Sunday, 18 August 2013

वृक्ष की आत्मकथा

                            
जी हाँ! मैं वृक्ष हूँ। वही वृक्ष, जिसके विषय में पद््मपुराण यह कहता है कि - जो मनुष्य सड़क के किनारे तथा जलाशयों के तट पर वृक्ष लगाता है वह स्वर्ग में उतने ही वह वृक्ष फलता फूलता है। इस तरह आप मेरे महत्त्व को समझ सकते हैं।  मेरी प्रशंसा करते हुए महाकवि कालीदास `अभिज्ञान शाकुन्तलम्' में लिखते हैं -
``अनुभवति हि मूर्ध्ना पादपस्तीऋामुष्णं।
शमयति परितापं छायया संश्रितानाम्।।''
जिसका अर्थ है कि मैं (वृक्ष) अपने सिर पर गर्मी सह लेता हँू। परन्तु अपनी छाया से औरों को गर्मी से बचाता हूँ। मेरे ही विषय में `शार्गधरपद््धति:' में कहा गया है कि -
``पत्रपुष्पफलच्छाया मूल वल्कल दारुभि:
गन्धनिर्यासभस्मास्थितोक्मैं: कामान् वितन्वते।।''
अर्थात, मैं (वृक्ष) अपने पत्ते, फूल, फल, छाया, मूल, वल्कल, काष्ट, गन्ध, दूध, भस्म, गुण्ली और कोमल अंकुर से सभी प्राणियों को सुख पहुँचाता हँू।
यह सब बातें मेरे महत्त्व को बतलाने में समर्थ हैं।  मैं हजारों-लाखो-करोडों वर्षो से अपना सबकुछ देकर इस धरा के धराधारियों को जीवन प्रदान कर रहा हँू। लेकिन आज मैं यह सोचकर सिहर जाता हँू कि आखिर मैं अपनी यह जिम्मेदारी कबतक निभा पाऊगाँ? मुझे नष्ट करने वाले नादान, ये नहीं समझ पा रहे हैं कि मेरे बिना उनका अपना ही अस्तित्व शून्य में विलीन हो जायेगा।
सूर्य इस संसार की आत्मा है। वेदों की यह वाणी आध्यात्मिक और वैज्ञानिक रुपों में सच है। आधुनिक चिकित्साशास्त्र भी सूर्य की किरणों को `प्राकृतिक महौबाधि' मानता है। पर सूर्य कब तक हमें ऊर्जा और स्वास्थ्य देने वाला बना रहेगा? यह प्रश्न आज के मनुष्यों के चिंतन का विषय होना चाहिए। क्योंकि शायद बहुत लम्बे समय तक सूर्य अपनी यह जिम्मेदारी निभा नहीं पायेगा।
आज का मनुष्य अपनी करतूतों से ऐसी परिस्थितियाँ पैदा करने जा रहा है कि सूर्य आराध्य देव नहीं बल्कि सबसे बड़ा शत्रु हो जायेगा।  सूर्य की किरणें कैंसर जैसे भयानक रोग अपने साथ लाएगी और रोग से लड़ने की इंसानी क्षमता को नष्ट कर देगी। गर्मी बेहद बढ़ जायेगी और बर्फ पिघल कर समुद्रतल को बढ़ा देगी। समुद्र के किनारे बसे शहर पानी में डूब जायेगे। कूएँ सूख जाएँगे और रेत का साम्राज्य इतना बढ़ जाएगा कि लोगों को जान बचाने के लिए मैदानों व जंगलों की तरफ भागना पड़ेगा। पर इसमें सूर्य की क्या गलती? गलती तो अपने अहंकार में चूर मानव की ही है। मनुष्य मुझे और मुझसे निर्मित पर्यावरण को महत्त्वहीन मान रहा है। हमारे साथ खिलवाड़ करते हुए वह यह भूल गया है कि हमारे बिना मनुष्य अपने आनेवाले कल की कल्पना तक नही कर सकता।
यह सब मैं इसलिए कह रहा हँू क्योंकि संकट की घड़ी आ चुकी है। जीवनभर सहज स्वाभाविक तौर पर जीते हुए साँसों के जरिये प्राणवायु का इस्तमाल करते हुए मनुष्य कभी भी उसके बारे में नहीं सोचता। परन्तु साँसों में तकलीफ होते ही आक्सीजन सिलेण्डर की याद आती है। जब तक आपदाएँ कहर बनकर नहीं टूटीं तब तक जल, हवा, जमीन और मेरे बारे में किसी मनुष्य ने भी नहीं सोचा।
ऐसा नहीं है कि सभी मनुष्य एक समान हैं। वे महान आत्माएँ जो मेर महत्त्व को समझने में सफल हुए, उन्होनें इसे दूसरों तक पहुँचाने का अथक प्रयास किया। `सामान इकट्ठा करते जाना' इसे समृद्धि का प्रतिमान मानने की प्रवृत्ति को महान रवीन्द्रनाथ टैगोर ने जिस नाम से पुकारा वह है - `सभ्यतानाम्नी पाताल'। नदी के पानी पर बाँध-बाँधने के खिलाफ उन्होंने `मुक्तधारा' नाटक लिखा। धरती के नीचे सुषुप्त सम्पदा को कुछ लालची लोगों द्वारा निकाले जाने के विरूद्ध उन्होंने `रक्तकरबी' और अनेक निबंध लिखे हैं। उन्होंने कहा था, `मनुष्य का लोभ सिर्फ प्रकृति के विनाश से शान्त नहीं होगा, वह मनुष्य का भी विनाश करेगा।  `महात्मा गाँधी का यह कथन सभी देशों के पर्यावरण विद यंत्रवत उद्धृत करते हैं - Nature has enough for everybody's need but not for everybody's greed.
मनुष्य की सभ्यता का इतिहास मूलत: मेरे साथ उसकी गृहस्थी का इतिहास है। प्रत्येक प्राचीन सभ्यता में आम लोग प्राकृतिक शक्तियों का सम्मान करते रहे हैं।  उनसे प्यार करते रहे हैं। आदिम काल में मनुष्य ने सिर्फ अज्ञान और भयवश प्राकृतिक शक्तियों की पूजा की है, ऐसा नहीं है। पर्यावरण संरक्षण के लिए तमाम नियम उन्होंने बनाये थे। जिन्हें वे मानते थे। किस मौसम में कौन-सी मछलियाँ या सब्जियाँ खायी जाएँ, जंगल से पेड़ काटने जरूरी हो तो कैसे छाँटे जाएँ, ऐसे अनेक नियम उन्होंने अपने अनुभवो से ही बनाए।  बंगाल में `खनार बचन' हिन्दी में `घाघ' और राजस्थान में `भडलीपुराण' तो असल में मिट्टी, जल और सौर उर्जा के अन्तरसम्बन्धों पर आधारित सटीक कृषि कार्य संचालन के अनुभवों का संकलन ही है।
मुझे कभी - कभी यह सोचते हुए हँसी भी आती है और गुस्सा भी आता है कि मैं वृक्ष होकर भी महान आत्माओं द्वारा कहे हुए व लिखे हुए ज्ञान को जानता हँू, समझता हूँ, पर मनुष्य खुद इन चीजों पर अमल करते हुए कही दिखायी नहीं दे रहा है। आज मनुष्य उसी शेख चिल्ली की तरह व्यवहार कर रहा है जो उसी डाल को काटने पर तुला हुआ रहता जिस पर खुद बैठता था। `आ बैल मुझे मार' यह बात आज के मनुष्यो पर उनके क्रियाकलापों को देखकर सच लग रही है। आज मेरे विनाश में पृथ्वी के सभी देशों की सरकारे लगी है। सत्ता संपन्न लोग भी वन-विनाश की नीतियाँ तैयार करते नजर आ रहे हैं। और यह काम दिन दुनी रात चौगनी वाली स्थिती में पहुँचकर आज एक भयानक मानवीय संकट के रुप में प्रतिष्ठित हो चुका है।
मनुष्यों द्वारा अपना स्वार्थ को साधने में मेरा भरपूर इस्तमाल किया गया है। भारत के संदर्भ में कहूँ तो - कहना होगा कि ब्रिटिश नौसैनिक बेड़ों की अपराजेयता भारत वर्ष और बर्मा के सागौन जंगलों की कीमत पर स्थापित हुई। इससे पहले यूरोप मे जहाज ओक की लकड़ियों से बनाये जाते थे। लेकिन औपनिवेशिक शक्तियों की आपसी लड़ाइयो में उन्नीसवीं सदी के शुरू में ही यूरोप के प्राचीन व विख्यात ओक के जंगल समाप्त हो गए। परिवहन सुविधा के म ेनजर ब्रिटिश हुक्मरानों ने जब भारतवर्ष में रेल की पटरियां बिछानी शुरु की और रेलवे इंजन दौड़ने लगे, तब पटरियों के स्लीपरों के लिए व्यापक पैमाने पर अहेतुक अपव्यय के बतौर हिमालय से, खासतौर पर कुमायूँ गढ़वाल से हजारों-हजार वृक्ष काटे गए। निर्यात के लिए जिन इलाकों में खेती का पैमाना बढ़ाने की जरुरत पड़ी, उन सभी जगहों पर मेरी अन्धाधुन्ध कटाई हुई। गुलाम भारतवर्ष की विशाल अरण्यभूमि इसीतरह हिंस्त्र, अदूरदर्शी, स्वार्थान्वेषी आक्रमणों में निहत हुई। यह सिर्फ भारतवर्ष का ही नहीं, तीसरी दुनियाँ के प्रत्येक देश का सत्य है। स्पेन ने दक्षिण अमेरिका के जिन देशों को उपनिवेश बनाया, वहाँ गन्ने के रस से चीनी तैयार करने के क्रम में इंधन के तौर पर उन इलाकों के जंगल काटकर फूंक दिये।
सबसे भयंकर बात तो यही है कि यह भयंकर विनाश बन्द होने के बजाय आज और भी ज्यादा तेजी से चल रहा है। उपग्रहों से मिली तस्वीरों के द्वारा मनुष्यां को यह ज्ञात है कि हरसाल लगभग 13 लाख हेक्टेअर जमीन पर बसे जंगल साफ हो रहे हैं। कहीं सड़के बन रही हैं, कहीं नये पर्यटन स्थल बन रहे है अथवा कहीं नगर-निर्माण के लिए हजारो-हजार हेक्टेअर प्राचीन वनभूमि का विध्वंस हो रहा है। जंगलों के विनाश से वनवासियों के संकट और कष्टों के अलावा सबसे बड़ा संकट भूमि कटाव का है। जंगल ही जमीन को वर्षा के सीधे प्रहार से बचाते हैं। जंगल - रिक्त भूमि की उर्वर ऊपरी सतह वृष्टि से घुल जाती है। इससे एक ओर तो विस्तीर्ण अंचल रूक्ष, निष्पादप और अनुर्वर बन जाते हैं, दूसरी ओर पानी के साथ निकली वह मिट्टी नदियों की सतह में जमा होने लगती है, और नदियों का स्वाभाविक प्रवाह बाधित होता है। इसी कारण से पशुपालन क्षेत्र भी नष्ट होते हैं।
इसतरह मेरी दुर्दशा का आलम यह है कि वह सार्वभौम होते हुए भी, काई सार्थक पहल मुझे बचाने के लिए नही हो रही है। सबसे चिंतनीय परिस्थितियाँ उष्णकटिबंध के जंगलों की है, जो धरती के केवल सात फीसदी हिस्से पर फैले हैं पर दुनियाँ के 50 से 80  जैविक और वानस्पतिक प्रजातियों के घर हैं। इन जगलों के विनाश की रफ्तार प्रति सेकेण्ड एक मैदान के बराबर है। ब्राजील के दो-दो सौ फुट ऊँचे पेड़ो वाले विशाल रांडोनिया के जंगलो का 20  नष्ट किया जा चुका है। और अगर इसकी यही रफ्तार रही तो आनेवाले 20-22 सालों में रांडोनिया के जंगल धरती के नक्शे से गुम हो जायेगें।
वैसे मनुष्यों द्वारा लिखे गए पौराणिक ग्रंथो में यह कहा गया है कि मेरा उद््भव मेरी कृतघ्नता के दंड स्वरुप हुआ है। जिसके प्रायश्चित स्वरुप मुझे इस जन्म में जेठ की गरमी, माघ की शीत व आषाढ़ की वर्षा सहनी पड़ती है। इस तरह मैं दूसरों के परमार्थिक, भौतिक विकास के कार्यो में अनवरत एकांगी भाव से लगा रहता हँू। हो सकता है कि मेरे द्वारा पूर्वजन्म में किये गये पापों से छुटकारा पाने का यह साधन है। यदि इसी को मनुष्य द्वारा खोजे गये वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर वैज्ञानिक ढ़ग से सोचा जाय तो प्रसिद्ध भारतीय वैज्ञानिक जगदीशचंद्र बोस ने सिद्ध किया है कि सामान्य मनुष्य की भाँति मुझे भी श्वसन, निद्रा, भय, भोजन तथा विसर्जन की आवश्यकता होती है। अर्थात समानता में मैं मनुष्य के समतुल्य जीव हँू। ऐसे में प्रश्न उठता है कि फिर क्यों आज हम दोनों के बीच भाईचारे का भाव घटता जा रहा है। क्योंकि अपने स्वार्थीपन के कारण मनुष्य अपने सिवाय दूसरों के बारे में नहीं सोचता है। वैसे जो आनेवाले दुष्परिणामों के बारे में नहीं सोचता वह अदूरदर्शी होता है। और मनुष्यों की मुझे मिटाने की मुहिम देखकर इसमें कोई शंका नहीं रह जाती कि आज का मनुष्य अदूरदर्शी हो गया है।
यदि यह विनाश लीला जारी रही तो मानव अपनी संतानों को विरासत में मरू-भूमि तथा संस्कार विहीन धरती को प्रदान करेगे। जिसमें सबसे ज्यादा हानि मनुष्यों की ही होगी। इसलिए चाहिए कि मनुष्य समय रहते चेत जाये। जो मनुष्य समय रहते नही चेतते; समय उन्हें नष्ट कर देता है। हे मनुष्यों! समय के महत्त्व को समझो और यह मान लो कि अब तुम्हारे पास खोने को कुछ नहीं बचा है - सिवाय पाने के। इसलिए आप सब से मेरी करबद्ध प्रार्थना है कि आप सब मेरी इन बातों पर गंभीरता पूर्वक विचार करते हुए किसी साहसिक कदम को उठायें।
मनुष्य और शेष प्रकृति को इस विनाश से बचाने के लिए; जिसका जिम्मेदार स्वयं मनुष्य ही है, उसे (मनुष्य को) उस परंपरा की ओर लौटना होगा जहाँ मनुष्य और प्रकृति में सामंजसय हो विरोध नहीं। जीवन दृष्टि प्रकृति के संयमित और विवेकशील इस्तेमाल की हो, लूट खसोट की नहीं। वृक्षो की संस्कृति पर आधारित जीवन पद्धति की ओर और जीवन-दृष्टि की ओर मनुष्यों को लौटना ही होगा। क्योंकि मेरे बिना न प्रकृति होगी और न जीवन।  और जीवन के बिना मनुष्य क्या होगा? उत्तर होगा पाषाण। वृक्षो के बिना मनुष्य चेतना शून्य हो जायेगा। मनुष्यों में अगर चेतनता है तो इसका एकमात्र कारण सिर्फ मैं हूँ मैं। मनुष्य इस बात को जितनी जल्दी समझ जाये यह उसके हित में ही होगा।
मैनें अपनी व्यथा व अपनी चिंता आपके सामने रख दी है। मुझे न्ष्ट करके आपको कुछ भी प्राप्त नहीं होगा। आपका कल्याण, मेरे कल्याण के ही साथ जुड़ा हुआ है। फिर भी अगर आप में से कुछ लोगों को यह लगता है कि मैंने यह सब बातें केवल अपने स्वार्थ के लिए आप की हमदर्दी हासिल करने के खातिर की है। तो मैं आप लोगों से कवि के इन्हीं शब्दों के साथ विदा चाहता हँू कि -
``मैं गाता हूँ, नहीं किसी की प्रीति चुराने के लिए।
मेरा यह तप है, दुनियाँ का दु:ख पी जाने के लिए।''

                               डॉ मनीष कुमार मिश्रा 

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हिंदी साहित्य का इतिहास : पुनर्मूल्यांकन के कुछ चर्चित बिंदु

                 
हिंदी साहित्य के इतिहास की पूर्व प्रचलित मान्यताएँ नित नवीन शोधों, अनुसंधानों एवम् विचार धाराओं के आलोक में पुनर्मूल्यांकन एवम् पुनर्लेखन की ओर हम सभी का ध्यान केन्द्रित करती हैं। हिंदी साहित्येतिहास लेखन की एक सुदृढ़ परंपरा इसी बात को बल प्रदान करती है। जब मैं बात हिंदी साहित्येतिहास लेखन की परंपरा की करता हँू तो निश्चित रूप से यहाँ `परंपरा' का अर्थ ``आधुनिक मान्यताओं, विचारों एवम् अवधारणाओं को आत्मसाथ कर आगे बढ़ने की प्रवृत्ति से ही है।'' संक्षेप में मेरी `परंपरा' की कल्पना में आधुनिकता (तथाकथित सम् सामायिक संदर्भो में) हमेशा परंपरा से जुड़ता चलती है। इसलिए नवीन शोधों, अनुसंधानों, तथ्यों, विचारधाराओं एवम् अवधारणाओं के परंपरा से जुड़ने पर मैं इसे `दुसरी परंपरा' या `तीसरी परंपरा' नहीं मानता। पुनर्मूल्यांकन व पुनर्लेखन वास्तव में आधुनिकता के ही परिचायक हैं। ये ही वो तत्व हैं जो परंपरा के परिमल - विमल प्रवाह को गति प्रदान करते हैं। यही परंपरा व्यापक स्वरूप में संस्कृति का निर्माण करती है। जोसेफ बी. कॉपर और जेम्स एल. मैकगाह अपनी किताब -
यहाँ पर जिस   की बात हो रही है, मेरे हिसाब से  परंपरा और  नवीन मान्यताओं की ही तरफ इशारा कर रहे हैं।
पिछले कई दशकों से हिंदी साहित्यातिहास के जिन बिंदुओं को लेकर व्यापक चर्चा हुई है, उनमें से कुछ की (`कुछ की' इसलिए कह रहा हँू क्योंकि मेरे अध्ययन की अपनी सीमाएँ हैं और हिंदी का क्षेत्र बड़ा व्यापक।) चर्चा मैं अपने तरीके से करना चाहूँगा। जब भी बात हिंदी साहित्येतिहास की चलती है तो पहला प्रश्न `इतिहास' और `साहित्येतिहास' की अवधारणा को ही लेकर उठता है। ``साहित्यिक इतिहास क्यों और कैसे?'' नामक अपने लेख में हिंदी के सुप्रसिद्ध मार्क्सवादी आलोचक डॉ. नामवर सिंह लिखते हैं कि, ``साहित्यिक इतिहास की विषय-सामग्री किसी भाषा की सर्जनात्मका और साहित्यिक-सृष्टि है, जिसकी गुणवत्ता का तारतमिक मूल्यांकन भी साहित्यिक इतिहासकार का अतिरिक्त दायित्व है। यह आलोचना-धर्म साहित्यिक इतिहास का ऐसा पक्ष है जो अन्य इतिहासों से उसे अलग करता है। इस दृष्टि से यदि एक ओर इतिहास से साहित्य की होड़ है तो साहित्यिक इतिहास भी इस होड़ में उसका बगलगीर है।'' नामवर जी की इस `होड़ दृष्टि' पर विचार करना आवश्यक है। मुझे लगता है कि यह कोई होड़ न होकर विकास की अपनी अलग-अलग स्थितियाँ हैं। जब कोई रचना बनती है या लिखी जाती है तो वह अपने निर्माण के साथ ही `कालजयी' होने का दावा नहीं करने लगती। बल्कि एक लंबे अंतराल के बाद उस रचना विशेष की लोकप्रियता, कथ्य, शिल्प, अलंकारिकता, काव्यगत तत्व, सम सामायिक राजनैतिक, आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक व ऐसे ही कई पक्षों  पर विचार करके उसकी `कालजयिता' का मूल्यांकन विद्ववानों द्वारा किया जाता है। काल वह कसौटी है जिस पर रचना (साहित्य) जाने- अनजाने लगातार घिसी जाती हैं। वह साहित्य जो काल परिवर्तन से प्रभावित हुए बिना अपनी प्रासंगिकता बनाये रखने में सफल रहता है वही कालजयी कहलाता है।
काल सतत गतिशील है। (वृत्ताकार रूप में या कि एक रेखीय रूप में? इस विवाद में मैं नहीं पड़ना चाहता।) लेकिन साहित्य के बारे में ऐसा दावा नहीं किया जा सकता। साहित्य की गतिशीलता कई अन्य पक्षों पर आधारित होती है। साहित्य की होड़ साहित्य से ही होती है, काल से नहीं। जहाँ तक प्रश्न काल और कला का है तो, कला का क्षेत्र बड़ा व्यापक है। काल विशेष की कला उस काल विशेष को ऐतिहासिक गरिमा प्रदान करते हैं। काल विशेष की परिस्थितियों में ही कला का जन्म होता है। मुझे तो ये परस्पर एक दूसरे के पूरक प्रतीत होते हैं। और अगर ना भी हों तो, कम से कम किसी होड़ में शामिल नहीं दिखते।
हिंदी साहित्येतिहास और इतिहास दर्शन को लेकर भी बहुत सारे विचार चर्चा में रहे। इतिहास संबंधी भारतीय दृष्टिकोण प्राय: आदर्शमूलक एवम् आध्यात्मवादी रहा। पाश्चात्य इतिहासकार यथार्थवादी दृष्टिकोण से अनुप्राणित रहे। इसके अतिरिक्त मार्क्सवादियों का द्वंद्ववात्मक भौतिक विकासवाद, वर्ग संघर्ष और आर्थिक परिस्थितियों से संबंधित सिद्धांत। जर्मन चिंतकों द्वारा प्रतिपादित `युग चेतना'   का सिद्धांत। मनोविज्ञान, मनोविश्लेषण और अर्थ विज्ञान के आधार पर, आई. . रिचड्र्स, विलियम एम्पसन, सी.एम.लेविस, डब्लू. पी. कर एवम् एफ्. डब्लू. बैटसन का विशेषतया शैलीपक्ष से संबंधित सिद्धांत। इन तमाम दृष्टियों के बीच इतिहास लेखन की समस्या पर प्रकाश डालते हुए डॉ. विश्वंभरनाथ उपाध्याय जी ने अपने लेख `साहित्येतिहास - दर्शन की समस्याएँ' (जो हिंदी साहित्य का इतिहास : पुनर्लेखन की समस्याएं' नामक पुस्तक में छपा है) में लिखते हैं कि, ``इतिहास लेखन में दृष्टि से भी अधिक महत्त्व मनोवृत्ति का है। यदि मनोवृत्ति या नीयत खराब है तब इतिहास प्रामाणिक न होगा। हिंदी में विभिन्न वादों या दृष्टियों के अनुरूप इतिहास लिखे जाने चाहिए। ये एक दूसरे के पूरक होंगे क्योंकि जो तथ्य या व्यक्ति एक बाद के इतिहास में नहीं आएँगे वे दूसरी विचारधारा के इतिहास में आ जायेंगे।''
डॉ. विश्वंभरनाथ उपाध्याय जी का यह दृष्टिकोण यथार्थवादी है। इसलिए इसे स्वीकार करने में किसी को कोई परेशानी भी नहीं होनी चाहिए। लेकिन जो लोग यह सोचते हैं कि साहित्यातिहास लेखक के अंदन यह गुण होना चाहिए कि वह अपनी व्यक्तिगत मान्यताओं, पसंद-नापसंद आदि से बचते हुए तथ्यों के आधार पर अपनी बात रखें। तो यहाँ पर यही कहना चाहँूगा कि ये बातें सुनने में जरूर अच्छी लगती हैं पर व्यावहारिक दृष्टि से इसे निभा पाना मुश्किल है।  ऐसे विचार `उस फल की तरह हैं जो बाहर से देखने में बड़े सुंदर लगते हैं पर उन्हें काटने पर पता चलता है की वे सड़े हुए हैं। तथा किसी भी तरह आहार के रूप में उसे ग्रहण नहीं किया जा सकता है। इसलिए साहित्यातिहास और इतिहास दर्शन संबंधी अनेकानेक विचारधाराओं एवम् मान्यताओं के बीच तथ्यगत व्यावहारिक पक्ष पर अधिक बल देते हुए, उसे स्वीकार करना चाहिए। इतिहास का अर्थ अगर हम `   ' मानते हैं तो साहित्यातिहास को भी किसी एक निश्चित धारणा मे बाँधने के बदले बृहद रूप में एक अवधारणा के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए।
साहित्य, इतिहास, साहित्यातिहास और इतिहास दर्शन के संदर्भ में थोड़ी और चर्चा आवश्यक है। साहित्य समाज का आईना मात्र नहीं है। समाज कैसा है? इससे आगे बढ़कर समाज कैसा होना चाहिए? इस बात को भी साहित्य स्पष्ट करता है। साहित्य मनुष्यों द्वारा रचा जाता है। हर व्यक्ति की अपनी विचारधारा, अपने आदर्श और उस क्षेत्र विशेष की अलग-अलग परिस्थितियाँ होती हैं जहाँ पर वह निवास करता है। इन परिस्थितियों का भी साहित्य के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। इसलिए जब साहित्यातिहास लेखन की बात होती है तो यहाँ पर भी मान लेना चाहिए कि साहित्यातिहास लिखनेवाले अलग-अलग व्यक्तियों की विचारधाराएँ एवम् धारणाएँ अलग-अलग हो सकती हैं। इस प्रकार जिस तरह साहित्य रचना की अपनी अलग-अलग स्थितियाँ होती हैं, ठीक उसी तरह साहित्यातिहास लेखन की भी अपनी अलग-अलग स्थितियाँ हैं। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं निकाला जाना चाहिए कि दोनों में कोई प्रतिस्पर्धा है। बल्कि ये दोनों के विकास एवम् मूल्यांकन की अलग-अलग स्थितियाँ हैं।
इतिहासकार और साहित्यातिहासकार की भी अपनी अलग-अलग स्थितियाँ हैं। क्योंकि इतिहास लिखना और साहित्य का इतिहास लिखने में बुनियादी अंतर है। इतिहास अधिक तथ्यपरक है अपेक्षाकृत साहित्यतिहास के। साहित्यातिहास में इतिहास की अपनी दृष्टि एवम् धारणाएँ भी उतनी ही आवश्यक हैं जितनी की `गवेषणा' और इसके माध्यम से प्राप्त `तथ्य'`हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास' की भूमिका में डॉ. बच्चन सिंह लिखते हैं कि, ``साहित्य के इतिहास को साहित्यिक बनाये रखना इतिहासकार का केंद्रीय धर्म है। ---- पूर्ववर्ती साहित्य तो वही रहता है पर उसे पढ़ने की दृष्टि बदल जाती है। भक्तिकाल को शुक्लजी ने एक ढंग से पढ़ा और द्विवेदीजी ने दूसरे ढंग से।----''
जहाँ तक प्रश्न इतिहास दर्शन का है तो हमें यह समझना होगा कि साहित्येतिहास के अंतर्गत `इतिहासदर्शन' के सिद्धांतो का व्यावहारिक स्वरूप क्या हो? `दर्शन' शब्द संस्कृत के `दृश्य' शब्द से बना है। कहा गया है कि ``दृश्यते यथार्थ तत्त्व मनने'' जिसका अर्थ है कि - ``जिसके द्वारा यथार्थ तत्त्व की अनुभूति हो वही दर्शन है।ण'' अंग्रेजी भाषा में इसके लिए ``philosohpy'' शब्द प्रचलित है। इसकी भी उत्पत्ति दो युनानी शब्दों से हुई है।  ``philosohpy = Philos प्रेम + sophia (wisdom ज्ञान) ''इस तरह ``ज्ञान से प्रेम' या `सत्य की खोज' ही दर्शन है। प्लेटो ने अपनी किताब `रिपब्लिक' में दार्शनिक के बारे में लिखा कि, `` '' दर्शन के संदर्भ में जॉन डेवी की यह परिभाषा भी महत्त्वपूर्ण है कि, ``'' दर्शन के संदर्भ में जॉन डेवी की यह परिभाषा महत्त्वपूर्ण है कि, `` '' इतिहास के बारे में हम पहले ही देख चुके हैं कि ``'' जबकि साहित्य के बारे में कहा गया है कि, ``'' बल्कि इससे भी कुछ अधिक। साहित्य इतिहास और समाजशास्त्र की संयुक्त प्रयोगशाला की उत्पत्ति है। दुनियाँ के कई विश्वविद्यालयों में  ` ' को ` ' कहा जाता है। और जब बात `संस्कृति' की आती है तो यह समझ लेना चाहिए की `समाज' और `संस्कृति' ये समानार्थी शब्द नहीं ह। `` '' यहाँ पर जिस `रिकार्डिंग' की बात है वह साहित्य व अन्य कलाओं के द्वारा ही संभव है। इस तरह हम कह सकते हैं कि ``साहित्य   समाज   इतिहास   दर्शन'' यह सब मिलकर ही साहित्यातिहास की आधारभूमि बनाते हैं।
कुछ विद्वानों ने जिस `इतिहास आलेखकारी' की बात की है उसमें भी संस्कृति और समाज के महत्त्व को `साहित्यइतिहास' के संदर्भ में आसानी से समझा जा सकता है।  डॉ. रमेश कुंतल मेघजी ने `इतिहासआलेखकारी' की बड़े विस्तार से चर्चा की है। उन्होंने आदर्श, प्रादर्श एवम् प्रतिदर्श ( ) की विवेचना के साथ साहित्येइतिहास के व्यवहारिक एवम् वैज्ञानिक स्वरूप को विवेचित किया है ( कुंतल जी के व्याख्यान की स्मृति के आधार पर)। समग्ररूप से कहने का तात्पर्य यही है कि परंपरा को उसके बृहद रूप में स्वीकार करते हुए इतिहास दर्शन के अनेकों सिद्धांतो के बीच हर दृष्टिकोण से साहित्यातिहास लिखा जाय पर `साहित्य के इतिहास को साहित्यिक' रहने दिया जाय। निश्चित धारणाओं की जगह बुनियादी अवधारणाओं को प्रतिदर्श के रूप में स्वीकार किया जाय। इस तरह विचारों के फेनोच्छवास से अध्ययन-अध्यापन की धूमिल स्थितियों को शायद एक स्पष्ट राह मिल सके।
इन सब के अतिरिक्त साहित्यातिहास से संबंधित एक और प्रश्न अक्सर उठता है। वह प्रश्न है कि, ``हिंदी साहित्य का आरंभ कब से माना जाय?'' इस संबंध में डॉ. रामविलास शर्मा जी के अध्ययन एवम् चिंतन को प्रणाम करने से (स्वीकार करने से) एक तथ्यगत व तर्कगत उत्तर हमें प्राप्त हो जाता है। उन्होंने `हिंदी जाति' का विवेचन `यूरोप में आधुनिक जातियों के अभ्युदय और उसके आरंभिक निर्माण काल के साहित्य के आधार पर किया। उन्होंने सिद्ध किया कि किस तरह बाजार जातियों के निर्माण में सहायक होता है। उनके अनुसार ``जाति का निर्माण सामंती अवस्था के अंतर्गत व्यापारिक पूँजीवाद के विकास के साथ होता है, अत: यह विकास विषम गति से होता है और उसकी प्रक्रिया दीर्घकालीन होती है। (जाति और साहित्य - हिंदी साहित्य का इतिहास : पुनर्लेखन की समस्याएँ, पृष्ठ नं. 28)। इसी  लेख में वे लिखते हैं कि, ``प्राचीन काल में यहाँ के एक प्रदेश में भरत जन निवास करते थे। वे अपने कर्म से ऐसे विख्यात हुए कि सारे देश को ही भारतवर्ष कहा जाने लगा।  आगे चलकर यही स्थिति हिंद और हिंदुस्तान शब्दों की हुई। ये शब्द पहले हिंदी प्रदेश के लिए, फिर सारे देश के लिए प्रयुक्त होने लगे।...''
कहने का तात्पर्य यहाँ है कि `हिंदी' शब्द काफी पुराना है। खड़ीबोली ही नहीं राजस्थानी, ब्रज, अवधी जैसी बोलियों में जो भी साहित्य लिखा गया, उसे हिंदी ही मानना चाहिए। लेकिन यहीं पर एक और प्रश्न खड़ा हो जाता है। वह यह कि `देशी भाषा' या `देश्य भाषा' कही जाने वाली बोलियों को अगर हिंदी साहित्य में माना जाता है तो फिर अपभ्रंश साहित्य को इसमे शामिल किया जाय या नहीं? इस संबंध में डॉ. राम कृपाल पांडेय जी का स्पष्ट मत है कि, ``--- संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश इत्यादि साहित्य की परिनिष्ठित भाषाएँ थीं जो अपने-अपने समय की देशी भाषाओं से भिन्न थीं। अत: उनमें से किसी भी लोकभाषा या देशीभाषा समझना उपयुक्त नहीं। (`हिंदी साहित्य का आरंभ कब से मानना चाहिए?')'' आगे अपनी बात को अधिक स्पष्ट करते हुए वे लिखते हैं कि, ``.... साहित्यिक भाषा से देशी भाषा नहीं उत्पन्न होती। अत: अपभ्रंश से हिंदी देश भाषा नहीं उत्पन्न होती। अत: जिस प्रकार संस्कृत एवम् प्राकृत भाषाओं का साहित्य हिंदी भाषा के साहित्य के अंतर्गत नहीं आ सकता, वैसे ही अपभ्रंश भाषा का साहित्य भी हिंदी साहित्य के अंतर्गत नहीं आ सकता।''
अपनी किताब `हिंदी भाषा का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य' में डॉ. रामकिशोर शर्मा लिखते हैं कि, ``छठीं से बारहवीं शताब्दी तक देशी भाषा (संस्कृत से भिन्न सामान्य काव्य भाषा) अपभ्रंश है। ---- `यह भाषा जनता के दिन रात के व्यवहार में आने वाली बोलियों में से उपज और प्राकृत की अन्य भाषाओं की तरह थोड़ा बहुत हेर-फार के साथ साहित्यिक बन गयी (प्रो. रिचर्ड पिशल)। अपभ्रंश के व्यापक प्रचार-प्रसार होने के कारण अनेक क्षेत्रीय भेदों और उप-भेदों का होना स्वाभाविक है। रुद्रट ने देश विशेष से अपभ्रंश के अनेक भेदों की ओर संकेत किया। उद्योतन सूरि ने देशी भाषा अपभ्रंश की अठारह विभाषाओं का उदाहरण सहित उल्लेख किया है।...''
उपर्युक्त दोनों विचारों से स्पष्ट है कि अपभ्रंश साहित्य को हिंदी साहित्य में शामिल करने या न करने का प्रश्न जटिल है। इसमें वे सभी भाषा वैज्ञानिक तत्त्व मिलते हैं जो इसके पूर्व की भाषाओं में थे। साथ ही साथ इसमें वे नवीन तत्त्व भी समाहित मिलते हैं जो की नयी विकसित भाषाओं में परिलक्षित होते हैं। एक तरह से हम कह सकते हैं कि अपभ्रंश भाषा नवीन आर्यभाषाओं के निर्माण के पूर्व की संक्रमणकालीन भाषा थी। यह वही धरातल था जिसमें से आर्यभाषाओं का जन्म हुआ। लेकिन यह आधुनिक आर्य भाषाओं में से एक नहीं है। अत: हमें अपभ्रंश का मोह छोड़कर उसे हिंदी साहित्य में शामिल करने से बचना चाहिए। वैसे इस बात को कहने का कोई ठोस तथ्यगत अधिकार मेरे पास नहीं है। लेकिन इस संदर्भ में अध्ययन और अध्यापन की अपनी व्यक्तिगत समझ के आधार पर मैं यह राय रखता हँू।
इसी तरह हिंदी साहित्यातिहास से जुड़े ऐसे कई बिंदु हैं, जिनको लेकर लगातार चर्चा होती रही है। जैसे कि आदिकाल के काल निर्धारण का प्रश्न, भक्तिकाल में भक्ति के उदय का प्रश्न, रीतिकाल के अध्यापन के औचित्य का प्रश्न, भक्तिकाल की प्रासंगिकता का प्रश्न, आधुनिकता की अवधारणा का प्रश्न, उत्तर-आधुनिकता की अवधारणा का प्रश्न, हिंदी उर्दू की समस्या का प्रश्न, और ऐसे ही न जाने कितने और विषय हैं, जिन्हे लेकर हमेशा साहित्यिक चर्चा होती रहती है। और ऐसी चर्चाओं के केन्द्र में जाते हैं, आचार्य रामचन्द्र शुक्ल और उनके द्वारा लिखित साहित्य का इतिहास संगोष्ठियाँ आयोजित होती रहती है। लेकिन एक लेख या प्रपत्र की अपनी सीमाएँ होती हैं। इसलिए इन सब विषयों पर चर्चा के लिए कुछ ठहराव जरूरी हैं।
हिंदी साहित्य का इतिहास लिखने की प्रक्रिया एक तरह से परिमार्जन की प्रक्रिया है। यह लेखन कार्य सही दिशा में विकासशील है। जैसे-जैसे हिन्दी साहित्य के इतिहास का परिष्कृत व विकासशील रूप सामने आता जायेगा वैसे-वैसे साहित्यातिहासकारों से नयी अपेक्षाएँ भी जुड़ती चली जायेंगी। इसलिए यह जरूरी है कि `वाद-विवाद के बीच से ही संवाद' की नयी स्थितियों पर कार्य सतत रूप से होता रहे।
मनीष कुमार मिश्र
हिंदी व्याख्याता
के.एम.अग्रवाल महाविद्यालय,
कल्याण (.) 421301.
जिला - ठाणे, महाराष्ट्र


मानवाधिकार और आतंकवाद


प्रारंभ में अंतर्राष्ट्रीय विधि में ये संकल्पना पूर्णत: पोषित थी कि राष्ट्र ही अंतर्राष्ट्रीय विधि के विषय हैं किन्तु कालांतर में उसमें परिवर्तन हुआ और राज्यों के अतिरिक्त, व्यक्तियों को अधिकार और कर्तव्य दिये जाने के कारण उनको भी अंतर्राष्ट्री विधि का विषय माना जाने लगा।
द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद यह निर्विवाद हो गया कि अंतर्राष्ट्रीय शांति व सुरक्षा उसी समय बनी रह सकती है जब व्यक्तियों की स्थिति में सुधार हो तथा उनके अधिकारों मूल स्वतंत्रताओं की अभिवृद्धी हो। इसी कारण व्यक्तियों को राज्यों द्वारा दिये गए कई अधिकारों में से एक अधिकार को `मानवाधिकार' कहते हैं।
चूँकि मानव बुद्धिमान एवं विवेकशील प्राणी है। इसीकारण इसको कुछ ऐसे मूल तथा अहरणीय अधिकार प्राप्त रहते हैं जिसे सामान्यतया मानवाधिकार कहा जाता है। चँूकि ये अधिकार उनके अस्तित्व के कारण उनसे संबंधित रहते हैं अत: वे उनमें जन्म से ही विहीत रहते हैं। इस प्रकार मानवाधिकार सभी व्यक्तियों के लिए होते हैं, चाहे उनका मूलवंश, धर्म, लिंग तथा राष्ट्रीयता कुछ भी हो। ये अधिकार सभी व्यक्तियों के लिए आवश्यक हैं क्योंकि ये उनकी गरिमा एवं स्वतंत्रता के अनुरुप हैं तथा शारीरिक, भौतिक, नैतिक, सामाजिक कल्याण के लिए सहायक होते हैं।
विभिन्न राज्यों की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि, उनके विचार तथा उनकी आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक स्थितियों में भिन्नता के कारण `मानवाधिकार' इस शब्द को परिभाषित करना कठिन है। लेकिन यह कहा ही जा सकता है कि मानवाधिकार का विचार मानवीय गरिमा के विचार से संबंधित है। अत: उन सभी अधिकारों को मानवाधिकार कहा जा सकता है जो मानवीय गरिमा को बनाये रखने के लिए आवश्यक है।
वियना के 1993 में मानवाधिकार सम्मेलन की घोषणा में यह कहा गया था कि सभी मानवाधिकार व्यक्ति में गरिमा और अंतर्निहित योग्यता से प्रोद्युत होते हैं और `व्यक्ति' मानवाधिकार तथा मूल स्वतंत्रताओं का केन्द्रीय विषय है। डी. डी. बसु मानवाधिकारों को उन न्यूनतम अधिकारों के रुप में परिभाषित करते हैं, जिन्हें प्रत्येक व्यक्ति को, बिना किसी अन्य विचार के, मानव परिवार का सदस्य होने के फलस्वरुप राज्य या अन्य लोकप्राधिकारी के विरूद्ध धारण करना चाहिए।
मानवाधिकार अविभाज्य एवं अन्योन्याक्षित होते हैं इसलिए संक्षिप्त में भिन्न-भिन्न प्रकार के मानवाधिकार नहीं हो सकते फिर भी संयुक्त राष्ट्र प्रणाली के अंतर्गत मानवाधिकार के क्षेत्र में किये गए विकास से यह स्पष्ट हो जाता है कि मानवाधिकारों को मुख्य रुप से दो भागों में बाँटा जा सकता है। अर्थात
1) सिविल एवं राजनैतिक अधिकार और
2) आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक अधिकार।
जब आतंक का व्यवस्थित प्रयोग कतिपय उ ेश्यों को विशेष रुप में राजनैतिक उ ेश्यों को पूरा करने के लिए किया जाता है तब सामान्यतया उसको आतंकवाद कहा जाता है।
आतंकवादी कार्य एवं तरीको से राज्यों की सामाजिक एवं संवैधानिक व्यवस्था तथा राज्यक्षेत्रीय अखण्डता एवं सुरक्षा का भय बना रहता है। फिर भी, आतंकवाद की उपर्युक्त परिभाषा सार्वभौमिक नहीं हो सकती। बहुत से समय या अवसरों पर किसी राज्य की सरकार किसी कृत्य को इसलिए आतंकवादी कृत्य मान लेती है क्योंकि यह उसके हित को प्रत्यक्ष रुप से प्रभावित करने लगता है। तब उन लोगों द्वारा न्यायोचित ठहराया जाता है जो कृत्यों को कारित करते हैं। आतंकवाद या तो देशी या आंतरिक हो सकता है या अंतर्राष्ट्रीया राज्य देशी आतंकवाद को उनकी दाण्डिक विधि का उल्लंघन मानते हैं और अपनी देशीय विधि के प्रयोग करने में नहीं हिचकते हैं। यहाँ यह बताना महत्वपूर्ण है कि आतंकवाद चाहे वह देशीय हो या अंतर्राष्ट्रीय, एक दाण्डिक अपराध है।
आतंकवाद से पीड़ित व्यक्तियों के मूलभूत मानवाधिकारों का हनन होता है। विशेष रुप से इससे प्राण के अधिकार, शारीरिक निष्ठा के अधिकार एवं वैयक्तिक स्वतंत्रता के अधिकार प्रभावित होते हैं। आतंकवाद के प्रोत्साहन हेतु उसमें धर्म की अफीम, काम (सेक्स) की स्वतंत्रता एवं उन्मुक्तता, ईश्वर या अल्लाह के लिए समर्पित कर्म, धन की उपाजेयता एवं स्वतंत्र तथा स्वच्छंद वातावरण की खुराक आवश्यक है।
आतंकवाद के प्रचार एवं प्रसार के लिए जहाँ एक वर्ग को जोड़ना आवश्यक है, वहीं युवाओं का झुकाव एक खुली सच्चाई है। जब कोई अपना सब कुछ लगाकर कुछ प्राप्त करने के लिए अवैधात्मक हिंसात्मक अवधारणाओं द्वारा किसी राज्य या उसके कुछ भाग के संवैधानिक आधारों तथा दाण्डिक एवं व्यवहारिक को नष्ट करता है तो वही ---- आतंकवाद है।
आतंकवाद का प्रारंभ ही मानवाधिकारों पर प्रहार है। किसी आतंकवाद प्रभावित क्षेत्र की जनता को प्रदत्त मानवाधिकारों का हनन न सिर्फ आतंकवादियों द्वारा ही होता है बल्कि उसे रोकने के निमित्त सुरक्षाबलों द्वारा कर दिया जाता है। पोटा (आतंकवाद निरोधक अधिनियम) एवम् एसपीएएफ (स्पेशल पॉवर आफ आर्मड फोर्सेस) को प्रदत्त किये गए अधिकार आतंकवाद के खत्में के लिए हैं किन्तु ये क्षेत्र विशेष की जनता के मानवाधिकारों को भी प्रभावित कर जाते हैं।
इस संबंध में समुचित प्रयास एवं विनियमों को पारित किया जाना आवश्यक है क्योंकि यही आतंकवाद विनाश आतंकवाद सृजन का रुप लेता है। आहत मानव न्याय चाहता है चाहे उसका तरीका कुछ भी हो, सही हो या गलत, वह सहज हो तो आतंकवादी हो जाता है।
मानवाधिकार एवं आतंकवाद एक दूसरे से आपवादिक रुप से जुड़े हैं। आतंकवाद का होना मानवाधिकारों का हनन है और समग्रता में मानवाधिकार आतंकवाद के लिए कुछ भी नहीं छोड़ता है।

                                     डॉ. मनीष कुमार मिश्रा 


संदर्भ ग्रंथ:-
1) अंतर्राष्ट्रीय विधि - अग्रवाल।
2) नोट्स - प्रो. . पी. तिवारी (एच..डी. लॉ गोरखपुर युनिवर्सिटी)
3) अंतर्राष्ट्रीय विधि - डॉ. कपूर।
                                                         
      



कात्यायनी की कविता - शोक गीत


09 मई 1959 को उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में जन्मी कात्यायनी आज की शीर्षस्थ हिंदी कवियित्रियों में एक हैं। आप की कविताएँ मुख्य रूप से नारी विमर्श की कविताएँ हैं। आपके प्रमुख काव्य संग्रह हैं।
1. सात भाइयों के बीच चम्पा - 1994
2. इस पौरूषपूर्ण समय में - 1999
3. जादू नहीं कविता - 2002
4. रात के संतरी की कविता।
5. चाहत
6. कविता की जगह।
7. आखेट।
8. कुहेर की दीवार खड़ी है।
इनके अतिरिक्त रूसी और अंग्रेजी भाषा में आपकी कविताओं का अनुवाद हुआ है। नारी प्रश्न संबंधित आपके लेखों का संग्रह `दुर्ग द्वार पर दस्तक' नाम से प्रकाशित हो चुका है। अगर आप इंटरनेट के माध्यम से कात्यायनी जी के साहित्य को पाना चाहते हैं तो   पर जाकर उनसे संबंधित जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
जिस नारी विमर्श / स्त्री विमर्श और नारीवादी इत्यादी आंदोलनों की चर्चा हम सुनते रहते हैं वह पुरुषों के समकक्ष स्त्रियों की राजनीतिक, सामाजिक एवम् शैक्षिक समानता का आंदोलन है। जिसकी जड़े 18वी शती के मानवतावाद और औद्योगिक क्रांति में थी। यह एक कड़वी सच्चाई है कि आज भी विश्व की पूरी ज़मीन का केवल 1  भाग महिलाओं के नाम है। जबकि वे दुनियाँ की आधी आबादी हैं। विश्व के काम का 60  महिलाएँ करती हैं, मगर आमदनी का केवल 10  हिस्सा उनकी निजी आमदनी मानी जाती है। आज भी निरक्षर जनता का तीन चौथाई भाग महिलाओं का है। भारत में लगभग पाँच हजार महिलाएँ प्रतिवर्ष दहेज के लिए मार दी जाती हैं। पूरे एशिया में एक लाख महिलाएँ हरवर्ष वेश्यावृत्ति में ढकेल दी जाती हैं। ऐसे समय में जीते हुए, अगर कात्यायनी जी अपनी कविताओं का मुख्य बिंदु `नारी विमर्श' को बनाती हैं, तो सही ही करती हैं।
एक साहित्यकार या रचनाकार होने के नाते हमारी यह नैतिक जिम्मेदारी होती है कि हम अपने वक्त की चौह ी में घिरे हुए सामान्य व्यक्ति के द्वंद्व और सपने को प्रधानता दें, न की किसी विचारधारा या विमर्श की चौह ी में अपने आप को बाँधकर, इस बंधन को ही `शाश्वत बंधन धर्म' घोषित करते हुए उन्हीं का गुणगान करते रहें।
लेकिन सिक्के का एक दूसरा पहलू यह भी है कि अलग-अलग विमर्शो एवम् अनुशासनों में जो लेखन हो रहा है, वह भी साहित्य का ही एक हिस्सा है। इस लेखन के कारण ही समाज और साहित्य का आपसी संबंध पहले से कहीं अधिक प्रगाढ़ हुआ है। आज के साहित्य की सबसे बड़ी चिंता तो सामाजिक और आर्थिक उ ेश्यों को लेकर चलनेवाले विभिन्न विमर्श जल्द ही अपने मार्ग से भटककर यश, प्रतिष्ठा, पुरस्कार एवम् सुविधाएँ बटोरने के साधन मात्र बन जाते हैं। ऐसे रचनाकारों की साधना, साधन के आगे भंग हो जाती है। लेकिन जहाँ तक प्रश्न कात्यायनी जी का है, तो अब तक ऐसी कोई बात दिखायी नहीं पड़ती। अपनी रचनाशीलता के लिए उन्होंने जिस धारणा को केन्द्रिय बिन्दु बनाया है, वह धारण व्यापक रूप में साहित्य की मानवीय अवधारणा की पूर्ति जरूर करती है। इसलिए `विमर्शवादी' कवयित्री मात्र कह कर उनके श्रम को नकारा नहीं जा सकता।
पाठ्यक्रम में निर्धारित उनकी कविता `शोक गीत' के संक्षिप्त विश्लेषण से यह बात और स्पष्ट हो जायेगी। `शोकगीत' मूल रूप में जीवन की विडम्बनओं, जीवन के संघर्ष, आशा-निराशा और इसके (जीवन) आस-पास के परिवेश में बढ़ रही मूल्यहीनता, अवसरवादिता, स्वार्थपरकता, दोहरे व्यक्तित्व इत्यादि की कलई खोलते हुए इस कठिन समय में जी रहे सामान्य व्यक्ति के असामान्य संघर्ष को सामने लाती है। यहाँ शोक जीवन भी नहीं, इस जीवन की विडंबनाओं का है। और अगर विड़बनाओं का शोक है, तो इनमें तप रहे व्यक्ति के साहस, संघर्ष और आशा-निराशा और इसके (जीवन) आस-पास के परिवेश में बढ़ रही मूल्यहीनता, अवसरवादिता, स्वार्थपरकता, दोहरे व्यक्तित्व इत्यादी की कलई खोलते हुए इस कठिन समय में जी रहे सामान्य व्यक्ति के असामान्य संघर्ष को सामने लाती है। यहाँ शोक जीवन ही नही, इस जीवन की विडंबनाओं का है। और अगर विड़बनाओं का शोक है, तो इनमे तप रहे व्यक्ति के साहस, संघर्ष और आसक्ती ----- के प्रति इस काव्यगीत कविता के माध्यम से एक आदर और सम्मान का भाव भी है।
कविता की शुरूआत करते हुए कात्यायनी जी लिखती हैं कि -
``बस यूँ ही गुजार दी जिंदगी
नहीं रच सके कोई `एपिक' (महाकाव्य)
न हो सके पाठकों के आँखे के तारे
न किसी आलोचक श्रेष्ठ के दुलारे
अपुन तो बस यूँ ही गुजार दी
पूरी जिंदगी''
ऊपरी तौर पर इन पंक्तियों का अर्थ यही निकलता है कि कवियित्री `एपिक' अर्थात महाकाव्य न रच पाते दुख को जता रही हैं। पाठको में प्रिय न होने का दुख जता रही हैं और साथ ही साथ किसी ``आलोचक श्रेष्ठ'' की कृपा पात्र न बन पाने के दुख को भी प्रगट कर रही हैं। लेकिन वो जो कहना चाह रही हैं मेरी समझ से वह यह है कि यदि आपको जिंदगी ``यूँ ही'' नहीं बिताती, साहित्य जगत में ख्याति प्राप्त करती है, पाठकों के बीच अपने आप को लोकप्रिय बनाता है तो आपको अनिवार्यत: किसी श्रेष्ठ आलोचक की कृपा हासिल करनी होगी। उसका प्रिय होना होगा। आपको चापलूस होना होगा, अवसदवादी होना होगा और पदप्रतिष्ठा इत्यादि के लिए जीवनमूल्यों से समझौता करना होगा। और अगर आप ऐसा नहीं करेंगे तो आप अपनी जिंदगी `यँ ही' बिता देने को अभिशप्त रहेंगे।
इन पंक्तियाँ में एक महत्त्वपूर्ण बात यह भी आयी है कि कवियित्री `एपिक' या महाकाव्य न रच पाने के दुख को व्यक्त कर रही हैं। अब सवाल यह उठता है कि `महाकाव्य' ही न रचने का दुख उन्होंने क्यों जताया। दरअसल महाकाव्य किसी भी सुसंस्कृत समाज की सांस्कृतिक और साहित्यिक संपत्ति हैं। ये मानव जीवन को उसकी समग्रता में प्रस्तु करती हैं। ये प्राचीन देशों की पूर्ण विकसित संस्कृति का प्रतिनिधित्व करते हैं। और समांतर रूप से आधुनिक जीवन को भी प्रभावित करते हैं इन महाकाव्यों में विद्यमान मूल्य, मानवीय दृष्टिकोण और इनकी निश्चल गुणवत्ता ने अभिजात्य साहित्य में इनका शाश्वत स्थान बनाये रखा है। महाकाव्यों का मुख्य उ ेश्य वैचारिक दृष्टिकोण में परिवर्तन के साथ मानवीय व्यवहार का पोषण एवम् संवर्धन है। ये संस्कृति के संगठित खजाने हैं। अब आप समझ सकते हैं कि यदि महाकाव्य लिखना है तो मानवीय मूल्यों जे समझौता नही हो सकता। मगर परेशानी यह है कि अगर आप समझौता नहीं हो सकता। अगर परेशानी यह है कि अगर आप समझौता नहीं करेंगे तो आपके रचे हुए काव्य को `महाकाव्य' की श्रेणी में रखेगा कौन? ये जो आदर्श और व्यवहार का द्वंद्व है, कवियित्री का इशारा उसी तरफ है। अपने रसात्मक एवम् कलात्मक गुणों के द्वारा कोई रचना काल बन जाये, यह आज के काव्य में संभव सा नहीं दिखता। क्योंकि इस त्रासदी भरे युग के रचना की होड़ रचना से नहीं अपने समय की विसंगतियाँ के बीच से निकलने के लिए आपको एक रचनाकार होने के नाते जो कीमत चुकानी पड़ेगी वह चुकाने के बाद आपके पास `मूल्यों' के रूप में कुछ बचेगा नहीं। और जो बचेगा वह `एपिक' या महाकाव्य नहीं हो सकता।
कविता को आगे बढ़ाते हुए कात्यायनी जी जीवन के एक दूसरे बड़े महत्त्वपूर्ण पर वर्जित क्षेत्र में प्रवेश करते हुए लिखती हैं -
``प्यार किया एक मामूली आदमी की तरह
राशन-पानी जुटाया
सब्जियों की खरीदारी की
पूरी जिम्मेदारी के साथ।
भरपूर गुस्से के साथ
जुलूस में शामिल हुए मँहगाई के खिलाफ,
निष्ठापूर्वक गये हड़ताल पर।
नहीं बना सके एक शांत सुरूचिपूर्ण
अध्ययन कक्ष।''
यहाँ पर कात्यायनी जी आम व्यक्ति की तरह प्यार करने की बात स्वीकार कर रही हैं। लेकिन मन में सवाल यह उठ रहा है कि आम व्यक्ति का प्यार होता कैसा है? दूसरी बात यह कि वे `प्यार' की जिम्मेदारी के साथ कर रहीं है। कैसे ही जैसे भी जिम्मेदारी के साथ पाती जुटाना और सब्जी खरीदने का काम होता है। अगर आप लोगों को मामूली आदमी की तरह सब्जी खरीदने का अनुभव होगा, तो आप जानते होगे कि यह कितना कठिन काम है। मोल-भाव करना, बराबर तौलवान और जो आपने खरीदा उसकी गुणवत्ता भी अच्छी तरह --- तो जितनी सावधानी से आज का आम आदमी सब्जी खरीद रहा है, उतनी ही जिम्मेदारी से वह प्यार भी कर रहा है। वह प्रेम में भी व्यावहारिक दृष्टिकोण देख रहा है। आज प्रेम किसी के लिए तरक्की की सीढ़ी की तरह है तो किसी के लिए सामाजिक और आर्थिक सुरखा की गारंटी। आज जिस बाज़ारवादी संस्कृति में हम जी रहे हैं, वह हमें खुद बता रहा है कि हमें प्रेम को किस तरह जीना चाहिए। ``72 घंटों के भीतर एक गोली'' जैसे विज्ञापन बहुत कुछ कहते हैं। अब प्रेम एक हकीकत है। शायद कात्यायनी जी इसी ``आम आदमी वाले प्रेम'' को स्वीकार करती हैं। वैसे भी हीर-राँझा, सोनी-महिवाल और लैला-मजनू जैसा प्रेम आज के जमाने में किसी काम का नहीं रहा। जीवन की इसी विडंबना को कात्यायनी जी ने बड़े ही सुंदर तरीके से प्रस्तुत किया है।
कविता को आगे बढ़ाते हुए कात्यायनी जी लिखती हैं कि -
``जब एक उत्कृष्ट कविता
लिखने का समय था,
उसे हारे हुए समय में भी
लिख रहे थे दीवारों पर तारे।
जब लिखनी थी
अपने समय की सर्वाधिक चर्चित कहानी
लिख रहे थे हड़ताल का पर्चा
सामान्य ही रहे अंत तक।
यूँ हुए असफल।''
जब वे लिखती हैं कि जब एक उत्कृष्ट कविता लिखने का समय था, तो सवाल उठता है कि कौन सा समय उत्कृष्ट कविता को लिखने का होता है? फिर आगे वे लिखती हैं कि `` उस हारे हुए समय में भी तो पुन: प्रश्न उठता है कि समय कब, और किससे हारा हुआ था? जब तक हम इन दो प्रश्नों के उत्तर नहीं खोज लेंगे, तब तक इन काव्य पंक्तियों के लालित्य को भी समझ नहीं सकेंगे। जहाँ तक मेरी अपनी सोच ओर समझ है, उसके अनुसार मुझे यह लगता है कि अगर हम यह मानते हैं कि ``कविता-भाषा में आदमी होने की तमीज हैं तो हमें यह भी स्वीकार करना ही पड़ेगा कि ``कविता मानवता की मातृभाषा हैं।'' इस तरह कविता को रचनेवाला कठिन से कठिन अमानुषिक और आततायी व्यवस्था के बीच में भी मानवता और रचनात्मकता से बचाने का महत्त्वपूर्ण कार्य अपनी कविता के माध्यम से करता है। स्पष्ट है कि हारे हुए समय में रची गयी कविता ही उत्कृष्ट कविता होगी। और यहाँ ``हारे हुए समय'' से अभिप्राय समय विशेष की परिस्थितियों में मानवी मूल्यों के बिखराव, विघटन और बिनाश से है। तो ऐसे समय में जीवन जी रहे व्यक्ति की आकांक्षा, व्यग्रता, उल्लास, अधूरापन, बेबसी, अवसाद और कसमसाहट को व्यक्त करने के लिए उसे अभिव्यक्ति प्रदान करने के लिए संवेदनशील रचनाकार कविता का सहारा लेता है। यहाँ पर वह जो कविता रच रहा है, उसमें `रचने' से ज्यादा `बचने' का भाव होता है। आवश्यकता से कहीं अधिक प्रश्न `अनिवार्यता' का होता है।
`किसी भी समाज में कविता स्वायत्त घटना नहीं होती' नामक अपने एक लेख में (सहस्त्राब्दी अंक तेरह 2003, आलोचना त्रैमासिक में प्रकाशित) कुमार अंबुज लिखते हैं कि, ``एक अच्छी ओर विश्वसनीय कविता में आवेगों, उत्तेजनाओं और ऊहापोहों का सम्मिश्रण भी संभव है। कविता कोई निर्णायक इतिहास रचे, ऐसी कामना एक अच्छा स्वप्न् है। ऐसा शताब्दीयों से होता है। इस लिहाज से समकालीन हिन्दी कविता के सामने चुनौती है। लेकिन फिर वही सवाल तो खड़ा होगा ही। यानी आप सोचते हैं कि समाज में बहुसंख्यक नागरिक लोलुप, भ्रष्ट, कायर, अवसरवादी और यथास्थितिवादी बनें रहे लेकिन कविता निर्णायक इतिहास रच दे। यदि कविता समाज की आँख है तो उसका `देखना' तब ही सार्थक और प्रतिफलित होगा जब शरीररूपी समाज के शेष अंग भी अपना काम मुस्तैदी से करें।''
तो उपर्युक्त विवेचन से स्पष्ट हुआ कि उत्कृष्ट कविता लिखने का समय कौन सा है।? हारे हुए समय से ---- अभिप्राय है और इसी तरह अपने समय भी सर्वाधिक चर्चित कहानी लिखने का समय कौन सा है? कुल मिलाकर कवियित्री शायद यह कहना चाह रही हैं कि वे जिस कठिन परिवेश में जी रही है उसमें अच्छी रचनाधर्मिता के लिए पर्याप्त --- तो है लेकि उस अच्छी रचना के लिए अवकाश कहाँ? अवसर कहाँ है? साधन कहाँ है? समय तो बीत रहा है मँहगाई के खिलाफ जुलूस में शामिल होने में, दीवारों पर नारे लिखने में और हड़ताल के चर्चे लिखने में। किसी शांत सुरूचिपूर्ण अध्ययन कक्ष में बैठकर चिंतन-मनन के लिए न तो साधन ही हैं और नही उन साधनों को जुटाने के लिए अवकाश।
दरअसल `हड़ताल' `तारे' और `हड़ताल का पर्चा' जैसे शब्द भी मुझे प्रतीकात्मक से लग रहे हैं। ये शब्द किसी आंदोलन या क्रांति के प्रतीक न होकर राजनीतिक छलावे को अधिक अभिव्यक्त कर रहे हैं। मजदूर युनियनों और राजनीति एवम् पूँजीपतियों की साँठगॉठ से कौन परिचित नहीं है। दरअसल कविता समाज से अलग कोई स्वतंत्र या हवाई वस्तु नहीं है। अगर पिछले दो-तीन दशकों में समाज में कोई क्रांति या आंदोलन नहीं हुआ है तो उसकी अपेक्षा साहित्य में कैसे की जा सकती है। हाँ, आंदलनो का छलावा जरूर सामने आया है। जिसका शिकार यही सामान्य आदमी हुआ है जो, नारे और पर्चो में ही उलझा रहा। पर्दे के पीछे के सौदे से वे अनभिज्ञ रहे। मतलब की यहाँ भी - संघर्ष और आंदोलन के नाम पर सामान्य आदमी केवल और केवल छला गया। इसे किसी वस्तु की तरह इस्तमाल किया गया और छोड़ दिया गया वहीं जहाँ से उसे उठाया गया था। चुनावों और रैलियों में पैसे और खाने का लालच देकर ट्रकों में भर-भरकर इसी सामान्य व्यक्ति सेनारे दिलवाये जाते हैं। और `भीड़तंत्र' के छलावे में `लोकतंत्र' की नींव मजबूत करने का दावा किया जाता है। ऐसे लोग ही अंत तक सामान्य रहते हुए असफल रहते हैं। लेकिन इस छलावे के बीच भी जीवन जीने की तृषिता उनके जान जुड़ी होती है।
कविता के अंत में कवियित्री लिखिती हैं कि -
``अपनी सभी विलक्षण कारगुजारियों को
मानवता की सेवा में प्रस्तुत कर
न हो सके महान।
नहीं लिखेगा कोई गणमान्य कवि
एक शोकगीत
मेरे मरने के बाद।
यूँ होगा
एक कठिन
कहानी का

      सुखांत।''

समय, स्मृति और मनुष्य की तलाश : ‘अक्टूबर उस साल’ का आलोचनात्मक पुनर्पाठ

  समय, स्मृति और मनुष्य की तलाश : ‘अक्टूबर उस साल’ का आलोचनात्मक पुनर्पाठ समकालीन हिंदी कविता का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि उसने जीवन के ...