भारत की जीवंत भाषायी मौखिक परंपराएँ:
लोक-स्मृति, भाषायी विविधता और सांस्कृतिक निरंतरता
Living Oral Traditions of Language in India: Folk Memory, Linguistic Diversity and Cultural Continuity
डॉ. मनीष कुमार सी. मिश्रा
एसोसिएट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग
के. एम. अग्रवाल महाविद्यालय, कल्याण (पश्चिम), महाराष्ट्र
सारांश
भारत की भाषायी संस्कृति को केवल लिखित ग्रंथों, मानकीकृत भाषाओं और मुद्रित साहित्य के आधार पर समझना पर्याप्त नहीं है। भारतीय समाज की सांस्कृतिक स्मृति का एक विशाल भाग बोलने, सुनने, गाने, दुहराने, अभिनय करने, कथा कहने और सामुदायिक अनुष्ठानों में भाग लेने की प्रक्रियाओं के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचरित हुआ है। यही जीवंत मौखिक परंपराएँ भाषा को सामाजिक व्यवहार, सामूहिक स्मृति और सांस्कृतिक पहचान का माध्यम बनाती हैं। प्रस्तुत आलेख भारत की मौखिक भाषायी परंपराओं का बहुआयामी अध्ययन करता है। इसमें वैदिक पाठ-परंपरा से लेकर रामकथा, लोकमहाकाव्य, लोकगीत, कथावाचन, आदिवासी आख्यान, धार्मिक गायन, क्षेत्रीय प्रदर्शन-परंपराओं तथा समकालीन डिजिटल माध्यमों तक मौखिकता के विविध रूपों का विवेचन किया गया है। आलेख का केंद्रीय तर्क है कि मौखिक परंपरा लिखित साहित्य का प्रारंभिक अथवा ‘अपूर्ण’ रूप नहीं, बल्कि ज्ञान-निर्माण और सांस्कृतिक संप्रेषण की अपनी स्वतंत्र प्रणाली है। आधुनिक शिक्षा, शहरीकरण, प्रव्रजन, भाषा-परिवर्तन और जनसंचार ने इन परंपराओं के सामने चुनौतियाँ उत्पन्न की हैं; दूसरी ओर ऑडियो-वीडियो अभिलेखन, डिजिटल संग्रह, सामुदायिक दस्तावेजीकरण और नई मीडिया संस्कृति इनके पुनर्जीवन के अवसर भी प्रदान करती है।
बीज शब्द: मौखिक परंपरा, मौखिकता, लोक-स्मृति, लोकभाषा, भाषायी विविधता, अमूर्त सांस्कृतिक विरासत, लोकसाहित्य, आदिवासी भाषा, सांस्कृतिक निरंतरता।
1. प्रस्तावना
भारत को प्रायः भाषाओं का देश कहा जाता है, पर उसकी भाषायी विविधता का वास्तविक विस्तार केवल संविधान की अनुसूचित भाषाओं या साहित्यिक भाषाओं की संख्या में नहीं समाता। गांव की चौपाल, खेत, नदी, पर्व, विवाह, जन्म-संस्कार, धार्मिक स्थल, यात्रा, श्रम, बाजार, जंगल और घर के भीतर चलने वाली बातचीत में भाषा के असंख्य जीवंत रूप मौजूद हैं। इनमें कहावतें, पहेलियाँ, लोककथाएँ, मिथक, गीत, मंत्र, प्रार्थनाएँ, गाथाएँ, लोरियाँ, शोकगीत, वीरगाथाएँ, वंशावलियाँ और नाटकीय प्रस्तुतियाँ शामिल हैं। UNESCO भी मौखिक परंपराओं और अभिव्यक्तियों में कहावत, पहेली, कथा, किंवदंती, मिथक, महाकाव्य-गीत, कविता, मंत्र, प्रार्थना, गायन और नाटकीय प्रस्तुति जैसे अनेक रूपों को सम्मिलित करता है तथा भाषा को अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के संचार का प्रमुख माध्यम मानता है।
मौखिक परंपरा का अर्थ केवल यह नहीं है कि कोई सामग्री लिखी नहीं गई। इसका मूल आधार ‘प्रदर्शन’ और ‘संचरण’ है। एक कथा हर प्रस्तुति में थोड़ी बदल सकती है; गायक श्रोताओं, अवसर और स्थान के अनुसार पंक्तियाँ जोड़ सकता है; कथावाचक स्थानीय स्मृति और वर्तमान घटनाओं को पुराने आख्यान में समाहित कर सकता है। इसीलिए मौखिकता स्थिर पाठ के बजाय जीवंत प्रक्रिया है। स्मृति, स्वर, लय, हावभाव, सामूहिक प्रत्युत्तर और प्रसंग उसके अर्थ का हिस्सा होते हैं।
2. मौखिकता की अवधारणा और सैद्धांतिक आधार
मौखिक संस्कृति के अध्ययन में Walter J. Ong ने प्राथमिक मौखिकता और लेखन/मुद्रण से प्रभावित संस्कृति के बीच अंतर को रेखांकित किया। उनके अनुसार मौखिक समाजों में ज्ञान स्मरणीय बनाने के लिए पुनरावृत्ति, सूत्रात्मक अभिव्यक्ति, लय और सामुदायिक सहभागिता का सहारा लिया जाता है। भारत जैसे समाज में शुद्ध रूप से ‘मौखिक’ और ‘लिखित’ संस्कृतियाँ अलग-अलग खानों में नहीं रहतीं; वे लगातार एक-दूसरे को प्रभावित करती हैं। लिखित रामायण का पाठ लोकगायन में प्रवेश करता है और लोककथा साहित्यिक पुनर्लेखन में। इसी परस्परता को समझे बिना भारतीय भाषायी संस्कृति की पूर्ण तस्वीर संभव नहीं है।
A. K. Ramanujan ने भारतीय कथा-संसार में एक ही कथा के अनेक रूपों और पुनर्कथनों की ओर ध्यान आकर्षित किया। भारतीय परंपरा में ‘मूल’ और ‘रूपांतर’ का संबंध अक्सर आधुनिक कॉपीराइट-आधारित पाठ-धारणा से भिन्न है। मौखिक कथाकार परंपरा का उत्तराधिकारी भी होता है और रचनाकार भी। वह विरासत को ज्यों का त्यों नहीं दुहराता; अपने समुदाय के अनुभवों के अनुरूप उसका पुनर्सृजन करता है।
3. श्रुति से लोक-स्मृति तक: भारतीय मौखिकता की दीर्घ परंपरा
भारतीय मौखिक परंपरा का सबसे चर्चित उदाहरण वैदिक पाठ है। वेद लिखित पांडुलिपियों से बहुत पहले सुनने और कंठस्थ करने की विशिष्ट पद्धतियों से सुरक्षित रहे। उच्चारण, स्वराघात और शब्दक्रम की शुद्धता बनाए रखने के लिए जटिल पाठ-विधियाँ विकसित हुईं। UNESCO ने ‘Tradition of Vedic Chanting’ को 2008 में मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में अंकित किया। यह उदाहरण दिखाता है कि मौखिक संचरण केवल सहज स्मृति नहीं, बल्कि अत्यंत अनुशासित ज्ञान-प्रौद्योगिकी भी हो सकता है।
महाभारत और रामायण जैसे महाकाव्य भी भारत के विभिन्न क्षेत्रों में केवल पुस्तक के रूप में नहीं रहे। कथा, पाठ, गायन, अभिनय और उत्सव के माध्यम से उन्होंने अनेक स्थानीय भाषायी रूप ग्रहण किए। रामलीला में कथा, संवाद, गायन, पाठ और सामुदायिक अभिनय एक साथ आते हैं। UNESCO के अनुसार उत्तर भारत की रामलीला परंपरा रामचरितमानस से गहरे जुड़ी है और अयोध्या, रामनगर-बनारस, वृंदावन, अल्मोड़ा, सतना और मधुबनी जैसे क्षेत्रों में विशिष्ट रूपों में प्रस्तुत होती है।
4. लोकमहाकाव्य और कथावाचन
भारत के अनेक क्षेत्रों में वीरों, संतों, स्थानीय देवताओं और समुदाय के पूर्वजों की स्मृति लोकमहाकाव्यों में संरक्षित है। उत्तर भारत की आल्हा गायकी में आल्हा-ऊदल की वीरता का आख्यान आज भी वर्षा ऋतु और सामुदायिक अवसरों पर गाया जाता है। राजस्थान में पाबूजी की कथा फड़ और गायन-प्रदर्शन से जुड़ती है। छत्तीसगढ़ की पंडवानी महाभारत को स्थानीय बोली, संगीत, नाटकीयता और तत्काल रचनात्मकता के साथ प्रस्तुत करती है। ऐसे रूप यह प्रमाणित करते हैं कि महाकाव्य केवल साहित्यिक ग्रंथ नहीं, बल्कि समुदाय द्वारा बार-बार सक्रिय की जाने वाली स्मृति हैं।
मौखिक प्रस्तुति में कथाकार की भूमिका केंद्रीय है। वह पाठ का वाचक भर नहीं, स्मृति का संरक्षक, अभिनेता, गायक और कभी-कभी सामाजिक टिप्पणीकार भी होता है। श्रोता निष्क्रिय नहीं रहते; उनकी प्रतिक्रिया प्रस्तुति की गति और रूप को प्रभावित करती है। इस प्रकार मौखिक साहित्य ‘लेखक–पाठक’ की द्विपक्षीय संरचना के बजाय कलाकार–समुदाय–प्रसंग की त्रिपक्षीय संरचना में विकसित होता है।
5. लोकगीत: जीवन-चक्र की भाषायी स्मृति
भारतीय लोकगीतों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे जीवन के लगभग प्रत्येक चरण से जुड़े हैं। उत्तर भारत में सोहर जन्म के अवसर पर, विवाह गीत विवाह-संस्कारों में, कजरी वर्षा ऋतु में, चैती चैत्र मास में और बिरहा विरह तथा सामाजिक अनुभवों को स्वर देता है। महाराष्ट्र में ओवी घरेलू और श्रम-संस्कृति से जुड़ी रही है; पोवाड़ा वीरता और ऐतिहासिक स्मृति को गायन में रूपांतरित करता है। पंजाब की बोलियाँ, गुजरात के गरबा-गीत, बंगाल के बाउल गायन, असम के बिहू गीत और दक्षिण भारत की अनेक कार्यगीत-परंपराएँ भाषा को दैनिक जीवन से जोड़ती हैं।
लोकगीत विशेषतः महिलाओं की मौखिक अभिव्यक्ति के अध्ययन में महत्त्वपूर्ण हैं। अनेक समुदायों में ऐतिहासिक रूप से औपचारिक लेखन-संस्थाओं तक महिलाओं की पहुँच सीमित रही, किंतु विवाह, श्रम, पर्व और घरेलू संस्कारों के गीतों में उन्होंने संबंधों, पीड़ा, हास्य, इच्छा, विरोध और अनुभव को पीढ़ियों तक संरक्षित किया। इसलिए लोकगीत सामाजिक इतिहास के वैकल्पिक अभिलेख भी हैं।
6. आदिवासी और स्वदेशी समुदायों की मौखिक ज्ञान-परंपराएँ
भारत के आदिवासी समुदायों में मौखिक परंपरा भाषा, भूगोल और पारिस्थितिकी को जोड़ती है। गोंड, भील, संथाल, मुंडा, हो, नागा, मिजो तथा अनेक अन्य समुदायों की कथाओं और गीतों में उत्पत्ति-कथाएँ, पूर्वज-स्मृति, जंगल, पशु-पक्षी, कृषि, ऋतु, उपचार और सामुदायिक नियम निहित रहते हैं। ऐसे आख्यानों को केवल ‘लोक मनोरंजन’ मानना उनके ज्ञानात्मक पक्ष की उपेक्षा होगी। इनमें स्थानीय पर्यावरण की समझ, सामाजिक दायित्व और नैतिक व्यवहार के सूत्र भी सुरक्षित होते हैं।
आदिवासी मौखिकता का दस्तावेजीकरण एक संवेदनशील प्रश्न है। बाहरी शोधकर्ता द्वारा रिकॉर्डिंग कर लेना संरक्षण का पर्याय नहीं है। समुदाय की सहमति, बौद्धिक अधिकार, भाषायी संदर्भ, प्रदर्शन का अवसर और रिकॉर्डिंग पर समुदाय का नियंत्रण आवश्यक है। विरासत को संग्रहालय की वस्तु बनाने के बजाय उसे समुदाय के भीतर जीवित रहने देना अधिक महत्त्वपूर्ण है।
7. राजस्थान, मध्य भारत और बहुभाषी मौखिकता
राजस्थान की कालबेलिया परंपरा मौखिकता, संगीत और सामुदायिक पहचान के संबंध का उल्लेखनीय उदाहरण है। UNESCO के विवरण में कालबेलिया गीतों को मिथकीय ज्ञान के प्रसार तथा तात्कालिक गीत-रचना की क्षमता से जोड़ा गया है; परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी मौखिक रूप से चलती है और उसके लिए परंपरागत लिखित प्रशिक्षण-पुस्तिकाएँ नहीं हैं। इससे स्पष्ट होता है कि ‘ज्ञान’ का अस्तित्व लिखित पाठ पर निर्भर नहीं होता।
उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान में प्रचलित चार बैत जैसी परंपराएँ भारत की बहुभाषी सांस्कृतिक अंतःक्रिया को सामने लाती हैं। इस शैली में अवधी, उर्दू, फ़ारसी आदि भाषायी संसाधनों का सह-अस्तित्व दिखाई देता है और प्रतिस्पर्धी गायन में तत्काल कविता-रचना भी होती है। यह उदाहरण बताता है कि मौखिक परंपरा भाषाओं के बीच कठोर सीमाएँ बनाने के बजाय मिश्रण और आदान-प्रदान का क्षेत्र बन सकती है।
8. हिमालय और पूर्वोत्तर भारत
हिमालयी और पूर्वोत्तर क्षेत्रों की भाषायी विविधता में कथा, गीत, धार्मिक पाठ और सामुदायिक अनुष्ठान अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। लद्दाख की बौद्ध मंत्रोच्चार परंपरा 2012 से UNESCO की प्रतिनिधि सूची में है। मणिपुर का संकीर्तन गायन, वादन और नृत्य को धार्मिक-सामुदायिक अनुभव में जोड़ता है और 2013 में सूचीबद्ध हुआ। गढ़वाल का रम्माण धार्मिक उत्सव और अनुष्ठानिक रंगमंच का संयुक्त रूप है। इन उदाहरणों में शब्द केवल अर्थ का माध्यम नहीं; संगीत, देह, वेशभूषा, स्थान और सामूहिक भागीदारी के साथ अर्थ ग्रहण करता है।
पूर्वोत्तर भारत में अनेक समुदायों का इतिहास वंश-कथाओं, उत्पत्ति-मिथकों, लोकगीतों और स्मृति-कथाओं से संचरित हुआ है। जब छोटी भाषाओं में पीढ़ीगत भाषा-संचरण कम होता है, तो सबसे पहले वे शब्द और कथाएँ संकट में पड़ती हैं जो विद्यालयी या प्रशासनिक भाषा में स्थान नहीं पातीं। भाषा का क्षरण इस अर्थ में केवल शब्दावली का क्षरण नहीं, बल्कि सांस्कृतिक स्मृति और स्थानीय ज्ञान का भी नुकसान है।
9. दक्षिण भारत: शास्त्रीयता और लोक की अंतःक्रिया
दक्षिण भारत में संस्कृत, द्रविड़ भाषाओं और स्थानीय प्रदर्शन-परंपराओं का लंबा संवाद दिखाई देता है। केरल का कूटियाट्टम संस्कृत रंगमंच की अत्यंत प्राचीन जीवित परंपरा है। UNESCO इसे संस्कृत शास्त्रीयता और केरल की स्थानीय परंपराओं के संश्लेषण के रूप में देखता है। इसमें नेत्र-अभिनय और हस्त-अभिनय जैसी अभिव्यक्तियाँ शब्द से परे संप्रेषण का जटिल तंत्र निर्मित करती हैं। यह तथ्य मौखिक परंपरा की व्यापकता समझाता है—वाणी, देह, संगीत और स्मृति मिलकर ‘पाठ’ बनाते हैं।
केरल का मुडियेट्टु, कर्नाटक का यक्षगान, तमिल क्षेत्र की कथात्मक और लोकनाट्य परंपराएँ तथा तेलुगु-कन्नड़ क्षेत्रों की हरिकथा जैसे रूपों में धार्मिक आख्यान स्थानीय भाषा, संगीत और अभिनय के माध्यम से सामुदायिक अनुभव बनते हैं। इनका अध्ययन केवल नाट्यशास्त्र या संगीतशास्त्र से नहीं, समाजभाषाविज्ञान और लोकसाहित्य के संयुक्त दृष्टिकोण से भी किया जाना चाहिए।
10. भाषा, पहचान और सामुदायिक स्मृति
मौखिक परंपरा समुदाय को यह बताती है कि वह अपने अतीत को किस रूप में याद करता है। स्थानों के नाम, नदी-पर्वत से जुड़ी कथाएँ, कुल-कथाएँ, देवी-देवताओं की स्थानीय कहानियाँ और ऐतिहासिक घटनाओं के गीत सामुदायिक भूगोल का निर्माण करते हैं। मानकीकृत इतिहास जहाँ तारीख और दस्तावेज को प्राथमिकता देता है, मौखिक स्मृति अनुभव, मूल्य और पहचान को संरक्षित करती है। दोनों के सत्य-दावे समान नहीं होते, पर इतिहासलेखन के लिए मौखिक स्रोतों को आलोचनात्मक पद्धति से पढ़ना अत्यंत उपयोगी है।
भाषायी पहचान में उच्चारण और शैली भी महत्त्वपूर्ण हैं। एक कहावत का अर्थ उसके शब्दकोशीय अर्थ से अधिक उसके प्रयोग के अवसर में होता है। किसी लोकगीत की स्थानीय धुन बदल देने पर शब्द वही रह सकते हैं, किंतु सांस्कृतिक अनुभव बदल सकता है। अतः मौखिक विरासत का दस्तावेजीकरण केवल लिखित लिप्यंतरण तक सीमित नहीं होना चाहिए। ध्वनि, स्वर, गति, विराम, हावभाव और श्रोता-प्रतिक्रिया का अभिलेखन भी आवश्यक है।
11. मौखिकता और बहुभाषिकता
भारतीय समाज में बहुभाषिकता अक्सर दैनिक व्यवहार की स्वाभाविक अवस्था है। लोकगायक और कथावाचक श्रोताओं के अनुसार भाषा बदलते हैं, पड़ोसी भाषाओं के शब्द ग्रहण करते हैं और धार्मिक या काव्यात्मक प्रसंग में संस्कृत, फ़ारसी, अरबी अथवा अन्य स्रोतों से आए पदों का उपयोग करते हैं। इससे मौखिक भाषिक व्यवहार मानकीकृत भाषा की सीमाओं से अधिक लचीला दिखाई देता है। यही लचीलापन भारत की संपर्क-संस्कृति का आधार रहा है।
इस संदर्भ में ‘बोली’ को ‘भाषा से कमतर’ मानने वाली दृष्टि समस्या पैदा करती है। अनेक मौखिक परंपराएँ उन्हीं भाषिक रूपों में जीवित हैं जिन्हें प्रशासनिक या शैक्षिक व्यवस्था में सीमित प्रतिष्ठा मिलती है। यदि नई पीढ़ी अपनी घरेलू बोली को पिछड़ेपन से जोड़ने लगे, तो उसके साथ जुड़े गीत, कहावतें और कथाएँ भी तेजी से अप्रचलित हो सकती हैं। इसलिए भाषायी सम्मान संरक्षण की बुनियादी शर्त है।
12. मौखिक परंपराओं के सामने समकालीन चुनौतियाँ
UNESCO मौखिक परंपराओं के लिए शहरीकरण, बड़े पैमाने के प्रव्रजन, औद्योगीकरण, पर्यावरणीय परिवर्तन और आधुनिक जनमाध्यमों से उत्पन्न चुनौतियों की ओर ध्यान दिलाता है। भारत में इन कारकों के साथ शिक्षा और रोजगार के लिए प्रमुख भाषाओं की ओर स्थानांतरण भी जुड़ता है। जब प्रदर्शन के सामाजिक अवसर कम होते हैं, तो केवल कलाकार ही नहीं, श्रोता-समुदाय भी समाप्त होता है। मौखिक परंपरा का जीवन प्रदर्शन की निरंतरता पर निर्भर है।
दूसरी चुनौती ‘मंचीयकरण’ है। पर्यटन, सांस्कृतिक उत्सव या टेलीविजन के लिए लंबी कथाओं को कुछ मिनटों में समेटा जाता है। इससे कलाकार को नई आजीविका मिल सकती है, पर संदर्भ, अनुष्ठान और कथात्मक विस्तार कम हो सकते हैं। संरक्षण का उद्देश्य परंपरा को अपरिवर्तनीय बनाना नहीं होना चाहिए; परिवर्तन उसकी जीवंतता का हिस्सा है। प्रश्न यह है कि परिवर्तन समुदाय की भागीदारी से हो रहा है या बाहरी बाजार की मांग से।
13. डिजिटल युग: संकट के साथ नया अवसर
डिजिटल तकनीक मौखिक परंपराओं के लिए दोहरी भूमिका निभाती है। एक ओर वैश्विक मनोरंजन स्थानीय प्रदर्शन के समय और दर्शक कम कर सकता है; दूसरी ओर मोबाइल फोन, पॉडकास्ट, ऑनलाइन वीडियो और डिजिटल अभिलेख ऐसे रूपों को रिकॉर्ड और प्रसारित कर सकते हैं जिन्हें पहले सीमित क्षेत्र में ही सुना जाता था। UNESCO भी ऑडियो-वीडियो तकनीक द्वारा स्वर, शैली, कलाकार-श्रोता संवाद और गैर-मौखिक संकेतों को दर्ज करने की उपयोगिता स्वीकार करता है।
डिजिटल संरक्षण की आदर्श पद्धति ‘समुदाय-केंद्रित डिजिटल अभिलेख’ होनी चाहिए। रिकॉर्डिंग के साथ कलाकार का नाम, भाषा/बोली, स्थान, अवसर, तिथि, शैली, अर्थ और समुदाय द्वारा स्वीकृत विवरण रखा जाए। जहाँ सामग्री पवित्र, निजी या सीमित सामुदायिक उपयोग की हो, वहाँ खुली ऑनलाइन पहुँच देना उचित नहीं होगा। डिजिटल नैतिकता संरक्षण का अभिन्न अंग है।
14. शिक्षा और अनुसंधान में मौखिक विरासत
भारतीय विद्यालय और विश्वविद्यालय स्थानीय मौखिक विरासत के संरक्षण में सक्रिय भूमिका निभा सकते हैं। विद्यार्थी अपने क्षेत्र के बुजुर्गों से कहावतें, गीत, कथाएँ और स्थानीय इतिहास रिकॉर्ड करें; भाषा-विज्ञान के विद्यार्थी ध्वन्यात्मक और व्याकरणिक विशेषताओं का अध्ययन करें; इतिहास के विद्यार्थी मौखिक साक्ष्य को लिखित स्रोतों से तुलना करें; साहित्य के विद्यार्थी कथा के विभिन्न संस्करणों का तुलनात्मक अध्ययन करें। इस प्रक्रिया में समुदाय को ‘सूचना देने वाला’ मात्र न मानकर ज्ञान-साझेदार माना जाना चाहिए।
अनुसंधान में क्षेत्रकार्य की गुणवत्ता अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। रिकॉर्डिंग से पहले सूचित सहमति, उचित श्रेय, अनुवाद की पारदर्शिता और रिकॉर्ड की प्रतिलिपि समुदाय को लौटाना अच्छे अभ्यास हैं। डिजिटल ह्यूमैनिटीज के माध्यम से बहुभाषी ऑडियो संग्रह, मानचित्र-आधारित कथा-संग्रह और समान कथा के विभिन्न भाषायी संस्करणों का तुलनात्मक कॉर्पस तैयार किया जा सकता है।
15. संरक्षण की प्रस्तावित कार्ययोजना
16. निष्कर्ष
भारत की जीवंत मौखिक भाषायी परंपराएँ उसकी सांस्कृतिक विविधता का मूल आधार हैं। वैदिक पाठ की सूक्ष्म स्मृति-पद्धति से लेकर गांव की लोरी, आल्हा की वीरगाथा, पंडवानी का कथात्मक अभिनय, कालबेलिया गीत, बाउल गायन, ओवी, पोवाड़ा, रामलीला, लद्दाखी बौद्ध मंत्रोच्चार और पूर्वोत्तर की समुदाय-कथाओं तक एक साझा तथ्य सामने आता है—भाषा केवल लिखित संकेतों की प्रणाली नहीं, बल्कि सामाजिक क्रिया है। वह आवाज़, स्मृति, देह, संगीत, स्थान और समुदाय में जीवित रहती है।
मौखिक परंपराओं को बचाने का अर्थ उन्हें किसी एक ‘प्रामाणिक’ रूप में जमा देना नहीं है। उनकी शक्ति परिवर्तन, पुनर्कथन और सामुदायिक प्रयोग में है। संरक्षण तभी सार्थक होगा जब बोलने वाले समुदाय अपनी भाषा को अगली पीढ़ी तक पहुँचाएँ, कलाकारों को प्रस्तुति के अवसर मिलें और स्थानीय भाषिक रूप सम्मान के साथ सार्वजनिक जीवन में बने रहें। डिजिटल तकनीक इस दिशा में उपयोगी साधन है, किंतु वह जीवित अंतरपीढ़ी संवाद का विकल्प नहीं बन सकती। अतः भारत की भाषायी नीति, शिक्षा, सांस्कृतिक संस्थाओं और विश्वविद्यालयों को मौखिक विरासत को ‘अतीत की वस्तु’ नहीं, वर्तमान और भविष्य के ज्ञान-संसाधन के रूप में देखना चाहिए।
संदर्भ सूची
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