संयुक्त राष्ट्र का “Correct the Map” प्रस्ताव
मर्केटर से Equal Earth तक—अफ्रीका, मानचित्रण और वैश्विक प्रतिनिधित्व की नई राजनीति
डॉ. मनीष कुमार सी. मिश्रा
एसोसिएट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग
के. एम. अग्रवाल महाविद्यालय, कल्याण (पश्चिम), महाराष्ट्र
सितंबर 2026
सारांश
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 4 सितंबर 2026 को टोगो द्वारा अफ्रीकी समूह की ओर से प्रस्तुत “Correct the Map: Rebalancing Global Cartographic Representation and Promoting Equitable Global Understanding” प्रस्ताव (A/80/L.104) को 164 मतों से स्वीकार किया। अमेरिका ने अकेले विरोध में मतदान किया और छह देशों ने मतदान से विरत रहना चुना। प्रस्ताव सामान्य प्रयोजन के विश्व-मानचित्रों में मर्केटर प्रक्षेपण की जगह Equal Earth तथा अन्य उपयुक्त समान-क्षेत्रफल प्रक्षेपणों के प्रयोग को प्रोत्साहित करता है। यह आलेख मानचित्र-प्रक्षेपण की वैज्ञानिक समस्या, मर्केटर की नौवहन-उपयोगिता और क्षेत्रफल-विकृति, Equal Earth की विशेषताओं, अफ्रीकी संघ की “संज्ञानात्मक न्याय” संबंधी दलील, अमेरिकी असहमति तथा शिक्षा और डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर संभावित प्रभाव का आलोचनात्मक अध्ययन करता है। अध्ययन दस्तावेजी एवं तुलनात्मक पद्धति पर आधारित है और संयुक्त राष्ट्र, अफ्रीकी संघ, समकक्ष-समीक्षित मानचित्र-विज्ञान शोध तथा विश्वसनीय समाचार-स्रोतों का उपयोग करता है। निष्कर्ष यह है कि प्रस्ताव पृथ्वी का कोई एक “पूर्णतः सही” सपाट चित्र उपलब्ध नहीं कराता—क्योंकि प्रत्येक प्रक्षेपण कुछ गुणों को बचाकर अन्य गुणों में विकृति उत्पन्न करता है—फिर भी सामान्य विश्व-दृष्टि और क्षेत्रफल-तुलना के लिए Equal Earth, मर्केटर की अपेक्षा अधिक उपयुक्त है। प्रस्ताव का सबसे बड़ा महत्व कानूनी बाध्यता से नहीं, बल्कि शिक्षा, प्रतीकात्मक न्याय और वैश्विक दृश्य-संस्कृति के मानदंड बदलने की क्षमता से उत्पन्न होता है।
मुख्य शब्द: संयुक्त राष्ट्र महासभा, Correct the Map, Equal Earth, मर्केटर प्रक्षेपण, अफ्रीका, मानचित्रण, संज्ञानात्मक न्याय, उपनिवेशवाद।
1. प्रस्तावना
नक्शा केवल पृथ्वी की सतह का चित्र नहीं होता; वह दुनिया को देखने, समझने और क्रमबद्ध करने का माध्यम भी होता है। विद्यालय की दीवार, समाचार-कक्ष, कूटनीतिक प्रस्तुति या मोबाइल स्क्रीन पर दिखाई देने वाला विश्व-मानचित्र यह तय करता है कि कौन-सा भूभाग विशाल, केंद्रीय, दूरस्थ या सीमांत प्रतीत होगा। इसलिए मानचित्र का तकनीकी चयन मनोवैज्ञानिक और राजनीतिक अर्थ ग्रहण कर सकता है। J. B. Harley ने मानचित्रों को सत्ता और ज्ञान की सामाजिक संरचनाओं से जोड़ते हुए यह दिखाया कि उनका निर्माण पूरी तरह निष्पक्ष या संदर्भ-विहीन नहीं होता [7]। इस दृष्टि से 2026 का संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव केवल कार्टोग्राफी की बहस नहीं, बल्कि वैश्विक प्रतिनिधित्व की बहस भी है।
4 सितंबर 2026 को महासभा में पारित प्रस्ताव को 164 देशों का समर्थन मिला, अमेरिका ने विरोध किया तथा सर्बिया, एस्टोनिया, जॉर्जिया, लिथुआनिया, मोल्दोवा और यूक्रेन ने मतदान से परहेज किया [1][3]। इतनी व्यापक सहमति यह संकेत देती है कि सदस्य देशों ने सामान्य प्रयोजन वाले विश्व-मानचित्रों में क्षेत्रफल की तुलनात्मक शुद्धता को शिक्षा और सार्वजनिक संचार के लिए महत्त्वपूर्ण माना। किंतु लोकप्रिय समाचार-शीर्षकों में “संयुक्त राष्ट्र ने दुनिया का नक्शा बदल दिया” जैसी अभिव्यक्ति सावधानी से समझी जानी चाहिए। महासभा का प्रस्ताव सामान्यतः अनुशंसात्मक है; यह किसी देश, विद्यालय, प्रकाशक या प्रौद्योगिकी कंपनी पर स्वतः कानूनी दायित्व नहीं डालता [10]।
2. अध्ययन के उद्देश्य, प्रश्न और पद्धति
इस अध्ययन के चार उद्देश्य हैं: प्रथम, मर्केटर और Equal Earth प्रक्षेपणों के तकनीकी अंतर को स्पष्ट करना; द्वितीय, अफ्रीका के आकार और वैश्विक स्थिति की दृश्य प्रस्तुति पर इनका प्रभाव समझना; तृतीय, संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव तथा उससे पूर्व अफ्रीकी संघ की पहल की राजनीतिक-सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का परीक्षण करना; और चतुर्थ, शिक्षा, मीडिया तथा डिजिटल मानचित्रण में इसके व्यावहारिक निहितार्थों का आकलन करना।
मुख्य शोध-प्रश्न हैं: क्या मर्केटर प्रक्षेपण वस्तुतः अफ्रीका को “छोटा” करता है? Equal Earth किस अर्थ में अधिक सही है और किस अर्थ में नहीं? क्या मानचित्र-परिवर्तन को औपनिवेशिक विरासत के सुधार के रूप में देखना वैज्ञानिक रूप से संगत है? और गैर-बाध्यकारी महासभा प्रस्ताव व्यवहार में परिवर्तन कैसे ला सकता है? अध्ययन वर्णनात्मक, तुलनात्मक और आलोचनात्मक दस्तावेज-विश्लेषण का प्रयोग करता है। प्राथमिक आधार संयुक्त राष्ट्र की बैठक-सूचना और प्रस्ताव, अफ्रीकी संघ का निर्णय तथा Equal Earth का मूल शोध-पत्र हैं [1][2][5]। सहायक स्रोतों में Esri का प्रक्षेपण-विवरण, संयुक्त राष्ट्र का विधिक स्पष्टीकरण और अंतरराष्ट्रीय समाचार रिपोर्टें शामिल हैं।
3. गोल पृथ्वी को सपाट बनाने की वैज्ञानिक समस्या
पृथ्वी की वक्र सतह को सपाट कागज या स्क्रीन पर उतारते समय किसी-न-किसी प्रकार की विकृति अनिवार्य है। कोई प्रक्षेपण क्षेत्रफल, आकार, दूरी और दिशा—इन सभी गुणों को वैश्विक स्तर पर एक साथ सुरक्षित नहीं रख सकता। अतः “सही नक्शा” का अर्थ लक्ष्य-निर्भर होता है। नौवहन के लिए दिशा और स्थानीय कोण महत्त्वपूर्ण हो सकते हैं; जनसंख्या, वनक्षेत्र या महाद्वीपों के आकार की तुलना के लिए क्षेत्रफल-समानता अधिक महत्त्वपूर्ण है। इसी कारण वैज्ञानिक बहस का उचित प्रश्न यह नहीं कि कौन-सा मानचित्र हर प्रयोजन के लिए पूर्ण है, बल्कि यह है कि कौन-सा प्रक्षेपण किस कार्य के लिए उपयुक्त है।
मर्केटर एक अनुरूप या conformal प्रक्षेपण है: यह छोटे क्षेत्रों में कोण और आकृतियों की स्थानीय संगति बनाए रखता है। इसके कारण स्थिर दिक्-पथ (rhumb line) सीधे दिखाई देते हैं और ऐतिहासिक समुद्री नौवहन में यह अत्यंत उपयोगी रहा। किंतु अक्षांश बढ़ने के साथ इसका पैमाना तेजी से बढ़ता है; ध्रुवों को दिखाना संभव नहीं होता और उच्च अक्षांशों के भूभाग अत्यधिक बड़े प्रतीत होते हैं। Esri स्पष्टतः बताता है कि व्यापक क्षेत्रफल-विकृति के कारण मर्केटर सामान्य भौगोलिक विश्व-मानचित्र और विषयगत मानचित्रण के लिए अनुपयुक्त है [6]। इसलिए समस्या मर्केटर का अस्तित्व नहीं, बल्कि उसके मूल उद्देश्य से बाहर उसका सार्वभौमिक उपयोग है।
4. मर्केटर प्रक्षेपण: उपयोगिता, प्रभुत्व और विकृति
जेरार्डस मर्केटर ने 1569 में अपने प्रक्षेपण को उस युग की समुद्री जरूरतों के संदर्भ में विकसित किया। यह मान लेना ऐतिहासिक रूप से सरलीकरण होगा कि उसका गणित केवल अफ्रीका को छोटा दिखाने के उद्देश्य से बनाया गया था। परंतु यह भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है कि बाद की औपनिवेशिक और शैक्षिक संस्थाओं ने इसी मानचित्र को सामान्य विश्व-छवि के रूप में प्रसारित किया। तकनीकी उपकरण अपने मूल उद्देश्य से अलग सामाजिक प्रभाव उत्पन्न कर सकता है। यूरोप, उत्तरी अमेरिका और रूस जैसे उच्च अक्षांशों वाले क्षेत्र बड़े दिखाई देते हैं, जबकि भूमध्य रेखा के आसपास स्थित अफ्रीका का क्षेत्रफल तुलनात्मक दृश्य में दब जाता है।
अफ्रीका का वास्तविक क्षेत्रफल लगभग 30.3 मिलियन वर्ग किलोमीटर और ग्रीनलैंड का लगभग 2.1 मिलियन वर्ग किलोमीटर है; अर्थात अफ्रीका करीब चौदह गुना बड़ा है [4]। मर्केटर विश्व-मानचित्र में दोनों लगभग समान आकार के दिखाई दे सकते हैं। अधिक सटीक भाषा में कहें तो प्रक्षेपण अफ्रीका का वास्तविक क्षेत्रफल कम नहीं करता, बल्कि उच्च अक्षांशीय क्षेत्रों का दृश्य पैमाना इतना बढ़ा देता है कि अफ्रीका तुलनात्मक रूप से छोटा प्रतीत होता है। यही अंतर वैज्ञानिक सटीकता के लिए जरूरी है।
5. Equal Earth प्रक्षेपण की उत्पत्ति और विशेषताएँ
Equal Earth प्रक्षेपण को Bojan Šavrič, Tom Patterson और Bernhard Jenny ने 2018 में विकसित किया; इसका समकक्ष-समीक्षित विवरण 2019 में International Journal of Geographical Information Science में प्रकाशित हुआ [5]। यह एक समान-क्षेत्रफल (equal-area), छद्म-बेलनाकार (pseudocylindrical) प्रक्षेपण है। इसका अर्थ है कि मानचित्र पर भूभागों का क्षेत्रफल एक-दूसरे के साथ सही अनुपात में बना रहता है। इसकी रूपरेखा Robinson projection की परिचित और संतुलित दृश्य-भाषा से प्रेरित है, पर Robinson के विपरीत Equal Earth क्षेत्रफल-समानता बनाए रखता है।
Equal Earth की वक्र बाहरी सीमाएँ पृथ्वी की गोलाई का दृश्य संकेत देती हैं; समानांतर अक्षांश रेखाएँ सीधी रहती हैं; और महाद्वीपों की रूपरेखा तुलनात्मक रूप से सहज दिखती है। इसके गणितीय समीकरण सरल और संगणकीय रूप से कुशल बताए गए हैं [5]। फिर भी यह आकारों को हर स्थान पर हूबहू सुरक्षित नहीं रखता। विशेषकर किनारों और उच्च अक्षांशों पर आकृतियों में खिंचाव या संपीड़न हो सकता है। अतः इसे “बिना किसी विकृति का नक्शा” कहना गलत होगा। इसकी प्रमुख श्रेष्ठता सामान्य विश्व-मानचित्र में क्षेत्रफल का सही अनुपात और स्वीकार्य दृश्य संतुलन है।
6. तकनीकी तुलना
स्रोत: Šavrič, Patterson एवं Jenny [5]; Esri प्रक्षेपण दस्तावेज [6][14] के आधार पर लेखक द्वारा संयोजित।
7. “Correct the Map” अभियान और अफ्रीकी संघ
“Correct the Map” अभियान ने तकनीकी समस्या को सामाजिक प्रतिनिधित्व के प्रश्न से जोड़ा। Africa No Filter और Speak Up Africa जैसे संगठनों ने तर्क दिया कि विद्यालयों, मीडिया, व्यवसाय और डिजिटल प्लेटफॉर्मों में विकृत विश्व-मानचित्र अफ्रीका को वैश्विक कल्पना में सीमांत बनाते हैं [9][12]। अगस्त 2025 में अफ्रीकी संघ ने इस अभियान का समर्थन किया। फरवरी 2026 के 39वें अफ्रीकी संघ शिखर सम्मेलन के निर्णय ने मर्केटर प्रक्षेपण सहित अफ्रीका के अनुपातहीन मानचित्रीय चित्रण को सुधारने के लिए संयुक्त राष्ट्र और उसकी एजेंसियों से औपचारिक आग्रह का समर्थन किया [2]।
अफ्रीकी संघ की भाषा में यह “cognitive justice” अर्थात संज्ञानात्मक न्याय और प्रतीकात्मक प्रतिपूर्ति का प्रश्न है। संज्ञानात्मक न्याय का आशय है कि ज्ञान की संस्थाएँ दुनिया के बारे में ऐसी आधारभूत छवियाँ न दोहराएँ जो ऐतिहासिक शक्ति-असमानताओं को स्वाभाविक या तटस्थ रूप में प्रस्तुत करें। यह अवधारणा मानचित्र को केवल माप का उपकरण न मानकर स्मृति, आत्म-छवि और वैश्विक पदानुक्रम निर्मित करने वाली दृश्य भाषा के रूप में पढ़ती है। हालाँकि किसी एक प्रक्षेपण को औपनिवेशिक विषमता का अकेला कारण नहीं माना जा सकता, उसका लगातार अनुचित संदर्भ में उपयोग उस विषमता की दृश्य आदत को बनाए रख सकता है।
8. संयुक्त राष्ट्र महासभा का 2026 प्रस्ताव
टोगो ने अफ्रीकी समूह की ओर से प्रस्ताव A/80/L.104 प्रस्तुत किया। संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक बैठक-सूचना के अनुसार प्रस्ताव ने वैश्विक मानचित्रीय प्रतिनिधित्व को पुनर्संतुलित करने और समान समझ विकसित करने का आह्वान किया [1]। मतदान का परिणाम 164 पक्ष, 1 विपक्ष और 6 विरत रहा। फ्रांस और यूनाइटेड किंगडम सहित अनेक यूरोपीय देशों का समर्थन इस बात का संकेत था कि प्रश्न को केवल अफ्रीकी क्षेत्रीय मांग के रूप में नहीं देखा गया। टोगो के विदेश मंत्री Robert Dussey का मूल तर्क था कि नक्शे शिक्षा, कल्पना और सामूहिक धारणाओं को प्रभावित करते हैं।
प्रस्ताव मर्केटर पर कानूनी प्रतिबंध नहीं लगाता। न ही यह नौवहन के लिए उसके उपयोग को चुनौती देता है। टोगो के आधिकारिक स्पष्टीकरण के अनुसार समुद्री और वायु नौवहन में मर्केटर की उपयुक्तता मान्य रहती है [3]। प्रस्ताव सरकारों, संयुक्त राष्ट्र संस्थाओं, विद्यालयों, प्रकाशकों, मीडिया और प्रौद्योगिकी कंपनियों से सामान्य विश्व-चित्रण में Equal Earth अथवा उपयुक्त समान-क्षेत्रफल मानचित्रों को प्राथमिकता देने का आग्रह करता है। महासभा के ऐसे प्रस्ताव सदस्य देशों की सामूहिक राजनीतिक राय व्यक्त करते हैं, पर सामान्यतः कानून की तरह बाध्यकारी नहीं होते [10]। इसलिए प्रभाव संस्थागत स्वीकृति, पाठ्यक्रम-संशोधन और स्वैच्छिक मानक-परिवर्तन पर निर्भर करेगा।
9. अमेरिका का विरोध और उसका परीक्षण
अमेरिका एकमात्र विरोधी देश था। अमेरिकी वक्तव्य ने प्रस्ताव को वैचारिक एजेंडा और अंतरराष्ट्रीय शांति, समृद्धि तथा अच्छे संबंधों की वास्तविक समस्याओं से ध्यान भटकाने वाला प्रयास कहा [1][3]। इस आपत्ति के दो स्तर हैं। पहला प्रक्रियात्मक: क्या महासभा को मानचित्र-प्रक्षेपण जैसे विषय पर समय और संसाधन लगाने चाहिए? दूसरा वैचारिक: क्या एक तकनीकी मानचित्र को औपनिवेशिक न्याय की भाषा से जोड़ना विज्ञान का राजनीतिकरण है?
आलोचनात्मक दृष्टि से अमेरिकी आपत्ति में यह उपयोगी चेतावनी निहित है कि मानचित्र-विज्ञान को नारे में सीमित नहीं करना चाहिए। मर्केटर का गणित औपनिवेशिक षड्यंत्र का स्वतः प्रमाण नहीं है और Equal Earth भी सर्वप्रयोजन समाधान नहीं। फिर भी “विचारधारा” कहकर क्षेत्रफल-विकृति के सत्य और शिक्षा पर उसके प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता। संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव तकनीकी उपयोग-विभाजन को स्वीकार करता है: नौवहन के लिए मर्केटर, किंतु सामान्य विश्व-दृष्टि और तुलनात्मक क्षेत्रफल के लिए समान-क्षेत्रफल प्रक्षेपण। इस सीमित और व्यावहारिक लक्ष्य को वैश्विक शांति से असंबद्ध बताना महासभा के व्यापक शैक्षिक और सांस्कृतिक कार्यक्षेत्र को अत्यंत संकीर्ण रूप में देखना होगा।
10. मानचित्र, शक्ति और औपनिवेशिक दृष्टि
औपनिवेशिक शासन ने सर्वेक्षण, सीमा-निर्धारण, संसाधन-सूचीकरण और प्रशासन में मानचित्रों का व्यापक उपयोग किया। मानचित्र ने क्षेत्र को पठनीय बनाकर सत्ता को कराधान, सैन्य नियंत्रण और वर्गीकरण में सहायता दी। Harley की “Deconstructing the Map” यह रेखांकित करती है कि मानचित्र का मौन, चयन और श्रेणीकरण भी अर्थ पैदा करता है [7]। उत्तर को ऊपर, यूरोप को केंद्र में और साम्राज्यिक क्षेत्रों को विशिष्ट रंगों में दिखाने की परंपराएँ तटस्थ प्रकृति के नियम नहीं थीं; वे ऐतिहासिक निर्णय थीं।
फिर भी उत्तर-औपनिवेशिक आलोचना को तकनीकी इतिहास से संवाद बनाए रखना चाहिए। सभी केंद्रित विश्व-मानचित्र किसी क्षेत्र को किनारे पर रखेंगे; ऊपर और नीचे का चयन भी संदर्भानुसार बदला जा सकता है; और क्षेत्रफल-समानता आकार-समानता की गारंटी नहीं देती। इसलिए न्यायपूर्ण कार्टोग्राफी का अर्थ किसी एक नक्शे को अंतिम सत्य घोषित करना नहीं, बल्कि उद्देश्य, चयन और विकृतियों को स्पष्ट करना है। Equal Earth की नैतिक शक्ति इसी पारदर्शिता में है: यह सामान्य विश्व-तुलना में क्षेत्रफल को प्राथमिकता देता है और दर्शक को बताता है कि यह निर्णय क्यों लिया गया।
11. शिक्षा पर संभावित प्रभाव
विद्यालयी मानचित्र बच्चों की पहली वैश्विक स्मृति बनते हैं। यदि छात्र वर्षों तक अफ्रीका और ग्रीनलैंड को लगभग समान आकार में देखते हैं, तो वास्तविक क्षेत्रफल संबंधी तथ्य पढ़ने के बाद भी दृश्य पूर्वधारणा बनी रह सकती है। Equal Earth का प्रयोग अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका, दक्षिण एशिया और अन्य निम्न-अक्षांशीय क्षेत्रों की तुलनात्मक स्थिति को अधिक यथार्थ बनाएगा। इससे जनसंख्या घनत्व, जैव-विविधता, कृषि, जलवायु, संसाधन और विकास-सूचकों के विषयगत मानचित्र भी अधिक जिम्मेदारी से पढ़े जा सकेंगे।
पाठ्यपुस्तक सुधार केवल चित्र बदलने तक सीमित नहीं होना चाहिए। विद्यार्थियों को globe और अनेक projections की तुलना, Tissot indicatrix जैसे विकृति-दर्शक साधन, और “उद्देश्य के अनुसार प्रक्षेपण” की अवधारणा पढ़ाई जानी चाहिए। एक अभ्यास में मर्केटर, Equal Earth, Gall–Peters, Robinson और globe पर अफ्रीका, रूस, भारत तथा ग्रीनलैंड की तुलना कराई जा सकती है। इससे छात्र मानचित्र को अंतिम सत्य नहीं, बल्कि गणितीय चयन और सांस्कृतिक संप्रेषण के रूप में समझेंगे।
12. डिजिटल प्लेटफॉर्म और Web Mercator
आधुनिक बहस में एक जटिलता Web Mercator है, जो ऑनलाइन स्लिपी-मैप टाइलों का वास्तविक मानक बन चुका है। स्थानीय स्तर पर zoom करके सड़क, भवन और मार्ग दिखाने में इसका आयताकार टाइल तंत्र अत्यंत सुविधाजनक है। EPSG:3857 का घोषित क्षेत्र “web mapping and visualisation” है, किंतु उसमें भू-मापन संबंधी सीमाएँ भी दर्ज हैं [13]। इसलिए डिजिटल कंपनियों से मर्केटर को हर स्तर पर हटाना व्यावहारिक नहीं होगा।
उचित समाधान स्तर-आधारित हो सकता है। वैश्विक zoom या विश्व-सारांश दृश्य में Equal Earth जैसे प्रक्षेपण का प्रयोग किया जाए; उपयोगकर्ता के स्थानीय क्षेत्र में zoom करने पर Web Mercator अथवा स्थानीय उपयुक्त coordinate system सक्रिय हो सकता है। सांख्यिकीय choropleth मानचित्रों के लिए equal-area projection अनिवार्य प्राथमिकता होनी चाहिए, क्योंकि असमान क्षेत्रफल दृश्य पैटर्न को भ्रामक बना सकता है। प्रस्ताव का वास्तविक परीक्षण यही होगा कि क्या तकनीकी कंपनियाँ सामान्य विश्व-दृश्य और विश्लेषणात्मक मानचित्रों में प्रक्षेपण-सचेत डिजाइन अपनाती हैं।
13. प्रस्ताव की सीमाएँ और सावधानियाँ
इस पहल की सफलता के लिए पाँच सावधानियाँ आवश्यक हैं। पहला, “अफ्रीका को बड़ा करने” के बजाय “क्षेत्रफल का सही अनुपात दिखाने” की भाषा अपनाई जाए। दूसरा, मर्केटर की नौवहन और स्थानीय web-mapping उपयोगिता को अस्वीकार न किया जाए। तीसरा, Equal Earth को विकृतिहीन या पृथ्वी का अंतिम सत्य न कहा जाए। चौथा, सीमाओं, विवादित भूभागों और नामकरण जैसे अन्य मानचित्रीय प्रश्नों के लिए अलग स्पष्ट नीतियाँ हों। पाँचवाँ, प्रतीकात्मक बदलाव को अफ्रीका की वास्तविक राजनीतिक, आर्थिक और संस्थागत चुनौतियों का विकल्प न बनाया जाए।
मानचित्र सुधार गरीबी, ऋण, संघर्ष, जलवायु संकट या वैश्विक संस्थाओं में प्रतिनिधित्व की कमी को सीधे समाप्त नहीं करेगा। किंतु प्रतीक और संरचना परस्पर विरोधी नहीं होते। पाठ्यपुस्तक में सही अनुपात वाला नक्शा अपनाने की लागत सीमित है, जबकि उसका शैक्षिक लाभ दीर्घकालिक हो सकता है। इसीलिए इसे न तो चमत्कारी न्याय के रूप में प्रस्तुत करना चाहिए, न निरर्थक प्रतीकवाद के रूप में खारिज करना चाहिए।
14. भारत के लिए निहितार्थ
भारत के विद्यालयी एटलस, विश्वविद्यालयी भूगोल, मीडिया ग्राफिक्स और सरकारी प्रस्तुतियों में भी प्रक्षेपण का उद्देश्य स्पष्ट करने की आवश्यकता है। भारत स्वयं भूमध्य रेखा के अपेक्षाकृत निकट स्थित विशाल विकासशील देश है और वैश्विक दक्षिण की अधिक संतुलित दृश्य-उपस्थिति से लाभान्वित होता है। राष्ट्रीय पाठ्यचर्या में Equal Earth को सामान्य विश्व-मानचित्र के विकल्प के रूप में सम्मिलित करना, साथ ही मर्केटर के ऐतिहासिक और नौवहन उपयोग को पढ़ाना, वैज्ञानिक तथा बहुपक्षीय दोनों दृष्टियों से संगत होगा।
भारत-अफ्रीका संबंधों के संदर्भ में यह विषय सांस्कृतिक कूटनीति का भी अवसर है। विश्वविद्यालय संयुक्त मानचित्र-साक्षरता परियोजनाएँ, हिन्दी और अफ्रीकी भाषाओं में डिजिटल संसाधन तथा उपनिवेशोत्तर भूगोल पर पाठ्यक्रम विकसित कर सकते हैं। परंतु भारत को किसी मानचित्र के राजनीतिक सीमांकन और उसके projection को अलग-अलग प्रश्न मानना होगा: Equal Earth क्षेत्रफल-समानता प्रदान करता है, किंतु सीमाओं या संप्रभुता विवादों का समाधान नहीं करता।
15. निष्कर्ष
संयुक्त राष्ट्र महासभा का 4 सितंबर 2026 का निर्णय कार्टोग्राफी के इतिहास में एक उल्लेखनीय मानक-संकेत है। 164 देशों का समर्थन बताता है कि वैश्विक समुदाय का बड़ा हिस्सा सामान्य विश्व-मानचित्र में क्षेत्रफल-समानता को महत्त्व देता है। प्रस्ताव की शक्ति आदेश में नहीं, मानदंड निर्माण में है। यदि विद्यालय, मीडिया, प्रकाशक, अंतरराष्ट्रीय संगठन और डिजिटल प्लेटफॉर्म इसके अनुरूप व्यवहार बदलते हैं, तो Equal Earth वैश्विक दृश्य-संस्कृति में नई सामान्यता स्थापित कर सकता है।
वैज्ञानिक निष्कर्ष स्पष्ट है: मर्केटर गलत गणित नहीं, बल्कि सीमित उद्देश्य का उत्कृष्ट उपकरण है; वह सामान्य विश्व-क्षेत्रफल तुलना के लिए गलत चयन है। Equal Earth हर गुण को सुरक्षित नहीं रखता, किंतु भूभागों के पारस्परिक क्षेत्रफल को सही रखकर सामान्य शिक्षा और विषयगत विश्व-मानचित्रण के लिए बेहतर संतुलन प्रस्तुत करता है। राजनीतिक निष्कर्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है: दुनिया को कैसे चित्रित किया जाता है, यह दुनिया में किसे कितना स्थान दिया जाता है—इस प्रश्न से अलग नहीं है। “Correct the Map” की सबसे टिकाऊ उपलब्धि शायद यही होगी कि वह मानचित्र को अदृश्य और निष्पक्ष पृष्ठभूमि मानने की आदत तोड़कर दर्शक से पूछता है—यह चित्र किस उद्देश्य से, किन समझौतों के साथ और किस दृष्टि से बनाया गया है?
संदर्भ
[1] United Nations. (2026, 4 September). General Assembly adopts text to “Correct the Map”, among other resolutions. UN Meetings Coverage, GA/12779.
[2] African Union. (2026). Decisions of the Thirty-Ninth Ordinary Session of the Assembly of the Union, 14–15 February 2026, Addis Ababa; Assembly/AU/Dec.959(XXXIX), pp. 37–38.
[3] Reuters. (2026, 4 September). “UN approves resolution in support of map that shows Africa’s true size.”
[4] Reuters Graphics. (2025, 3 September). “The true size of Africa.”
[5] Šavrič, B., Patterson, T., & Jenny, B. (2019). The Equal Earth map projection. International Journal of Geographical Information Science, 33(3), 454–465. https://doi.org/10.1080/13658816.2018.1504949
[6] Esri. (2026). Mercator—ArcGIS Pro documentation: Description and limitations.
[7] Harley, J. B. (1989). Deconstructing the map. Cartographica, 26(2), 1–20. https://doi.org/10.3138/E635-7827-1757-9T53
[8] American Cartographer. (1989). The case against rectangular world maps. The American Cartographer/Cartography and Geographic Information Systems, 16(3), 222–223.
[9] Correct The Map. (2025–2026). Campaign website and educational materials. https://correctthemap.org/
[10] United Nations. (n.d.). How decisions are made at the UN: General Assembly resolutions as recommendations.
[11] Associated Press. (2026, 4 September). “UN General Assembly endorses a new world map that shows more accurately Africa’s size.”
[12] Reuters. (2025, 14 August). “African Union urges adoption of world map showing continent’s true size.”
[13] EPSG Geodetic Parameter Dataset. (2020 revision). EPSG:3857—WGS 84 / Pseudo-Mercator: scope and remarks.
[14] Esri. (2026). Equal Earth—ArcGIS Pro documentation.
[15] Monmonier, M. (2018). How to Lie with Maps (3rd ed.). University of Chicago Press.
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