ढाका के आकाश की विस्मृत नायिका
जीनैट वैन टैसल की 1892 की ऐतिहासिक गुब्बारा-उड़ान,
औपनिवेशिक आधुनिकता और स्त्री-साहस का पुनर्पाठ
आधार: चर्च अभिलेख, समकालीन समाचार-विवरण, ऐतिहासिक छायाचित्र और आधुनिक शोध
सारांश
16 मार्च 1892 को अमेरिकी वैमानिका जीनैट वैन टैसल ने ढाका की बुरीगंगा नदी के दक्षिणी तट से गर्म हवा के गुब्बारे में उड़ान भरी और पैराशूट से उतरने का प्रयास किया। तेज हवा उन्हें निर्धारित स्थान—अहसान मंज़िल—से दूर रमना–शाहबाग क्षेत्र की ओर ले गई, जहाँ उनका पैराशूट एक ऊँचे पेड़ में उलझ गया। सुरक्षित बचाव-सामग्री की प्रतीक्षा करने की उनकी कथित मांग के बावजूद बाँसों की सहायता से उन्हें उतारने का प्रयास किया गया। बाँस टूटने अथवा उसके जोड़ खुलने से वे ऊँचाई से गिर गईं। गंभीर चोटों के कारण 18 मार्च 1892 को उनकी मृत्यु हो गई और उन्हें ढाका के नारिंदा ईसाई कब्रिस्तान में दफनाया गया।
यह घटना वर्तमान बांग्लादेश के भूभाग में दर्ज आरंभिक मानवयुक्त गुब्बारा-उड़ानों में गिनी जाती है। प्रस्तुत आलेख समाचार-विवरणों, चर्च के मृत्यु-अभिलेख, ऐतिहासिक छायाचित्र, यात्रावृत्त तथा बाद के अनुसंधानों के आधार पर घटना का पुनर्निर्माण करता है। साथ ही यह औपनिवेशिक मनोरंजन, तकनीकी आधुनिकता, स्त्री की सार्वजनिक उपस्थिति, जोखिमपूर्ण प्रदर्शन और ऐतिहासिक विस्मृति के प्रश्नों की पड़ताल करता है।
बीज शब्द: जीनैट वैन टैसल, ढाका, गुब्बारा-उड़ान, पैराशूट, स्त्री वैमानिका, अहसान मंज़िल, औपनिवेशिक बंगाल, विमानन इतिहास।
प्रस्तावना
मानव इतिहास में आकाश केवल प्राकृतिक विस्तार नहीं रहा; वह स्वतंत्रता, अज्ञात संसार, शक्ति और मानवीय आकांक्षा का प्रतीक भी रहा है। उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशकों में गुब्बारा-उड़ान और पैराशूट प्रदर्शन आधुनिक विज्ञान तथा लोकप्रिय मनोरंजन के बीच स्थित रोमांचकारी गतिविधियाँ थीं। इनमें भाग लेने वाले वैमानिक केवल तकनीशियन नहीं, बल्कि जोखिम उठाने वाले सार्वजनिक कलाकार भी थे।
16 मार्च 1892 को ढाका के नागरिकों ने ऐसा ही एक असाधारण दृश्य देखा। हजारों लोग बुरीगंगा नदी के दोनों किनारों, नौकाओं, मकानों की छतों और अहसान मंज़िल परिसर में जमा हुए थे। उनके आकर्षण का केंद्र चौबीस वर्ष की एक अमेरिकी महिला—जीनैट वैन टैसल—थीं। वह गुब्बारे में ऊपर उठीं और पैराशूट से नीचे आने का प्रयास किया। कुछ ही समय बाद यह सार्वजनिक उत्सव त्रासदी में बदल गया।
जीनैट की कहानी की विशेषता केवल यह नहीं है कि वह ढाका की आरंभिक महिला वैमानिका थीं। इसका महत्त्व औपनिवेशिक बंगाल में आधुनिक तकनीक के प्रवेश, स्थानीय अभिजात वर्ग की सांस्कृतिक भूमिका, स्त्री-शरीर को तमाशे में बदलने वाली सार्वजनिक दृष्टि, औपनिवेशिक प्रशासन की जवाबदेही तथा इतिहास में महिलाओं की अनुपस्थिति जैसे प्रश्नों में भी है।
विश्व में गुब्बारा और पैराशूट उड़ान की पृष्ठभूमि
मानवयुक्त गर्म हवा के गुब्बारे का सफल सार्वजनिक प्रदर्शन 1783 में फ्रांस के मोंटगोल्फ़ियर बंधुओं के प्रयोगों के बाद संभव हुआ। इसी वर्ष पिलात्र द रोज़िए और फ्रांस्वा लॉरां द’आर्लांद ने स्वतंत्र मानवयुक्त उड़ान भरी। अतः कुछ लोकप्रिय लेखों में दिखाई देने वाला यह कथन कि पहली यात्री गुब्बारा-उड़ान 1872 में हुई थी, ऐतिहासिक रूप से सही नहीं है।
1797 में फ्रांसीसी वैमानिक आंद्रे-जाक गार्नेरिन ने गुब्बारे से अलग होकर पैराशूट द्वारा उतरने का उल्लेखनीय प्रदर्शन किया। इसके बाद उन्नीसवीं शताब्दी में यूरोप और अमेरिका में गुब्बारा-आरोहण तथा पैराशूट-जंप मेले, सार्वजनिक समारोह और व्यावसायिक प्रदर्शन का हिस्सा बन गए।
इन प्रदर्शनों के गुब्बारे आधुनिक नियंत्रित विमान नहीं थे। उनकी दिशा मुख्यतः हवा पर निर्भर रहती थी। नीचे उतरने के लिए वैमानिक प्रायः गुब्बारे से पैराशूट के सहारे छलाँग लगाता था। उपकरणों की सीमाएँ, मौसम के पूर्वानुमान का अभाव और व्यवस्थित बचाव-व्यवस्था न होने के कारण प्रत्येक प्रदर्शन अत्यंत जोखिमपूर्ण था। महिला वैमानिकाओं की उपस्थिति ने इसमें अतिरिक्त आकर्षण जोड़ा; प्रचारक उनके साहस और स्त्रीत्व दोनों का व्यावसायिक उपयोग करते थे।
जीनैट वैन टैसल की पहचान का प्रश्न
जीनैट की निश्चित जीवनी तैयार करना कठिन है। उपलब्ध विवरणों में उनका नाम Jeanette, Jeannette और Jenny तथा उपनाम Van Tassel या Van Tassell के रूप में मिलता है। कुछ स्रोत उनका मूल नाम Jeanette Rumary बताते हैं। कहा जाता है कि उनका जन्म अमेरिका के सिनसिनाटी, ओहायो में हुआ था और वे जॉर्ज जॉन रूमरी तथा जेन टिंगली की आठ संतानों में चौथी थीं।
ढाका के सेंट थॉमस चर्च में संरक्षित मृत्यु-पंजी के आधार पर घटना के समय उनकी आयु 24 वर्ष थी और उनका व्यवसाय “Aeronaut”—अर्थात वैमानिका—दर्ज था। इसके विपरीत गनीउर राजा के यात्रावृत्त में उनकी आयु लगभग पंद्रह या सोलह वर्ष बताई गई। अभिलेखीय प्रमाण के कारण 24 वर्ष की आयु अधिक विश्वसनीय मानी जाती है।
पार्क वैन टैसल से उनके संबंध पर भी सहमति नहीं है। कुछ विवरण उन्हें पार्क की पत्नी बताते हैं; कुछ मंडली की सदस्य। संभव है कि “वैन टैसल” मंडली से जुड़े कलाकारों का पेशेवर नाम रहा हो। इसी तरह जीनैट के नाम से प्रचलित चित्र की पहचान भी संदिग्ध है; अतः उसे निश्चित चित्र कहना उचित नहीं। ये विसंगतियाँ बताती हैं कि उनकी जीवनी अलग-अलग अभिलेखीय टुकड़ों से निर्मित होती है।
पार्क वैन टैसल की भ्रमणशील वैमानिक मंडली
पार्क वैन टैसल अमेरिका के उन वैमानिक-कलाकारों में थे जिन्होंने गुब्बारे और पैराशूट के सार्वजनिक प्रदर्शनों को व्यावसायिक भ्रमणशील कार्यक्रम में बदला। उनकी मंडली ने अमेरिका के पश्चिमी क्षेत्रों, हवाई, ऑस्ट्रेलिया और एशिया में प्रदर्शन किए। ऐसी मंडलियाँ आधुनिक तकनीक, सर्कस, साहसिक खेल और जन-मनोरंजन का मिश्रण प्रस्तुत करती थीं।
1891–92 के आसपास वैन टैसल मंडली कलकत्ता में सक्रिय थी। जर्मन छायाकार फ्रिट्ज कैप ने कथित रूप से मंडली और ढाका के नवाब ख्वाजा अहसानुल्लाह के बीच संपर्क स्थापित कराया। जीनैट की उड़ान के लिए तैयार किए जा रहे विशाल गुब्बारे का ऐतिहासिक छायाचित्र भी कैप से संबद्ध माना जाता है।
ख्वाजा अहसानुल्लाह और प्रदर्शन का आयोजन
ख्वाजा अहसानुल्लाह उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ढाका नवाब परिवार के प्रमुख व्यक्ति थे। उपलब्ध विवरणों के अनुसार उन्होंने “नवाब बहादुर” की उपाधि प्राप्त होने के उपलक्ष्य में गुब्बारा-प्रदर्शन आयोजित कराया। वैन टैसल मंडली से अनुबंध कथित रूप से 10,000 रुपये में हुआ। आधुनिक विवरणों में कभी इसे 10,000 टका कहा गया है, किंतु 1892 के औपनिवेशिक बंगाल में “भारतीय रुपये” अधिक उपयुक्त मुद्रा-वर्णन है।
कुछ विवरणों के अनुसार जीनैट से अपेक्षा की गई थी कि वे पैराशूट द्वारा अहसान मंज़िल की छत पर उतरें, ताकि नवाब परिवार की पर्दानशीन महिलाएँ प्रदर्शन देख सकें। इसके लिए अतिरिक्त 5,000 रुपये देने की बात कही जाती है। मूल अनुबंध उपलब्ध न होने के कारण इस दावे को सावधानी से ग्रहण करना चाहिए; उस काल के अनियंत्रित पैराशूट से किसी निश्चित छत पर उतरना अत्यंत कठिन था।
16 मार्च 1892: ढाका की ऐतिहासिक संध्या
16 मार्च की शाम बुरीगंगा के किनारे, नौकाओं, आसपास के भवनों और अहसान मंज़िल की छत पर असाधारण भीड़ जमा थी। गनीउर राजा के विवरण के अनुसार लकड़ी और मिट्टी के तेल से उत्पन्न गर्म हवा द्वारा गुब्बारा फुलाया गया। गुब्बारे के नीचे एक छोटा मंच अथवा झूले जैसा ढाँचा था, जिस पर वैमानिका खड़ी होती थी।
लगभग शाम 6 बजकर 20 मिनट पर रस्सियाँ खोल दी गईं और जीनैट ऊपर उठने लगीं। कुछ विवरणों में ऊँचाई लगभग 6,000 फीट बताई गई है। गनीउर राजा ने उन्हें पतंगों और गिद्धों की ऊँचाई तक जाता देखा। किंतु स्वतंत्र उपकरणीय मापन उपलब्ध न होने के कारण 6,000 फीट को सत्यापित आँकड़ा नहीं, समकालीन अथवा बाद का अनुमान मानना चाहिए।
निर्धारित दिशा से विचलन और पैराशूट-जंप
दक्षिण से चल रही तेज हवा गुब्बारे को अहसान मंज़िल से दूर उत्तर की दिशा में बहा ले गई। उड़ान को इच्छानुसार नियंत्रित करने का कोई प्रभावी माध्यम जीनैट के पास नहीं था। कुछ समय बाद उन्होंने गुब्बारे से पैराशूट द्वारा छलाँग लगा दी।
लोकप्रिय विवरणों में इसे उनकी 41वीं पैराशूट-जंप कहा गया है और लगभग 300 गुब्बारा-उड़ानों का दावा भी मिलता है। पूर्ण स्वतंत्र प्रदर्शन-सूची उपलब्ध न होने के कारण ये संख्याएँ प्रचलित ऐतिहासिक दावे हैं, निश्चित आँकड़े नहीं। पैराशूट खुल गया, पर तेज हवा उन्हें बहाती रही और अंततः वह रमना–शाहबाग क्षेत्र के एक ऊँचे पेड़ में उलझ गया। स्थान को अलग-अलग स्रोत रमना गार्डन, शाहबाग का नवाबी बगीचा या वर्तमान ढाका विश्वविद्यालय के आसपास बताते हैं—संभवतः ये नाम उस समय के एक विस्तृत भूभाग की ओर संकेत करते हैं।
दुर्घटना नहीं, विफल बचाव
जीनैट गुब्बारे के गिरने से तत्काल नहीं मरी थीं। उनका पैराशूट खुल चुका था और वे पेड़ पर जीवित फँसी थीं। वास्तविक त्रासदी बचाव-प्रक्रिया में हुई। विवरणों के अनुसार उन्होंने रस्सी अथवा उचित उपकरण मँगाने और सुरक्षित सहायता आने तक प्रतीक्षा करने की इच्छा व्यक्त की।
घटनास्थल पर पहुँचे अंग्रेज पुलिस अधिकारी ने कथित रूप से बाँसों की सहायता से उन्हें नीचे आने को कहा। कई बाँस जोड़कर अस्थायी सहारा बनाया गया। उतरते समय बाँस टूट गया या जोड़ खुल गया। जीनैट ऊँचाई से जमीन पर गिरकर गंभीर रूप से घायल हुईं। उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहाँ 18 मार्च 1892 को मृत्यु हुई। 19 मार्च को द बंगाल टाइम्स ने समाचार प्रकाशित किया। इसलिए इसे केवल “गुब्बारा दुर्घटना” कहना अधूरा है; प्रतिकूल हवा, पेड़ में उलझाव और अव्यवस्थित बचाव—तीनों चरणों ने त्रासदी बनाई।
मृत्यु के बाद विवाद और औपनिवेशिक उत्तरदायित्व
जीनैट की मृत्यु के बाद ढाका में असंतोष फैलने की सूचना मिलती है। स्थानीय लोगों के एक हिस्से ने अंग्रेज पुलिस अधिकारी की जल्दबाजी को जिम्मेदार माना, जबकि कुछ अंग्रेजी समाचार-विवरणों ने घटना को अलग ढंग से प्रस्तुत किया। परिवार या मंडली द्वारा कानूनी कार्रवाई पर विचार का उल्लेख मिलता है, पर किसी मुकदमे के परिणाम का पुष्ट अभिलेख उपलब्ध नहीं।
यदि जीनैट ने सुरक्षित उपकरणों की प्रतीक्षा करने की मांग की थी और उसे अनसुना किया गया, तो यह केवल तकनीकी भूल नहीं, बल्कि एक अनुभवी महिला पेशेवर की आवाज़ की अवमानना भी थी। यह प्रसंग औपनिवेशिक सत्ता, नस्ल, विशेषज्ञता और लैंगिक असमानता के जटिल संबंध खोलता है।
नारिंदा के कब्रिस्तान में अनाम विश्राम
जीनैट को पुराने ढाका के नारिंदा ईसाई कब्रिस्तान में दफनाया गया। समय के साथ उनकी कब्र का नाम-पट्ट और स्पष्ट पहचान समाप्त हो गई। आज जिस कब्र को उनका अंतिम विश्राम-स्थल माना जाता है, उस पर स्पष्ट नाम या अभिलेख नहीं है। विदेशी धरती पर मृत्यु, भ्रमणशील मंडली का अस्थायी चरित्र और स्थानीय स्मृति-संरक्षण का अभाव—इन सबने उनकी पहचान धूमिल की। उनकी अनाम कब्र इतिहास में स्त्रियों के अदृश्य होने का भौतिक प्रतीक है।
जीनैट की कहानी की पुनर्खोज
जीनैट की कहानी पुनः सामने लाने का प्रमुख श्रेय वास्तुकार और शोधकर्ता शमीम अमीनुर रहमान को दिया जाता है। उन्होंने गनीउर राजा के ढाका-यात्रा विवरण से संकेत पाया। 1989 में नवाब परिवार के वंशज ख्वाजा हलीम के संग्रह में उन्हें आंशिक रूप से फुलाए विशाल गुब्बारे और भीड़ का छायाचित्र मिला, जो फ्रिट्ज कैप से संबद्ध था।
रहमान ने सेंट थॉमस चर्च के मृत्यु-पंजी में जीनैट का नाम, आयु, पेशा और मृत्यु-तिथि खोजी। ढाका विश्वविद्यालय में सुरक्षित पुराने समाचार-पत्रों के माइक्रोफिल्म से 19 मार्च 1892 के द बंगाल टाइम्स का मृत्यु-समाचार मिला। लगभग आठ वर्ष के अनुसंधान के बाद 2000 में उनकी बांग्ला पुस्तक “ढाकार प्रथम आकाशचारी वैन टैसल” प्रकाशित हुई और विस्मृत घटना सार्वजनिक इतिहास में लौटी।
उपलब्ध तथ्यों का आलोचनात्मक वर्गीकरण
औपनिवेशिक आधुनिकता का प्रदर्शन
यह आयोजन उस दौर का प्रतिनिधित्व करता है जब भारत के अभिजात वर्ग आधुनिक तकनीक को सार्वजनिक प्रतिष्ठा और सांस्कृतिक नेतृत्व से जोड़ रहा था। रेलवे, बिजली, फोटोग्राफी, छापाखाना और वैज्ञानिक प्रदर्शन औपनिवेशिक नगरों में आधुनिकता के प्रतीक थे। नवाब अहसानुल्लाह द्वारा विदेशी वैमानिक मंडली को बुलाना ढाका को वैश्विक तकनीकी परिवर्तन से जुड़ा नगर दिखाने का प्रयास भी था।
इसके साथ औपनिवेशिक आधुनिकता की विषमता दिखाई देती है। प्रदर्शन पर बड़ी राशि खर्च हुई, लेकिन आपातकालीन बचाव की व्यवस्थित तैयारी नहीं थी। तकनीकी चमत्कार आमंत्रित किया गया, किंतु उसके जोखिमों के प्रबंधन की आधुनिक संस्था अनुपस्थित रही।
स्त्री-साहस और सार्वजनिक दृष्टि
उन्नीसवीं शताब्दी में स्त्रियों की गतिशीलता अनेक सामाजिक प्रतिबंधों से घिरी थी। ऐसे समय एक महिला का हजारों दर्शकों के सामने गुब्बारे से ऊपर उठना स्थापित लैंगिक भूमिकाओं को चुनौती देता था। किंतु वही साहस उसके व्यावसायिक प्रदर्शन और सार्वजनिक तमाशे का आधार भी बना। जीनैट एक साथ स्वतंत्र पेशेवर महिला और बाजारीकृत दृश्य का केंद्र थीं।
अहसान मंज़िल की पर्दानशीन महिलाओं को प्रदर्शन दिखाने वाला विवरण इस विरोधाभास को गहरा करता है। एक ओर स्थानीय अभिजात महिलाएँ पर्दे में थीं; दूसरी ओर विदेशी महिला अपने शरीर और जीवन को सार्वजनिक रूप से जोखिम में डाल रही थी। दोनों स्थितियाँ अलग-अलग रूपों में पितृसत्तात्मक सामाजिक संरचना से संबद्ध थीं।
प्रारंभिक विमानन इतिहास में स्थान
जीनैट की उड़ान को कभी “बांग्लादेश की पहली उड़ान” कहा जाता है। चूँकि बांग्लादेश 1971 में अस्तित्व में आया, इसलिए “वर्तमान बांग्लादेश के भूभाग में दर्ज आरंभिक मानवयुक्त गुब्बारा-उड़ान” अधिक सटीक है। गुब्बारा-उड़ान आधुनिक इंजन-संचालित वायुयान से अलग तकनीकी श्रेणी है; राइट बंधुओं की नियंत्रित उड़ान 1903 में हुई। फिर भी 1892 का यह प्रदर्शन दक्षिण एशिया की आरंभिक सार्वजनिक विमानन-संस्कृति का महत्त्वपूर्ण अध्याय है।
इतिहास ने जीनैट को क्यों भुला दिया?
भ्रमणशील कलाकार की अस्थायी पहचान: मंडली का किसी स्थानीय संस्था से स्थायी संबंध नहीं था।
स्त्री इतिहास की उपेक्षा: पारंपरिक इतिहास ने शासकों और राजनीतिक घटनाओं को प्राथमिकता दी।
नाम और पारिवारिक संबंध की अस्पष्टता: अलग नामों और पेशेवर उपनाम ने पहचान कठिन बनाई।
अभिलेखों का बिखराव: सूचना चर्च-पंजी, निजी छायाचित्र, समाचार-पत्र और यात्रावृत्त में बंटी रही।
कब्र की पहचान समाप्त होना: नाम-पट्ट न रहने से स्मृति का भौतिक आधार नष्ट हुआ।
राष्ट्रवादी इतिहास की सीमाएँ: एक अमेरिकी कलाकार की नवाबी आयोजन से जुड़ी कहानी किसी एक राष्ट्रीय आख्यान में सरलता से नहीं समाई।
स्मृति-संरक्षण की आवश्यकता
जीनैट का इतिहास ढाका और दक्षिण एशिया की साझा सांस्कृतिक विरासत है। इसके संरक्षण के लिए निम्न कदम महत्त्वपूर्ण हो सकते हैं:
नारिंदा ईसाई कब्रिस्तान में उनकी कब्र की वैज्ञानिक और अभिलेखीय पहचान की जाए।
पुष्ट पहचान मिलने पर द्विभाषी स्मृति-पट्ट लगाया जाए।
फ्रिट्ज कैप के छायाचित्र, मृत्यु-पंजी और द बंगाल टाइम्स के समाचार की डिजिटल प्रतियाँ सार्वजनिक की जाएँ।
अहसान मंज़िल संग्रहालय में जीनैट की उड़ान पर स्थायी प्रदर्शनी बनाई जाए।
शमीम अमीनुर रहमान की पुस्तक का प्रामाणिक अंग्रेजी और हिन्दी अनुवाद प्रकाशित हो।
भारत, बांग्लादेश, अमेरिका और ब्रिटेन के अभिलेखागारों में संयुक्त शोध किया जाए।
उनकी स्मृति को दक्षिण एशिया की महिला विमानन-परंपरा से जोड़ा जाए।
निष्कर्ष
जीनैट वैन टैसल की कहानी आकाश में उड़ने वाली अमेरिकी महिला की दुखद दुर्घटना से कहीं अधिक व्यापक अर्थ रखती है। यह उस ऐतिहासिक क्षण का दस्तावेज़ है जब तकनीक तमाशा थी, आकाश अज्ञात क्षेत्र था और प्रत्येक उड़ान जीवन तथा मृत्यु के बीच किया गया साहसिक समझौता थी।
16 मार्च 1892 को जीनैट ने ढाका के नागरिकों को नगर को आकाश की दृष्टि से कल्पित करने का अवसर दिया। उड़ान सफलतापूर्वक आरंभ हुई और पैराशूट भी खुला, लेकिन प्रतिकूल हवा तथा अव्यवस्थित बचाव ने उसे त्रासदी में बदल दिया। दो दिन बाद उनकी मृत्यु हुई और धीरे-धीरे उनका नाम सार्वजनिक स्मृति से मिट गया।
उनकी पुनर्खोज बताती है कि इतिहास केवल प्रसिद्ध शासकों और बड़ी राजनीतिक घटनाओं से नहीं बनता। पुराने मृत्यु-पंजी की एक पंक्ति, भूला हुआ समाचार, निजी संग्रह का छायाचित्र और अनाम कब्र भी इतिहास की दिशा बदल सकते हैं। जीनैट को स्मरण करना स्त्री-साहस, आरंभिक विमानन, पेशेवर जोखिम और अभिलेखीय शोध—सभी को सम्मान देना है। उन्होंने केवल ढाका के ऊपर उड़ान नहीं भरी थी; उन्होंने उस सामाजिक सीमा को भी पार किया था जो स्त्रियों को धरती और घरेलू संसार तक सीमित रखना चाहती थी।
संदर्भ
Lava, Fahima Kaniz. “Forgotten Story of Jeanette Van Tassel, the American Woman Who Flew over Dhaka in 1892.” The Daily Star, 5 September 2026. https://www.thedailystar.net/slow-reads/focus/news/forgotten-story-jeanette-van-tassel-the-american-woman-who-flew-over-dhaka-1892-4264941
“Bangladesh’s First Balloonist.” The Daily Star, 2016. https://www.thedailystar.net/star-weekend/bangladeshs-first-balloonist-1301611
Rezwan. “Forgotten History: American Aeronaut Jeanette Van Tassel Lies Buried in Dhaka Christian Cemetery.” Global Voices, 17 September 2021. https://globalvoices.org/2021/09/17/forgotten-history-american-aeronaut-jeanette-van-tassel-lies-buried-in-dhaka-christian-cemetery/
Rahman, Shamim Aminur. Dhakar Prothom Akashchari Van Tassel. Dhaka, 2000.
The Bengal Times. Jeanette Van Tassel death report, 19 March 1892; cited through later archival research.
St Thomas’ Church, Dhaka. Death Register entry concerning Jeanette Van Tassel, March 1892; cited in later research.
Smithsonian Libraries. “Age of the Aeronaut.” https://library.si.edu/exhibition/fantastic-worlds/age-of-the-aeronaut
Kapp, Fritz. “Balloon for the Ascent of Jeanette Van Tassel over Dhaka, 16 March 1892.” Historical photograph, public domain. https://commons.wikimedia.org/wiki/File:Jeanette_Van_Tassel_Balloon_Ascent_over_Dhaka.jpg
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