जाएँगे ।

Tuesday, 24 March 2009

नैनो के फायदे और नुक्सान

टाटा मोटर्स का ६ साल पुराना सपना साकार हो गया और नैनो कार बाजार मे आ गई । अब सवाल यह उठता है की इसके फायदे और नुक्सान क्या -क्या हैं ?


अगर बात फायदे की करे तो कहा जा सकता है की -




  1. देश के मध्यम वर्ग का कार मे घूमने का सपना नैनो कार की वजह से पुरा हो गया । साथ ही साथ आम आदमी तक कार पहुँच सकी .isksathikइ

  2. दूसरी बात यह की इससे रोजगार के नए अवसर भी देश मे लोंगो को मिलेंगे ।

अब अगर दूसरी दृष्टी से सोचा जाये तो टाटा की नैनो को प्राथमिकता का निर्णय ग़लत भी लगता है । एक ऐसे समय मे जब पूरी दुनिया मे मंदी छाई हुई है तो देश के मध्यम वर्ग को कार देना कौन सा सार्थक निर्णय है ?

दूसरी बात हमारी ऊर्जा संकट की है । पेट्रोलियम पदार्थों की कमी की है । बुनियादी सुविधावों के आभाव की है । इन सब को भूल कर नैनो का स्वागत करना इतना आसन नही है ।

वैसे आप इस बारे मे क्या सोचते हैं ?


कबअब agarar २अब 2kइकी

Sunday, 22 March 2009

आज से साहित्य का महा-कुम्भ द्वारका(गुजरात) मे -------

हिन्दी साहित्य समेलन प्रयाग का ६१ वां अधिवेशन और परिसंवाद आज २२ मार्च से गुजरात के द्वारका मे सुरु हो रहा है । यह सम्मलेन २४ मार्च २००९ तक चलेगा । देश भर से करीब ५०० से अधिक हिन्दी साहित्यकारों और विद्वानों के इस सम्मलेन मे सामिल होने की सम्भावना है ।

कार्यक्रम पुस्तकालय टाऊन हाल ,हरी प्रेम मार्ग ,द्वारका मे होगा । अधिक जानकारी के लिये शैलेस भाई नरेन्द्र भाई ठाकर से ०९४२८३१५४०३ इस मोबाइल पे संपर्क किया जा सकता है ।

Friday, 20 March 2009

आतंकवाद के ख़िलाफ़ हिन्दी गीतों की सुरांजलि -आलोक भट्टाचार्य

अगर आप 26-3-2009 की शाम मुंबई मे हैं और अपनी शाम को यादगार बनाना चाहते हैं तो आप शाम ५.३० बजे मानिक सभागृह हाल ,लीलावती हॉस्पिटल के सामने,बान्द्रा पूर्व मे आना होगा ।
यंहा हिन्दी गीतों की एक सी.डी का लोकार्पण नूरजंहा के हांथो होगा । इन गीतों को लिखने का काम श्री आलोक भट्टाचार्य ने किया है । गीतों को अपनी आवाज से सवार हाय -सुरेश वाडेकर.साधना सरगम,मोहमद अजीज़ और जावेद अली ने ।
इस अवसर पे कई जाने-माने लोग भी उपस्थित रहेंगे । आप का भी स्वागत है इस साहित्यिक और संगीतमय आयोजन मे ।

Thursday, 19 March 2009

अपनी राह बनाने को ---------------

अपनी राह बनाने को
मैं तो अकेला चल निकला
मंजिल का कहना मुस्किल है ,
पर साथ है मेरे राह प्रिये ।


आयेंगे जितने भी सब का
द्वार पे मेरे स्वागत होगा
जाना जो भी चाहेगा,
हर वक्त है वो आजाद प्रिये ।



इतनी अगर सजा दी है
तो फ़िर थोड़ा प्यार भी दो
आँचल की थोड़ी हवा सही ,
या बाँहों का हार प्रिये ।


तेरे-मरे रिश्ते जितना
उम्मीद से मेरा रिश्ता है ।
कितनी लम्बी प्यास है मेरी ,
पनघट बन तू देख प्रिये ।

भावों का यह वंदन पूजन --------

अनुग्रह की अभिलाषा यह
तुमको देव बनाती है
भावों का यह वंदन पूजन
कर लेना स्वीकार प्रिये


मेरी सारी इच्छायें
तुमसे ही तो जुड़ती हैं
फ़िर क्यों और किसी ठाकुर के
द्वार का घंट बजाऊँ प्रिये

जीत -जीत कर जीवन मे
चाहे जो भी हासिल कर लो
पर प्यार जीतने के खातिर
हार यंहा अनिवार्य प्रिये

खो कर ही सबकुछ
प्यार को पाना होता है
इसीलिये तो कहता हूँ
प्यार को मैं सन्यास प्रिये

मीठी -मीठी तेरी बोली

मीठी -मीठी तेरी बोली
मन को मोहित करती है
अंदर ही अंदर मै हर्षित
करके तुझको याद प्रिये


उषा की लाली मे ही
नया सवेरा खिलता है
तिमिर भरी हर रात के आगे
रश्मिरथी उपहार प्रिये


पहले कितना शर्माती थी
अब तुम कितना कहती हो
मुझसे मिलकर खिलती हो
लगती हो जैसे परी प्रिये


मरे अंदर जितना तुम हो
उतना हे मैं तेरे अंदर
हम दोनों मे मैं से जादा
भरा है हम का भाव प्रिये

Wednesday, 18 March 2009

मै न रहूँगा सच है लेकिन --------

दे कर प्रेम ताल पे ताल
मस्ती भरी चलू मैं चाल
नव पर नव की अभिलाषा
मन मे मेरे भरी प्रिये


मैं न रहूँगा सच है लेकिन
रहेगी मेरी अभिलाषा
एक ह्रदय की दूजे ह्रदय से
यह करेगी सारी बात प्रिये


जो हम चाहें वो मिल जाये
ऐसा अक्सर कब होता
जो है उसमे खुश रहना
खुशियों की सौगात प्रिये


मंजिल की चाहत मे हम
लुफ्त सफ़र का खोते हैं
है जिसमे सच्चा आनंद
उसी को खोते रहे प्रिये

तकलीफों से डर के हम
नशे मे डूबा करते हैं
बद को बदतर ख़ुद करते
फ़िर किस्मत कोसा करें प्रिये

प्रेम भरे मन की अभिलाषा
मधुशाला मे ना पुरा होती
प्रेम को पूरा करता है ,
जग मे केवल प्रेम प्रिये

मदिरालय मे जानेवाला
कायर पथिक है जीवन का
जो संघर्षो को गले लगाये
कदमो मे उसके जग है प्रिये

जिसके जीवन मे केवल
पैमाना-शाकी -बाला है
जीवन पथ पे उसके गले मे
सदीव हार की माला प्रिये

Tuesday, 17 March 2009

मेरी अन्तिम साँस की बेला

मेरी अन्तिम साँस की बेला
मत देना तुलसी गंगाजल
अपने ओठों का एक चुम्बन
ओठों पे देना मेरे प्रिये


इससे पावन जग मे सारे
वस्तु नही दूजी कोई
इसमे प्रेम की अभिलाषा
और उसी का यग्य प्रिये


मेरी अन्तिम शव यात्रा मे
राम नाम तुम सत्य ना कहना
प्रेम को कहना अन्तिम सच
प्रेमी कहना मुझे प्रिये


चिता सजी हो जब मेरी तो
मरघट पे तुम भी आना
आख़िर मेरे प्रिय स्वजनों मे
तुमसे बढ़कर कौन प्रिये ?

श्राद्ध मेरा तुम यूँ करना
जैसे उत्सव या त्यौहार
पर्व अगर जीवन है तो
महापर्व है मृत्यु प्रिये

इंतजार हो मौसम का
इतना धैर्य नही मुझमे
हम जैसो के खातिर ही
होती बेमौसम बरसात प्रिये

मेरा अर्पण और समर्पण
सब कुछ तेरे नाम प्रिये
स्वास-स्वास तेरी अभिलाषा
तू जीवन की प्राण प्रिये

Thursday, 12 March 2009

४ पीढियों का कवि नीरज

नीरज का नाम कौन नही जनता है ,हिन्दी साहित्य मे ? लेकिन जब मैने बाल कवि बैरागी के मुह से यह सुना की आज भी जिस कवि को ४ पीढियां एक साथ सुनती हैं ,वह कोई और नही बल्कि कवि नीरज ही हैं।
नीरज के बारे मे उन्होने बताया की एक बार जब नीरज के साथ बैरागी जी काव्य पाठ कर रहे थे तो बैरागी जी ने कहा की- आप के मर जाने के बाद हम लोग तो आप को कन्धा भी नही डे पायेंगे ।
इस पर नीरज ने पुछा -क्यों आप ऐसा क्यों कह रहे हो ?
बैरागीजी बोले- जब आप की शव यात्रा निकले गी तो हमे कन्धा देने के लिये बिना चप्पलो के चलना होगा ,और ऐसे मे आप की प्रेमिकाओं की टूटी हुई चूडियाँ हमारे पैरों मे चुभेंगी । तो आप ही बताओ हम कैसे चल पायेंगे ।
इतना सुनते ही नीरज ने बैरागी जी को गले लगा लिया । बात मजाक मे khatm ho gai । lekin jo niraj ko kareeb say jaantay hain vo इस बात की गहराई को समझते हैं । प्यार मे कोई बरबाद नही होता । प्यार हमे उदार बनता है ,samvaidansheel banata hai , yahaa tak ki maanav ko मानव भी प्रेम ही बनता है । प्रेम से बचो मत --------इसमे गहरा उतारने की कोशिस करो । तुम्हारी जय हो गी -------प्रेम करो ---प्रेम बांटो -----------------------------------------------------------------------------------

Wednesday, 11 March 2009

होली के रंग -बाल कवि बैरागी के संग

कल की होली मेरे लिये यादगार बन गई ,क्योंकि कल का पूरा दिन मुझे बाल कवि बैरागी जैसे महान कवि के साथ बिताने का अवसर मिला । सुबह ७.३० बजे मोबाइल की घंटी बजी । देखा तो श्री ओम प्रकाश मुन्ना पाण्डेय जी का फ़ोन था । उन्हों ने कहा की मुंबई सेंट्रल जाना है ,बाल कवि जी को लेने ।
मै फटाफट तैयार हो गया । मुन्ना भइया की ही कार से हम लोग मुंबई सेंट्रल पहुंचे .थोडी देर के बाद ही राजधानी एक्सप्रेस आ गई । बैरागी जी को हमलोगों ने रिसिव किया और कार तक ले आये ।
बैरागी जी ने फ़ोन से घर पे सूचना दी की वे पहुँच गये हैं और दो लिखे-पढे लोग उन्हे लेकर जा रहे हैं । फ़िर मोबाइल को दिखाते हुए बोले की -यह वो जनेऊ है जो कान पर चढाते ही आदमी बोलने लगता है । फ़िर हम लोग एक दूसरे से इधर -उधर की बातें करने लगे । उन्होने अपने कुछ मित्रों के नाम लिये जिन्हें मै-और मुन्ना भइया भी जानते थे ,उनसे बैरागी जी की मोबाइल पर ही बात कराइ गयी । जैसे की NAIND किशोर नौटियाल ,सचिन्द्र त्रिपाठी ,आलोक भट्टाचार्य और विजय पंडित .रास्ते मे बैरागी जी की नजर पोस्टर और बैनरों पर बराबर पड़ रही थी । मैं ने कहा -दादा यंहा लोग हिन्दी -मराठी के घाल-मेल के कारण अक्सर गलतियां कर देते हैं । मेरी बात सुनकर उन्होने कहा कि-कोई बात नही है ,हिन्दी की सास्त्रियता का यह समय नही है । जरूरत इस बात की है कि हम इसका जादा से जादा उपयोग करें ,और इसके विकास के लिये सरकार कि तरफ़ देखना बंद करें। बैरागी जी लोकसभा और राज्यसभा दोनों के ही सदस्य रह चुके हैं । वे राजभाषा समिति के सदस्य के रूप मे अपनी कुछ स्मृतियों का जिक्र करते हुवे बतातें हैं कि ---गोविन्द मिश्र भी उनके गुस्से का कारन बने थे । मुंबई मे ही सन १९८६-८७ के आस -पास जब वे संसदीय समिति के सदस्य के रूप मे आयकर विभाग मे आये तो गोविन्द मिश्र की हिन्दी सम्बन्धी शासकीय जवाब देही से नाखुश हुए और खाना खाने से भी INKAAR KAR DIYA POOREE SAMITI NAY .
इसी तरह बैरागी जी ने पूर्व राष्टपति कलाम के सम्बन्ध मे भी बताया कि एक बार उन्हे कलाम जी के हस्ताक्षर वाला एक निमंत्रण मिला ,जिसे उन्होने सिर्फ़ इस लिये अस्वीकार कर दिया क्योंकि वह निमंत्रण हिन्दी मे नही अंग्रजी मे था .इसी तरह कि कई बाते उन्होने बताई । आध्यात्म ,वेद और आयुर्वेद के साथ -साथ अहिंसा दिवस को वे भारत की तरफ़ से पूरी दुनिया को दिया गया श्रेष्ठ उपहार मानते हैं ।
बैरागी जी ने अपने बारे मे बताया कि वे एक भिखमंगे परिवार से आते हैं । ४ साल कि उम्र मे उन्हें जो पहला खिलौना मिला वह था -भीख मांगने का कटोरा । उम्र के २४ साल तक उन्होने भीख माँगा । आज भी बैरागी जी कपड़ा मांग कर ही पहनते हैं । ऐसी ही कई बाते करते हुए हमलोग अम्बरनाथ के प्रीतम होटल तक पहुंचे । वहा हम तीनो ने दोपहर का खाना खाया .फ़िर हमने बैरागी जी से कहा कि वे अपने रूम मे आराम करें ,शाम कोहम फ़िर मिलेंगे ।
शाम को कवि सम्मेलन था । मैं और मुन्ना भइया फ़िर शाम को बैरागी जी का काव्य पाठ सुनने अम्बरनाथ पहुंचे .बैरागी जी ने जब काव्य पाठ शुरू किया तो समां बंध गया । पनिहारिन .दिनकर के वंसज और ऐसी ही कई रचनायें वे रात २ बजे तक सुनाते रहे । उनकी यह पंक्ति याद रह गई कि --
''मैं कभी मरूँगा नही , क्योंकि मैं ऐसा कुछ करूँगा नही "
रात ३ बजे मै और मुन्ना भाई जब वापस निकले तो हमे याद आया कि रात का खाना हमने खाया ही नही है और भूख काफ़ी लगी है । कल्याण आकर रातभर चलने वाली एक दूकान पर हमने आलू कि टिकिया खाई और चाय पी । ३.४५ पर मैं घर पहुँचा और सोने कि कोशिस करने लगा । पर आँखों मे बालकवि जी दिखाई पड़ रहे थे और कानो मे उनकी यह पंक्तियाँ सुनाई पड़ रही थी ---
''अपनी ही आहूती देकर ,स्वयम प्रकाशित होना सीखो
यश-अप्य्स जो मिल जाये ,उसको हस कर सहना सीखो ''------------








Monday, 9 March 2009

निरर्थक परीक्षा प्रणाली

इस साल पहली बार मुंबई बोर्ड के १२ कक्षा के प्रश्न पत्र जांचने के लिये मिले ,वो भी पूरे २५० । साथ ही साथ यह आदेश भी मिला की मै जल्द से जल्द उन्हे मोडरेटर के पास भिजवा दूँ । मै परेसान था की इतने जल्दी मैं २५० प्रश्न पत्र किसी जांच सकता हूँ ?
परेसान हो कर मैं ने अपने मोडरेटर को फ़ोन किया । उन्हे अपनी परेसानी बताई । इस पर उन्होने कहा की ''तुम २५० पेपर लेकर परेसान हो, मुझे तो १७०० पेपर निपटाने हैं । जल्दी करो ---"
मैं ने भी निपटा ही दिया २५० प्रश्न पत्र । लेकिन यह सोच कर परेसान था की जो विद्यार्थी साल भर मेहनत करते हैं .उन्हें इस तरह निपटा देना कितना सही है ? आख़िर यह व्यवस्था किस काम की है ? इसका इलाज होना ही चाहिये । परीक्षा के नाम पे यह दिखावटी व्यवस्था ख़त्म होनी चाहिये ।
आप इस बारे मे क्या सोचते हैं ?

Friday, 6 March 2009

कबीर और तुकाराम के काव्य मे अभिव्यक्त सांस्कृतिक चेतना का तुलनात्मक अनुशीलन

डॉ.बालकवि सुरंजे द्वारा लिखी गई यह प्रथम पुस्तक हाल ही मे प्रकाशित हुई .इस पुस्तक को पढ़ने के बाद इस बात का अंदाजा सहज ही हो जाता है की लेखक ने इस पुस्तक को लिखने मे जी-तोड़ मेहनत की है । साथ ही साथ मराठी और हिन्दी दोनों भाषावो पर उनका समान अधिकार है । कबीर हिन्दी साहित्य के बहूत बडे कवि हैं , तुकाराम भी संत परम्परा के मध्यकालीन कवि हैं ,महाराष्ट्र से । इन दोनों के साहित्य मे जो समानता रही है उसे ही सामने लाने का प्रयास लेखक ने किया है ।
यह पुस्तक लेखक का शोध -प्रबंध रहा है ,इस कारण कुछ स्थानों पर विस्तार अधिक दिखाई पड़ता है .लेकिन कुल मिलाकर पुस्तक पठनीय और संग्रहणीय है .पुस्तक पाप्ति के लिये लेखक से निम्नलिखित पते पर संपर्क किया जा सकता है
डॉ.बालकवि सुरंजे
अध्यक्ष-हिन्दी विभाग
बिरला महाविद्यालय
कल्याण -पश्चिम ४२१३०१
महाराष्ट्र

Wednesday, 4 March 2009

भव्य लोकार्पण समारोह -मन के साँचे की मिट्टी


सोमवार दिनांक ०२ मार्च २००९ की शाम कल्याण के आदर्श हिन्दी हाई स्कूल मे श्री विजय नारायण पंडित जी के प्रथम काव्य संग्रह ''मन के सांचे की मिट्टी '' का भव्य लोकार्पण समारोह आयोजित किया गया ।



इस समारोह मे अध्यक्ष के रूप मे बिरला कॉलेज के प्राचार्य डॉ.नरेश चंद्र उपस्थित थे । लोकार्पण कर्ता के रूप मे मुंबई विद्यापीठ के पूर्व हिन्दी विभाग प्रमुख डॉ.रामजी तिवारी उपस्थित थे । स्वागत वक्तव्य हिन्दी के जाने-माने साहित्यकार श्री अलोक भट्टाचार्य जी ने दिया । अतिथि स्वागत भाषण दी कल्याण होलेसले मर्चंट असोसिएशन के अध्यक्ष श्री नन्द कुमार लक्ष्मण सोनवाने जी ने दिया । प्रमुख अतिथि के रूप मे कल्याण डोम्बिवली महानगर पालिका के कमिश्नर श्री गोविन्द राठोड जी उपस्थित थे । दोपहर का सामना हिन्दी समाचार के कार्यकारी संपादक श्री प्रेम शुक्ला जी भी प्रमुख अतिथि के रूप मे उपस्थित थे ।



प्रमुख वक्ता के रूप मे डॉ.सतीश पाण्डेय ,डॉ.अनिल सिंह, और डॉ.ईश्वर पवार जी उपस्थित थे । इस समारोह मे मुंबई विद्यापीठ से सम्बद्ध कई महाविद्यालयों के हिन्दी विभाग प्रमुख उपस्थित थे । जैसे की -डॉ.प्रकास मिश्रा ,डॉ.संतोष मोटवानी,डॉ.प्रदीप सिंघ,डॉ.दौलत सिंग पालीवाल,डॉ.बालकवि सुरंजय ,डॉ.स्याम सुंदर पाण्डेय .डॉ.दामोदर मोरे ,डॉ.अनीता मन्ना ,डॉ.डी.पी.सिंग और डॉ.संजीव दुबे । इनके अतरिक्त भी कई पत्त्रिकाओ से सम्बंधित लोग भी उपस्थित थे .सञ्चालन श्री ॐ प्रकाश पाण्डेय जी ने किया ।



इस अवसर पर २००० के करीब लोग उपस्थित थे .सभी ने हिन्दी के विद्वानों को गंभीरता पुर्वक सुना ।



अपना भाषण देते हुवे डॉ.रामजी तिवारी ने कवितावों की खूब प्रसंसा की । इस समारोह की कुछ तस्वीरे आप इस लेख के साथ देख सकते हैं । मुंबई जैसे सहर मे किसी कविता पुस्तक के लोकार्पण मे इतने लोगो का उपस्थित होना एक आश्चर्य ही है । मगर यह सच है । आँखों देखा सुखद सच ---------------



Friday, 27 February 2009

क्यो होता है प्यार ?

सोचा है कभी आपने की आख़िर क्या है यह प्यार ? क्यो हम प्यार करते हैं ? आख़िर यह प्यार होता क्या है ? ये सारे सवाल आसन नही हैं । इनका जवाब खोजना और मुस्किल काम है । अगर आप इस तरह के सवाल अपने मित्रो से करेंगे तो कुछ पुराने और तर्क हीन जवाब मिल जायेगा । जै से की -------
१-प्यार बता के नही होता ।
२-यह दिमाक से नही दिल से होता है ।
३-मै प्यार करना नही चाहता था /थी पर हो गया
४-प्यार खुदा/इश्वर की इनायत है ।
इसी तरह की अनेको बातो से आप को टाल दिया जाता है । लेकिन सच्चाई इन सब बातो से कोसो दूर है । दरअसल प्यार का दिल से कुछ लेना -देना नही है । यह सब हमारे मनोविज्ञान और शारीरिक-मानसिक प्रवित्ति का एक हिस्सा है । यह बात विज्ञानं के शोध मे भी साबित हो चुकी है ।
मनुष्य के रूप मे अपना सामाजिक जीवन जीते हुए, हम बहुत से कार्य ना चाहते हुऐ भी करते हैं । हम कई तरह के समझोते भी करते हैं । व्यवहार मे आडम्बर ,ओपचारिकता और ऐसी ही अनेकों बातो का घाल -मेल बढ़ता जाता है । ऐसे मे हमारी हालत उस मकडी की तरह हो जाती है जो अपने ही बनाये जाल मे फस कर मरने लगती है । ऐसे मे हमे एक तरह की मानसिक विश्रांती की आवश्यकता होती है । किसी के स्नेह और विशवास की आवश्यकता होती है । अपनी पूरी वास्तविकता के साथ किसी के सामने प्रस्तुत होने का मन होता है । मन होता है की कोई हमे हमारी पूरी कमियों के साथ स्वीकार कर ले । कोई हो जिसके लिये मुझसे जादा महत्वपूर्ण और कुछ ना हो ।
तो जब मन चाहता है तो हम अपने आस पास से ही किसी को चुन कर उसे अपने प्यार के काबिल बना लेते हैं .

Wednesday, 25 February 2009

सीख

आज जब क्लास रूम मे पंहुचा तो मै १०-१५ मिनट देरी से था । लेकिन अगर ईमानदारी से कहूं तो यह कोई नई बात नही थी । अध्यापक के तौर पर आज भी कितने लोग ठीक समय पे क्लास में जाते हैं , यह शोध किया जाय तो चौकाने वाले नतीजे निकल सकते हैं । फ़िर मै कोई अपवाद कैसे हो सकता हूँ ?

कभी-कभी इसका कारण बड़ा अजीब सा होता है , जैसे की साथ काम करने वालों के साथ उनका बनकर रहने की मजबूरी । मसलन अगर सभी क्लास मे देरी से जाते हैं तो यह आप की नैतिक जिम्मेदारी हो जाती है की आप भी उन्ही की तरह आचरण करें । अन्यथा ''अलग करने '' के चक्कर मे आप ही सबसे अलग कर दिये जायेंगे । और इस तरह का अलगाव बड़ा ही कस्टप्रद होता है .अतः ''जन्हा रहो सब का बन कर रहो ''यह बहुत जरूरी है । दूसरा कारन यह भी है की आज शिक्षको की हालत सरकारी नियमो की वजह say और bigdi है ।
अगर महाराष्ट्र की बात karoo to आप को जानकर aaschary हो ga की yanha

thaika padhati pay sikshako say काम लिया जाता है । इस कारण यह उसकी भी मजबूरी है की वह एक say अधिक जगहों pay काम karay और आमदनी के vaikalpik rasto की talaas karai ।

to बात यहाँ say shoroo हुई थी की मैं क्लास may dair say pahucha । गाँधी जी के sansmaran का एक paath padhanay लगा । jismay way एक dair say aanay wakai adhyaapak को samjhatai हैं की उसकी dari के कारण देश कितना peechay हो जा reha है। जब paath khatm हुआ to एक लड़की nay dhheray say कहा -sir आप भी dair say aayain हैं ।

मैं ander ही ander kafi sarminda हुआ । और उस दिन say मैं nai यह tain किया की मैं अब कभी भी dari say क्लास may नही jaoonga । उस paath nay bachho के साथ -साथ mujhai भी एक nai seekh दी ।

यही थी mari seekh -------------------------------------

Saturday, 21 February 2009

हास्य सम्राट सुनील सावरा



आप लोगो को जान कर खुशी होगी की अब आप मशहूर हास्य सम्राट सुनील सावरा को भी इसी ब्लॉग पर एक लेखक के रूप मे पढ़ सकते हैं। उनके अनुभव और चुटीले व्यन्गो का मजा ले सकते हैं।


majak aur baba ramdev

mujhai kai baar mauka mila baba ramdev say milnay kaa. vai ek achhai insaan hai.unkay ander gajab ka sense of humer hai.vay har baat may hasya khoj laitai hain.hasanai valon ko bhi hasy ka visay bana detai hain.
pichlay dino jab unsay mila to mujhsai bolay-aaj kal kya kar rehai ho ?
mai bola-baba vahi logo ko hasanay ka kaam.
baba bolay beta pranayam shuroo kar do ,nahi to log tumhai sun kar nahi dekh kar hasayin gai.




?

Friday, 13 February 2009

Just to say a 'HI!!!'

Hello friends,  now youu can read my articles on this blog in english.
Thanks to Manish, for inviting me as an Author on this Blog.
Hope you like my posts.

Thursday, 12 February 2009

वैलेंटाइन डे और डॉ.विद्यानिवास मिश्र ----------------------

बात १४ फ़रवरी २००४ की है । मै अपने शोध कार्य से लखनऊ गया था । वहा के महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विस्वविद्यालय -शोध केन्द्र मे मेरा वय्बा था ,विषय स्वीकार करने हेतु। मैं
वहा पे डॉ वीद्याबिंदु सिंह के यहाँ रुका था । विद्या दीदी मुझपे अपार स्नेह रखती हैं । मै अपना शोध कार्य भी उन्ही के साहित्य पे करना चाहता था । पंडित जी (डॉ.विद्यानिवास मिश्र ) भी मरे शोध कार्य से खुश थे। १४ फ़रवरी को मैने अपना विषय शोध समिति के सामने प्रस्तुत किया। विषय स्वीकार भी हो गया । मैं सोच रहा था की जल्दी से यह खबर विद्यादिदी को बता दूँ ।
मैं शाम को जब दीदी के घर आया तो ,सब लोग खामोश थे .दीदी अपने रूम मे रो रही थी । मेरी समझ मे कुछ नही आ रहा था । फ़िर किसी ने बताया की पंडित जी का रोड एक्सीडेंट हो गया ,और वे अब नही रहे ।
यह सुन कर मैं हतप्रभ रह गया .------------------------------आज २००९ ,१४ फ़रवरी को मैं अपना शोध कार्य पूरा कर चुका हूँ । मुंबई विश्विद्यालय से अमरकांत के कथा साहित्य पे । लेकिन जब भी यह १४ फ़रवरी आती है तो पंडित जी का चेहरा आँखों के सामने आ जाता है । सायद इस लिये भी की वो ख़ुद एक संत थे । दीदी ने बताया था की सफ़र में-------JAB KABHI PANDIT JI KO KOI PURANA पेड दिखाई देता वो उसके पास जाते उस पेड से लिपट कर उसे उसकी सेवा के लिये धन्यवाद देते । Aउर उसके प्रति अपनी हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त करते ।
पंडित जी का यह प्रेम का संदेश हम सभी को समझना होगा ।

Sunday, 8 February 2009

भारतीय भाषावों का ग़ज़ल संस्करण -------------


भारतीय भाषावों का ग़ज़ल संस्करण हाल ही मे मुंबई से निकलने वाली पत्रिका ''शब्द श्रृष्टि '' ने प्रकाशित किया ।
इसकी प्रति मिली तो लिखे बगैर नही रहा गया .एक नही अपितु १७ भारतीय भाषावों मे लिखी जा रही ग़ज़लों का समावेश इसमे किया गया है ।
हिन्दी और मराठी भाषा मे प्रकाशित होने वाली यह अपने तरह की अनोखी पत्रिका है । इसके संपादक के रूप मे श्री मनोहर जी और डॉ.विजय बहुत ही सराहनीय कार्य कर रहे हैं।
अगर आप गज़लों के शोखीन हैं , तो यह अंक आप को जरूर पढ़ना चाहिये .हिन्दी,उर्दू,मराठी,पंजाबी,गुजराती,भोजपुरी समेत १७ भाषावों की ग़ज़लों का समावेश इस अंक मे किया गया है।
इस अंक को प्राप्त करने के लिये आप सीधे इसके संपादक से निम्नलिखित पते पर संपर्क कर सकते हैं
श्री मनोहर जी
शब्द श्रिष्टी
१०२,कृष्ण कमल ,प्लाट नम्बर -५
संत यानेश्वर महाराज मार्ग
नेरुल(पूर्व)
नवी मुंबई -४००७०६
मोबाइल नो- ०९८२१९०२२७६ /९८२१५४५२८८
फैक्स-०२२-२७७०१७०३
मुझे विशवास है की यह अंक आप को जरूर पसंद आयेगा ।
अपनी प्रतिक्रिया अवस्य दें ।

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