भारतीय नारीवाद की अवधारणा: इतिहास, सामाजिक संरचना और समकालीन संदर्भ
Concept of Indian Feminism: History, Social Structure and Contemporary Context
सारांश
भारतीय नारीवाद को केवल पश्चिमी नारीवादी सिद्धांतों के भारतीय विस्तार के रूप में समझना उसके ऐतिहासिक और सामाजिक चरित्र को सीमित कर देना होगा। भारत में स्त्री-अधिकारों की आधुनिक चेतना का विकास औपनिवेशिक शासन, सामाजिक-सुधार आंदोलनों, जाति व्यवस्था, स्त्री-शिक्षा, राष्ट्रवादी आंदोलन, संवैधानिक लोकतंत्र और स्वतंत्रता के बाद विकसित महिला आंदोलनों के बीच हुआ। इसलिए भारतीय नारीवाद का प्रश्न केवल स्त्री और पुरुष के बीच समानता तक सीमित नहीं रहता। इसमें जाति, वर्ग, धर्म, समुदाय, श्रम, परिवार, विवाह, शिक्षा, संपत्ति, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और स्त्री की अपनी निर्णय-क्षमता जैसे प्रश्न भी सम्मिलित होते हैं।
उन्नीसवीं शताब्दी में स्त्री-शिक्षा, विधवा-विवाह, बाल-विवाह और सती जैसी सामाजिक प्रथाओं को लेकर हुए सुधारवादी हस्तक्षेपों से लेकर सावित्रीबाई फुले, पंडिता रमाबाई और ताराबाई शिंदे की वैचारिक विरासत; डॉ. बी. आर. आंबेडकर द्वारा जाति, अंतर्विवाह और स्त्री की स्थिति के बीच स्थापित संबंध; स्वतंत्र भारत के संविधान में समानता के प्रावधान; 1974 की ऐतिहासिक Towards Equality रिपोर्ट तथा बाद में विकसित स्वायत्त महिला आंदोलन तक भारतीय नारीवादी चिंतन की यात्रा बहुस्तरीय रही है। प्रस्तुत आलेख इसी ऐतिहासिक यात्रा के आधार पर भारतीय नारीवाद की विशिष्ट अवधारणा का विश्लेषण करता है।
कुंजी शब्द: भारतीय नारीवाद, स्त्री-अस्मिता, पितृसत्ता, जाति, सावित्रीबाई फुले, आंबेडकर, स्त्री-शिक्षा, महिला आंदोलन, लैंगिक समानता, सामाजिक न्याय।
प्रस्तावना
नारीवाद का सामान्य अर्थ ऐसी वैचारिक और सामाजिक चेतना से है जो स्त्री-पुरुष के बीच असमान शक्ति-संबंधों को पहचानती है और स्त्रियों के लिए समानता, स्वतंत्रता, गरिमा तथा अधिकारों की मांग करती है। किंतु नारीवाद किसी एक देश और एक ऐतिहासिक परिस्थिति में निर्मित अपरिवर्तनीय सिद्धांत नहीं है। विभिन्न समाजों की ऐतिहासिक संरचना के अनुसार उसके प्रश्न और प्राथमिकताएँ बदलती रही हैं।
इसी कारण भारतीय नारीवाद को समझते समय भारत की सामाजिक संरचना को केंद्र में रखना आवश्यक है। यहां स्त्री की स्थिति केवल उसके लिंग से निर्धारित नहीं होती। जाति, वर्ग, आर्थिक स्थिति, शिक्षा, धर्म, क्षेत्र, ग्रामीण-शहरी परिवेश और परिवार की संरचना भी उसके जीवन-अनुभव को प्रभावित करती है।
भारतीय नारीवाद की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में इसलिए सामाजिक न्याय और लैंगिक न्याय के बीच संबंध दिखाई देता है। भारतीय संदर्भ में यह प्रश्न पूछा जाना आवश्यक है कि स्त्री की स्वतंत्रता का अर्थ क्या है, यदि वह जातिगत उत्पीड़न से मुक्त नहीं है? आर्थिक संसाधनों तक उसकी पहुंच न हो तो कानूनी समानता कितनी प्रभावी हो सकती है? शिक्षा उपलब्ध न होने पर राजनीतिक अधिकारों का वास्तविक उपयोग कैसे होगा?
इन्हीं प्रश्नों के कारण भारतीय नारीवाद एक बहुस्तरीय सामाजिक विमर्श के रूप में विकसित हुआ।
भारतीय नारीवादी चेतना की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
आधुनिक भारतीय स्त्री-अधिकार विमर्श के महत्वपूर्ण स्रोत उन्नीसवीं शताब्दी के सामाजिक सुधार आंदोलनों में दिखाई देते हैं। इस काल में स्त्रियों की शिक्षा, बाल-विवाह, विधवाओं की स्थिति और सती जैसे प्रश्न सार्वजनिक बहस का विषय बने।
सती प्रथा के संदर्भ में राजा राममोहन राय का हस्तक्षेप विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा। 1829 में बंगाल प्रेसीडेंसी में सती को अवैध घोषित करने वाला विनियमन लागू किया गया। इसी प्रकार ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने हिन्दू विधवाओं के पुनर्विवाह के पक्ष में अभियान चलाया और 1856 का Hindu Widows' Remarriage Act इस सुधारवादी वातावरण का महत्वपूर्ण परिणाम था।
फिर भी भारतीय स्त्री-मुक्ति के इतिहास को केवल पुरुष समाज-सुधारकों की कथा के रूप में देखना उचित नहीं होगा। स्वयं स्त्रियों ने भी अपनी शिक्षा, सामाजिक गरिमा और अधिकारों के लिए महत्वपूर्ण वैचारिक तथा व्यावहारिक हस्तक्षेप किए।
सावित्रीबाई फुले और शिक्षा के माध्यम से मुक्ति
भारतीय नारीवादी इतिहास में सावित्रीबाई फुले का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। ज्योतिराव फुले के साथ उनका शैक्षिक कार्य स्त्री-मुक्ति को जाति-विरोधी सामाजिक परिवर्तन के साथ जोड़ता है।
1848 में पुणे के भिड़े वाडा में लड़कियों के लिए विद्यालय आरंभ करने से जुड़ा सावित्रीबाई और ज्योतिराव फुले का कार्य भारतीय स्त्री-शिक्षा के इतिहास में एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है। भारत सरकार के प्रेस सूचना ब्यूरो ने भी सावित्रीबाई को महिला शिक्षा और सामाजिक सुधार की अग्रणी व्यक्तित्व के रूप में रेखांकित किया है।
फुले दंपति के प्रयास की विशेषता यह थी कि शिक्षा का प्रश्न केवल उच्च सामाजिक वर्ग की स्त्रियों तक सीमित नहीं था। उनके सामाजिक दृष्टिकोण में जाति और लिंग दोनों से उत्पन्न असमानता को चुनौती देने की संभावना मौजूद थी।
इस अर्थ में सावित्रीबाई की विरासत भारतीय नारीवाद के एक महत्वपूर्ण सिद्धांत की ओर संकेत करती है—शिक्षा केवल ज्ञान प्राप्त करने का माध्यम नहीं बल्कि सामाजिक शक्ति-संबंधों को बदलने का साधन भी है।
ताराबाई शिंदे और पितृसत्तात्मक दोहरे मानदंड
भारतीय स्त्रीवादी चिंतन के आरंभिक ग्रंथों में ताराबाई शिंदे की स्त्री पुरुष तुलना (1882) विशेष उल्लेखनीय है। इस रचना में उन्होंने स्त्री और पुरुष के लिए समाज द्वारा निर्मित अलग-अलग नैतिक मानदंडों की आलोचना की।
इसका महत्व इसलिए भी है कि यहां स्त्री स्वयं अपने समाज में स्त्री के प्रति प्रचलित दृष्टिकोण को प्रश्नांकित कर रही थी। स्त्री की नैतिकता पर कठोर सामाजिक नियंत्रण और पुरुष को मिलने वाली अपेक्षाकृत अधिक स्वतंत्रता के बीच का विरोधाभास भारतीय स्त्रीवादी विमर्श का आरंभिक विषय बनता दिखाई देता है।
पंडिता रमाबाई और स्त्री की स्वतंत्रता
पंडिता रमाबाई भारतीय स्त्री-अधिकार इतिहास की एक अन्य महत्वपूर्ण हस्ती हैं। उनकी प्रसिद्ध अंग्रेजी पुस्तक The High-Caste Hindu Woman 1887 में प्रकाशित हुई। इसमें उन्होंने विशेष रूप से उच्च जातीय हिन्दू समाज में स्त्रियों, बाल-विधवाओं और बाल-विवाह से संबंधित परिस्थितियों की आलोचनात्मक चर्चा की।
रमाबाई का महत्व केवल लेखन तक सीमित नहीं है। उन्होंने स्त्री-शिक्षा और आश्रय से संबंधित संस्थागत प्रयास भी किए। उनकी जीवन-यात्रा भारतीय स्त्री की शिक्षा, धर्म, आत्मनिर्णय और सामाजिक स्वतंत्रता से संबंधित जटिल प्रश्नों को सामने लाती है।
जाति के बिना भारतीय नारीवाद अधूरा क्यों है?
भारतीय नारीवाद की विशिष्टता समझने के लिए जाति व्यवस्था की भूमिका को समझना आवश्यक है।
डॉ. बी. आर. आंबेडकर का 1916 का प्रसिद्ध शोध-पत्र Castes in India: Their Mechanism, Genesis and Development इस संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है। आंबेडकर ने जाति की संरचना को समझने में endogamy अर्थात् समूह के भीतर विवाह को केंद्रीय तत्व माना। उनका तर्क था कि जाति की सीमाओं को बनाए रखने में विवाह संबंधों का नियंत्रण महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
इस विश्लेषण के नारीवादी निहितार्थ गहरे हैं। यदि जाति की निरंतरता के लिए विवाह-सीमाओं को नियंत्रित किया जाता है, तो स्त्री की विवाह-संबंधी स्वतंत्रता और उसकी यौनिकता पर सामाजिक नियंत्रण जाति-व्यवस्था से जुड़ जाता है। बाद के विद्वानों ने आंबेडकर के इस विश्लेषण को जाति और पितृसत्ता के अंतर्संबंध को समझने की महत्वपूर्ण बौद्धिक आधारभूमि माना है।
इसलिए भारतीय नारीवादी विमर्श में जाति को केवल एक अतिरिक्त सामाजिक समस्या मानना पर्याप्त नहीं है। जाति कई परिस्थितियों में विवाह, परिवार, श्रम और स्त्री की सामाजिक स्थिति को संरचित करती है।
स्वतंत्रता आंदोलन और स्त्रियों की सार्वजनिक भागीदारी
भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन ने बड़ी संख्या में महिलाओं को सार्वजनिक राजनीतिक जीवन में आने का अवसर दिया। सरोजिनी नायडू, कमलादेवी चट्टोपाध्याय, अरुणा आसफ अली, सुचेता कृपलानी और अनेक अन्य महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी इस परिवर्तन का प्रतीक बनी।
महात्मा गांधी के नेतृत्व वाले आंदोलनों में भी महिलाओं की व्यापक भागीदारी हुई। सत्याग्रह, विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार और औपनिवेशिक सत्ता के विरोध में महिलाओं की सक्रियता ने घर और सार्वजनिक क्षेत्र के बीच पारंपरिक विभाजन को चुनौती दी।
फिर भी राष्ट्रवादी आंदोलन और स्त्री-मुक्ति को समानार्थी नहीं माना जा सकता। स्वतंत्रता प्राप्ति अपने-आप सामाजिक पितृसत्ता की समाप्ति नहीं थी। स्वतंत्रता के बाद भी स्त्रियों के सामने शिक्षा, रोजगार, हिंसा, संपत्ति और सामाजिक प्रतिनिधित्व से संबंधित अनेक समस्याएं बनी रहीं।
संविधान और लैंगिक समानता
26 जनवरी 1950 से लागू भारतीय संविधान ने स्त्रियों की समान नागरिकता को मजबूत कानूनी आधार प्रदान किया।
अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता और कानून के समान संरक्षण का प्रावधान करता है। अनुच्छेद 15 धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान आदि के आधार पर भेदभाव का निषेध करता है, जबकि अनुच्छेद 15(3) राज्य को महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष प्रावधान बनाने की अनुमति देता है। अनुच्छेद 16 सार्वजनिक रोजगार के मामलों में अवसर की समानता का संवैधानिक आधार प्रदान करता है। सरकारी विवरण भी इन प्रावधानों को महिलाओं की समानता के संवैधानिक आधार के रूप में रेखांकित करते हैं।
यह परिवर्तन अत्यंत महत्वपूर्ण था। स्त्री अब केवल परिवार अथवा समुदाय की सदस्य नहीं, बल्कि स्वतंत्र संवैधानिक अधिकारों वाली नागरिक भी थी।
परंतु कानूनी समानता और सामाजिक वास्तविकता में अंतर बना रहा। यही अंतर स्वतंत्रता के बाद के भारतीय महिला आंदोलन की प्रमुख चिंता बना।
1974 की ‘Towards Equality’ रिपोर्ट: एक ऐतिहासिक मोड़
स्वतंत्र भारत में स्त्रियों की स्थिति के अध्ययन में Towards Equality: Report of the Committee on the Status of Women in India अत्यंत महत्वपूर्ण दस्तावेज है।
यह रिपोर्ट भारत सरकार के शिक्षा एवं समाज कल्याण मंत्रालय के समाज कल्याण विभाग के अंतर्गत गठित Committee on the Status of Women in India से संबंधित थी और दिसंबर 1974 में प्रकाशित हुई। उपलब्ध अभिलेख इसकी प्रकाशन तिथि और सरकारी संस्थागत पृष्ठभूमि की पुष्टि करते हैं।
इस रिपोर्ट का महत्व केवल आंकड़ों के संकलन में नहीं था। इसने स्वतंत्रता के लगभग ढाई दशकों बाद यह गंभीर प्रश्न सामने रखा कि संवैधानिक समानता के बावजूद भारतीय स्त्रियों की वास्तविक सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थिति क्या है।
इसी कारण Towards Equality को स्वतंत्रता के बाद भारतीय महिला आंदोलन के पुनरुत्थान से जुड़े प्रमुख दस्तावेजों में माना जाता है।
1970 और 1980 के दशक का महिला आंदोलन
1970 के दशक के बाद भारतीय महिला आंदोलन ने नए रूप ग्रहण किए। अब प्रश्न केवल सामाजिक सुधार तक सीमित नहीं रहा। दहेज-संबंधी हिंसा, बलात्कार, घरेलू हिंसा, कार्यस्थल पर भेदभाव, मजदूरी, संपत्ति और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दे अधिक स्पष्ट रूप से सार्वजनिक आंदोलन का हिस्सा बने।
इसी दौर में स्वायत्त महिला संगठनों की भूमिका बढ़ी। स्त्री के शरीर, श्रम और निर्णय लेने की स्वतंत्रता के प्रश्न अधिक मुखर हुए।
यहां भारतीय नारीवाद का स्वर पहले की तुलना में अधिक राजनीतिक दिखाई देता है। अब केवल स्त्री की 'स्थिति सुधारने' के स्थान पर उन संस्थागत और सामाजिक संरचनाओं की आलोचना की जाने लगी जो असमानता उत्पन्न करती थीं।
श्रम और भारतीय स्त्री
भारतीय नारीवाद का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र स्त्री-श्रम है। स्त्रियां कृषि, घरेलू कार्य, देखभाल, असंगठित अर्थव्यवस्था, कारखानों और सेवा क्षेत्र में काम करती रही हैं। किंतु उनके अनेक प्रकार के श्रम को आर्थिक मूल्यांकन और सामाजिक प्रतिष्ठा में पर्याप्त स्थान नहीं मिला।
घरेलू श्रम इसका सबसे स्पष्ट उदाहरण है। भोजन बनाना, बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल, पानी अथवा ईंधन की व्यवस्था, सफाई तथा परिवार के दैनिक पुनरुत्पादन से जुड़े अनेक कार्य आर्थिक व्यवस्था को अप्रत्यक्ष रूप से चलाते हैं, फिर भी पारंपरिक आर्थिक गणनाओं में इनका मूल्यांकन कठिन रहा है।
इससे भारतीय नारीवाद में एक महत्वपूर्ण प्रश्न उत्पन्न हुआ—काम किसे कहा जाए और किसका श्रम दिखाई देता है?
दलित नारीवाद का हस्तक्षेप
भारतीय नारीवाद के विकास में दलित स्त्रीवादी चिंतन ने महत्वपूर्ण वैचारिक हस्तक्षेप किया। इसका मूल प्रश्न यह था कि क्या 'भारतीय स्त्री' को एक समान सामाजिक श्रेणी मान लेना उचित है?
दलित स्त्री के अनुभव में लिंग के साथ जाति और कई बार आर्थिक वंचना भी सक्रिय होती है। इसलिए उसका अनुभव किसी उच्च जातीय और आर्थिक रूप से संपन्न स्त्री के अनुभव से भिन्न हो सकता है।
शर्मिला रेगे जैसी विदुषियों ने जाति और जेंडर के इस संबंध पर महत्वपूर्ण अकादमिक कार्य किया। दलित महिलाओं के अनुभवों और आत्मकथात्मक लेखन ने भी मुख्यधारा नारीवादी ज्ञान की सीमाओं को चुनौती दी।
इस दृष्टिकोण ने भारतीय नारीवाद को यह समझने में सहायता की कि सभी स्त्रियों की सामाजिक स्थिति समान नहीं है और इसलिए मुक्ति की रणनीति भी एकरूप नहीं हो सकती।
आदिवासी और ग्रामीण स्त्रियों का प्रश्न
इसी प्रकार आदिवासी और ग्रामीण महिलाओं के अनुभवों को भी सामान्यीकृत 'भारतीय महिला' की श्रेणी में समाहित नहीं किया जा सकता।
भूमि, जंगल, विस्थापन, कृषि, आजीविका और प्राकृतिक संसाधनों तक पहुंच जैसे प्रश्न अनेक ग्रामीण और आदिवासी महिलाओं के जीवन में सीधे लैंगिक प्रश्न बन जाते हैं।
यहां नारीवाद का संबंध पर्यावरण और विकास की नीतियों से भी जुड़ जाता है। इस प्रकार भारतीय नारीवादी विमर्श घर की चारदीवारी से निकलकर भूमि, जल, जंगल, श्रम और विकास नीति तक विस्तृत होता है।
भारतीय नारीवाद और धर्म
भारत बहुधार्मिक समाज है। इसलिए विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, परिवार और व्यक्तिगत कानून से जुड़े प्रश्न नारीवादी बहस का महत्वपूर्ण हिस्सा रहे हैं।
यह क्षेत्र विशेष रूप से जटिल है क्योंकि यहां दो अधिकार कभी-कभी तनाव में दिखाई देते हैं—एक ओर समुदाय की धार्मिक-सांस्कृतिक स्वतंत्रता और दूसरी ओर समुदाय के भीतर महिला की व्यक्तिगत समानता और स्वतंत्रता।
भारतीय नारीवाद ने इसलिए धर्म की आलोचना और धार्मिक समुदायों के भीतर महिलाओं की agency दोनों पर विचार किया है। किसी समुदाय की स्त्रियों को केवल पीड़ित के रूप में प्रस्तुत करना भी उतना ही समस्याग्रस्त हो सकता है जितना धार्मिक परंपरा के नाम पर असमानता की आलोचना से बचना।
परिवार: उत्पीड़न का स्थल या सहयोग की संस्था?
भारतीय नारीवाद की चर्चा में परिवार का प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण है।
परिवार व्यक्ति को प्रेम, सहयोग, सामाजिक सुरक्षा और भावनात्मक आधार प्रदान कर सकता है। लेकिन यही परिवार संपत्ति, उत्तराधिकार, विवाह, श्रम-विभाजन और स्त्री की गतिशीलता पर नियंत्रण का माध्यम भी बन सकता है।
इसलिए भारतीय नारीवाद का उद्देश्य आवश्यक रूप से परिवार का निषेध नहीं है। महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि परिवार के भीतर संबंध समानता, सहमति, सम्मान और न्याय पर आधारित हैं या नहीं।
स्त्री द्वारा परिवार को महत्व देना और स्त्री द्वारा स्वतंत्रता की मांग करना परस्पर विरोधी स्थितियां नहीं हैं।
भारतीय और पश्चिमी नारीवाद: विरोध नहीं, संवाद
कभी-कभी भारतीय नारीवाद को पश्चिमी नारीवाद के पूर्णतः विपरीत प्रस्तुत किया जाता है। यह सरलीकरण है।
उदारवादी नारीवाद, समाजवादी नारीवाद, मार्क्सवादी नारीवाद, रेडिकल नारीवाद और बाद के intersectional feminism से भारतीय चिंतन ने अनेक अवधारणाएं ग्रहण की हैं। दूसरी ओर भारतीय अनुभवों—विशेषतः जाति, समुदाय, औपनिवेशिकता और विकास के प्रश्नों—ने वैश्विक नारीवादी सिद्धांत को भी नए प्रश्न दिए हैं।
इसलिए अधिक उपयुक्त दृष्टिकोण 'भारतीय बनाम पश्चिमी' का द्वंद्व बनाने के बजाय विचारों के आदान-प्रदान और स्थानीय पुनर्व्याख्या को समझना है।
साहित्य में भारतीय नारीवाद
भारतीय भाषाओं के साहित्य ने स्त्री-अनुभव को अभिव्यक्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
हिन्दी में महादेवी वर्मा की शृंखला की कड़ियाँ स्त्री की सामाजिक स्थिति पर महत्वपूर्ण वैचारिक हस्तक्षेप है। आगे चलकर कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी, मृदुला गर्ग, प्रभा खेतान, मैत्रेयी पुष्पा सहित अनेक लेखिकाओं ने स्त्री की इच्छाओं, परिवार, विवाह, देह, श्रम, प्रेम, सामाजिक नियंत्रण और अस्मिता से संबंधित विविध अनुभवों को साहित्य में स्थान दिया।
भारतीय भाषाओं में स्त्री-आत्मकथाओं और दलित स्त्री लेखन ने नारीवादी विमर्श को और विस्तृत किया। यहां स्त्री अपने अनुभव की स्वयं व्याख्याता बनती है।
यह परिवर्तन महत्वपूर्ण है—स्त्री साहित्य में केवल विषय नहीं रहती, बल्कि अपने अनुभव की वक्ता और ज्ञान की निर्माता बनती है।
समकालीन भारतीय नारीवाद
इक्कीसवीं शताब्दी में भारतीय नारीवाद के प्रश्न और विस्तृत हुए हैं। उच्च शिक्षा, कॉरपोरेट रोजगार, डिजिटल मीडिया, ऑनलाइन उत्पीड़न, कार्यस्थल की सुरक्षा, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, वैवाहिक संबंधों में समानता, यौन हिंसा, घरेलू हिंसा, unpaid care work और डिजिटल सार्वजनिक क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी नए विमर्शों से जुड़ गए हैं।
सोशल मीडिया ने स्त्रियों को अपने अनुभव सार्वजनिक करने का नया मंच दिया है। साथ ही डिजिटल माध्यम स्वयं लैंगिक हिंसा और उत्पीड़न के नए रूपों का क्षेत्र भी बना है।
इस प्रकार तकनीक स्वतः मुक्ति का माध्यम नहीं है। उसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि डिजिटल संसाधनों तक किसकी पहुंच है और डिजिटल सार्वजनिक क्षेत्र में किसकी आवाज कितनी सुरक्षित है।
भारतीय नारीवाद की मूल विशेषताएँ
भारतीय नारीवाद के लंबे ऐतिहासिक विकास से कुछ केंद्रीय विशेषताएं सामने आती हैं—
पहली, स्त्री-मुक्ति का शिक्षा से गहरा संबंध है।
दूसरी, भारतीय समाज में लैंगिक असमानता को जाति से अलग करके पूरी तरह नहीं समझा जा सकता।
तीसरी, संवैधानिक समानता अत्यंत आवश्यक है, लेकिन कानून मात्र से सामाजिक समानता स्वतः स्थापित नहीं होती।
चौथी, महिलाओं के बीच स्वयं जाति, वर्ग, धर्म, क्षेत्र और आर्थिक स्थिति के कारण महत्वपूर्ण अंतर मौजूद हैं।
पांचवीं, स्त्री की agency—अर्थात अपने जीवन के संबंध में निर्णय लेने की वास्तविक क्षमता—नारीवादी चिंतन का केंद्रीय तत्व है।
छठी, भारतीय नारीवाद की कोई एक आवाज नहीं है। इसमें उदारवादी, समाजवादी, मार्क्सवादी, दलित, आदिवासी, पर्यावरणवादी तथा अन्य अनेक वैचारिक धाराओं के बीच संवाद और मतभेद दोनों मौजूद हैं।
क्या ‘भारतीय नारीवाद’ की एक निश्चित परिभाषा संभव है?
भारतीय नारीवाद को एक वाक्य में सीमित करना कठिन है, फिर भी उसकी व्यापक अवधारणा इस प्रकार प्रस्तुत की जा सकती है—
भारतीय नारीवाद भारत की विशिष्ट ऐतिहासिक और सामाजिक परिस्थितियों में विकसित वह बहुवचनात्मक वैचारिक-सामाजिक चेतना है जो लिंग आधारित असमानता को जाति, वर्ग, धर्म, परिवार, श्रम और अन्य सत्ता-संबंधों के साथ समझते हुए स्त्रियों की समानता, गरिमा, स्वतंत्रता, सामाजिक न्याय और निर्णय-क्षमता की स्थापना का प्रयास करती है।
इस परिभाषा में 'बहुवचनात्मक' शब्द महत्वपूर्ण है। भारतीय नारीवाद कोई एक विचारधारा अथवा एक संगठन का नाम नहीं है।
निष्कर्ष
भारतीय नारीवाद का इतिहास केवल आधुनिक 'फेमिनिज़्म' शब्द के भारत पहुंचने का इतिहास नहीं है। यह उन स्त्रियों और सामाजिक आंदोलनों की भी कहानी है जिन्होंने अलग-अलग ऐतिहासिक परिस्थितियों में शिक्षा, सम्मान, संपत्ति, श्रम, विवाह, प्रतिनिधित्व और स्वतंत्रता के प्रश्न उठाए।
सावित्रीबाई फुले के शैक्षिक संघर्ष से ताराबाई शिंदे की पितृसत्तात्मक नैतिकता की आलोचना तक, पंडिता रमाबाई के हस्तक्षेप से आंबेडकर के जाति और अंतर्विवाह संबंधी विश्लेषण तक और संविधान की समानता की अवधारणा से Towards Equality तथा बाद के महिला आंदोलनों तक इसकी लंबी यात्रा दिखाई देती है।
1974 की Towards Equality रिपोर्ट का ऐतिहासिक महत्व इस तथ्य में है कि संवैधानिक समानता के बाद भी महिलाओं की वास्तविक स्थिति की गंभीर समीक्षा आवश्यक बनी रही। रिपोर्ट दिसंबर 1974 में भारत सरकार के समाज कल्याण विभाग द्वारा प्रकाशित हुई थी।
अंततः भारतीय नारीवाद का सबसे महत्वपूर्ण योगदान संभवतः यह समझ है कि स्त्री की स्वतंत्रता को समाज के दूसरे न्याय-संबंधी प्रश्नों से अलग नहीं किया जा सकता। जाति, आर्थिक विषमता, शिक्षा, श्रम और सामाजिक प्रतिष्ठा से मुक्त किए बिना लैंगिक समानता अधूरी रह सकती है।
इसलिए भारतीय नारीवाद का लक्ष्य केवल 'स्त्री को पुरुष के समान बनाना' नहीं, बल्कि ऐसी सामाजिक व्यवस्था की कल्पना करना है जिसमें किसी व्यक्ति के अवसर, गरिमा और स्वतंत्रता को उसका लिंग, जाति अथवा सामाजिक स्थिति अनुचित रूप से सीमित न करे।
संदर्भ
- Government of India. Towards Equality: Report of the Committee on the Status of Women in India. Department of Social Welfare, Ministry of Education & Social Welfare, New Delhi, December 1974.
- Ambedkar, B. R. Castes in India: Their Mechanism, Genesis and Development. Paper presented in 1916; subsequently published in 1917.
- Shinde, Tarabai. Stri Purush Tulana. 1882.
- Ramabai, Pandita. The High-Caste Hindu Woman. 1887.
- Government of India, constitutional provisions concerning equality: Articles 14, 15 and 16 and related provisions.
- Rege, Sharmila. Writing Caste/Writing Gender: Narrating Dalit Women's Testimonios. Zubaan, New Delhi, 2006.
- Chakravarti, Uma. Gendering Caste: Through a Feminist Lens. Stree, Kolkata.
- Sangari, Kumkum and Sudesh Vaid (eds.). Recasting Women: Essays in Colonial History. Kali for Women, New Delhi, 1989.
- Menon, Nivedita. Seeing Like a Feminist. Zubaan/Penguin, 2012.
- Forbes, Geraldine. Women in Modern India. Cambridge University Press, 1996.
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