हिन्दी सिनेमा में भारतबोध और सांस्कृतिक चेतना
परंपरा, अस्मिता और बदलते भारतीय समाज का अध्ययन
सारांश
हिन्दी सिनेमा आधुनिक भारत की सांस्कृतिक यात्रा का एक महत्वपूर्ण दृश्य अभिलेख है। उसने केवल मनोरंजन नहीं किया, बल्कि भारतीय समाज के स्वप्न, संघर्ष, अंतर्विरोध, स्मृतियाँ, परंपराएँ, आधुनिकता की आकांक्षाएँ और राष्ट्रीय अस्मिता को भी निरंतर अभिव्यक्त किया है। भारतीय सिनेमा की विशेषता उसकी भाषायी और सांस्कृतिक बहुलता है। इस बहुभाषिक परिवेश में हिन्दी सिनेमा ने एक ऐसे साझा सांस्कृतिक मंच की भूमिका निभाई है, जिस पर राष्ट्र, परिवार, गाँव, शहर, किसान, मजदूर, स्त्री, युवा, प्रवासी भारतीय, धर्म, जाति, भाषा, लोक-संस्कृति और आधुनिकता से जुड़े प्रश्न बार-बार सामने आते रहे हैं। प्रस्तुत आलेख में ‘भारतबोध’ को संकीर्ण राजनीतिक राष्ट्रवाद का पर्याय न मानकर भारत की ऐतिहासिक स्मृति, सांस्कृतिक बहुलता, सामाजिक संवेदना, लोकजीवन, आध्यात्मिक परंपरा, सह-अस्तित्व और निरंतर परिवर्तनशील सामूहिक पहचान के रूप में समझने का प्रयास किया गया है। दो बीघा ज़मीन, मदर इंडिया, नया दौर, उपकार, पूरब और पश्चिम, शोले, लगान, स्वदेस, रंग दे बसंती, चक दे! इंडिया, पीपली लाइव, न्यूटन और आर्टिकल 15 जैसी फिल्मों के संदर्भ में यह आलेख दिखाता है कि हिन्दी सिनेमा में भारतबोध स्थिर अवधारणा नहीं रहा; प्रत्येक ऐतिहासिक दौर ने उसे नए अर्थ दिए हैं।
बीज शब्द
हिन्दी सिनेमा, भारतबोध, भारतीयता, सांस्कृतिक चेतना, राष्ट्रीय अस्मिता, लोक-संस्कृति, सामाजिक परिवर्तन, वैश्वीकरण, प्रवासी भारतीय, सांस्कृतिक विविधता।
1. प्रस्तावना
सिनेमा बीसवीं और इक्कीसवीं शताब्दी के सबसे प्रभावशाली सांस्कृतिक माध्यमों में से एक है। साहित्य शब्दों के माध्यम से जिस समाज को निर्मित करता है, सिनेमा उसे दृश्य, ध्वनि, संगीत, संवाद, अभिनय और तकनीक के सम्मिलित प्रभाव से हमारे सामने उपस्थित करता है। यही कारण है कि किसी देश के सिनेमा को केवल उसकी मनोरंजन-व्यवस्था के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है। फिल्मों में उस देश की सामाजिक संरचना, राजनीतिक आकांक्षाएँ, सांस्कृतिक स्मृतियाँ और बदलती जीवन-दृष्टि भी दिखाई देती है।
भारत के संदर्भ में यह भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत स्वयं में अनेक भाषाओं, धर्मों, जातीय समुदायों, लोक-परंपराओं, भौगोलिक क्षेत्रों और जीवन-पद्धतियों वाला विशाल सांस्कृतिक भूगोल है। जिसे हम सामान्यतः ‘भारतीय सिनेमा’ कहते हैं, वह वस्तुतः अनेक सिनेमाई परंपराओं का समुच्चय है। हिन्दी सिनेमा उनमें एक अत्यंत प्रभावशाली धारा है। इसलिए हिन्दी सिनेमा के भारतबोध की चर्चा करते हुए यह ध्यान रखना आवश्यक है कि हिन्दी सिनेमा स्वयं सम्पूर्ण भारतीय सिनेमा नहीं है; वह भारतीय सिनेमाई बहुलता का एक बड़ा और प्रभावशाली हिस्सा है।
2. भारतबोध : अवधारणा और अर्थ
‘भारतबोध’ शब्द को समझने के लिए ‘भारत’ और ‘बोध’ दोनों को साथ समझना आवश्यक है। यहाँ भारत केवल भौगोलिक सीमा नहीं है। भारत एक ऐतिहासिक अनुभव, सभ्यतागत स्मृति, सांस्कृतिक बहुलता और साझा सामाजिक जीवन भी है। ‘बोध’ का आशय उस अनुभव की चेतना से है। इस दृष्टि से भारतबोध को ऐतिहासिक स्मृति, सांस्कृतिक पहचान, सामाजिक अनुभव और राष्ट्रीय चेतना—इन चार स्तरों पर समझा जा सकता है। हिन्दी सिनेमा ने अलग-अलग समय में भारत को अलग रूपों में देखा है। कभी भारत किसान की भूमि है, कभी त्यागमयी माँ; कभी औद्योगीकरण की ओर बढ़ता आधुनिक राष्ट्र; कभी पश्चिमी प्रभाव से जूझती संस्कृति; कभी खेल के मैदान में एक साथ खड़े विभिन्न प्रदेशों के नागरिक; और कभी भ्रष्ट व्यवस्था से सवाल पूछता युवा।
3. सिनेमा : भारतीय समाज की दृश्य स्मृति
फिल्में अपने निर्माण-काल की मानसिकता को संरक्षित करती हैं। इसीलिए पुरानी फिल्मों को आज देखने पर केवल कहानी नहीं दिखाई देती; उस समय के वस्त्र, मकान, सड़कें, भाषिक व्यवहार, सामाजिक संबंध, लैंगिक भूमिकाएँ और राजनीतिक वातावरण भी दिखाई देते हैं। 1950 का दशक भारत के लिए राष्ट्र-निर्माण का समय था। स्वतंत्रता प्राप्त हो चुकी थी, पर विभाजन का आघात ताजा था। गरीबी, विस्थापन, बेरोजगारी, जमींदारी, ग्रामीण संकट और औद्योगीकरण जैसी समस्याएँ सामने थीं। साथ ही आधुनिक लोकतांत्रिक राष्ट्र बनने का उत्साह भी था। इसलिए इस दौर का हिन्दी सिनेमा आशा और संकट दोनों को साथ लेकर चलता है।
4. दो बीघा ज़मीन : मिट्टी, किसान और विस्थापन का भारत
बिमल रॉय की दो बीघा ज़मीन (1953) भारतबोध की चर्चा में अत्यंत महत्वपूर्ण फिल्म है। इसका नायक शंभू केवल एक किसान नहीं है। उसकी भूमि के साथ जुड़ा संबंध उस भारतीय ग्रामीण सभ्यता का प्रतिनिधित्व करता है जिसमें जमीन आर्थिक संपत्ति होने के साथ स्मृति, सम्मान और अस्तित्व भी है। औद्योगीकरण के विस्तार के कारण किसान की जमीन संकट में पड़ती है और वह शहर जाकर रिक्शा चलाने को विवश होता है। इस प्रकार फिल्म गाँव और शहर, कृषि और उद्योग, श्रम और पूँजी तथा परंपरा और आधुनिक विकास के बीच तनाव को सामने लाती है। यहाँ भारतबोध केवल गौरव का आख्यान नहीं है; वह पीड़ा का बोध भी है।
5. मदर इंडिया : राष्ट्र, मातृत्व और नैतिकता
मेहबूब खान की मदर इंडिया (1957) हिन्दी सिनेमा में भारत की सबसे प्रभावशाली प्रतीकात्मक प्रस्तुतियों में से एक है। राधा का चरित्र माँ, धरती, श्रम, नैतिकता और राष्ट्र के अनेक अर्थों को एक साथ धारण करता है। वह गरीबी से संघर्ष करती है, खेत में श्रम करती है, परिवार की रक्षा करती है और विपरीत परिस्थितियों के बावजूद अपने नैतिक मूल्यों से समझौता नहीं करती। परंतु आज इस फिल्म को आलोचनात्मक दृष्टि से पढ़ना भी आवश्यक है। राधा के माध्यम से स्त्री को त्याग और सहनशीलता के आदर्श में बाँधने का प्रश्न उठाया जा सकता है। यही आलोचनात्मक दृष्टि सांस्कृतिक अध्ययन को अधिक सार्थक बनाती है।
6. नया दौर : मशीन और मनुष्य के बीच आधुनिक भारत
बी. आर. चोपड़ा की नया दौर (1957) स्वतंत्रता के बाद भारत में विकास और आधुनिकीकरण से जुड़े एक महत्वपूर्ण प्रश्न को उठाती है—मशीन आएगी तो मनुष्य का क्या होगा? फिल्म में ताँगा और बस का संघर्ष केवल दो वाहनों की प्रतिस्पर्धा नहीं है। उसके पीछे मशीन और मानव श्रम के बीच संबंध का बड़ा प्रश्न मौजूद है। नया दौर तकनीक-विरोधी फिल्म नहीं है; उसका आग्रह मानव-केंद्रित विकास पर है। आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता, स्वचालन और रोजगार के संबंध में चल रही बहसों को देखते हुए यह प्रश्न फिर अत्यंत प्रासंगिक दिखाई देता है।
7. राष्ट्र-निर्माण और हिन्दी फिल्मी गीत
हिन्दी सिनेमा में सांस्कृतिक चेतना के निर्माण में गीतों की भूमिका असाधारण रही है। फिल्मी गीतों ने राष्ट्र, प्रकृति, प्रेम, श्रम, किसान, सैनिक, भाषा और सामाजिक एकता से जुड़े विचारों को जनसामान्य तक पहुँचाया। जागृति, नया दौर, उपकार, पूरब और पश्चिम जैसी फिल्मों के गीतों ने भारतीयता के लोकप्रिय भाव को निर्मित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। फिल्मी गीतों की भाषा प्रायः किसी एक ‘शुद्ध’ भाषिक परंपरा तक सीमित नहीं रही। हिन्दी-उर्दू के साझा भाषिक संसार ने हिन्दी सिनेमा को व्यापक संप्रेषणीयता प्रदान की।
8. उपकार और किसान-सैनिक का भारत
मनोज कुमार की उपकार (1967) में भारतबोध प्रत्यक्ष राष्ट्रवादी रूप ग्रहण करता है। ‘जय जवान, जय किसान’ की पृष्ठभूमि में फिल्म किसान और सैनिक को राष्ट्र की शक्ति के रूप में प्रस्तुत करती है। यहाँ खेत में अन्न पैदा करने वाला किसान और सीमा की रक्षा करने वाला सैनिक दोनों राष्ट्रीय जीवन के आधार हैं।
9. पूरब और पश्चिम : प्रवास और सांस्कृतिक अस्मिता
पूरब और पश्चिम (1970) भारतबोध के एक नए आयाम को सामने लाती है—विदेश में भारतीयता। फिल्म भारत और पश्चिम के बीच एक स्पष्ट सांस्कृतिक द्वंद्व निर्मित करती है। भारतीय संस्कृति को परिवार, परंपरा, मर्यादा और आध्यात्मिक मूल्यों से जोड़ा जाता है। आज के दृष्टिकोण से यह विभाजन अत्यधिक सरल प्रतीत हो सकता है, फिर भी फिल्म का ऐतिहासिक महत्व इस बात में है कि उसने प्रवासी भारतीय पहचान के प्रश्न को लोकप्रिय सिनेमा के केंद्र में रखा।
10. 1970 का दशक : व्यवस्था से असंतोष का भारत
1970 के दशक तक हिन्दी सिनेमा में राष्ट्र के प्रति आशावादी भाव के साथ व्यवस्था के प्रति असंतोष अधिक स्पष्ट होने लगा। बेरोजगारी, भ्रष्टाचार, आर्थिक असमानता और शहरी अपराध जैसी समस्याएँ लोकप्रिय सिनेमा में प्रवेश करती हैं। इसी वातावरण में ‘एंग्री यंग मैन’ का उदय होता है। राष्ट्र से प्रेम का अर्थ हमेशा सत्ता या व्यवस्था से सहमति नहीं होता। कई बार व्यवस्था की आलोचना ही नागरिक जिम्मेदारी का रूप बनती है।
11. शोले : कानून, समुदाय और लोकनायक
रमेश सिप्पी की शोले (1975) को सामान्यतः लोकप्रिय मनोरंजन और ‘मसाला’ सिनेमा के शिखर के रूप में देखा जाता है, परंतु इसमें भी भारतीय समाज के कई सांस्कृतिक तत्व मौजूद हैं। रामगढ़ एक छोटा समुदाय है। जय और वीरू पारंपरिक अर्थ में आदर्शवादी नायक नहीं हैं। उनके चरित्र में दोस्ती, त्याग और नैतिक परिवर्तन की प्रक्रिया दिखाई देती है। यह उदाहरण बताता है कि सांस्कृतिक चेतना केवल तथाकथित ‘गंभीर’ फिल्मों में नहीं होती। लोकप्रिय सिनेमा भी सामूहिक स्मृति का निर्माण करता है।
12. परिवार : हिन्दी सिनेमा में भारतीयता का स्थायी केंद्र
यदि हिन्दी सिनेमा में भारतीयता के सबसे स्थायी प्रतीकों में से किसी एक को चुनना हो तो वह ‘परिवार’ होगा। मदर इंडिया से लेकर हम आपके हैं कौन..! और कभी खुशी कभी ग़म तक परिवार हिन्दी सिनेमा के केंद्र में बना रहा। प्रारंभिक फिल्मों में परिवार आर्थिक और सामाजिक संघर्ष की इकाई है। बाद में वह सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक बनता है। विवाह, त्योहार, संयुक्त परिवार, बड़ों का सम्मान और पारिवारिक दायित्व जैसी परंपराओं को फिल्मों ने व्यापक दृश्य पहचान प्रदान की।
13. उदारीकरण और नया भारतबोध
1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद भारतीय समाज में व्यापक परिवर्तन आए। उपभोक्तावाद, निजी क्षेत्र, सैटेलाइट टेलीविजन और वैश्विक बाजार के विस्तार ने भारतीय मध्यवर्ग की आकांक्षाओं को बदल दिया। अब भारतीयता केवल गाँव, किसान और मिट्टी से नहीं जुड़ी थी। वह विदेशों में रहने वाले भारतीय परिवारों के बीच भी दिखाई देने लगी। प्रवासी भारतीय हिन्दी सिनेमा का महत्वपूर्ण दर्शक और पात्र दोनों बना।
14. दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे : वैश्विक भारतीयता
दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे (1995) इस परिवर्तन का प्रभावशाली उदाहरण है। राज और सिमरन यूरोपीय परिवेश में मिलते हैं। प्रेम आधुनिक है, लेकिन उसका समाधान पारिवारिक स्वीकृति के भीतर खोजा जाता है। इस फिल्म ने भारतीयता की एक ऐसी लोकप्रिय परिभाषा प्रस्तुत की जिसमें आधुनिक जीवनशैली और पारिवारिक परंपरा एक साथ रह सकती हैं।
15. लगान : औपनिवेशिक सत्ता और सामूहिक प्रतिरोध
आशुतोष गोवारिकर की लगान (2001) भारतबोध को ऐतिहासिक और रूपकात्मक दोनों स्तरों पर प्रस्तुत करती है। कहानी औपनिवेशिक भारत में स्थित है। अंग्रेजी सत्ता द्वारा लगाए गए लगान के विरुद्ध संघर्ष क्रिकेट के मैदान में पहुँचता है। फिल्म की महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि विजय किसी एक नायक की नहीं, बल्कि समुदाय की होती है। अलग-अलग सामाजिक पृष्ठभूमियों के लोग एक टीम में आते हैं। यहाँ भारतबोध का आधार विविधता में सहयोग है।
16. स्वदेस : राष्ट्रप्रेम की पुनर्परिभाषा
आशुतोष गोवारिकर की स्वदेस (2004) हिन्दी सिनेमा में भारतबोध की सबसे विचारोत्तेजक प्रस्तुतियों में से एक है। इसका नायक मोहन भार्गव विदेश में सफल वैज्ञानिक है। वह भारत लौटता है और धीरे-धीरे ग्रामीण भारत की समस्याओं से जुड़ता है। फिल्म का राष्ट्रप्रेम नारे या शत्रु-विरोध पर आधारित नहीं है; वह जिम्मेदारी पर आधारित है। बिजली, शिक्षा, जातिगत दूरी, गरीबी और ग्रामीण विकास जैसे प्रश्न राष्ट्रभक्ति की नई परिभाषा बनाते हैं। भारत यहाँ केवल गौरव का विषय नहीं, जिम्मेदारी का क्षेत्र है।
17. रंग दे बसंती : इतिहास और युवा चेतना
रंग दे बसंती (2006) में स्वतंत्रता आंदोलन का इतिहास समकालीन युवा जीवन से जुड़ता है। आरंभ में पात्र इतिहास से लगभग कटे हुए हैं, लेकिन स्वतंत्रता सेनानियों की भूमिकाएँ निभाते-निभाते उनके भीतर वर्तमान व्यवस्था के प्रति राजनीतिक चेतना विकसित होती है। यहाँ अतीत संग्रहालय में बंद नहीं रहता; वह वर्तमान से संवाद करता है।
18. चक दे! इंडिया : क्षेत्रीय पहचान से राष्ट्रीय एकता तक
चक दे! इंडिया (2007) भारत की बहुलता को खेल के माध्यम से प्रस्तुत करती है। महिला हॉकी टीम की खिलाड़ी अलग-अलग राज्यों और सांस्कृतिक पृष्ठभूमियों से आती हैं। आरंभ में उनकी क्षेत्रीय पहचानें प्रमुख हैं, धीरे-धीरे वे सामूहिक टीम बनती हैं। यह फिल्म ‘विविधता में एकता’ के विचार को प्रत्यक्ष सिनेमाई संरचना देती है।
19. भारतीय स्त्री और बदलती सांस्कृतिक चेतना
हिन्दी सिनेमा में स्त्री की छवि के परिवर्तन को देखे बिना सांस्कृतिक चेतना का अध्ययन अधूरा रहेगा। मदर इंडिया की राधा त्याग, श्रम और नैतिक शक्ति की प्रतिमूर्ति है। बाद के सिनेमा में शिक्षा, रोजगार, विवाह में चयन, लैंगिक हिंसा, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक प्रतिष्ठा जैसे प्रश्न अधिक मुखर हुए हैं। इस परिवर्तन का अर्थ भारतीय संस्कृति का लोप नहीं है; बल्कि यह बताता है कि संस्कृति स्थिर नहीं होती।
20. गाँव से महानगर तक बदलता भारत
हिन्दी सिनेमा का भूगोल भी भारतबोध के परिवर्तन का प्रमाण है। 1950 और 1960 के दशकों में गाँव का महत्व अत्यधिक था। बाद में महानगर प्रमुख हुआ। मुंबई हिन्दी फिल्मों का केवल निर्माण-केंद्र नहीं रहा; वह स्वयं सिनेमाई पात्र बन गया। महानगर अवसर देता है, लेकिन अकेलापन भी पैदा करता है। वह आर्थिक गतिशीलता का प्रतीक है, लेकिन असमानता का भी।
21. पीपली लाइव : ग्रामीण संकट पर मीडिया की दृष्टि
पीपली लाइव (2010) ग्रामीण भारत और मीडिया के संबंध की तीखी आलोचना प्रस्तुत करती है। किसान की समस्या वास्तविक है, लेकिन मीडिया उसे तमाशे में बदल देता है। यहाँ सांस्कृतिक चेतना का अर्थ है उस अदृश्य भारत को देखना जिसकी आवाज़ मुख्यधारा में पर्याप्त रूप से नहीं पहुँचती।
22. न्यूटन : लोकतंत्र का दूरस्थ भारत
अमित मसूरकर की न्यूटन (2017) भारतीय लोकतंत्र को महानगर से बहुत दूर ले जाती है। जंगल और संघर्षग्रस्त क्षेत्र में चुनाव सम्पन्न कराने गया सरकारी कर्मचारी लोकतंत्र की प्रक्रियाओं और जमीनी वास्तविकताओं के बीच अंतर का अनुभव करता है। भारतबोध की दृष्टि से फिल्म अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि वह बताती है कि राष्ट्र केवल राजधानी, महानगर और मुख्यधारा नहीं है। लोकतंत्र तभी सार्थक है जब सबसे दूर स्थित नागरिक भी उसमें सम्मानपूर्वक शामिल हो सके।
23. आर्टिकल 15 : संविधान और भारतबोध
आर्टिकल 15 (2019) भारतबोध को संवैधानिक नैतिकता से जोड़ने वाली महत्वपूर्ण फिल्मों में गिनी जा सकती है। फिल्म जातिगत भेदभाव और सामाजिक असमानता के प्रश्न को केंद्र में रखती है। यहाँ भारत की पहचान केवल उसकी प्राचीन संस्कृति से नहीं, बल्कि आधुनिक संविधान द्वारा स्थापित समानता के आदर्श से भी निर्धारित होती है।
24. भाषा और हिन्दी सिनेमा का भारतबोध
हिन्दी सिनेमा की भाषा स्वयं भारतीय बहुलता का रोचक उदाहरण है। उसकी लोकप्रिय भाषा में हिन्दी, उर्दू, पंजाबी, अंग्रेजी और विभिन्न क्षेत्रीय भाषाओं के शब्द सहज रूप से प्रवेश करते रहे हैं। इसी भाषिक लचीलेपन ने उसे व्यापक दर्शक वर्ग तक पहुँचने में सहायता दी। भारत का सिनेमा हिन्दी तक सीमित नहीं है; इसलिए हिन्दी सिनेमा का भारतबोध तभी समावेशी हो सकता है जब वह भारतीय भाषायी बहुलता को स्वीकार करे।
25. लोक-संस्कृति और सिनेमा
हिन्दी फिल्मों में लोकगीत, लोकनृत्य, मेले, विवाह, त्योहार, कृषि-जीवन, स्थानीय वेशभूषा और क्षेत्रीय बोलियों का उपयोग लंबे समय से होता रहा है। परंतु व्यावसायिक सिनेमा कई बार लोक-संस्कृति को उसकी वास्तविक सामाजिक पृष्ठभूमि से अलग करके केवल आकर्षक दृश्य में बदल देता है। इसलिए यह देखना आवश्यक है कि फिल्म लोक को जीवंत सामाजिक अनुभव के रूप में प्रस्तुत करती है या केवल सजावटी तत्व के रूप में।
26. धर्म, अध्यात्म और सह-अस्तित्व
भारत के सामाजिक जीवन में धर्म की भूमिका महत्वपूर्ण रही है और हिन्दी सिनेमा इससे अछूता नहीं है। धार्मिक प्रतीक, त्योहार, मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, प्रार्थना और आध्यात्मिक विश्वास फिल्मों में लगातार दिखाई देते हैं। हिन्दी सिनेमा की एक महत्वपूर्ण परंपरा धार्मिक सह-अस्तित्व की भी रही है।
27. संगीत : भारतीय सांस्कृतिक संवाद का लोकप्रिय माध्यम
हिन्दी सिनेमा की सांस्कृतिक शक्ति का सबसे बड़ा माध्यम संभवतः उसका संगीत है। फिल्मी संगीत में शास्त्रीय संगीत, लोकधुन, ग़ज़ल, कव्वाली, भजन, सूफी परंपरा और बाद में पश्चिमी तथा वैश्विक संगीत शैलियों का मिश्रण मिलता है। इस अर्थ में हिन्दी फिल्म संगीत भारतीय संस्कृति की मिश्रित प्रकृति का उत्कृष्ट उदाहरण है।
28. वैश्वीकरण और सांस्कृतिक परिवर्तन
वैश्वीकरण के बाद हिन्दी सिनेमा का भारत अधिक आत्मविश्वासी और वैश्विक दिखाई देने लगा। नई पीढ़ी विदेश में पढ़ सकती है, काम कर सकती है और फिर भी भारत से भावनात्मक संबंध बनाए रख सकती है। इससे भारतीयता की परिभाषा भौगोलिक सीमा से बाहर निकलती है। लेकिन इस परिवर्तन के साथ उपभोक्तावाद भी बढ़ा, जिससे यह प्रश्न पैदा हुआ कि क्या मुख्यधारा हिन्दी सिनेमा का ‘भारत’ मध्यवर्गीय और उच्चवर्गीय भारत तक सीमित होता जा रहा है।
29. हाशिये का भारत और नए सिनेमाई स्वर
समकालीन हिन्दी सिनेमा की महत्वपूर्ण उपलब्धि यह है कि उसने उन समुदायों की ओर अपेक्षाकृत अधिक ध्यान देना शुरू किया जिन्हें मुख्यधारा में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिलता था। जाति, आदिवासी समाज, क्षेत्रीय पहचान, स्त्री, छोटे शहर, प्रवासी मजदूर और अन्य वंचित समुदायों के अनुभव अब अधिक स्पष्टता से सामने आ रहे हैं। यह परिवर्तन भारतबोध को अधिक लोकतांत्रिक बनाता है।
30. डिजिटल युग, OTT और नया सांस्कृतिक भूगोल
डिजिटल तकनीक ने भारतीय सिनेमा की संरचना बदल दी है। निर्माण, वितरण और दर्शक—तीनों स्तरों पर परिवर्तन आया है। OTT मंचों ने इस परिवर्तन को और आगे बढ़ाया। अब दर्शक केवल हिन्दी फिल्म नहीं देखता; वह मलयालम, तमिल, तेलुगु, मराठी, बंगाली और विदेशी सामग्री भी उपशीर्षकों के साथ देख सकता है। इससे हिन्दी सिनेमा के सामने भारतीयता को अधिक बहुल और जटिल रूप में समझने की चुनौती आई है।
31. क्या राष्ट्रवादी फिल्म ही भारतबोध की फिल्म है?
सामान्यतः जब सिनेमा और राष्ट्र की चर्चा होती है तो युद्ध, सेना, सीमा या राष्ट्रगीत से संबंधित फिल्मों को प्राथमिकता दी जाती है। लेकिन भारतबोध इससे कहीं व्यापक है। दो बीघा ज़मीन में किसान की पीड़ा, मदर इंडिया में ग्रामीण स्त्री का संघर्ष, लगान में सामूहिक प्रतिरोध, स्वदेस में गाँव के विकास की जिम्मेदारी, रंग दे बसंती में युवा नागरिक चेतना, चक दे! इंडिया में विभिन्न प्रदेशों की महिलाओं का एक टीम बनना, न्यूटन में दूरस्थ नागरिक के मतदान का अधिकार और आर्टिकल 15 में समानता का प्रश्न—ये सभी भारतबोध के रूप हैं।
32. सांस्कृतिक चेतना : संरक्षण नहीं, संवाद
‘सांस्कृतिक चेतना’ को कई बार परंपरा के संरक्षण तक सीमित कर दिया जाता है। यह पर्याप्त नहीं है। संस्कृति तभी जीवित रहती है जब वह बदलती परिस्थितियों से संवाद करती है। विवाह की परंपरा बनी रह सकती है, लेकिन उसमें स्त्री की स्वतंत्रता का प्रश्न नया होगा। परिवार बना रह सकता है, लेकिन परिवार के भीतर समानता की अपेक्षा बदलेगी। भाषा बनी रहती है, लेकिन उसमें नए शब्द आते हैं। लोकसंगीत जीवित रहता है, लेकिन आधुनिक संगीत से संवाद करता है।
33. हिन्दी सिनेमा की सीमाएँ
हिन्दी सिनेमा ने भारत की कल्पना को व्यापक बनाया है, लेकिन उसकी सीमाएँ भी रही हैं। हिन्दी सिनेमा को कई बार सम्पूर्ण भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधि मान लिया जाता है, जबकि भारत का सिनेमाई संसार हिन्दी से बहुत बड़ा है। पूर्वोत्तर भारत, आदिवासी समाज और अनेक छोटे भाषायी समुदाय मुख्यधारा हिन्दी सिनेमा में लंबे समय तक अपेक्षाकृत कम दिखाई दिए। स्त्री, जाति, क्षेत्र, भाषा और समुदायों को कई बार रूढ़ छवियों में प्रस्तुत किया गया। इसलिए हिन्दी सिनेमा में भारतबोध का अध्ययन प्रशंसात्मक होने के साथ आलोचनात्मक भी होना चाहिए।
34. सिनेमा और सांस्कृतिक धरोहर
सिनेमा की फिल्म-रील केवल व्यावसायिक सामग्री नहीं है; वह सांस्कृतिक विरासत भी है। पुरानी फिल्मों के नष्ट होने का अर्थ हमारी दृश्य स्मृति के एक हिस्से का नष्ट होना है। भारतबोध के अध्ययन में film preservation भी महत्वपूर्ण विषय है। जिस समाज के पास अपनी दृश्य स्मृति सुरक्षित नहीं होगी, उसके लिए अपने सांस्कृतिक इतिहास की पूर्ण समझ कठिन होगी।
35. हिन्दी सिनेमा और विश्व में भारत की सांस्कृतिक उपस्थिति
भारतीय फिल्मों का प्रभाव भारत की सीमाओं से बाहर भी रहा है। सिनेमा ने भारतीय संगीत, नृत्य, वेशभूषा, पारिवारिक जीवन और सामाजिक भावनाओं को वैश्विक दर्शकों तक पहुँचाया। इस अर्थ में सिनेमा सांस्कृतिक कूटनीति का अनौपचारिक माध्यम भी है। विश्व का दर्शक कई बार भारत को पहली बार किसी फिल्म के माध्यम से देखता है। इसलिए फिल्म में निर्मित भारत की छवि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय संस्कृति की समझ को भी प्रभावित कर सकती है।
36. बदलता भारत, बदलता भारतबोध
लगभग सात दशकों के हिन्दी सिनेमा को एक साथ देखने पर भारतबोध के परिवर्तन की रोचक यात्रा दिखाई देती है। 1950 के दशक में प्रश्न था—नया भारत कैसा बनेगा? 1960 के दशक में—किसान, सैनिक और विकास का संबंध क्या होगा? 1970 के दशक में—व्यवस्था आम नागरिक की आकांक्षाएँ क्यों पूरी नहीं कर रही? 1990 के दशक में—वैश्वीकरण के बीच भारतीय पहचान कैसे सुरक्षित रहे? 2000 के दशक में—प्रवासी और देश के बीच वास्तविक संबंध क्या है? नई सदी में प्रश्न नागरिकता, सामाजिक न्याय, लैंगिक समानता, जाति और क्षेत्रीय पहचान से जुड़ते हैं।
37. निष्कर्ष
हिन्दी सिनेमा में भारतबोध किसी एक प्रतीक, विचारधारा या ऐतिहासिक काल तक सीमित नहीं है। लगभग एक शताब्दी की सिनेमाई यात्रा में भारत की छवि लगातार बदलती रही है। कभी भारत खेत में हल चलाता किसान है; कभी विपरीत परिस्थितियों में खड़ी माँ है; कभी शहर में रिक्शा खींचता विस्थापित श्रमिक है; कभी सीमा पर खड़ा सैनिक है; कभी विदेश में अपनी सांस्कृतिक पहचान खोजता प्रवासी है; कभी गाँव लौटकर परिवर्तन करने वाला वैज्ञानिक है; कभी भ्रष्ट व्यवस्था से प्रश्न करता युवा है; कभी हॉकी मैदान में अलग-अलग प्रदेशों से आई महिलाओं की एक टीम है; और कभी जंगल के दूरस्थ मतदान केंद्र तक पहुँचने वाला नागरिक है।
इन सभी छवियों को एक साथ रखने पर हिन्दी सिनेमा का भारत निर्मित होता है। भारतबोध में राष्ट्रप्रेम है, लेकिन उसके साथ सामाजिक न्याय भी है; परंपरा है, लेकिन आलोचना भी; आध्यात्मिकता है, लेकिन आधुनिक वैज्ञानिक दृष्टि भी; गाँव है और महानगर भी; हिन्दी है और उसके साथ भारत की अनेक भाषाएँ भी। हिन्दी सिनेमा में सांस्कृतिक चेतना का भविष्य अतीत को जस का तस दोहराने में नहीं, बल्कि परंपरा और आधुनिकता, स्थानीयता और वैश्विकता, स्मृति और परिवर्तन तथा विविधता और राष्ट्रीय एकता के बीच सार्थक संवाद स्थापित करने में है।
संदर्भ
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