Monday, 7 September 2026

संविधान सभा की बहसों में शराब अनुच्छेद 47 की निर्मिति, निषेध-विमर्श, स्वतंत्रता, जनस्वास्थ्य और आदिवासी स्वायत्तता का ऐतिहासिक-संवैधानिक अध्ययन डॉ. मनीष कुमार सी. मिश्रा

 


शोध-आलेख

संविधान सभा की बहसों में शराब

अनुच्छेद 47 की निर्मिति, निषेध-विमर्श, स्वतंत्रता, जनस्वास्थ्य और आदिवासी स्वायत्तता का ऐतिहासिक-संवैधानिक अध्ययन


डॉ. मनीष कुमार सी. मिश्रा

एसोसिएट प्रोफेसर, हिंदी विभाग, के. एम. अग्रवाल महाविद्यालय, कल्याण (पश्चिम), महाराष्ट्र

सितंबर 2026

सारांश

यह शोध-आलेख भारतीय संविधान सभा में शराब और अन्य मादक पदार्थों से संबंधित बहसों का प्राथमिक स्रोतों पर आधारित विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इसका केंद्र 23 और 24 नवंबर 1948 को प्रारूप अनुच्छेद 38 पर हुई चर्चा है, जो पुनर्संख्यांकन के बाद संविधान का अनुच्छेद 47 बना। मूल प्रारूप में राज्य को पोषण-स्तर, जीवन-स्तर और जनस्वास्थ्य सुधारने का दायित्व दिया गया था; शराबबंदी का स्पष्ट वाक्य सभा में संशोधन के माध्यम से जोड़ा गया। महावीर त्यागी और प्रो. शिब्बन लाल सक्सेना ने निषेध को गांधीवादी सामाजिक सुधार, श्रमिक परिवारों की आर्थिक सुरक्षा और सार्वजनिक स्वास्थ्य का साधन माना। बी. एच. खारडेकर ने अमेरिकी निषेध की विफलता, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, राजस्व-हानि, भ्रष्टाचार और अवैध शराब की आशंका उठाई। जयपाल सिंह ने आदिवासी धार्मिक-सांस्कृतिक जीवन में चावल की बियर की भूमिका पर बल देकर एकरूपी निषेध के विरुद्ध सांस्कृतिक स्वायत्तता का प्रश्न सामने रखा। ए. वी. ठक्कर, बी. जी. खेर और लक्ष्मीनारायण साहू ने इसके प्रत्युत्तर में सामाजिक संरक्षण तथा क्रमिक सुधार की दलील दी। सरदार भूपिंदर सिंह मान का तंबाकू को भी शामिल करने का प्रस्ताव इस विमर्श की श्रेणीगत सीमा को उजागर करता है। डॉ. बी. आर. आंबेडकर ने नीति-निदेशक तत्त्वों की गैर-न्यायोचित प्रकृति, राज्य को उपलब्ध समयगत और पद्धतिगत विवेक, तथा छठी अनुसूची में आदिवासी स्वायत्तता के संरक्षण का उल्लेख कर समझौते का संवैधानिक ढाँचा स्पष्ट किया। आलेख का निष्कर्ष है कि अनुच्छेद 47 तत्काल और सर्वदेशीय दंडात्मक निषेध का आदेश नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य की दिशा में राज्य के प्रयास का मानक है; इसे मूल अधिकारों, संघवाद, वैज्ञानिक प्रमाण, सामाजिक न्याय और सांस्कृतिक बहुलता के साथ पढ़ना चाहिए।

मुख्य शब्द: संविधान सभा; शराबबंदी; अनुच्छेद 47; नीति-निदेशक तत्त्व; महावीर त्यागी; शिब्बन लाल सक्सेना; बी. एच. खारडेकर; जयपाल सिंह; बी. आर. आंबेडकर; जनस्वास्थ्य; आदिवासी स्वायत्तता

अध्ययन की केंद्रीय स्थापना

अनुच्छेद 47 तत्काल, सर्वदेशीय और एकरूपी दंडात्मक निषेध का स्वचालित आदेश नहीं है। यह जनस्वास्थ्य के व्यापक संवैधानिक कर्तव्य के भीतर राज्य को निषेध की दिशा में प्रयास का मानक देता है, जिसकी पूर्ति क्रमिक, आंशिक, क्षेत्र-संवेदनशील और प्रमाण-आधारित उपायों से भी हो सकती है।

विषय-सूची

1. प्रस्तावना

2. शोध-समस्या, प्रश्न और पद्धति

3. औपनिवेशिक आबकारी, राष्ट्रवाद और निषेध की पृष्ठभूमि

4. प्रारूप अनुच्छेद 38 से अनुच्छेद 47 तक

5. महावीर त्यागी और शिब्बन लाल सक्सेना: गांधीवादी कल्याण का तर्क

6. बी. एच. खारडेकर: स्वतंत्रता, विफलता और प्रशासनिक यथार्थ

7. जयपाल सिंह: आदिवासी संस्कृति, धार्मिक अधिकार और चावल की बियर

8. प्रत्युत्तर: बी. जी. खेर, ए. वी. ठक्कर और लक्ष्मीनारायण साहू

9. तंबाकू संशोधन और नीति की श्रेणीगत सीमा

10. डॉ. आंबेडकर का संवैधानिक समझौता

11. अनुच्छेद 47 का पाठ और उसका व्याकरण

12. नीति-निदेशक तत्त्व, मूल अधिकार और लोकतांत्रिक विवेक

13. संघवाद, राज्य-शक्ति और राजस्व का अंतर्विरोध

14. सर्वोच्च न्यायालय की व्याख्या में अनुच्छेद 47

15. वर्ग, जाति, श्रम और परिवार

16. लिंग-न्याय, घरेलू क्षेत्र और निषेध

17. आदिवासी संवैधानिकता और छठी अनुसूची

18. नैतिकता बनाम जनस्वास्थ्य

19. निषेध की प्रभावशीलता को परखने की कसौटियाँ

20. बहस के प्रमुख वैचारिक प्रतिमान

21. आलोचनात्मक पुनर्पाठ: सभा ने क्या कहा और क्या नहीं कहा

22. समकालीन नीति के लिए संवैधानिक सिद्धांत

23. विस्तृत निष्कर्ष

24. वक्ता-केंद्रित तुलनात्मक विश्लेषण

25. शब्दावली का सूक्ष्म पाठ: निषेध, सेवन, हानि और औषधि

26. पूर्ण निषेध, आंशिक निषेध और विनियमित नियंत्रण

27. शोधार्थियों के लिए स्रोत-समीक्षा और सावधानियाँ

28. उपसंहार: शराब-विमर्श से संविधान की व्यापक समझ

29. परिशिष्टात्मक विश्लेषण: बारह केंद्रीय निष्कर्ष

30. भावी अनुसंधान की दिशाएँ

1. प्रस्तावना

भारतीय संविधान केवल शासन-संस्थाओं की रूपरेखा नहीं है; वह उस सामाजिक रूपांतरण की परियोजना भी है जिसे स्वतंत्रता के बाद भारतीय गणराज्य ने अपने लिए निर्धारित किया। संविधान का भाग IV—राज्य के नीति-निदेशक तत्त्व—इसी परिवर्तनकारी आकांक्षा का घोषणापत्र है। इन्हीं तत्त्वों में अनुच्छेद 47 राज्य को पोषण-स्तर और जीवन-स्तर ऊँचा करने, जनस्वास्थ्य सुधारने तथा औषधीय प्रयोजनों को छोड़कर स्वास्थ्य के लिए हानिकारक मादक पेयों और औषधियों के सेवन पर निषेध लाने का प्रयास करने की दिशा देता है। आज शराबबंदी पर चर्चा प्रायः चुनाव, अपराध, राजस्व या नैतिकता तक सीमित रहती है, जबकि संविधान सभा की बहस दिखाती है कि मूल प्रश्न कहीं अधिक जटिल था: स्वतंत्र नागरिक के चुनाव की सीमा क्या हो; निर्धन परिवारों की आय और स्वास्थ्य की रक्षा कैसे हो; राज्य सामाजिक सुधार के लिए कितना दंडात्मक हो; और क्या बहुसंख्यक नैतिक दृष्टि को आदिवासी धार्मिक-सांस्कृतिक प्रथाओं पर आरोपित किया जा सकता है?

इस विषय की विशेषता यह है कि शराबबंदी मूल प्रारूप अनुच्छेद 38 का हिस्सा नहीं थी। 1948 के प्रारूप में केवल पोषण, जीवन-स्तर और जनस्वास्थ्य की बात थी। 23 नवंबर को महावीर त्यागी ने सभा के तल से निषेध-संबंधी शब्द जोड़ने का संशोधन प्रस्तुत किया; 24 नवंबर को प्रो. शिब्बन लाल सक्सेना ने “औषधीय प्रयोजनों को छोड़कर” अपवाद जोड़ने का प्रस्ताव रखा; डॉ. आंबेडकर ने “विशेष रूप से” जोड़कर निषेध को जनस्वास्थ्य के व्यापक कर्तव्य के भीतर स्थापित किया। इसलिए अनुच्छेद 47 की भाषा समिति-कक्ष में पूर्णतः तैयार होकर नहीं आई, बल्कि बहस, विरोध, परिष्कार और समझौते से बनी। यह प्रक्रिया संविधान-निर्माण के लोकतांत्रिक चरित्र का जीवंत उदाहरण है।

बहस का एक पक्ष औपनिवेशिक आबकारी व्यवस्था के प्रति अविश्वास था। औपनिवेशिक राज्य ने शराब को केवल सामाजिक समस्या के रूप में नहीं, राजस्व के स्रोत के रूप में भी देखा। राष्ट्रवादी राजनीति ने इस व्यवस्था की आलोचना की और संयम अथवा निषेध को स्वराज, ग्राम-कल्याण और परिवार की सुरक्षा से जोड़ा। किंतु स्वतंत्र राज्य को उसी क्षण वित्तीय पुनर्निर्माण, शरणार्थी पुनर्वास, खाद्य-संकट, शिक्षा और स्वास्थ्य पर खर्च करना था। इस कारण प्रश्न केवल नैतिक इच्छा का नहीं, प्रशासनिक क्षमता और संसाधनों की प्राथमिकता का भी था। खारडेकर की आपत्ति इसी व्यावहारिक तनाव को सामने लाती है; सक्सेना इसके विपरीत शराब पर होने वाले निजी व्यय और उससे उत्पन्न सामाजिक लागत को राजस्व से अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं।

जयपाल सिंह के हस्तक्षेप ने बहस का क्षितिज निर्णायक रूप से बदल दिया। उन्होंने बताया कि आदिवासी समाजों में चावल की बियर केवल नशे का पदार्थ नहीं, धार्मिक अनुष्ठान, सामुदायिकता और श्रम-संस्कृति से जुड़ी वस्तु है। इस तर्क ने “शराब” को एक समान सामाजिक श्रेणी मान लेने की समस्या उजागर की। आसवित वाणिज्यिक मदिरा, स्थानीय किण्वित पेय, औषधीय अल्कोहल और मादक औषधियाँ न तो रासायनिक रूप से समान हैं, न सामाजिक अर्थ में। आंबेडकर का उत्तर—छठी अनुसूची के स्वायत्त जिला और क्षेत्रीय परिषदों की सहमति का संरक्षण—भारतीय संघवाद के भीतर सांस्कृतिक बहुलता की संवैधानिक तकनीक को प्रकट करता है।

यह आलेख न तो शराब के सेवन का समर्थन करता है, न किसी विशेष राज्य की निषेध नीति का प्रचार। इसका उद्देश्य संविधान सभा के तर्कों को उनके समय, भाषा और संस्थागत संदर्भ में समझना है। ऐतिहासिक कथन और सभा-सदस्यों के दावे अलग-अलग रखे गए हैं; 1948 में सदस्यों द्वारा बताए गए राजस्व या सामाजिक प्रभाव के आँकड़ों को वर्तमान सत्य मानकर नहीं दोहराया गया है। जहाँ प्रत्यक्ष उद्धरण दिए गए हैं, वे संक्षिप्त, क्रमांकित और स्रोत-सूची से संबद्ध हैं। शेष विवेचन प्राथमिक अभिलेख का विश्लेषणात्मक सार है।

2. शोध-समस्या, प्रश्न और पद्धति

इस अध्ययन की मूल समस्या यह है कि अनुच्छेद 47 को अक्सर एक पंक्ति में “संविधान ने शराबबंदी का आदेश दिया” कहकर प्रस्तुत किया जाता है। यह कथन अधूरा है। अनुच्छेद 37 स्पष्ट करता है कि नीति-निदेशक तत्त्व न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं हैं, यद्यपि वे शासन में मूलभूत हैं और कानून बनाते समय राज्य का कर्तव्य है कि उन्हें लागू करे। दूसरी ओर अनुच्छेद 47 की क्रिया “प्रयास करेगा” है, और उसका निषेध-वाक्य जनस्वास्थ्य के प्राथमिक कर्तव्य के भीतर “विशेष रूप से” रखा गया है। इस व्याकरण और संस्थागत स्थान को समझे बिना संविधान सभा की मंशा का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं।

अध्ययन पाँच प्रश्न पूछता है। पहला, शराबबंदी का विचार प्रारूप अनुच्छेद 38 में किस प्रक्रिया से जोड़ा गया? दूसरा, समर्थक और विरोधी सदस्यों ने स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था, नैतिकता और स्वतंत्रता के बीच संबंध कैसे बनाया? तीसरा, जयपाल सिंह की आपत्ति ने धर्म, संस्कृति और आदिवासी स्वशासन का कौन-सा प्रश्न उपस्थित किया? चौथा, आंबेडकर ने नीति-निदेशक तत्त्व और छठी अनुसूची के माध्यम से विरोधी हितों में किस प्रकार संतुलन बनाया? पाँचवाँ, बाद के संवैधानिक कानून और न्यायिक व्याख्या में इन बहसों का क्या महत्व है?

प्राथमिक सामग्री में संविधान सभा वाद-विवाद का आधिकारिक खंड VII, 23 और 24 नवंबर 1948 की कार्यवाही, 1948 का प्रारूप संविधान, 1950 का संविधान, अनुच्छेद 37 और 47, सातवीं अनुसूची की राज्य सूची की प्रविष्टियाँ 8 और 51, तथा छठी अनुसूची का संबंधित प्रावधान सम्मिलित हैं। बाद की व्याख्या के लिए सर्वोच्च न्यायालय के प्रमाणित निर्णय—स्टेट ऑफ बॉम्बे बनाम एफ. एन. बलसारा, हर शंकर बनाम डिप्टी एक्साइज एंड टैक्सेशन कमिश्नर, पी. एन. कौशल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया, खोडे डिस्टिलरीज लिमिटेड बनाम स्टेट ऑफ कर्नाटक और केरल बार होटल्स एसोसिएशन बनाम स्टेट ऑफ केरल—देखे गए हैं। इन निर्णयों का उपयोग 1948 की मंशा को पीछे से आरोपित करने के लिए नहीं, बल्कि अनुच्छेद 47 के बाद के विधिक जीवन को समझने के लिए किया गया है।

पद्धति ऐतिहासिक-पाठीय और संवैधानिक है। वक्तव्यों को केवल “पक्ष” तथा “विपक्ष” में नहीं बाँटा गया; उनके भीतर छिपी मान्यताओं की जाँच की गई है। उदाहरणतः निषेध-समर्थक श्रमिक-परिवार की रक्षा की बात करते हैं, पर उनकी भाषा कभी-कभी संरक्षणवादी और जाति-आधारित सामान्यीकरण से युक्त है। स्वतंत्रता-समर्थक आपत्ति राज्य के अतिक्रमण को पहचानती है, पर वह लत, घरेलू हिंसा और निर्धनता की संरचनात्मक समस्या को कम आँक सकती है। आदिवासी अधिकार का तर्क सांस्कृतिक आत्मनिर्णय की रक्षा करता है, किंतु समुदाय के भीतर स्वास्थ्य और लैंगिक न्याय के प्रश्न भी बने रहते हैं। इस प्रकार बहस को नैतिक द्वंद्व के बजाय बहुस्तरीय संवैधानिक समस्या के रूप में पढ़ा गया है।

उद्धरण-प्रणाली में मूल अंग्रेजी अभिलेख के अत्यंत छोटे अंश लिए गए हैं और साथ में हिंदी अर्थ दिया गया है। संख्या लेख के भीतर “उद्धरण–1” आदि रूप में है। संदर्भ-सूची में उसी संख्या के सामने वक्ता, दिनांक, आधिकारिक खंड और प्रासंगिक पृष्ठ/कार्यवाही दी गई है। लंबी बातें अनुवादित सार के रूप में हैं ताकि संदर्भ से काटे हुए वाक्य को सदस्य की संपूर्ण स्थिति न माना जाए।

3. औपनिवेशिक आबकारी, राष्ट्रवाद और निषेध की पृष्ठभूमि

भारत में मदिरा-नियमन का इतिहास संविधान से बहुत पुराना है। स्थानीय समाजों में ताड़ी, महुआ, चावल या अन्य अनाज से बने किण्वित पेयों की विविध परंपराएँ थीं। औपनिवेशिक प्रशासन ने इन्हें लाइसेंस, ठेका, उत्पादन-नियंत्रण और आबकारी कर की व्यापक व्यवस्था में बाँधा। इससे शराब राजस्व का नियमित साधन बनी और प्रशासनिक वर्गीकरण ने विविध पेयों को “देशी”, “विदेशी”, आसवित या किण्वित श्रेणियों में रखा। राष्ट्रवादी आलोचना का कहना था कि सरकार एक ओर सामाजिक अनुशासन की बात करती है, दूसरी ओर आय के लिए बिक्री को संस्थागत प्रोत्साहन देती है। इस अंतर्विरोध ने निषेध को वित्तीय प्रश्न के साथ-साथ औपनिवेशिक नैतिकता के प्रश्न में बदल दिया।

उन्नीसवीं और बीसवीं शताब्दी के संयम आंदोलनों में धार्मिक सुधार, महिला सक्रियता, जाति-सुधार और श्रमिक कल्याण के सूत्र मिले। अनेक परिवारों के लिए शराब का प्रश्न घरेलू आय, ऋण, हिंसा और असुरक्षा से जुड़ा था। महिलाओं का निषेध-समर्थन केवल “नैतिक शुद्धता” नहीं था; उसमें परिवार के संसाधनों पर दावा और सार्वजनिक नीति में घरेलू अनुभव की मान्यता भी थी। फिर भी संयम की राजनीति कभी-कभी उच्च जातीय नैतिकता और गरीब समुदायों की निगरानी का रूप ले सकती थी। संविधान सभा की भाषा में ये दोनों विरासतें दिखाई देती हैं—कल्याणकारी चिंता भी और अनुशासनकारी दृष्टि भी।

महात्मा गांधी ने शराब को स्वराज की सामाजिक बुनियाद से जोड़ा। उनके लिए राजनीतिक स्वतंत्रता तब अधूरी थी जब गरीब की मजदूरी नशे में नष्ट हो, परिवार असुरक्षित रहे और राज्य उससे राजस्व प्राप्त करे। कांग्रेस के रचनात्मक कार्यक्रम में निषेध का महत्वपूर्ण स्थान था। 1937 के प्रांतीय चुनावों के बाद कई कांग्रेसी मंत्रिमंडलों ने अलग-अलग स्तर पर निषेध-नीति अपनाने की कोशिश की। मद्रास और बॉम्बे के अनुभवों का सभा में बार-बार उल्लेख इसी राजनीतिक इतिहास का परिणाम था। हालाँकि उन अनुभवों की सफलता पर वक्ताओं की धारणाएँ भिन्न थीं और व्यवस्थित तुलनात्मक आँकड़े बहस में उपलब्ध नहीं कराए गए।

स्वतंत्रता के निकट आते समय आर्थिक परिस्थिति असाधारण थी। विभाजन, विस्थापन, खाद्यान्न की कमी और सीमित कर-क्षमता के बीच प्रांतीय सरकारें आबकारी राजस्व छोड़ने से हिचक सकती थीं। संविधान सभा के साथ संलग्न वित्तीय विशेषज्ञ समिति ने भी संकेत किया था कि निषेध जैसी सामाजिक सुधार योजनाओं की राजस्व-हानि की भरपाई प्रांतों को स्वयं सोचनी होगी और विकास-कार्य तथा सामाजिक सुधार की तात्कालिकताओं में संतुलन बनाना होगा। इससे स्पष्ट है कि निषेध को स्वीकार करने वाले राजनीतिक वातावरण के भीतर भी वित्तीय व्यावहारिकता पर गंभीर चिंता थी।

अमेरिकी निषेध का उदाहरण भी बहस की पृष्ठभूमि में था। संयुक्त राज्य अमेरिका के अठारहवें संशोधन ने मदिरा पर राष्ट्रीय निषेध स्थापित किया था और इक्कीसवें संशोधन ने उसे निरस्त किया। खारडेकर ने इसे चेतावनी माना कि संविधान में व्यापक निषेध लिखना अवैध बाजार और प्रशासनिक विफलता पैदा कर सकता है। निषेध-समर्थकों ने इसके विपरीत तर्क दिया कि किसी अन्य देश की विफलता भारत के सामाजिक अनुभव को निर्णायक नहीं कर सकती। यह तुलना दिखाती है कि संविधान सभा वैश्विक प्रयोगों से परिचित थी, पर भारतीय समाधान को स्थानीय नैतिक और सामाजिक परिस्थितियों में रखना चाहती थी।

इस पृष्ठभूमि में “निषेध” तीन अर्थों में उपस्थित था। पहला, व्यक्ति को हानिकारक नशे से बचाने वाला जनस्वास्थ्य उपाय; दूसरा, परिवार की आय और श्रम-क्षमता सुरक्षित करने वाला सामाजिक-आर्थिक सुधार; और तीसरा, औपनिवेशिक राजस्व-राज्य से नैतिक दूरी बनाने वाला राष्ट्रवादी प्रतीक। विरोधियों के लिए यही नीति चौथे अर्थ में दिखाई दी—व्यक्तिगत चुनाव में राज्य का हस्तक्षेप। आदिवासी प्रतिनिधि के लिए पाँचवाँ अर्थ उभरा—एक ऐसी बहुसंख्यक नीति जो स्थानीय धार्मिक-सांस्कृतिक जीवन को अपरिचित मानकों से नियंत्रित कर सकती थी।

4. प्रारूप अनुच्छेद 38 से अनुच्छेद 47 तक

1948 के प्रारूप संविधान का अनुच्छेद 38 संक्षिप्त था। उसमें राज्य को लोगों के पोषण-स्तर और जीवन-स्तर को ऊँचा करने तथा जनस्वास्थ्य सुधारने को प्राथमिक कर्तव्य मानने की दिशा दी गई थी। उसमें शराब, मादक पेय, औषधीय अपवाद या निषेध का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं था। इसलिए अंतिम अनुच्छेद 47 को पढ़ते समय दो परतें अलग करनी चाहिए: मूल स्वास्थ्य-कल्याण वाक्य और सभा में जोड़ा गया निषेह-वाक्य। बाद में दोनों को “और विशेष रूप से” के माध्यम से जोड़ा गया।

23 नवंबर 1948 को अनुच्छेद 38 के विचार के अंत में महावीर त्यागी ने संशोधन संख्या 71 प्रस्तुत किया। प्रस्ताव का सार था कि राज्य स्वास्थ्य के लिए हानिकारक मादक पेयों और औषधियों के सेवन पर निषेध लाने का प्रयास करे। उन्होंने लंबा भाषण नहीं दिया; व्यंग्यात्मक ढंग से कहा कि प्रस्ताव स्वीकार होने पर पीने वालों की सूखी जिह्वाओं से उन्हें गालियाँ और लाभ पाने वाली पत्नियों से आशीर्वाद मिलेगा। यह छोटी टिप्पणी उस समय के निषेध-विमर्श में परिवार और विशेषतः पत्नी के अनुभव को राजनीतिक वैधता देने का संकेत है।

उद्धरण–1: “Everybody appreciates the value of prohibition.” इसका आशय था कि त्यागी निषेध को पहले से मौजूद व्यापक सहमति के रूप में रख रहे थे, न कि शून्य से शुरू हुई विवादास्पद योजना के रूप में। किंतु अगले दिन की बहस ने दिखाया कि “सबकी सहमति” का दावा अतिशयोक्तिपूर्ण था। व्यक्तिगत स्वतंत्रता, सांस्कृतिक अधिकार, व्यावहारिकता और श्रेणी-निर्धारण पर स्पष्ट असहमति मौजूद थी।

24 नवंबर को प्रो. शिब्बन लाल सक्सेना ने त्यागी के प्रस्ताव में औषधीय प्रयोजनों का अपवाद जोड़ने का संशोधन रखा। यह परिवर्तन केवल तकनीकी नहीं था। इसके बिना औषधि, वैज्ञानिक अनुसंधान, औद्योगिक उपयोग और उपचार में प्रयुक्त अल्कोहल भी व्यापक निषेध की भाषा में आ सकते थे। अंतिम अनुच्छेद में “consumption except for medicinal purposes” का क्रम इस चिंता को स्वीकार करता है। सक्सेना ने निषेध को स्वास्थ्य और परिवार की आर्थिक सुरक्षा से जोड़ते हुए राजस्व छोड़ने को नैतिक निवेश के रूप में प्रस्तुत किया।

डॉ. आंबेडकर ने संशोधित प्रस्ताव स्वीकार करते हुए आरंभ में “in particular” जोड़ने की सलाह दी। इससे शराबबंदी जनस्वास्थ्य से स्वतंत्र, पूर्ण और अकेला संवैधानिक लक्ष्य नहीं रही; वह पोषण, जीवन-स्तर और स्वास्थ्य के व्यापक कर्तव्य का विशिष्ट उदाहरण बनी। इस शब्द का विधिक महत्व है। किसी निषेध नीति की संवैधानिक दिशा केवल शराब की अनुपलब्धता से नहीं, उसके स्वास्थ्य और कल्याण प्रभाव से आंकी जानी चाहिए। यदि कोई नीति जहरीली अवैध शराब, कारावास, भ्रष्टाचार या स्वास्थ्य सेवा से दूरी बढ़ाती है, तो अनुच्छेद 47 के पहले भाग के साथ उसका संबंध भी जाँचना होगा।

सभा ने त्यागी के प्रस्ताव को सक्सेना और आंबेडकर के परिवर्तनों सहित स्वीकार किया। तंबाकू जोड़ने का भूपिंदर सिंह मान का संशोधन अस्वीकृत हुआ। इसके बाद प्रारूप अनुच्छेद 38 संशोधित रूप में संविधान में जोड़ा गया और अंतिम संपादन तथा पुनर्संख्यांकन में अनुच्छेद 47 बना। प्रक्रिया से तीन तथ्य स्थापित होते हैं: शराबबंदी मूल प्रारूप में नहीं थी; औषधीय अपवाद जानबूझकर जोड़ा गया; और नीति को जनस्वास्थ्य के अंतर्गत रखकर राज्य को प्रयत्न का दायित्व दिया गया, तत्काल न्यायिक रूप से प्रवर्तनीय परिणाम का नहीं।

5. महावीर त्यागी और शिब्बन लाल सक्सेना: गांधीवादी कल्याण का तर्क

महावीर त्यागी के प्रस्ताव की शब्दावली सीमित किंतु प्रभावशाली थी। “राज्य प्रयास करेगा” ने लक्ष्य स्पष्ट किया और साधन राज्यों पर छोड़ा। “सेवन” पर बल होने से यह केवल व्यापार-नियमन नहीं रहा, बल्कि सामाजिक व्यवहार बदलने की नीति बना। “स्वास्थ्य के लिए हानिकारक” विशेषण ने नैतिक निंदा को स्वास्थ्य-मानदंड से जोड़ा। हालाँकि यह भी प्रश्न बना रहा कि हानि किस मात्रा, किस पेय और किस वैज्ञानिक प्रमाण से तय होगी।

त्यागी का पत्नी के आशीर्वाद वाला कथन शराब के घरेलू आयाम को सामने लाता है। संविधान सभा में महिलाएँ कम संख्या में थीं, किंतु निषेध की राष्ट्रवादी राजनीति में महिलाओं का अनुभव एक महत्वपूर्ण नैतिक स्रोत था। मजदूरी का शराब में व्यय, बच्चों के पोषण की कमी और घरेलू हिंसा—इन समस्याओं को सार्वजनिक नीति का प्रश्न बनाने में महिला आंदोलनों की भूमिका रही। फिर भी पत्नी को केवल पीड़िता और पुरुष को स्वभावतः मद्यपी मान लेने से परिवार की विविध वास्तविकताएँ छूट सकती हैं। बहस की उपयोगिता इस सामान्यीकरण में नहीं, घरेलू क्षेत्र को संवैधानिक कल्याण से जोड़ने में है।

सक्सेना ने बहस को विस्तृत आर्थिक गणना दी। उन्होंने प्रांतीय आबकारी आय, निषेध लागू करने की लागत और परिवारों द्वारा शराब पर किए जाने वाले व्यय की चर्चा की। इन संख्याओं को आज प्रमाणित आर्थिक तथ्य मानना उचित नहीं, क्योंकि सभा में उनकी कार्यपद्धति या स्वतंत्र सत्यापन प्रस्तुत नहीं हुआ। फिर भी तर्क की संरचना महत्वपूर्ण है: राजस्व सरकारी लाभ है, पर शराब पर निजी व्यय और उससे जुड़ी बीमारी, अपराध तथा श्रम-हानि सामाजिक लागत हैं। अतः केवल आबकारी आय देखकर नीति का मूल्यांकन अधूरा होगा। आधुनिक सार्वजनिक वित्त में भी “राजस्व” और “बाह्य सामाजिक लागत” के इस अंतर का महत्व है।

सक्सेना ने विशेषतः श्रमिक और तत्कालीन भाषा में “हरिजन” परिवारों का उल्लेख किया। यह चिंता वर्गीय थी—मिल और श्रमिक बस्तियों के निकट शराब की दुकानों से गरीब मजदूर अधिक प्रभावित होते हैं। साथ ही भाषा संरक्षणवादी थी, क्योंकि गरीब समुदायों को स्वयं नीति-निर्माता के बजाय सुधार के विषय के रूप में देखा गया। आज इस तर्क को सामाजिक न्याय की दृष्टि से पुनर्गठित करना होगा: प्रभावित समुदायों की भागीदारी, उपचार, सामाजिक सुरक्षा और आजीविका को केंद्र में रखते हुए हानि कम करना; केवल पुलिस और दंड के भरोसे गरीब उपभोक्ता को अपराधी न बनाना।

उद्धरण–2: “except for medicinal purposes.” चार शब्दों का यह अपवाद अंतिम पाठ की कुंजी है। इससे सभा ने माना कि पदार्थ का नैतिक और कानूनी अर्थ उसके प्रयोजन से बदलता है। वही अल्कोहल पेय, औषधि, औद्योगिक कच्चा माल या वैज्ञानिक माध्यम हो सकता है। औषधीय अपवाद ने निषेध को निरपेक्ष पवित्रता के सिद्धांत के बजाय स्वास्थ्य-आधारित नियमन बनाया।

सक्सेना ने प्रांतीय प्रयोगों, खासकर कानपुर और मद्रास की कथित सफलता का उल्लेख कर यह उम्मीद जताई कि निर्देश केवल “पवित्र इच्छा” बनकर न रह जाए। यहाँ नीति-निदेशक तत्त्वों की केंद्रीय दुविधा उभरती है। वे न्यायालय में सीधे लागू नहीं होते, फिर भी राजनीतिक जवाबदेही का मानक हैं। राज्य निषेध न लागू करने पर स्वतः असंवैधानिक घोषित नहीं होता, किंतु उसे यह बताना पड़ सकता है कि वह जनस्वास्थ्य और शराब-हानि को अन्य उपायों—कर, लाइसेंस, आयु-सीमा, समय-सीमा, उपचार, शिक्षा या विज्ञापन-नियंत्रण—से कैसे संबोधित कर रहा है।

गांधीवादी तर्क का बल उसकी समग्रता में था। वह शराब को अकेली व्यक्तिगत आदत न मानकर गरीबी, श्रम, परिवार और राज्य की राजस्व-नीति से जोड़ता था। उसकी सीमा यह थी कि नैतिक आदर्श और प्रशासनिक परिणाम के बीच अंतर कम दिखाई देता है। कानून बन जाना व्यवहार बदल जाने के बराबर नहीं। संविधान सभा में भी खारडेकर ने इसी अंतर को रेखांकित किया। इसीलिए अंतिम पाठ में “प्रयास” और नीति-निदेशक स्थान एक ऐसी रचना बनाते हैं जिसमें लक्ष्य दृढ़ है, लेकिन समय, क्रम और साधन पर लोकतांत्रिक विवेक बना रहता है।

6. बी. एच. खारडेकर: स्वतंत्रता, विफलता और प्रशासनिक यथार्थ

कोल्हापुर के बी. एच. खारडेकर ने अपने प्रथम संसदीय भाषण में निषेध के विरुद्ध बोलने का साहस किया। सभा का वातावरण प्रस्ताव के पक्ष में था; उन्होंने अपनी घबराहट स्वीकारते हुए सुनवाई की माँग की। उनका वक्तव्य भारतीय संविधान-निर्माण में अल्पमत की उपयोगिता का उदाहरण है। किसी प्रस्ताव को नैतिक रूप से लोकप्रिय मान लेने पर भी उसके परिणाम, लागत और अधिकार-संबंधी प्रभाव की जाँच आवश्यक है।

उनकी पहली बड़ी दलील अमेरिकी अनुभव थी। यदि अमेरिका ने संवैधानिक निषेध लागू कर अंततः वापस लिया, तो भारत को उस विफलता से सीखना चाहिए। यह तुलना यांत्रिक नहीं मानी जा सकती—दोनों देशों की सामाजिक संरचना और राज्य-क्षमता अलग थी—फिर भी उसने निषेधवादी उत्साह के सामने नीति-परिणाम का प्रश्न रखा। कानून की प्रतिष्ठा तब घटती है जब व्यापक उल्लंघन, समानांतर बाजार और चयनात्मक प्रवर्तन सामान्य हो जाएँ।

उद्धरण–3: “history teaches us nothing?” खारडेकर का यह प्रश्न अनुभव से सीखने की संवैधानिक विनम्रता पर बल देता है। उनका आशय था कि सदाशयता किसी नीति की सफलता की गारंटी नहीं। निषेध के लक्ष्य और निषेध के साधन अलग-अलग मूल्यांकन माँगते हैं। सार्वजनिक स्वास्थ्य का लक्ष्य स्वीकार करते हुए भी यह पूछा जा सकता है कि पूर्ण प्रतिबंध, नियंत्रित उपलब्धता, कराधान, उपचार या हानि-न्यूनीकरण में कौन-सा उपाय वास्तविक परिस्थितियों में बेहतर है।

दूसरी दलील प्राथमिकताओं की थी। नवस्वतंत्र भारत को शिक्षा, कुष्ठ-उपचार, ग्रामीण स्वास्थ्य, गरीबी-उन्मूलन और आधारभूत सेवाओं के लिए धन चाहिए था। आबकारी राजस्व छोड़कर प्रवर्तन पर अतिरिक्त खर्च करना उन्हें अनुचित क्रम लगा। यहाँ उनका तर्क शराब को निर्दोष घोषित करना नहीं, सीमित सार्वजनिक संसाधनों के अवसर-लागत की ओर संकेत करना था। निषेध-समर्थक इसका उत्तर सामाजिक लागत और परिवार की बचत से देते हैं। दोनों को मिलाकर देखें तो उचित आर्थिक मूल्यांकन में राजस्व, प्रवर्तन-व्यय, स्वास्थ्य-हानि, उत्पादकता, अपराध, उपचार और परिवार-कल्याण सब शामिल होने चाहिए।

तीसरी दलील व्यक्तिगत स्वतंत्रता की थी। खारडेकर ने हेरॉल्ड लास्की के स्वतंत्रता-विचार का उल्लेख किया और कहा कि संयत उपभोग तथा मद्यपता में भेद होना चाहिए। उनके अनुसार सभी उपभोक्ताओं को कुछ गंभीर दुरुपयोगकर्ताओं के कारण दंडित करना उचित नहीं। यह विचार आधुनिक आनुपातिकता से मेल खाता है: राज्य का उपाय वैध लक्ष्य से तर्कसंगत रूप से जुड़ा, आवश्यक और अत्यधिक बोझ न डालने वाला होना चाहिए। हालाँकि उस समय भारतीय न्यायशास्त्र में आनुपातिकता आज के रूप में विकसित नहीं थी, बहस में उसका नैतिक बीज दिखाई देता है।

चौथी दलील अवैध शराब और भ्रष्टाचार की थी। खारडेकर ने आशंका जताई कि निर्भर उपभोक्ता अवैध आसवन या जहरीले पदार्थों की ओर जाएगा और प्रवर्तन-तंत्र को रिश्वत का नया अवसर मिलेगा। यह भविष्यवाणी किसी एक नीति का स्वतः खंडन नहीं, लेकिन कार्यान्वयन की कसौटी अवश्य है। यदि प्रतिबंध से आपूर्ति भूमिगत हो, गुणवत्ता-नियंत्रण समाप्त हो और गरीब व्यक्ति अधिक खतरनाक पदार्थ ले, तो स्वास्थ्य लक्ष्य को क्षति पहुँच सकती है। इसके विपरीत समर्थक कहेंगे कि कमजोर प्रवर्तन का उत्तर बेहतर प्रशासन है, हानिकारक वस्तु की सहज उपलब्धता नहीं।

खारडेकर के भाषण में सामाजिक जीवन और आनंद का पक्ष भी था। उन्होंने शहर, क्लब, वाइन या बियर और श्रमिक की ताड़ी का उदाहरण देकर कहा कि सभी मदिरा-संबंधी व्यवहार को नैतिक पतन नहीं माना जाना चाहिए। यह अंश उस समय की अभिजात सामाजिकता से प्रभावित है, पर इसका मूल प्रश्न वैध है: क्या संविधान नागरिकों के सदाचार की एकमात्र परिभाषा तय करे? अनुच्छेद 47 का उत्तर प्रत्यक्ष दंडादेश नहीं, राज्य-नीति का स्वास्थ्य-उन्मुख निर्देश है। आंबेडकर ने इसी आधार पर खारडेकर की आशंका को सीमित किया।

खारडेकर की स्थिति की अपनी सीमाएँ हैं। पीने वाले और गंभीर निर्भरता वाले व्यक्ति की उनकी संख्यात्मक धारणा अनुमान पर आधारित थी। स्वतंत्र चुनाव की भाषा सामाजिक दबाव, लत, विज्ञापन, असमानता और घरेलू हिंसा को पर्याप्त महत्व नहीं देती। फिर भी उनका असहमति-पत्र बहस को समृद्ध करता है क्योंकि वह बहुमत को साधन की प्रभावशीलता, व्यक्तिगत क्षेत्र और प्रशासनिक दुष्परिणाम पर उत्तर देने के लिए बाध्य करता है।

7. जयपाल सिंह: आदिवासी संस्कृति, धार्मिक अधिकार और चावल की बियर

जयपाल सिंह का भाषण इस बहस का सबसे दूरगामी हस्तक्षेप है। उन्होंने प्रस्ताव को केवल शराब-नीति नहीं, आदिवासी धार्मिक अधिकार में संभावित हस्तक्षेप के रूप में देखा। उनका आग्रह था कि आदिवासी क्षेत्रों पर विचार करने वाली सलाहकार समिति और अनुसूचित प्रावधानों के संदर्भ के बिना देशव्यापी निषेध स्वीकार करना जल्दबाजी होगी। उनके लिए प्रश्न यह नहीं था कि अत्यधिक मद्यपान हानिकारक है या नहीं; प्रश्न यह था कि स्थानीय किण्वित पेय को बाहरी राज्य किस ज्ञान और अधिकार से “हानिकारक मादक पेय” घोषित करेगा।

उद्धरण–4: “no religious function can be performed.” यह छोटा अंश आदिवासी अनुष्ठानों में चावल की बियर की अनिवार्य भूमिका के उनके दावे को व्यक्त करता है। उन्होंने पेय को समुदाय, पूजा, कृषि-श्रम और परंपरा से जोड़ा। पदार्थ का अर्थ केवल रासायनिक नशा नहीं; उसका सामाजिक उपयोग और सांस्कृतिक स्थान भी है। एक धार्मिक समारोह में नियंत्रित सामुदायिक सेवन को वाणिज्यिक आसवित शराब के बाजार के समान मान लेना सांस्कृतिक अज्ञान हो सकता है।

जयपाल सिंह ने “intoxicating drinks” और “injurious to health” की अस्पष्टता पर प्रश्न उठाया। दोनों पद वैज्ञानिक वर्गीकरण माँगते हैं। नशा मात्रा पर निर्भर हो सकता है, स्वास्थ्य-हानि पेय की शक्ति, मिलावट, आवृत्ति, आयु और सामाजिक स्थिति से बदल सकती है। उनके तर्क का आधुनिक रूप यह होगा कि कानून स्पष्ट परिभाषा, प्रमाण और जोखिम-भेद के आधार पर बने। स्थानीय हल्के किण्वित पेयों, औद्योगिक शराब और उच्च-अल्कोहल आसवित मदिरा को एक श्रेणी में रखना अनुचित नियमन का कारण बन सकता है।

उन्होंने संथाल कृषि-श्रम का उदाहरण दिया: वर्षा और कीचड़ में धान रोपते गरीब श्रमिकों के लिए चावल की बियर ऊर्जा, आराम और सामुदायिक श्रम का अंग थी। यह दावा उस समय का अनुभवजन्य अवलोकन था, चिकित्सा निष्कर्ष नहीं। स्वयं जयपाल सिंह ने चिकित्सा अनुसंधान की माँग की। यह महत्वपूर्ण बौद्धिक विनम्रता है—उन्होंने परंपरा को विज्ञान से ऊपर घोषित नहीं किया, बल्कि विज्ञान से परंपरा को समझने को कहा। आज ऐसी जाँच पोषण, अल्कोहल प्रतिशत, स्वास्थ्य जोखिम और सामुदायिक अर्थ सभी को साथ लेकर होनी चाहिए।

उद्धरण–5: “we shall educate them to lead a life of temperance.” इससे स्पष्ट है कि वे अनियंत्रित या हानिकारक सेवन के समर्थक नहीं थे। वे संयम-शिक्षा और हानि से बचाव के पक्ष में थे, पर धार्मिक विशेषाधिकार छोड़ने के लिए तैयार नहीं थे। अतः उनका मत “शराब समर्थक” कह देना गलत होगा। वह निषेध की एकरूपता के विरुद्ध सांस्कृतिक स्वायत्तता और अनुपातिक नीति का पक्ष था।

इस भाषण में प्रतिनिधित्व का प्रश्न भी है। जब ए. वी. ठक्कर ने कहा कि सभी आदिवासी पेय नहीं चाहते और भिल समुदाय के बीच स्वैच्छिक संयम का अनुभव अलग है, तो बहस ने दिखाया कि “आदिवासी मत” एक नहीं है। जयपाल सिंह सभी समुदायों की ओर से अंतिम सत्य नहीं बोल सकते, और ठक्कर का समाजसेवी अनुभव भी समुदाय की स्वप्रतिनिधि आवाज का स्थान नहीं ले सकता। संवैधानिक समाधान को समुदायों के भीतर की विविधता और स्थानीय लोकतांत्रिक निर्णय दोनों स्वीकार करने चाहिए।

आंबेडकर ने छठी अनुसूची के उस सुरक्षा-तंत्र की ओर ध्यान दिलाया जिसके अनुसार राज्य विधानमंडल का गैर-आसवित मादक पेय के निषेध या प्रतिबंध वाला कानून स्वायत्त जिले या क्षेत्र में तभी लागू होगा जब संबंधित जिला परिषद सार्वजनिक अधिसूचना से ऐसा निर्देश दे। यह प्रावधान जयपाल सिंह की चिंता का पूर्ण समाधान था या नहीं, इस पर बहस हो सकती है, किंतु इससे दो सिद्धांत निकलते हैं: सामान्य राज्य कानून सांस्कृतिक रूप से विशिष्ट क्षेत्र में स्वतः लागू न हो; और स्थानीय प्रतिनिधि संस्था को स्वीकृति, अपवाद या संशोधन का अधिकार मिले।

आज जयपाल सिंह का हस्तक्षेप आदिवासी ज्ञान, खाद्य-संस्कृति और स्वशासन के अध्ययन के लिए केंद्रीय है। मदिरा-नीति जब महुआ या चावल आधारित पारंपरिक उत्पादन को अपराध बनाती है, तब आजीविका, महिला उत्पादक, सामुदायिक उत्सव और सांस्कृतिक पहचान प्रभावित हो सकते हैं। दूसरी ओर समुदायों के भीतर नशे से होने वाली स्वास्थ्य या लैंगिक हानि की उपेक्षा भी सांस्कृतिक अधिकार नहीं हो सकती। समाधान स्थानीय सहमति, स्वास्थ्य-शिक्षा, गुणवत्ता-नियंत्रण और समुदाय-नेतृत्व वाली नीति में है।

8. प्रत्युत्तर: बी. जी. खेर, ए. वी. ठक्कर और लक्ष्मीनारायण साहू

बी. जी. खेर ने निषेध को संविधान की रचना का महत्वपूर्ण नीति-तत्त्व माना। उन्होंने बॉम्बे और मद्रास के अनुभव का हवाला देकर कहा कि परिवारों से धन्यवाद-पत्र मिल रहे थे और श्रमिक लाभान्वित थे। खेर का तर्क सामुदायिक स्वास्थ्य को व्यक्तिगत चुनाव पर प्राथमिकता देता है। उनके अनुसार आत्मघाती या स्वास्थ्य-विनाशकारी आचरण को “स्वतंत्रता” कहकर राज्य निष्क्रिय नहीं रह सकता। यह कल्याणकारी राज्य की मजबूत अवधारणा है, जिसमें राज्य केवल सुरक्षा-रक्षक नहीं बल्कि सामाजिक परिस्थितियाँ सुधारने वाला अभिकर्ता है।

खेर ने शराब को हिंदू, मुस्लिम और ईसाई समाजों में व्यापक रूप से दोषपूर्ण माने जाने की बात कही और औपनिवेशिक प्रभाव से उसके फैशनेबल बनने का तर्क दिया। इस कथन में राष्ट्रवादी सांस्कृतिक आलोचना है, पर धार्मिक समुदायों की आंतरिक विविधता को समतल करने का जोखिम भी है। संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता का उचित आधार किसी धर्म की पाप-धारणा नहीं, सार्वजनिक स्वास्थ्य और दूसरों के अधिकारों पर प्रमाणित प्रभाव होना चाहिए। अंतिम अनुच्छेद की भाषा इसीलिए “स्वास्थ्य के लिए हानिकारक” कहती है, किसी धार्मिक निषेध का उल्लेख नहीं करती।

उद्धरण–6: “There is therefore no compulsion on the State.” यह आंबेडकर का उत्तर था, पर खेर के कठोर नैतिक समर्थन के साथ पढ़ने पर इसका महत्व अधिक स्पष्ट होता है। सभा ने नीति को दिशा के रूप में स्वीकार किया, तत्काल बाध्यकारी दंडादेश के रूप में नहीं। इससे राज्य को जनमत, प्रशासनिक तैयारी और स्थानीय परिस्थिति के अनुसार क्रमिक या आंशिक उपाय चुनने की जगह मिली।

ए. वी. ठक्कर ने जयपाल सिंह के दावे का प्रतिवाद अपने भिल और गोंड समुदायों के बीच कार्य-अनुभव से किया। उन्होंने कहा कि अनेक आदिवासी शराब की दुकानें बंद चाहते हैं और स्वैच्छिक संयम ने कुछ दुकानों को आर्थिक रूप से विफल किया। यह बहस सांस्कृतिक अधिकार की जटिलता दिखाती है। एक समुदाय में पेय धार्मिक परंपरा हो सकता है, दूसरे में बाहरी ठेका-व्यवस्था शोषण का साधन। समान नीति दोनों परिस्थितियों के साथ न्याय नहीं कर सकती। ठक्कर का अनुभव स्थानीय विकल्प का समर्थन करता है, यद्यपि उन्होंने उसे सर्वदेशीय निषेध के समर्थन में रखा।

लक्ष्मीनारायण साहू ने आदिवासी पेयों के भेद को स्वीकार किया—उन्होंने स्थानीय पेय को सामान्य शराब से अलग बताया—फिर भी सामाजिक सुधार के आधार पर निषेध का समर्थन किया। उन्होंने शिक्षा और मद्यपान को परस्पर विरोधी बताया तथा हानिकारक परंपरा बदलने के उदाहरण दिए। उनके तर्क में सुधारवादी आग्रह है, पर सती या मानव-बलि से पेय-परंपरा की तुलना अनुपात और हानि की भिन्नता मिटा देती है। प्रत्येक सांस्कृतिक व्यवहार का मूल्यांकन उसकी विशिष्ट हानि, सहमति और सामाजिक अर्थ पर होना चाहिए।

इन प्रत्युत्तरों का संयुक्त पाठ बताता है कि निषेध-समर्थक पक्ष एकरूप नहीं था। खेर राज्य-नीति और सार्वजनिक नैतिकता पर बल देते हैं; ठक्कर आदिवासी समुदायों के भीतर निषेध की मांग का दावा करते हैं; साहू शिक्षा और सामाजिक परिवर्तन का तर्क देते हैं; सक्सेना अर्थव्यवस्था और परिवार की बचत देखते हैं; त्यागी गांधीवादी प्रतिबद्धता को संक्षेप में रखते हैं। इन्हें एक ही नैतिक नारे में समेटना बहस की विविधता नष्ट कर देगा।

9. तंबाकू संशोधन और नीति की श्रेणीगत सीमा

सरदार भूपिंदर सिंह मान ने “drinks” और “drugs” के बीच तंबाकू जोड़ने का प्रस्ताव किया। उनका तर्क था कि यदि कसौटी नशा और स्वास्थ्य-हानि है, तो निकोटीनयुक्त तंबाकू को बाहर रखने का कारण क्या है। उन्होंने यह भी संकेत किया कि बहुसंख्यक उपभोग किसी हानिकारक पदार्थ को संवैधानिक ध्यान से बाहर नहीं कर सकता। यह संशोधन अस्वीकृत हुआ, पर उसने अनुच्छेद 47 की तार्किक सीमा पर स्थायी प्रश्न छोड़ दिया।

उद्धरण–7: “why don’t you prohibit tobacco also?” यह प्रश्न चयनात्मक नैतिकता की ओर संकेत करता है। किसी पदार्थ का नियमन केवल उसकी रासायनिक हानि से तय नहीं होता; इतिहास, सामाजिक स्वीकृति, अर्थव्यवस्था, प्रशासनिक क्षमता और राजनीतिक गठबंधन भी प्रभाव डालते हैं। संविधान सभा ने शराब और हानिकारक औषधियों को विशेष रूप से चुना, तंबाकू को नहीं। इससे तंबाकू स्वास्थ्य-नीति के बाहर नहीं हो जाता, किंतु अनुच्छेद 47 का स्पष्ट निषेध-वाक्य उस पर शब्दशः लागू करने में सावधानी चाहिए। जनस्वास्थ्य का व्यापक पहला भाग अवश्य प्रासंगिक है।

मान का प्रस्ताव एक और बात स्पष्ट करता है: “कम मात्रा” और “अधिक मात्रा” का विवाद। लगभग हर पदार्थ की हानि मात्रा और संदर्भ से बदलती है, लेकिन कुछ पदार्थों में सुरक्षित सीमा का प्रश्न वैज्ञानिक रूप से अलग हो सकता है। संविधान स्थायी वैज्ञानिक पाठ्यपुस्तक नहीं; इसलिए उसने विस्तृत सूची के बजाय व्यापक श्रेणियाँ और राज्य-प्रयास की भाषा अपनाई। वैज्ञानिक ज्ञान बदलने पर विधायिका और कार्यपालिका नियमन बदल सकती हैं।

संशोधन की अस्वीकृति को तंबाकू की निरापदता का संवैधानिक निर्णय नहीं माना जा सकता। सभा ने संक्षिप्त मतदान किया; विस्तृत वैज्ञानिक निष्कर्ष नहीं दिया। संविधान-निर्माण में अस्वीकृत संशोधन कई कारणों से गिरते हैं—विषय की तैयारी, राजनीतिक प्राथमिकता, शब्दावली या यह धारणा कि मौजूदा पाठ पर्याप्त है। इसलिए “सभा ने तंबाकू सुरक्षित माना” कहना अभिलेख से परे होगा। उचित निष्कर्ष इतना है कि तंबाकू को अनुच्छेद के विशेष निषेध-वाक्य में नाम से जोड़ने का प्रस्ताव स्वीकार नहीं हुआ।

10. डॉ. आंबेडकर का संवैधानिक समझौता

आंबेडकर ने प्रस्ताव स्वीकार करते समय बहस को तीन स्तरों पर उत्तर दिया। पहला स्तर संस्थागत था: यह नीति-निदेशक तत्त्व है, मूल अधिकार या दंड-विधान नहीं। इसलिए राज्य पर तत्काल बाध्यता नहीं कि वह उसी दिन पूर्ण निषेध लागू करे। दूसरा स्तर समय और साधन का था: राज्य तय कर सकता है कि समय उपयुक्त है या नहीं, और निषेध क्रमिक या आंशिक रूप में आए। तीसरा स्तर सांस्कृतिक-संघीय था: छठी अनुसूची आदिवासी स्वायत्त क्षेत्रों में गैर-आसवित मदिरा पर सामान्य कानून के स्वतः अनुप्रयोग को रोकती है।

उद्धरण–8: “gradually or partially.” इन दो शब्दों में आंबेडकर का व्यावहारिक संवैधानिकवाद संक्षेपित है। लक्ष्य को अस्वीकार किए बिना उन्होंने नीति-मार्ग की बहुलता स्वीकार की। पूर्ण निषेध, चरणबद्ध प्रतिबंध, क्षेत्रीय सीमा, पेय-विशिष्ट नियम, लाइसेंस, समय-नियंत्रण और स्वास्थ्य-शिक्षा—सभी संभावित साधन हैं। नीति का चुनाव निर्वाचित राज्य और जनमत पर छोड़ा गया।

यह उत्तर खारडेकर की स्वतंत्रता-आपत्ति को पूरी तरह समाप्त नहीं करता। नीति-निदेशक तत्त्व स्वयं दंड नहीं देता, लेकिन उसके आधार पर राज्य कठोर कानून बना सकता है। तब मूल अधिकारों की समीक्षा आवश्यक रहेगी। आंबेडकर का आशय यह नहीं था कि नीति-निदेशक तत्त्व के नाम पर कोई भी उपाय वैध हो जाएगा; केवल यह कि संविधान का अनुच्छेद अपने आप व्यक्ति को दंडित नहीं करता और विधायिका को परिस्थितियों के अनुसार निर्णय लेना है। बाद का न्यायशास्त्र भी शराब-व्यापार पर व्यापक राज्य-शक्ति स्वीकार करते हुए वर्गीकरण, विधायी क्षमता और अन्य अधिकारों की समीक्षा करता रहा।

जयपाल सिंह के संबंध में आंबेडकर ने छठी अनुसूची के प्रावधान का पाठ रखा। उसके अनुसार गैर-आसवित मादक पेय के निषेध या प्रतिबंध वाला राज्य कानून स्वायत्त जिला या क्षेत्र में संबंधित परिषद की अधिसूचना के बिना लागू नहीं होगा; परिषद अपवाद या संशोधन भी कर सकती है। यह “एक देश, एक नीति” के भीतर संवैधानिक बहुलवाद की मिसाल है। राज्य का सार्वजनिक स्वास्थ्य लक्ष्य बना रहता है, लेकिन आदिवासी संस्था स्थानीय सामाजिक ज्ञान और सहमति के आधार पर अनुप्रयोग तय करती है।

आंबेडकर ने खारडेकर का नाम अभिलेख में कभी “खांडेकर/खंडेकर” जैसा लिया, जिस पर बाद के विद्वानों ने पहचान-संबंधी त्रुटि की ओर ध्यान दिलाया है। शोध की दृष्टि से वक्ता की सही पहचान बी. एच. खारडेकर, कोल्हापुर है। यह छोटा तथ्य प्राथमिक स्रोत पढ़ने की सावधानी बताता है: सदन की तत्काल मौखिक त्रुटि को बिना जाँच ऐतिहासिक पहचान न बना दिया जाए।

अंततः आंबेडकर ने “in particular” जोड़कर निषेध को पोषण, जीवन-स्तर और स्वास्थ्य के साथ बाँधा। यदि इसे एक प्रकार की उद्देश्य-श्रृंखला मानें, तो राज्य की नीति का मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि क्या वह वास्तव में स्वास्थ्य और जीवन-स्तर सुधारती है। केवल बिक्री बंद होना पर्याप्त सफलता-सूचक नहीं; रोग, मृत्यु, परिवार की सुरक्षा, अवैध बाजार, न्याय-व्यवस्था पर भार और उपचार तक पहुँच भी देखनी होगी।

11. अनुच्छेद 47 का पाठ और उसका व्याकरण

अंतिम अनुच्छेद 47 दो जुड़े हुए कर्तव्य रखता है। पहला सकारात्मक कर्तव्य है—पोषण-स्तर, जीवन-स्तर और जनस्वास्थ्य को ऊँचा करना। दूसरा विशेष प्रयत्न है—औषधीय प्रयोजनों को छोड़कर स्वास्थ्य के लिए हानिकारक मादक पेयों और औषधियों के सेवन पर निषेध लाना। “और विशेष रूप से” दोनों को जोड़ता है। इससे शराबबंदी स्वास्थ्य-राज्य की समग्र परियोजना का एक साधन बनती है, न कि संविधान का पृथक नैतिक निषेध।

“राज्य” का अर्थ अनुच्छेद 12 की परिभाषा और संवैधानिक संदर्भ में संघ तथा राज्य स्तर की संस्थाओं तक विस्तृत है, किंतु मदिरा का प्रमुख विधायी क्षेत्र सातवीं अनुसूची की राज्य सूची में है। प्रविष्टि 8 मादक मदिराओं के उत्पादन, निर्माण, कब्जे, परिवहन, क्रय और विक्रय को राज्य विषय बनाती है। प्रविष्टि 51 मानव उपभोग की मदिरा पर राज्य आबकारी शुल्क से संबंधित है। इसलिए राष्ट्रीय नैतिक लक्ष्य का कार्यान्वयन मुख्यतः राज्य-विशिष्ट कानूनों और नीतियों से होता है। यही कारण है कि भारत में पूर्ण निषेध, आंशिक प्रतिबंध और विनियमित बिक्री के अलग-अलग मॉडल साथ मौजूद रहे हैं।

“shall regard” और “shall endeavour” में सूक्ष्म अंतर है। राज्य जनस्वास्थ्य को प्राथमिक कर्तव्य “मानेगा”—यह मूल्य-निर्धारण है। निषेध लाने का “प्रयास करेगा”—यह दिशा और सतत प्रयत्न है। प्रयास की पर्याप्तता लोकतांत्रिक आलोचना का विषय है, लेकिन अनुच्छेद 37 के कारण नागरिक सीधे अदालत से सर्वदेशीय निषेध लागू कराने का सरल आदेश नहीं माँग सकता। न्यायालय इन तत्त्वों का उपयोग कानून की उद्देश्यपरक व्याख्या और प्रतिबंधों की तर्कसंगतता में कर सकते हैं।

“consumption” भी महत्वपूर्ण है। राज्य सूची की प्रविष्टि 8 पूरी आपूर्ति-श्रृंखला पर विधायी शक्ति देती है, जबकि अनुच्छेद 47 का लक्ष्य सेवन पर निषेध है। उत्पादन या विक्रय पर प्रतिबंध सेवन घटाने के साधन हैं; वे स्वयं अंतिम संवैधानिक मूल्य नहीं। औद्योगिक, औषधीय या प्रसाधन उपयोग वाली अल्कोहल को पेय के समान मानना इस प्रयोजन से बाहर जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय के मामलों में पेय योग्य और औद्योगिक अल्कोहल का भेद इसी कारण महत्वपूर्ण हुआ।

“intoxicating drinks and drugs which are injurious to health” का व्याकरण भी बहस योग्य है। स्वास्थ्य-हानिकारक विशेषण पेयों और औषधियों दोनों को सीमित करता है या केवल औषधियों को—अंग्रेजी संरचना पर तकनीकी चर्चा संभव है; किंतु सभा की बहस से स्पष्ट है कि समर्थक हानिकारक मादक पेयों की बात कर रहे थे। फिर भी हानि का वैज्ञानिक निर्धारण और जोखिम-अंतर नीति के लिए आवश्यक है। अनुच्छेद किसी विशिष्ट अल्कोहल प्रतिशत, मात्रा या सूची को स्थिर नहीं करता।

औषधीय अपवाद निषेध की सीमा के साथ राज्य की जिम्मेदारी भी बनाता है। औषधि के नाम पर पेय शराब की चोरी रोकना वैध है, पर वास्तविक दवाओं, शोध या उपचार को अनुपलब्ध करना अपवाद के उद्देश्य को विफल करेगा। नियमन में अनुमति-पत्र, डिनैचरेशन, आपूर्ति अभिलेख और दुरुपयोग-रोधी उपाय हो सकते हैं, किंतु वे अनुपातिक होने चाहिए।

12. नीति-निदेशक तत्त्व, मूल अधिकार और लोकतांत्रिक विवेक

अनुच्छेद 37 कहता है कि भाग IV के उपबंध किसी न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं, फिर भी देश के शासन में मूलभूत हैं और कानून बनाने में उनका अनुप्रयोग राज्य का कर्तव्य है। यह संरचना न तो उन्हें निरर्थक उपदेश बनाती है, न मूल अधिकारों से ऊपर रखती है। वे विधायिका को सामाजिक लक्ष्य देते हैं, प्रशासन को नीति-दिशा देते हैं और न्यायालय को संवैधानिक मूल्य का संदर्भ देते हैं।

शराब-नीति में मूल अधिकार का प्रश्न कई रूपों में आता है: व्यापार या व्यवसाय की स्वतंत्रता, समानता, गोपनीयता, जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता, धर्म और संस्कृति। भारतीय न्यायालयों ने पेय मदिरा के व्यापार को सामान्य व्यापार जैसी सुरक्षा देने से प्रायः इनकार किया और राज्य को व्यापक नियंत्रण दिया। किंतु इससे हर वर्गीकरण या प्रवर्तन स्वतः वैध नहीं हो जाता। लाइसेंस नीति मनमानी, भेदभावपूर्ण या विधायी शक्ति से बाहर हो तो न्यायिक समीक्षा संभव है।

व्यक्तिगत सेवन को लेकर संविधान सभा में खारडेकर ने स्वतंत्रता का तर्क दिया, पर अंतिम पाठ ने उसे मूल अधिकार के रूप में स्वीकार या अस्वीकार नहीं किया। अनुच्छेद 47 राज्य को निषेध की दिशा देता है; यह स्वयं नागरिक के विरुद्ध अपराध निर्मित नहीं करता। अपराध, दंड, तलाशी, जब्ती और जमानत का ढाँचा संबंधित विधान में बनता है और उसे संविधान के अन्य प्रावधानों की कसौटी पर परखा जा सकता है।

धार्मिक स्वतंत्रता का प्रश्न जयपाल सिंह ने उठाया। किसी प्रथा का धार्मिक होना उसे हर नियमन से पूर्ण प्रतिरक्षा नहीं देता; संविधान सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के आधार पर सीमाएँ स्वीकार करता है। पर राज्य को यह भी सिद्ध करना चाहिए कि प्रथा का वास्तविक स्वरूप और हानि क्या है। आदिवासी पेय-संस्कृति पर बाहरी अनुमान पर्याप्त नहीं। छठी अनुसूची की स्थानीय सहमति व्यवस्था इसी संदर्भ-संवेदनशीलता का संस्थागत उत्तर है।

लोकतांत्रिक विवेक का अर्थ निष्क्रियता नहीं। आंबेडकर ने निर्णय का समय और क्रम राज्य तथा जनमत पर छोड़ा, क्योंकि नीति-निदेशक तत्त्वों की पूर्ति संसाधन और सामाजिक तैयारी पर निर्भर है। लेकिन राज्य यदि शराब बिक्री से राजस्व ले और स्वास्थ्य-हानि पर कोई कार्रवाई न करे, तो अनुच्छेद 47 की राजनीतिक जवाबदेही उठती है। कार्रवाई के रूप अनेक हो सकते हैं—उपलब्धता सीमित करना, न्यूनतम आयु, नशे में वाहन चलाने पर नियंत्रण, उपचार, चेतावनी, विपणन-प्रतिबंध, मूल्य-नीति और समुदाय-आधारित कार्यक्रम।

इस संतुलन का सबसे उचित सिद्धांत “लक्ष्य में दृढ़ता, साधन में प्रमाण-आधारित विवेक” है। जनस्वास्थ्य और कमजोर परिवारों की रक्षा संवैधानिक लक्ष्य हैं; साधन को प्रभावशीलता, समानता, न्यूनतम आवश्यक दमन और अनपेक्षित दुष्परिणाम के आधार पर चुनना चाहिए।

13. संघवाद, राज्य-शक्ति और राजस्व का अंतर्विरोध

भारतीय संविधान में शराब का नियमन संघवाद का उत्कृष्ट अध्ययन-विषय है। सार्वजनिक स्वास्थ्य साझा राष्ट्रीय चिंता है, पर मानव उपभोग के लिए मादक मदिरा का उत्पादन, कब्जा, परिवहन, क्रय और विक्रय राज्य सूची में है। इस व्यवस्था से राज्य स्थानीय परिस्थितियों, सामाजिक दृष्टिकोण और प्रशासनिक क्षमता के अनुसार नीति बना सकते हैं। यही संवैधानिक कारण है कि अनुच्छेद 47 होते हुए भी पूरे भारत में एक समान निषेध नहीं है। विविधता संविधान-विरोध नहीं; वह विधायी वितरण का अपेक्षित परिणाम है।

राज्यों के सामने मूल अंतर्विरोध आबकारी आय और स्वास्थ्य-कर्तव्य का है। निषेध-समर्थकों ने सभा में कहा कि सरकार को हानिकारक उपभोग से आय नहीं लेनी चाहिए। विरोधियों ने पूछा कि शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए आवश्यक राजस्व कहाँ से आएगा। यह द्वंद्व आज भी बना है। किंतु राजस्व पर निर्भरता किसी स्वास्थ्य-हानिकारक बाजार को अधिक फैलाने का औचित्य नहीं हो सकती। उसी प्रकार अचानक आय समाप्त कर बिना वैकल्पिक वित्त और प्रशासनिक योजना के निषेध लागू करना सार्वजनिक सेवाओं को कमजोर कर सकता है।

संविधान सभा के वित्तीय विशेषज्ञों की सावधानी यहाँ मार्गदर्शक है: प्रांतीय सरकारों को सामाजिक सुधार और विकास-कार्य की तात्कालिकता में संतुलन बनाना था तथा केंद्रीय सहायता को स्वतः उपलब्ध मानकर योजना नहीं बनानी थी। इसका अर्थ निषेध का विरोध नहीं, वित्तीय उत्तरदायित्व है। उचित संक्रमण में वैकल्पिक कर-स्रोत, प्रवर्तन लागत, उपचार सेवाएँ, प्रभावित श्रमिकों का पुनर्वास और सीमा-पार तस्करी पर समन्वय शामिल होना चाहिए।

राज्य-विशिष्ट नीति में पड़ोसी राज्यों का प्रभाव महत्वपूर्ण है। एक राज्य में पूर्ण निषेध और दूसरे में विनियमित बिक्री होने पर सीमा-पार खरीद, तस्करी और पुलिस-व्यय बढ़ सकता है। संघीय समन्वय सूचना, परिवहन नियंत्रण, औद्योगिक अल्कोहल की निगरानी और सार्वजनिक स्वास्थ्य मानकों में सहायक हो सकता है; फिर भी अंतिम नीति पर राज्य की संवैधानिक भूमिका बनी रहती है।

राजस्व की बहस को नैतिक आरोप से परे ले जाना चाहिए। आबकारी आय का आकार, शराब से संबंधित रोग-भार, सड़क दुर्घटनाएँ, अपराध, घरेलू हिंसा, कार्यस्थल हानि और न्याय-व्यवस्था की लागत का पारदर्शी लेखा आवश्यक है। साथ ही निषेध से उत्पन्न अवैध बाजार, जहरीली शराब की घटनाएँ, गिरफ्तारी का सामाजिक वितरण और जेलों पर भार मापा जाना चाहिए। अनुच्छेद 47 का सच्चा अनुप्रयोग नारे से नहीं, परिणाम-सूचकों से दिखेगा।

स्थानीय निकायों और समुदायों की भूमिका भी संघवाद के भीतर आती है। शराब दुकान का स्थान, बिक्री समय और ग्रामसभा की आपत्ति स्थानीय जीवन को सीधे प्रभावित करते हैं। लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण निषेध और उपलब्धता के बीच सूक्ष्म विकल्प दे सकता है। आदिवासी स्वायत्त परिषदों का विशेष संवैधानिक अधिकार इसका मजबूत रूप है; सामान्य क्षेत्रों में भी परामर्श और सामाजिक प्रभाव-आकलन नीति की वैधता बढ़ा सकते हैं।

14. सर्वोच्च न्यायालय की व्याख्या में अनुच्छेद 47

संविधान लागू होने के शीघ्र बाद स्टेट ऑफ बॉम्बे बनाम एफ. एन. बलसारा में बॉम्बे निषेध अधिनियम, 1949 की वैधता सर्वोच्च न्यायालय के सामने आई। न्यायालय ने राज्य की विधायी क्षमता और अनुच्छेद 47 के सार्वजनिक स्वास्थ्य उद्देश्य को महत्व दिया, यद्यपि अधिनियम के कुछ प्रावधानों पर अधिकार-संबंधी सीमाएँ भी देखीं। इस निर्णय ने स्थापित किया कि पेय मदिरा पर व्यापक रोक राज्य के वैध कल्याणकारी उद्देश्य से जुड़ सकती है। साथ ही औषधीय और अन्य गैर-पेय उपयोगों का भेद महत्त्वपूर्ण बना।

हर शंकर बनाम डिप्टी एक्साइज एंड टैक्सेशन कमिश्नर में न्यायालय ने शराब व्यापार को राज्य द्वारा कठोर रूप से नियंत्रित किए जाने योग्य माना। लाइसेंसधारी सामान्य मुक्त बाजार के समान दावा नहीं कर सकता; राज्य अनुमति की शर्तें निर्धारित कर सकता है। इस धारा में “res extra commercium” अर्थात सामान्य व्यापारिक संरक्षण से बाहर या विशेष नियंत्रण योग्य गतिविधि की भाषा विकसित हुई। इस सिद्धांत की विद्वत आलोचना संभव है, किंतु भारतीय न्यायिक परंपरा में उसने मदिरा-व्यापार पर राज्य-शक्ति को व्यापक आधार दिया।

पी. एन. कौशल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया में न्यायालय ने अनुच्छेद 47 और सार्वजनिक स्वास्थ्य को शराब-नियमन की पृष्ठभूमि माना। निर्णयों की इस शृंखला का सामान्य तत्त्व यह है कि कोई व्यापारी केवल अनुच्छेद 19(1)(g) के आधार पर राज्य से मदिरा बेचने का अनियंत्रित अधिकार नहीं मांग सकता। लेकिन राज्य को अपनी वैधानिक प्रक्रिया और समानता की कसौटी का पालन करना होता है।

खोडे डिस्टिलरीज लिमिटेड बनाम स्टेट ऑफ कर्नाटक की संविधान पीठ ने पूर्व निर्णयों का समेकन किया। उसने पेय मदिरा के निर्माण और व्यापार पर पूर्ण निषेध, राज्य एकाधिकार या लाइसेंस-आधारित कठोर नियंत्रण की संभावनाएँ स्वीकार कीं। साथ ही औद्योगिक अल्कोहल और मानव सेवन की मदिरा में अंतर रखा। यह वही प्रयोजन-भेद है जिसकी संवैधानिक जड़ “औषधीय प्रयोजनों को छोड़कर” और राज्य सूची की विशिष्ट प्रविष्टियों में दिखाई देती है।

केरल बार होटल्स एसोसिएशन बनाम स्टेट ऑफ केरल में सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य की चरणबद्ध शराब-नीति और होटल-लाइसेंस वर्गीकरण की समीक्षा की। न्यायालय ने अनुच्छेद 47 को राज्य के निषेध की दिशा में कदमों के समर्थन में पढ़ा और नीति-निर्णय के क्षेत्र में विधायिका/कार्यपालिका को पर्याप्त अवकाश दिया। यह मामला आंबेडकर के “क्रमिक या आंशिक” दृष्टिकोण की बाद की प्रतिध्वनि जैसा दिखाई देता है, यद्यपि न्यायालय का निर्णय अपने विशिष्ट तथ्यों और समानता-विश्लेषण पर आधारित था।

इन मामलों से यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि अनुच्छेद 47 हर कठोर कानून को स्वतः वैध करता है। विधायी क्षमता, मनमानी, प्रक्रिया, वर्गीकरण और गैर-पेय उपयोगों की सुरक्षा अलग प्रश्न हैं। संविधान सभा की बहस भी राज्य को विवेक देती है, असीमित शक्ति नहीं। न्यायिक समीक्षा का काम स्वास्थ्य-लक्ष्य को नकारना नहीं, यह देखना है कि साधन संवैधानिक सीमाओं के भीतर है।

न्यायालयों ने राजमार्गों के निकट शराब बिक्री, लाइसेंस संख्या और नीति-परिवर्तन के मामलों में भी अनुच्छेद 47 का उल्लेख किया है। इससे अनुच्छेद एक स्थिर ऐतिहासिक वाक्य न रहकर जीवित नीति-मानक बना। फिर भी न्यायिक आदेश और सार्वजनिक प्रशासन की क्षमता में अंतर है। सड़क सुरक्षा या उपलब्धता घटाने का आदेश तभी सफल होगा जब डेटा, निगरानी, वैकल्पिक मार्ग और प्रवर्तन की ईमानदारी साथ हों।

15. वर्ग, जाति, श्रम और परिवार

संविधान सभा के निषेध-समर्थक वक्तव्यों में श्रमिक परिवार केंद्रीय पात्र है। मिल-मजदूर की कमाई, शराब की दुकान का निकट होना और परिवार की जरूरतों का वंचित रहना बार-बार सामने आता है। इससे शराब प्रश्न निजी स्वाद से सामाजिक वितरण की समस्या बनता है। एक ही मात्रा का व्यय संपन्न और निर्धन परिवार पर समान प्रभाव नहीं डालता। गरीब परिवार में भोजन, शिक्षा और दवा का अवसर सीधे घट सकता है।

सक्सेना ने उस समय प्रचलित “हरिजन” शब्द का उपयोग करते हुए दलित और श्रमिक परिवारों को विशेषतः प्रभावित बताया। आज इस भाषा को आलोचनात्मक दूरी से पढ़ना चाहिए। दलित समुदायों को मद्यपान से स्वभावतः जोड़ना तथ्यहीन कलंक पैदा कर सकता है। औपनिवेशिक और जातीय सत्ता ने कई समुदायों की आजीविका—जैसे ताड़ी निकालना या स्थानीय पेय बनाना—को जाति से बाँधा था। नीति यदि उत्पादन करने वाले समुदाय को अपराधी और उपभोग करने वाले उच्चवर्ग को अदृश्य बनाती है, तो सामाजिक न्याय का लक्ष्य विफल होता है।

श्रम-क्षमता का तर्क भी दोधारी है। समर्थक कहते हैं कि शराब स्वास्थ्य और उत्पादकता घटाती है; विरोधी कहते हैं कि कठोर श्रम करने वाले व्यक्ति को सीमित विश्राम या पेय से वंचित करना अभिभावकवादी है। दोनों में श्रमिक को उत्पादन की इकाई बनाने का जोखिम है। संविधान का जीवन-स्तर लक्ष्य श्रमिक की दक्षता से आगे उसके सम्मान, अवकाश, स्वास्थ्य, परिवार और स्वायत्तता को समाहित करता है।

परिवार की बात में महिला का अनुभव अक्सर परोक्ष है। त्यागी “पत्नियों के आशीर्वाद” का संकेत देते हैं, पर कोई महिला सदस्य इस विशेष बहस में विस्तृत वक्तव्य नहीं देती। इसलिए इतिहासकार को महिला निषेध आंदोलनों, सामाजिक संगठनों और स्थानीय अभिलेखों से सभा के बाहर की आवाजें भी देखनी चाहिए। संविधान सभा महत्वपूर्ण मंच था, पर संविधान-निर्माण का समाज उससे व्यापक था।

दंडात्मक निषेध का बोझ भी वर्ग और जाति के अनुसार असमान हो सकता है। संपन्न व्यक्ति निजी स्थान या महंगे नेटवर्क से नियम बचा सकता है; गरीब उपभोक्ता, सड़क विक्रेता या पारंपरिक उत्पादक पुलिस कार्रवाई के सामने अधिक दिखाई देता है। अनुच्छेद 47 के सामाजिक न्याय उद्देश्य से मेल खाने वाली नीति गिरफ्तारी की संख्या को सफलता न माने, बल्कि निर्भरता-उपचार, परिवार सहायता और अवैध आपूर्ति के संगठित लाभार्थियों पर ध्यान दे।

आजीविका का प्रश्न केवल शराब उद्योग के बड़े कारोबार तक सीमित नहीं। अंगूर उत्पादक, होटल कर्मचारी, परिवहन, पैकेजिंग, ताड़ी या महुआ उत्पादक और छोटे विक्रेता प्रभावित हो सकते हैं। कोई राज्य पूर्ण निषेध चुने तो वैकल्पिक रोजगार और संक्रमण योजना कल्याणकारी दायित्व का हिस्सा होनी चाहिए। नीति का नैतिक लक्ष्य उन लोगों को अचानक बेरोजगार बनाकर पूरा नहीं माना जा सकता जिनकी जीविका पूर्व वैधानिक व्यवस्था पर निर्भर थी।

16. लिंग-न्याय, घरेलू क्षेत्र और निषेध

शराब और परिवार पर बहस को आज लिंग-न्याय के बिना पूरा नहीं माना जा सकता। हानिकारक मद्यपान घरेलू हिंसा, आर्थिक नियंत्रण, बच्चों की उपेक्षा और महिलाओं की असुरक्षा से जुड़ सकता है। इसलिए महिलाओं द्वारा शराब-दुकान विरोध या स्थानीय निषेध की मांग को केवल नैतिक रूढ़िवाद कहकर खारिज करना अनुचित है। यह सुरक्षा, भोजन और घरेलू संसाधनों पर अधिकार की राजनीति भी है।

फिर भी कानून का स्वरूप सावधानी मांगता है। यदि पति के शराब रखने पर गिरफ्तारी होती है और परिवार की आय का स्रोत वही है, तो दंड परिवार को और संकट में डाल सकता है। यदि शिकायत की प्रक्रिया पुलिस भ्रष्टाचार से ग्रस्त हो, तो महिलाओं पर समझौते का दबाव बढ़ सकता है। इसलिए निषेध के साथ सामाजिक सुरक्षा, त्वरित संरक्षण, नशा-उपचार, कानूनी सहायता और आय-विकल्प जरूरी हैं।

महिला को केवल “पत्नी” के रूप में देखना भी सीमित है। महिलाएँ उपभोक्ता, श्रमिक, उत्पादक, आंदोलनकारी, स्वास्थ्यकर्मी और नीति-निर्माता हो सकती हैं। आदिवासी क्षेत्रों में पारंपरिक पेय बनाने और बेचने का कार्य महिलाओं की आय तथा सांस्कृतिक भूमिका से जुड़ा हो सकता है। बाहरी निषेध महिला को घरेलू हिंसा से बचाने के साथ किसी दूसरी महिला की आजीविका छीन सकता है। स्थानीय, लिंग-संवेदनशील परामर्श के बिना एक ही नीति दोनों स्थितियों का न्याय नहीं कर सकती।

संविधान सभा ने इन सभी आयामों को विस्तार से नहीं खोला, पर त्यागी और सक्सेना की परिवार-केंद्रित भाषा ने दरवाजा अवश्य खोला। अनुच्छेद 47 के “जीवन-स्तर” और “स्वास्थ्य” को महिलाओं और बच्चों की वास्तविक सुरक्षा से जोड़ने पर निषेध-नीति अधिक व्यापक कल्याण कार्यक्रम बनती है। बिक्री बंद करना अकेला सूचक नहीं; घरेलू हिंसा, पोषण, विद्यालय उपस्थिति, महिला की वित्तीय स्वायत्तता और उपचार तक पहुँच मापनी चाहिए।

17. आदिवासी संवैधानिकता और छठी अनुसूची

छठी अनुसूची का शराब-संबंधी प्रावधान भारतीय संविधान में बहुस्तरीय शासन का सशक्त उदाहरण है। सामान्य राज्य कानून और स्वायत्त क्षेत्र के बीच संबंध को “स्वतः अनुप्रयोग” के बजाय स्थानीय परिषद की अधिसूचना से जोड़ा गया। इससे कानून की क्षेत्रीय उपयुक्तता पर स्थानीय प्रतिनिधि निकाय का निर्णय मान्य हुआ। यह साधारण प्रशासनिक छूट नहीं; संवैधानिक रूप से संरक्षित स्वशासन है।

गैर-आसवित मदिरा का विशिष्ट उल्लेख तकनीकी और सांस्कृतिक दोनों है। चावल की बियर, महुआ या अन्य पारंपरिक पेय प्रायः स्थानीय किण्वन से बनते हैं और औद्योगिक आसवन से भिन्न हो सकते हैं। संविधान-निर्माताओं ने कम-से-कम कुछ आदिवासी क्षेत्रों के लिए इस भेद को संस्थागत स्थान दिया। इससे जयपाल सिंह की आपत्ति का प्रभाव अंतिम संवैधानिक संरचना में पढ़ा जा सकता है, भले संबंधित अनुसूची का प्रारूप पहले से चर्चा में था।

स्थानीय स्वायत्तता का अर्थ यह नहीं कि स्वास्थ्य-हानि पर कोई उत्तरदायित्व नहीं। जिला परिषद निषेध लागू कर सकती है, संशोधन कर सकती है या स्थानीय नियम बना सकती है। समुदाय-आधारित गुणवत्ता नियंत्रण, आयु-सीमा, समारोहिक उपयोग, विक्रय-नियमन और उपचार कार्यक्रम स्थानीय ज्ञान के आधार पर अधिक प्रभावी हो सकते हैं। बाहरी पुलिस-केंद्रित मॉडल के बजाय सामुदायिक संस्था वैधता और अनुपालन बढ़ा सकती है।

यह भी आवश्यक है कि “परंपरा” के नाम पर समुदाय के भीतर कमजोर सदस्यों की आवाज न दबे। महिला, युवा, स्वास्थ्यकर्मी और विभिन्न कबीलाई या धार्मिक समूह स्थानीय निर्णय में शामिल हों। परिषद की औपचारिक सहमति तभी वास्तविक सांस्कृतिक स्वायत्तता बनेगी जब निर्णय प्रक्रिया सहभागी और पारदर्शी हो।

छठी अनुसूची की सुरक्षा सभी आदिवासी समुदायों या सभी राज्यों पर समान रूप से लागू नहीं। इसलिए जयपाल सिंह का व्यापक नैतिक प्रश्न संवैधानिक भूगोल से बड़ा है। अनुसूचित क्षेत्र, ग्रामसभा और अन्य स्वशासन व्यवस्थाओं में भी स्थानीय संस्कृति और स्वास्थ्य को समेटने की नीति चाहिए। बहस का स्थायी संदेश यह है कि आदिवासी समाज को केवल सुधार की वस्तु नहीं, नीति-ज्ञान और निर्णय का स्रोत माना जाए।

18. नैतिकता बनाम जनस्वास्थ्य

सभा की भाषा में शराब कभी “पाप”, कभी “विष”, कभी “दुर्गुण” और कभी स्वास्थ्य-हानिकारक पदार्थ है। इन शब्दों के बीच संवैधानिक अंतर है। धार्मिक पाप राज्य के दंड का स्वतः आधार नहीं; सार्वजनिक स्वास्थ्य, दूसरों को हानि और सामाजिक लागत धर्मनिरपेक्ष विधायी आधार दे सकते हैं। अंतिम अनुच्छेद ने धार्मिक शब्दावली छोड़कर स्वास्थ्य की भाषा चुनी। यह परिवर्तन भारतीय धर्मनिरपेक्षता के लिए महत्वपूर्ण है।

नैतिकता पूरी तरह अप्रासंगिक भी नहीं। संविधान सामूहिक कल्याण, गरिमा और कमजोर की रक्षा जैसे नैतिक मूल्यों पर आधारित है। प्रश्न यह है कि नैतिक निर्णय सार्वजनिक कारणों में अनूदित हो—प्रमाणित हानि, समानता और अधिकार के रूप में—न कि केवल बहुसंख्यक आस्था के रूप में। खेर के धार्मिक उदाहरणों को अंतिम पाठ ने स्वास्थ्य-केंद्रित मानदंड में रूपांतरित किया।

जनस्वास्थ्य दृष्टि व्यक्ति को दोषी ठहराने के बजाय जोखिम के वातावरण को देखती है: उपलब्धता, कीमत, विज्ञापन, सामाजिक तनाव, बेरोजगारी, मानसिक स्वास्थ्य और उपचार की कमी। निर्भरता को केवल चरित्र-दोष मानने से व्यक्ति उपचार से दूर जाता है। अनुच्छेद 47 का आधुनिक पाठ रोकथाम और उपचार दोनों को राज्य के कर्तव्य में शामिल कर सकता है।

पूर्ण निषेध और हानि-न्यूनीकरण को सदैव शत्रु विकल्प मानना भी आवश्यक नहीं। किसी क्षेत्र में उच्च जोखिम वाले पेयों पर निषेध, आयु और समय सीमा, नशे में वाहन चलाने पर कठोरता, गर्भावस्था चेतावनी, उपचार और स्थानीय शिक्षा साथ चल सकते हैं। आंबेडकर की “आंशिक या क्रमिक” भाषा मिश्रित साधनों की संवैधानिक गुंजाइश दर्शाती है।

नीति की नैतिक सफलता नागरिक के अपमान से नहीं मापी जानी चाहिए। तलाशी, सार्वजनिक शर्म, सामूहिक दंड या कमजोर समुदाय पर असमान पुलिस कार्रवाई स्वास्थ्य का विकल्प नहीं। राज्य का अधिकार जितना व्यापक, प्रक्रिया की निष्पक्षता और जवाबदेही उतनी आवश्यक।

19. निषेध की प्रभावशीलता को परखने की कसौटियाँ

संविधान सभा के वक्ताओं ने सफलता के अनेक संकेत दिए—परिवार की बचत, श्रम-क्षमता, अपराध में कमी, स्वास्थ्य और नैतिक सुधार। आधुनिक नीति-मूल्यांकन इन्हें मापने योग्य सूचकों में बदल सकता है। शराब-संबंधी रोग और मृत्यु, दुर्घटना, हिंसा, उपचार की मांग, घरेलू खर्च, अवैध शराब विषाक्तता और प्रवर्तन-व्यय का निषेह से पहले और बाद का तुलनात्मक अध्ययन होना चाहिए।

केवल वैधानिक बिक्री घटना सफलता का पर्याप्त प्रमाण नहीं, क्योंकि उपभोग अवैध बाजार में जा सकता है। इसी प्रकार जब्त बोतलों और गिरफ्तारियों की बढ़ती संख्या दो अर्थ रख सकती है—बेहतर प्रवर्तन या बड़े अवैध बाजार का निर्माण। आँकड़ों की व्याख्या स्वतंत्र शोध और पारदर्शी पद्धति से होनी चाहिए।

वितरणात्मक प्रभाव अलग से देखना होगा। किस वर्ग, जाति, लिंग और क्षेत्र के लोग गिरफ्तार हुए; किसे जमानत मिली; किन परिवारों की आय प्रभावित हुई; कौन-से संगठित नेटवर्क लाभ में रहे—ये प्रश्न अनुच्छेद 14 और सामाजिक न्याय से जुड़े हैं। नीति औसत स्वास्थ्य सुधार दिखाए लेकिन कमजोर समुदाय पर असमान दंड डाले तो उसका संवैधानिक मूल्यांकन अधूरा रहेगा।

सांस्कृतिक प्रभाव का मूल्यांकन भी आवश्यक है। आदिवासी या स्थानीय पेय पर नियम ने अनुष्ठान, आजीविका और सामुदायिक संबंध को कैसे बदला? क्या स्थानीय परिषद से वास्तविक परामर्श हुआ? क्या उच्च-अल्कोहल वाणिज्यिक मदिरा और पारंपरिक हल्के पेय में भेद किया गया? जयपाल सिंह की आपत्ति इन सूचकों की ऐतिहासिक नींव देती है।

नीति में पूर्वनिर्धारित समीक्षा-काल होना चाहिए। यदि अपेक्षित स्वास्थ्य लाभ न मिले या जहरीली शराब और भ्रष्टाचार बढ़े, तो साधन बदलना लक्ष्य से विश्वासघात नहीं। खारडेकर का अनुभव-आधारित प्रश्न और आंबेडकर का पद्धतिगत विवेक ऐसी समीक्षा को उचित ठहराते हैं।

राज्य को नीति डेटा सार्वजनिक करना चाहिए। आबकारी राजस्व का कितना भाग उपचार, जागरूकता और स्वास्थ्य पर लगा; निषेध राज्य में प्रवर्तन पर कितना व्यय हुआ; कितने उपचार केंद्र उपलब्ध हैं; कितनी मृत्यु कानूनी और अवैध शराब से जुड़ी—ऐसी जानकारी नागरिक विमर्श को नारे से प्रमाण की ओर ले जाती है।

20. बहस के प्रमुख वैचारिक प्रतिमान

पहला प्रतिमान गांधीवादी सामाजिक कल्याण है। इसमें शराब गरीब परिवार की आय और नैतिक स्वराज को नष्ट करने वाली शक्ति है; राज्य का राजस्व-हित त्याग योग्य है। त्यागी, सक्सेना और खेर अलग-अलग ढंग से इस धारा का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसका योगदान घरेलू और सामाजिक हानि को सार्वजनिक प्रश्न बनाना है; सीमा यह कि सदाशय निषेध को कभी परिणाम की पर्याप्त जाँच के बिना समाधान मान लिया जाता है।

दूसरा प्रतिमान उदार व्यक्तिगत स्वतंत्रता है। खारडेकर संयत उपभोग, आनंद और व्यक्तित्व-विकास के निजी क्षेत्र की रक्षा करते हैं। वे बहुमत की नैतिकता तथा राज्य की पुलिस-शक्ति से सावधान करते हैं। योगदान यह कि नीति की अनुपातिकता और अनपेक्षित परिणाम दिखते हैं; सीमा यह कि बाजार, लत और पारिवारिक असमानता से व्यक्ति की पसंद कैसे निर्मित होती है, इसका विश्लेषण कम है।

तीसरा प्रतिमान सामाजिक अर्थशास्त्र है। राजस्व बनाम परिवार की बचत, उत्पादकता, अपराध और रोग की लागत का प्रश्न सक्सेना तथा खारडेकर दोनों उठाते हैं, यद्यपि निष्कर्ष विपरीत हैं। इससे स्पष्ट होता है कि समान आर्थिक चिंता अलग नीति की ओर ले जा सकती है। निर्णायक तत्व प्रमाण की गुणवत्ता और लागतों की समग्र गणना है।

चौथा प्रतिमान सांस्कृतिक बहुलवाद है। जयपाल सिंह पदार्थ के स्थानीय अर्थ, धार्मिक कार्य और कृषि-श्रम की ओर ध्यान दिलाते हैं। यह बहुसंख्यक अनुभव को सार्वभौमिक मानने का प्रतिरोध है। छठी अनुसूची का स्वायत्तता-तंत्र इस प्रतिमान को संस्थागत रूप देता है।

पाँचवाँ प्रतिमान वैज्ञानिक वर्गीकरण है। तंबाकू संशोधन, औषधीय अपवाद और गैर-आसवित पेयों की चर्चा पूछती है कि कौन-सा पदार्थ कितना हानिकारक है और किस उपयोग में। संविधान ने विज्ञान का स्थिर उत्तर नहीं दिया; उसने स्वास्थ्य-लक्ष्य और नीति-विवेक का ढाँचा दिया।

छठा प्रतिमान परिवर्तनकारी किंतु संयमित राज्य है। आंबेडकर लक्ष्य स्वीकारते हैं, पर उसे गैर-न्यायोचित नीति-निर्देश, क्रमिकता और क्षेत्रीय स्वायत्तता में रखते हैं। यह न न्यूनतम राज्य है, न सर्वाधिकारवादी सुधारक; यह लोकतांत्रिक राज्य है जो जनमत, विधायिका और स्थानीय संस्थाओं के माध्यम से आगे बढ़ता है।

21. आलोचनात्मक पुनर्पाठ: सभा ने क्या कहा और क्या नहीं कहा

सभा ने यह कहा कि शराब से स्वास्थ्य, परिवार और श्रम पर गंभीर हानि हो सकती है और राज्य को निष्क्रिय नहीं रहना चाहिए। उसने औषधीय प्रयोजन को बाहर रखा, निषेध को जनस्वास्थ्य के व्यापक कर्तव्य से जोड़ा और राज्य को प्रयास की दिशा दी। उसने यह भी माना कि समय और रूप राज्य तथा जनमत पर निर्भर हो सकते हैं।

सभा ने यह नहीं कहा कि संविधान लागू होते ही पूरे देश में एक समान पूर्ण निषेध स्वतः लागू हो जाएगा। न ही उसने किसी नागरिक के लिए सीधे अपराध और दंड निर्धारित किया। अनुच्छेद 47 विधायिका को नीति दिशा देता है; विशिष्ट अपराध संबंधित कानून बनाता है।

सभा ने आदिवासी आपत्ति को अनसुना नहीं किया। तीखी असहमति के बावजूद आंबेडकर ने छठी अनुसूची की स्थानीय परिषद व्यवस्था से उत्तर दिया। यह उत्तर केवल सांत्वना नहीं, कानून के अनुप्रयोग पर संस्थागत नियंत्रण का उल्लेख था। फिर भी यह मानना गलत होगा कि सभी आदिवासी समाजों की समस्या पूर्णतः हल हो गई; अनुसूची का क्षेत्र सीमित था और समुदायों के भीतर विविध मत थे।

सभा ने शराब और तंबाकू की तुलनात्मक चिकित्सा समीक्षा नहीं की। तंबाकू जोड़ने का संशोधन गिरने को वैज्ञानिक निर्णय नहीं माना जा सकता। उसने अमेरिकी निषेध अनुभव का व्यवस्थित तुलनात्मक अध्ययन भी नहीं किया; खारडेकर ने उदाहरण दिया और समर्थकों ने भारतीय परिस्थिति पर बल दिया।

सभा में प्रस्तुत वित्तीय संख्याएँ वक्ताओं के तर्क थे। उनका स्रोत-विवरण और पद्धति अभिलेख में पर्याप्त नहीं; इसलिए उन्हें आज के प्रमाण की तरह उद्धृत करना ऐतिहासिक त्रुटि होगी। वे उस समय सदस्यों द्वारा समस्या को आर्थिक रूप में देखने के प्रमाण हैं।

सभा ने नशा-निर्भरता को चिकित्सा विकार के आधुनिक ढाँचे में विस्तार से नहीं रखा। शिक्षा, संयम और कानून प्रमुख साधन थे। आज उपचार, मानसिक स्वास्थ्य, पुनर्वास और हानि-न्यूनीकरण का ज्ञान अनुच्छेद 47 के स्वास्थ्य उद्देश्य को अधिक मानवीय रूप दे सकता है। मूल लक्ष्य स्थिर रहते हुए साधन विकसित हो सकते हैं।

22. समकालीन नीति के लिए संवैधानिक सिद्धांत

पहला सिद्धांत स्वास्थ्य-केंद्रितता है। शराब नीति का औचित्य धार्मिक पाप या सांस्कृतिक श्रेष्ठता नहीं, प्रमाणित स्वास्थ्य और सामाजिक हानि होना चाहिए। इससे नीति सभी नागरिकों के सामने सार्वजनिक कारणों से न्यायसंगत बनती है।

दूसरा सिद्धांत अनुपातिकता है। उच्च जोखिम के उत्तर में ऐसा साधन चुना जाए जो प्रभावी हो और अनावश्यक दमन न करे। पूर्ण निषेध संभव संवैधानिक विकल्प है, पर एकमात्र विकल्प नहीं। आंशिक, क्रमिक और मिश्रित उपाय भी सभा के समझौते में समाहित हैं।

तीसरा सिद्धांत सांस्कृतिक भेद और स्थानीय सहमति है। पारंपरिक गैर-आसवित पेय, धार्मिक समारोह और आदिवासी आजीविका पर नीति बनाते समय स्वशासी संस्थाओं तथा समुदायों को निर्णय में वास्तविक भूमिका मिले। संस्कृति को स्वास्थ्य से छूट न बनाया जाए, लेकिन स्वास्थ्य को सांस्कृतिक दमन का बहाना भी न बनाया जाए।

चौथा सिद्धांत सामाजिक न्याय है। प्रवर्तन का भार गरीब, दलित, आदिवासी या महिला उत्पादक पर असमान न पड़े। उपचार और परिवार सहायता को पुलिस कार्रवाई से प्राथमिक या कम-से-कम समान महत्व मिले। संगठित तस्करी और मिलावट से लाभ कमाने वाले नेटवर्क पर लक्ष्यित कार्रवाई हो।

पाँचवाँ सिद्धांत राजकोषीय पारदर्शिता है। राज्य आबकारी आय और शराब-संबंधी सार्वजनिक लागत दोनों बताए। निषेध लागू करने पर वैकल्पिक वित्त और प्रभावित रोजगार की योजना प्रकाशित करे। नीति को राजस्व बढ़ाने या राजनीतिक प्रतीक बनाने के बजाय कल्याण परिणाम से आँका जाए।

छठा सिद्धांत वैज्ञानिक समीक्षा है। पेय की शक्ति, उपभोग पैटर्न, लत, रोग और अवैध बाजार पर स्वतंत्र डेटा एकत्र हो। समय-समय पर नीति का प्रभाव मूल्यांकित हो और विफल साधन संशोधित किए जाएँ। अनुभव से सीखना खारडेकर की आपत्ति का सार और लोकतांत्रिक प्रशासन की आवश्यकता है।

सातवाँ सिद्धांत अधिकार-सम्मत प्रक्रिया है। तलाशी, गिरफ्तारी, जब्ती, लाइसेंस और दंड स्पष्ट कानून, निष्पक्ष प्रक्रिया तथा न्यायिक समीक्षा के अधीन रहें। नीति-निदेशक लक्ष्य मूल अधिकारों की उपेक्षा की अनुमति नहीं देता; दोनों को सामंजस्यपूर्ण रूप से पढ़ना भारतीय संवैधानिकता की सामान्य पद्धति है।

23. विस्तृत निष्कर्ष

संविधान सभा की शराब-संबंधी बहस भारतीय गणराज्य के नैतिक और संस्थागत स्वभाव की छोटी किंतु अत्यंत अर्थपूर्ण खिड़की है। यहाँ गांधीवादी सामाजिक सुधार, औपनिवेशिक आबकारी की आलोचना, गरीब परिवार की सुरक्षा, उदार स्वतंत्रता, प्रशासनिक क्षमता, आदिवासी संस्कृति, विज्ञान और संघवाद एक ही अनुच्छेद की भाषा में मिलते हैं। अंतिम पाठ किसी एक पक्ष की पूर्ण विजय नहीं, बहुस्तरीय समझौता है।

महावीर त्यागी ने निषेध को सभा के सामने औपचारिक संशोधन के रूप में रखा। शिब्बन लाल सक्सेना ने औषधीय अपवाद जोड़कर भाषा को व्यावहारिक बनाया और सामाजिक लागत का आर्थिक तर्क दिया। खारडेकर ने लोकप्रिय नैतिक सहमति के बीच असहमति दर्ज कर अमेरिकी अनुभव, राजस्व, स्वतंत्रता, भ्रष्टाचार और अवैध शराब की चेतावनी दी। जयपाल सिंह ने भारतीय आधुनिकता के भीतर आदिवासी धार्मिक-सांस्कृतिक अधिकार और स्थानीय ज्ञान की मांग रखी। भूपिंदर सिंह मान ने तंबाकू का प्रश्न उठाकर नीति की चयनात्मक श्रेणियाँ उजागर कीं। खेर, ठक्कर और साहू ने संरक्षण, समुदाय-सुधार और क्रमिक शिक्षा का समर्थन किया।

आंबेडकर ने इन विरोधी दावों को संविधान की संस्थागत भाषा में समेटा। निषेध को नीति-निदेशक तत्त्व में रखने से लक्ष्य शासन में मूलभूत रहा, किंतु अदालत द्वारा सीधे लागू किया जाने वाला व्यक्तिगत दंडादेश नहीं बना। “विशेष रूप से” ने उसे पोषण और जनस्वास्थ्य से जोड़ा; “प्रयास” ने राज्य को समय तथा साधन का विवेक दिया; “क्रमिक या आंशिक” संभावना ने नीति प्रयोग की जगह बनाई; और छठी अनुसूची के उल्लेख ने आदिवासी स्वायत्तता की संवैधानिक सुरक्षा बताई।

इस इतिहास के आधार पर अनुच्छेद 47 को दो अतियों से बचाना चाहिए। पहली अति है उसे निरर्थक नैतिक उपदेश मानना। वह राज्य पर वास्तविक राजनीतिक और संवैधानिक जिम्मेदारी डालता है कि वह शराब से होने वाली हानि की उपेक्षा न करे। दूसरी अति है उसे हर समय, हर क्षेत्र और हर पेय पर तत्काल पूर्ण निषेध का अपरिवर्तनीय आदेश मानना। सभा का अभिलेख स्वयं राज्य-विवेक, क्रमिकता, औषधीय अपवाद और स्थानीय स्वायत्तता स्वीकार करता है।

समकालीन लोकतंत्र में अनुच्छेद 47 का श्रेष्ठ अनुप्रयोग प्रमाण-आधारित सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति होगा। राज्य को उपलब्धता, कीमत, विज्ञापन, सड़क सुरक्षा, उपचार, मानसिक स्वास्थ्य, घरेलू हिंसा और परिवार-कल्याण पर समन्वित कार्य करना चाहिए। यदि पूर्ण निषेध चुना जाए, तो अवैध बाजार, जहरीली शराब, भ्रष्टाचार, असमान गिरफ्तारी और आजीविका के प्रभाव की स्वतंत्र निगरानी हो। यदि विनियमित बिक्री चुनी जाए, तो राजस्व-लालच स्वास्थ्य लक्ष्य पर हावी न हो।

आदिवासी संदर्भ में बहस का संदेश और स्पष्ट है: नीति समुदाय के बारे में नहीं, समुदाय के साथ बने। पारंपरिक पेय के सामाजिक अर्थ, अल्कोहल शक्ति, धार्मिक उपयोग, महिला की आजीविका और स्वास्थ्य-जोखिम को अलग-अलग समझा जाए। छठी अनुसूची की परिषद-सहमति भारतीय संविधान के बहुलवादी चरित्र की याद दिलाती है।

अंततः यह बहस लोकतांत्रिक संविधान-निर्माण का पाठ है। बहुमत के पास प्रस्ताव पारित करने की शक्ति थी, किंतु अल्पमत की आपत्तियों ने अंतिम अर्थ को अधिक सूक्ष्म बनाया। खारडेकर ने साधन की विफलता से सावधान किया; जयपाल सिंह ने सांस्कृतिक बहुलता को दृश्य बनाया; मान ने श्रेणीगत असंगति दिखाई; आंबेडकर ने लक्ष्य और विवेक में संतुलन बनाया। अनुच्छेद 47 की परिपक्व व्याख्या तभी संभव है जब इन सभी आवाजों को साथ सुना जाए। शराब पर संविधान सभा का निर्णय एक साधारण “हाँ” या “नहीं” नहीं था; वह स्वास्थ्य-सम्मत, लोकतांत्रिक, संघीय और बहुलवादी राज्य की कठिन खोज थी।

24. वक्ता-केंद्रित तुलनात्मक विश्लेषण

महावीर त्यागी की भूमिका प्रस्तावक की थी, पर उनका भाषण संक्षिप्त रहा। इस संक्षिप्तता को विषय की सरलता नहीं समझना चाहिए। उन्होंने निषेध को ऐसे नैतिक सामान्य ज्ञान की तरह प्रस्तुत किया जिसे लंबी सिद्धि की जरूरत नहीं। पत्नी के आशीर्वाद और पीने वालों की नाराजगी का उनका व्यंग्य सामाजिक संघर्ष का संकेत देता है: कानून का लाभ और बोझ अलग व्यक्तियों को दिखाई देगा। त्यागी की राजनीति में परिवार वह इकाई है जिसकी ओर से राज्य व्यक्ति के व्यवहार में हस्तक्षेप करेगा।

शिब्बन लाल सक्सेना प्रस्ताव के नीति-अर्थशास्त्री के रूप में उभरते हैं। उन्होंने राजस्व, निजी व्यय और प्रवर्तन लागत को एक ही तर्क में रखा। उनकी गणना में शराब पर खर्च परिवार से संसाधन निकालता है; सरकारी राजस्व उसका छोटा अंश है; अतः निषेध से खजाने की हानि की तुलना में समाज की बचत बड़ी होगी। पद्धति के पर्याप्त विवरण के अभाव में संख्या को प्रमाण नहीं माना जा सकता, फिर भी यह आधुनिक लागत-लाभ विश्लेषण की पूर्वपीठिका है। उन्होंने नैतिक आदर्श को आर्थिक भाषा देकर कल्याणकारी राज्य के लिए स्वीकार्य बनाया।

बी. एच. खारडेकर का वक्तव्य विपक्ष की संसदीय भूमिका का नमूना है। उन्होंने स्वयं को निषेध के वातावरण में अल्पमत जानते हुए भी प्रस्ताव के साधन पर प्रश्न उठाया। उनकी शैली में हास्य, शहर-केंद्रित सामाजिकता और उदारवादी पाठ का संदर्भ है। कभी यह भाषण अभिजात अनुभव से सीमित लगता है, फिर भी अवैध आसवन, भ्रष्टाचार और जहरीले विकल्प की चेतावनी गरीब के स्वास्थ्य से भी जुड़ती है। वह बहुमत से पूछते हैं कि नैतिक लक्ष्य के नाम पर असफल कानून की सामाजिक कीमत कौन देगा।

जयपाल सिंह का वक्तव्य प्रतिनिधित्व की दिशा बदलता है। त्यागी की पत्नी, सक्सेना का मजदूर और खारडेकर का स्वतंत्र नागरिक नीति से प्रभावित व्यक्ति हैं; जयपाल सिंह का आदिवासी समुदाय एक वैकल्पिक विधि और संस्कृति का धारक है। वह केवल राज्य से सुरक्षा नहीं मांगता, बल्कि यह दावा करता है कि बाहरी शब्दावली स्थानीय वस्तु को ठीक से पहचानती ही नहीं। “मादक” और “हानिकारक” की परिभाषा पर उनका प्रश्न ज्ञान-सत्ता का प्रश्न है: कानून बनाने वाला किस अनुभव को सामान्य और किसे अपवाद मानता है?

बी. जी. खेर समर्थक पक्ष को प्रशासनिक अनुभव का आधार देते हैं। प्रांतीय सरकार में निषेध के प्रयास का संदर्भ देकर वे परिवारों के कथित लाभ की बात करते हैं। उनका विश्वास है कि क्रमिक शिक्षा से आदिवासी समाज भी हानिकारक आदत छोड़ सकता है। पर उनकी भाषा में समुदाय के लिए बोलने का राज्यवादी आत्मविश्वास है। यही वह बिंदु है जहाँ जयपाल सिंह की स्वप्रतिनिधि आवाज और ठक्कर/खेर की कल्याणकारी प्रतिनिधि आवाज टकराती हैं। लोकतांत्रिक नीति में प्रभावित समुदाय का अपना कथन बाहरी हितैषी के कथन से प्रतिस्थापित नहीं होना चाहिए।

ए. वी. ठक्कर का अनुभव इस द्वंद्व को और जटिल करता है। वे भिल और गोंड समुदायों में निषेध की मांग बताते हैं। यदि उनके अवलोकन को स्वीकारें, तब जयपाल सिंह की व्यापक भाषा सभी आदिवासियों पर लागू नहीं हो सकती। पर इसका उल्टा भी सही है: कुछ समुदायों की स्वैच्छिक संयम-प्रतिज्ञा के आधार पर सभी पारंपरिक पेयों पर बाहरी निषेध उचित नहीं ठहराया जा सकता। दोनों वक्तव्यों का संयुक्त संदेश स्थानीय लोकतांत्रिक चुनाव है, भले स्वयं वक्ताओं ने उसे उसी शब्द में न रखा हो।

भूपिंदर सिंह मान बहस के तार्किक आलोचक हैं। उनका तंबाकू प्रस्ताव पूछता है कि स्वास्थ्य-हानि वास्तविक कसौटी है तो व्यापक रूप से प्रयुक्त दूसरे पदार्थ को क्यों छोड़ा गया। बहुमत ने संशोधन अस्वीकार किया, किंतु प्रश्न बना रहा। नीति प्रायः वैज्ञानिक जोखिम के साथ राजनीतिक स्वीकार्यता का परिणाम होती है। मान का हस्तक्षेप संविधान के पाठ और समाज की प्रचलित आदतों के बीच चयनात्मकता को दृश्यमान करता है।

आंबेडकर का वक्तव्य विधि-निर्माता का संश्लेषण है। वे किसी वक्ता की संपूर्ण नैतिक दुनिया स्वीकार नहीं करते, बल्कि भाषा और संस्था में न्यूनतम साझा सहमति बनाते हैं। सक्सेना का औषधीय अपवाद, त्यागी का निषेध-लक्ष्य, खारडेकर की क्रमिकता की चिंता और जयपाल सिंह की स्वायत्तता—इन सबको अलग संवैधानिक स्थान मिलता है। यह समझौता पूर्णतः सममित नहीं; निषेध लक्ष्य पाठ में आता है, जबकि स्वतंत्रता की आपत्ति विवेक में रहती है। फिर भी संस्था ऐसी बनाई गई कि भविष्य की लोकतांत्रिक राजनीति साधन तय कर सके।

25. शब्दावली का सूक्ष्म पाठ: निषेध, सेवन, हानि और औषधि

“Prohibition” शब्द सामान्य नियमन से अधिक मजबूत है। वह कर, लाइसेंस या चेतावनी मात्र नहीं, किसी व्यवहार को रोकने की दिशा व्यक्त करता है। किंतु उसके साथ “endeavour” होने से पाठ परिणाम की पूर्ण गारंटी नहीं मांगता। राज्य का ईमानदार और तर्कसंगत प्रयास आवश्यक है, सफलता हर परिस्थिति में नहीं। इस संयोजन से लक्ष्य की कठोरता और साधन की लचक साथ रहती हैं।

“Consumption” उत्पादन और व्यापार से अलग व्यक्ति के उपयोग पर केंद्रित है। सेवन रोकने के लिए राज्य आपूर्ति पर नियंत्रण कर सकता है, पर संवैधानिक उद्देश्य उपभोग-हानि कम करना है। यदि उत्पादन केवल निर्यात या औद्योगिक उपयोग के लिए हो तो उसका संबंध अलग होगा। इसीलिए विधायी प्रविष्टियों और न्यायिक निर्णयों में पेय योग्य अल्कोहल का भेद जरूरी है। नीति के साधन उद्देश्य से अधिक व्यापक हों तो उनके औचित्य की अलग समीक्षा चाहिए।

“Except for medicinal purposes” वस्तु के बजाय प्रयोजन की छूट है। इसका अर्थ यह नहीं कि कोई उत्पाद केवल लेबल पर “औषधि” लिखकर मुक्त हो जाए। वास्तविक चिकित्सीय उपयोग, संरचना और वितरण का नियमन हो सकता है। साथ ही राज्य ऐसी कठोरता न अपनाए कि आवश्यक दवा या चिकित्सीय तैयारी अनुपलब्ध हो। यह अपवाद निषेध के भीतर विवेक और विज्ञान की जगह बनाता है।

“Intoxicating drinks” में पेय का नशीला गुण केंद्रीय है, पर नशे की सीमा पाठ में नहीं। अल्कोहल प्रतिशत, सेवन मात्रा और प्रभाव अलग हो सकते हैं। जयपाल सिंह की स्थानीय चावल की बियर संबंधी आपत्ति इसी अस्पष्टता को चुनौती देती है। आधुनिक विधायिका को परिभाषा में रासायनिक मानक, उत्पाद श्रेणी और उपयोग स्पष्ट करना चाहिए; अन्यथा मनमाना प्रवर्तन संभव है।

“Drugs which are injurious to health” में औषधि/नशीली दवा शब्द की ऐतिहासिक व्यापकता है। आज नियंत्रित पदार्थों की अलग कानूनी व्यवस्थाएँ हैं। अनुच्छेद 47 का स्वास्थ्य सिद्धांत उन पर दिशा दे सकता है, पर विशिष्ट अपराध और दंड संबंधित कानून से आते हैं। शराब और अन्य दवाओं को एक ही नीति में रखकर भी उनके जोखिम, उपचार और अवैध बाजार की भिन्नता समझनी होगी।

“Injurious to health” नैतिकता को अनुभवजन्य कसौटी देता है। हानि का निर्धारण स्थिर नहीं; चिकित्सा ज्ञान और सामाजिक प्रमाण विकसित होते हैं। यह पद विधायिका को अद्यतन विज्ञान देखने के लिए बाध्य करने वाला माना जा सकता है। साथ ही केवल औसत जैविक हानि पर्याप्त नहीं; मानसिक स्वास्थ्य, परिवार, दुर्घटना और सामाजिक लागत भी सार्वजनिक स्वास्थ्य का भाग हैं।

“In particular” प्राथमिकता का सूचक है, अलगाव का नहीं। निषेध पोषण और जीवन-स्तर से संबंधित है क्योंकि शराब पर व्यय भोजन घटा सकता है, रोग आय घटा सकता है और हिंसा परिवार की सुरक्षा नष्ट कर सकती है। इसके विपरीत खराब निषेध नीति जहरीली शराब या कारावास से जीवन-स्तर घटा सकती है। दोनों दिशाओं का परीक्षण पाठ के समग्र अर्थ से होना चाहिए।

हिंदी आधिकारिक पाठ में प्रयुक्त “मादक पेयों”, “औषधीय प्रयोजनों” और “प्रतिषेध” जैसे शब्द प्रशासनिक अर्थ रखते हैं। लोकप्रिय भाषा का “शराबबंदी” सुविधाजनक है, पर उससे अनुच्छेद का औषधीय अपवाद, हानिकारक औषधियों का उल्लेख और व्यापक स्वास्थ्य वाक्य छूट सकता है। अकादमिक लेखन में पूर्ण पाठ की संरचना दिखाना आवश्यक है।

26. पूर्ण निषेध, आंशिक निषेध और विनियमित नियंत्रण

पूर्ण निषेध में सामान्यतः पेय मदिरा के निर्माण, विक्रय, परिवहन, कब्जे और सेवन पर व्यापक रोक लगाई जाती है, कुछ परमिट या औषधीय अपवादों के साथ। इसका लाभ स्पष्ट संदेश और उपलब्धता में संभावित तेज कमी है। चुनौती सीमा-पार तस्करी, अवैध उत्पादन, गुणवत्ता-नियंत्रण की हानि, उच्च प्रवर्तन लागत और व्यापक आपराधिकरण है। संविधान सभा में समर्थकों ने पहले पक्ष और खारडेकर ने दूसरे पक्ष की आशंका रखी।

आंशिक निषेध पेय, क्षेत्र, दिन, समय या बिक्री स्थल के आधार पर हो सकता है। उच्च-अल्कोहल पेय पर कठोरता और स्थानीय हल्के पेय पर अलग नियम; विद्यालय, धार्मिक स्थल या राजमार्ग के निकट बिक्री रोकना; कुछ आयु वर्ग के लिए निषेध—ये उदाहरण हैं। आंबेडकर का “partially” शब्द इस नीति-स्थान को मान्यता देता है। आंशिकता मनमानी वर्गीकरण नहीं होनी चाहिए; जोखिम और उद्देश्य से तार्किक संबंध जरूरी है।

क्रमिक निषेध समय के साथ दुकानें घटाने, नए लाइसेंस सीमित करने, बिक्री समय कम करने और उपचार क्षमता बढ़ाने का मार्ग हो सकता है। इससे प्रशासन और अर्थव्यवस्था को अनुकूलन का अवसर मिलता है। लेकिन क्रमिकता अनिश्चित विलंब का बहाना भी बन सकती है। स्पष्ट लक्ष्य, समय-सारणी, वार्षिक समीक्षा और सार्वजनिक रिपोर्ट आवश्यक हैं।

विनियमित नियंत्रण में राज्य बिक्री की अनुमति रखते हुए कीमत, कर, लाइसेंस, आयु, विज्ञापन और उपलब्धता पर नियंत्रण करता है। यह अवैध बाजार के जोखिम को कम कर सकता है और गुणवत्ता निगरानी संभव बनाता है। लेकिन आबकारी राजस्व राज्य को बिक्री बढ़ाने का प्रोत्साहन दे सकता है। अनुच्छेद 47 मांग करता है कि नियमन का स्वास्थ्य उद्देश्य राजस्व उद्देश्य पर प्रधान रहे।

राज्य एकाधिकार को कभी नियंत्रण का माध्यम माना जाता है। निजी लाभ-प्रेरणा सीमित कर दुकान संख्या और समय नियंत्रित किए जा सकते हैं। दूसरी ओर सरकारी विक्रेता और राजस्व विभाग स्वयं बिक्री लक्ष्य के दबाव में हों तो हित-संघर्ष बना रहता है। प्रशासनिक पारदर्शिता और स्वास्थ्य विभाग की निर्णायक भूमिका जरूरी है।

समुदाय-आधारित मॉडल स्थानीय संस्था को दुकान अनुमति, समारोहिक उपयोग और पारंपरिक उत्पादन पर अधिकार देता है। छठी अनुसूची इसका संवैधानिक रूप दिखाती है। स्थानीय सत्ता भी प्रभावशाली समूहों से प्रभावित हो सकती है, इसलिए महिला और स्वास्थ्य प्रतिनिधित्व, अपील और डेटा आवश्यक हैं।

हानि-न्यूनीकरण नीति व्यक्ति को अपराधी के बजाय स्वास्थ्य सेवा का पात्र मानती है। उपचार, परामर्श, सुरक्षित वापसी, मानसिक स्वास्थ्य और परिवार सहायता इसके अंग हैं। यह निषेध के विरोध का पर्याय नहीं; कठोर आपूर्ति नियंत्रण के साथ भी निर्भर व्यक्ति को दंड के बजाय उपचार दिया जा सकता है।

कोई मॉडल सभी राज्यों के लिए स्थायी रूप से श्रेष्ठ घोषित नहीं किया जा सकता। सीमा, पर्यटन, स्थानीय संस्कृति, प्रशासनिक क्षमता और उपभोग पैटर्न भिन्न हैं। संविधान का साझा लक्ष्य स्वास्थ्य है; संघवाद प्रयोग की अनुमति देता है; लोकतंत्र तुलनात्मक परिणाम से सीखने का मार्ग देता है।

27. शोधार्थियों के लिए स्रोत-समीक्षा और सावधानियाँ

संविधान सभा बहस का उपयोग करते समय तिथि और प्रारूप अनुच्छेद सही पहचानना पहली आवश्यकता है। वर्तमान अनुच्छेद 47 बहस के समय प्रारूप अनुच्छेद 38 था। वर्तमान अनुच्छेद 38 अलग विषय रखता है। यदि शोधकर्ता केवल “Article 47 debate” खोजकर उद्धरण ले, तो पुनर्संख्यांकन की प्रक्रिया समझे बिना भ्रम हो सकता है। स्रोत में 23 नवंबर का प्रस्ताव और 24 नवंबर की मुख्य चर्चा दोनों देखना चाहिए।

वक्ता के नाम की सावधानी भी जरूरी है। कोल्हापुर प्रतिनिधि बी. एच. खारडेकर थे; तत्काल वक्तव्य में आंबेडकर ने नाम अलग ढंग से लिया। द्वितीयक लेख उस मौखिक त्रुटि को दोहरा सकते हैं। सदस्य-सूची और बहस शीर्षक से पहचान मिलानी चाहिए। इसी प्रकार शिब्बन लाल सक्सेना की वर्तनी अलग डिजिटल प्रतियों में बदल सकती है।

डिजिटल प्रतिलिपि में OCR त्रुटियाँ हैं—शब्द जुड़े हुए, spelling गलत और पंक्तियाँ टूटी हुई मिल सकती हैं। उद्धरण लेते समय मुद्रित आधिकारिक रिपोर्ट या विश्वसनीय डिजिटाइज्ड संस्करण से मिलान आवश्यक है। इस आलेख में इसी कारण प्रत्यक्ष उद्धरण बहुत छोटे रखे गए हैं और तिथि-वक्ता दिया गया है।

सभा-सदस्य द्वारा दिया आँकड़ा अपने आप आधिकारिक सांख्यिकी नहीं। सक्सेना की राजस्व गणना और खारडेकर का पीने वालों का प्रतिशत उनके वक्तव्य का हिस्सा हैं। उनका ऐतिहासिक महत्व यह बताना है कि सदस्य किस प्रकार तर्क बना रहे थे। समकालीन तथ्य के रूप में उपयोग करने के लिए मूल सांख्यिकीय रिपोर्ट और कार्यपद्धति चाहिए।

द्वितीयक स्रोत उपयोगी व्याख्या देते हैं, पर उद्धरण और घटनाक्रम प्राथमिक बहस से सत्यापित होने चाहिए। किसी ब्लॉग का निष्कर्ष सभा की मंशा नहीं माना जा सकता। अलग विद्वान समान वाक्य को निषेध, जिम्मेदार सेवन, कल्याणकारी राज्य या सांस्कृतिक अधिकार के समर्थन में पढ़ सकते हैं। शोधकर्ता को अपने व्याख्यात्मक कदम स्पष्ट करने चाहिए।

न्यायिक निर्णयों में अनुच्छेद 47 की भाषा उद्धृत होती है, लेकिन निर्णय का अनुपात अपने तथ्य और मुद्दे पर निर्भर है। बलसारा, हर शंकर, पी. एन. कौशल, खोडे और केरल बार होटल्स को एक वाक्य में “शराब पर कोई अधिकार नहीं” कहकर समेटना सरलता होगी। विधायी क्षमता, व्यापार, लाइसेंस और समानता के प्रश्न अलग-अलग हैं।

गांधी के नाम पर प्रचलित अनेक कथन बिना सटीक स्रोत घूमते हैं। संविधान सभा सदस्यों ने गांधी की इच्छा का उल्लेख किया, पर प्रत्येक कथन को गांधी का शब्दशः उद्धरण मानना उचित नहीं। शोध में Collected Works या प्रमाणित प्रकाशन से सत्यापन जरूरी है। इस आलेख ने असत्यापित लोकप्रिय कथन को प्रत्यक्ष गांधी-उद्धरण के रूप में नहीं लिया है।

अंततः वर्तमान राज्यों की निषेध स्थिति समय के साथ बदल सकती है। ऐतिहासिक लेख में नवीन सूची तभी दी जाए जब सरकारी अधिसूचना से तिथि सहित सत्यापन हो। इस अध्ययन का केंद्र संविधान सभा है; इसलिए अस्थिर समकालीन सूची देने के बजाय संवैधानिक मॉडल और न्यायिक सिद्धांत पर बल रखा गया है।

28. उपसंहार: शराब-विमर्श से संविधान की व्यापक समझ

शराब पर हुई बहस हमें बताती है कि संविधान सामाजिक जीवन की बहुत ठोस वस्तुओं तक पहुँचता है—मजदूर की मजदूरी, परिवार का भोजन, आदिवासी अनुष्ठान, शहर की सामाजिकता, राज्य का कर और पुलिस का अधिकार। अमूर्त शब्द “स्वतंत्रता” और “कल्याण” इन्हीं ठोस स्थितियों में अर्थ पाते हैं।

यह बहस संविधान को केवल न्यायालय का दस्तावेज मानने की सीमा भी दिखाती है। नीति-निदेशक तत्त्व लोकतांत्रिक सरकार, बजट, प्रशासन और जनमत के माध्यम से जीवित होते हैं। शराबबंदी पर अदालत महत्वपूर्ण है, पर उपचार केंद्र खोलना, डेटा एकत्र करना, दुकान नीति बनाना और स्थानीय समुदाय से संवाद कार्यपालिका तथा विधायिका की जिम्मेदारी है।

बहस असहमति के मूल्य का पाठ देती है। यदि खारडेकर न बोलते तो प्रवर्तन, स्वतंत्रता और अमेरिकी अनुभव का प्रश्न अभिलेख में कमजोर रहता। यदि जयपाल सिंह न बोलते तो चावल की बियर और आदिवासी धार्मिक अधिकार बहुमत की नैतिक भाषा में खो जाते। यदि मान तंबाकू न उठाते तो स्वास्थ्य-कसौटी की चयनात्मकता कम दिखाई देती। लोकतांत्रिक संविधान विरोधी आवाजों से कमजोर नहीं, अधिक बुद्धिमान बनता है।

यह बहस समझौते की प्रकृति भी बताती है। समझौता हमेशा बीच का संख्यात्मक बिंदु नहीं; अलग चिंताओं को अलग संस्थागत स्थान देना भी है। निषेध लक्ष्य अनुच्छेद 47 में, औषधीय अपवाद भाषा में, क्रमिकता नीति-विवेक में और आदिवासी संरक्षण छठी अनुसूची में आया। संविधान ने एक ही वाक्य से हर समस्या हल करने का दावा नहीं किया।

आज सबसे बड़ी आवश्यकता इसी संस्थागत बुद्धिमत्ता को पुनः प्राप्त करना है। शराब नीति को राजनीतिक प्रतीक या राजस्व साधन बनाने के बजाय स्वास्थ्य परिणाम, अधिकार और स्थानीय विविधता से जोड़ना होगा। प्रतिबंध की कठोरता से अधिक महत्वपूर्ण उसका वास्तविक प्रभाव है; उदार उपलब्धता से अधिक महत्वपूर्ण राज्य की स्वास्थ्य जिम्मेदारी है।

अनुच्छेद 47 की आत्मा को “शराब उपलब्ध है या नहीं” के एक प्रश्न में सीमित नहीं किया जा सकता। उसकी आत्मा पोषण, जीवन-स्तर और जनस्वास्थ्य का समेकित सुधार है। परिवार भूखा रहे, उपचार न मिले और अवैध विष बिके तो केवल कानूनी निषेध संवैधानिक सफलता नहीं। उसी प्रकार राज्य स्पष्ट हानि जानते हुए राजस्व के लिए बाजार बढ़ाए तो विनियमित बिक्री भी पर्याप्त नहीं।

संविधान सभा की बहस का संतुलित संदेश है: राज्य हानि से आँख न मोड़े; नागरिक को केवल दंड का विषय न बनाए; समुदाय की संस्कृति को सुने; विज्ञान से नीति जाँचे; और अपने साधनों को परिणाम के आधार पर बदलने को तैयार रहे। यही लोकतांत्रिक जनस्वास्थ्य का संवैधानिक रूप है।

29. परिशिष्टात्मक विश्लेषण: बारह केंद्रीय निष्कर्ष

पहला निष्कर्ष यह है कि शराबबंदी का स्पष्ट वाक्य 1948 के मूल प्रारूप अनुच्छेद 38 में नहीं था। उसे सभा के तल से आए संशोधन ने जोड़ा। इसलिए यह कहना अधिक सटीक है कि संविधान सभा ने विचार-विमर्श के दौरान जनस्वास्थ्य के सामान्य दायित्व को निषेध के विशिष्ट प्रयत्न से विस्तृत किया। इससे सदस्यों की संशोधन-शक्ति और खुली बहस का महत्व प्रकट होता है।

दूसरा निष्कर्ष यह है कि 23 नवंबर का संक्षिप्त प्रस्ताव और 24 नवंबर की विस्तृत बहस एक ही प्रक्रिया के दो चरण हैं। केवल 24 नवंबर पढ़ने पर त्यागी की आरंभिक भूमिका और प्रस्ताव की भाषा का उद्भव छूट सकता है; केवल 23 नवंबर पढ़ने पर सक्सेना का औषधीय अपवाद, खारडेकर और जयपाल सिंह की आपत्तियाँ तथा आंबेडकर का समाधान नहीं दिखाई देगा।

तीसरा निष्कर्ष है कि अंतिम भाषा सामूहिक निर्मिति है। त्यागी ने निषेध जोड़ा, सक्सेना ने औषधीय प्रयोजन की छूट दी और आंबेडकर ने “विशेष रूप से” जोड़कर स्वास्थ्य के व्यापक कर्तव्य से संबंध स्पष्ट किया। किसी एक व्यक्ति को पूरे अनुच्छेद का अकेला रचयिता बताना अभिलेख की सहयोगी प्रकृति को कम करेगा।

चौथा निष्कर्ष है कि निषेध समर्थक तर्क केवल धार्मिक नैतिकता पर आधारित नहीं था। परिवार की आय, श्रमिक की स्थिति, रोग, अपराध, उत्पादकता और प्रांतीय प्रशासन के अनुभव उसके महत्वपूर्ण आधार थे। धार्मिक भाषा कुछ वक्तव्यों में थी, लेकिन अंतिम पाठ ने धर्मनिरपेक्ष जनस्वास्थ्य की शब्दावली अपनाई।

पाँचवाँ निष्कर्ष है कि विरोध केवल शराब उद्योग के आर्थिक हित से नहीं आया। खारडेकर ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता, सामाजिक आनंद, प्राथमिकताओं, अमेरिकी अनुभव, अवैध उत्पादन और भ्रष्टाचार की चिंता रखी। उनके कुछ अनुमान प्रमाणहीन हो सकते हैं, फिर भी प्रश्न नीति-विज्ञान के लिए वैध हैं और आज भी प्रभाव-मूल्यांकन में शामिल होने चाहिए।

छठा निष्कर्ष है कि आदिवासी प्रश्न बहस का परिधीय प्रसंग नहीं। जयपाल सिंह ने राज्य की श्रेणी, ज्ञान और सांस्कृतिक अधिकार को चुनौती दी। उन्होंने हानिकारक अति और धार्मिक-सामुदायिक उपयोग में अंतर किया तथा अनुसंधान की माँग की। यह आधुनिक स्वदेशी ज्ञान और सहभागी नीति के सिद्धांत से मेल खाता है।

सातवाँ निष्कर्ष है कि “आदिवासी मत” एकरूप नहीं। जयपाल सिंह ने चावल की बियर के धार्मिक महत्व की रक्षा की; ठक्कर ने भिल और गोंड समुदायों में शराब दुकान बंद करने की इच्छा बताई; साहू ने स्थानीय पेय का भेद मानकर भी सुधार का समर्थन किया। नीति को इस आंतरिक विविधता के लिए स्थान बनाना होगा।

आठवाँ निष्कर्ष है कि छठी अनुसूची का उल्लेख सांस्कृतिक चिंता का ठोस संस्थागत उत्तर था। सामान्य राज्य निषेध कानून को स्वायत्त क्षेत्र में स्थानीय परिषद की सहमति के बिना लागू न करने की व्यवस्था संवैधानिक बहुलता है। यह दिखाती है कि समान राष्ट्रीय लक्ष्य का अर्थ समान प्रशासनिक तरीका नहीं।

नौवाँ निष्कर्ष है कि तंबाकू संशोधन की अस्वीकृति अनुच्छेद की नैतिक राजनीति उजागर करती है। वैज्ञानिक हानि अकेली संवैधानिक सूची तय नहीं करती; सामाजिक स्वीकार्यता और राजनीतिक प्राथमिकता भी भूमिका निभाती हैं। पर अस्वीकृति को तंबाकू की सुरक्षा की घोषणा समझना गलत होगा।

दसवाँ निष्कर्ष है कि आंबेडकर ने निषेध को तत्काल बाध्यता के बजाय लोकतांत्रिक नीति के रूप में समझाया। राज्य समय चुन सकता है और क्रमिक या आंशिक मार्ग ले सकता है। इस विवेक को जनस्वास्थ्य की उपेक्षा की छूट नहीं, परिस्थितियों के अनुसार प्रभावी साधन चुनने की जिम्मेदारी समझना चाहिए।

ग्यारहवाँ निष्कर्ष है कि बाद के सर्वोच्च न्यायालय ने मदिरा व्यापार पर राज्य की व्यापक शक्ति स्वीकार की, पर अनुच्छेद 47 अकेला विधिक उत्तर नहीं। विधायी सूचियाँ, समानता, व्यापार स्वतंत्रता, वैधानिक प्रक्रिया और पेय तथा औद्योगिक अल्कोहल का भेद साथ पढ़े जाते हैं। निर्णयों को उनके विशिष्ट तथ्य और अनुपात सहित समझना आवश्यक है।

बारहवाँ निष्कर्ष है कि अनुच्छेद 47 की समकालीन सार्थकता परिणाम में है। किसी राज्य की नीति चाहे पूर्ण निषेध हो या कठोर विनियमन, उसे स्वास्थ्य, पोषण, परिवार की सुरक्षा, सांस्कृतिक अधिकार, न्यायपूर्ण प्रवर्तन और पारदर्शी डेटा की कसौटी पर खरा उतरना चाहिए। संविधान सभा ने लक्ष्य दिया और लोकतंत्र को सीखने, संशोधित करने तथा स्थानीय विविधता का सम्मान करने का संस्थागत अवसर भी दिया।

30. भावी अनुसंधान की दिशाएँ

इस बहस पर आगे का पहला शोध प्रांतीय अभिलेखों का होना चाहिए। बॉम्बे, मद्रास, संयुक्त प्रांत और अन्य क्षेत्रों में 1937 से 1950 के बीच निषेध के प्रयोगों के बजट, स्वास्थ्य रिपोर्ट, पुलिस अभिलेख और महिला संगठनों की याचिकाएँ खोजी जाएँ। तब सभा-सदस्यों के सफलता या विफलता संबंधी दावों को वास्तविक प्रशासनिक आँकड़ों से परखा जा सकेगा।

दूसरी दिशा महिला इतिहास है। त्यागी और सक्सेना ने पत्नियों तथा परिवारों को लाभार्थी माना, पर बहस में उनकी प्रत्यक्ष आवाज सीमित है। स्थानीय शराब-विरोधी आंदोलनों, पत्रिकाओं, संगठनात्मक प्रस्तावों और मौखिक इतिहास से यह समझा जा सकता है कि महिलाओं ने निषेध को सुरक्षा, घरेलू आय, सम्मान और राजनीतिक भागीदारी से कैसे जोड़ा।

तीसरी दिशा आदिवासी पेय-संस्कृतियों का तुलनात्मक अध्ययन है। चावल की बियर, महुआ, ताड़ी और अन्य किण्वित पेयों की उत्पादन विधि, अल्कोहल शक्ति, पोषण, समारोहिक अर्थ, लिंग आधारित श्रम और बाजार में परिवर्तन का समुदाय-नेतृत्व वाला अनुसंधान होना चाहिए। इससे जयपाल सिंह की 1948 की वैज्ञानिक जाँच की मांग को आज के ज्ञान से उत्तर मिल सकता है।

चौथी दिशा भाषिक और वैचारिक अध्ययन है। “पाप”, “बुराई”, “स्वास्थ्य-हानि”, “स्वतंत्रता”, “शिक्षा” और “सभ्य सरकार” जैसे शब्द किन सामाजिक धारणाओं को व्यक्त करते हैं, इसका विमर्श-विश्लेषण किया जा सकता है। यह भी देखा जा सकता है कि अंतिम विधिक पाठ ने बहस की धार्मिक और नैतिक भाषा को किस प्रकार धर्मनिरपेक्ष स्वास्थ्य-शब्दावली में बदला।

पाँचवीं दिशा संघीय नीति की तुलनात्मक समीक्षा है। अलग-अलग राज्यों के पूर्ण निषेध, आंशिक प्रतिबंध और विनियमित बिक्री मॉडल को समान संकेतकों पर मापा जाए। केवल राजस्व या गिरफ्तारी नहीं, रोग, दुर्घटना, घरेलू हिंसा, अवैध शराब मृत्यु, उपचार, भ्रष्टाचार और गरीब परिवार की स्थिति शामिल हो। इससे आंबेडकर द्वारा मान्य नीति-विविधता वास्तविक सीख का स्रोत बनेगी।

छठी दिशा न्यायिक सिद्धांत की आलोचना है। “res extra commercium”, व्यापार की स्वतंत्रता, गोपनीयता, सार्वजनिक स्वास्थ्य और नीति-निदेशक तत्त्वों के संबंध को नए संविधान पीठ निर्णयों तथा आधुनिक अनुपातिकता के प्रकाश में पढ़ा जाए। प्रश्न यह नहीं कि राज्य नियमन कर सकता है या नहीं, बल्कि यह कि व्यापक शक्ति को न्यायपूर्ण, प्रमाणित और उत्तरदायी कैसे रखा जाए।

सातवीं दिशा दंड-न्याय है। निषेध कानूनों में गिरफ्तार व्यक्तियों की सामाजिक पृष्ठभूमि, जमानत, दोषसिद्धि, मुकदमे की अवधि और महिलाओं पर प्रभाव का अध्ययन आवश्यक है। यदि संवैधानिक कल्याण का साधन कमजोर व्यक्ति को अनुपातहीन कारावास देता है, तो नीति के स्वास्थ्य लाभ के साथ न्यायिक लागत भी सामने आएगी।

आठवीं दिशा सार्वजनिक वित्त है। राज्यों की आबकारी आय और शराब-संबंधी स्वास्थ्य तथा सामाजिक लागत का स्वतंत्र लेखा बनाया जाए। निषेध लागू करने वाले राज्यों में प्रवर्तन, वैकल्पिक राजस्व और पुनर्वास व्यय भी जोड़ा जाए। सक्सेना और खारडेकर के विपरीत आर्थिक तर्कों को आज विश्वसनीय डेटा से परखना इसी प्रकार संभव होगा।

इन अनुसंधानों का साझा सिद्धांत प्रभावित समुदाय की भागीदारी होना चाहिए। शोध केवल राज्य अभिलेख या अस्पताल आँकड़ों तक सीमित न रहे; श्रमिक, महिलाएँ, उपचार प्राप्त व्यक्ति, आदिवासी परिषद, पुलिस, स्वास्थ्यकर्मी और छोटे उत्पादक सभी ज्ञान-स्रोत हों। संविधान सभा की बहस ने अनेक आवाजें दर्ज कीं; भावी अध्ययन को उसकी बहुलता और आगे बढ़ानी चाहिए।

एक डिजिटल मानविकी परियोजना भी उपयोगी होगी जिसमें 23–24 नवंबर की कार्यवाही को वक्ता, विषय, संशोधन और संवैधानिक परिणाम के अनुसार टैग किया जाए। मूल स्कैन, शुद्ध प्रतिलिपि और हिंदी अनुवाद को समानांतर रखकर शोधकर्ता OCR त्रुटि पहचान सकेंगे। प्रत्येक दावे को संबंधित पृष्ठ और अनुच्छेद से जोड़ने पर लोकप्रिय लेखों में फैलने वाली गलत वर्तनी, अपूर्ण उद्धरण और संदर्भ-विहीन निष्कर्ष कम होंगे।

अंततः भावी शोध को शराबबंदी की सफलता या विफलता पहले से मानकर नहीं चलना चाहिए। संविधान सभा में दोनों ओर शक्तिशाली नैतिक अनुमान थे। आज का शोध परिकल्पना, डेटा और पद्धति स्पष्ट करे, प्रतिकूल परिणाम भी प्रकाशित करे और नीति से प्रभावित लोगों की गरिमा सुरक्षित रखे। तभी अनुच्छेद 47 पर विमर्श राजनीतिक दावे से आगे बढ़कर संवैधानिक जनस्वास्थ्य का विश्वसनीय ज्ञान बनेगा।

इस प्रकार ऐतिहासिक अभिलेख, विधिक पाठ और सामाजिक प्रमाण का त्रिकोण ही विषय की संतुलित समझ दे सकता है। किसी एक को छोड़ने पर निष्कर्ष अधूरा रहेगा।

क्रमांकित उद्धरणों की स्रोत-सूची

नोट: आलेख में उद्धृत अंग्रेजी अंश मूल कार्यवाही के अत्यंत संक्षिप्त अंश हैं; उनका विवेचन हिंदी में किया गया है। पृष्ठांकन विभिन्न मुद्रित संस्करणों में थोड़ा बदल सकता है, इसलिए तिथि, वक्ता और प्रारूप अनुच्छेद भी दिए गए हैं।

क्रमांक

वक्ता

तिथि

प्रामाणिक स्रोत

उद्धरण–1

महावीर त्यागी

23 नवंबर 1948

Constituent Assembly Debates, Official Report, Vol. VII, प्रारूप अनुच्छेद 38 पर कार्यवाही; संशोधन सं. 71.

उद्धरण–2

प्रो. शिब्बन लाल सक्सेना

24 नवंबर 1948

Constituent Assembly Debates, Official Report, Vol. VII, प्रारूप अनुच्छेद 38; संशोधन सं. 86, औषधीय अपवाद.

उद्धरण–3

बी. एच. खारडेकर

24 नवंबर 1948

Constituent Assembly Debates, Official Report, Vol. VII, pp. 564–566 (प्रासंगिक बहस).

उद्धरण–4

जयपाल सिंह

24 नवंबर 1948

Constituent Assembly Debates, Official Report, Vol. VII, pp. 565–566 (आदिवासी धार्मिक प्रथा पर वक्तव्य).

उद्धरण–5

जयपाल सिंह

24 नवंबर 1948

वही, संयम-शिक्षा और धार्मिक विशेषाधिकार संबंधी वक्तव्य.

उद्धरण–6

डॉ. बी. आर. आंबेडकर

24 नवंबर 1948

Constituent Assembly Debates, Official Report, Vol. VII, p. 566 (नीति-निदेशक तत्त्व की गैर-बाध्यकारी प्रकृति).

उद्धरण–7

सरदार भूपिंदर सिंह मान

24 नवंबर 1948

वही, तंबाकू जोड़ने का संशोधन सं. 81, List III.

उद्धरण–8

डॉ. बी. आर. आंबेडकर

24 नवंबर 1948

वही, p. 566 (राज्य द्वारा क्रमिक या आंशिक निषेध की संभावना).

संदर्भ-सूची

  1. भारत की संविधान सभा. Constituent Assembly Debates (Official Report), Vol. VII. नई दिल्ली: लोक सभा सचिवालय; विशेषतः 23–24 नवंबर 1948 की कार्यवाही, प्रारूप अनुच्छेद 38.

  2. Constituent Assembly of India. Draft Constitution of India, 1948, Draft Article 38 and Sixth Schedule draft provisions.

  3. भारत का संविधान, 1950. अनुच्छेद 37 और 47; सातवीं अनुसूची, सूची II, प्रविष्टियाँ 8 और 51; छठी अनुसूची का संबंधित प्रावधान.

  4. B. Shiva Rao (ed.). The Framing of India’s Constitution: Select Documents. New Delhi: Indian Institute of Public Administration, 1966–68.

  5. B. Shiva Rao. The Framing of India’s Constitution: A Study. New Delhi: Indian Institute of Public Administration, 1968.

  6. Granville Austin. The Indian Constitution: Cornerstone of a Nation. Oxford University Press, 1966.

  7. State of Bombay and Another v. F. N. Balsara, AIR 1951 SC 318; 1951 SCR 682.

  8. Har Shankar and Others v. Deputy Excise and Taxation Commissioner and Others, (1975) 1 SCC 737.

  9. P. N. Kaushal and Others v. Union of India and Others, (1978) 3 SCC 558.

  10. Khoday Distilleries Ltd. and Others v. State of Karnataka and Others, (1995) 1 SCC 574.

  11. Kerala Bar Hotels Association and Another v. State of Kerala and Others, (2015) 16 SCC 421.

  12. National Judicial Academy. National Workshop on Prohibition: Social and Legal Issues, Programme Report P-1274, 2021.

  13. Tarunabh Khaitan. Directive Principles and the Expressive Accommodation of Ideological Dissenters. Working paper, 2016; प्रासंगिक चर्चा के साथ मूल CAD संदर्भों का सत्यापन आवश्यक मानकर उपयोग.

प्राथमिक ऑनलाइन अभिलेख

  • संविधान सभा बहस, 23 नवंबर 1948: https://www.constitutionofindia.net/debates/23-nov-1948/

  • संविधान सभा बहस, 24 नवंबर 1948: https://indiankanoon.org/doc/1945234/

  • अनुच्छेद 47: प्रारूप और अंतिम पाठ: https://www.constitutionofindia.net/articles/article-47-duty-of-the-state-to-raise-the-level-of-nutrition-and-the-standard-of-living-and-to-improve-public-health/

  • संसद का संविधान सभा वाद-विवाद, खंड VII: https://sansad.in/uploads/const_Assmbly_Debates_Volume7_4_November1948_64efedfedd.pdf?updated_at=20

  • सर्वोच्च न्यायालय: निर्णय अभिलेख: https://www.sci.gov.in/

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