रामधारी सिंह दिनकर के खण्डकाव्यों में मिथकीय नायकत्व की पुनर्व्याख्या : सत्ता-संरचना, सामाजिक अस्मिता और नैतिक द्वंद्व के संदर्भ में
लेखक : डॉ. मनीष कुमार सी. मिश्रा
एसोसिएट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, के. एम. अग्रवाल महाविद्यालय, कल्याण (पश्चिम), महाराष्ट्र
पूर्व विजिटिंग प्रोफेसर, आईसीसीआर हिन्दी चेयर, ताशकंद स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ ओरिएंटल स्टडीज़, ताशकंद, उज़्बेकिस्तान
सारांश
रामधारी सिंह ‘दिनकर’ आधुनिक हिन्दी कविता में मिथक को श्रद्धापूर्वक दुहराने वाले कवि नहीं, बल्कि उसे आधुनिक समाज के प्रश्नों से टकराकर नया अर्थ देने वाले सर्जक हैं। ‘रश्मिरथी’, ‘कुरुक्षेत्र’ और ‘उर्वशी’ में वे महाभारत तथा पुरूरवा-उर्वशी आख्यान के परिचित पात्रों को उनकी पारंपरिक प्रतिष्ठा से हटाकर आधुनिक मनुष्य की बेचैनी, सामाजिक बहिष्करण, राजनीतिक हिंसा, प्रेम, उत्तरदायित्व और नैतिक अनिर्णय के बीच रखते हैं। प्रस्तुत शोध-पत्र का केंद्रीय प्रतिपाद्य यह है कि दिनकर के यहाँ मिथकीय नायकत्व जन्म, विजय, दैवी संरक्षण अथवा शारीरिक पराक्रम का स्थिर गुण नहीं रह जाता; वह न्यायपूर्ण स्वत्व, अर्जित व्यक्तित्व, लोक-उत्तरदायित्व, आत्मालोचन और अपने निर्णयों की नैतिक कीमत स्वीकार करने की क्षमता से निर्मित होता है। इस दृष्टि से कर्ण बहिष्कृत प्रतिभा और सामाजिक अस्मिता का प्रतिनिधि है, किन्तु उसकी दुर्योधन-निष्ठा उसे निर्दोष प्रतिरोध-नायक नहीं रहने देती। युधिष्ठिर विजय के बाद अपराध-बोध में प्रवेश करके विजेता की निर्विवाद महिमा को भंग करते हैं, जबकि भीष्म सत्ता, युद्ध और सामाजिक विषमता के संरचनात्मक कारणों की पहचान कराते हैं। ‘उर्वशी’ में पुरूरवा का राजकीय और पुरुषोचित आत्मविश्वास इच्छा के सामने विखंडित होता है; उर्वशी की स्वायत्त कामना, औशीनरी की मौन पीड़ा और सुकन्या का संतुलित जीवनबोध नायकत्व को पुरुष-केंद्रित युद्धभूमि से निकालकर संबंधों की नैतिकता में ले आते हैं। लेख निकट-पाठ, अंतर्पाठीय तुलना और सत्ता-विमर्श की पद्धति से यह दिखाता है कि दिनकर मिथक का विसर्जन नहीं करते, बल्कि उसकी आंतरिक दरारों को खोलते हैं। उनका नायक अपनी महानता के साथ अपने दोष, ऋण, मोह, हिंसा और असफलता भी वहन करता है। यही जटिलता दिनकर के मिथकीय पुनर्पाठ को आज की जाति, असमानता, राज्य-हिंसा, लैंगिक अस्मिता और नैतिक नेतृत्व की बहसों में जीवित बनाती है।
बीज शब्द : रामधारी सिंह दिनकर, मिथक, नायकत्व, रश्मिरथी, कुरुक्षेत्र, उर्वशी, सत्ता-संरचना, सामाजिक अस्मिता, नैतिक द्वंद्व, कर्ण, युधिष्ठिर, पुरूरवा।
प्रस्तावना और अध्ययन-पद्धति
मिथक किसी संस्कृति की केवल प्राचीन कथा नहीं होता। वह स्मृति, मूल्य, भय, आकांक्षा और वैधता का ऐसा सांकेतिक ढाँचा है जिसके भीतर कोई समाज स्वयं को पहचानता और अपनी संस्थाओं को स्वाभाविक ठहराता है। इसी कारण मिथकीय कथा में राजा केवल व्यक्ति नहीं रहता, राजसत्ता का प्रतिरूप बन जाता है; योद्धा केवल रणकुशल पुरुष नहीं, मान्य वीरता का मानदंड बनता है; पत्नी, माता, कुल, वंश और जाति केवल सामाजिक संबंध नहीं, पहचान तथा अधिकार बाँटने वाली संस्थाएँ बन जाते हैं। आधुनिक लेखक जब मिथक को पुनर्लिखता है तो वह प्रायः मूल कथा को नष्ट नहीं करता। वह कथा का केंद्र बदलता है, मौन पात्र को बोलने देता है, पूजित नायक से असुविधाजनक प्रश्न पूछता है और उस मूल्य-व्यवस्था को दृश्य बनाता है जो पुरानी कथा में सामान्य अथवा दैवी मान ली गई थी। रोलाँ बार्थ के मिथक-विमर्श की उपयोगिता यहाँ इस तथ्य में है कि सामाजिक रूप से निर्मित अर्थ अक्सर मिथक में प्रकृति-सिद्ध दिखाई देने लगते हैं। दिनकर का रचनात्मक हस्तक्षेप इसी स्वाभाविकीकरण को तोड़ता है: जन्माधारित श्रेष्ठता को वे अर्जित गुण के सामने रखते हैं, विजय को शवों और विधवाओं की दृष्टि से पढ़ते हैं और पुरुष-नायक की कामना के सामने स्त्री के अनुभव तथा अधिकार का प्रश्न उपस्थित करते हैं।
दिनकर की रचनात्मक यात्रा राष्ट्रीय मुक्ति-संघर्ष, औपनिवेशिक दमन, विश्वयुद्ध, स्वतंत्रता, लोकतांत्रिक राज्य-निर्माण और आधुनिक विज्ञान की तीव्र हलचलों से होकर गुजरती है। अतः उनके यहाँ मिथकीय काल और आधुनिक काल अलग-अलग बंद कक्ष नहीं हैं। महाभारत का युद्ध बीसवीं शताब्दी की हिंसा से संवाद करता है; कर्ण की सामाजिक अवमानना आधुनिक भारत की जाति और अवसर-असमानता को उद्घाटित करती है; पुरूरवा की इच्छाएँ उस आधुनिक व्यक्ति की दुविधा बन जाती हैं जो देह और आत्मा, प्रेम और स्वामित्व, सार्वजनिक दायित्व और निजी तृप्ति के बीच बँटा हुआ है। ‘रश्मिरथी’ की भूमिका में दिनकर स्वयं स्पष्ट करते हैं कि कर्ण के चरित्र के बहाने उन्हें अपने समय और समाज के विषय में कहने के अवसर मिले। वे कर्ण के पुनरुत्थान को “नई मानवता की स्थापना का ही प्रयास”[1] कहते हैं। यह कथन इस अध्ययन का प्रमुख प्राथमिक प्रमाण है: दिनकर का मिथक-प्रयोग पुरातन गौरव की पुनरावृत्ति नहीं, आधुनिक मानव-मूल्य की खोज है।
यहाँ ‘खण्डकाव्य’ पद का प्रयोग एक सावधानी के साथ किया गया है। ‘रश्मिरथी’ और ‘कुरुक्षेत्र’ को हिन्दी आलोचना में प्रबंध-काव्य, कथाकाव्य, खण्डकाव्य और कभी-कभी महाकाव्य जैसे निकटवर्ती पदों से संबोधित किया गया है। ‘उर्वशी’ को स्वयं उसके प्रकाशकीय अभिलेख और आलोचनात्मक परंपरा में काव्य-नाटक अथवा प्रबंध-काव्य भी कहा गया है। अतः यह शोध-पत्र विधा की कठोर शास्त्रीय सीमा का दावा नहीं करता। ‘खण्डकाव्य’ यहाँ उस व्यापक आधुनिक कथात्मक काव्य-रूप का कार्यकारी संकेत है जो किसी महाकथा के एक चयनित प्रसंग, पात्र या जीवन-संघर्ष को केंद्र बनाकर स्वतंत्र वैचारिक संपूर्णता प्राप्त करता है। अध्ययन का मुख्य पाठ ‘रश्मिरथी’, ‘कुरुक्षेत्र’ और ‘उर्वशी’ हैं, क्योंकि तीनों में क्रमशः सामाजिक अस्मिता, राजनीतिक-सामूहिक नैतिकता और प्रेम-लैंगिकता के क्षेत्र में मिथकीय नायकत्व का सर्वाधिक विकसित पुनर्संयोजन दिखाई देता है।
शोध की पद्धति मूलतः निकट-पाठ पर आधारित है। कथानक-सार देने के स्थान पर पात्रों के निर्णायक कथनों, प्रसंग-चयन, संवाद-संरचना, दृष्टिकोण और मूल्य-संघर्ष का विश्लेषण किया गया है। इसके साथ अंतर्पाठीय दृष्टि से यह देखा गया है कि दिनकर महाभारत अथवा पुरूरवा-उर्वशी की सांस्कृतिक स्मृति में कौन-सा परिवर्तन करते हैं। तीसरी पद्धति सत्ता-संरचनात्मक है: राजसभा, वंश, जाति, गुरु-शिष्य व्यवस्था, राज्य, युद्ध, विवाह और प्रेम को केवल निजी संबंध न मानकर अधिकार तथा प्रतिष्ठा वितरित करने वाली संरचनाओं के रूप में पढ़ा गया है। चौथा आयाम नैतिक है, जिसमें किसी पात्र को पहले से धर्म या अधर्म का प्रतिनिधि मान लेने के बजाय उसके विकल्पों, बाध्यताओं, परिणामों और आत्मबोध की जाँच की गई है। इसीलिए यहाँ नायकत्व का अर्थ विजय या आदर्शीकरण नहीं, नैतिक जटिलता को वहन करने की क्षमता है।
दिनकर के काव्य में नायक प्रायः द्वंद्व से जन्म लेता है। वह एकरेखीय देव-प्रतिमा नहीं है। कर्ण में दान और प्रतिशोध, आत्मसम्मान और हीनता-बोध, मित्रता और अन्याय में सहभागिता साथ-साथ हैं। युधिष्ठिर में धर्म-बुद्धि और युद्धजन्य अपराध-बोध का संघर्ष है। भीष्म प्रतिज्ञा और सत्ता-निष्ठा के कारण विनाशकारी व्यवस्था से बँधे रहते हैं, फिर भी शरशय्या पर वे उसी व्यवस्था की आलोचना करते हैं। पुरूरवा वीर राजा है, पर प्रेम में उसका नियंत्रण टूटता है; उर्वशी स्वतंत्र है, पर मातृत्व और पृथ्वी के संबंध से वह भी द्वंद्व का अनुभव करती है। इस तरह दिनकर नायक को उसकी मूर्ति से उतारकर इतिहास, समाज और संबंधों की मिट्टी में रखते हैं। यह मानवीकरण नायक की गरिमा घटाता नहीं; उसके नैतिक अर्थ को अधिक कठिन और विश्वसनीय बनाता है।
मिथकीय पुनर्व्याख्या की दूसरी विशेषता केंद्र और परिधि का उलटाव है। महाभारत की राजवंशी कथा में कर्ण केंद्र में आते हैं; युद्ध-विजय की कथा में विजेता युधिष्ठिर का उत्सव नहीं, उसका पश्चात्ताप केंद्र बनता है; पुरूरवा की प्रेमकथा में उर्वशी के अतिरिक्त औशीनरी, सुकन्या और आयु के अनुभव अर्थपूर्ण हो उठते हैं। यह उलटाव आधुनिक लोकतांत्रिक संवेदना से जुड़ता है। दिनकर का जनवादी आग्रह केवल ‘जनता’ शब्द के प्रयोग में नहीं, काव्य-दृष्टि के पुनर्वितरण में है। वे पूछते हैं कि राज्याभिषेक किसके रक्त पर खड़ा है, कुल-प्रतिष्ठा किसके अपमान से सुरक्षित रहती है, पुरुष की आध्यात्मिक यात्रा की कीमत कौन-सी स्त्री चुकाती है और मित्रता कब न्याय के प्रतिकूल राजनीतिक बंधन बन जाती है।
इस शोध-पत्र का मूल तर्क तीन स्तरों पर विकसित होगा। प्रथम, सत्ता-संरचना नायक को केवल रोकती नहीं, उसे गढ़ती भी है। कर्ण का ‘सूतपुत्र’ होना और दुर्योधन द्वारा उसका अंगराज बनाया जाना दो विरोधी सत्ता-क्रियाएँ हैं, पर दोनों उसकी पहचान पर बाहरी नाम अंकित करती हैं। द्वितीय, सामाजिक अस्मिता स्वाभिमान का स्रोत होने के साथ नैतिक अंधता का कारण भी बन सकती है। अपमानित व्यक्ति उस हाथ का आजीवन ऋणी हो सकता है जिसने उसे सम्मान दिया, भले वह हाथ अन्याय की सत्ता का हो। तृतीय, नैतिक द्वंद्व का समाधान दिनकर सरल उपदेश में नहीं देते। वे हिंसा और अहिंसा, तप और प्रतिकार, प्रेम और संन्यास, देह और अतीन्द्रियता, निष्ठा और न्याय के बीच स्थायी तनाव बनाए रखते हैं। दिनकर की शक्ति उत्तर देने से अधिक प्रश्न को उसकी पूरी ऊष्मा में उपस्थित करने में है।
‘रश्मिरथी’ : जन्माधारित सत्ता के विरुद्ध अर्जित नायकत्व
‘रश्मिरथी’ का सबसे बड़ा रचनात्मक निर्णय कर्ण को कथा का केंद्र बनाना है। महाभारत की व्यापक संरचना में कर्ण अत्यंत महत्त्वपूर्ण होते हुए भी पाण्डव-कौरव संघर्ष के बीच स्थित एक त्रासद पात्र है; दिनकर उसके अनुभव को केंद्र बनाकर पूरी राजकीय और जातीय व्यवस्था को उसकी आँख से देखने लगते हैं। परिणामतः कथा का प्रश्न ‘कौन जीता?’ से बदलकर ‘किसे मनुष्य और वीर माने जाने का अधिकार मिला?’ हो जाता है। रंगभूमि का प्रसंग इस परिवर्तन की कुंजी है। अर्जुन के समकक्ष प्रतिभा दिखाने वाले कर्ण को युद्ध-कौशल के आधार पर स्वीकार नहीं किया जाता; उससे कुल और जन्म पूछा जाता है। यहाँ राजसभा योग्यता की निष्पक्ष निर्णायक संस्था नहीं, वंशगत विशेषाधिकार की रक्षक सिद्ध होती है। कौशल उपस्थित है, किंतु वैधता अनुपस्थित; वैधता इसलिए अनुपस्थित है क्योंकि सत्ता ने जन्म को प्रतिभा से पहले रखा है।
कर्ण की प्रतिक्रिया केवल निजी क्रोध नहीं, पहचान की वैकल्पिक राजनीति है। उसका संक्षिप्त प्रतिवाद—“जाति हैं ये मेरे भुजदंड”[2]—जैविक वंशावली के स्थान पर श्रम, साधना और सामर्थ्य को पहचान का आधार बनाता है। भुजदंड यहाँ वीरता का अलंकार मात्र नहीं; अर्जित व्यक्तित्व का चिह्न है। कर्ण कहता है कि मनुष्य की सामाजिक स्थिति उसके जन्म से नहीं, उसके कर्म और क्षमता से पढ़ी जानी चाहिए। किंतु इस प्रतिवाद की आधुनिक शक्ति के साथ उसकी सीमा भी देखना आवश्यक है। कर्ण जाति-विरोध को कभी-कभी पौरुष और युद्ध-शक्ति की भाषा में व्यक्त करता है। इससे जन्माधारित ऊँच-नीच पर चोट तो पड़ती है, पर मानवीय गरिमा का मानदंड पुनः वीर पुरुष की शक्ति बन सकता है। दिनकर का पाठ स्वयं इस सीमा को दया, तप, त्याग, चरित्र और लोक-मंगल जैसे गुणों से संतुलित करता है; फिर भी समकालीन आलोचना को पूछना चाहिए कि जो व्यक्ति शारीरिक या सैन्य सामर्थ्य प्रदर्शित नहीं कर सकता, उसकी समानता किस आधार पर सुरक्षित होगी। इस प्रश्न से ‘रश्मिरथी’ कमजोर नहीं होती; उसकी सामाजिक बहस आगे बढ़ती है।
रंगभूमि में दुर्योधन का हस्तक्षेप सत्ता की द्वैध प्रकृति को प्रकट करता है। वह कर्ण को अंगदेश का राजा बनाकर राजवंशी अवरोध तोड़ता है। इस क्षण वह सामाजिक न्याय का वाहक दिखाई देता है, क्योंकि उसके निर्णय से प्रतिभा को सार्वजनिक मान्यता मिलती है। पर यह दान निष्काम नहीं है। दुर्योधन को अर्जुन के विरुद्ध एक समकक्ष योद्धा और पाण्डवों के विरुद्ध स्थायी सहयोगी चाहिए। अतः अंगराज्य एक साथ मुक्ति और बंधन है। वह कर्ण को सम्मान देता है, किंतु उसे राजनीतिक ऋण में भी बाँधता है। आधुनिक सत्ता भी बहिष्कृत समुदायों को प्रतिनिधित्व, पद और संरक्षण देकर न्याय का विस्तार कर सकती है, पर संरक्षण यदि व्यक्ति की स्वतंत्र नैतिक निर्णय-क्षमता गिरवी रख ले तो वह न्याय ग्राहकता में बदल जाता है। कर्ण की त्रासदी इसी बिंदु से प्रारंभ होती है: जिस क्षण उसे सामाजिक जन्म मिलता है, उसी क्षण उसकी राजनीतिक स्वतंत्रता सीमित हो जाती है।
दिनकर दुर्योधन को केवल खलनायक बनाकर इस जटिलता से बचते नहीं। वह उस व्यवस्था के पाखंड को पहचानता है जिसमें कुलीनता को नैतिकता मान लिया गया है। उसका तर्क है कि बड़ा वंश खोटे कर्मों को उज्ज्वल नहीं बना सकता। इस कथन में लोकतांत्रिक मूल्य है, पर दुर्योधन स्वयं सत्ता और संपत्ति के असमान वितरण का पक्षधर है। वह कर्ण के लिए जाति-बंधन तोड़ता है, पर पाण्डवों के न्यायोचित हिस्से को स्वीकार नहीं करता। इसका अर्थ यह है कि सत्ता किसी एक बहिष्कृत को ऊपर उठाकर भी समग्र अन्याय को बनाए रख सकती है। अपवाद संरचना को बदलता हुआ दिखाई देता है, पर कभी-कभी वही अपवाद संरचना की वैधता बचाता है। कर्ण का राजतिलक सामाजिक क्रांति नहीं, राजकीय विवेक से चुना गया असाधारण समावेशन है।
कर्ण की अस्मिता बहुस्तरीय है। वह जैविक रूप से कुन्ती और सूर्य का पुत्र, सामाजिक रूप से राधा और अधिरथ का पुत्र, सार्वजनिक रूप से सूतपुत्र, राजनीतिक रूप से अंगराज और आत्मबोध में अर्जित पौरुष का स्वामी है। दिनकर इन पहचानों में से किसी एक को अंतिम सत्य नहीं बनाते। आधुनिक अस्मिता-विमर्श की दृष्टि से यह अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। जन्म का रहस्य खुल जाने पर भी पालन-पोषण का संबंध झूठा नहीं हो जाता; राजत्व मिल जाने पर अपमान की स्मृति मिटती नहीं; सूर्यपुत्र होना सामाजिक जीवन में भोगे गए बहिष्कार को रद्द नहीं करता। कर्ण का ‘मैं’ कई असंगत इतिहासों से बना है। इसीलिए कृष्ण और कुन्ती के प्रस्ताव उसके सामने केवल राजनीतिक विकल्प नहीं, आत्म-पहचान का संकट बनकर आते हैं। यदि वह पाण्डवों में लौटे तो रक्त-संबंध स्वीकार करेगा, किंतु उस सामाजिक जीवन और मित्रता को अस्वीकार करेगा जिसने उसे वास्तविक पहचान दी। यदि दुर्योधन के साथ रहे तो अपने उपकार-बोध को निभाएगा, किंतु व्यापक न्याय के विरुद्ध युद्ध करेगा।
कृष्ण-कर्ण संवाद ‘रश्मिरथी’ का सर्वोच्च नैतिक क्षण है। कृष्ण कर्ण को उसकी जन्मकथा बताते हैं, ज्येष्ठ पाण्डव का अधिकार और साम्राज्य का प्रस्ताव देते हैं। सामान्य नायककथा में यह पहचान की पुनर्प्राप्ति और विजय का अवसर होता। दिनकर इसे अस्वीकार की परीक्षा बनाते हैं। कर्ण जानता है कि कृष्ण का प्रस्ताव उसे प्रतिष्ठा, भ्रातृत्व और राज्य दे सकता है, फिर भी वह दुर्योधन को छोड़ने से इनकार करता है। उसका कथन—“मुझको न कहीं कुछ पाना है, केवल ऋण मात्र चुकाना है”[3]—निष्ठा की ऊँचाई और नैतिक संकट दोनों को एक साथ व्यक्त करता है। कर्ण को निजी लाभ नहीं चाहिए; यह उसकी महत्ता है। पर जिस ऋण को वह चुका रहा है, उसका राजनीतिक परिणाम अन्यायपूर्ण सत्ता की रक्षा है; यह उसकी सीमा है। दिनकर निष्ठा को स्वतः धर्म नहीं मानते। वे दिखाते हैं कि श्रेष्ठ व्यक्तिगत गुण भी गलत संरचना में विनाशकारी बन सकता है।
यहाँ ऋण की अवधारणा पर विशेष ध्यान आवश्यक है। भारतीय नैतिक परंपरा में माता-पिता, गुरु, देव और समाज के ऋण का विचार व्यक्ति को संबंधपरक बनाता है। कर्ण का दुर्योधन-ऋण इसी संबंधपरक नैतिकता का रूप है। लेकिन ऋण की असीमता व्यक्ति को विवेकहीन आज्ञाकारिता में बदल सकती है। कर्ण उपकार का प्रत्युत्तर देना चाहता है, पर क्या उपकारकर्ता के प्रत्येक अन्याय में साथ देना ऋण-परिशोधन है? क्या कृतज्ञता न्याय से बड़ी हो सकती है? ‘रश्मिरथी’ का उत्तर उपदेशात्मक नहीं है। कर्ण की मृत्यु उसके निर्णय की कीमत बनती है, पर कवि उसे तुच्छ नहीं करता। पाठक उसकी निष्ठा से प्रभावित और उसके पक्ष-चयन से व्यथित रहता है। यही नैतिक द्वंद्व नायकत्व को प्रचारात्मक आदर्श से साहित्यिक चरित्र बनाता है।
परशुराम प्रसंग सत्ता के एक अन्य संस्थागत रूप—ज्ञान पर नियंत्रण—को उद्घाटित करता है। कर्ण को शस्त्रविद्या चाहिए, पर सामाजिक श्रेणी उसके लिए वैध शिक्षा का मार्ग बंद करती है। वह ब्राह्मण होने का असत्य कहकर परशुराम से शिक्षा लेता है। यहाँ झूठ व्यक्तिगत दोष है, किंतु उसकी पृष्ठभूमि संरचनात्मक वंचना है। न्यायपूर्ण व्यवस्था में उसे छल की आवश्यकता न पड़ती। परशुराम का शाप भी केवल गुरु-क्रोध नहीं; ज्ञान-सत्ता द्वारा सीमा-भंग करने वाले शिष्य को दंड है। दिनकर परशुराम को भी सपाट खलनायक नहीं बनाते। उनके भीतर तप, वीरता और मानवीय स्नेह है; वे कर्ण की प्रतिभा से प्रसन्न होते हैं, किंतु जातिगत पूर्वमान्यता सत्य खुलने पर करुण संबंध को नष्ट कर देती है। इस प्रसंग में मिथकीय गुरु की महिमा प्रश्नांकित होती है और शिक्षा तक समान पहुँच आधुनिक न्याय का मौन मानदंड बनती है।
कर्ण का दान भी पुनर्पाठ की माँग करता है। कवच-कुण्डल देना पारंपरिक रूप से दानवीरता का चरम है। दिनकर उसके उदार हृदय को पूर्ण गरिमा देते हैं; याचक को निराश न लौटाने की प्रतिज्ञा कर्ण को लोकनायक बनाती है। फिर भी इन्द्र का ब्राह्मण-वेश सत्ता की असमानता दिखाता है। देवता अपने पुत्र अर्जुन की विजय सुनिश्चित करने के लिए सामाजिक रूप से अपमानित योद्धा की नैतिक महानता का उपयोग करते हैं। कर्ण की उदारता उसकी सुरक्षा छीन लेती है। इस घटना में शक्ति केवल प्रत्यक्ष बल नहीं; वेश, प्रतिष्ठा और नैतिक संहिता के रणनीतिक उपयोग में भी है। प्रभुत्वशाली पक्ष वंचित व्यक्ति की सद्गुणशीलता को उसके विरुद्ध मोड़ सकता है। नायक का गुण उसकी कमजोरी बना दिया जाता है।
फिर भी दान को केवल आत्मघाती मूर्खता कहना कर्ण के चरित्र को छोटा करना होगा। उसके लिए कवच बचाना देह बचाना है, किंतु वचन और दान बचाना आत्मा बचाना। वह जीवन की जैविक निरंतरता से ऊपर अपने चुने हुए चरित्र को रखता है। मिथकीय नायकत्व का यह रूप आधुनिक उपयोगितावादी बुद्धि को चुनौती देता है। प्रश्न यह नहीं कि उसने लाभकारी निर्णय लिया या नहीं; प्रश्न यह है कि व्यक्ति कौन-सा मूल्य खो देने के बाद स्वयं नहीं रह जाता। कर्ण के लिए दानशीलता और वचन उस आत्म-सत्ता के स्रोत हैं जिसे समाज ने बार-बार नकारा। वह अपना शरीर दे सकता है, पर स्वयं के बनाए मानदंड पर बाहरी सत्ता का अधिकार स्वीकार नहीं करता। इसीलिए उसका दान प्रतिरोध भी है, यद्यपि उसका परिणाम मृत्यु की संभावना बढ़ाता है।
द्रौपदी और अभिमन्यु से जुड़े प्रसंग कर्ण-नायकत्व की आलोचनात्मक सीमा खोलते हैं। सामाजिक अपमान भोगा हुआ व्यक्ति अनिवार्यतः अन्य पीड़ितों का सहचर नहीं बन जाता। सत्ता से मान्यता मिलने के बाद वह दूसरे के अपमान में सहभागी हो सकता है। द्रौपदी-अपमान के प्रसंग में कर्ण की भूमिका उसके जनवादी नायकत्व पर स्थायी प्रश्नचिह्न है। इसी प्रकार युद्ध में सामूहिक नैतिकता टूटती है और साध्य के लिए अनुचित साधन स्वीकार होने लगते हैं। दिनकर कर्ण को निर्दोष संत में परिवर्तित नहीं करते; उनकी करुणा दोषों को मिटाती नहीं, उन्हें अधिक दुखद बनाती है। कर्ण के भीतर बहिष्करण से जन्मी आग न्याय की चेतना भी बनती है और प्रतिशोध की अंधता भी। आधुनिक अस्मिता-राजनीति के लिए यह गंभीर संकेत है: पीड़ा नैतिक अधिकार देती है, पर स्वतः नैतिक अचूकता नहीं।
कुन्ती-कर्ण संवाद निजी मातृत्व और राजवंशी राजनीति के तनाव को सामने लाता है। कुन्ती का अपराध केवल शिशु-त्याग नहीं; वह सामाजिक भय की शिकार भी है। अविवाहित मातृत्व को स्वीकार न करने वाली व्यवस्था उसके निर्णय की पृष्ठभूमि है। इसलिए उसे केवल क्रूर माता कहना पर्याप्त नहीं। पर युद्ध के ठीक पहले कर्ण को पुत्र कहने का उसका प्रयास राजनीतिक स्वार्थ से मुक्त भी नहीं। वह कर्ण को जीवन भर सार्वजनिक पहचान नहीं दे सकी, पर अब पाण्डवों की रक्षा के लिए मातृत्व का दावा करती है। कर्ण का आक्रोश उस देर से आए रक्त-संबंध के विरुद्ध है जो पालन, अपमान और संघर्ष के इतिहास को अनदेखा करना चाहता है। यहाँ दिनकर जैविक सत्य पर सामाजिक सत्य की जटिलता स्थापित करते हैं।
कर्ण का कुन्ती को चार पुत्रों की सुरक्षा का वचन देना उसके भीतर के नैतिक स्वशासन को दिखाता है। वह दुर्योधन का पक्ष नहीं छोड़ता, अर्जुन से युद्ध का प्रण भी नहीं छोड़ता, पर प्रतिशोध को पूर्ण संहार में बदलने से रोकता है। यह सीमित प्रतिज्ञा युद्ध के भीतर नैतिक सीमा खींचने का प्रयास है। नायकत्व यहाँ सर्वशक्तिमान निर्णय नहीं, असंभव परिस्थिति में हिंसा को मर्यादित करने की छोटी क्षमता है। कर्ण जानता है कि किसी भी पक्ष की विजय में कुन्ती पाँच पुत्रों की माता रहेगी; वह स्वयं को उस गणना में बलिदान कर देता है। इस क्षण उसकी अस्मिता रक्त, मित्रता और नियति के बीच स्वयं चुने हुए वचन में स्थिर होती है।
‘रश्मिरथी’ का शल्य प्रसंग सत्ता द्वारा मनोवैज्ञानिक हिंसा का उदाहरण है। सारथि युद्ध में योद्धा की सहायता करता है, किंतु शल्य कर्ण के जन्म और योग्यता पर बार-बार आघात करता है। प्रत्यक्ष शस्त्र के पहले भाषा उसे दुर्बल करने लगती है। सामाजिक अपमान यहाँ अतीत की स्मृति नहीं, रणभूमि की सक्रिय रणनीति है। यह दिखाता है कि प्रतिष्ठा से वंचित व्यक्ति को समान पद मिल जाने के बाद भी पूर्वाग्रह उसका पीछा नहीं छोड़ता। संस्थागत समावेशन पर्याप्त नहीं, यदि सांस्कृतिक भाषा लगातार व्यक्ति को हीन घोषित करती रहे। कर्ण के पराक्रम को केवल अर्जुन के बाण नहीं, उस व्यवस्था की दीर्घकालिक चोट भी कमजोर करती है जिसने उसके आत्मविश्वास को बार-बार घेरा।
अंततः कर्ण की मृत्यु नियति की कथा से अधिक संरचनाओं और विकल्पों की संयुक्त परिणति है। शाप, कवच-वियोग, रथचक्र, शल्य, कृष्ण की रणनीति और अर्जुन का बाण—सब मिलते हैं; किंतु इनके साथ कर्ण का स्वयं चुना हुआ पक्ष भी है। दिनकर किसी एक कारण में त्रासदी को बंद नहीं करते। यदि केवल भाग्य दोषी हो तो नैतिक प्रश्न समाप्त हो जाएगा; यदि केवल कर्ण दोषी हो तो सामाजिक अन्याय अदृश्य हो जाएगा। ‘रश्मिरथी’ की उपलब्धि यह है कि वह दोनों को साथ रखती है। कर्ण पीड़ित भी है, कर्ता भी; प्रतिरोधक भी, सहभागी भी; दानी भी, प्रतिशोधी भी। मिथकीय नायकत्व की पुनर्व्याख्या इसी द्वैत को स्वीकार करने में है।
‘रश्मिरथी’ आधुनिक भारत के लिए समान अवसर का काव्य है, लेकिन उससे अधिक यह मान्यता की राजनीति का काव्य है। मनुष्य को केवल संसाधन नहीं, सार्वजनिक सम्मान चाहिए। अपमान उसकी राजनीतिक निष्ठा को बदल सकता है; मान्यता उसे उस सत्ता से बाँध सकती है जो व्यापक रूप से अन्यायी है। इसलिए न्याय का कार्य किसी असाधारण कर्ण को पद देना भर नहीं, ऐसी व्यवस्था बनाना है जिसमें किसी की योग्यता पूछने से पहले उसका गोत्र न पूछा जाए। दिनकर का अर्जित नायकत्व जन्माधारित कुलीनता को तोड़ता है, पर पाठक को यह भी सिखाता है कि शक्ति, दान और निष्ठा को न्याय तथा करुणा से अलग कर देने पर महान व्यक्ति भी विनाशकारी राजनीति का उपकरण बन सकता है।
कर्ण की सार्वजनिक प्रतिष्ठा में ‘जनता’ की भूमिका भी उल्लेखनीय है। रंगभूमि की संस्थागत सत्ता उसे अस्वीकार करती है, पर उपस्थित जनसमुदाय उसके कौशल को पहचानता और अंगराज के रूप में उसका अभिनंदन करता है। इससे वैधता के दो स्रोत बनते हैं—कुलीन संस्था और लोक-स्वीकृति। दिनकर की लोकतांत्रिक संवेदना दूसरे स्रोत को नैतिक बढ़त देती है, किन्तु जनसमर्थन को भी अचूक नहीं मानती। जनता शौर्य से शीघ्र मुग्ध हो सकती है और राजनीतिक दान के पीछे छिपे उद्देश्य को न देख पाए। अतः लोकनायकत्व और लोकप्रियता समानार्थी नहीं। लोकनायक को जन-प्रेम के साथ सार्वजनिक विवेक भी चाहिए। कर्ण लोक की आकांक्षा का प्रतिनिधि बनता है, पर दुर्योधन की सत्ता से उसका गठबंधन जन-मान्यता को राजकीय रणनीति में बदल देता है। यह प्रसंग आधुनिक लोकतंत्र में करिश्माई नेतृत्व, संरक्षक राजनीति और प्रतिनिधित्व की जटिलता समझने का उपयोगी आधार है। बहिष्कृत समूह से आने वाला अथवा उसका सम्मान करने वाला नेता स्वतः समतामूलक राजनीति नहीं करता; उसके संस्थागत गठबंधन और निर्णय भी जाँचे जाने चाहिए।
दिनकर कर्ण की भाषा को ऊर्जस्वी, प्रत्यक्ष और वादात्मक बनाते हैं। यह शैली महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि अस्मिता केवल कथानक से नहीं, बोलने के अधिकार से निर्मित होती है। जिस व्यक्ति से सभा गोत्र पूछकर उसे मौन कराना चाहती है, वही व्यक्ति सभा की नैतिकता पर अभियोग लगाता है। उसकी वाणी निजी लज्जा को सार्वजनिक प्रश्न में बदलती है। अपमान को भीतर सहते रहना सत्ता को सुरक्षित रखता; उसका नाम लेना संरचना को दृश्य बनाता है। किंतु कर्ण की तीखी वाणी कई बार प्रतिपक्ष को संवाद के बजाय प्रतिशोध की दिशा में भी ले जाती है। दिनकर इस भाषिक ऊर्जा को नियंत्रित नैतिक समाधान में नहीं बाँधते। पाठक अनुभव करता है कि सदियों का मौन टूटे तो उसमें संतुलित शिष्टता की अपेक्षा करना स्वयं विशेषाधिकार हो सकता है, फिर भी प्रतिरोध की भाषा को अंततः न्यायपूर्ण समुदाय बनाना होगा। इस द्वंद्व में ‘रश्मिरथी’ सामाजिक क्रोध को वैधता देती है और उसके राजनीतिक उपयोग पर सावधानी भी रखती है।
‘कुरुक्षेत्र’ : विजय के विरुद्ध उत्तरदायित्व और सत्ता की संरचनात्मक आलोचना
‘कुरुक्षेत्र’ महाभारत-युद्ध का पुनःवर्णन नहीं, युद्ध के बाद बची हुई चेतना का काव्य है। इसकी केंद्रीय स्थिति स्वयं आधुनिक है: विजेता उत्सव में नहीं, अपराध-बोध में खड़ा है। युधिष्ठिर रणभूमि पर रक्त, शव, विधवा, अनाथ और उजड़े राज्य को देखकर पूछते हैं कि ऐसी विजय का नैतिक मूल्य क्या है। परंपरागत वीरगाथा विजय-क्षण पर नायक की महिमा बढ़ाती है; दिनकर विजय के बाद कैमरा मृतभूमि की ओर मोड़ देते हैं। यहाँ नायकत्व शत्रु-वध में नहीं, अपनी विजय के पीड़ितों को देखने की क्षमता में है। यह दृष्टि युद्ध को राजाओं की कीर्ति से निकालकर सामान्य मनुष्यों की हानि में पढ़ती है।
युधिष्ठिर का पश्चात्ताप दिनकर के लिए कायरता नहीं। वह उस नैतिक चेतना का संकेत है जो साध्य प्राप्त होने के बाद साधनों और कीमत का लेखा माँगती है। फिर भी दिनकर उसे अंतिम सत्य नहीं बनाते, क्योंकि अपराध-बोध यदि कर्मत्याग में बदल जाए तो विनष्ट समाज को पुनर्निर्माण करने वाला नेतृत्व अनुपस्थित हो जाएगा। युधिष्ठिर वन जाना चाहते हैं; भीष्म उन्हें भुवन में लौटने, आँसू पोंछने और निष्काम कर्म करने को कहते हैं। इस प्रकार ‘कुरुक्षेत्र’ दो नैतिक अतियों के बीच संवाद रचता है: एक ओर हिंसा को धर्म कहकर सरल वैधता देना, दूसरी ओर हिंसा के बाद निजी आत्मशुद्धि के लिए सार्वजनिक दायित्व छोड़ देना। दिनकर का आग्रह है कि सच्चा प्रायश्चित पलायन नहीं, पीड़ित समाज के प्रति सक्रिय उत्तरदायित्व है।
भीष्म का चरित्र स्वयं गहरे विरोधाभास से बना है। वे प्रतिज्ञा, तप, शौर्य और ज्ञान के मिथकीय प्रतीक हैं, किन्तु उनकी प्रतिज्ञा उन्हें हस्तिनापुर की सत्ता से बाँधती है। वे दुर्योधन की अन्यायपूर्ण राजनीति पहचानते हुए भी राज्य-निष्ठा के कारण उसके पक्ष में युद्ध करते हैं। शरशय्या पर उनका ज्ञान इसलिए निर्मल और साथ ही त्रासद है कि वह अनुभव की भारी कीमत के बाद आया है। भीष्म व्यवस्था के बाहर खड़े तटस्थ दार्शनिक नहीं; वे उसके सहभागी हैं। दिनकर उनके मुख से सत्ता की आलोचना कराते हैं, पर सहभागिता का इतिहास मिटाते नहीं। इससे नैतिक ज्ञान की प्रकृति बदलती है: वह निर्दोष व्यक्ति का उपदेश नहीं, दोष और पराजय से अर्जित आत्मालोचन है।
युद्ध के प्रश्न पर ‘कुरुक्षेत्र’ का प्रसिद्ध द्वंद्व आज भी अक्सर एक पक्ष चुनकर उद्धृत किया जाता है। कोई इसे प्रतिकार और शक्ति का घोष मानता है, कोई युद्ध-विरोध का काव्य। वस्तुतः दोनों स्वर इसकी संरचना में हैं। भीष्म कहते हैं कि व्यक्ति के लिए तप, करुणा और क्षमा धर्म हो सकते हैं, पर समुदाय पर आक्रमण होने पर सामूहिक रक्षा का प्रश्न अलग है। उनका वाक्यांश—“व्यक्ति का है धर्म तप, करुणा, क्षमा”[4]—निजी और सार्वजनिक नैतिकता के भेद की भूमिका बनता है। पर काव्य युद्ध को उत्सव नहीं बनाता; युधिष्ठिर का अंतर्दाह हर औचित्य के सामने मानवीय कीमत रखता है। दिनकर न तो निष्क्रिय अहिंसा स्वीकार करते हैं, न अनियंत्रित सैन्यवाद। उनका प्रश्न है कि प्रतिकार किस परिस्थिति में अपरिहार्य होता है, उसे कौन बुलाता है और विजय के बाद कौन उत्तरदायी रहेगा।
यहीं सत्ता-संरचना का विश्लेषण निर्णायक हो जाता है। दिनकर के अनुसार युद्ध अचानक आकाश से नहीं उतरता। उसके पहले शोषण, उपेक्षा, दमन, अपमान, असमान भोग और संचित प्रतिहिंसा की लंबी प्रक्रिया चलती है। शांति यदि न्यायहीन व्यवस्था की रक्षा का नाम है तो वह वास्तविक शांति नहीं, दबाई हुई हिंसा है। काव्य का संक्षिप्त सूत्र—“न्यायोचित सुख सुलभ नहीं जब तक मानव-मानव को”[5]—शांति को समानता से जोड़ता है। इसका अर्थ यांत्रिक समानता नहीं, जीवन, विकास, सम्मान और आवश्यक संसाधनों तक न्यायपूर्ण पहुँच है। भूखा और अपमानित समुदाय जिस व्यवस्था में चुप है, वहाँ युद्ध अनुपस्थित दिखाई दे सकता है, पर संरचनात्मक हिंसा उपस्थित रहती है।
इस दृष्टि से ‘कुरुक्षेत्र’ युद्ध का कारण मानव की अमूर्त ‘हिंसक प्रकृति’ में ही नहीं ढूँढ़ता। वह पूछता है कि लाभ कौन लेता है, किसके सुख के लिए शांति-व्यवस्था बनाई गई है और किनकी अस्थियों पर वह सुख टिका है। सत्ता अपने विशेषाधिकार को शांति, कानून और धर्म की भाषा में ढक सकती है। जो उस व्यवस्था को चुनौती देता है उसे अशांत, अपराधी या हिंसक कहा जा सकता है, जबकि मूल हिंसा संसाधनों और अधिकारों के अन्यायपूर्ण वितरण में होती है। दिनकर दलित और शोषित के प्रतिकार को स्वचालित पाप मानने से इनकार करते हैं। यह विचार औपनिवेशिक शासन और स्वाधीनता-संघर्ष की पृष्ठभूमि में अर्थवान था, पर आज भी वर्ग, जाति, भूमि, श्रम और राज्य-हिंसा की बहसों में प्रासंगिक है।
फिर भी दिनकर प्रतिकार को नैतिक छूट नहीं देते। युद्ध प्रारंभ होने पर धर्म-अधर्म की सीमाएँ टूटती हैं। गुरु-वध के लिए असत्य, समाधिस्थ योद्धा की हत्या, नियम-विरुद्ध प्रहार और प्रतिशोध की क्रूरता विजेता पक्ष को भी पाप से मुक्त नहीं रहने देती। युधिष्ठिर का प्रश्न इसलिए आवश्यक है कि न्यायपूर्ण उद्देश्य भी अनुचित साधनों से दूषित हो सकता है। काव्य में युद्ध का कोई पक्ष पूर्ण नैतिक पवित्रता नहीं बचा पाता। यह विचार आधुनिक ‘न्यायोचित युद्ध’ की बहस से मेल खाता है: युद्ध में प्रवेश का कारण न्यायपूर्ण होना पर्याप्त नहीं; युद्ध के साधन, अनुपात, नागरिक क्षति और युद्धोत्तर दायित्व भी नैतिक मूल्यांकन के विषय हैं।
दिनकर का भीष्म शक्ति की आवश्यकता बताते हुए भी क्रोध, ईर्ष्या और उन्माद के संक्रमण को पहचानता है। व्यक्तिगत विकार सामूहिक आकाश को जला सकते हैं; प्रचार, अपमान और भय समुदायों को उस युद्ध में धकेलते हैं जिसे आरंभ में बहुत कम लोग चाहते थे। इस बिंदु पर मिथकीय रणभूमि आधुनिक जन-राजनीति का रूपक बन जाती है। सत्ता केवल सेनाएँ नहीं चलाती; वह स्मृतियों, भावनाओं और पहचानों को संगठित करती है। नायकत्व इसलिए शत्रु पर प्रहार करने जितना सरल नहीं। सच्चा नेता वह होगा जो वैध प्रतिरोध और उन्मादी प्रतिशोध के बीच सीमा पहचान सके, सामूहिक पीड़ा को न्याय में बदले, घृणा में नहीं।
‘कुरुक्षेत्र’ राजतंत्र की आवश्यकता और उसकी निंदा दोनों को एक ही वैचारिक अनुक्रम में रखता है। युद्धोत्तर अराजकता में भीष्म कहते हैं कि अत्याचारियों को रोकने, परस्पर संघर्ष नियंत्रित करने और नीति स्थापित करने के लिए शासन चाहिए। पर उसी प्रसंग में राजतंत्र को “मलिन, निहीन प्रकृति”[6] का द्योतक कहा गया है। यह विरोधाभास असावधानी नहीं, राजनीतिक दर्शन की गंभीरता है। राज्य आवश्यक हो सकता है, पर उसकी आवश्यकता मानव समाज की नैतिक अपूर्णता का प्रमाण है; इसलिए राज्य को दैवी और असीमित अधिकार नहीं दिया जा सकता। शासन का औचित्य लोक-रक्षा में है, स्वामीत्व में नहीं। जिस क्षण राजनियम विचार को भी बाँधने लगे, सत्ता संस्कृति का कलंक बन जाती है।
युधिष्ठिर का राज्य-त्याग इसीलिए निजी पवित्रता और सार्वजनिक न्याय के संघर्ष का उदाहरण है। युद्ध में उसकी भूमिका से उत्पन्न ग्लानि वास्तविक है; लेकिन यदि वह सिंहासन छोड़कर वन चला जाए तो युद्ध से घायल जन किसके भरोसे रहेंगे? दिनकर तप और संन्यास के भारतीय आदर्श का सम्मान करते हुए कर्मभूमि की प्रधानता स्थापित करते हैं। सामाजिक नायकत्व आत्मा बचाने के लिए समाज से भागता नहीं; वह दूषित इतिहास के भीतर रहकर पुनर्निर्माण करता है। यहाँ गीता का निष्काम कर्म आधुनिक लोकसेवा में रूपांतरित होता है। निष्कामता का अर्थ परिणाम से उदासीनता नहीं, पद और भोग के निजी आकर्षण से मुक्त होकर पीड़ितों के प्रति उत्तरदायी होना है।
काव्य में विज्ञान की चर्चा मिथकीय पुनर्पाठ को बीसवीं शताब्दी की विश्व-स्थिति से जोड़ती है। मनुष्य ने प्रकृति की शक्तियों को नियंत्रित किया, दूरी घटाई और पदार्थ के रहस्य खोले, पर हृदय का विकास पीछे रह गया। बुद्धि और तकनीक यदि करुणा तथा न्याय से अलग हों तो वे विनाश की क्षमता बढ़ाती हैं। महाभारत का अस्त्र आधुनिक वैज्ञानिक युद्ध का प्रतीक बन जाता है। यह आलोचना विज्ञान-विरोध नहीं है; दिनकर विज्ञान के समतामूलक उपयोग की कल्पना करते हैं, जिससे श्रम का अपव्यय रुके और सुख-सुविधाएँ सबको मिलें। समस्या ज्ञान नहीं, ज्ञान पर असमान सत्ता और नैतिक चेतना से उसका विच्छेद है।
युद्ध और विज्ञान का यह संबंध आधुनिक नायकत्व की नई कसौटी देता है। प्राचीन वीर अधिक शक्तिशाली अस्त्र पाने की आकांक्षा रखता है; आधुनिक नायक को यह भी जानना है कि किस शक्ति का प्रयोग न करना चाहिए। संयम केवल दुर्बल की विवशता नहीं, समर्थ की नैतिक उपलब्धि है। दिनकर शक्ति और क्षमा के संबंध को बार-बार इसी अर्थ में रखते हैं। क्षमा तभी अर्थवान है जब उसके पीछे प्रतिकार की क्षमता हो, किंतु क्षमता होना प्रयोग की अनिवार्यता नहीं। शक्ति न्याय की रक्षा के लिए है; प्रतिष्ठा, विस्तार या प्रतिशोध के लिए उसका उपयोग नायकत्व को आसुरी बना देता है।
द्रौपदी का अपमान ‘कुरुक्षेत्र’ में युद्ध के नैतिक कारणों में प्रमुख है। सभा में उपस्थित पुरुष-सत्ता का मौन हिंसा को वैधता देता है। यह प्रसंग बताता है कि युद्ध केवल भूमि-विवाद से नहीं, संस्थागत मर्यादा के पतन से भी जन्मता है। जब राजसभा एक स्त्री की गरिमा की रक्षा नहीं करती, तब वह न्याय-संस्था रहने का अधिकार खो देती है। भीष्म, द्रोण और अन्य महापुरुषों की निष्क्रियता उनकी व्यक्तिगत महानता पर संरचनात्मक प्रश्न है। पद, प्रतिज्ञा और राजनिष्ठा यदि अन्याय के सामने मौन करा दें तो वे गुण नहीं रहते। दिनकर का मिथकीय पुनर्पाठ नायकत्व को ‘मैंने स्वयं अत्याचार नहीं किया’ की संकीर्ण नैतिकता से आगे ले जाता है; अन्याय रोकने की सामर्थ्य होते हुए मौन रहना भी उत्तरदायित्व है।
युद्धोत्तर दृश्य में स्त्रियाँ और बच्चे अदृश्य सैन्य गणना को मानवीय रूप देते हैं। विधवा का मिटा सिंदूर, पुत्रहीन माता और पितृहीन बालक विजय के आधिकारिक आख्यान को विखंडित करते हैं। राज्य इतिहास में विजेता का नाम लिखता है, पर काव्य उन लोगों की अनुपस्थिति दर्ज करता है जिनके जीवन से विजय की कीमत चुकाई गई। यह स्मृति-राजनीति का महत्त्वपूर्ण हस्तक्षेप है। नायक की कीर्ति तभी नैतिक हो सकती है जब उसमें पीड़ित की स्मृति शामिल हो। युधिष्ठिर की आँख इसलिए नायक की नई आँख है: वह मुकुट में चमकता सोना नहीं, रक्त की कीच देखती है।
लेकिन केवल शोक पर्याप्त नहीं। दिनकर का भीष्म दुःख को कर्म में बदलने की माँग करता है। युद्ध के कारण बनी विषमता को यदि युद्ध के बाद भी नहीं बदला गया तो बलिदान व्यर्थ होगा और नया संघर्ष जन्म लेगा। पुनर्निर्माण का अर्थ भवन, सेना और राजकोष की बहाली मात्र नहीं; सुख-भाग, विश्वास और मानवीय संबंधों का न्यायपूर्ण पुनर्वितरण है। इसी कारण ‘कुरुक्षेत्र’ का अंतिम राजनीतिक क्षितिज समता, स्नेह-सिंचित न्याय और मनुष्य-मनुष्य के उचित संबंध की कल्पना है। वीरता का चरम शत्रु-वध नहीं, ऐसी व्यवस्था बनाना है जिसमें अगला युद्ध अनिवार्य न हो।
‘कुरुक्षेत्र’ के भीतर गांधीवादी अहिंसा और क्रांतिकारी प्रतिरोध का संवाद भी सुना जा सकता है, किंतु किसी पात्र को सीधे किसी ऐतिहासिक व्यक्ति का मुखपत्र बना देना सरलीकरण होगा। दिनकर स्वयं अपने युग की बड़ी बहसों से जूझ रहे थे। उनके लिए व्यक्तिगत आत्मबल मूल्यवान है, पर सामूहिक उत्पीड़न के सामने केवल उपदेश अपर्याप्त हो सकता है। उसी समय वे शक्ति की पूजा से सावधान हैं, क्योंकि युद्ध मनुष्य के विवेक को नष्ट करता और साधनों को भ्रष्ट करता है। यह असमाप्त बहस काव्य की कमजोरी नहीं; आधुनिक नैतिकता की वास्तविक स्थिति है। अत्याचारी को रोका जाना चाहिए, पर रोकने वाला स्वयं अत्याचारी न बन जाए—नायकत्व इसी कठिन सीमा पर परखा जाता है।
इस प्रकार ‘कुरुक्षेत्र’ विजय-नायक को उत्तरदायी नायक में बदलता है। युधिष्ठिर की महानता सिंहासन पाने में नहीं, सिंहासन को नैतिक प्रश्न के अधीन करने में है; भीष्म की महत्ता अचूक नीति देने में नहीं, अपने समय और सहभागिता की विफलताओं से सीखकर सत्ता की संरचना खोलने में है। काव्य युद्ध का रोमानीकरण और निष्क्रिय शांति—दोनों अस्वीकार करता है। वह न्यायपूर्वक प्रतिकार, साधनों की मर्यादा, पीड़ितों की स्मृति, समान सुख-अधिकार और युद्धोत्तर लोकसेवा को नायकत्व के संयुक्त मानदंड बनाता है।
इस राजनीतिक विचार को लोकतंत्र की कसौटी पर पढ़ें तो ‘कुरुक्षेत्र’ राजा की सदाशयता से अधिक संस्थागत न्याय की आवश्यकता बताता है। एक धर्मनिष्ठ युधिष्ठिर अस्थायी रूप से अच्छा शासन दे सकता है, पर स्थायी शांति किसी एक श्रेष्ठ व्यक्ति पर निर्भर नहीं रह सकती। संसाधनों, अवसरों और निर्णय में सहभागिता की ऐसी व्यवस्था चाहिए जो अगला सुयोधन पैदा होने पर भी समाज को उसके स्वेच्छाचार से बचाए। दिनकर प्रत्यक्ष रूप से आधुनिक संविधान का सिद्धांत नहीं लिख रहे, किंतु सुख-भाग की समता, विचार की स्वतंत्रता और राजनियम द्वारा चिंतन को बाँधने की आलोचना लोकतांत्रिक दिशा रखती है। यहाँ नायक का सर्वोच्च कार्य अपनी पूजा कराना नहीं, ऐसी संस्थाएँ बनाना है जिनमें न्याय उसके निजी चरित्र पर निर्भर न रहे। इस अर्थ में नायकत्व अंततः अपने ही अनिवार्य होने की स्थिति समाप्त करता है।
भीष्म-युधिष्ठिर संवाद में पीढ़ियों का नैतिक संबंध भी निहित है। भीष्म पुरानी व्यवस्था के ज्ञान और दोष दोनों के प्रतिनिधि हैं; युधिष्ठिर नई सत्ता के उत्तराधिकारी हैं जो विरासत में विजय के साथ अपराध भी पाता है। नई पीढ़ी यदि केवल पूर्वजों को दोष दे तो अपने कर्म का दायित्व नहीं लेगी, और यदि उन्हें निष्कलंक पूजे तो उनकी भूल दुहराएगी। दिनकर का संवाद आलोचनात्मक परंपरा की राह सुझाता है—पूर्वज से ज्ञान लेना, पर प्रश्न का अधिकार न छोड़ना। मिथक की आधुनिक उपयोगिता भी यही है। परंपरा संग्रहालय में बंद पूज्य वस्तु नहीं, उत्तरदायित्वपूर्ण संवाद है। भीष्म का अनुभव तभी सार्थक है जब युधिष्ठिर उससे नई न्याय-व्यवस्था बनाए; युधिष्ठिर का पश्चात्ताप तभी सार्थक है जब वह केवल निजी ग्लानि न रहकर लोककल्याण में बदले।
‘कुरुक्षेत्र’ में प्रकृति, श्रम और भोग के संबंध को भी सत्ता-विमर्श में शामिल किया गया है। धरती के भीतर पर्याप्त विभव है, पर वैयक्तिक भोगवाद और संचय उसे सामूहिक सुख में बदलने से रोकते हैं। दिनकर के लिए अभाव केवल प्राकृतिक नियति नहीं; वह वितरण, स्वामित्व और श्रम-संबंध का परिणाम भी है। यह समझ युद्ध की व्याख्या को मनोवैज्ञानिक द्वेष से आगे आर्थिक-सामाजिक धरातल देती है। जब कुछ समूह शांति के लाभ भोगते और अन्य उसकी कीमत देते हैं, तब कानून की स्थिरता न्याय का प्रमाण नहीं। इसलिए नायकत्व दान देने वाले उदार राजा तक सीमित नहीं; वह ऐसी व्यवस्था के निर्माण में है जहाँ जीवनोपयोगी साधन अधिकार के रूप में उपलब्ध हों।
‘उर्वशी’ : पुरुष-वीरता से संबंधपरक नायकत्व तक
‘उर्वशी’ दिनकर की मिथकीय पुनर्व्याख्या को युद्ध और जाति से हटाकर इच्छा, प्रेम, देह, अध्यात्म और लैंगिक संबंधों के क्षेत्र में ले जाती है। इसका प्राचीन आख्यान ऋग्वैदिक संवाद से लेकर शतपथ ब्राह्मण, पुराणों और कालिदास के ‘विक्रमोर्वशीयम्’ तक अनेक रूपों में मिलता है। दिनकर का काव्य-नाटक 1961 में प्रकाशित हुआ और 1972 के ज्ञानपीठ सम्मान के लिए मान्य कृति बना। लेकिन इसका महत्व पुरस्कार से आगे है। यहाँ पुरूरवा केवल विजयी राजा नहीं, द्वंद्वग्रस्त मनुष्य है; उर्वशी केवल प्राप्त की जाने वाली अप्सरा नहीं, अपनी इच्छा और अस्तित्व का कथन करने वाली चेतना है; औशीनरी केवल बाधक पत्नी नहीं, पुरुष-नायक की निजी आध्यात्मिकता की सामाजिक कीमत का साक्ष्य है।
दिनकर अपनी भूमिका में पुरूरवा को इन्द्रिय-सुख से उद्वेलित और उससे आगे जाने को आकुल मनुष्य का प्रतीक बताते हैं, जबकि उर्वशी को कामनाओं का रूप मानते हैं। यह प्रतीक-योजना नायकत्व को बाहरी शत्रु से आंतरिक संघर्ष की ओर मोड़ती है। पुरूरवा रण में शत्रु जीत सकता है, पर अपनी इच्छा को आदेश नहीं दे सकता। उसका राजकीय अधिकार प्रेम में अप्रासंगिक हो जाता है; उर्वशी को पद, वंश या बल से प्राप्त नहीं किया जा सकता। इस विफलता में आधुनिक मनुष्य का संकट है: बाहरी दुनिया पर बढ़ते नियंत्रण के बावजूद वह अपने रक्त, स्मृति, आकांक्षा और अकेलेपन पर पूर्ण नियंत्रण नहीं रखता।
उर्वशी का कथन—“मैं देश-काल से परे चिरन्तन नारी हूँ”[7]—उसे किसी एक सामाजिक भूमिका में सीमित होने से रोकता है। वह अप्सरा, प्रेमिका, सौन्दर्य, कला, कामना और अंततः माता—अनेक रूपों में उपस्थित है। इसके तुरंत निकट उसका आत्मवर्णन “मैं आत्मतन्त्र यौवन की नित्य नवीन प्रभा”[8] स्त्री-इच्छा की स्वायत्तता को रेखांकित करता है। ‘आत्मतन्त्र’ विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है: उर्वशी पुरुष की संपत्ति या वैवाहिक संस्था का निष्क्रिय अंश नहीं होना चाहती। वह प्रेम करती है क्योंकि उसकी इच्छा है, न कि किसी राजाज्ञा या सामाजिक कर्तव्य से। इस अर्थ में दिनकर की मिथकीय नायिका आधुनिक स्त्री-अस्मिता की दिशा खोलती है।
फिर भी आलोचनात्मक दृष्टि को यह देखना चाहिए कि उर्वशी कई स्थानों पर ‘विश्वनर की अतृप्त इच्छा’ से उत्पन्न कल्पना के रूप में भी प्रस्तुत होती है। इससे स्त्री की स्वायत्तता और पुरुष की कल्पना में निर्मित स्त्री-रूप के बीच तनाव पैदा होता है। एक ओर वह स्वयं बोलती है; दूसरी ओर उसका सार्वभौम रूप पुरुष-कामना की प्रतिमा बन सकता है। दिनकर का पाठ इस विरोध को पूरी तरह हल नहीं करता। यही कारण है कि ‘उर्वशी’ को केवल स्त्री-मुक्ति का घोष अथवा केवल पुरुषवादी सौन्दर्य-पूजा कहना दोनों अधूरे निष्कर्ष होंगे। कृति की शक्ति इस अस्थिरता में है कि वह स्त्री को इच्छा का विषय और इच्छा करने वाला कर्ता—दोनों बनाती है।
पुरूरवा के नायकत्व की पहली परीक्षा प्रेम को स्वामित्व से अलग करने में है। राजा के रूप में वह अधिकार का अभ्यस्त है, पर प्रेम में दूसरे की स्वतंत्रता स्वीकार करनी पड़ती है। उसकी उत्कटता कभी-कभी उर्वशी को अपने अनुभव की सीढ़ी बनाने लगती है; वह देह से अतीन्द्रियता तक जाना चाहता है। उर्वशी उसकी आध्यात्मिक यात्रा का माध्यम नहीं, स्वयं एक पूर्ण अनुभवशील सत्ता है। जब पुरूरवा सौन्दर्य को भोग और आराधना के बीच समझना चाहता है, तब काव्य का प्रश्न उठता है—“रूप की आराधना का मार्ग आलिंगन नहीं है”[9]। यह निषेध देह-विरोध नहीं; देह को स्वामित्व और उपभोग तक सीमित करने का निषेध है। प्रेम का आरंभ शरीर से हो सकता है, किंतु उसका अर्थ दूसरे के व्यक्तित्व, स्वतंत्रता और रहस्य को स्वीकार किए बिना पूर्ण नहीं होता।
दिनकर का ‘कामाध्यात्म’ इसी बिंदु पर समझना चाहिए। यह काम का दमन कर अध्यात्म पाने की संन्यासी योजना नहीं, काम के अनुभव में निहित आत्म-अतिक्रमण की संभावना है। देह जन्मभूमि है, अंतिम सीमा नहीं। प्रेमी जब दूसरे को वस्तु के रूप में नहीं, अपने से परे स्वतंत्र अस्तित्व के रूप में अनुभव करता है, तभी देह से परे अर्थ खुलता है। लेकिन इस विचार की नैतिक कसौटी संबंध के दोनों पक्षों की समानता है। यदि पुरुष अपनी अनुभूति को आध्यात्मिक कहे और स्त्री के श्रम, पीड़ा या विकल्प को अनदेखा करे तो ‘कामाध्यात्म’ विशेषाधिकार की भाषा बन सकता है। औशीनरी की उपस्थिति इसी संभावित आत्मप्रवंचना को उजागर करती है।
औशीनरी ‘उर्वशी’ की नैतिक संरचना में केंद्रीय है, यद्यपि आकर्षण का केंद्र नहीं। वह पुरूरवा की पत्नी और प्रतिष्ठानपुर की महारानी है। राजा की उर्वशी-आकांक्षा केवल दो स्वतंत्र प्रेमियों का निजी प्रसंग नहीं; उसका प्रभाव उस स्त्री पर पड़ता है जो विवाह, राज्य और दाम्पत्य की संस्था में पहले से जुड़ी है। औशीनरी की पीड़ा प्रेमकथा के उत्सव को असुविधाजनक बनाती है। यदि उसे हटाकर केवल पुरूरवा और उर्वशी का उदात्त मिलन पढ़ा जाए तो पुरुष की इच्छा को स्वतंत्रता और पत्नी की वेदना को बाधा मानने का खतरा है। दिनकर उसे मौन छाया बनाकर पूरी तरह विस्मृत नहीं करते; उसकी व्यथा काव्य को पुरूरवा के संन्यास पर समाप्त नहीं होने देती—यह बात स्वयं कवि ने भूमिका में स्वीकार की है।
औशीनरी का चरित्र पूर्ण विद्रोही नहीं। वह पतिव्रता और राजमर्यादा से बँधी है, प्रत्यक्ष सत्ता को चुनौती नहीं देती। प्रारंभिक आलोचना ने इसी बिंदु पर देखा कि आधुनिक बुद्धिवादी युग पुरानी कथा की उस सहज स्वीकृति से संतुष्ट नहीं हो सकता जिसमें पत्नी पति को दूसरी स्त्री से मिलने की अनुमति देकर आदर्श घोषित हो। दिनकर औशीनरी को मनोवैज्ञानिक भाषा और प्रश्न देते हैं, पर उसे संस्थागत स्वायत्तता पूरी तरह नहीं देते। इस सीमा को दर्ज करना आवश्यक है। मिथकीय पुनर्व्याख्या अक्सर अपने युग से आगे भी जाती है और अपने युग की सीमाएँ भी वहन करती है। ‘उर्वशी’ स्त्री की इच्छा को अभूतपूर्व गरिमा देती है, पर विवाह के भीतर स्त्री के समान अधिकार की आधुनिक राजनीतिक भाषा तक हर जगह नहीं पहुँचती।
सुकन्या इस कृति में भिन्न प्रकार की स्त्री-शक्ति का प्रतिनिधित्व करती है। वह च्यवन की सहधर्मिणी और आश्रम-जीवन की सहभागी है; मातृत्व, देखभाल और संतुलन का उसका अनुभव उर्वशी की मुक्त कामना तथा औशीनरी की दाम्पत्य पीड़ा के बीच तीसरा मार्ग प्रस्तुत करता है। उर्वशी का नवजात आयु उसके संरक्षण में है। इससे मातृत्व जैविक संबंध से विस्तृत होकर पालन और उत्तरदायित्व का संबंध बनता है—वैसा ही प्रश्न ‘रश्मिरथी’ में राधा और कुन्ती के बीच था। दिनकर की तीनों कृतियों में जन्म और पालन का अंतर नायक की अस्मिता को पुनर्परिभाषित करता है। रक्त पहचान का एक तत्व है, संपूर्ण सत्य नहीं।
आयु का जन्म प्रेम को निजी तृप्ति से सामाजिक समय में प्रवेश कराता है। प्रेमी युगल का अनुभव अब संतान, उत्तराधिकार, राज्य और भविष्य से जुड़ता है। उर्वशी माता बनकर पृथ्वी की पीड़ा और काल का अनुभव करती है; उसकी कथित द्वंद्व-मुक्त देवत्वस्थिति भंग होती है। यह परिवर्तन स्त्री को केवल मातृत्व में पूर्ण मानने का रूढ़ सूत्र नहीं होना चाहिए। अधिक उपयुक्त अर्थ यह है कि संबंध का परिणाम उत्तरदायित्व उत्पन्न करता है। इच्छा स्वतंत्र हो सकती है, पर उसके प्रभावों से कोई पूर्णतः स्वतंत्र नहीं। नायकत्व अपनी कामना स्वीकार करने के साथ उससे जन्मे जीवन और पीड़ा की जिम्मेदारी स्वीकार करना भी है।
पुरूरवा के भीतर राजा, प्रेमी, पति और साधक की भूमिकाएँ टकराती हैं। राजपुरुष के लिए उत्तराधिकार और शासन अनिवार्य हैं; प्रेमी के लिए उर्वशी अद्वितीय है; पति के रूप में औशीनरी के प्रति दायित्व है; साधक देह से ऊपर उठना चाहता है। कोई एक भूमिका अन्य सभी को मिटा नहीं सकती। आधुनिक मनुष्य भी पेशागत, पारिवारिक, नागरिक और निजी पहचानों के बीच इसी प्रकार विभाजित है। दिनकर का मिथकीय नायक इसलिए प्रासंगिक है कि वह समग्र और स्थिर नहीं, भूमिकाओं का संघर्षशील संयोग है। उसकी विफलता बताती है कि निजी प्रामाणिकता का दावा दूसरों के प्रति दायित्व से मुक्त नहीं करता।
संन्यास का निर्णय पुरूरवा की अंतिम विजय नहीं, अस्पष्ट नैतिक परिणति है। एक ओर वह राजसत्ता आयु को सौंपकर विरक्ति की ओर जाता है; इसे इच्छा से आत्मोन्नयन माना जा सकता है। दूसरी ओर यह प्रश्न रहता है कि क्या संन्यास संबंधों से उत्पन्न पीड़ा और उत्तरदायित्व से पलायन है। दिनकर की भूमिका स्वयं समाधान देने से संकोच करती है; कविता की भूमि दर्द और बेचैनी को जानती है, अंतिम नीति-सूत्र देना उसका कार्य नहीं। इसीलिए पुरूरवा का संन्यास पाठक को आश्वस्त करने के बजाय औशीनरी की व्यथा और उर्वशी के वियोग के साथ खुला रहता है। मिथकीय नायक अंत में भी नैतिक रूप से अपूर्ण है।
‘उर्वशी’ में सत्ता राजसिंहासन तक सीमित नहीं। सौन्दर्य स्वयं शक्ति है; दृष्टि और आकर्षण पुरुष-वीरता को असहाय कर सकते हैं। पुरुष जिस स्त्री को भोग्य मानता है, उसी के सामने उसका आत्मविश्वास टूटता है। लेकिन सौन्दर्य की शक्ति भी सामाजिक सत्ता का सरल विकल्प नहीं। अप्सरा की स्वतंत्रता दैवी लोक की संरचना से नियंत्रित है, पत्नी की स्थिति विवाह से, माता की स्थिति संतान और वियोग से। दिनकर दिखाते हैं कि इच्छा मुक्ति देती और बाँधती दोनों है। इसलिए स्त्री-अस्मिता को केवल आकर्षण की विजय में नहीं, अपने निर्णय, वाणी और पीड़ा की मान्यता में पढ़ना चाहिए।
उर्वशी का आत्मतंत्र आधुनिक स्वायत्तता है, पर उसका ‘चिरन्तन नारी’ रूप सावधानी माँगता है। ‘सनातन नारी’ या ‘सनातन पुरुष’ जैसी प्रतीकात्मक संज्ञाएँ सार्वभौम मानवीय अनुभव पकड़ती हैं, किंतु वे ऐतिहासिक स्त्रियों की विविधता को एक आदर्श रूप में समेट सकती हैं। जाति, वर्ग, विवाह, मातृत्व और श्रम की स्थितियाँ सभी स्त्रियों के अनुभव समान नहीं रहने देतीं। कृति के भीतर औशीनरी, सुकन्या, मेनका, चित्रलेखा और उर्वशी की भिन्नता स्वयं इस सार्वभौमकरण का प्रतिवाद है। अतः उर्वशी को समस्त नारी का अंतिम सत्य न मानकर स्त्री-इच्छा और सौन्दर्य का एक शक्तिशाली मिथकीय रूप समझना अधिक न्यायपूर्ण होगा।
‘रश्मिरथी’ और ‘उर्वशी’ के बीच एक रोचक समांतर है। कर्ण अपनी पहचान जन्म देने वाली कुन्ती के बजाय पालने वाली राधा और मान्यता देने वाले दुर्योधन से बनाता है; आयु की पहचान भी उर्वशी, पुरूरवा और सुकन्या के बहुस्तरीय संबंध में विकसित होती है। दोनों कृतियाँ बताती हैं कि व्यक्ति की अस्मिता जैविक मूल से अधिक सामाजिक संबंधों की निर्मिति है। अंतर यह है कि कर्ण का पालन उसे निम्न सामाजिक स्थिति देता है, जबकि आयु का पालन आश्रम और राजवंश के बीच सेतु बनता है। दिनकर इस तरह मातृत्व और वंश को नियति न मानकर इतिहास तथा विकल्प से जोड़ते हैं।
‘कुरुक्षेत्र’ और ‘उर्वशी’ के बीच भी गहरा संबंध है। पहले काव्य में मनुष्य बाह्य शक्ति और विज्ञान पर अधिकार पाकर भी हृदय में पिछड़ा है; दूसरे में वही मनुष्य देह और मन के रहस्य के सामने असहाय है। दोनों में नायकत्व नियंत्रण की मात्रा से नहीं, नियंत्रण की सीमा पहचानने से बनता है। युधिष्ठिर को स्वीकारना पड़ता है कि विजय शुद्ध नहीं; पुरूरवा को स्वीकारना पड़ता है कि इच्छा को संपत्ति नहीं बनाया जा सकता। एक में करुणा राजनीति को मानवीय बनाती है, दूसरे में दूसरे की स्वतंत्रता प्रेम को मानवीय बनाती है।
लैंगिक दृष्टि से दिनकर की उपलब्धि और सीमा को साथ पढ़ना ही प्रामाणिक आलोचना है। उपलब्धि यह कि उन्होंने काम और देह को पाप या मौन का विषय नहीं माना; स्त्री की कामना को भाषा दी; औशीनरी की पीड़ा तथा सुकन्या के अनुभव को कथा में स्थान दिया; प्रेम को मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक समस्या बनाया। सीमा यह कि अनेक स्थानों पर स्त्री पुरुष की आत्मोन्नति, सौन्दर्य-दृष्टि या सार्वभौम कामना का प्रतीक बन जाती है; सामाजिक अधिकार की ठोस राजनीति अपेक्षाकृत कम विकसित है। यह द्वंद्व स्वयं आधुनिक हिन्दी साहित्य के संक्रमण का साक्ष्य है।
‘उर्वशी’ इस प्रकार वीरता की परिभाषा बदलती है। यहाँ शस्त्र चलाना पर्याप्त नहीं; इच्छा की सच्चाई स्वीकारना, दूसरे की स्वतंत्रता मानना, संबंधों की कीमत देखना, मातृत्व और पालन के श्रम को पहचानना और अपूर्ण समाधान के साथ जीना भी साहस है। पुरूरवा का नायकत्व उसकी विजय में नहीं, उसके विभाजन में दिखाई देता है; उर्वशी का नायकत्व उसकी अप्राप्यता में नहीं, उसके आत्मकथन में; औशीनरी का नैतिक महत्व उसके त्याग के आदर्शीकरण में नहीं, उस मौन प्रश्न में है जो पुरुष-केंद्रित आध्यात्मिकता से अपना हिसाब माँगता है।
प्राचीन आख्यान के साथ तुलना करने पर दिनकर की आधुनिकता और स्पष्ट होती है। ऋग्वैदिक संवाद में उर्वशी और पुरूरवा का संबंध वियोग, शर्त और असमान लोकों की दूरी से चिह्नित है; कालिदास का ‘विक्रमोर्वशीयम्’ राजकीय प्रेम, विरह और पुनर्मिलन को नाटकीय विस्तार देता है। दिनकर इन सांस्कृतिक स्मृतियों को लेते हैं, किंतु उनका केंद्र मनोवैज्ञानिक और दार्शनिक संवाद बनता है। वे पात्रों को आधुनिक शब्दावली का मुखौटा मात्र नहीं पहनाते; मिथक की मूल तनाव-रेखा—नश्वर और अमर, पृथ्वी और स्वर्ग, देह और अतीन्द्रियता—को बनाए रखते हुए उसमें स्वायत्त इच्छा, दाम्पत्य की पीड़ा और मातृत्व का उत्तरदायित्व जोड़ते हैं। इसीलिए पुनर्व्याख्या का अर्थ मूल कथा से मनमाना विच्छेद नहीं, उसकी सुप्त संभावनाओं का नए ऐतिहासिक संदर्भ में प्रस्फुटन है।
उर्वशी और औशीनरी को एक-दूसरे की प्रतिद्वंद्वी स्त्रियाँ बनाकर पढ़ना पुरुष-केंद्रित कथा की पुनरावृत्ति होगी। दोनों पर भिन्न संस्थागत दबाव हैं। उर्वशी की समस्या इच्छा को स्वतंत्र रखना है; औशीनरी की समस्या उस विवाह और राज्य में अपनी गरिमा बचाना है जहाँ पति का अधिकार उससे अधिक है। एक की स्वतंत्रता दूसरी की पीड़ा पर खड़ी दिखाई दे तो नैतिक प्रश्न पुरुष की जवाबदेही का है, स्त्रियों की परस्पर ईर्ष्या का नहीं। सुकन्या इस द्वंद्व को देखभाल और विवेक के धरातल पर रखती है। इस त्रिकोण से स्त्री-अस्मिता के कम-से-कम तीन रूप उभरते हैं—कामना का स्वत्व, दाम्पत्य में सम्मान और पालन का उत्तरदायित्व। इन्हें परस्पर विरोधी आदर्श न मानकर समान गरिमा वाले अनुभवों के रूप में पढ़ना दिनकर के पाठ की समकालीन संभावना है।
पुरूरवा की आध्यात्मिक बेचैनी की आलोचना करते समय उसके मानवीय सत्य को भी बचाना चाहिए। इच्छा का अतिक्रमण चाहना हमेशा पाखंड नहीं; मनुष्य वास्तव में सीमित अनुभव में असीम अर्थ खोजता है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब वह दूसरे व्यक्ति को अपनी मुक्ति का साधन समझ ले। दिनकर का काव्य इस सीमा पर बार-बार ठहरता है। प्रेम में आत्म-विसर्जन है, पर दूसरे का विलय नहीं; निकटता है, पर भिन्नता समाप्त नहीं होती। आधुनिक सहमति-आधारित संबंध-नीति की भाषा में कहें तो प्रेम की ऊँचाई अधिकार कम और उत्तरदायित्व अधिक करती है। नायक वह है जो अपनी तीव्र इच्छा को सत्य मानता है, पर उसे दूसरे पर आदेश नहीं बनाता।
समेकित निष्कर्ष
दिनकर के मिथकीय पुनर्पाठ में नायकत्व का पहला परिवर्तन वंश से कर्म की ओर है। कर्ण का संघर्ष स्पष्ट करता है कि जन्म, कुल और सामाजिक लेबल मनुष्य की क्षमता तथा गरिमा निर्धारित नहीं कर सकते। किंतु कर्म का अर्थ केवल युद्ध-कौशल नहीं; चरित्र, दान, करुणा, आत्मसम्मान और उत्तरदायित्व भी है। दिनकर जन्माधारित अभिजातता के विरुद्ध अर्जित अभिजातता रखते हैं, फिर उसे भी नैतिक आलोचना के अधीन करते हैं। शक्तिशाली और प्रतिभाशाली होना न्यायपूर्ण होने की गारंटी नहीं।
दूसरा परिवर्तन विजय से उत्तरदायित्व की ओर है। ‘कुरुक्षेत्र’ विजेता को इतिहास का स्वामी नहीं, इतिहास के मृतकों के प्रति जवाबदेह व्यक्ति बनाता है। युद्ध के औचित्य का प्रश्न उसके परिणाम से अलग नहीं। न्याय के लिए प्रतिकार आवश्यक हो सकता है, पर न्यायपूर्ण समाज बनाने में असफल विजय नया युद्ध तैयार करती है। इसलिए नायकत्व का अंतिम लक्ष्य रण में जीतना नहीं, शोषण और अपमान की उन संरचनाओं को बदलना है जो रण को जन्म देती हैं।
तीसरा परिवर्तन बाह्य नियंत्रण से आत्मालोचन की ओर है। कर्ण, युधिष्ठिर, भीष्म और पुरूरवा सभी शक्तिशाली हैं, पर उनकी महानता तब खुलती है जब शक्ति की सीमा और अपने निर्णय का दोष सामने आता है। आधुनिक राजनीतिक संस्कृति प्रायः नायक को अचूक, सर्वज्ञ और निष्कलंक बनाती है। दिनकर का मिथक इस व्यक्तिपूजा का प्रतिरोध करता है। उनका नायक त्रुटि करता है, पक्ष चुनता है, ऋण में बँधता है, पश्चात्ताप करता है और कभी-कभी समाधान तक नहीं पहुँचता। नैतिक परिपक्वता दोषहीनता नहीं, दोष का बोध है।
चौथा परिवर्तन एकाकी पुरुष-वीरता से संबंधपरक नायकत्व की ओर है। कर्ण को राधा, अधिरथ, दुर्योधन, कुन्ती, कृष्ण और अर्जुन के संबंधों से अलग समझा नहीं जा सकता। युधिष्ठिर का धर्म मृत सैनिकों, विधवाओं, अनाथों और प्रजा के प्रति उत्तरदायित्व में अर्थ पाता है। पुरूरवा का प्रेम उर्वशी, औशीनरी, आयु और सुकन्या के जीवन को प्रभावित करता है। नायक स्वयं-निर्मित स्वतंत्र इकाई नहीं; वह दूसरों से प्राप्त मान्यता, प्रेम, श्रम और पीड़ा से बनता है। इसीलिए उसके निर्णय का नैतिक मूल्य भी संबंधों में आँका जाना चाहिए।
पाँचवाँ परिवर्तन सत्ता की व्यक्तिगत छवि से संरचनात्मक समझ की ओर है। दुर्योधन अन्यायी व्यक्ति है, पर अन्याय केवल उसकी प्रकृति नहीं; राजवंश, जाति, गुरु-सत्ता, संपत्ति और सभा की संस्थाएँ भी उसे संभव बनाती हैं। महाभारत का युद्ध पाँच व्यक्तियों के क्रोध से अधिक असमान शांति की परिणति है। पुरूरवा की दुविधा निजी है, पर विवाह, राजत्व और पुरुष-विशेषाधिकार उसे आकार देते हैं। दिनकर के यहाँ सत्ता तलवार के साथ नामकरण, मौन, शिक्षा-निषेध, संरक्षण, उपकार और सौन्दर्य-दृष्टि में भी काम करती है।
सामाजिक अस्मिता के संदर्भ में कर्ण दिनकर की सबसे बड़ी उपलब्धि है, क्योंकि वह बहिष्कृत मनुष्य की गरिमा को सांस्कृतिक केंद्र में लाता है। फिर भी समकालीन पाठ को कर्ण की वीरता से आगे जाकर उन लोगों को भी देखना चाहिए जो ‘भुजबल’ की भाषा में स्वयं को सिद्ध नहीं कर सकते। समानता का आधुनिक सिद्धांत क्षमता-प्रदर्शन पर निर्भर नहीं, मनुष्य होने की गरिमा पर आधारित है। दिनकर का पाठ इस दिशा में खुलता है, विशेषतः जब वह दया, धर्म और शील को श्रेष्ठता से जोड़ता है; आज की आलोचना उस संभावना को अधिक समावेशी बना सकती है।
लैंगिक अस्मिता के संदर्भ में ‘उर्वशी’ स्त्री की इच्छा और देह को वैध काव्य-विषय बनाती है, पर ‘चिरन्तन नारी’ की अवधारणा को ऐतिहासिक स्त्री-अनुभवों के साथ संतुलित करना आवश्यक है। उर्वशी की स्वतंत्रता, औशीनरी की उपेक्षा और सुकन्या की उत्तरदायी उपस्थिति मिलकर एकल स्त्री-प्रतिमा को तोड़ती हैं। इस बहुस्वर को आगे बढ़ाने पर कृति पुरुष की आध्यात्मिक खोज भर नहीं रहती; वह प्रेम में न्याय का प्रश्न बनती है।
नैतिक द्वंद्व दिनकर के नायकत्व का दोष नहीं, उसका केंद्रीय मूल्य है। कर्ण के लिए निष्ठा और न्याय साथ नहीं चलते; युधिष्ठिर के लिए धर्मयुद्ध और निष्पाप विजय संभव नहीं; भीष्म के लिए प्रतिज्ञा और न्याय टकराते हैं; पुरूरवा के लिए प्रेम, दाम्पत्य, राज्य और संन्यास एक-दूसरे को काटते हैं। इन पात्रों की त्रासदी बताती है कि वास्तविक नैतिक जीवन में सभी अच्छे मूल्यों को एक साथ बचाना संभव नहीं होता। चुनाव किसी मूल्य की क्षति करता है। नायक वह नहीं जो इस क्षति को छिपा दे, बल्कि वह जो उसकी कीमत पहचाने।
आज के संदर्भ में ‘रश्मिरथी’ शैक्षणिक और संस्थागत अवसर की समानता, जातिगत सम्मान और प्रतिनिधित्व की राजनीति पर विचार कराती है। वह चेतावनी देती है कि अपमानित प्रतिभा को न्याय न मिलने पर अन्यायी शक्ति उसका संरक्षण करके उसे अपना सबसे समर्पित सहयोगी बना सकती है। समावेशन यदि सार्वभौम नियम न बने और व्यक्तिगत कृपा बना रहे तो वह मुक्ति से अधिक राजनीतिक बंधन उत्पन्न करता है।
‘कुरुक्षेत्र’ वर्तमान विश्व में युद्ध, राष्ट्रवाद, असमानता और तकनीकी शक्ति के बीच संबंध समझने में सहायक है। केवल युद्ध-विराम शांति नहीं, यदि अपमान और संसाधन-असमानता बनी रहे। साथ ही न्याय की भाषा युद्ध में प्रत्येक साधन को वैध नहीं कर सकती। दिनकर की द्वंद्वात्मकता हमें सुरक्षा और स्वतंत्रता, प्रतिकार और संयम, राष्ट्रीय हित और मानवता के बीच कठिन संतुलन की याद दिलाती है।
‘उर्वशी’ डिजिटल उपभोग, दृश्य-संस्कृति और संबंधों के वस्तुकरण के युग में प्रेम और देह की नैतिकता पर पुनर्विचार कराती है। सौन्दर्य का अनुभव अधिकार नहीं देता; इच्छा की प्रामाणिकता दूसरे की सहमति और स्वतंत्रता को समाप्त नहीं करती; निजी आत्म-सिद्धि दूसरों की पीड़ा से अलग नहीं हो सकती। इस आधुनिक विस्तार में दिनकर का कामाध्यात्म स्वामित्व से मुक्त, संवादपूर्ण और उत्तरदायी प्रेम की माँग बन सकता है।
दिनकर की भाषा ओज, संवाद, सूक्ति और भावावेग से बनी है। यही लोकप्रियता कभी-कभी उनकी जटिलता पर पर्दा डाल देती है, क्योंकि एक-दो पंक्तियाँ संदर्भ से काटकर निश्चित राजनीतिक नारा बन जाती हैं। प्रामाणिक अध्ययन के लिए आवश्यक है कि शक्ति की पंक्ति के साथ करुणा, युद्ध के औचित्य के साथ पश्चात्ताप, कर्ण की सामाजिक पीड़ा के साथ उसकी नैतिक सहभागिता और उर्वशी की स्वतंत्रता के साथ औशीनरी की व्यथा भी पढ़ी जाए। दिनकर का वास्तविक स्वर किसी एक उद्धरण में नहीं, विरोधी स्वरों के संवाद में है।
शिक्षण और शोध के स्तर पर भी यह समग्र पठन आवश्यक है। यदि ‘रश्मिरथी’ से केवल जाति-विरोधी सूक्तियाँ, ‘कुरुक्षेत्र’ से केवल शक्ति-समर्थक पंक्तियाँ और ‘उर्वशी’ से केवल प्रेम-दर्शन चुना जाए तो प्रत्येक कृति आधी रह जाती है। कक्षा में प्रसंग, वक्ता, श्रोता, निर्णय और परिणाम को साथ पढ़ना चाहिए। उद्धरण किस पात्र ने किस परिस्थिति में कहा, बाद की घटना उस कथन की पुष्टि करती है या विडंबना—इन प्रश्नों से विद्यार्थी मिथक को जीवित बहस की तरह समझ सकते हैं। शोध में भी लोकप्रिय स्मृति और मूल पाठ के बीच अंतर करना, संस्करणों की जाँच करना तथा OCR पाठ को मुद्रित प्रति से मिलाना अनिवार्य है। दिनकर की अत्यधिक उद्धरणीयता प्रामाणिक पाठ-संपादन की आवश्यकता और बढ़ाती है।
इन कृतियों का एक साझा नैतिक व्याकरण ‘मर्यादा’ है, पर दिनकर के यहाँ मर्यादा स्थिर सामाजिक नियम नहीं। जाति-व्यवस्था स्वयं को मर्यादा कहती है, फिर भी कर्ण के संदर्भ में वह अन्याय है; राजनिष्ठा मर्यादा है, पर द्रौपदी-अपमान के सामने मौन उसे अधर्म बनाता है; दाम्पत्य मर्यादा है, पर पत्नी की अस्मिता मिटाकर वह न्यायपूर्ण नहीं रह सकती। इसलिए मर्यादा का मूल्य उसके प्राचीन होने से नहीं, मानवीय गरिमा और लोकमंगल की रक्षा से तय होगा। यही कसौटी दिनकर की परंपरा-निष्ठा को रूढ़िवाद से अलग करती है। वे मिथक को बचाते हुए उसके भीतर के अन्याय को चुनौती देते हैं।
अतः कहा जा सकता है कि दिनकर मिथकीय नायक को आधुनिक नागरिक, सामाजिक बहिष्कृत, उत्तरदायी शासक और इच्छामय मनुष्य में पुनर्जन्म देते हैं। उनके नायक दैवी ऊँचाई से उतरते हैं, पर तुच्छ नहीं होते; वे अधिक मानवीय और इसलिए अधिक कठिन बनते हैं। सत्ता उन्हें गढ़ती है, अस्मिता उन्हें प्रतिरोध देती है और नैतिक द्वंद्व उनकी सीमाएँ खोलता है। ‘रश्मिरथी’, ‘कुरुक्षेत्र’ और ‘उर्वशी’ का संयुक्त संदेश किसी सरल वीर-पूजा में नहीं, इस आग्रह में है कि शक्ति को न्याय, पहचान को करुणा, निष्ठा को विवेक, प्रेम को समानता और विजय को उत्तरदायित्व के अधीन होना चाहिए। यही दिनकर के मिथकीय नायकत्व की सबसे आधुनिक और स्थायी पुनर्व्याख्या है।
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स्रोत-संबंधी टिप्पणी
मूल काव्य-पंक्तियों के पाठ में ऑनलाइन OCR प्रतियों में अनेक अशुद्धियाँ थीं। उद्धृत अंशों का वर्तनी-संशोधन स्कैन की दृश्य प्रति तथा एक से अधिक उपलब्ध पाठों से मिलान करके किया गया है। ‘रश्मिरथी’ के प्रकाशन-वर्ष को कुछ ऑनलाइन सूचीकरण 1951 और अधिकांश मानक परिचय 1952 बताते हैं; यहाँ कृति की भूमिका में दिए संवत् 2009 तथा प्रचलित ग्रंथ-सूचियों के आधार पर 1952 ग्रहण किया गया है। विश्लेषण में किसी अप्रमाणित जीवनी-कथा का उपयोग नहीं किया गया।
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