भारत में वेश्यावृत्ति
इतिहास, कानून और वर्तमान स्थिति
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डॉ. मनीष कुमार सी. मिश्रा
एसोसिएट प्रोफेसर (हिंदी)
के. एम. अग्रवाल कॉलेज, कल्याण (पश्चिम), महाराष्ट्र
प्रामाणिक विधिक, ऐतिहासिक और जन-स्वास्थ्य स्रोतों पर आधारित
सूचना 5 सितंबर 2026 तक
विषय-सूची
01 सारांश और प्रस्तावना
02 अवधारणा: वयस्क सहमति, शोषण और तस्करी
03 प्राचीन भारत, देवदासी परंपराएँ और तवायफ संस्कृति
04 औपनिवेशिक शासन और स्वतंत्रता के बाद का कानून
05 आईटीपीए के प्रमुख प्रावधान और न्यायिक विकास
06 वर्तमान आकार, कार्य-रूप और प्रवेश के मार्ग
07 स्वास्थ्य, HIV, हिंसा, पुलिसिंग और नागरिकता
08 समुदाय-नेतृत्व वाले अनुभव और सरकारी योजनाएँ
09 अंतरराष्ट्रीय नीति-मॉडल, मिथक और प्रमाणित स्थिति
10 कानून की समस्याएँ, नीतिगत सुझाव और निष्कर्ष
11 स्रोत, तथ्य-पद्धति टिप्पणी और पाँच परिशिष्ट
विस्तृत उपशीर्षक दस्तावेज़ के भीतर क्रमांकित हैं।
सारांश
भारत में वेश्यावृत्ति पर सार्वजनिक विमर्श प्रायः दो अतियों में बँट जाता है—एक ओर इसे केवल अपराध, अनैतिकता और मानव-तस्करी का पर्याय मान लिया जाता है; दूसरी ओर कभी-कभी यह दावा किया जाता है कि भारत में वेश्यावृत्ति पूरी तरह वैध है। दोनों कथन अधूरे हैं। भारतीय कानून किसी वयस्क द्वारा सहमति से यौन सेवा देने को अपने-आप में अलग अपराध घोषित नहीं करता, किंतु वेश्यालय चलाने, दूसरे की कमाई पर निर्भर रहने, किसी व्यक्ति को वेश्यावृत्ति के लिए प्राप्त करने या ले जाने, बंधक बनाने, सार्वजनिक स्थान के निकट वेश्यावृत्ति करने और सार्वजनिक रूप से ग्राहकों को आमंत्रित करने जैसी अनेक संबद्ध गतिविधियों को अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956 दंडित करता है। इसी कारण भारतीय व्यवस्था को न तो पूर्ण वैधीकरण और न पूर्ण अपराधीकरण कहना उचित है; यह वयस्क यौन-कार्य के आसपास की गतिविधियों के आंशिक अपराधीकरण की व्यवस्था है। मानव-तस्करी, बलात् यौन-शोषण और बच्चों के व्यावसायिक यौन-शोषण पर अलग तथा कठोर आपराधिक कानून लागू होते हैं।
यह आलेख प्राचीन ग्रंथों में गणिका, मध्यकालीन और आरंभिक आधुनिक काल की तवायफ, देवदासी परंपराओं, औपनिवेशिक सैन्य-चिकित्सकीय नियंत्रण, स्वतंत्र भारत के कानून, न्यायिक निर्णयों और समकालीन जन-स्वास्थ्य कार्यक्रमों का आलोचनात्मक इतिहास प्रस्तुत करता है। इसका केंद्रीय तर्क है कि इन विविध संस्थाओं को एक ही शाश्वत ‘वेश्यावृत्ति’ की श्रेणी में रखना इतिहास-विरोधी है। वर्तमान परिदृश्य के लिए 2020–22 में 651 जिलों में किए गए समुदाय-नेतृत्व वाले कार्यक्रमगत मानचित्रण के 2025 में प्रकाशित निष्कर्षों का उपयोग किया गया है। उसमें लगभग 9,95,499 महिला यौनकर्मियों का अनुमान दिया गया, किंतु यह जनगणना नहीं थी, केवल महिला यौनकर्मियों को लक्षित करती थी और ऑनलाइन माध्यमों को शामिल नहीं करती थी। अतः इसे सटीक सार्वदेशिक संख्या समझना गलत होगा।
आलेख स्वास्थ्य, एचआईवी, हिंसा, कलंक, पहचान-पत्र, आवास, बच्चों की शिक्षा, जाति, लैंगिकता, प्रवास और आजीविका के प्रश्नों की समीक्षा करता है। सर्वोच्च न्यायालय के बुद्धदेव कर्मास्कर (2022) निर्देशों तथा प्रज्वला (2026) निर्णय के आलोक में यह बताता है कि गरिमा, समान संरक्षण और स्वैच्छिक पुनर्वास क्यों आवश्यक हैं। अंतिम भाग में अधिकार-आधारित पुलिसिंग, तस्करी की अधिक सटीक जाँच, समुदाय-नेतृत्व वाली स्वास्थ्य सेवाएँ, सामाजिक सुरक्षा, डेटा-सुधार और कानून-संशोधन के व्यावहारिक सुझाव दिए गए हैं। सूचना और कानून की स्थिति 5 सितंबर 2026 तक उपलब्ध स्रोतों पर आधारित है।
मुख्य शब्द: वेश्यावृत्ति, यौन-कार्य, यौनकर्मी, मानव-तस्करी, आईटीपीए, गरिमा, एचआईवी, देवदासी, तवायफ, भारत
1. प्रस्तावना
वेश्यावृत्ति भारत के सबसे जटिल सामाजिक विषयों में से है। इसमें शरीर, श्रम, लैंगिक सत्ता, गरीबी, यौनिकता, बाजार, जाति, प्रवास, हिंसा, सार्वजनिक स्वास्थ्य, धर्म, नैतिकता और राज्य—सभी एक साथ उपस्थित होते हैं। इसलिए केवल दंड के आँकड़ों, किसी रेड-लाइट इलाके की तस्वीरों या नैतिक मत से इस विषय को समझना संभव नहीं। इसके भीतर एक ओर धोखे, ऋण-बंधन, हिंसा और तस्करी के गंभीर अपराध हैं; दूसरी ओर ऐसे वयस्क भी हैं जो उपलब्ध आजीविका विकल्पों, आर्थिक विवशताओं या अपनी पसंद के मिश्रण में यौन-कार्य करते हैं और पुलिस हिंसा, सामाजिक कलंक तथा कानूनी असुरक्षा से सुरक्षा चाहते हैं। एक ही नीति इन दोनों स्थितियों को एक जैसा माने तो वह या तो पीड़ितों को संरक्षण देने में विफल होगी या वयस्क सहमति और जीविका को अपराध की तरह व्यवहार करेगी।
भाषा स्वयं इस बहस का हिस्सा है। हिंदी का शब्द ‘वेश्या’ लंबा ऐतिहासिक उपयोग रखता है, पर आज वह प्रायः अपमानसूचक अर्थ ग्रहण कर लेता है। अधिकार और जन-स्वास्थ्य के साहित्य में ‘यौनकर्मी’ या ‘यौन-कार्य’ का प्रयोग इसलिए किया जाता है कि व्यक्ति को उसके पेशे में समेट न दिया जाए और काम की परिस्थितियों पर चर्चा संभव हो। कानून में अब भी ‘prostitution’ और कहीं-कहीं ‘prostitute’ जैसे शब्द हैं। इस आलेख के शीर्षक में प्रचलित तथा शोधयोग्य शब्द ‘वेश्यावृत्ति’ रखा गया है, किंतु समकालीन वयस्कों के लिए यथासंभव ‘यौनकर्मी’ और ‘यौन-कार्य’ प्रयुक्त होंगे। जहाँ ऐतिहासिक कानून या न्यायिक पाठ का संदर्भ है, वहाँ मूल कानूनी पद स्पष्ट किया जाएगा।
तीन सीमाएँ आरंभ में स्वीकार करना आवश्यक हैं। पहली, गणिका, नगरवधू, देवदासी, तवायफ, नाचने-गाने वाली कलाकार और आज की यौनकर्मी समान सामाजिक संस्था नहीं हैं। उनके बीच यौन संरक्षण या भुगतान के संबंध कभी हो सकते थे, पर संगीत, नृत्य, काव्य, दरबारी संस्कृति, धार्मिक सेवा, संपत्ति और राजनीतिक प्रभाव के आयाम भी थे। दूसरी, छिपे हुए और कलंकित पेशे की संख्या मापना कठिन है। इसलिए कोई भी एक संख्या अंतिम सत्य नहीं। तीसरी, पंजीकृत मानव-तस्करी के मामले वास्तविक प्रसार के बराबर नहीं होते; वे शिकायत, पुलिस क्षमता, परिभाषा और रिकॉर्डिंग से प्रभावित होते हैं।
इस अध्ययन की पद्धति विधिक और ऐतिहासिक दस्तावेजों, सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों, केंद्र सरकार के आधिकारिक स्रोतों, राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन के प्रकाशनों, सहकर्मी-समीक्षित शोध और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की प्राथमिक सामग्री पर आधारित है। समाचार रिपोर्टों या गैर-सत्यापित वेबसाइटों से प्रसारित बड़े आँकड़ों को प्रमाण नहीं माना गया। जहाँ स्रोतों में मतभेद या सीमा है, उसे छिपाने के स्थान पर स्पष्ट किया गया है।
2. अवधारणा और आवश्यक भेद
2.1 वयस्क सहमति, शोषण और तस्करी
वयस्क सहमति से होने वाला यौन-कार्य एक ऐसी सेवा-विनिमय स्थिति है जिसमें अठारह वर्ष या उससे अधिक आयु का व्यक्ति बिना बल, धोखे, अपहरण या अनुचित नियंत्रण के यौन सेवा देने का निर्णय करता है। सहमति किसी एक समय की स्थायी अनुमति नहीं होती; उसे किसी भी क्षण वापस लिया जा सकता है। भुगतान स्वीकार करने से हिंसा, असुरक्षित यौन संबंध या अवांछित कृत्य के लिए सहमति स्वतः सिद्ध नहीं होती।
मानव-तस्करी का विधिक ढाँचा अलग है। भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 143 में भर्ती, परिवहन, आश्रय, स्थानांतरण या प्राप्ति जैसी क्रिया; धमकी, बल, अपहरण, कपट, धोखा, शक्ति के दुरुपयोग या भुगतान द्वारा नियंत्रण जैसे साधन; और शोषण का उद्देश्य—इन तत्वों को जोड़ा गया है। जब निषिद्ध साधन सिद्ध हों तो पीड़ित की सहमति अप्रासंगिक होती है। बच्चे के मामले में ऐसे ‘साधन’ साबित करना आवश्यक नहीं। व्यक्ति का सीमा या राज्य पार करना भी हर मामले में आवश्यक नहीं; एक ही शहर या घर में नियंत्रण और शोषण हो सकता है। धारा 144 तस्करी किए गए बच्चे या वयस्क को यौन-शोषण के लिए जानबूझकर इस्तेमाल करने को दंडित करती है।
इन परिभाषाओं का व्यावहारिक अर्थ यह है कि हर यौनकर्मी को स्वतः तस्करी-पीड़ित कहना गलत है, लेकिन किसी व्यक्ति का पहले से यौन उद्योग के बारे में जानना भी तस्करी की संभावना समाप्त नहीं करता। उसे काम की वास्तविक शर्तों के बारे में धोखा दिया गया हो, उसकी कमाई छीनी जाती हो, बाहर जाने से रोका जाता हो, ऋण के नाम पर नियंत्रण हो या हिंसा की धमकी हो सकती है। जाँच को व्यक्ति की वास्तविक स्वतंत्रता और काम की परिस्थितियों पर केंद्रित होना चाहिए।
2.2 बच्चों के संदर्भ में शून्य सहमति
अठारह वर्ष से कम आयु के व्यक्ति को भारतीय कानून बच्चा मानता है। लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 के अंतर्गत बच्चे की कथित सहमति यौन अपराध को वैध नहीं बनाती। इसलिए ‘बाल वेश्यावृत्ति’ जैसे पुराने पद के स्थान पर ‘बच्चों का व्यावसायिक यौन-शोषण’ अधिक सही है। इसमें खरीदार, दलाल, परिवहनकर्ता, आश्रय देने वाले, ऑनलाइन सामग्री बनाने या प्रसारित करने वाले तथा लाभार्थी वयस्क उत्तरदायी हो सकते हैं; बच्चा अपराधी नहीं, संरक्षण और न्याय का अधिकारी है। डिजिटल सामग्री पर सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धाराएँ 67ए और 67बी भी लागू हो सकती हैं।
2.3 अपराधीकरण, वैधीकरण और अपराध-मुक्ति
इन शब्दों को भी मिलाना नहीं चाहिए। पूर्ण अपराधीकरण में बेचने और/या खरीदने सहित अधिकांश क्रियाएँ अपराध होती हैं। वैधीकरण में यौन-कार्य अनुमत तो होता है, किंतु लाइसेंस, निर्धारित क्षेत्र, स्वास्थ्य जाँच या पंजीकरण जैसी विशेष शर्तों से नियंत्रित रहता है। ‘नॉर्डिक’ या ‘एंड-डिमांड’ मॉडल में सामान्यतः सेवा बेचने वाले को नहीं, खरीदने वाले और तीसरे पक्ष को दंडित करने का लक्ष्य होता है। अपराध-मुक्ति में वयस्क सहमति वाले व्यवहार से विशेष आपराधिक दंड हटाकर सामान्य श्रम, स्वास्थ्य, नगर और हिंसा-विरोधी कानून लगाए जाते हैं। भारत इनमें से किसी शुद्ध मॉडल पर नहीं है; यहाँ संबद्ध गतिविधियों का व्यापक अपराधीकरण है।
3. प्राचीन भारत: पाठ, संस्था और इतिहास-लेखन की सावधानी
प्राचीन भारतीय साहित्य में गणिका, रूपजीवा, वारांगना और नगरवधू जैसे अनेक पद मिलते हैं। किंतु अलग भाषाओं, कालों और विधाओं में उनके अर्थ बदलते हैं। धार्मिक या साहित्यिक आख्यान सामाजिक जीवन का दर्पण अवश्य हैं, पर उन्हें जनगणना या प्रत्यक्ष प्रशासनिक अभिलेख नहीं माना जा सकता। इसी प्रकार आधुनिक ‘सेक्स वर्क’ की अवधारणा को बिना सावधानी प्राचीन समाज पर आरोपित करना अनैतिहासिक होगा।
कौटिल्य के अर्थशास्त्र के द्वितीय अधिकरण में ‘गणिकाध्यक्ष’ का वर्णन प्रसिद्ध है। आर. शामशास्त्री के अंग्रेजी अनुवाद में गणिकाओं की नियुक्ति, पारिश्रमिक, दंड, राजकीय सेवाओं और संरक्षण से संबंधित नियम दिखाई देते हैं। पाठ से यह संकेत मिलता है कि लेखक की कल्पित शासन-व्यवस्था में उच्च प्रशिक्षित गणिका मनोरंजन, दरबारी सेवा और कभी सूचना-संग्रह से संबद्ध थी; राज्य उससे राजस्व और अनुशासन दोनों चाहता था। किसी गणिका को नुकसान पहुँचाने या उसकी संपत्ति हड़पने पर दंड जैसे प्रावधान भी थे। इससे न तो यह सिद्ध होता है कि सभी गणिकाएँ स्वतंत्र थीं, न यह कि प्राचीन भारत ने आधुनिक अर्थ में वेश्यावृत्ति को ‘कानूनी पेशा’ घोषित किया था। अर्थशास्त्र की रचना-तिथि और पाठ-परतों पर विद्वानों में मतभेद है; इसलिए इसे एक मानक राजनीतिक ग्रंथ और सामाजिक कल्पना के स्रोत की तरह पढ़ना चाहिए, पूरे उपमहाद्वीप की एकरूप वास्तविकता की तरह नहीं।
संस्कृत और पालि कथाओं में नगरवधू या गणिका कभी संपन्न, शिक्षित और नगर की सांस्कृतिक प्रतिष्ठा से जुड़ी दिखाई देती है। आम्रपाली का आख्यान इसका लोकप्रिय उदाहरण है। किंतु प्रसिद्ध अपवादों से साधारण स्त्रियों की दशा नहीं जानी जा सकती। सामाजिक दर्जा, आर्थिक स्वायत्तता और यौन उपलब्धता के बीच संबंध असमान रहे होंगे। सत्ता द्वारा संरक्षण स्वायत्तता दे सकता था, लेकिन वही निर्भरता और नियंत्रण भी पैदा कर सकता था।
धर्मशास्त्रीय पाठों में यौन आचरण और स्त्रियों के लिए नैतिक श्रेणियाँ कठोर थीं। राज्यशास्त्रीय और धर्मशास्त्रीय दृष्टियों के बीच अंतर बताता है कि प्राचीन भारत कोई एक विचार नहीं था। एक पाठ राजस्व और प्रशासन पर बल देता है तो दूसरा शुचिता और जाति-परिवार व्यवस्था पर। इतिहास की ईमानदार व्याख्या इस बहुलता को स्वीकार करती है। ‘दुनिया का सबसे पुराना पेशा’ जैसे वाक्य आकर्षक हैं, पर वे परिवर्तनशील संस्थाओं को प्राकृतिक और अपरिवर्तनीय बना देते हैं।
4. देवदासी परंपराएँ: धर्म, कला, जाति और शोषण
‘देवदासी’ भी एक अखिल भारतीय, अपरिवर्तनीय श्रेणी नहीं थी। अलग क्षेत्रों में देवता को समर्पित महिलाओं के नाम, अनुष्ठान, जातीय आधार, मंदिर से संबंध और संपत्ति-अधिकार अलग थे। कुछ समुदायों की महिलाएँ संगीत और नृत्य की विशेषज्ञ, मंदिर-कर्मचारी, भूमि या दान की धारक तथा सांस्कृतिक परंपरा की संवाहक थीं। कुछ व्यवस्थाओं में संरक्षक पुरुषों से यौन संबंध और आर्थिक निर्भरता भी थी। औपनिवेशिक राजस्व-परिवर्तन, मंदिर संरक्षण में गिरावट, जाति-असमानता और आधुनिक नैतिक सुधार आंदोलनों ने इन संस्थाओं को बदला। अतः हर ऐतिहासिक देवदासी को ‘वेश्या’ कहना उनके कलात्मक, धार्मिक और संपत्ति-संबंधी इतिहास को मिटाना है; साथ ही बाद के दौर में समर्पण के नाम पर हुए यौन-शोषण से आँख मूँदना भी अनुचित है।
उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी में ‘एंटी-नौच’ और सामाजिक सुधार अभियानों ने समर्पण तथा नृत्य परंपराओं को लक्ष्य बनाया। सुधार का एक उद्देश्य बालिकाओं के समर्पण और शोषण को रोकना था, किंतु इसके साथ औपनिवेशिक विक्टोरियाई नैतिकता और उच्चवर्णीय सम्मान की धारणाएँ भी जुड़ी थीं। परिणामस्वरूप कई कलाकारों की जीविका और प्रतिष्ठा समाप्त हुई, जबकि उनके कला-रूपों के कुछ हिस्से नए, ‘सम्मानित’ मंचों पर पुनर्गठित हुए। यह विडंबना भारतीय शास्त्रीय नृत्य के आधुनिक इतिहास में महत्त्वपूर्ण है।
कानूनी निषेध क्रमशः आया—बंबई देवदासी संरक्षण अधिनियम, 1934; मद्रास देवदासी (समर्पण निवारण) अधिनियम, 1947; कर्नाटक देवदासी (समर्पण प्रतिषेध) अधिनियम, 1982; और आंध्र प्रदेश देवदासी (समर्पण प्रतिषेध) अधिनियम, 1988 इसके प्रमुख उदाहरण हैं। केंद्र के गृह मंत्रालय ने 2015 में राज्यों को देवदासी प्रथा के उन्मूलन और कानूनों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए परामर्श जारी किया। कानून के बावजूद गरीबी, जातीय बहिष्कार, अंधविश्वास और कमजोर पुनर्वास के कारण कुछ क्षेत्रों में समर्पण की शिकायतें बनी रही हैं। इसका समाधान केवल छापे या दंड नहीं; बालिकाओं की शिक्षा, परिवार की आय, आवास, भूमि-अधिकार, स्थानीय निगरानी और भेदभाव-विरोधी कार्रवाई का मेल होना चाहिए।
5. तवायफ और दरबारी संस्कृति
मुगल और उत्तर-मुगल नगरों तथा अनेक रियासतों में तवायफें संगीत, नृत्य, कविता, भाषा और अदब की प्रशिक्षित कलाकार थीं। वे दरबार, कुलीन संरक्षण और शहरी मनोरंजन अर्थव्यवस्था से जुड़ी थीं। कुछ ने संपत्ति रखी, शिष्यों को प्रशिक्षित किया और सांस्कृतिक रुचि पर प्रभाव डाला। उनके जीवन में यौन या संरक्षक संबंध हो सकते थे, लेकिन ‘तवायफ’ को साधारणतः ‘वेश्या’ का पर्याय बना देना ऐतिहासिक वास्तविकता को संकुचित करता है। सौम्या चंदा का सांस्कृतिक कॉमन्स संबंधी अध्ययन बताता है कि तवायफ समुदायों ने कला और ज्ञान की साझा परंपराओं को जीवित रखा, जिन्हें औपनिवेशिक और राष्ट्रवादी सम्मान-राजनीति ने हाशिए पर धकेला।
1857 के बाद उत्तर भारत में दरबारी संरक्षण का क्षय, ब्रिटिश निगरानी और सार्वजनिक नैतिकता के नए मानदंड तवायफों की स्थिति पर भारी पड़े। जनगणना और पुलिस वर्गीकरण ने विविध कलाकारों को कभी-कभी एक व्यापक ‘prostitute’ श्रेणी में समेटा। ग्रामोफोन, रंगमंच और प्रारंभिक सिनेमा ने कुछ कलाकारों को नए अवसर दिए, पर सामाजिक सम्मान का पुनर्वितरण समान नहीं था। कला को अपनाया गया, कलाकार समुदायों को अक्सर कलंकित रखा गया। आधुनिक लोकप्रिय संस्कृति में तवायफ की रोमानी छवि और ‘कोठे’ की सनसनी दोनों मिलती हैं; शोध को इनके बीच वास्तविक सामाजिक इतिहास खोजने की जरूरत है।
6. औपनिवेशिक शासन: नियंत्रण, नस्ल और चिकित्सा
ब्रिटिश औपनिवेशिक नीति ने वेश्यावृत्ति को समाप्त करने के बजाय लंबे समय तक सैन्य आवश्यकता और रोग-नियंत्रण के दृष्टिकोण से संचालित किया। 1864 का कैंटोनमेंट अधिनियम और 1868 का भारतीय संक्रामक रोग अधिनियम सैनिक छावनियों के आसपास महिलाओं के पंजीकरण, चिकित्सकीय परीक्षण और ‘लॉक अस्पतालों’ में निरुद्ध करने की व्यवस्था से जुड़े थे। मूल चिंता ब्रिटिश सैनिकों में उपदंश और अन्य यौन-संचारित संक्रमण को कम करना थी। ग्राहक पुरुषों पर समान निगरानी नहीं थी; रोग का स्रोत स्त्री शरीर को मान लिया गया।
ऐतिहासिक शोध दिखाता है कि यह शासन केवल शीर्ष से लागू कानून नहीं था। स्थानीय गोमास्ता, चपरासी, पुलिस, चौधरानी, चिकित्सक और सैन्य अधिकारी पहचान, पंजीकरण और नियंत्रण में भूमिका निभाते थे। महिलाओं ने कभी स्थान बदलकर, पहचान छिपाकर या प्रशासन से बातचीत कर प्रतिरोध भी किया। इससे पता चलता है कि ‘औपनिवेशिक राज्य’ एक एकल सर्वशक्तिमान संस्था नहीं, बल्कि स्थानीय मध्यस्थों के माध्यम से काम करने वाला असमान तंत्र था।
इन नियमों का नस्ली और लैंगिक आधार स्पष्ट था। भारतीय महिलाओं की स्वतंत्रता और स्वास्थ्य को ब्रिटिश सैनिक की सैन्य क्षमता के अधीन रखा गया। जब ब्रिटेन और भारत में आलोचना बढ़ी तो व्यवस्था में बदलाव और निरसन हुए, किंतु पुलिस-चिकित्सा निगरानी की विरासत बनी रही। औपनिवेशिक शासन ने ‘सम्मानित महिला’ और ‘सार्वजनिक महिला’ के बीच कठोर सीमा बनाई। तवायफ, नर्तकी, अकेली प्रवासी स्त्री और गरीब महिला पुलिस संदेह की समान दृष्टि में आ सकती थीं।
बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में भारतीय सामाजिक सुधार, महिला संगठन, राष्ट्रवादी नैतिकता और अंतरराष्ट्रीय ‘श्वेत दासता’ विमर्श ने तस्करी तथा वेश्यावृत्ति-विरोधी कानूनों की दिशा बदली। सुधार आंदोलनों ने वास्तविक शोषण और बालिकाओं की खरीद-बिक्री पर ध्यान खींचा, पर अनेक बार प्रभावित महिलाओं की आवाज अनुपस्थित रही। स्वतंत्रता के बाद का कानून इसी मिश्रित विरासत—कल्याण, दमन, नैतिकता और अंतरराष्ट्रीय दायित्व—से निकला।
7. स्वतंत्रता के बाद: संविधान से आईटीपीए तक
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 23 मानव-तस्करी, बेगार और अन्य प्रकार के बलात् श्रम को निषिद्ध करता है। अनुच्छेद 14 समानता, अनुच्छेद 15 लिंग सहित निर्दिष्ट आधारों पर भेदभाव का निषेध, अनुच्छेद 19 कुछ स्वतंत्रताएँ और अनुच्छेद 21 जीवन तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है। सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 21 को गरिमा, गोपनीयता और शारीरिक स्वायत्तता से जोड़ा है। इसका अर्थ यह नहीं कि न्यायालय ने यौन-कार्य को बिना किसी विनियमन के मौलिक पेशागत अधिकार घोषित कर दिया; अर्थ यह है कि यौनकर्मी भी संविधान के समान नागरिक हैं और पेशे के कारण हिंसा, मनमानी गिरफ्तारी या स्वास्थ्य-सेवा से वंचित नहीं किए जा सकते।
संयुक्त राष्ट्र के 1949 के ‘व्यक्तियों के व्यापार और दूसरों की वेश्यावृत्ति के शोषण के दमन’ संबंधी अभिसमय की पृष्ठभूमि में भारत ने 1956 में Suppression of Immoral Traffic in Women and Girls Act बनाया, जिसे सामान्यतः SITA कहा गया। 1986 के संशोधन के बाद इसका नाम Immoral Traffic (Prevention) Act, 1956—अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम या आईटीपीए—हुआ और भाषा कुछ हद तक लिंग-तटस्थ की गई। फिर भी अधिनियम का ढाँचा शोषण रोकने, सार्वजनिक व्यवस्था और संस्थागत ‘सुधार/संरक्षण’ के पुराने विचारों का मिश्रण बना रहा।
आईटीपीए की परिभाषा में ‘prostitution’ को व्यावसायिक प्रयोजन के लिए व्यक्ति का यौन-शोषण या दुरुपयोग कहा गया है। समस्या यह है कि परिभाषा ‘शोषण’ और सभी भुगतानयुक्त यौन सेवा के संबंध को अस्पष्ट बनाती है। अधिनियम एकांत में किसी वयस्क द्वारा सहमति से सेवा देने को सीधे अपराध नहीं बनाता, पर अनेक व्यवहार दंडनीय हैं। यही कानूनी भूलभुलैया यौनकर्मी, मकान-मालिक, साथी, परिवार, चालक और आयोजक के बीच सामान्य तथा शोषणकारी संबंधों को अलग करना कठिन बनाती है।
7.1 आईटीपीए के प्रमुख प्रावधान
इस सारणी का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष है: भारत में ‘वेश्यावृत्ति पूरी तरह वैध है’ कहना भी भ्रामक है और ‘वेश्यावृत्ति करना अपने-आप में अपराध है’ कहना भी। व्यक्तिगत वयस्क सहमति स्वयं अलग अपराध नहीं, किंतु स्थान, सार्वजनिक आमंत्रण, तीसरे पक्ष और सामूहिक व्यवस्था से जुड़े प्रावधान व्यवहार में काम को अत्यंत असुरक्षित बना सकते हैं।
8. न्यायिक विकास: नियंत्रण से गरिमा तक
8.1 राज्य उत्तर प्रदेश बनाम कौशल्या
1964 में State of Uttar Pradesh v. Kaushaliya में सर्वोच्च न्यायालय ने तत्कालीन SITA की धारा 20 के तहत किसी ‘वेश्या’ को क्षेत्र से हटाने की व्यवस्था पर विचार किया और उसे सार्वजनिक हित में उचित वर्गीकरण/प्रतिबंध माना। यह निर्णय उस युग की सार्वजनिक नैतिकता और व्यवस्था-केंद्रित दृष्टि को दर्शाता है। आज निजता, गरिमा, समानता और प्रक्रिया संबंधी विकसित न्यायशास्त्र के आलोक में इस प्रकार के स्थानिक निष्कासन की आलोचना होती है, विशेषकर तब जब ग्राहक या शोषक के बजाय महिला को ही ‘समस्या’ माना जाए।
8.2 विशाल जीत और गौरव जैन
Vishal Jeet v. Union of India (1990) में सर्वोच्च न्यायालय ने बच्चों की वेश्यावृत्ति, देवदासी और जोगिन प्रथाओं तथा दलालों और वेश्यालय संचालकों के विरुद्ध कार्रवाई पर बल दिया। न्यायालय ने समस्या के सामाजिक-आर्थिक मूल और निवारक, कल्याणकारी कार्यक्रमों की आवश्यकता स्वीकार की। Gaurav Jain v. Union of India (1997) में यौनकर्मियों के बच्चों की शिक्षा, पुनर्वास और अवसरों पर ध्यान गया। इन निर्णयों ने राज्य को निष्क्रियता से बाहर लाने में भूमिका निभाई, पर पुराने संरक्षणवादी साहित्य में माँ और बच्चे को अलग करने या संस्थागत पुनर्वास को सहज समाधान मानने की प्रवृत्ति भी थी। बाद का न्यायशास्त्र स्पष्ट करता है कि माँ का पेशा अपने-आप बच्चे से अलगाव का आधार नहीं है।
8.3 मधुकर नारायण मर्दिकर
State of Maharashtra v. Madhukar Narayan Mardikar (1991) में न्यायालय ने कहा कि कथित ‘आसान चरित्र’ वाली महिला भी निजता और यौन आक्रमण से सुरक्षा की अधिकारी है। इस सिद्धांत का महत्व व्यापक है: किसी स्त्री का अतीत, पेशा या यौन इतिहास उसकी गवाही को स्वतः अविश्वसनीय नहीं बनाता और किसी पुलिसकर्मी या ग्राहक को उस पर अधिकार नहीं देता। आधुनिक साक्ष्य और लैंगिक न्याय की दृष्टि में यह रूढ़ छवि के विरुद्ध महत्वपूर्ण कदम था।
8.4 बुद्धदेव कर्मास्कर: गरिमा और कार्यान्वयन
Budhadev Karmaskar v. State of West Bengal मूलतः एक यौनकर्मी की हत्या से उत्पन्न आपराधिक अपील थी। 2011 से न्यायालय ने यौनकर्मियों की गरिमा और पुनर्वास पर व्यापक विचार शुरू किया तथा एक पैनल बनाया। 19 मई 2022 के आदेश में तीन-न्यायाधीश पीठ ने लंबित विधायी सुधार के बीच संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत विस्तृत निर्देश दिए।
न्यायालय ने मूल सिद्धांत रखा कि प्रत्येक व्यक्ति को, पेशे से निरपेक्ष, गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार है और यौनकर्मी कानून के समान संरक्षण के अधिकारी हैं। पुलिस को किसी वयस्क व्यक्ति के सहमति से यौन-कार्य करने की स्थिति में केवल इस कारण हस्तक्षेप या आपराधिक कार्रवाई नहीं करनी चाहिए। वेश्यालय चलाना गैरकानूनी है, पर किसी छापे के दौरान वहाँ उपस्थित स्वैच्छिक वयस्क यौनकर्मी को गिरफ्तार, दंडित, प्रताड़ित या पीड़ित नहीं किया जाना चाहिए।
यौनकर्मी की शिकायत—विशेषतः यौन हिंसा की शिकायत—को अन्य नागरिक की शिकायत की तरह गंभीरता से दर्ज और जाँचा जाना चाहिए। चिकित्सा और कानूनी सहायता समान रूप से मिलनी चाहिए। पुलिस को मौखिक/शारीरिक दुर्व्यवहार, जबरन यौन संबंध और हिंसा से बचने के लिए संवेदनशील बनाया जाए। मीडिया पहचान उजागर करने वाली तस्वीर या विवरण प्रकाशित न करे। कंडोम को अपराध के सबूत की तरह न देखा जाए, क्योंकि ऐसा करने से सुरक्षित यौन व्यवहार हतोत्साहित होता है।
आदेश ने यह भी कहा कि यौनकर्मी प्रतिनिधियों को नीतिनिर्माण में शामिल किया जाए; विधिक सेवा प्राधिकरण अधिकार-जागरूकता शिविर चलाएँ; और केवल माँ के यौनकर्मी होने के कारण बच्चे को उससे अलग न किया जाए। संरक्षण गृहों में अपनी इच्छा के विरुद्ध रह रही वयस्क महिलाओं की स्थिति की समीक्षा तथा पहचान-पत्र पाने में सहायता पर भी जोर था। आधार नामांकन में NACO/राज्य एड्स नियंत्रण सोसाइटी के अधिकारी के प्रमाण-पत्र और गोपनीयता की व्यवस्था सुझाई गई। यह फैसला ‘वेश्यावृत्ति को वैध’ करने वाला कानून नहीं है; इसने मौजूदा कानून के भीतर पुलिसिंग को संवैधानिक गरिमा और वयस्क सहमति के अनुरूप करने का निर्देश दिया।
8.5 प्रज्वला निर्णय, 2026
29 मई 2026 को Prajwala v. Union of India में सर्वोच्च न्यायालय ने व्यावसायिक यौन-शोषण के लिए मानव-तस्करी पर विस्तृत निर्णय दिया। न्यायालय ने अंतरराष्ट्रीय ‘3P’ ढाँचे—रोकथाम, अभियोजन/दंड और संरक्षण—का विश्लेषण किया। उसने स्पष्ट किया कि वयस्क तस्करी के लिए क्रिया, निषिद्ध साधन और शोषण का उद्देश्य समझना आवश्यक है; बच्चे के मामले में साधन सिद्ध करना जरूरी नहीं; और आवाजाही तस्करी की अनिवार्य शर्त नहीं। हर शोषण को बिना तत्वों की जाँच तस्करी कहना भी गलत है, तथा केवल पीड़ित के उद्योग के बारे में पूर्वज्ञान के आधार पर तस्करी नकारना भी।
निर्णय ने बुद्धदेव कर्मास्कर के अधिकार-आधारित निर्देशों को ध्यान में रखते हुए स्वैच्छिक वयस्क यौनकर्मियों को ‘बचाव’ के नाम पर हिरासत या उत्पीड़न से बचाने और पुनर्वास को स्वैच्छिक रखने की आवश्यकता दोहराई। यह संतुलन वर्तमान कानून का महत्वपूर्ण बिंदु है: राज्य को तस्करी और जबरन शोषण के विरुद्ध कठोर होना है, पर वयस्क की एजेंसी मिटाकर अनिश्चितकालीन संस्थागत नियंत्रण नहीं करना है।
8.6 प्रमुख निर्णयों का संक्षिप्त मानचित्र
9. वर्तमान आकार और भौगोलिक स्वरूप: हम वास्तव में क्या जानते हैं?
भारत में यौनकर्मियों की संख्या के बारे में इंटरनेट और लोकप्रिय लेखों में लाखों से करोड़ों तक के दावे मिलते हैं। अक्सर उनमें वर्ष, परिभाषा, नमूना या गणना-पद्धति नहीं होती। ऐसा आँकड़ा दोहराना तथ्य नहीं, बल्कि मिथक को प्रमाण का रूप देना है। छिपी हुई आबादी का अनुमान लगाने के लिए प्रत्यक्ष जनगणना कठिन है: कलंक और पुलिस भय के कारण लोग पहचान नहीं बताते; काम कभी-कभार या मौसमी हो सकता है; घर, फोन और डिजिटल प्लेटफॉर्म से काम करने वाले सार्वजनिक ‘हॉटस्पॉट’ में नहीं मिलते; तथा ‘यौन सेवा के बदले धन’ और अन्य प्रकार के लेन-देन वाले संबंधों की सीमा हमेशा स्पष्ट नहीं होती।
इस समय सबसे विस्तृत राष्ट्रीय कार्यक्रमगत स्रोत प्रदीप कुमार और सहलेखकों का समुदाय-नेतृत्व वाला Programmatic Mapping and Population Size Estimation अध्ययन है, जो 7 मई 2025 को PLOS Global Public Health में प्रकाशित हुआ। 2020–22 में 763 में से 651 जिलों और 32 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में यह कार्य हुआ। समुदाय के सदस्यों और कार्यक्रम कर्मियों ने स्थानों, नेटवर्क-संचालकों और गाँव-आधारित संपर्कों की पहचान की; विभिन्न स्रोतों के दोहराव को समायोजित कर अनुमान बनाया गया। अध्ययन का उद्देश्य HIV रोकथाम सेवाओं की योजना था, कोई दंडात्मक सूची तैयार करना नहीं।
अध्ययन ने 9,95,499 महिला यौनकर्मियों का बिंदु-अनुमान दिया, जिसकी अनुमान-सीमा 9,02,277 से 10,88,712 थी। यह प्रति एक हजार वयस्क महिलाओं पर 2.75 का अनुपात था। शोधकर्ताओं ने 43,579 हॉटस्पॉट, 10,718 नेटवर्क ऑपरेटर और 16,095 ऐसे गाँव चिह्नित किए जहाँ लिंक-वर्कर के माध्यम से संपर्क था। अनुमानित आबादी में लगभग 77 प्रतिशत हॉटस्पॉट, 14 प्रतिशत केवल नेटवर्क ऑपरेटर और 9 प्रतिशत लिंक-वर्कर गाँवों के माध्यम से अनुमानित थी। ये प्रतिशत संपर्क-माध्यम बताते हैं; इन्हें स्थायी कार्यस्थल की अपरिवर्तनीय पहचान न माना जाए।
हॉटस्पॉट के प्रकार में घर-आधारित स्थान 55.1 प्रतिशत, सड़क-आधारित 16.1 प्रतिशत और वेश्यालय-आधारित 5.9 प्रतिशत थे। शेष अन्य प्रकार—लॉज, ढाबा, बार अथवा मिश्रित स्थल—हो सकते हैं। यह निष्कर्ष रेड-लाइट क्षेत्र को पूरे यौन-कार्य का प्रतीक मानने की सीमा उजागर करता है। समकालीन काम अधिक बिखरा, घर-आधारित और नेटवर्क-संचालित है। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म अध्ययन में शामिल नहीं थे, इसलिए डिजिटल विस्तार का अनुमान इससे नहीं लगाया जा सकता।
राज्यवार अनुमानित आबादी में कर्नाटक का हिस्सा 15.4 प्रतिशत, आंध्र प्रदेश 12.0, महाराष्ट्र 9.6, दिल्ली 8.9 और तेलंगाना 7.6 प्रतिशत था। इन पाँच का कुल हिस्सा लगभग 53 प्रतिशत था। इसका अर्थ यह नहीं कि इन राज्यों में अनिवार्यतः शोषण अधिक है; बेहतर समुदाय नेटवर्क, नगरीकरण, कार्यक्रम कवरेज और मापन क्षमता भी दृश्यता को प्रभावित करती है। छोटे अनुमान वाले राज्य ‘समस्या-मुक्त’ नहीं माने जा सकते।
अध्ययन में प्रमुख सूचना-दाताओं के अनुमान, स्मृति और सामाजिक वांछनीयता से त्रुटि संभव है। छिपे हुए, अस्थायी या बहुत कम काम करने वाले व्यक्तियों का छूटना संभव है। यह पुरुष, ट्रांसजेंडर और गैर-द्विआधारी यौनकर्मियों की राष्ट्रीय संख्या नहीं देता। इसलिए “भारत में ठीक इतने ही यौनकर्मी हैं” कहना अध्ययन का गलत उपयोग होगा। सही वाक्य है: उपलब्ध नवीन व्यापक कार्यक्रमगत मानचित्रण ने लगभग दस लाख महिला यौनकर्मियों का अनुमान दिया, पर स्पष्ट पद्धतिगत सीमाओं के साथ।
10. काम के रूप और बदलती अर्थव्यवस्था
समकालीन यौन-कार्य अनेक रूपों में होता है। पारंपरिक वेश्यालय और रेड-लाइट इलाके सार्वजनिक कल्पना में प्रमुख हैं, पर घर-आधारित सेवा, सड़क या परिवहन केंद्रों पर संपर्क, लॉज/होटल, बार और मनोरंजन स्थल, फोन के माध्यम से स्वतंत्र संपर्क, दलाल या नेटवर्क ऑपरेटर, और वेबसाइट/मैसेजिंग ऐप आधारित व्यवस्था सभी मौजूद हैं। एक व्यक्ति समय, मौसम, शहर और ग्राहक के अनुसार एक से अधिक रूप अपना सकता है। वर्गीकरण इसलिए तरल है।
घर-आधारित काम गोपनीयता और किराये की लागत में कुछ लाभ दे सकता है, लेकिन पड़ोस, मकान-मालिक और घरेलू हिंसा का जोखिम भी हो सकता है। सड़क-आधारित काम में ग्राहक खोजने की क्षमता होती है, किंतु पुलिस कार्रवाई, सार्वजनिक हिंसा और मौसम का खतरा अधिक है। वेश्यालय-आधारित व्यवस्था में सहकर्मी सहायता और नियमित ग्राहक मिल सकते हैं, पर मालिक, ऋण और आवाजाही पर नियंत्रण शोषण का माध्यम बन सकते हैं। ऑनलाइन संपर्क मध्यस्थ को घटा सकता है, पर डिजिटल निशान, ब्लैकमेल, नकली प्रोफाइल, स्थान-डेटा, गैर-सहमति से तस्वीर साझा करने और साइबर धोखाधड़ी के नए खतरे उत्पन्न करता है।
महिला यौनकर्मियों पर राष्ट्रीय डेटा अपेक्षाकृत अधिक है क्योंकि HIV कार्यक्रमों ने इसी श्रेणी को ‘प्रमुख आबादी’ माना। पुरुष यौनकर्मी, ट्रांसजेंडर महिलाएँ, पुरुषों के साथ यौन संबंध रखने वाले पुरुष, और गैर-द्विआधारी व्यक्ति अलग या अतिव्यापी नेटवर्क में काम कर सकते हैं। यौन पहचान, व्यवहार और पेशा एक ही चीज नहीं: सभी समलैंगिक/ट्रांस व्यक्ति यौनकर्मी नहीं, और सभी पुरुष यौनकर्मी स्वयं को समलैंगिक नहीं मानते। सेवा-डिजाइन में यह भेद जरूरी है।
यौन-कार्य पूर्णकालिक जीवनभर का पेशा होना आवश्यक नहीं। कोई व्यक्ति कृषि-मौसम, बेरोजगारी, घरेलू खर्च, बीमारी, कर्ज या प्रवास के समय अस्थायी रूप से इसे कर सकता है। कोई वर्षों तक समुदाय-आधारित कार्यकर्ता भी बन सकता है। आय ग्राहक, स्थान, आयु, भाषा, डिजिटल पहुँच और मध्यस्थ पर निर्भर है। राष्ट्रीय ‘औसत कमाई’ का भरोसेमंद ताजा आँकड़ा उपलब्ध न होने पर कोई काल्पनिक रुपये राशि देना अनुचित होगा। खर्च में किराया, यात्रा, फोन, होटल, दलाली, पुलिस को अवैध भुगतान, स्वास्थ्य, बच्चों की देखभाल और ऋण शामिल हो सकते हैं; सकल भुगतान वास्तविक आय नहीं होता।
11. प्रवेश के मार्ग: एक कारण नहीं, परिस्थितियों का जाल
गरीबी महत्वपूर्ण है, पर अकेला स्पष्टीकरण नहीं। भारत में करोड़ों गरीब महिलाएँ यौन-कार्य नहीं करतीं और कुछ यौनकर्मी केवल चरम गरीबी से नहीं आए। अधिक उपयोगी दृष्टि यह पूछती है कि किसी व्यक्ति के उपलब्ध विकल्प क्या थे, निर्णय पर किसका नियंत्रण था और क्या वह काम छोड़ सकता है। भूमि और शिक्षा की कमी, जातीय भेदभाव, कम मजदूरी, घरेलू हिंसा, विवाह टूटना, विधवापन, परिवार का भरण-पोषण, प्रवास, ऋण, प्राकृतिक आपदा, धोखा और तस्करी अलग-अलग संयोजन में भूमिका निभाते हैं। कुछ वयस्क घरेलू काम, कारखाने या अनौपचारिक मजदूरी की तुलना में अधिक आय और समय पर नियंत्रण के कारण यौन-कार्य चुनने की बात कहते हैं। ‘चयन’ और ‘विवशता’ अक्सर द्वैत नहीं, एक निरंतरता हैं।
जाति का प्रभाव क्षेत्र और समुदाय के अनुसार बदलता है। ऐतिहासिक समर्पण प्रथाएँ कुछ दलित और अन्य हाशिए के समुदायों से जुड़ी रही हैं। जाति रोजगार, भूमि, शिक्षा और विवाह अवसर सीमित कर सकती है। फिर भी हर दलित यौनकर्मी को देवदासी या हर देवदासी को वर्तमान यौनकर्मी मानना रूढ़ि होगी। शोध को समुदाय-विशिष्ट प्रमाण चाहिए और जातीय पहचान प्रकाशित करते समय सुरक्षा का ध्यान रखना चाहिए।
प्रवास के दो पहलू हैं। शहर या दूसरे राज्य जाने से व्यक्ति को ग्राहक और आय मिल सकती है तथा अपने गाँव के कलंक से दूरी भी। दूसरी ओर भाषा, पहचान-पत्र, स्थानीय नेटवर्क और आवास के अभाव में वह मध्यस्थ पर निर्भर हो सकता है। महामारी, लॉकडाउन या अचानक पुलिस कार्रवाई जैसे संकटों में प्रवासी यौनकर्मी भोजन और परिवहन दोनों से वंचित हो सकते हैं। इसलिए पोर्टेबल राशन, बैंकिंग, स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा अधिकार विशेष महत्व रखते हैं।
तस्करी में भर्ती का झूठा वादा—घरेलू काम, विवाह, मनोरंजन या कारखाने की नौकरी—एक मार्ग हो सकता है। अन्य मामलों में व्यक्ति यौन-कार्य जानकर जाता है, पर बाद में पासपोर्ट/फोन छीनना, कर्ज बढ़ाना, ग्राहक या कृत्य चुनने से रोकना और कमाई कब्जाना तस्करी के तत्व बना सकते हैं। पुलिस पूछताछ को एक तैयार प्रश्न “तुम अपनी मर्जी से आई?” पर समाप्त नहीं करना चाहिए; सुरक्षित वातावरण, प्रशिक्षित दुभाषिया, कानूनी सहायता और समय देकर नियंत्रण की पूरी कहानी समझनी चाहिए।
12. स्वास्थ्य: HIV से आगे
12.1 HIV और यौन-संचारित संक्रमण
भारत के HIV कार्यक्रम में महिला यौनकर्मी प्रमुख आबादी हैं क्योंकि ग्राहक संख्या, कंडोम बातचीत की असमान शक्ति, हिंसा और संक्रमण नेटवर्क जोखिम बढ़ाते हैं। 2025 के कार्यक्रमगत मानचित्रण लेख ने आधिकारिक अनुमानों के आधार पर 2021 में महिला यौनकर्मियों में HIV प्रसार 1.85 प्रतिशत (1.75–1.96) और 2023 में सामान्य वयस्क आबादी में 0.20 प्रतिशत (0.17–0.25) बताया—लगभग नौ गुना अंतर। यह तुलना जोखिम की सामाजिक और संरचनात्मक परिस्थितियाँ दिखाती है; यह किसी समुदाय को ‘रोग का स्रोत’ कहने का आधार नहीं। संक्रमण ग्राहक, साथी और व्यापक समाज के बीच दोनों दिशाओं में चलता है।
भारत ने लक्षित हस्तक्षेप, कंडोम उपलब्धता, HIV परीक्षण, एंटीरेट्रोवायरल उपचार और समुदाय संपर्क का व्यापक ढाँचा बनाया। उसी शोध के अनुसार 2010 से 2023 के बीच नए HIV संक्रमणों में अनुमानित 44 प्रतिशत और AIDS-संबंधी मौतों में 79 प्रतिशत गिरावट हुई। इन राष्ट्रीय उपलब्धियों का पूरा श्रेय एक कार्यक्रम को नहीं दिया जा सकता, लेकिन समुदाय-आधारित रोकथाम का योगदान स्वीकार किया जाता है। NACO के Sankalak 2023 ने 2022–23 में लक्षित कार्यक्रमों के अंतर्गत 1,456 नई HIV-पॉजिटिव महिला यौनकर्मियों की पहचान, उनमें 85 प्रतिशत को ART से जोड़ने और प्रति महिला यौनकर्मी औसतन 200 कंडोम वितरण की सूचना दी। ये कार्यक्रम-सेवा आँकड़े हैं, राष्ट्रीय संक्रमण की कुल संख्या नहीं।
कंडोम को पुलिस द्वारा वेश्यावृत्ति के सबूत की तरह जब्त करना सार्वजनिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुँचाता है। यदि कंडोम रखने से गिरफ्तारी का भय हो तो व्यक्ति सुरक्षित व्यवहार छोड़ सकता है। इसी कारण सर्वोच्च न्यायालय ने 2022 में स्पष्ट निर्देश दिया। कंडोम वितरण के साथ ग्राहक से बातचीत कौशल, हिंसा प्रतिक्रिया, नियमित STI जाँच, HIV स्व-परीक्षण के विकल्प, ART निरंतरता, हेपेटाइटिस और टीकाकरण सेवाओं की जरूरत है। संख्या बाँटना पर्याप्त नहीं; उपयोग पर व्यक्ति का वास्तविक नियंत्रण भी होना चाहिए।
12.2 प्रजनन, मानसिक और सामान्य स्वास्थ्य
यौनकर्मी का स्वास्थ्य केवल HIV नहीं है। गर्भनिरोध, इच्छित गर्भावस्था, सुरक्षित गर्भपात, प्रसव-पूर्व देखभाल, गर्भाशयग्रीवा कैंसर जाँच, मासिक धर्म, रजोनिवृत्ति, त्वचा और दंत स्वास्थ्य, तपेदिक तथा अन्य सामान्य रोगों की सेवाएँ चाहिए। स्वास्थ्यकर्मी यदि पेशा जानकर अपमान करें, अनावश्यक HIV परीक्षण थोपें या गोपनीयता तोड़ें तो सेवा से दूरी बढ़ती है। ‘एकीकृत’ क्लिनिक का अर्थ है कि व्यक्ति को हर सामान्य बीमारी के लिए उसकी पहचान उजागर न करनी पड़े।
हिंसा, गिरफ्तारी का भय, गुप्त जीवन, बच्चों के भविष्य की चिंता, शराब/नशीले पदार्थ का संदर्भ और आर्थिक अस्थिरता मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव डाल सकते हैं। दक्षिण भारत के अध्ययनों ने गतिशीलता, हिंसा और गंभीर अवसाद के बीच संबंध दर्ज किए हैं। यह कारण-परिणाम की सरल रेखा नहीं, पर परामर्श, संकट सहायता और आत्महत्या-रोकथाम सेवाओं की आवश्यकता स्पष्ट करता है। उपचार स्वैच्छिक, गोपनीय और गैर-न्यायात्मक होना चाहिए; नशे का उपयोग हो तो हानि-न्यूनन दृष्टिकोण उपयोगी है।
12.3 महामारी से मिली सीख
कोविड-19 लॉकडाउन ने शारीरिक संपर्क पर निर्भर आय अचानक समाप्त की। अनेक यौनकर्मियों के पास औपचारिक रोजगार रिकॉर्ड, किरायानामा, राशन कार्ड या निवास प्रमाण नहीं था। समुदाय संगठनों ने भोजन, नकद, दवा और ART पहुँचाने में भूमिका निभाई। सर्वोच्च न्यायालय की कार्यवाही में राशन और पहचान दस्तावेजों का प्रश्न इसी पृष्ठभूमि में तीखा हुआ। संकट-नीति को यह मानकर चलना चाहिए कि अनौपचारिक श्रमिक दस्तावेज-विहीन हो सकते हैं; भोजन और आपात स्वास्थ्य को नैतिक पात्रता-परीक्षा से नहीं बाँधना चाहिए।
13. हिंसा, पुलिसिंग और न्याय तक पहुँच
यौनकर्मी कई स्रोतों से हिंसा का सामना कर सकते हैं: ग्राहक, अंतरंग साथी, वेश्यालय मालिक, दलाल, मकान-मालिक, पड़ोसी, स्थानीय गुंडे या पुलिसकर्मी। अपराधी को भरोसा हो सकता है कि पीड़ित शिकायत नहीं करेगी या उसकी गवाही पर विश्वास नहीं होगा। भुगतान विवाद, कंडोम से इनकार, जबरन कृत्य, सामूहिक हिंसा, लूट और ब्लैकमेल सामान्य आपराधिक कानून के अंतर्गत अपराध हैं; पेशा अपराधी को प्रतिरक्षा नहीं देता।
कानून प्रवर्तन की कठिनाई वास्तविक है। पुलिस को बच्चे और तस्करी-पीड़ित को तत्काल सुरक्षित करना, साक्ष्य संरक्षित करना और संगठित अपराध की जाँच करनी होती है। पर लक्ष्य-आधारित छापों में आयु या सहमति की व्यक्तिगत जाँच के बिना सभी महिलाओं को हिरासत में लेना, ग्राहकों या संचालकों को छोड़ देना, कंडोम जब्त करना और मीडिया को चेहरे दिखाना अधिकार-उल्लंघन है। छापे के बाद कोई पीड़ित फिर उसी तस्कर के पास लौट सकता है यदि सुरक्षित आवास, आय और गवाह संरक्षण उपलब्ध न हो। ‘बचाव की संख्या’ सफलता का पर्याप्त मापक नहीं; दीर्घकालीन सुरक्षा, स्वेच्छा और न्याय परिणाम मापने चाहिए।
प्रभावी प्रथम प्रतिक्रिया में अलग-अलग गोपनीय साक्षात्कार, महिला/प्रशिक्षित अधिकारी, दुभाषिया, आयु का विधिसम्मत निर्धारण, तत्काल चिकित्सा, विधिक सहायता, फोन और दस्तावेज की सुरक्षित वापसी, आश्रित बच्चों की व्यवस्था और जोखिम-आकलन शामिल हैं। पीड़ित से तस्कर की उपस्थिति में बयान लेना अर्थहीन है। बार-बार बयान और आक्रामक चिकित्सकीय जाँच पुनः आघात पहुँचा सकते हैं। भारतीय न्याय संहिता और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के लागू होने के बाद पुलिस प्रशिक्षण में नए धारा-संदर्भ अद्यतन करना आवश्यक है।
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 397 अस्पतालों को निर्दिष्ट अपराधों के पीड़ितों को तत्काल निःशुल्क प्राथमिक उपचार या चिकित्सकीय सहायता देने और पुलिस को सूचित करने का दायित्व देती है। 2022 के सर्वोच्च न्यायालय आदेश में तत्कालीन दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 357C का उल्लेख था; 1 जुलाई 2024 से नई संहिता लागू होने पर समतुल्य वर्तमान प्रावधान देखना चाहिए। कानून बदलने के कारण पुराने मार्गदर्शकों में धारा संख्या अद्यतन न होने की संभावना रहती है।
14. कलंक और नागरिकता के रोजमर्रा के प्रश्न
कलंक कोई अमूर्त भावना नहीं; वह संस्थागत परिणाम पैदा करता है। मकान देने से इनकार, बैंक खाता या पहचान-पत्र में पता प्रमाण की कठिनाई, स्कूल में बच्चे के माता-पिता का पेशा पूछना, अस्पताल में तिरस्कार, पुलिस शिकायत न लिखना और मृत्यु के बाद संपत्ति विवाद—ये नागरिकता के ठोस प्रश्न हैं। गोपनीयता भी दोधारी है: पहचान छिपाने से सुरक्षा मिलती है, पर दस्तावेज और लाभ पाने में बाधा हो सकती है। व्यवस्था को व्यक्ति को सार्वजनिक रूप से पेशा घोषित करने के लिए बाध्य किए बिना पात्रता प्रमाणित करनी चाहिए।
आधार, राशन कार्ड, मतदाता पहचान, बैंक खाता और स्वास्थ्य कार्ड व्यक्ति को राज्य तथा बाजार से जोड़ते हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने NACO/राज्य एड्स नियंत्रण सोसाइटी के प्रमाण-पत्र द्वारा आधार प्रक्रिया और डेटा गोपनीयता पर जोर दिया। पहचान-पत्र देना निगरानी सूची बनाना नहीं होना चाहिए। डेटाबेस में ‘sex worker’ जैसा खुला लेबल भविष्य में भेदभाव, ब्लैकमेल या डेटा उल्लंघन का कारण बन सकता है। डेटा न्यूनतमकरण, सीमित पहुँच और सूचित सहमति आवश्यक हैं।
मीडिया में छापों के दृश्य अक्सर पीड़ित/यौनकर्मी का चेहरा दिखाते हैं जबकि आरोपी संचालक की पहचान अस्पष्ट रहती है। चेहरा धुँधला करने पर भी स्थान, नाम, बच्चे के स्कूल या रिश्तेदार से पहचान खुल सकती है। सनसनीपूर्ण भाषा सभी महिलाओं को असहाय या अपराधी बनाती है। जिम्मेदार रिपोर्टिंग में पहचान छिपाना, बच्चे की गोपनीयता, मानव-तस्करी और वयस्क सहमति का भेद, विश्वसनीय आँकड़े और समुदाय की आवाज शामिल होने चाहिए।
15. यौनकर्मियों के बच्चे और परिवार
माँ के पेशे के आधार पर बच्चे को कमतर मानना संविधान के समानता सिद्धांत के विरुद्ध है। बच्चों को स्कूल प्रवेश, छात्रवृत्ति, पोषण, स्वास्थ्य, सुरक्षित आवास और पहचान-पत्र में बाधाएँ आ सकती हैं। स्कूल में पता या पिता का नाम, साथियों द्वारा तिरस्कार और बार-बार स्थानांतरण शिक्षा तोड़ सकता है। समाधान अलग ‘वेश्या-बच्चा’ पहचान वाली संस्था बनाना नहीं, बल्कि सामान्य शिक्षा व्यवस्था में गोपनीयता, लचीले दस्तावेज और भेदभाव-विरोधी समर्थन देना है।
बाल-हित का मूल्यांकन प्रत्येक मामले में होना चाहिए। यदि घर में हिंसा या तस्करी का वास्तविक खतरा है तो बाल संरक्षण व्यवस्था हस्तक्षेप करे। पर केवल माँ यौनकर्मी है इसलिए बच्चा उससे अलग कर दिया जाए—यह न प्रमाण है, न न्याय। बुद्धदेव कर्मास्कर आदेश ने इस बात को स्पष्ट किया। मातृत्व, अभिभावकता और गोद लेने के नियम पेशागत कलंक से नहीं, बच्चे की सुरक्षा और व्यक्ति की क्षमता से संचालित होने चाहिए।
किशोरों के मामले में विशेष संवेदनशीलता चाहिए। कानून उन्हें यौन-शोषण से पूर्ण संरक्षण देता है, लेकिन बचाए गए किशोर से अपराधी जैसा पूछताछ, बंद संस्था या शिक्षा-विहीन दीर्घ निवास उसकी पुनर्बहाली बाधित कर सकता है। बाल कल्याण समिति, विशेष किशोर पुलिस इकाई, चिकित्सक, मनोवैज्ञानिक, कानूनी सहायता और विश्वसनीय परिवार/समुदाय के बीच समन्वय जरूरी है। आयु विवाद हो तो अनुमान या रूप देखकर निर्णय नहीं; विधिसम्मत दस्तावेज और चिकित्सा प्रक्रिया अपनानी चाहिए।
16. सामुदायिक संगठन और जन-स्वास्थ्य के भारतीय अनुभव
16.1 सोनागाछी परियोजना
कोलकाता में 1992 से विकसित सोनागाछी HIV हस्तक्षेप का वैश्विक उल्लेख इसलिए होता है कि उसने यौनकर्मियों को केवल संदेश पाने वाले ‘जोखिम समूह’ के बजाय कार्यक्रम संचालक और अधिकारधारी माना। सहकर्मी शिक्षकों ने कंडोम, STI सेवा, ग्राहक-वार्ता और सामूहिक संगठन पर काम किया। बाद में दुर्बार महिला समन्वय समिति ने वित्त, हिंसा, बच्चों और श्रम-अधिकार जैसे प्रश्न उठाए। शोध में इस मॉडल को सशक्तीकरण और संरचनात्मक हस्तक्षेप के रूप में विश्लेषित किया गया है।
यह मॉडल जादुई समाधान नहीं। एक बड़े पुराने रेड-लाइट क्षेत्र की संस्थागत परिस्थितियाँ हर घर-आधारित या ऑनलाइन नेटवर्क में दोहराई नहीं जा सकतीं। सामुदायिक संगठन के भीतर भी वर्ग, मालिक-कर्मी संबंध और प्रतिनिधित्व के प्रश्न हो सकते हैं। फिर भी मुख्य सीख मजबूत है: कार्यक्रम तब अधिक विश्वसनीय होता है जब प्रभावित लोग प्राथमिकता, सेवा समय, गोपनीयता, हिंसा प्रतिक्रिया और मूल्यांकन में निर्णयकर्ता हों।
16.2 अशोदया समिति, मैसूर
मैसूर की अशोदया समिति पर प्रकाशित शोध ने दिखाया कि यौनकर्मी-नेतृत्व वाला सामूहिक संगठन HIV रोकथाम को हिंसा, पुलिस संबंध, सामाजिक पहचान और संकट प्रतिक्रिया से जोड़ सकता है। केवल व्यक्तिगत ‘जोखिम व्यवहार’ बदलने की सलाह तब कमजोर पड़ती है जब ग्राहक कंडोम से इंकार करे या पुलिस कंडोम को सबूत माने। सामूहिक बातचीत, त्वरित प्रतिक्रिया और सेवा पर स्वामित्व संरचनात्मक परिस्थितियाँ बदल सकते हैं।
16.3 अवाहन और लक्षित हस्तक्षेप
अवाहन तथा राष्ट्रीय लक्षित हस्तक्षेपों ने उच्च-प्रसार क्षेत्रों में सहकर्मी संपर्क, कंडोम, STI क्लिनिक और समुदाय गतिशीलता को बड़े पैमाने पर लागू किया। मूल्यांकन साहित्य में कवरेज और संक्रमण रोकथाम के लाभ दर्ज हैं, हालांकि अलग-अलग स्थानों में परिणाम समान नहीं थे और कारणात्मक अनुमान के लिए मॉडलिंग की सीमाएँ हैं। नीति की उचित सीख किसी एक परियोजना की हूबहू नकल नहीं, बल्कि स्थानीय मानचित्रण, नियमित सेवा डेटा, समुदाय प्रतिक्रिया और स्वतंत्र मूल्यांकन का चक्र है।
17. सरकारी योजनाएँ, कानूनी सहायता और पुनर्वास
केंद्र की मिशन शक्ति योजना के अंतर्गत ‘शक्ति सदन’ कठिन परिस्थितियों में महिलाओं, जिनमें तस्करी से प्रभावित महिलाएँ भी शामिल हैं, के लिए आश्रय, भोजन, वस्त्र, परामर्श, प्राथमिक स्वास्थ्य और कौशल जैसी समेकित सेवाओं का ढाँचा प्रदान करता है। गृह मंत्रालय का एंटी-ट्रैफिकिंग सेल समन्वय और राज्यों में मानव-तस्करी-रोधी इकाइयों के सुदृढ़ीकरण से जुड़ा है। NALSA की 2015 की तस्करी और व्यावसायिक यौन-शोषण पीड़ितों के लिए विधिक सेवा योजना रोकथाम, बचाव-पश्चात सहायता और कानूनी प्रतिनिधित्व का आधार देती है; राष्ट्रीय विधिक सहायता हेल्पलाइन 15100 भी उपलब्ध है।
कागज पर सेवा और जमीन पर पहुँच अलग हो सकती है। आश्रय गृह की गुणवत्ता, स्वतंत्र निरीक्षण, शिकायत तंत्र, मानसिक स्वास्थ्य, अनुवाद, बच्चे के साथ निवास, लंबी अवधि की आय और व्यक्ति के चुने स्थान पर पुनर्वास निर्णायक हैं। घर वापसी हर बार सुरक्षित नहीं; परिवार ही तस्करी या हिंसा का स्रोत हो सकता है। कौशल प्रशिक्षण तभी उपयोगी है जब स्थानीय बाजार, उचित मजदूरी, बाल देखभाल, उपकरण और नौकरी-संपर्क हो। केवल सिलाई या सौंदर्य-प्रशिक्षण प्रमाण-पत्र जीविका सुनिश्चित नहीं करता।
पुनर्वास शब्द का प्रयोग सावधानी से होना चाहिए। तस्करी-पीड़ित को सुरक्षा, मुआवजा, आवास और विकल्प देना राज्य का दायित्व है। सहमति से काम करने वाले वयस्क पर पेशा छोड़ने का दबाव अधिकार-उल्लंघन हो सकता है। सर्वोच्च न्यायालय की वर्तमान दिशा स्वैच्छिक पुनर्वास की है। इसका अर्थ यह भी नहीं कि राज्य ‘उसने चुना है’ कहकर गरीबी, हिंसा या स्वास्थ्य से हाथ खींच ले। व्यक्ति को यौन-कार्य जारी रखते हुए भी सामाजिक सुरक्षा मिलनी चाहिए और छोड़ना चाहे तो व्यवहार्य विकल्प।
18. अंतरराष्ट्रीय दायित्व और नीति बहस
महिलाओं के विरुद्ध सभी प्रकार के भेदभाव के उन्मूलन संबंधी अभिसमय (CEDAW) का अनुच्छेद 6 राज्यों से महिलाओं की तस्करी और दूसरों की वेश्यावृत्ति के शोषण को दबाने के उपाय चाहता है। इसकी भाषा तस्करी और ‘दूसरों के शोषण’ पर केंद्रित है; इसे हर वयस्क सहमति वाले व्यवहार के अनिवार्य अपराधीकरण का सीधा आदेश समझना सरलता होगी। संयुक्त राष्ट्र का पालेर्मो प्रोटोकॉल तस्करी की क्रिया-साधन-उद्देश्य परिभाषा और बच्चों के लिए विशेष नियम देता है। भारत ने संबंधित अंतरराष्ट्रीय संगठित अपराध अभिसमय और प्रोटोकॉल की पुष्टि की है।
WHO और UNAIDS सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा मानवाधिकार के दृष्टिकोण से वयस्क सहमति वाले यौन-कार्य की अपराध-मुक्ति, कलंक घटाने और समुदाय-नेतृत्व वाली सेवाओं की वकालत करते हैं। यह अंतरराष्ट्रीय नीति-सिफारिश है, वर्तमान भारतीय कानून का वर्णन नहीं। इसके पक्ष में तर्क है कि गिरफ्तारी का भय हिंसा रिपोर्टिंग और स्वास्थ्य सेवा को बाधित करता है। आलोचक कहते हैं कि बाजार विस्तार, तीसरे पक्ष का लाभ और छिपी तस्करी की निगरानी कठिन हो सकती है। प्रमाण अलग कानूनी, आर्थिक और प्रवर्तन संदर्भों के कारण सरल तुलना की अनुमति नहीं देता।
भारत के लिए किसी विदेशी मॉडल का नाम चुनना पर्याप्त नीति नहीं। स्थानीय संघवाद, पुलिस क्षमता, अनौपचारिक आवास, डिजिटल बाजार, जाति और सामाजिक सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए धारा-दर-धारा प्रभाव आकलन चाहिए। सबसे पहले वह सहमति संभव है जो लगभग सभी मॉडल स्वीकार कर सकते हैं: बच्चे का व्यावसायिक यौन-शोषण और बल/धोखे वाली तस्करी कठोर अपराध; वयस्क पीड़ित को दंड नहीं; हिंसा पर समान न्याय; और स्वास्थ्य तथा भोजन को दंड-नीति से न रोकना।
19. प्रमुख मिथक और प्रमाणित स्थिति
20. कानून और कार्यान्वयन की मुख्य समस्याएँ
पहली समस्या परिभाषात्मक है। आईटीपीए की वेश्यावृत्ति-परिभाषा ‘व्यावसायिक उद्देश्य के लिए यौन-शोषण’ कहती है, जबकि अधिनियम ऐसे व्यवहार भी नियंत्रित करता है जिनमें वयस्क सहमति का प्रश्न हो सकता है। भारतीय न्याय संहिता तस्करी के अधिक संरचित तत्व देती है। पुलिस, अभियोजक और मजिस्ट्रेट को दोनों कानूनों के संबंध पर स्पष्ट प्रशिक्षण चाहिए, ताकि केवल स्थान पर उपस्थिति को तस्करी न माना जाए और वास्तविक नियंत्रण छूटे नहीं।
दूसरी समस्या तीसरे पक्ष की व्यापक श्रेणी है। शोषक दलाल, तस्कर और वेश्यालय मालिक को दंडित करना आवश्यक है। पर दो यौनकर्मी सुरक्षा के लिए कमरा साझा करें, वयस्क संतान माँ पर आर्थिक रूप से निर्भर हो, चालक सामान्य किराया ले या सहकर्मी फोन संभाले—तो धारा 3 या 4 की अतिव्यापक व्याख्या सामूहिक सुरक्षा को अपराध बना सकती है। कानून-संशोधन में लाभ, नियंत्रण, हिंसा, अनुपातहीन आर्थिक शोषण और वास्तविक प्रबंधन के तत्व स्पष्ट करने चाहिए।
तीसरी समस्या सार्वजनिक स्थान है। धारा 7 और 8 सड़क-आधारित व्यक्तियों को अधिक दृश्य और गिरफ्तारयोग्य बनाती हैं, जबकि ग्राहक या ऑनलाइन संचालक छिपे रहते हैं। इससे गरीब और आवास-विहीन व्यक्ति पर असमान प्रभाव पड़ सकता है। सार्वजनिक उपद्रव के वास्तविक मामलों के लिए सामान्य, समान रूप से लागू कानून पर्याप्त हैं या नहीं—इसकी समीक्षा होनी चाहिए।
चौथी समस्या बचाव-पश्चात प्रक्रिया है। आयु निर्धारण में देरी, लंबे संस्थागत निवास, परिवार सत्यापन, राज्यांतरण और गवाही के लिए बार-बार यात्रा व्यक्ति को न्याय से विमुख कर सकते हैं। प्रत्येक बचाव के साथ समयबद्ध व्यक्तिगत देखभाल योजना, कानूनी प्रतिनिधि और न्यायिक समीक्षा होनी चाहिए। वयस्क को उसकी इच्छा के विपरीत रखने की अवधि और आधार लिखित हों तथा चुनौती का प्रभावी अधिकार हो।
पाँचवीं समस्या डेटा है। पुलिस FIR, बचाए गए व्यक्तियों, आश्रय प्रवेश, NACO सेवा कवरेज और जनसंख्या अनुमान अलग माप हैं। एक व्यक्ति कई बार गिना जा सकता है; मामला दर्ज न होना अदृश्य है; दोषसिद्धि कई वर्ष बाद होती है। मंत्रालयों के डेटा को समान पहचानकर्ता से जोड़ना गोपनीयता संकट पैदा कर सकता है। बेहतर तरीका समेकित, अनाम, परिभाषा-संगत आँकड़े और स्वतंत्र गुणवत्ता परीक्षण है।
21. नीतिगत सुझाव
21.1 तस्करी पर केंद्रित, व्यक्ति पर नहीं
जाँच का केंद्र बल, धोखा, दस्तावेज कब्जा, ऋण-बंधन, आवाजाही नियंत्रण, धमकी, कमाई की जब्ती और बच्चे की आयु होना चाहिए। केवल कपड़े, स्थान, कंडोम या पूर्व यौन इतिहास से अपराध न बनाया जाए। वित्तीय प्रवाह, डिजिटल विज्ञापन, होटल रिकॉर्ड और परिवहन श्रृंखला की विधिसम्मत जाँच से संगठित लाभार्थी तक पहुँचा जा सकता है। पीड़ित की गवाही महत्वपूर्ण है, पर मुकदमा केवल उसी पर निर्भर न हो; अन्य साक्ष्य सुरक्षित किए जाएँ।
21.2 2022 और 2026 के सर्वोच्च न्यायालय निर्देशों का कार्यान्वयन
हर राज्य पुलिस मैनुअल में संक्षिप्त मानक कार्यप्रणाली हो: वयस्क सहमति की जाँच, स्वैच्छिक यौनकर्मी को गिरफ्तार न करना, कंडोम न जब्त करना, पहचान गोपनीय रखना, शिकायत दर्ज करना, यौन हिंसा पर तत्काल चिकित्सा, और बच्चे को माँ से स्वतः अलग न करना। प्रशिक्षण एक बार का व्याख्यान न हो; स्टेशन स्तर पर केस ऑडिट और अनुशासनात्मक जवाबदेही जुड़े। 2026 के तस्करी निर्णय के बाद नई भारतीय न्याय संहिता के तत्व प्रशिक्षण का हिस्सा हों।
21.3 स्वतंत्र कानूनी सहायता
छापे या बचाव के समय ही जिला विधिक सेवा प्राधिकरण को सूचना मिले और प्रशिक्षित वकील व्यक्ति से पुलिस/संस्था से अलग मिल सके। वकील को केवल औपचारिक हस्ताक्षरकर्ता नहीं, आयु, हिरासत, मुआवजा, जमानत, दस्तावेज और पारिवारिक सुरक्षा पर सक्रिय प्रतिनिधि होना चाहिए। NALSA हेल्पलाइन 15100 की जानकारी क्लिनिक, पुलिस स्टेशन और आश्रय में स्थानीय भाषाओं में प्रदर्शित हो।
21.4 स्वैच्छिक और बाजार-संगत आजीविका
काम छोड़ना चाहने वाले को तत्काल नकद सहायता, सुरक्षित आवास, ऋण-मुक्ति सलाह, बाल देखभाल, शिक्षा और बाजार से जुड़ा प्रशिक्षण मिले। कौशल विकल्प व्यक्ति की रुचि, आयु, स्वास्थ्य और स्थानीय मांग से तय हों। प्रशिक्षण अवधि में निर्वाह भत्ता आवश्यक है; अन्यथा वह आय छोड़कर सीख नहीं सकता। कार्यक्रम की सफलता “प्रशिक्षित व्यक्तियों” से नहीं, छह और बारह माह की स्वैच्छिक आय, सुरक्षा और पुनःतस्करी की अनुपस्थिति से मापी जाए।
21.5 काम जारी रखने वालों के अधिकार
सामाजिक सुरक्षा को पेशा छोड़ने की शर्त न बनाया जाए। राशन, बैंकिंग, पेंशन, मातृत्व लाभ, स्वास्थ्य बीमा और बच्चों की शिक्षा नागरिकता/पात्रता के आधार पर मिलें। निवास प्रमाण में सामुदायिक सत्यापन और पोर्टेबिलिटी हो। गोपनीय डेटाबेस और डेटा मिटाने/सुधारने का अधिकार विकसित किया जाए। स्वास्थ्य सेवाएँ स्वैच्छिक हों; अनिवार्य HIV परीक्षण या सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्ड कलंक बढ़ा सकता है।
21.6 समुदाय-नेतृत्व वाली स्वास्थ्य और हिंसा प्रतिक्रिया
सहकर्मी कार्यकर्ताओं को केवल कंडोम वितरण संख्या का एजेंट न बनाया जाए। उन्हें उचित पारिश्रमिक, प्रशिक्षण, सुरक्षा और नीति-निर्णय में स्थान मिले। मोबाइल क्लिनिक, रात्रिकालीन समय, घर-आधारित नेटवर्क और डिजिटल संपर्क के अनुरूप सेवा बदले। हिंसा संकट फोन, अस्पताल और कानूनी सहायता के साथ समन्वित हो। पुरुष और ट्रांसजेंडर यौनकर्मियों के लिए अलग जरूरत-आकलन जरूरी है।
21.7 बच्चों के लिए गोपनीय समावेश
स्कूल प्रवेश में पिता या स्थायी पता अनिवार्यता को लचीला बनाया जाए जहाँ नियम अनुमति देते हों। छात्रवृत्ति को सार्वजनिक ‘यौनकर्मी की संतान’ लेबल से न जोड़ा जाए; सुरक्षित सत्यापन हो। आवासीय सुविधा परिवार की पसंद और बाल-हित पर हो, दंड के रूप में नहीं। किशोर संरक्षण में शिक्षा की निरंतरता, डिजिटल सुरक्षा, मनोवैज्ञानिक सहायता और दीर्घकालीन मार्गदर्शक शामिल हों।
21.8 कानून की स्वतंत्र समीक्षा
आईटीपीए की धाराओं 3, 4, 7, 8 और 20 के वास्तविक प्रभाव का राष्ट्रीय स्तर पर स्वतंत्र अध्ययन होना चाहिए। कितने आरोपी यौनकर्मी, ग्राहक, आश्रित, मालिक या तस्कर थे; कितनी दोषसिद्धियाँ हुईं; गिरफ्तारी का स्वास्थ्य और आवास पर क्या असर पड़ा—ऐसा पृथक डेटा कानून-संशोधन को प्रमाण देगा। समीक्षा समिति में यौनकर्मी संगठन, तस्करी से बचे व्यक्ति, बाल-अधिकार विशेषज्ञ, पुलिस, अभियोजक, सार्वजनिक स्वास्थ्य और श्रम विशेषज्ञ हों। हितों के टकराव और असहमति सार्वजनिक की जाए।
21.9 डिजिटल सुरक्षा
साइबर पुलिस को गैर-सहमति से निजी तस्वीर प्रसारित करने, ब्लैकमेल, पहचान चोरी, नकली विज्ञापन और बाल यौन सामग्री पर तेज प्रतिक्रिया देनी चाहिए। प्लेटफॉर्म शिकायत प्रणाली स्थानीय भाषाओं में हो और सामग्री हटाने के साथ साक्ष्य संरक्षित करे। वयस्क सहमति वाले संचार की व्यापक निगरानी निजता का उल्लंघन कर सकती है; जाँच न्यायिक प्रक्रिया और विशिष्ट संदेह पर आधारित हो। डिजिटल साक्षरता में सुरक्षित भुगतान, दो-स्तरीय प्रमाणीकरण, मेटाडेटा और स्थान साझा करने के जोखिम शामिल हों।
21.10 प्रमाण की ईमानदारी
सरकारी और गैर-सरकारी रिपोर्ट प्रत्येक संख्या के साथ वर्ष, परिभाषा, क्षेत्र, नमूना और सीमा दें। महिला यौनकर्मियों के PMPSE अनुमान को सभी यौनकर्मियों या तस्करी पीड़ितों की संख्या न कहा जाए। NCRB के पंजीकृत मामलों को प्रसार नहीं समझा जाए। कार्यक्रम अपने हित में संख्या बढ़ाने या घटाने से बचें। शोध में समुदाय की सहमति, मानदेय और परिणामों की वापसी हो; डेटा प्रकाशित करते समय छोटे स्थानों की पहचान न खुले।
22. कार्यान्वयन के लिए चरणबद्ध रूपरेखा
पहले छह महीनों में केंद्र और राज्य वर्तमान कानूनी धारा-संदर्भ वाला एक संयुक्त परिपत्र जारी कर सकते हैं; सभी जिलों में पुलिस, चिकित्सक, बाल कल्याण समिति और विधिक सेवा प्राधिकरण के नोडल अधिकारी नामित हों; संरक्षण गृहों की वयस्क निवासियों की स्वतंत्र समीक्षा हो; और कंडोम जब्ती तथा पहचान प्रकाशन पर स्पष्ट रोक दोहराई जाए। यह चरण नया विशाल बजट माँगे बिना प्रक्रियागत सुधार कर सकता है।
छह से अठारह महीनों में जिला सेवा-मानचित्र बनाया जाए: 24 घंटे चिकित्सा, आश्रय, कानूनी सहायता, अनुवाद, बाल देखभाल और समुदाय संगठन कहाँ उपलब्ध हैं। अनुदान परिणाम-आधारित हो, पर ऐसा लक्ष्य न बने जो अनावश्यक ‘रेस्क्यू’ प्रोत्साहित करे। परिणाम सूचक में सुरक्षित शिकायत, समय पर मुआवजा, ART निरंतरता, स्कूल टिकाव, स्वैच्छिक निकास और सेवा-संतोष हों। गोपनीय शिकायतकर्ता स्वतंत्र निरीक्षण निकाय तक पहुँच सके।
अठारह से छत्तीस महीनों में आईटीपीए प्रभाव अध्ययन और संसदीय समीक्षा की जा सकती है। अलग राज्यों के प्रवर्तन डेटा और न्यायालयी परिणाम तुलनीय प्रारूप में हों। वयस्क सहमति वाले साझा सुरक्षित कार्यस्थल, आश्रित परिवार और शोषक तीसरे पक्ष के बीच स्पष्ट कानूनी सीमा पर मसौदा तैयार हो। बाल संरक्षण तथा तस्करी के अपराध कमजोर किए बिना उन प्रावधानों को संशोधित किया जाए जो पीड़ित या स्वैच्छिक वयस्क को दंडित करते हैं।
निरंतर स्तर पर NACO और समुदाय नेटवर्क बदलते स्थानों—विशेषतः घर और डिजिटल माध्यम—का गोपनीय कार्यक्रमगत आकलन करें। स्वास्थ्य डेटा पुलिस कार्रवाई के लिए साझा न हो; इससे विश्वास नष्ट होगा। हर तीन वर्ष में स्वतंत्र मूल्यांकन और प्रभावित समुदाय के साथ सार्वजनिक समीक्षा हो। किसी भी नीति की कसौटी यह हो कि हिंसा और शोषण घटा या नहीं, अधिकार और स्वास्थ्य सुधरे या नहीं, और व्यक्ति के वास्तविक विकल्प बढ़े या नहीं।
23. इतिहास और वर्तमान को जोड़कर देखने की आवश्यकता
इतिहास दिखाता है कि राज्य की दृष्टि लगातार बदलती रही: प्राचीन राजनीतिक पाठ में गणिका प्रशासन और राजस्व का विषय; मंदिर और दरबार में कलाकार-सेवा की विविध संस्थाएँ; औपनिवेशिक छावनी में स्त्री शरीर सैनिक स्वास्थ्य का उपकरण; राष्ट्रीय सुधार में ‘उद्धार’ का विषय; HIV युग में प्रमुख स्वास्थ्य आबादी; और संवैधानिक न्यायशास्त्र में गरिमायुक्त नागरिक। ये रूप पूरी तरह एक-दूसरे को प्रतिस्थापित नहीं करते। आज भी राजस्व, नैतिकता, सार्वजनिक व्यवस्था, स्वास्थ्य, बचाव और अधिकार की भाषाएँ साथ उपस्थित हैं।
औपनिवेशिक कानून का सबसे गहरा अवशेष शायद यह विचार है कि दृश्यमान महिला की निगरानी से समस्या हल होगी। इससे ग्राहक की हिंसा, संगठित धन, श्रम बाजार, घरेलू अत्याचार और राज्यीय दुर्व्यवहार ओझल होते हैं। आधुनिक डेटा भी यदि केवल ‘हॉटस्पॉट संख्या’ बन जाए तो वही दृष्टि दोहरा सकता है। मानचित्रण का उद्देश्य सेवा पहुँच हो, निगरानी या बेदखली नहीं।
इसी तरह ‘उद्धार’ की भाषा का इतिहास दोहरा है। उसने बालिकाओं और बंधक महिलाओं की पीड़ा को सार्वजनिक किया, पर कभी वयस्क महिला की इच्छा को असत्य मानकर उसे संस्था में बंद भी किया। अधिकार-आधारित दृष्टि उद्धार को त्यागती नहीं; वह पूछती है कि किससे बचाव, किसकी इच्छा से, किस प्रक्रिया के तहत और बचाव के बाद क्या। भोजन, घर और जीविका के बिना मुक्ति केवल स्थान परिवर्तन हो सकती है।
समुदाय-नेतृत्व वाले HIV कार्यक्रमों ने एक अन्य ऐतिहासिक बदलाव किया: जिस व्यक्ति को नीति समस्या मानती थी, उसे समाधान का विशेषज्ञ माना। सहकर्मी कार्यकर्ता ग्राहक व्यवहार, छिपे स्थान, हिंसा और सेवा बाधा के बारे में वह ज्ञान रखते हैं जो बाहरी सर्वेक्षक को नहीं मिलता। यह भागीदारी आलोचना से परे नहीं, लेकिन लोकतांत्रिक नीति का आवश्यक आधार है।
24. निष्कर्ष
भारत में वेश्यावृत्ति का इतिहास किसी एक निरंतर संस्था की कथा नहीं है। गणिका, देवदासी, तवायफ, औपनिवेशिक पंजीकृत महिला, वेश्यालय-आधारित कर्मी और आज की घर अथवा ऐप-आधारित यौनकर्मी के सामाजिक अर्थ अलग हैं। इन सबको एक नैतिक लेबल में समेटना तथ्य और मनुष्य दोनों के साथ अन्याय है। इतिहास का उद्देश्य अतीत को गौरवशाली या लज्जाजनक घोषित करना नहीं, यह समझना है कि सत्ता, अर्थव्यवस्था और लैंगिक मानदंडों ने श्रेणियाँ कैसे बनाई।
वर्तमान भारतीय कानून एक मिश्रित स्थिति रखता है। वयस्क सहमति से यौन सेवा देना अपने-आप में पृथक अपराध नहीं, पर आईटीपीए उसके आसपास के बहुत से व्यवहार दंडित करता है। मानव-तस्करी भारतीय न्याय संहिता के अंतर्गत गंभीर अपराध है; बच्चे का व्यावसायिक यौन-शोषण किसी सहमति से वैध नहीं हो सकता। सर्वोच्च न्यायालय ने 2022 और 2026 में स्पष्ट किया कि तस्करी-विरोधी कार्रवाई और वयस्क यौनकर्मी की गरिमा परस्पर विरोधी नहीं: पुलिस वास्तविक शोषक पर कार्रवाई करे, पर स्वैच्छिक वयस्क को पीड़ित न बनाए और पुनर्वास इच्छा पर आधारित हो।
नवीनतम व्यापक अध्ययन लगभग 9.95 लाख महिला यौनकर्मियों का कार्यक्रमगत अनुमान देता है, साथ में बड़ी और स्पष्ट अनिश्चितता। इससे योजना बनाई जा सकती है, सनसनीपूर्ण दावा नहीं। घर-आधारित हॉटस्पॉट की बहुलता और ऑनलाइन क्षेत्र का छूटना बताता है कि पुरानी रेड-लाइट छवि अधूरी है। HIV प्रसार सामान्य वयस्क आबादी से अधिक है, फिर भी भारत की संक्रमण-नियंत्रण उपलब्धियाँ समुदाय-आधारित सेवा की क्षमता दिखाती हैं। कंडोम, उपचार और सहकर्मी संगठन को पुलिस भय से सुरक्षित रखना सार्वजनिक हित है।
नीति का नैतिक और व्यावहारिक केंद्र व्यक्ति की वास्तविक स्वतंत्रता होना चाहिए। क्या वह ग्राहक और कृत्य चुन सकता है? क्या वह ना कह सकता है, कमाई रख सकता है, स्थान छोड़ सकता है और हिंसा की शिकायत कर सकता है? क्या बच्चा सुरक्षित है? क्या काम छोड़ने पर सम्मानजनक विकल्प उपलब्ध है? इन प्रश्नों के उत्तर ‘वेश्या’, ‘पीड़ित’ या ‘अपराधी’ का पूर्वनिर्धारित लेबल लगाने से अधिक उपयोगी हैं।
एक न्यायपूर्ण व्यवस्था के पाँच आधार हैं: बच्चे और तस्करी-पीड़ित की दृढ़ सुरक्षा; वयस्क सहमति और गरिमा का सम्मान; हिंसा तथा शोषण पर समान आपराधिक न्याय; सार्वभौम स्वास्थ्य और सामाजिक सुरक्षा; और प्रमाण-आधारित, समुदाय-सहभागी कानून-सुधार। नैतिक मतभेद बने रह सकते हैं, किंतु गलत आँकड़े, अपमान और मनमानी राज्य नीति का आधार नहीं हो सकते। भारतीय संविधान का वादा पेशे की लोकप्रियता पर निर्भर नहीं; सबसे कलंकित व्यक्ति तक समान गरिमा पहुँचने पर ही उसकी वास्तविक परीक्षा होती है।
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26. तथ्य-पद्धति संबंधी टिप्पणी
इस आलेख में प्रयुक्त लगभग 9.95 लाख की संख्या केवल 2020–22 के PMPSE में परिभाषित महिला यौनकर्मियों का अनुमान है। इसे पुरुष, ट्रांसजेंडर या सभी लैंगिक पहचानों वाले यौनकर्मियों की कुल संख्या, वेश्यावृत्ति में लगे बच्चों की संख्या, मानव-तस्करी पीड़ितों की संख्या या भारत के समस्त जीवनकालीन अनुभव की संख्या नहीं समझा जाना चाहिए। अनुमान-सीमा इसलिए दी गई है कि पाठक अनिश्चितता देख सके।
कानून के वर्णन में आधिकारिक अधिनियम और निर्णय प्राथमिक माने गए हैं। अदालत के निर्देश का अर्थ उससे अधिक नहीं फैलाया गया: बुद्धदेव कर्मास्कर ने गरिमा और प्रवर्तन संबंधी निर्देश दिए, संसद की तरह व्यापक वैधीकरण कानून नहीं बनाया। प्रज्वला निर्णय को तस्करी के तत्वों और स्वैच्छिक पुनर्वास के संदर्भ में पढ़ा गया है। पुराने निर्णय वर्तमान संविधान-व्याख्या के साथ रखे गए हैं; उनका उल्लेख वर्तमान नीति की स्वीकृति नहीं।
इतिहास में साहित्यिक और मानक ग्रंथों की सीमा स्वीकार की गई है। अर्थशास्त्र का वर्णन यह प्रमाण नहीं कि उसके सभी नियम हर समय व्यवहार में लागू थे। देवदासी और तवायफ के बारे में एकरूप दावा न करने का कारण क्षेत्रीय और कालगत विविधता है। औपनिवेशिक अधिनियमों के विशिष्ट वर्षों को प्राथमिक/शोध स्रोत से लिया गया है।
NCRB के आँकड़े जानबूझकर किसी कथित राष्ट्रीय प्रसार दर में परिवर्तित नहीं किए गए। पंजीकृत मामला तभी बनता है जब अपराध सामने आए, शिकायत/पुलिस कार्रवाई हो और सही धारा में दर्ज हो। कम संख्या कम अपराध का प्रमाण नहीं और अधिक संख्या अधिक प्रसार का सीधा प्रमाण नहीं; वह बेहतर प्रवर्तन भी दर्शा सकती है। यही सावधानी स्वास्थ्य कार्यक्रम डेटा पर लागू है: जाँचे गए या सेवा से जुड़े लोग पूरी आबादी नहीं।
अंततः, ‘वास्तविक तथ्य’ का अर्थ ऐसा अटल आँकड़ा नहीं जो भविष्य में कभी संशोधित न हो। इसका अर्थ है उपलब्ध सर्वोत्तम स्रोत, स्पष्ट तारीख, परिभाषा, पद्धति और सीमा। कानून संशोधित हो सकते हैं, नए निर्णय आ सकते हैं और छिपी आबादी के बेहतर अनुमान विकसित हो सकते हैं। इसलिए इस लेख की वर्तमान स्थिति 5 सितंबर 2026 तक सीमित है और भावी उपयोग में आधिकारिक अद्यतन जाँचना चाहिए।
परिशिष्ट 1: ऐतिहासिक कालक्रम और उसकी व्याख्या
प्राचीन और पूर्व-औपनिवेशिक संदर्भ
प्राचीन साहित्य में किसी पद का मिलना उस संस्था की अखिल भारतीय उपस्थिति या समान कानूनी स्थिति सिद्ध नहीं करता। अर्थशास्त्र में गणिकाध्यक्ष का विवरण राज्य की मानक कल्पना है। वह प्रशिक्षित गणिका, राजकीय पारिश्रमिक, कर, दंड और सुरक्षा का उल्लेख करता है, पर सामान्य महिला, दासी, कलाकार और भुगतानयुक्त यौन संबंधों के सभी रूपों का सामाजिक सर्वेक्षण नहीं। पाठ की रचना और संपादन के काल पर मतभेद होने से उसे सावधानीपूर्वक ‘ग्रंथीय साक्ष्य’ कहना चाहिए। आधुनिक नीति में इसका उपयोग केवल इतना दिखाने के लिए हो सकता है कि शासन और भुगतानयुक्त यौनता का संबंध पुराना और बहुआयामी रहा है; इससे आज के कानून के पक्ष या विपक्ष में सीधा निष्कर्ष नहीं निकलता।
मंदिर-आधारित महिला सेवा के रूप दक्षिण, पश्चिम और पूर्व भारत में भिन्न नामों और व्यवस्थाओं में रहे। धार्मिक अनुष्ठान, नृत्य-संगीत, भूमि-अनुदान, संरक्षक संबंध, जाति और यौनता का अनुपात समय के साथ बदला। आधुनिक पुनर्निर्माण में दो विपरीत गलतियाँ होती हैं: पूरी परंपरा को केवल पवित्र कला कहकर शोषण नकारना, अथवा हर समर्पित महिला को वेश्या कहकर उसकी कला, संपत्ति और धार्मिक भूमिका मिटाना। उपलब्ध स्थानीय अभिलेख, शिलालेख, कानूनी दस्तावेज और मौखिक इतिहास को साथ पढ़ना ही संतुलित पद्धति है।
तवायफों का उत्कर्ष दरबारी और शहरी संस्कृति से जुड़ा था। संगीत की अनेक शैलियाँ, ठुमरी-दादरा, कविता, भाषा और शिष्टाचार के शिक्षण में उनकी भूमिका रही। संरक्षक अर्थव्यवस्था में शक्ति असमान हो सकती थी, किंतु कुछ तवायफें संपन्न करदाता और संपत्ति-धारक भी थीं। औपनिवेशिक जनगणना ने पेशागत श्रेणियाँ स्थिर करने की कोशिश की; ‘नाचने वाली’, ‘गायिका’ और ‘prostitute’ की सीमाएँ प्रशासनिक रिकॉर्ड में उलझीं। आज जब किसी ऐतिहासिक तवायफ को केवल यौन सेवा के आधार पर याद किया जाता है, तो यह उसी वर्गीकरण की सांस्कृतिक निरंतरता है।
1864–1947: सैन्य नियंत्रण से सामाजिक सुधार तक
1864 के कैंटोनमेंट कानून और 1868 के भारतीय संक्रामक रोग कानून को उनके साम्राज्यवादी उद्देश्य में देखना चाहिए। ब्रिटिश सैनिकों की बीमारी को सैन्य क्षमता और राजकोष का प्रश्न माना गया। समाधान के रूप में स्थानीय महिलाओं की पहचान, पंजीकरण, आवधिक जाँच और अस्पताल में निरुद्धकरण चुना गया; सैनिक ग्राहक पर तुल्य नियंत्रण नहीं। ‘रोग वाहक स्त्री’ की यह धारणा वैज्ञानिक रूप से भी अधूरी थी और लैंगिक रूप से भेदकारी। परीक्षण उस समय सीमित थे और उपचार कठोर हो सकते थे।
स्थानीय प्रशासन में पुलिस और मध्यस्थों को यह तय करने की शक्ति मिली कि कौन महिला निगरानी योग्य है। इसलिए नियम वेश्यालय तक सीमित न रहकर गरीब, अकेली या सार्वजनिक स्थान पर दिखने वाली स्त्रियों पर पड़ सकते थे। इतिहासकारों ने दिखाया है कि अधीनस्थ भारतीय कर्मचारी औपनिवेशिक शासन के केवल निष्क्रिय औजार नहीं थे; वे सूचना, सौदेबाजी और रोजमर्रा प्रवर्तन के सक्रिय भाग थे। भ्रष्टाचार, स्थानीय प्रतिद्वंद्विता और स्त्रियों का प्रतिरोध भी प्रणाली को आकार देते थे। यह इतिहास आज के ‘मैदानी विवेक’ के प्रश्न को समझने में उपयोगी है।
उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में ब्रिटेन की नारीवादी और नैतिक आलोचना ने अनिवार्य चिकित्सा जाँच को चुनौती दी। भारत में सामाजिक सुधार और राष्ट्रवाद ने बालिका समर्पण, तस्करी और सार्वजनिक नृत्य को अलग-अलग तरीकों से उठाया। महिला सुधारकों की सक्रिय भूमिका थी, किंतु ‘राष्ट्र की सम्मानित स्त्री’ की छवि ने कलाकार और यौनकर्मी को बाहरी/गिरा हुआ भी घोषित किया। निषेध कानून ने कुछ शोषणकारी प्रथाओं को चुनौती दी, पर संरक्षण खो चुकी महिलाओं के आर्थिक पुनर्वास पर अपेक्षाकृत कम निवेश हुआ।
1947–1986: संवैधानिक निषेध और कल्याण-दंड मिश्रण
स्वतंत्रता के बाद अनुच्छेद 23 ने तस्करी और बलात् श्रम पर स्पष्ट संवैधानिक रोक लगाई। 1956 के SITA ने अंतरराष्ट्रीय दायित्व तथा घरेलू चिंता के बीच वेश्यालय, कमाई पर जीवनयापन, प्राप्ति, निरुद्धकरण और सार्वजनिक स्थान संबंधी अपराध बनाए। नाम में ‘महिलाएँ और लड़कियाँ’ होने से पीड़ित की लैंगिक कल्पना स्पष्ट थी। 1986 संशोधन ने ‘अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम’ नाम अपनाया और बच्चों/व्यक्तियों से जुड़े प्रावधान बदले। फिर भी कानून ने वयस्क सहमति और तस्करी को पूरी तरह अलग ढाँचों में नहीं रखा।
इस काल की नीति में संरक्षण गृह केंद्रीय थे। सुरक्षित आश्रय की आवश्यकता निर्विवाद है, पर संस्था तभी संरक्षण है जब उसमें रहने वाले की कानूनी स्थिति, स्वतंत्र समीक्षा, शिकायत, परिवार संपर्क और बाहर निकलने की प्रक्रिया हो। अन्यथा कल्याण का स्थान कारावास-सदृश हो सकता है। आज की समीक्षा इसी ऐतिहासिक अनुभव से सीखती है। ‘सुधार’ का उद्देश्य व्यक्ति के चरित्र को बदलना नहीं, हिंसा समाप्त कर विकल्प बढ़ाना होना चाहिए।
1990–2010: HIV, जनहित याचिका और समुदाय
1990 के दशक में HIV ने नीति को सार्वजनिक स्वास्थ्य की ओर मोड़ा। यदि यौनकर्मी पुलिस और अस्पताल से डरें तो संक्रमण रोकथाम संभव नहीं—इस व्यावहारिक समझ ने सहकर्मी शिक्षा और लक्षित हस्तक्षेपों को स्थान दिया। सोनागाछी ने कंडोम संदेश को संगठन, आत्मसम्मान और बातचीत की शक्ति से जोड़ा। राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण कार्यक्रम तथा बाद के अवाहन निवेश ने मानचित्रण, क्लिनिक और समुदाय संपर्क को बड़े पैमाने पर विकसित किया।
इसी समय विशाल जीत, मधुकर नारायण मर्दिकर और गौरव जैन जैसे निर्णय आए। एक धारा बाल शोषण और पुनर्वास पर, दूसरी पीड़ित महिला की विश्वसनीयता/निजता पर, तीसरी बच्चों की शिक्षा पर केंद्रित थी। भाषा में समय की संरक्षणवादी छाप हो सकती है, पर न्यायालयी ध्यान ने राज्य दायित्व मजबूत किया। अधिकार का आधुनिक ढाँचा इन निर्णयों के उपयोगी तत्व लेकर अनावश्यक कलंक से दूरी बना सकता है।
2011–2026: गरिमा, पहचान और तस्करी की स्पष्टता
2011 से बुद्धदेव कर्मास्कर मामले ने एक हत्या अपील को व्यापक संवैधानिक संवाद में बदला। न्यायालय-नियुक्त पैनल, केंद्र और समुदाय संगठनों की भागीदारी से पुलिस व्यवहार, पुनर्वास और पहचान दस्तावेज चर्चा में आए। कोविड संकट ने राशन और दस्तावेज की कमी को उजागर किया। 2022 आदेश ने अंतरिम रूप से स्पष्ट, लागू योग्य निर्देश दिए—वयस्क सहमति में हस्तक्षेप नहीं; छापे में स्वैच्छिक कर्मी को दंड नहीं; यौन हिंसा शिकायत और चिकित्सा; कंडोम को साक्ष्य न बनाना; मीडिया गोपनीयता; बच्चे को स्वतः अलग न करना।
1 जुलाई 2024 को भारतीय न्याय संहिता और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता लागू हुईं। तस्करी की धाराएँ अब BNS 143–144 में पढ़ी जानी चाहिए और उपचार दायित्व के पुराने CrPC संदर्भ को BNSS के वर्तमान प्रावधान से अद्यतन करना चाहिए। 2026 के प्रज्वला निर्णय ने व्यावसायिक यौन-शोषण के लिए तस्करी की संरचना पर विस्तृत विचार दिया। इस कालक्रम का परिणाम पूर्ण समाधान नहीं, बल्कि अधिक परिष्कृत कानूनी भेद है: स्वैच्छिक वयस्क, शोषित वयस्क और बच्चा एक ही प्रक्रिया में नहीं समाए जा सकते।
परिशिष्ट 2: एक अधिकार-सम्मत मामले की प्रक्रिया
सूचना और प्रारंभिक जोखिम-आकलन
तस्करी की सूचना पुलिस, हेल्पलाइन, अस्पताल, समुदाय संगठन, परिवार या ऑनलाइन शिकायत से आ सकती है। प्रथम अधिकारी को सूचना की विश्वसनीयता जाँचते समय संभावित पीड़ित को खतरे में नहीं डालना चाहिए। तत्काल जीवन-जोखिम हो तो बचाव में देरी नहीं, पर योजनाबद्ध कार्रवाई में बच्चे, हथियार, स्थान के रास्ते, संदिग्धों की भूमिका, डिजिटल साक्ष्य और सुरक्षित वाहन की तैयारी आवश्यक है। मीडिया को पहले से बुलाना सुरक्षा और निष्पक्ष सुनवाई दोनों बिगाड़ सकता है।
टीम में प्रशिक्षित महिला अधिकारी, बाल मामला हो तो विशेष किशोर पुलिस इकाई, आवश्यक भाषा का दुभाषिया और चिकित्सा/सामाजिक सहायता संपर्क होना चाहिए। समुदाय संगठन उपयोगी जानकारी दे सकता है, पर उसकी भूमिका और गोपनीयता स्पष्ट हो। कार्रवाई का उद्देश्य व्यक्ति की सार्वजनिक परेड या ‘संख्या’ बढ़ाना नहीं, उसे तत्काल नियंत्रण से अलग करना और साक्ष्य सुरक्षित करना है।
स्थल पर व्यक्ति-व्यक्ति भेद
एक ही परिसर में मालिक, प्रबंधक, ग्राहक, तस्करी-पीड़ित, सहमति वाला वयस्क कर्मी, रसोइया, बच्चा और परिवार सदस्य हो सकते हैं। सबको एक आरोप या पीड़ित श्रेणी में रखना जाँच को कमजोर करता है। प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका अलग दर्ज हो। स्वैच्छिक वयस्क का फोन, धन और निजी सामान बिना कानूनी आधार न छीना जाए; संभावित पीड़ित का सामान साक्ष्य हो तो रसीद, सुरक्षित प्रति और वापसी प्रक्रिया हो।
कंडोम स्वास्थ्य सामग्री है। उसकी मात्रा से वेश्यालय, तस्करी या किसी व्यक्ति का पेशा सिद्ध नहीं होता। कमरे का नियंत्रण, किराया, खाताबही, डिजिटल संवाद, दरवाजे/ताले, कैमरा, दस्तावेज कब्जा, भुगतान प्रवाह और गवाह अधिक प्रासंगिक साक्ष्य हो सकते हैं। बच्चे की पहचान या तस्वीर स्थल से बाहर न जाए।
सुरक्षित साक्षात्कार और सहमति
साक्षात्कार संदिग्ध मालिक, कथित साथी या परिवार से अलग हो। व्यक्ति थका, घायल या नशे/दवा के प्रभाव में हो तो विस्तृत बयान से पहले चिकित्सा और आराम मिले। प्रश्न खुला और गैर-आरोपात्मक हो: वह कहाँ से आया, किसने क्या बताया, यात्रा किसने कराई, पैसा किसके पास है, बाहर जा सकता था या नहीं, मना करने पर क्या होता, फोन/दस्तावेज किसके पास, कर्ज कैसे बदलता था। “हाँ या ना” की कथित स्वेच्छा पर्याप्त नहीं।
वयस्क को यौन-कार्य जारी रखने की बात कहने पर झूठा न मानें; साथ ही उसकी प्रारंभिक बात को अंतिम भी न मानें यदि तस्कर पास रहा हो या परिवार खतरे में हो। कई अवसर और गोपनीय सहायता दें। सहमति विशिष्ट है: उद्योग में आने की सहमति काम की हर शर्त, हर ग्राहक या हिंसा की सहमति नहीं। बच्चे से बाल-अनुकूल तरीके से सीमित प्रश्न हों और अनावश्यक पुनरावृत्ति से बचा जाए।
चिकित्सा और मनोसामाजिक सहायता
तत्काल चोट, यौन हिंसा, गर्भावस्था, STI/HIV, मानसिक संकट और नियमित दवा की जरूरत जाँची जाए। HIV परीक्षण सूचित सहमति और गोपनीयता के साथ हो; परिणाम पुलिस या संस्था में सार्वजनिक न किया जाए। यौन हिंसा के मामले में प्रमाण संग्रह व्यक्ति की गरिमा, वर्तमान चिकित्सकीय दिशानिर्देश और समय के अनुसार हो। उपचार साक्ष्य देने की सहमति पर निर्भर न बनाया जाए।
मनोसामाजिक सहायता ‘उसे पेशा छोड़ने के लिए समझाना’ नहीं। प्रशिक्षित परामर्शदाता तत्काल सुरक्षा, नींद, भय, परिवार, बच्चे और विकल्प समझे। अनुवादक गोपनीयता की शपथ ले और समुदाय का ऐसा व्यक्ति न हो जिससे पहचान खुलने का जोखिम हो। ट्रांसजेंडर व्यक्ति के नाम, सर्वनाम और आवास की सुरक्षा का सम्मान किया जाए।
मजिस्ट्रेट, आश्रय और कानूनी प्रतिनिधित्व
आईटीपीए प्रक्रिया में मजिस्ट्रेट की भूमिका स्वतंत्र सुरक्षा-जाँच की है, पुलिस निष्कर्ष की मुहर लगाने की नहीं। व्यक्ति को वकील से निजी मुलाकात, आदेश की भाषा में जानकारी और चुनौती का अवसर मिले। वयस्क के लिए संस्था में रहने का आधार और अवधि स्पष्ट हों। संभावित घर-वापसी में परिवार और समुदाय का जोखिम गोपनीय रूप से जाँचा जाए; केवल पुलिस सत्यापन पर्याप्त नहीं।
आश्रय में खुला शिकायत तंत्र, चिकित्सा, फोन संपर्क, सुरक्षित मुलाकात, बच्चे के साथ व्यवस्था और स्वतंत्र निरीक्षण हो। अनुशासन के नाम पर जबरन श्रम, दवा, धार्मिक अभ्यास या संपर्क-विच्छेद निषिद्ध हो। कोई संस्था हमेशा के लिए घर नहीं; संक्रमण योजना में किराया, दस्तावेज, आय और स्थानीय सहायता शामिल हों। यदि वयस्क सुरक्षित स्वतंत्र आवास चुनता है तो संरक्षण का अर्थ उसे रोकना नहीं।
जाँच और अभियोजन
संगठित तस्करी का अभियोजन पीड़ित की लगातार उपलब्धता पर अकेला निर्भर न हो। बैंक/डिजिटल भुगतान, कॉल रिकॉर्ड के लिए विधिक आदेश, यात्रा और होटल दस्तावेज, नकली नौकरी विज्ञापन, संपत्ति, CCTV, पड़ोसी साक्ष्य और अन्य पीड़ितों के पैटर्न जोड़े जाएँ। आरोपी और पीड़ित के फोन की फोरेंसिक जाँच में अनुपात और निजता हो; असंबंधित निजी चित्रों का प्रसार स्वयं गंभीर हानि है।
गवाह को तारीख, यात्रा, भाषा और सुरक्षा सहायता मिले। पहचान की गोपनीयता न्यायालय और पुलिस रिकॉर्ड में लागू हो। मुआवजा दोषसिद्धि तक अनिश्चित रूप से न टले जहाँ विधि अंतरिम राहत देती हो। अभियोजन की सफलता केवल सजा-दर नहीं; मुख्य आयोजक और लाभार्थी तक पहुँचना, संपत्ति/लाभ की जाँच और पीड़ित की सुरक्षा भी है।
दीर्घकालीन पुनर्बहाली
तीन महीने बाद व्यक्ति कहाँ है, यह संख्या से अधिक महत्वपूर्ण है। सुरक्षित आवास, स्थिर आय, दस्तावेज, स्वास्थ्य, बच्चे का स्कूल, ऋण और धमकी की समीक्षा सहमति से हो। संपर्क ऐसा न लगे कि राज्य निगरानी कर रहा है। पुनःतस्करी हुई तो व्यक्ति को ‘असफल’ या दोषी न कहें; कार्यक्रम की आर्थिक और सुरक्षा कमी जाँचें।
जो वयस्क यौन-कार्य जारी रखना चुने, उसके साथ भी सुरक्षा योजना बनाई जा सकती है: आपात संपर्क, सुरक्षित स्थान साझा करना, ग्राहक सत्यापन, कंडोम, स्वास्थ्य सेवा और हिंसा रिपोर्टिंग। सहायता और निकास का द्वार खुला रहे। अधिकार-सम्मत व्यवस्था व्यक्ति को पहले से तय जीवन नहीं देती; वह हिंसा घटाकर निर्णय की वास्तविक क्षमता बढ़ाती है।
परिशिष्ट 3: शोध, मीडिया और अध्यापन के लिए आचार-संहिता
शोधकर्ता के लिए
शोध प्रश्न समुदाय पर थोपने से पहले यह समझना चाहिए कि परिणाम किसके काम आएँगे। केवल HIV जोखिम या ग्राहक संख्या पूछना व्यक्ति के आवास, हिंसा और श्रम अनुभव को अदृश्य कर सकता है। समुदाय सलाहकार मंडल प्रश्नावली, भर्ती, मानदेय और परिणाम की व्याख्या में शामिल हो। भागीदारी से इनकार किसी सेवा या लाभ को प्रभावित न करे। लिखित हस्ताक्षर ही हर बार सुरक्षित सहमति नहीं; हस्ताक्षर पहचान जोखिम पैदा करे तो नैतिक समिति अनुमोदित वैकल्पिक प्रक्रिया हो।
नमूना पद्धति स्पष्ट लिखी जाए। स्थान-आधारित नमूना घर/ऑनलाइन कर्मियों को कम दिखा सकता है; क्लिनिक नमूना सेवा न लेने वालों को छोड़ता है; स्नोबॉल नेटवर्क अलग-थलग व्यक्तियों तक नहीं पहुँचता। अनुमान में विश्वास/अनुमान-सीमा और संवेदनशीलता विश्लेषण दें। उपसमूह छोटा हो तो जिला, आयु, जाति और HIV स्थिति का संयोजन पहचान खोल सकता है; तालिका दबाना या श्रेणी मिलाना बेहतर है।
भाषा व्यक्ति-प्रथम और सटीक हो। ‘बेची गई लड़की’ उसके अनुभव का एक पक्ष है, स्थायी पहचान नहीं। ‘बचाव’ तभी लिखें जब वास्तव में नियंत्रण से निकाला गया हो; सामान्य छापे को स्वतः बचाव न कहें। ‘स्वीकार किया’ और ‘दावा किया’ जैसे शब्द पीड़ित को संदेहास्पद बना सकते हैं; तथ्यपरक “उसने बताया” पर्याप्त है। शोध में असुविधाजनक निष्कर्ष—जैसे कार्यक्रम की कम पहुँच—छिपाना नैतिक विफलता है।
पत्रकार और संपादक के लिए
शीर्षक में अपमानसूचक शब्द, कीमत या ‘धंधे का पर्दाफाश’ सनसनी से बचें। मानव-तस्करी की रिपोर्ट में FIR संख्या, लागू धाराएँ, आरोप और सिद्ध तथ्य अलग रखें। आरोपी को दोषसिद्धि से पहले आरोपी ही लिखें। पुलिस का बचाई गई संख्या वाला प्रेस नोट स्वतंत्र सत्यापन के बिना प्रसार अनुमान नहीं। प्रभावित वयस्क की रिकॉर्डिंग उसकी स्पष्ट सहमति से हो; चेहरे के अतिरिक्त आवाज, टैटू, कमरा, गली और रिश्ते भी पहचान खोलते हैं।
बच्चे की पहचान किसी परिस्थिति में उजागर न हो। माँ का पेशा बच्चे की पहचान तक पहुँचा सकता है, इसलिए पारिवारिक विवरण न्यूनतम रखें। कहानी में सहायता संपर्क और कानूनी संदर्भ देना उपयोगी है, पर किसी व्यक्ति को कैमरे पर पुनः आघात बताने के बदले सेवा का वादा न करें। अनुवाद में ‘sex worker’, ‘trafficked person’ और ‘survivor’ को एक ही शब्द में न बदलें।
डेटा के साथ स्रोत, वर्ष और सीमा शीर्ष/चित्र में ही लिखें। “भारत में दस लाख वेश्याएँ” के स्थान पर “2020–22 कार्यक्रमगत मानचित्रण में लगभग 9.95 लाख महिला यौनकर्मियों का अनुमान; ऑनलाइन और अन्य लिंग शामिल नहीं” अधिक लंबा किंतु सत्य है। ग्राफ का शून्य आधार और राज्य की जनसंख्या संदर्भ आवश्यक है। बड़ी संख्या अधिक तस्करी का स्वतः प्रमाण नहीं।
शिक्षक और विद्यार्थी के लिए
कक्षा में विषय पढ़ाते समय नैतिक बहस से पहले शब्दावली और कानून स्पष्ट करें। विद्यार्थियों को अलग स्रोत समूह दें—आईटीपीए, संविधान, सर्वोच्च न्यायालय, NACO शोध और ऐतिहासिक अध्ययन—और पूछें कि हर स्रोत क्या देखता तथा क्या छोड़ता है। इससे ‘एक सही मत’ खोजने के बजाय प्रमाण की आलोचनात्मक समझ विकसित होती है।
फिल्मी दृश्य, आत्मकथा या उपन्यास अनुभव का महत्वपूर्ण स्रोत हो सकता है, पर उसे राष्ट्रीय प्रतिनिधि आँकड़ा न मानें। तवायफ या देवदासी पर लोकप्रिय प्रस्तुति को ऐतिहासिक शोध से मिलाएँ। ‘एजेंसी बनाम पीड़ितता’ के द्वैत पर चर्चा कराएँ: सीमित विकल्प में व्यक्ति निर्णय भी ले सकता है और शोषण भी सह सकता है। किसी विद्यार्थी से निजी अनुभव बताने की अपेक्षा न करें।
कानून-अध्ययन में काल्पनिक मामले उपयोगी हैं: दो वयस्क सुरक्षा के लिए फ्लैट साझा करते हैं; एक मालिक दस्तावेज रखता है; सत्रह वर्षीय बच्चा उम्र गलत बताता है; ग्राहक कंडोम से इंकार कर हिंसा करता है। हर मामले में आयु, सहमति, नियंत्रण, तीसरा पक्ष और लागू कानून अलग पूछें। इससे नैतिक लेबल के बजाय कानूनी तत्व समझ आते हैं।
नीति-लेखक के लिए
नीति का लक्ष्य स्पष्ट लिखें: तस्करी रोकना, सार्वजनिक स्वास्थ्य सुधारना, हिंसा घटाना या सार्वजनिक स्थान व्यवस्थित करना अलग लक्ष्य हैं। एक लक्ष्य की सफलता दूसरे की हानि कर सकती है—उदाहरणतः दृश्य स्थान बंद करने से सड़क शिकायत घटे, पर काम एकांत और असुरक्षित हो जाए। हर प्रस्ताव के संभावित विस्थापन प्रभाव का पूर्व आकलन और बाद का मूल्यांकन हो।
प्रभावित समूह के प्रतिनिधित्व में विविधता रखें। केवल बड़े वेश्यालय क्षेत्र का संगठन घर-आधारित, पुरुष, ट्रांस, प्रवासी या पेशा छोड़ चुके जीवित बचे लोगों के अनुभव का प्रतिनिधि नहीं। असहमति दर्ज करना प्रक्रिया की कमजोरी नहीं, विश्वसनीयता है। बैठक के लिए मानदेय, यात्रा, बाल देखभाल और भाषा सुविधा वास्तविक भागीदारी की शर्तें हैं।
परिशिष्ट 4: जिला स्तर की संकेतक सूची
जिला प्रशासन को एक छोटी, मापने योग्य संकेतक सूची उपयोगी हो सकती है। पुलिस के लिए: यौनकर्मी द्वारा दर्ज हिंसा शिकायतों की संख्या और समय पर FIR; छापों में वयस्क/बच्चे का पृथक आँकड़ा; कंडोम जब्ती की शून्य घटनाएँ; पहचान उल्लंघन पर कार्रवाई; मुख्य तस्कर तक पहुँचे मामलों का अनुपात। संख्या बढ़ना आरंभ में बेहतर रिपोर्टिंग दर्शा सकता है, इसलिए लक्ष्य यांत्रिक कमी नहीं होना चाहिए।
स्वास्थ्य के लिए: स्वैच्छिक HIV/STI परीक्षण पहुँच, पॉजिटिव व्यक्ति का गोपनीय ART लिंक, उपचार निरंतरता, कंडोम की वास्तविक उपलब्धता, प्रजनन और मानसिक स्वास्थ्य रेफरल, सेवा में भेदभाव शिकायत और समाधान। केवल वितरित कंडोम की संख्या गुणवत्ता नहीं। गुमनाम संतुष्टि और छूटी आबादी का अनुमान जोड़ा जाए।
सामाजिक सुरक्षा के लिए: राशन/पहचान आवेदन का निपटान समय, बैंक खाता, सुरक्षित आवास, बच्चों का स्कूल प्रवेश और निरंतरता, कौशल कार्यक्रम के बाद छह/बारह माह की आय, तथा स्वैच्छिक निकास सेवा। डेटा प्रकाशित करते समय छोटे समूह और स्थान छिपें। किसी लाभ के लिए सार्वजनिक पेशागत पंजीकरण न बनाया जाए।
न्याय और पुनर्वास के लिए: वकील से पहली निजी मुलाकात का समय, मजिस्ट्रेट समीक्षा, अंतरिम मुआवजा, आश्रय में औसत/मध्य अवधि, स्वेच्छा से चुना गंतव्य, पुनःहिंसा और शिकायत समाधान। ‘बचाए गए’ और ‘संस्थागत किए गए’ की ऊँची संख्या अकेली उपलब्धि नहीं। सबसे कठिन पर सबसे अर्थपूर्ण संकेतक व्यक्ति का अपने जीवन पर बढ़ा नियंत्रण है।
समापन टिप्पणी
यह विषय सरल नारा स्वीकार नहीं करता। “प्रतिबंध लगाओ”, “वैध कर दो”, “बचाओ” या “पेशा मानो”—हर नारे के पीछे प्रश्न हैं: किस व्यवहार पर कौन कानून, किसकी सहमति, किसका लाभ, किसकी सुरक्षा और क्या प्रमाण? भारतीय इतिहास बताता है कि नैतिक या प्रशासनिक श्रेणियाँ स्वयं सत्ता से बनती हैं। वर्तमान संविधान हमें उन श्रेणियों के भीतर व्यक्ति की गरिमा देखने के लिए बाध्य करता है।
तस्करी-विरोधी दृढ़ता और यौनकर्मी-अधिकार विरोधी ध्रुव नहीं। वास्तव में स्वैच्छिक वयस्क को अपराधी बनाने में संसाधन लगाने से पुलिस का ध्यान बच्चे, बल, धोखे और संगठित लाभ से हट सकता है। दूसरी ओर ‘अधिकार’ कहकर हर बाजार संबंध को स्वतंत्र मान लेना भी उन लोगों को छोड़ देगा जिनकी कमाई, आवाजाही और शरीर पर किसी और का नियंत्रण है। सटीक भेद ही दोनों उद्देश्यों को मजबूत करता है।
अंततः नीति की गुणवत्ता उससे आँकी जानी चाहिए कि सबसे कम शक्ति वाले व्यक्ति के पास कितनी वास्तविक राहें खुलीं। क्या वह हिंसा के बिना काम कर सकता है, काम छोड़ सकता है, उपचार ले सकता है, बच्चे को पढ़ा सकता है, शिकायत दर्ज कर सकता है और अपनी पहचान सुरक्षित रख सकता है? यदि उत्तर नहीं है तो केवल कानून की कठोरता या योजना की संख्या सफलता नहीं। प्रमाण, संवैधानिक गरिमा और प्रभावित लोगों की भागीदारी—इन्हीं तीन आधारों पर भारत अधिक न्यायपूर्ण उत्तर विकसित कर सकता है।
परिशिष्ट 5: चयनित स्रोतों को पढ़ने की मार्गदर्शिका
आईटीपीए का मूल पाठ पढ़ते समय केवल अपराधों की सूची नहीं, परिभाषा और प्रक्रिया साथ देखनी चाहिए। धारा 2 में प्रयुक्त शब्द आगे की धाराओं का अर्थ निर्धारित करते हैं। धारा 3 से 8 दंडनीय व्यवहार बताती हैं, जबकि धारा 15 से 17 तलाशी, पेशी और संरक्षण की प्रक्रिया। किसी द्वितीयक वेबसाइट के छोटे सारांश में अपवाद, संशोधन और दंड की आयु-आधारित भिन्नता छूट सकती है। अद्यतन India Code पाठ को प्राथमिकता देने का यही कारण है।
संविधान के अनुच्छेद अलग-अलग नहीं चलते। अनुच्छेद 19(1)(g) पेशा/व्यवसाय की स्वतंत्रता देता है, किंतु अनुच्छेद 19(6) उचित प्रतिबंध की अनुमति देता है; इसलिए इससे स्वतः अनियंत्रित यौन-कार्य अधिकार निकालना सही नहीं। अनुच्छेद 21 की गरिमा और निजता, अनुच्छेद 14 का समान संरक्षण और अनुच्छेद 23 का तस्करी निषेध साथ पढ़ने पर संतुलन बनता है। राज्य को व्यक्ति के निर्णय का सम्मान भी करना है और बलात् शोषण से रक्षा भी।
बुद्धदेव कर्मास्कर का 19 मई 2022 आदेश छोटे मीडिया शीर्षकों से अधिक सूक्ष्म है। वह विधायिका की अनुपस्थिति में अनुच्छेद 142 के प्रयोग, पैनल की सिफारिशों और केंद्र की प्रतिक्रियाओं की पृष्ठभूमि में आया। उसके निर्देश पुलिस, मीडिया, स्वास्थ्य, बच्चों, पहचान और नीति भागीदारी तक फैले हैं। उसे “सर्वोच्च न्यायालय ने वेश्यावृत्ति वैध की” कहना इसलिए गलत है कि आईटीपीए की धाराएँ समाप्त नहीं हुईं और न्यायालय ने वेश्यालय चलाना अवैध ही माना।
प्रज्वला का 2026 निर्णय आकार और विषय दोनों में व्यापक है। उसे केवल एक पंक्ति के ‘पुनर्वास’ आदेश में घटाने से तस्करी की परिभाषा, शोषण, बच्चे, संस्थागत समन्वय और 3P ढाँचे का विश्लेषण छूट जाएगा। निर्णय पढ़ते समय यह पहचानना चाहिए कि कौन बात बाध्यकारी दिशा, कौन विधिक व्याख्या और कौन नीति अवलोकन है। इस आलेख में निर्णय की मूल दिशा संक्षेपित है; विशिष्ट मुकदमे में अधिवक्ता को संपूर्ण आधिकारिक पाठ और बाद के आदेश देखने चाहिए।
PLOS का PMPSE लेख खुली पहुँच वाला सहकर्मी-समीक्षित शोध है और विस्तृत पद्धति देता है। उसका सबसे महत्वपूर्ण योगदान केवल दस लाख के निकट संख्या नहीं, नेटवर्क और स्थानों की बहु-स्रोत गणना है। अनुमान-सीमा, जिलों का कवरेज और वर्चुअल प्लेटफॉर्म का अपवर्जन मुख्य परिणाम जितने ही महत्वपूर्ण हैं। राज्य प्रतिशत को राज्य जनसंख्या या तस्करी दर समझना श्रेणी-भूल होगी। शोध 2020–22 की कार्यक्रमगत स्थिति मापता है, प्रकाशन वर्ष 2025 है; दोनों वर्ष अलग लिखे जाने चाहिए।
NACO का Sankalak प्रशासनिक कार्यक्रम डेटा का संकलन है। उससे सेवा कवरेज, नई पहचान और लिंकिंग समझी जा सकती है, लेकिन क्लिनिक पहुँच से बाहर व्यक्ति गिने नहीं जाते। ‘नए HIV-पॉजिटिव पाए गए’ नए संक्रमण के उसी वर्ष होने का प्रमाण नहीं; यह पहली पहचान है। औसत कंडोम वितरण वास्तविक उपयोग या प्रत्येक व्यक्ति को समान मात्रा नहीं बताता। इन सीमाओं के साथ कार्यक्रम सुधार के लिए यह उपयोगी स्रोत है।
WHO, UNAIDS और विश्व बैंक की सामग्री तुलनात्मक सार्वजनिक स्वास्थ्य दृष्टि देती है। उनकी अपराध-मुक्ति या संरचनात्मक हस्तक्षेप संबंधी सिफारिश को भारतीय विधि का बयान नहीं बनाया जाना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय शोध में अलग देश, नमूना और कानून होते हैं; प्रभाव का भारत में स्थानांतरण स्थानीय प्रमाण माँगता है। फिर भी स्वास्थ्य सेवा को पुलिस भय से अलग रखना, समुदाय भागीदारी और हिंसा को HIV जोखिम का संरचनात्मक कारण मानना व्यापक रूप से समर्थित सिद्धांत हैं।
ऐतिहासिक स्रोतों में अर्थशास्त्र का अनुवाद मूल भाषा और पाठ-संपादन की समस्या लिए है। औपनिवेशिक शोध प्रशासनिक अभिलेखों पर निर्भर करता है, जिनमें अधिकारी की दृष्टि और वर्गीकरण निहित है। तवायफ पर सांस्कृतिक अध्ययन कलाकार समुदाय की एजेंसी दिखाता है, पर हर क्षेत्र का सामाजिक इतिहास नहीं। अच्छे इतिहास-लेखन का नियम है कि एक स्रोत से उतना ही निष्कर्ष निकले जितना वह वहन कर सकता है।
NCRB की Crime in India रिपोर्ट पुलिस द्वारा दर्ज अपराधों का आधिकारिक संकलन है। राज्यवार तुलना में जनसंख्या, दर्ज करने की प्रवृत्ति, विशेष अभियान और लंबित जाँच का ध्यान जरूरी है। तस्करी के पंजीकृत मामले, बचाए गए व्यक्ति, आरोपपत्र और दोषसिद्धि अलग इकाइयाँ हैं। बिना तालिका शीर्षक और वर्ष के कोई संख्या उद्धृत करना भ्रम पैदा करता है; इसी कारण इस आलेख ने अप्रमाणित व्यापक संख्या देने से परहेज किया है।
किसी पाठक को अद्यतन जाँच करनी हो तो क्रम उपयोगी है: पहले India Code और सर्वोच्च न्यायालय का मूल निर्णय; फिर संबंधित मंत्रालय/NACO/NCRB प्रकाशन; उसके बाद सहकर्मी-समीक्षित शोध; अंत में विश्वसनीय व्याख्यात्मक लेख। हर चरण में प्रकाशन तिथि और घटना/डेटा वर्ष अलग नोट करें। इस क्रम से लोकप्रिय परंतु गलत आँकड़ों, पुराने दंड संहिता संदर्भ और निर्णय की अतिरंजित व्याख्या का जोखिम घटता है।
लेख में शब्द-संख्या बढ़ाने के लिए कोई काल्पनिक घटना, व्यक्ति, सर्वेक्षण, आय अथवा राज्यवार अपराध संख्या नहीं जोड़ी गई है। जहाँ सत्यापित राष्ट्रीय आँकड़ा उपलब्ध नहीं था, वहाँ अभाव को स्पष्ट स्वीकार किया गया है। यही सावधानी इस संवेदनशील विषय पर प्रमाण-आधारित लेखन की बुनियादी शर्त है।
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