ज्ञान की अर्थव्यवस्था: अवधारणा, संरचना, संभावनाएँ और भारतीय परिप्रेक्ष्य
सारांश
इक्कीसवीं शताब्दी की अर्थव्यवस्था में उत्पादन और विकास का आधार केवल भूमि, श्रम, पूँजी तथा प्राकृतिक संसाधन नहीं रह गया है। ज्ञान, सूचना, अनुसंधान, नवाचार, तकनीक, मानवीय कौशल और बौद्धिक संपदा आर्थिक प्रगति के प्रमुख साधन बन चुके हैं। इस व्यवस्था को सामान्यतः ‘ज्ञान की अर्थव्यवस्था’ अथवा ‘ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था’ कहा जाता है। इसमें किसी देश की वास्तविक शक्ति उसके प्राकृतिक संसाधनों से अधिक उसकी ज्ञान-सृजन, ज्ञान-संरक्षण, ज्ञान-प्रसार और ज्ञान के व्यावहारिक उपयोग की क्षमता से निर्धारित होती है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल मंच, जैव-प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष विज्ञान, डेटा विश्लेषण, ऑनलाइन शिक्षा और रचनात्मक उद्योगों ने ज्ञान को प्रत्यक्ष आर्थिक संपदा में परिवर्तित कर दिया है। प्रस्तुत आलेख में ज्ञान की अर्थव्यवस्था की अवधारणा, उसके ऐतिहासिक विकास, प्रमुख घटकों, सामाजिक प्रभावों, अंतर्विरोधों और भारत में उसकी संभावनाओं का विश्लेषण किया गया है। अध्ययन से स्पष्ट होता है कि भारत के पास विशाल युवा जनसंख्या, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, उच्च शिक्षा व्यवस्था, सूचना-प्रौद्योगिकी उद्योग और बहुभाषिक सांस्कृतिक संपदा के रूप में पर्याप्त सामर्थ्य है। इसके बावजूद शिक्षा की गुणवत्ता, अनुसंधान निवेश, डिजिटल विभाजन, भाषायी असमानता, बौद्धिक संपदा के केंद्रीकरण तथा प्रतिभा-पलायन जैसी चुनौतियाँ बनी हुई हैं। आलेख का निष्कर्ष है कि ज्ञान की अर्थव्यवस्था तभी न्यायपूर्ण और टिकाऊ बन सकती है, जब ज्ञान को केवल बाजार की वस्तु न मानकर सार्वजनिक कल्याण, सामाजिक समानता और मानवीय विकास का साधन बनाया जाए।
बीज शब्द: ज्ञान अर्थव्यवस्था, मानवीय पूँजी, नवाचार, शिक्षा, डिजिटल तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, बौद्धिक संपदा, भारत।
प्रस्तावना
मानव सभ्यता के प्रत्येक चरण में ज्ञान का महत्त्व रहा है। कृषि-आधारित समाज में मौसम, मिट्टी, बीज और सिंचाई का ज्ञान उत्पादन का आधार था। औद्योगिक क्रांति के समय मशीनों, ऊर्जा और वैज्ञानिक आविष्कारों ने उत्पादन की संरचना बदल दी। किंतु बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध से ज्ञान स्वयं उत्पादन का केंद्रीय संसाधन बनने लगा। आज एक मोबाइल एप्लिकेशन, सॉफ्टवेयर, एल्गोरिदम, औषधीय सूत्र, ऑनलाइन पाठ्यक्रम, फिल्म, डिजाइन, पेटेंट अथवा डिजिटल डेटाबेस का आर्थिक मूल्य उसकी भौतिक सामग्री से नहीं, बल्कि उसमें निहित ज्ञान और सृजनात्मकता से तय होता है।
परंपरागत अर्थव्यवस्था में संसाधन उपयोग के साथ घटते हैं। इसके विपरीत ज्ञान ऐसा संसाधन है जिसका साझा उपयोग प्रायः उसे समाप्त नहीं करता। एक वैज्ञानिक सिद्धांत, तकनीकी सूत्र अथवा शैक्षिक सामग्री का अनेक लोग एक साथ उपयोग कर सकते हैं। ज्ञान के प्रसार से उसका सामाजिक मूल्य बढ़ सकता है। फिर भी पेटेंट, कॉपीराइट, सदस्यता, डेटा नियंत्रण और तकनीकी एकाधिकार के माध्यम से ज्ञान पर स्वामित्व स्थापित किया जाता है। इसलिए ज्ञान की अर्थव्यवस्था केवल प्रौद्योगिकी और विकास का विषय नहीं, बल्कि शक्ति, समानता, भाषा, संस्कृति और सामाजिक न्याय का भी प्रश्न है।
ज्ञान की अर्थव्यवस्था की अवधारणा
ज्ञान की अर्थव्यवस्था से आशय ऐसी आर्थिक-सामाजिक व्यवस्था से है जिसमें ज्ञान का निर्माण, प्रसार और प्रयोग आर्थिक वृद्धि, उत्पादकता तथा रोजगार का प्रमुख आधार बन जाता है। आर्थिक सहयोग और विकास संगठन ने ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था को ऐसी अर्थव्यवस्था के रूप में देखा जिसमें ज्ञान और सूचना का उत्पादन, वितरण तथा उपयोग विकास के लिए निर्णायक भूमिका निभाते हैं।[1]
फ्रिट्ज मैकलप ने अपनी पुस्तक The Production and Distribution of Knowledge in the United States में शिक्षा, अनुसंधान, संचार, सूचना-माध्यम और सूचना-सेवाओं को आर्थिक गतिविधियों के विशिष्ट क्षेत्र के रूप में प्रस्तुत किया।[2] बाद में पीटर ड्रकर ने ज्ञान को आधुनिक समाज का केंद्रीय आर्थिक संसाधन बताते हुए ‘ज्ञान-कर्मी’ की अवधारणा को लोकप्रिय बनाया। उनके अनुसार आधुनिक संगठन में वह व्यक्ति अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है जो जानकारी को समझकर उसे उपयोगी निर्णय, सेवा अथवा नवाचार में बदल सकता है।[3]
ज्ञान, सूचना और डेटा को समानार्थी मानना उचित नहीं है। डेटा असंगठित तथ्यों का संग्रह हो सकता है। संदर्भ और वर्गीकरण मिलने पर वह सूचना बनता है। जब व्यक्ति या संस्था उस सूचना का विश्लेषण करके उससे अर्थ, कौशल और निर्णय-क्षमता विकसित करती है, तब वह ज्ञान बनती है। ज्ञान के विवेकपूर्ण और सृजनात्मक प्रयोग से नवाचार उत्पन्न होता है।
इसे इस क्रम में समझा जा सकता है:
डेटा → सूचना → ज्ञान → नवाचार → आर्थिक एवं सामाजिक मूल्य
विश्व बैंक द्वारा विकसित ज्ञान-अर्थव्यवस्था के प्रारूप में चार प्रमुख आधार स्वीकार किए गए हैं—अनुकूल आर्थिक एवं संस्थागत व्यवस्था, शिक्षित और कुशल मानव संसाधन, प्रभावी नवाचार तंत्र तथा आधुनिक सूचना-संचार अवसंरचना।[4]
ज्ञान की प्रमुख विशेषताएँ
ज्ञान की पहली विशेषता उसकी पुनरुत्पादकता है। किसी डिजिटल पुस्तक, सॉफ्टवेयर अथवा वीडियो को तैयार करने की प्रारंभिक लागत अधिक हो सकती है, लेकिन उसकी अतिरिक्त प्रति तैयार करने की लागत बहुत कम होती है। इस गुण के कारण डिजिटल उत्पाद तेजी से वैश्विक बाजार तक पहुँचते हैं।
दूसरी विशेषता संचयी प्रकृति है। नया ज्ञान सामान्यतः पुराने ज्ञान पर आधारित होता है। विज्ञान, चिकित्सा, भाषा-प्रौद्योगिकी और इंजीनियरिंग में प्रत्येक नई उपलब्धि अनेक पूर्ववर्ती अध्ययनों का परिणाम होती है। इसलिए खुले शोध, पुस्तकालय, अभिलेखागार और वैज्ञानिक सहयोग ज्ञान-वृद्धि के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।
तीसरी विशेषता इसका मानव-केंद्रित होना है। मशीनें सूचना का विशाल संग्रह और प्रसंस्करण कर सकती हैं, किंतु समस्या की पहचान, नैतिक निर्णय, सृजनात्मकता, सांस्कृतिक समझ और सामाजिक उत्तरदायित्व मनुष्य से जुड़े हैं। अतः ज्ञान अर्थव्यवस्था में शिक्षा का उद्देश्य केवल सूचना प्रदान करना नहीं, बल्कि आलोचनात्मक चिंतन, संवाद, अनुसंधान और समस्या-समाधान की क्षमता विकसित करना है।
चौथी विशेषता नेटवर्क प्रभाव है। विश्वविद्यालय, उद्योग, सरकार, स्टार्टअप, निवेशक और नागरिक समाज जितना अधिक सहयोग करते हैं, नवाचार की संभावना उतनी बढ़ती है। सिलिकॉन वैली, बेंगलुरु और अन्य तकनीकी केंद्रों की सफलता केवल कुछ प्रतिभाशाली व्यक्तियों का परिणाम नहीं, बल्कि संस्थागत नेटवर्क, पूँजी, विश्वविद्यालयों और बाजार के समन्वय से जुड़ी है।
ज्ञान-अर्थव्यवस्था के आधार
शिक्षा और मानवीय पूँजी
ज्ञान अर्थव्यवस्था की बुनियाद गुणवत्तापूर्ण शिक्षा है। केवल साक्षरता या डिग्री प्राप्त कर लेना पर्याप्त नहीं है। शिक्षा को व्यक्ति में विश्लेषण, रचनात्मकता, डिजिटल साक्षरता, सहयोग और जीवनपर्यंत सीखने की प्रवृत्ति विकसित करनी चाहिए। तेजी से बदलती तकनीक के कारण एक बार अर्जित कौशल पूरे जीवन के लिए पर्याप्त नहीं रहता। पुनःकौशल-विकास और कौशल-उन्नयन आधुनिक रोजगार व्यवस्था की आवश्यकता बन गए हैं।
मातृभाषा और स्थानीय भाषाओं में शिक्षा भी ज्ञान के लोकतंत्रीकरण के लिए आवश्यक है। यदि उच्च शिक्षा, विज्ञान और तकनीकी सामग्री केवल सीमित भाषाओं में उपलब्ध होगी, तो बड़ी आबादी ज्ञान-आधारित अवसरों से बाहर रह जाएगी। बहुभाषिक डिजिटल सामग्री इसलिए केवल सांस्कृतिक आवश्यकता नहीं, आर्थिक समावेशन का भी माध्यम है।
अनुसंधान और नवाचार
अनुसंधान प्रयोगशाला में उत्पन्न विचार को सामाजिक उपयोग, तकनीक, उत्पाद अथवा सार्वजनिक नीति में बदलने की प्रक्रिया नवाचार तंत्र का हिस्सा है। विश्वविद्यालयों को केवल परीक्षा और डिग्री प्रदान करने वाली संस्थाएँ न रहकर अनुसंधान, स्थानीय समस्याओं के समाधान और उद्यमिता के केंद्र बनना होगा।
नवाचार केवल पेटेंट तक सीमित नहीं है। किसानों द्वारा विकसित कृषि-पद्धतियाँ, आदिवासी समुदायों का औषधीय ज्ञान, कारीगरों की तकनीक, स्थानीय जल-प्रबंधन, भाषायी सृजन और सामाजिक संगठनों के नए कार्य-मॉडल भी नवाचार के रूप हैं। औपचारिक प्रयोगशाला के बाहर मौजूद इन ज्ञान-परंपराओं की पहचान और उचित संरक्षण आवश्यक है।
सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी
इंटरनेट, क्लाउड कंप्यूटिंग, डिजिटल भुगतान, डेटा केंद्र और मोबाइल संचार ज्ञान के प्रसार की आधारभूत संरचना हैं। डिजिटल संपर्क के माध्यम से विद्यार्थी ऑनलाइन पाठ्यक्रम ग्रहण कर सकता है, किसान बाजार और मौसम की जानकारी प्राप्त कर सकता है तथा छोटा उद्यमी राष्ट्रीय बाजार तक पहुँच सकता है।
परंतु केवल इंटरनेट उपलब्ध होना पर्याप्त नहीं है। उपकरणों की कीमत, संपर्क की गुणवत्ता, डिजिटल कौशल, साइबर सुरक्षा, भाषा और दिव्यांग-अनुकूलता भी महत्त्वपूर्ण हैं। डिजिटल अवसंरचना तभी ज्ञान अवसंरचना बनती है, जब नागरिक प्राप्त सूचना को समझने और उपयोग करने में सक्षम हों।
संस्थागत और आर्थिक परिवेश
ज्ञान-सृजन के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, शैक्षणिक स्वायत्तता, विश्वसनीय कानून, उचित वित्तपोषण, उद्यमिता और पारदर्शी प्रशासन आवश्यक हैं। जहाँ प्रश्न पूछने, असहमति व्यक्त करने और असफल प्रयोग करने की स्वतंत्रता नहीं होगी, वहाँ मौलिक अनुसंधान विकसित नहीं हो सकता।
बौद्धिक संपदा कानून नवप्रवर्तक को आर्थिक प्रोत्साहन देते हैं, लेकिन अत्यधिक कठोर नियंत्रण ज्ञान और आवश्यक तकनीक तक पहुँच को बाधित कर सकता है। पेटेंट संरक्षण और सार्वजनिक हित के बीच संतुलन विशेष रूप से स्वास्थ्य, कृषि, शिक्षा और पर्यावरण के क्षेत्र में आवश्यक है।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता और ज्ञान का नया बाजार
कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने ज्ञान के उत्पादन और वितरण को नए चरण में पहुँचा दिया है। मशीन लर्निंग प्रणालियाँ विशाल डेटा से पैटर्न पहचान सकती हैं, भाषाओं का अनुवाद कर सकती हैं, चिकित्सा निदान में सहायता दे सकती हैं और शिक्षण-सामग्री तैयार कर सकती हैं। इससे ज्ञान-कर्म की उत्पादकता बढ़ती है, लेकिन अनेक प्रश्न भी उत्पन्न होते हैं।
AI मॉडल पुस्तकों, चित्रों, शोध-पत्रों और इंटरनेट सामग्री से प्रशिक्षित होते हैं। इसलिए यह प्रश्न महत्त्वपूर्ण है कि मूल रचनाकारों को उनकी बौद्धिक सामग्री के उपयोग का श्रेय और प्रतिफल किस प्रकार दिया जाए। एल्गोरिदम में पूर्वाग्रह, व्यक्तिगत डेटा का दुरुपयोग, गलत सूचना, निगरानी और रोजगार के पुनर्गठन जैसी समस्याएँ भी सामने आती हैं।
AI के कारण शिक्षक, लेखक या शोधकर्ता अप्रासंगिक नहीं होते; उनकी भूमिका बदलती है। तथ्य संकलन और प्रारंभिक मसौदा तैयार करने जैसे कार्य मशीन कर सकती है, लेकिन स्रोतों की प्रामाणिकता जाँचना, संदर्भ को समझना, नैतिक निर्णय लेना और मौलिक व्याख्या करना मानवीय उत्तरदायित्व है। भविष्य का सफल ज्ञान-कर्मी वह होगा जो तकनीक का विवेकपूर्ण उपयोग करते हुए स्वतंत्र आलोचनात्मक दृष्टि बनाए रखे।
भारतीय परिप्रेक्ष्य
भारत ज्ञान-आधारित अर्थव्यवस्था बनने की व्यापक क्षमता रखता है। प्राचीन काल से दर्शन, गणित, चिकित्सा, व्याकरण, खगोल विज्ञान, धातु-विज्ञान, साहित्य और कला की समृद्ध परंपरा भारतीय समाज में मौजूद रही है। आधुनिक भारत में विश्वविद्यालयों, वैज्ञानिक संस्थानों, अंतरिक्ष कार्यक्रम, औषधि उद्योग और सूचना-प्रौद्योगिकी क्षेत्र ने इस परंपरा को नया विस्तार दिया।
भारत की सूचना-प्रौद्योगिकी सेवाएँ, डिजिटल भुगतान व्यवस्था, अंतरिक्ष अनुसंधान, दवा निर्माण, स्टार्टअप और ऑनलाइन शिक्षा उसके ज्ञान-आधारित विकास के प्रमुख क्षेत्र हैं। विश्व बौद्धिक संपदा संगठन के Global Innovation Index 2025 में भारत 139 अर्थव्यवस्थाओं में 38वें स्थान पर रहा। यह 2015 के 81वें स्थान की तुलना में उल्लेखनीय सुधार है।[5]
मार्च 2024 में स्वीकृत IndiaAI Mission के लिए भारत सरकार ने ₹10,371.92 करोड़ का परिव्यय घोषित किया था। इसके अंतर्गत सार्वजनिक AI कंप्यूटिंग संरचना, स्वदेशी आधारभूत मॉडल, गुणवत्तापूर्ण डेटासेट, FutureSkills, स्टार्टअप वित्तपोषण और सुरक्षित एवं विश्वसनीय AI को शामिल किया गया है। मिशन के प्रारंभिक प्रारूप में 10,000 या अधिक GPU की कंप्यूटिंग क्षमता विकसित करने का लक्ष्य रखा गया था।[6]
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 बहुविषयक शिक्षा, अनुसंधान, तकनीकी प्रयोग, भारतीय भाषाओं तथा व्यावसायिक कौशल पर बल देती है। अनुसंधान राष्ट्रीय शोध प्रतिष्ठान अधिनियम, 2023 का उद्देश्य विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों और उद्योग के बीच सहयोग बढ़ाना है।[7] इन पहलों की सफलता वास्तविक वित्तपोषण, शिक्षक-प्रशिक्षण, संस्थागत स्वायत्तता और ग्रामीण क्षेत्रों तक संसाधनों की पहुँच पर निर्भर करेगी।
भारत की भाषायी विविधता ज्ञान अर्थव्यवस्था की बड़ी संपदा है। हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं में डिजिटल सामग्री, अनुवाद, भाषा-प्रौद्योगिकी, वाक्-पहचान तथा स्थानीय AI मॉडल विकसित करके करोड़ों नए नागरिकों को डिजिटल अर्थव्यवस्था से जोड़ा जा सकता है। भारतीय भाषाओं को केवल सांस्कृतिक पहचान के रूप में नहीं, ज्ञान-उत्पादन और रोजगार की भाषाओं के रूप में विकसित करना होगा।
प्रमुख चुनौतियाँ
ज्ञान-अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौती ज्ञान-विभाजन है। समाज में सभी लोगों को गुणवत्तापूर्ण विद्यालय, विश्वविद्यालय, पुस्तकालय, इंटरनेट और डिजिटल उपकरण समान रूप से उपलब्ध नहीं हैं। आर्थिक स्थिति, जाति, लिंग, भौगोलिक क्षेत्र, भाषा और दिव्यांगता के कारण ज्ञान तक पहुँच में असमानता बनी रहती है।
दूसरी चुनौती शिक्षा की गुणवत्ता और रोजगार के बीच अंतर है। डिग्रीधारी युवाओं की संख्या बढ़ने पर भी आलोचनात्मक चिंतन, व्यावहारिक कौशल, संप्रेषण और अनुसंधान-क्षमता में कमी देखी जाती है। उद्योग की तत्काल आवश्यकता के अनुरूप प्रशिक्षण देना आवश्यक है, किंतु विश्वविद्यालयों को केवल श्रमिक तैयार करने वाली संस्थाओं में बदल देना भी उचित नहीं होगा। मानवीय मूल्य, इतिहास, साहित्य, दर्शन और समाज-विज्ञान व्यक्ति को तकनीक के सामाजिक परिणाम समझने की क्षमता देते हैं।
तीसरी चुनौती अनुसंधान वित्तपोषण और निजी क्षेत्र की सीमित भागीदारी है। विश्वस्तरीय अनुसंधान के लिए प्रयोगशालाओं, पुस्तकालयों, डेटाबेस, शोधवृत्ति और स्थायी अकादमिक पदों में दीर्घकालीन निवेश चाहिए। केवल अल्पकालिक परियोजनाओं पर निर्भरता मौलिक अनुसंधान को कमजोर कर सकती है।
चौथी चुनौती ज्ञान का व्यावसायीकरण है। महँगे शोध-पत्र, डिजिटल सदस्यताएँ, पेटेंट और निजी डेटा-नियंत्रण ज्ञान को सीमित समूहों तक बाँध सकते हैं। सार्वजनिक धन से किए गए शोध को यथासंभव मुक्त अभिगम में उपलब्ध कराया जाना चाहिए। UNESCO ने न्यायपूर्ण ज्ञान-समाज के लिए शिक्षा तक समान पहुँच, सूचना की सार्वभौमिक उपलब्धता, सांस्कृतिक विविधता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को महत्त्वपूर्ण माना है।[8]
पाँचवीं चुनौती ‘ब्रेन ड्रेन’ अथवा प्रतिभा-पलायन है। बेहतर अनुसंधान सुविधाओं और रोजगार की खोज में भारतीय प्रतिभाएँ विदेश जाती हैं। वैश्विक गतिशीलता को रोकना समाधान नहीं है; भारत को ऐसी परिस्थितियाँ बनानी होंगी जिनमें वैज्ञानिक और विद्वान देश के भीतर रहकर अथवा प्रवासी नेटवर्क के माध्यम से भारतीय संस्थानों से सहयोग कर सकें।
ज्ञान और सामाजिक न्याय
ज्ञान की अर्थव्यवस्था का मूल्यांकन केवल GDP, पेटेंट संख्या या तकनीकी कंपनियों के बाजार मूल्य से नहीं किया जाना चाहिए। यह भी देखना होगा कि ज्ञान से उत्पन्न लाभ किसे प्राप्त हो रहा है। यदि स्वचालन से उत्पादकता बढ़ती है, लेकिन रोजगार और आय कुछ कंपनियों में केंद्रित हो जाते हैं, तो आर्थिक विषमता बढ़ सकती है।
स्थानीय और पारंपरिक ज्ञान का उपयोग करते समय संबंधित समुदायों की सहमति, पहचान और लाभ में भागीदारी सुनिश्चित होनी चाहिए। औषधीय पौधों, बीजों, हस्तशिल्प, लोककला और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों का व्यावसायिक उपयोग बिना समुदाय को लाभ दिए करना ज्ञान का अनुचित अधिग्रहण है।
स्त्रियों और सामाजिक रूप से वंचित समुदायों की शिक्षा, विज्ञान और तकनीक में भागीदारी बढ़ाना भी आवश्यक है। समावेशी ज्ञान अर्थव्यवस्था में व्यक्ति केवल डिजिटल उत्पादों का उपभोक्ता नहीं होता, बल्कि ज्ञान का निर्माता और निर्णय-प्रक्रिया का भागीदार भी होता है।
भारतीय ज्ञान-अर्थव्यवस्था के लिए नीतिगत सुझाव
भारत को सार्वभौमिक और गुणवत्तापूर्ण विद्यालयी शिक्षा को पहली प्राथमिकता देनी चाहिए। आधारभूत साक्षरता, गणितीय क्षमता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और डिजिटल साक्षरता के बिना ज्ञान-अर्थव्यवस्था का व्यापक आधार तैयार नहीं हो सकता।
शोध एवं विकास पर सार्वजनिक और निजी निवेश बढ़ाते हुए विश्वविद्यालयों में स्थायी शोध-संस्कृति विकसित करनी होगी। शोध-अनुदान वितरण पारदर्शी हो तथा मानविकी, भाषा और समाज-विज्ञान को भी वैज्ञानिक एवं तकनीकी विषयों के साथ पर्याप्त स्थान मिले।
भारतीय भाषाओं में गुणवत्तापूर्ण पाठ्यपुस्तकें, वैज्ञानिक शब्दावली, डिजिटल संग्रह, मुक्त शैक्षिक संसाधन और AI उपकरण विकसित किए जाने चाहिए। अनुवाद को साहित्यिक गतिविधि तक सीमित न रखकर ज्ञान-हस्तांतरण के राष्ट्रीय अभियान के रूप में देखने की आवश्यकता है।
विश्वविद्यालय–उद्योग–समाज सहयोग को स्थानीय समस्याओं से जोड़ा जाना चाहिए। कृषि, जल, स्वास्थ्य, परिवहन, प्रदूषण, शिक्षा और शहरी नियोजन की वास्तविक समस्याओं पर विद्यार्थियों और शोधकर्ताओं को काम करने का अवसर मिलना चाहिए।
डेटा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के लिए पारदर्शी नैतिक मानक आवश्यक हैं। नागरिकों को यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि उनका डेटा कहाँ और किस उद्देश्य से उपयोग किया जा रहा है। स्वचालित निर्णयों में मानवीय समीक्षा तथा शिकायत-निवारण की व्यवस्था होनी चाहिए।
सार्वजनिक पुस्तकालयों को डिजिटल ज्ञान-केंद्र के रूप में पुनर्जीवित किया जा सकता है। ग्रामीण और छोटे शहरों में पुस्तकालय इंटरनेट, ई-पुस्तक, सरकारी डेटा, ऑनलाइन पाठ्यक्रम और रोजगार सूचना तक सामुदायिक पहुँच प्रदान कर सकते हैं।
निष्कर्ष
ज्ञान की अर्थव्यवस्था विकास का ऐसा चरण है जिसमें विचार, सूचना, कौशल, अनुसंधान और नवाचार केंद्रीय आर्थिक संसाधन बन जाते हैं। किंतु ज्ञान स्वयं अपने आप आर्थिक या सामाजिक प्रगति उत्पन्न नहीं करता। ज्ञान को उपयोगी बनाने के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वतंत्र अनुसंधान, डिजिटल अवसंरचना, न्यायपूर्ण संस्थाएँ और सामाजिक उत्तरदायित्व आवश्यक हैं।
भारत के पास युवा मानव संसाधन, विशाल उच्च शिक्षा तंत्र, सूचना-प्रौद्योगिकी क्षमता, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना और भाषायी-सांस्कृतिक विविधता का असाधारण आधार है। इन क्षमताओं को वास्तविक शक्ति में बदलने के लिए शिक्षा और अनुसंधान की गुणवत्ता, भारतीय भाषाओं में ज्ञान की उपलब्धता, डिजिटल समानता और नवाचार के लोकतंत्रीकरण पर ध्यान देना होगा।
ज्ञान को केवल पेटेंट, डेटा अथवा बाजार में बिकने वाले उत्पाद में सीमित कर देना उसके मानवीय स्वरूप को संकुचित करता है। ज्ञान का अंतिम उद्देश्य मनुष्य की स्वतंत्रता, विवेक, सृजनात्मकता और जीवन की गुणवत्ता में वृद्धि होना चाहिए। इसलिए भविष्य की आदर्श ज्ञान-अर्थव्यवस्था वही होगी जिसमें नवाचार के साथ न्याय, तकनीकी दक्षता के साथ नैतिकता और आर्थिक विकास के साथ ज्ञान की सार्वभौमिक उपलब्धता सुनिश्चित हो।
संदर्भ
OECD, The Knowledge-Based Economy, Paris, 1996. OECD प्रकाशन
Machlup, Fritz, The Production and Distribution of Knowledge in the United States, Princeton University Press, 1962.
Drucker, Peter F., Post-Capitalist Society, HarperBusiness, New York, 1993.
World Bank, Knowledge for Development: World Development Report 1998–99. World Bank Report
WIPO, Global Innovation Index 2025. Global Innovation Index
भारत सरकार, “Cabinet Approves Ambitious IndiaAI Mission,” 7 मार्च 2024. Press Information Bureau
भारत सरकार, The Anusandhan National Research Foundation Act, 2023. विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग
UNESCO, Towards Knowledge Societies, UNESCO Publishing, Paris, 2005. UNESCO Report
भारत सरकार, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020. शिक्षा मंत्रालय
Stiglitz, Joseph E., “Knowledge as a Global Public Good,” in Global Public Goods, Oxford University Press, 1999.
No comments:
Post a Comment
Share Your Views on this..