समकालीन हिन्दी उपन्यास में वृद्ध स्त्री, देह और सीमा का पुनर्पाठ: गीतांजलि श्री के ‘रेत समाधि’ का लैंगिक अध्ययन
डॉ. मनीष कुमार सी. मिश्रा
एसोसिएट प्रोफेसर एवं प्रभारी, हिन्दी विभाग, के. एम. अग्रवाल कला, वाणिज्य एवं विज्ञान महाविद्यालय, कल्याण (पश्चिम), महाराष्ट्र
ईमेल: manishmuntazir@gmail.com
सारांश
गीतांजलि श्री का उपन्यास ‘रेत समाधि’ समकालीन भारत में वृद्धावस्था, विधवापन, स्त्री-देह, परिवार, विभाजन और राष्ट्र-सीमा के प्रश्नों को एक-दूसरे से जोड़ता है। यह आलेख निकट-पाठ, स्त्रीवादी आलोचना और अंतर्संबंधी दृष्टि के माध्यम से जाँचता है कि उपन्यास की अस्सी वर्षीय ‘माँ’ किस प्रकार शोकग्रस्त, निष्क्रिय और परिवार-निर्भर विधवा की प्रचलित छवि से बाहर निकलकर इच्छा, स्मृति, यात्रा और निर्णय की स्वायत्त वाहक बनती है। आलेख का केंद्रीय तर्क है कि ‘रेत समाधि’ में आयु, जेंडर और राष्ट्रीय सीमा अलग-अलग अवरोध नहीं, बल्कि परस्पर जुड़ी हुई सत्ता-व्यवस्थाएँ हैं। माँ का बिस्तर से उठना, बेटी के घर जाना, रोज़ी से मित्रता करना और पाकिस्तान की यात्रा पर अड़ना इन्हीं सीमाओं के पुनर्संयोजन की क्रमिक अवस्थाएँ हैं। जूडिथ बटलर की जेंडर-परफॉर्मेटिविटी, सिमोन द बोउवार की वृद्धावस्था संबंधी अवधारणा तथा चंद्रा तलपड़े मोहंती की सीमा-पार स्त्रीवादी दृष्टि इस अध्ययन का वैचारिक आधार हैं। निष्कर्षतः उपन्यास वृद्ध स्त्री को करुणा की वस्तु नहीं, इतिहास की साक्षी, इच्छाधारी देह और नैतिक-राजनीतिक कर्ता के रूप में प्रतिष्ठित करता है।
बीज शब्द: वृद्ध स्त्री, विधवापन, स्त्री-देह, विभाजन, सीमा, लैंगिक अस्मिता
प्रस्तावना
समकालीन भारतीय समाज में ‘जेंडर’ केवल स्त्री और पुरुष की जैविक भिन्नता का प्रश्न नहीं है; यह परिवार, आयु, वैवाहिक स्थिति, वर्ग, भाषा, नागरिकता और सार्वजनिक स्थान तक पहुँच से निर्मित सामाजिक व्यवस्था भी है। इस अर्थ में वृद्ध स्त्री का अनुभव विशेष रूप से जटिल है। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष की ‘इंडिया एजिंग रिपोर्ट 2023’ के अनुसार भारत की 60 वर्ष से अधिक आयु वाली स्त्रियों में लगभग 54 प्रतिशत विधवा हैं, जबकि समान आयु के पुरुषों में यह अनुपात लगभग 16 प्रतिशत है। रिपोर्ट यह भी रेखांकित करती है कि 2050 तक भारत की वृद्ध आबादी कुल जनसंख्या के लगभग पाँचवें भाग तक पहुँच सकती है और अत्यधिक वृद्ध समूह में विधवा तथा आश्रित स्त्रियों की प्रधानता होगी (International Institute for Population Sciences and UNFPA)। इसलिए वृद्धावस्था का स्त्री-अनुभव अब निजी पारिवारिक प्रसंग भर नहीं, समकालीन भारत का महत्वपूर्ण सामाजिक प्रश्न है।
इसी पृष्ठभूमि में गीतांजलि श्री का ‘रेत समाधि’ (2018) अस्सी वर्षीय विधवा ‘माँ’ को कथा के केंद्र में रखता है। पति की मृत्यु के बाद दीवार की ओर मुँह करके लेटी माँ धीरे-धीरे घर, परिवार और स्मृति द्वारा तय की गई भूमिका से बाहर आती है। वह बेटी के घर जाती है, अपने वस्त्र और चाल-ढाल बदलती है, रोज़ी के साथ आत्मीयता विकसित करती है और अंततः बिना वीज़ा पाकिस्तान की सीमा पार कर अपने विभाजन-पूर्व जीवन तथा अधूरे प्रेम का सामना करती है (श्री)। उपन्यास का 2021 का अंग्रेजी अनुवाद ‘Tomb of Sand’ 2022 में इंटरनेशनल बुकर पुरस्कार जीतने वाला किसी भारतीय भाषा में मूलतः लिखा पहला उपन्यास बना। पुरस्कार संस्था ने इसे धर्म, देश और जेंडर के बीच खड़ी विनाशकारी सीमाओं के विरुद्ध रचनात्मक प्रतिवाद कहा (The Booker Prizes)। किंतु इसकी उपलब्धि पुरस्कार से आगे है: यह हिन्दी कथा में वृद्ध स्त्री की देह, इच्छा और इतिहास को नई दृश्यता देती है।
शोध-प्रश्न, उद्देश्य और पद्धति
इस अध्ययन के प्रमुख प्रश्न हैं: क्या ‘रेत समाधि’ वृद्ध विधवा की रूढ़ छवि को तोड़ता है? माँ की देह, गतिशीलता और स्मृति किस तरह स्त्री-अस्मिता को पुनर्गठित करती हैं? रोज़ी तथा बेटी के साथ उसके संबंध जेंडर की स्थिर धारणाओं को कैसे चुनौती देते हैं? और भारत-पाकिस्तान सीमा का उल्लंघन निजी स्वतंत्रता तथा विभाजन के स्त्री-इतिहास से किस प्रकार जुड़ता है? इन प्रश्नों के उत्तर के लिए उपन्यास का गुणात्मक निकट-पाठ किया गया है। कथा-संरचना, प्रतीक, चरित्र-संबंध, देह-भाषा और सीमा-बिंब विश्लेषण की मुख्य इकाइयाँ हैं।
वैचारिक स्तर पर जूडिथ बटलर की यह स्थापना उपयोगी है कि जेंडर कोई स्थिर सार नहीं, बल्कि बार-बार दोहराई गई सामाजिक क्रियाओं, संकेतों और अपेक्षाओं से निर्मित प्रभाव है (Butler)। सिमोन द बोउवार वृद्धावस्था को केवल जैविक क्षय नहीं मानतीं; समाज वृद्ध व्यक्ति को ‘अन्य’ बनाकर उसकी मानवीय सक्रियता से इंकार करता है (Beauvoir)। मोहंती स्थानीय इतिहास, वर्ग, राष्ट्र और सत्ता-संबंधों को ध्यान में रखने वाली सीमा-पार स्त्रीवादी एकजुटता पर बल देती हैं (Mohanty)। इन अवधारणाओं को भारतीय पाठ पर यांत्रिक रूप से आरोपित करने के बजाय, आलेख उनका उपयोग माँ की विशिष्ट सामाजिक-सांस्कृतिक स्थिति को समझने के लिए करता है।
विधवापन की पटकथा और माँ का ‘पीठ’ बन जाना
उपन्यास के आरंभ में माँ का दीवार की ओर पीठ करके लेटना शोक की निजी मुद्रा है, पर साथ ही परिवार द्वारा वृद्ध विधवा पर आरोपित भूमिका का दृश्य रूप भी। परिवार उसकी इच्छा पूछने के बजाय उसकी स्थिति की व्याख्या करता है; उसकी देह परिवार की चिंता, उत्तराधिकार, देखभाल और नियंत्रण का स्थल बन जाती है। वह बोलती कम है और अन्य लोग उसके बारे में अधिक बोलते हैं। इस प्रकार ‘माँ’ का निजी नाम और पूर्व-जीवन घरेलू संबोधनों के नीचे दबे रहते हैं। उषा दास ने उचित ही उपन्यास को वृद्ध मनोविज्ञान की नई दृष्टि कहा है, किंतु यहाँ मनोवैज्ञानिक अवसाद के साथ सामाजिक अदृश्यता को भी पढ़ना आवश्यक है (Das)।
दीवार फिर भी अंतिम अवरोध नहीं बनती। माँ की पीठ निष्क्रियता से आरंभ होकर असहमति की भाषा बन जाती है: वह दूसरों की निगाह और निर्देश से अपना चेहरा हटा लेती है। परिवार जिसे मृत्यु की ओर झुकाव समझता है, वही भीतर से पुरानी पहचान के विघटन की प्रक्रिया है। इसीलिए उसका पुनरुत्थान किसी बाहरी उद्धारक का उपहार नहीं, अपनी गति पुनः प्राप्त करने का कार्य है। विधवापन की स्वीकृत पटकथा—सफेदपन, संयम, कामना-विहीनता और घर के भीतर सीमित जीवन—उसकी छोटी-छोटी क्रियाओं से टूटती है। बटलर की भाषा में देखें तो माँ अपेक्षित स्त्री-आचरण को दोहराना बंद कर देती है; इसी विराम से दूसरी पहचान संभव होती है।
वृद्ध देह का पुनराविष्कार: क्षय से इच्छा तक
मुख्यधारा संस्कृति अक्सर स्त्री-देह को युवावस्था, सौंदर्य और प्रजनन से जोड़ती है। वृद्ध स्त्री इसलिए दोहरी अदृश्यता झेलती है—वह ‘स्त्री’ तो रहती है, पर उसकी इच्छा और सार्वजनिक उपस्थिति को अमान्य मान लिया जाता है। ‘रेत समाधि’ माँ की झुर्रियों, थकान, बीमारी और अस्थिर चाल को छिपाता नहीं; साथ ही इन्हें जीवन की समाप्ति का एकमात्र अर्थ भी नहीं बनने देता। छड़ी, तितली, धूप, रंगीन वस्त्र और चलना उसकी देह को फिर से संसार से जोड़ते हैं। शरीर छोटा होता प्रतीत होता है, किंतु उसकी जिज्ञासा, साहस और संसार फैलते जाते हैं। यही विरोधाभास उपन्यास की वृद्धावस्था-दृष्टि को विशिष्ट बनाता है।
माँ का कायांतरण ‘युवा बनने’ की इच्छा नहीं है। वह वृद्ध रहकर सक्रिय होती है; अतः उपन्यास उम्र-विरोधी सौंदर्य-बाज़ार का समर्थन नहीं करता, बल्कि सक्रियता को युवावस्था की निजी संपत्ति मानने से इनकार करता है। देह अब परिवार की देखभाल पाने वाली वस्तु नहीं, यात्रा करने, स्पर्श ग्रहण करने, पुराना प्रेम याद करने और जोखिम चुनने वाली विषय-सत्ता है। द बोउवार द्वारा उल्लिखित वृद्ध व्यक्ति के सामाजिक ‘अन्यीकरण’ का प्रत्युत्तर यहाँ देह की पुनः स्वीकृति से मिलता है। माँ मृत्यु की संभावना से मुक्त नहीं होती, पर अपने शेष जीवन के अर्थ पर परिवार के एकाधिकार को अस्वीकार करती है।
माँ-बेटी संबंध: आधुनिकता की उलट जाँच
बेटी स्वयं को अपेक्षाकृत आधुनिक, स्वतंत्र और परंपरा-विरोधी मानती है। आरंभ में वह माँ को अपने घर लाकर देखभाल और स्वतंत्रता का वैकल्पिक स्थान देती है। किंतु माँ की स्वायत्तता जैसे-जैसे बढ़ती है, बेटी की उदारता की सीमा भी सामने आती है। जिस स्वतंत्रता को बेटी अपने लिए अधिकार मानती है, वही माँ के जोखिमपूर्ण निर्णय में उसे अविवेक दिखाई देती है। इस उलटाव से उपन्यास पीढ़ियों की सरल द्वंद्व-योजना—पुरानी माँ बनाम आधुनिक बेटी—को तोड़ता है। आधुनिकता कोई स्थायी पदवी नहीं, बल्कि दूसरे की एजेंसी स्वीकार करने की कठिन नैतिक परीक्षा है।
माँ और बेटी का संबंध देखभाल की एकतरफा धारा भी नहीं है। कभी बेटी माँ की संरक्षक है, कभी माँ बेटी की धारणाओं को पुनर्गठित करती है। दोनों के बीच निकटता, असुविधा, ईर्ष्या, स्नेह और दूरी एक साथ उपस्थित हैं। इससे स्त्री-संबंध को त्याग और मातृत्व की आदर्श छवि से बाहर जटिल मानवीय संबंध के रूप में पढ़ने का अवसर मिलता है। माँ अपनी बेटी की प्रतिकृति नहीं बनती; वह उसके घर को संक्रमण-स्थल की तरह इस्तेमाल कर अपना मार्ग चुनती है।
रोज़ी: जेंडर की तरलता और वैकल्पिक आत्मीयता
रोज़ी का चरित्र उपन्यास में जेंडर की द्विआधारी व्यवस्था को प्रत्यक्ष चुनौती देता है। परिवार और समाज जिन पहचानों को ‘अस्पष्ट’ या हाशिये का मानते हैं, माँ उन्हीं के साथ सहज आत्मीयता बनाती है। रोज़ी के साथ मित्रता माँ के वस्त्र, घरेलू स्थान और दिनचर्या में नए रंग लाती है; साथ ही यह बताती है कि परिवार जैविक संबंधों तक सीमित नहीं। चुनी हुई मित्रता भी देखभाल, सृजन और पहचान का आधार हो सकती है। नबनीता चक्रवर्ती ने उपन्यास में परिचित-अपरिचित, स्त्री-पुरुष और मानवीय-अमानवीय सीमाओं के विघटन को ‘अनकैनी’ अनुभव से जोड़ा है (Chakraborty 81-89)।
फिर भी रोज़ी को केवल माँ के कायांतरण का उपकरण मानना उचित नहीं होगा। उसकी असुरक्षा, सार्वजनिक स्थान में अनिश्चितता और हिंसा की संभावना उस सामाजिक वास्तविकता को सामने लाती है जिसमें जेंडर-अनुरूपता से बाहर व्यक्ति की नागरिकता कमजोर हो जाती है। माँ-रोज़ी संबंध इसलिए भावुक सहानुभूति से अधिक है: वह दो अलग तरह से हाशियाकृत देहों—वृद्ध स्त्री और ट्रांस/तृतीयलिंगी व्यक्ति—की अस्थायी किंतु अर्थपूर्ण साझेदारी है। यह साझेदारी मोहंती की उस स्त्रीवादी दृष्टि के निकट आती है जिसमें समानता का अर्थ अनुभवों को एक जैसा मानना नहीं, बल्कि भिन्न स्थितियों के बीच उत्तरदायी संबंध बनाना है।
सीमा, विभाजन और स्त्री की स्मृति
पाकिस्तान जाने का माँ का निर्णय उपन्यास का सबसे स्पष्ट राजनीतिक कर्म है। राज्य के लिए सीमा दस्तावेज़, अनुमति और सुरक्षा का क्षेत्र है; परिवार के लिए वह वृद्ध माँ को रोकने का तर्क; माँ के लिए वही सीमा स्मृति, प्रेम और अधूरे जीवन तक पहुँचने का मार्ग बनती है। वह राष्ट्र की वैधानिक भाषा से अपने अनुभव की सत्यता प्रमाणित नहीं कराती। विभाजन ने जिसे चंदा से दूसरे नाम और दूसरे पारिवारिक जीवन में बदल दिया, वह वृद्धावस्था में अपने दबे हुए इतिहास को पुनः ग्रहण करती है। इस यात्रा में निजी प्रेम इतिहास-विरोधी पलायन नहीं, बल्कि उस इतिहास की मानवीय कीमत का प्रमाण है।
विभाजन के बड़े आख्यान प्रायः राष्ट्र, नेतृत्व, युद्ध और विस्थापन की संख्याओं पर केंद्रित रहे हैं; स्त्रियों की स्मृतियाँ अपहरण, यौन हिंसा, बिछोह और मौन में छिपी रहती हैं। माँ का कथन आधिकारिक इतिहास का स्थान नहीं लेता, लेकिन उसके रिक्त हिस्से को दृश्य बनाता है। सीमा पर उसका अतिक्रमण राष्ट्रों के अस्तित्व का साधारण निषेध नहीं; यह उस धारणा का प्रतिवाद है कि सीमा मनुष्यों की स्मृति, प्रेम और पहचान को पूर्णतः बाँट सकती है। अनालेना गाइस्लर ने भी उपन्यास की सीमा को केवल विभाजक रेखा नहीं, संबंध बनाने और रोकने वाली विरोधाभासी प्रक्रिया माना है (Geisler)। यहाँ सीमा के पार जाना स्त्री की अपनी कथा पर पुनः अधिकार का कर्म बनता है।
भाषा और कथा-शिल्प का लैंगिक प्रतिरोध
‘रेत समाधि’ का प्रतिरोध केवल कथानक में नहीं, उसकी भाषा में भी है। वाक्य टूटते, दोहरते, खेलते और दिशाएँ बदलते हैं; कौआ, तितली, दरवाज़ा, दीवार और छड़ी भी मानो कथा में बोलने लगते हैं। रैखिक, सर्वज्ञ और अनुशासित कथन की जगह बहुध्वन्यता आती है। यह शिल्प उस सत्ता-तर्क के विपरीत है जो पहचान को एक नाम, एक लिंग, एक धर्म और एक राष्ट्र में स्थिर करना चाहता है। चक्रवर्ती के अनुसार उपन्यास वास्तविक और अद्भुत के बीच की सीमांत भूमि से सामाजिक रूप से निर्मित देहगत आदतों को अस्थिर करता है (Chakraborty 84-86)।
रेत और समाधि शीर्षक भी अर्थपूर्ण द्वंद्व रचते हैं। समाधि स्थिरता, दफन स्मृति और अंत का संकेत देती है; रेत खिसकती है, नया आकार लेती है और दबे चिन्ह को फिर उजागर कर सकती है। माँ की अस्मिता भी ऐसी ही है—परिवार ने जिस पहचान को स्थायी मान लिया था, वह स्मृति और इच्छा के स्पर्श से बदल जाती है। अतः शिल्प स्वयं जेंडर की तरलता का अनुभव कराता है; पाठक को सीधे निष्कर्ष देने के बजाय उसे भाषा की अनिश्चितता में सक्रिय भागीदार बनाता है।
निष्कर्ष
‘रेत समाधि’ समकालीन भारत में जेंडर को आयु, विधवापन, परिवार, क्वीयर पहचान, विभाजन और राष्ट्र-सीमा से जोड़कर देखने की माँग करता है। माँ का कायांतरण किसी चमत्कारी मुक्ति-कथा की तरह नहीं, बल्कि देह, संबंध, स्मृति और गति पुनः प्राप्त करने की क्रमिक प्रक्रिया के रूप में उभरता है। वह वृद्ध स्त्री की स्थापित भूमिकाओं को अस्वीकार करती है, पर अपनी आयु को नकारती नहीं; परिवार से संबंध तोड़ती नहीं, पर उसके नियंत्रण को अंतिम नहीं मानती; सीमा पार करती है, पर इतिहास के घाव को भूलती नहीं।
उपन्यास की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि यह है कि वह वृद्ध स्त्री को पीड़िता अथवा पूजनीय ‘माँ’ की दो सीमित छवियों के बीच नहीं रखता। वह त्रुटिपूर्ण, जिद्दी, प्रेमशील, जोखिम लेने वाली और राजनीतिक व्यक्ति है। इसी कारण यह कृति ‘ब्रेकिंग स्टीरियोटाइप्स’ का उदाहरण भर नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व की पद्धति में परिवर्तन है। समकालीन भारत की तेजी से बढ़ती और स्त्री-प्रधान वृद्ध आबादी के संदर्भ में यह साहित्यिक हस्तक्षेप सामाजिक रूप से भी महत्त्वपूर्ण है। ‘रेत समाधि’ बताता है कि मुक्ति हमेशा सीमा मिटाने से नहीं आती; कभी-कभी सीमा तक जाकर, उसका अर्थ बदलकर और उसके दोनों ओर दबे जीवन को पहचानकर आती है।
संदर्भ सूची (Works Cited)
Beauvoir, Simone de. The Coming of Age. Translated by Patrick O’Brian, W. W. Norton, 1996.
Butler, Judith. Gender Trouble: Feminism and the Subversion of Identity. Routledge, 1990.
Chakraborty, Nabanita. “The Uncanny in Geetanjali Shree’s Tomb of Sand: Subverting the Reality.” Critical South Asian Studies, vol. 2, no. 1, 2024, pp. 81-89. https://doi.org/10.33182/csas.v2i1.3247.
Das, Usha. “Geetanjali Shree’s ‘Ret Samadhi’: Reflection of the Psychology of the Elderly.” International Journal for Multidisciplinary Research, vol. 5, no. 4, 2023. https://doi.org/10.36948/ijfmr.2023.v05i04.5155.
Geisler, Annalena. “The Relationality of Borders in Geetanjali Shree’s Tomb of Sand.” Postcolonial Literatures and Arts, vol. 3, no. 2, 2025. https://doi.org/10.4000/15988.
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Mohanty, Chandra Talpade. Feminism without Borders: Decolonizing Theory, Practicing Solidarity. Duke UP, 2003.
Shree, Geetanjali. Tomb of Sand. Translated by Daisy Rockwell, Tilted Axis Press, 2021.
श्री, गीतांजलि. रेत समाधि. राजकमल प्रकाशन, 2018.
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