प्रोफेसर उल्फतख़ोन मुखिबोवा
प्रोफेसर उल्फतख़ोन मुखिबोवा के भारतीय साहित्य संबंधी अध्ययनों में भक्ति परंपरा और अकादमिक मार्गदर्शन
डॉ. मनीष कुमार सी. मिश्रा
एसोसिएट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, के. एम. अग्रवाल महाविद्यालय, कल्याण पश्चिम, महाराष्ट्र
पूर्व विजिटिंग प्रोफेसर, ICCR हिन्दी चेयर, ताशकंद स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ ओरिएंटल स्टडीज़, ताशकंद, उज़्बेकिस्तान
सारांश
उज़्बेकिस्तान में भारतीय साहित्य के अध्ययन की परंपरा केवल विदेशी भाषा-अध्यापन का परिणाम नहीं है; वह मध्य एशिया और भारत के दीर्घ सांस्कृतिक संपर्क, सोवियतकालीन भारतविद्या, अनुवाद, तुलनात्मक साहित्य और विश्वविद्यालयीय प्रशिक्षण से निर्मित एक विशिष्ट ज्ञान-परंपरा है। इस परंपरा में प्रोफेसर उल्फतख़ोन मुखिबोवा का कार्य इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि उन्होंने मध्यकालीन हिन्दी साहित्य, ब्रजभाषा की गद्य-परंपरा, वार्ता साहित्य, बाबुरी अथवा मुगलकालीन भक्ति साहित्य, अनुवाद और हिन्दी-अध्यापन को एक सतत शोध-क्षेत्र के रूप में विकसित किया। उपलब्ध प्रमाणों के अनुसार 1995 में उनका शोध 17वीं शताब्दी के ब्रज साहित्य की गद्य शैली ‘वार्ता’ पर केंद्रित था और 2015 में उन्होंने ‘बाबुरी काल का भक्ति साहित्य’ विषय पर उच्चतर शोध प्रस्तुत किया। उनके नाम से उपलब्ध 2017 का सहलेखित शोध-लेख बाबुरी शासन में भक्ति साहित्य और संस्कृति के लिए समावेशी नीति का साहित्यिक अध्ययन करता है, जबकि 2022 की प्रविष्टियाँ उज़्बेकिस्तान में हिन्दी भाषा-साहित्य तथा भक्ति-काव्य के अनुवाद की समस्याओं पर उनके निरंतर चिंतन की पुष्टि करती हैं।
यह आलेख जीवनीपरक प्रशस्ति के बजाय प्रमाण-आधारित बौद्धिक मूल्यांकन प्रस्तुत करता है। इसमें प्रोफेसर मुखिबोवा के शोध की केंद्रीय अवधारणाओं—भक्ति, ब्रजभाषा, वार्ता, बाबुरी काल, सांस्कृतिक समावेशन और अनुवाद—को भारतीय साहित्येतिहास तथा मध्य एशियाई भारतविद्या के संदर्भ में समझा गया है। अध्ययन के प्राथमिक स्रोतों में ताशकंद स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ ओरिएंटल स्टडीज़ की 70वीं जन्म-जयंती संबंधी आधिकारिक सम्मेलन-विज्ञप्ति, उपलब्ध परिचय-संकलन, डॉ. मनीष कुमार सी. मिश्रा द्वारा लिया गया 2025 का वीडियो-साक्षात्कार और 2024–25 का प्रत्यक्ष अकादमिक सहकार्य शामिल हैं। जहाँ मूल प्रकाशन का पूर्ण पाठ उपलब्ध नहीं है, वहाँ केवल सत्यापित ग्रंथसूची-सूचना का उपयोग किया गया है; किसी अनुपलब्ध कथन, निष्कर्ष या पुरस्कार-विवरण का अनुमान नहीं लगाया गया। अध्ययन का निष्कर्ष है कि मुखिबोवा का योगदान तीन परस्पर संबद्ध स्तरों पर देखा जाना चाहिए: मध्यकालीन हिन्दी ग्रंथों का ऐतिहासिक-पाठपरक अध्ययन, भारतीय साहित्य का उज़्बेक ज्ञान-क्षेत्र में अनुवाद और अध्यापन, तथा नई पीढ़ी के भारतविदों के लिए संस्थागत अकादमिक मार्गदर्शन।
बीज शब्द
उल्फतख़ोन मुखिबोवा, उज़्बेक भारतविद्या, भक्ति साहित्य, बाबुरी काल, मुगल काल, ब्रजभाषा, वार्ता साहित्य, हिन्दी अध्ययन, अनुवाद, अकादमिक मार्गदर्शन, ताशकंद
1 प्रस्तावना
भारतीय साहित्य का वैश्विक अध्ययन अक्सर अंग्रेज़ी, यूरोपीय विश्वविद्यालयों और प्रवासी भारतीय संस्थानों के संदर्भ में लिखा जाता है। इस प्रचलित मानचित्र में मध्य एशिया की भूमिका अपेक्षाकृत कम दिखाई देती है, जबकि उज़्बेकिस्तान में हिन्दी, उर्दू, संस्कृत, भारतीय इतिहास और साहित्य के अध्ययन ने कई दशकों में एक स्थायी संस्थागत रूप ग्रहण किया है। ताशकंद इस परंपरा का प्रमुख केंद्र रहा है। यहाँ भारतीय भाषाओं का अध्ययन केवल उपयोगितावादी भाषा-प्रशिक्षण तक सीमित नहीं रहा; शब्दकोश, व्याकरण, साहित्येतिहास, अनुवाद, शोध-प्रबंध, पाठ्यपुस्तक, सांस्कृतिक व्याख्या और राजनयिक संपर्क—इन सबने मिलकर भारतविद्या की बहुस्तरीय संरचना बनाई।
प्रोफेसर उल्फतख़ोन मुखिबोवा इसी परंपरा की वरिष्ठ विदुषी हैं। ताशकंद स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ ओरिएंटल स्टडीज़ की 70वीं जन्म-जयंती संबंधी आधिकारिक सूचना उन्हें ऐसी भारतविद के रूप में प्रस्तुत करती है जो भारतीय साहित्य, विशेषतः मध्यकालीन साहित्य और भक्ति परंपरा, पर चार दशकों से अधिक समय से शोधरत हैं। विज्ञप्ति का वाक्यांश है—“more than 40 years” [उद्धरण 1]। यह छोटा-सा तथ्य उनकी विद्वत्ता के काल-विस्तार को बताता है, किंतु उनके योगदान का मूल्य केवल सेवावधि से निर्धारित नहीं किया जा सकता। महत्त्वपूर्ण यह है कि उन्होंने किस साहित्यिक सामग्री को चुना, किन प्रश्नों के साथ पढ़ा, उसे उज़्बेक अकादमिक संसार तक कैसे पहुँचाया और उस अध्ययन को अगली पीढ़ी तक किस रूप में हस्तांतरित किया।
इस आलेख का केंद्रीय तर्क है कि मुखिबोवा की विद्वत्ता को ‘भक्ति साहित्य की विदेशी अध्येता’ जैसे सीमित पदबंध में बाँधना उचित नहीं होगा। उनके शोध का वास्तविक स्वरूप कम-से-कम चार वृत्तों में विस्तृत है। पहला, मध्यकालीन हिन्दी की भाषिक और गद्यात्मक संरचना का अध्ययन; दूसरा, बाबुरी या मुगलकालीन सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश में भक्ति साहित्य का पुनर्पाठ; तीसरा, हिन्दी और उज़्बेक भाषिक संसारों के बीच अनुवाद-संबंध; और चौथा, विश्वविद्यालय, शोधार्थी तथा पाठ्यसामग्री के माध्यम से अकादमिक परंपरा का निर्माण। ये चारों वृत्त अलग नहीं हैं। वार्ता साहित्य का अध्ययन उन्हें ब्रजभाषा, संप्रदाय, सामुदायिक स्मृति और गद्य-कथन तक ले जाता है; बाबुरी काल का अध्ययन भक्ति, सत्ता, बहुभाषिकता और समावेशन के प्रश्न उठाता है; अनुवाद का क्षेत्र अर्थ, रस, सांस्कृतिक संकेत और पाठक की ग्रहणशीलता से जुड़ता है; और अध्यापन इन सभी निष्कर्षों को जीवित ज्ञान में बदलता है।
2 शोध समस्या उद्देश्य और पद्धति
इस अध्ययन की पहली समस्या स्रोतों की असमान उपलब्धता है। प्रोफेसर मुखिबोवा के कुछ कार्य उज़्बेक, रूसी, हिन्दी और अंग्रेज़ी में अलग-अलग रूपों में उपलब्ध हैं; कुछ का केवल ग्रंथसूचीगत विवरण प्राप्त है। नाम की रोमन वर्तनी भी Ulpatkhon, Ulpathon या Mukhibova जैसे रूपों में मिलती है। अतः किसी एक वर्तनी के आधार पर खोज करने से अधूरी सूची बन सकती है। दूसरी समस्या यह है कि स्मृति-लेख और अभिनंदन-साहित्य प्रायः प्रशंसात्मक होता है; उसमें तथ्य और मूल्यांकन के बीच पर्याप्त अंतर न रहे तो शोध-आलेख अनजाने में अतिशयोक्ति का रूप ले सकता है। तीसरी समस्या ‘बाबुरी काल’ की सीमा है। उज़्बेक शीर्षक “Бобурийлар даври” का शाब्दिक आशय बाबरवंशीय अथवा मुगल काल से है; इसे केवल बाबर के 1526–1530 के शासन तक सीमित करना उनके शोध-विषय को अनुचित रूप से संकुचित कर देगा।
इन समस्याओं को ध्यान में रखते हुए आलेख के उद्देश्य हैं: (1) मुखिबोवा के प्रमाणित शैक्षिक और प्रकाशन-संबंधी तथ्यों का संयमित पुनर्निर्माण; (2) वार्ता साहित्य और बाबुरी काल के भक्ति साहित्य के बीच उनके शोध की बौद्धिक निरंतरता की व्याख्या; (3) भक्ति को धार्मिक अनुभूति के साथ भाषा, समाज, संस्कृति और संवाद की प्रक्रिया के रूप में समझना; (4) अनुवाद और उज़्बेक पाठक के संदर्भ में उनके काम का महत्त्व रेखांकित करना; तथा (5) अकादमिक मार्गदर्शन को व्यक्तिगत गुरुता के बजाय ज्ञान-परंपरा, पाठ्यचर्या और संस्थागत उत्तराधिकार की प्रक्रिया के रूप में देखना।
पद्धति की दृष्टि से यह अध्ययन ऐतिहासिक-वर्णनात्मक, पाठपरक और तुलनात्मक है। प्राथमिक सामग्री में विश्वविद्यालय की आधिकारिक सम्मेलन-विज्ञप्ति, “उज़्बेकिस्तान के हिन्दी उस्ताद” शीर्षक परिचय-संकलन, 24 जनवरी 2025 को प्रकाशित 36 मिनट 54 सेकंड का वीडियो-साक्षात्कार और लेखक डॉ. मनीष कुमार सी. मिश्रा का 2024–25 में ICCR हिन्दी चेयर पर कार्य करते समय का प्रत्यक्ष अकादमिक सहकार्य शामिल है। साक्षात्कार की ऑनलाइन स्वचालित प्रतिलिपि उपलब्ध न होने के कारण इस आलेख में केवल उसके सत्यापित शीर्षक, प्रकाशन-विवरण और वीडियो-विवरण में लिखित तथ्यों का उपयोग किया गया है। मौखिक कथन का शब्दशः उद्धरण तभी किया जाना चाहिए जब सुनकर पुनः सत्यापन किया जा सके; इसलिए यहाँ कोई अनुमानित संवाद उद्धृत नहीं है। द्वितीयक सामग्री में Google Books की ग्रंथसूची, Google Scholar की प्रकाशन-प्रविष्टियाँ, मध्यकालीन इतिहास और भक्ति साहित्य के मान्य अध्ययन तथा मूल भक्तिपाठ सम्मिलित हैं।
यहाँ ‘सहभागी अकादमिक अवलोकन’ का आशय यह नहीं है कि निजी परिचय अपने-आप प्रमाण बन जाता है। इसका अर्थ केवल इतना है कि लेखक ने संबंधित विश्वविद्यालयी वातावरण, हिन्दी-अध्यापन की परिस्थितियों और विदुषी की अकादमिक उपस्थिति को निकट से देखा। जहाँ विशिष्ट घटना या कथन लिखित स्रोत में नहीं है, वहाँ उसे तथ्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया। यह सावधानी विशेष रूप से आवश्यक है क्योंकि किसी जीवित विदुषी पर लिखा लेख सम्मान और आलोचनात्मक विवेक—दोनों की माँग करता है।
3 उज़्बेकिस्तान में हिन्दी और भारतीय साहित्य अध्ययन की पृष्ठभूमि
उज़्बेकिस्तान में भारत के प्रति सांस्कृतिक रुचि के कई ऐतिहासिक आधार हैं। मध्य एशिया और भारतीय उपमहाद्वीप के बीच व्यापार, यात्राएँ, फ़ारसी और तुर्की भाषिक संपर्क, सूफी परंपराएँ तथा बाबर का जीवन और लेखन इस संबंध की दीर्घ पृष्ठभूमि बनाते हैं। आधुनिक काल में रूसी और सोवियत प्राच्यविद्या ने भारतीय भाषाओं के व्यवस्थित अध्ययन के लिए विश्वविद्यालयीय ढाँचा प्रदान किया। हिन्दी फिल्मों, साहित्यिक अनुवादों और भारत-सोवियत सांस्कृतिक संपर्क ने सामान्य पाठक की रुचि को बढ़ाया। इस व्यापक संदर्भ में ताशकंद के विद्वानों ने भाषा-विज्ञान, शब्दकोश, अनुवाद और साहित्यिक अध्ययन की अलग-अलग धाराएँ विकसित कीं।
उपलब्ध परिचय-संकलन में रहमानबेर्दी मुहम्मदजानोव, तशमिर्जा खलमुर्जायेव, तमारा खोजाएवा, फतिह तेशाबायेव, आज़ाद शमातोव, शीरीन जलिलोवा, खानजरिफ़ा बेगिज़ोवा, उल्फत मुखिबोवा, मक्तुबा मुर्तज़खोद्जायवा और कमोला रहमतजोनोवा जैसे विद्वानों का उल्लेख है। इस सूची को पूर्ण इतिहास नहीं माना जा सकता, पर यह स्पष्ट करती है कि ताशकंद की भारतविद्या किसी एक व्यक्ति का कार्य नहीं, बल्कि पीढ़ियों में विकसित सामूहिक परंपरा है। किसी ने हिन्दी-उर्दू व्याकरण और कोश पर काम किया, किसी ने अमृता प्रीतम या भारतीय संस्कृति पर, किसी ने दक्खिनी पर, किसी ने अनुवाद और भाषा-शिक्षण पर। मुखिबोवा का विशिष्ट स्थान इस समूह में मध्यकालीन हिन्दी, ब्रजभाषा और भक्ति साहित्य की विशेषज्ञता से बनता है।
ऐसी बहुभाषिक अकादमिक परंपरा में हिन्दी साहित्य पढ़ाना भारत के विश्वविद्यालय में हिन्दी पढ़ाने से भिन्न है। विद्यार्थी की मातृभाषा उज़्बेक या रूसी हो सकती है; उसे देवनागरी, सांस्कृतिक इतिहास, धार्मिक शब्दावली, छंद, लोक-संकेत और मध्यकालीन भाषा-रूप एक साथ समझने पड़ते हैं। ‘राम’, ‘कृष्ण’, ‘निर्गुण’, ‘सगुण’, ‘लीला’, ‘नाम’, ‘संत’, ‘गुरु’, ‘विरह’ और ‘दर्शन’ जैसे शब्द केवल कोशार्थ से नहीं खुलते। शिक्षक को अर्थ के साथ अनुभव-संरचना और ऐतिहासिक संदर्भ भी समझाना पड़ता है। यही कारण है कि विदेश में भक्ति साहित्य का अध्यापन स्वभावतः तुलनात्मक और व्याख्यात्मक बन जाता है। मुखिबोवा की शोध-दिशा इस जटिल शिक्षण आवश्यकता के अनुकूल दिखाई देती है।
4 प्रमाणित अकादमिक परिचय
उपलब्ध परिचय-संकलन के अनुसार उल्फत मुहिबोवा उचकुनोव्ना का जन्म 13 नवंबर 1956 को ताशकंद में हुआ। उसी स्रोत में उनके दो प्रमुख शोध-विषय इस प्रकार दर्ज हैं—“17वीं शताब्दी के ब्रज साहित्य में गद्य शैली ‘वार्ता’” और “बाबुरी काल का भक्ति साहित्य” [उद्धरण 2]। पहला शोध 1995 और दूसरा 2015 से संबद्ध बताया गया है। Google Books पर 2015 में प्रकाशित डॉक्टरेट शोध-सार का उज़्बेक शीर्षक “Бобурийлар даври бҳакти адабиёти” और लेखक का नाम “Мухибова Ульпатхон Учкуновна” मिलता है। यह स्वतंत्र ग्रंथसूची-साक्ष्य दूसरे शोध-विषय की पुष्टि करता है।
परिचय-संकलन में उनके पाँच मोनोग्राफ, पाँच पाठ्यपुस्तक/प्रशिक्षण मैनुअल, लगभग 140 शोध-लेख और अनेक अनुवादों का उल्लेख है। आधिकारिक सम्मेलन-विज्ञप्ति उनके चालीस वर्ष से अधिक के शोध और शिक्षण को रेखांकित करती है तथा भारतीय साहित्य अध्ययन और युवा विशेषज्ञों के प्रशिक्षण में उनके योगदान को सम्मेलन का आधार बनाती है। इन दोनों स्रोतों का संयुक्त संकेत यह है कि उनकी विद्वत्ता केवल शोध-प्रबंध तक सीमित नहीं रही; उसने प्रकाशन, शिक्षण और मार्गदर्शन के रूप ग्रहण किए। तथापि शीर्षकों की पूर्ण आधिकारिक सूची उपलब्ध न होने के कारण प्रत्येक पुस्तक का नाम अनुमान से देना उचित नहीं है।
उनकी सार्वजनिक रूप से खोजी जा सकने वाली कुछ प्रविष्टियाँ शोध-दिशा को और स्पष्ट करती हैं। 2017 में M. U. Uchkunovna और J. Ambrewadikar के नाम से “Inclusive Policy in Baburid Reign for Bhakti Literature and Culture: A Study through Literary Perspective” [उद्धरण 3] शीर्षक लेख Journal of Exclusion Studies, खंड 7, अंक 1, पृष्ठ 151–162 में दर्ज है। 2022 की एक प्रविष्टि “Uzbekistan me Hindi bhasha aur sahitya” [उद्धरण 4] पुस्तक भारती रिसर्च जर्नल में पृष्ठ 28–34 के साथ मिलती है। उसी वर्ष उज़्बेक शीर्षक “БҲАКТИ ШЕЪРИЯТИ ТАРЖИМАСИДАГИ МУАММОЛАР” [उद्धरण 5] अर्थात भक्ति-कविता के अनुवाद की समस्याएँ, Oriental Renaissance नामक शोध-पत्रिका से संबद्ध दिखाई देता है। इन शीर्षकों से सावधानीपूर्वक इतना निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि उनका शोध इतिहास, साहित्य, समावेशन, भाषा-प्रसार और अनुवाद के संगम पर स्थित है। पूर्ण पाठ देखे बिना इन लेखों के विशिष्ट निष्कर्षों का दावा करना उचित नहीं होगा।
5 भक्ति की अवधारणा और मुखिबोवा के अध्ययन का वैचारिक आधार
भक्ति को केवल ईश्वर के प्रति भावुक समर्पण मानने से मध्यकालीन साहित्य की बहुस्तरीयता पकड़ में नहीं आती। भारतीय दार्शनिक परंपरा में भक्ति की संक्षिप्त परिभाषा नारद भक्ति सूत्र में मिलती है—“सा त्वस्मिन् परमप्रेमरूपा” [उद्धरण 6], अर्थात वह परमात्मा के प्रति परम प्रेम का रूप है। अगले सूत्र का “अमृतस्वरूपा च” इस प्रेम को मुक्ति और अमरत्व के अनुभव से जोड़ता है। यहाँ प्रेम साधन भी है और मूल्य भी। वह केवल कर्मकांड नहीं, मनुष्य की चेतना का रूपांतरण है।
भगवद्गीता भक्ति को समता के सिद्धांत से जोड़ती है—“समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः” [उद्धरण 7]। इसका आशय है कि परम सत्ता सभी प्राणियों में सम है; कोई उसका स्वभावतः द्वेष्य या प्रिय नहीं। भागवत परंपरा में भक्ति का सर्वोच्च धर्म वह है जो निष्काम और अविच्छिन्न हो—“अहैतुक्यप्रतिहता ययात्मा सुप्रसीदति” [उद्धरण 8]। इन सूत्रों का साहित्यिक रूपांतरण संत और भक्त कवियों के यहाँ अनेक रूपों में हुआ। निर्गुण संत बाहरी भेद, जाति और रूढ़ि पर प्रश्न करते हैं; सगुण कवि ईश्वर को मानवीय संबंधों—माता, बालक, मित्र, प्रिय, स्वामी—में अनुभव करते हैं; वैष्णव वार्ता ग्रंथ भक्त-समुदाय की स्मृतियों, आचार और लीला को कथा-गद्य में सुरक्षित करते हैं।
मुखिबोवा के अध्ययन की विशेषता यही हो सकती है कि वह भक्ति को एक साथ विचार, भाषा, काव्य और समुदाय के रूप में ग्रहण करता है। उनके प्रारंभिक शोध का ‘वार्ता’ पर होना महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि वार्ता काव्यशास्त्रीय पद नहीं मात्र, बल्कि भक्तों के जीवन और संप्रदाय की स्मृति को गद्य-कथा में संगठित करने वाली विधा है। बाद का शोध बाबुरी काल के व्यापक भक्ति साहित्य पर है। इस क्रम में सूक्ष्म विधागत अध्ययन से व्यापक साहित्येतिहास की ओर गति दिखाई देती है। पहले स्तर पर प्रश्न है कि ब्रज गद्य कैसे बनता है; दूसरे स्तर पर प्रश्न है कि वही धार्मिक-सांस्कृतिक संसार बाबुरी सत्ता, बहुभाषिक समाज और व्यापक भक्ति आंदोलन के बीच कैसे स्थित है।
6 सत्रहवीं शताब्दी का ब्रज गद्य और वार्ता साहित्य
हिन्दी साहित्य का लोकप्रिय इतिहास प्रायः मध्यकाल को पद्यप्रधान मानता है। कबीर की साखियाँ, सूर के पद, तुलसी का रामचरितमानस, मीरा के भजन और रहीम के दोहे स्मृति में तुरंत आते हैं। इसके कारण गद्य की परंपरा कभी-कभी ओझल हो जाती है। किंतु धार्मिक संप्रदायों, टीकाओं, वंशावलियों और वार्ताओं ने गद्य के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। पुष्टिमार्गीय परंपरा की ‘चौरासी वैष्णवन की वार्ता’ और ‘दो सौ बावन वैष्णवन की वार्ता’ भक्तों के जीवन, गुरु-संपर्क, सेवा, चमत्कार, आचार और समुदाय की स्मृतियों को कथा में विन्यस्त करती हैं। इनके पाठ-इतिहास और लेखकीय स्तरों पर विद्वानों में मतभेद हो सकते हैं; इसलिए इन्हें एक क्षण में लिखे आधुनिक जीवनी-संग्रह की तरह पढ़ना अनुचित होगा।
वार्ता की शैली में घटना, संवाद, धार्मिक व्याख्या और सामुदायिक आदर्श एक साथ आते हैं। पात्र का जीवन केवल निजी इतिहास नहीं रहता; वह आचरण का उदाहरण बनता है। भाषा में ब्रजभाषा के साथ बोलचाल, संप्रदाय-विशेष की शब्दावली और कभी-कभी फ़ारसी या अन्य संपर्क-भाषाओं के प्रभाव दिखाई दे सकते हैं। गद्य की वाक्य-संरचना, क्रियापद, संयोजक, कथोपकथन और पुनरावृत्ति उस काल की भाषिक स्थिति समझने में सहायक हैं। मुखिबोवा द्वारा ‘गद्य शैली वार्ता’ को शोध-विषय चुनना इस कारण दूरदर्शी था कि इससे साहित्यिक विधा, भाषा-इतिहास और धार्मिक समुदाय—तीनों का संयुक्त अध्ययन संभव होता है।
वार्ता साहित्य आधुनिक अर्थ में निष्पक्ष इतिहास नहीं है। उसमें श्रद्धा और चमत्कार की संरचना होती है। किंतु इसी कारण वह अनुपयोगी नहीं हो जाता। इतिहासकार और साहित्य-अध्येता उससे समुदाय की आत्म-छवि, गुरु-शिष्य संबंध, सेवा-पद्धति, स्त्री-पुरुष भक्तों की भूमिकाएँ, यात्रा, भोजन, वस्त्र, सामाजिक संबोधन और भाषिक व्यवहार के संकेत पढ़ सकते हैं। पाठ को न तो अक्षरशः इतिहास मानना चाहिए, न केवल कल्पना कहकर छोड़ देना चाहिए। मुखिबोवा की भाषाशास्त्रीय पृष्ठभूमि ऐसी संतुलित पाठ-पद्धति के लिए उपयुक्त आधार देती है।
ब्रजभाषा स्वयं इस अध्ययन का केंद्रीय तत्व है। वह किसी छोटे भूभाग की बंद बोली नहीं रही; कृष्णभक्ति, संगीत, दरबार और साहित्यिक प्रतिष्ठा के कारण उत्तर भारत के विस्तृत क्षेत्र में काव्यभाषा बनी। उज़्बेक विद्यार्थी के लिए ब्रजभाषा पढ़ना आधुनिक मानक हिन्दी से भिन्न व्याकरण, सर्वनाम, क्रियारूप और ध्वनि-रूप सीखना है। अतः वार्ता का अध्ययन केवल अतीत की खोज नहीं, शिक्षण-पद्धति की चुनौती भी है। यदि शोधकर्ता रूप-सूची, वाक्य-विन्यास, सांस्कृतिक शब्दकोश और प्रसंग-व्याख्या विकसित करता है तो वह पाठ को विदेशी विद्यार्थी के लिए सुगम बनाता है। यही वह बिंदु है जहाँ मुखिबोवा की शोधकर्ता और अध्यापक की भूमिकाएँ परस्पर मिलती हैं।
7 बाबुरी काल और भक्ति साहित्य का ऐतिहासिक सहअस्तित्व
‘बाबुरी काल’ को समझने के लिए काल-सीमा स्पष्ट करना आवश्यक है। बाबर ने 1526 में उत्तर भारत में सत्ता स्थापित की और 1530 में उसकी मृत्यु हुई। पर उज़्बेक और मध्य एशियाई इतिहासलेखन में बाबर से आरंभ वंश को बाबुरी कहा जाना स्वाभाविक है; भारतीय इतिहास में वही राजवंश सामान्यतः मुगल कहलाता है। इसलिए “बाबुरी काल का भक्ति साहित्य” शीर्षक का अर्थ बाबर के चार वर्ष नहीं, बाबरवंशीय शासन के व्यापक काल में विकसित भक्ति साहित्य है। Google Books पर उपलब्ध उज़्बेक शोध-सार का शीर्षक भी इसी व्यापक अर्थ की ओर संकेत करता है।
यह काल भारतीय भाषाओं और धार्मिक धाराओं की असाधारण सक्रियता का समय था। कबीर की मृत्यु-तिथि पर मतभेद है, पर उनकी वाणी की व्यापक परंपरा सोलहवीं-सत्रहवीं शताब्दियों में पांडुलिपियों और संप्रदायों में स्थिर हुई। गुरु नानक, सूरदास, वल्लभाचार्य, चैतन्य, मीराबाई, तुलसीदास, दादूदयाल, रहीम, रसखान, गुरु अर्जन और अनेक क्षेत्रीय संत इसी विस्तृत समय-क्षेत्र से जुड़े हैं। इन रचनाकारों की भाषाएँ, मत और सामाजिक स्थितियाँ एक जैसी नहीं थीं। ‘भक्ति आंदोलन’ का एकवचन उपयोग सुविधाजनक है, किंतु उसके भीतर निर्गुण-सगुण, राम-कृष्ण, संत-वैष्णव, गृहस्थ-विरक्त, लोक-संस्कृत और विभिन्न क्षेत्रीय परंपराओं के अंतर बने रहते हैं।
बाबुरी शासन और भक्ति साहित्य के संबंध को सरल कारण-कार्य सूत्र में नहीं बाँधना चाहिए। यह कहना अतिशयोक्ति होगा कि किसी एक शासक-नीति ने भक्ति को जन्म दिया; दक्षिण भारत और अन्य क्षेत्रों की भक्ति परंपराएँ इससे बहुत पुरानी हैं। उतना ही अधूरा यह कहना होगा कि राजसत्ता और लोकभक्ति का कोई संबंध नहीं था। राजनीतिक स्थिरता या संघर्ष, नगरों का विकास, यात्रा-पथ, राजस्व व्यवस्था, तीर्थ, दरबार, पांडुलिपि-निर्माण, भाषाई संपर्क और धार्मिक नीति—ये सभी साहित्यिक संचार को प्रभावित कर सकते हैं। मुखिबोवा का 2017 का लेख-शीर्षक ‘Inclusive Policy’ इसी संबंध को साहित्यिक दृष्टि से देखने का संकेत देता है।
अकबर के शासन में तीर्थ-कर और जज़िया हटाने, विभिन्न धार्मिक विद्वानों से संवाद और सुल्ह-ए-कुल की धारणा पर इतिहासकारों ने विस्तार से लिखा है। फिर भी ‘समावेशन’ को केवल शाही उदारता का पर्याय बनाना पर्याप्त नहीं। साहित्यिक क्षेत्र का समावेशन भाषा और पात्रों में भी दिखाई देता है। रसखान का कृष्णप्रेम, रहीम का लोकनीतिपरक हिन्दी काव्य, गुरु ग्रंथ साहिब में विभिन्न संत-वाणियों का संकलन और भक्ति कवियों की जाति-विरोधी उक्तियाँ ऐसी सांस्कृतिक प्रक्रियाएँ हैं जिन्हें दरबारी नीति से स्वतंत्र सामाजिक ऊर्जा भी प्राप्त थी। रहीम का प्रसिद्ध दोहा—“रहिमन धागा प्रेम का मत तोरो चटकाय; टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ पड़ जाय” [उद्धरण 9]—प्रेम को सामाजिक संबंध की नाजुक नैतिकता में बदल देता है। यह दरबारी और लोकभाषिक संसार के बीच सेतु का उदाहरण है।
8 निर्गुण और सगुण परंपराओं का बहुवचन
भक्ति साहित्य की व्याख्या में निर्गुण और सगुण का विभाजन उपयोगी है, पर पूर्ण नहीं। कबीर के यहाँ निर्गुण ईश्वर, नाम, गुरु, अनुभव और सामाजिक आलोचना एक साथ आते हैं। “पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय; ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय” [उद्धरण 10] ज्ञान के विरोध में अज्ञान का समर्थन नहीं, बल्कि जीवित अनुभव से कटे ज्ञान-अहंकार की आलोचना है। विदेशी विद्यार्थी के लिए इस दोहे की कठिनाई केवल शब्दार्थ नहीं; ‘पंडित’ का सामाजिक-सांस्कृतिक अर्थ, ‘ढाई आखर’ की लोकोक्ति और प्रेम की आध्यात्मिकता भी समझानी पड़ती है।
रैदास की बेगमपुरा कल्पना भक्ति की सामाजिक आकांक्षा को सामने लाती है—“बेगमपुरा सहर को नाउ। दूखु अंदोहु नहीं तिहि ठाउ” [उद्धरण 11]। गुरु ग्रंथ साहिब में सुरक्षित यह पद ऐसे नगर की कल्पना करता है जहाँ दुःख, कर-भय और सामाजिक अधीनता नहीं। इसे आधुनिक संविधान का सीधा पूर्वरूप कहना ऐतिहासिक सरलीकरण होगा, किंतु समानता, निर्भयता और गरिमा की काव्यात्मक चाह के रूप में इसका अध्ययन आवश्यक है। बाबुरी कालीन सत्ता-संरचना के समानांतर ऐसी वाणी समाज के वैकल्पिक नैतिक मानचित्र बनाती है।
सगुण परंपरा में मीरा का पद—“मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई” [उद्धरण 12]—एकनिष्ठ भक्ति का उद्घोष है, पर उसके साहित्यिक अर्थ में स्त्री की आत्मवाणी, कुल-मर्यादा से संघर्ष और निजी आध्यात्मिक चुनाव भी सम्मिलित हैं। सूरदास की पंक्ति “अविगत गति कछु कहत न आवै” [उद्धरण 13] निर्गुण की अकथनीयता स्वीकारते हुए आगे सगुण लीला के अनुभव की ओर बढ़ती है। तुलसीदास कहते हैं—“सियाराममय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी” [उद्धरण 14]। यहाँ जगत में ईश्वर की सर्वव्याप्ति सामाजिक व्यवहार को नम्रता की दिशा देती है। इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि भक्ति केवल सिद्धांत नहीं; वह काव्य-भाषा, संबोधन और आत्म-अभिव्यक्ति की नई संभावनाएँ खोलती है।
मुखिबोवा का बाबुरी काल संबंधी अध्ययन इस बहुवचन को समेटने की क्षमता रखता है। मध्य एशियाई शोधकर्ता के लिए बाबर एक ऐतिहासिक रूप से निकट व्यक्तित्व है; भारत में उसके वंश के दौरान रचित भक्ति साहित्य दूसरी सांस्कृतिक भूमि की अभिव्यक्ति है। दोनों को साथ पढ़ने से ‘अपना’ और ‘पराया’ का द्वैत टूटता है। बाबर का मध्य एशियाई मूल और भारतीय राजवंश, फ़ारसी-तुर्की दरबारी संसार और अवधी-ब्रज-संतभाषा का लोक-साहित्य—ये सभी अंतःसंबंधित इतिहास के भाग बनते हैं। यह दृष्टि भारतविद्या को बाहरी पर्यवेक्षण से आगे ले जाकर साझे एशियाई इतिहास की खोज बनाती है।
9 भाषा लोक और सांस्कृतिक लोकतंत्रीकरण
भक्ति साहित्य ने संस्कृत को नकारकर ही अपनी पहचान नहीं बनाई; उसने संस्कृत, अपभ्रंश, क्षेत्रीय भाषाओं, फ़ारसी-अरबी शब्दावली और लोकवाणी के बीच नए संयोजन निर्मित किए। कबीर की भाषा को किसी एक आधुनिक भाषा की सीमा में रखना कठिन है। तुलसी की अवधी में संस्कृतनिष्ठ और लोकप्रचलित दोनों स्तर हैं। सूर और पुष्टिमार्गीय साहित्य में ब्रजभाषा भाव, संगीत और सिद्धांत की समर्थ भाषा बनती है। गुरु ग्रंथ साहिब बहुभाषिक संतवाणी को गुरुमुखी लिपि में संगृहीत करता है। इस बहुभाषिकता का अध्ययन आधुनिक राष्ट्रभाषा की सीमाओं से परे जाकर करना पड़ता है।
विदेशी कक्षा में यही बहुभाषिकता चुनौती और अवसर दोनों है। विद्यार्थी जब ‘नाम’, ‘राम’, ‘हरि’ या ‘साहिब’ पढ़ता है, तो हर शब्द के धर्मशास्त्रीय, काव्यात्मक और लोकप्रचलित अर्थ अलग-अलग खुलते हैं। अनुवाद यदि हर पद को केवल ‘God’ या उसके उज़्बेक पर्याय से बदल दे, तो संप्रदायगत संकेत मिट सकते हैं। दूसरी ओर शब्द को बिना अर्थ खोले जस का तस छोड़ देने पर पाठक दूर रह जाता है। अध्यापक को लिप्यंतरण, शब्दार्थ, सांस्कृतिक टिप्पणी, प्रसंग और काव्यानुभूति का संतुलन बनाना पड़ता है।
मुखिबोवा के 2022 के भक्ति-कविता अनुवाद संबंधी शीर्षक से स्पष्ट है कि उन्होंने इस समस्या को स्वतंत्र शोध-विषय माना। भक्ति-काव्य में अनुवाद की कम-से-कम पाँच कठिनाइयाँ हैं। पहली, मध्यकालीन भाषारूप का आधुनिक हिन्दी में भी अपरिचय; दूसरी, धार्मिक शब्दों की संप्रदायगत अर्थच्छाया; तीसरी, छंद, लय और गेयता; चौथी, लोक-सांस्कृतिक प्रतीक; और पाँचवीं, वक्ता की भाव-स्थिति—दास्य, सख्य, वात्सल्य, माधुर्य, विरह या निर्गुण अनुभव। शब्दशः अनुवाद अर्थ बचा सकता है पर रस खो सकता है; मुक्त अनुवाद रस का आभास दे सकता है पर ऐतिहासिक विशिष्टता मिटा सकता है। समाधान बहुस्तरीय प्रस्तुति में है: मूल पाठ, लिप्यंतरण, शाब्दिक अनुवाद, साहित्यिक अनुवाद और संक्षिप्त सांस्कृतिक टिप्पणी।
यहाँ अकादमिक मार्गदर्शन का अर्थ भी स्पष्ट होता है। एक अनुभवी शिक्षक विद्यार्थी को केवल ‘सही अर्थ’ नहीं देता; वह उसे अर्थ-निर्णय की प्रक्रिया सिखाता है। किस पाठांतर को चुना गया? शब्द का समकालीन अर्थ क्या था? क्या अनुवाद में ईसाई, इस्लामी या आधुनिक धर्मनिरपेक्ष शब्दावली अनजाने में भारतीय अवधारणा पर आरोपित हो रही है? क्या कविता की स्त्री-वाणी को केवल आत्मा-परमात्मा रूपक कह देने से उसका सामाजिक तनाव दब रहा है? ऐसे प्रश्न शोधार्थी को अनुवादक से आलोचक बनाते हैं।
10 समावेशन की साहित्यिक अवधारणा
मुखिबोवा और उनके सहलेखक के 2017 के लेख में ‘Inclusive Policy’ और ‘literary perspective’ शब्द साथ आते हैं। केवल शीर्षक के आधार पर लेख के सभी निष्कर्ष बताना संभव नहीं, पर शीर्षक स्वयं एक महत्त्वपूर्ण पद्धतिगत संकेत देता है: राजनीतिक नीति का अध्ययन साहित्य के माध्यम से करना। साहित्य राजकीय आदेश की प्रतिलिपि नहीं होता। वह नीति के सामाजिक प्रभाव, विरोध, सीमाएँ और वैकल्पिक नैतिकता को अनुभवात्मक रूप देता है।
समावेशन को तीन स्तरों पर समझा जा सकता है। पहला, राजकीय स्तर—धार्मिक समुदायों, तीर्थों, करों और संवाद के प्रति नीति। दूसरा, सामाजिक स्तर—जाति, पेशा, लिंग, संप्रदाय और स्थानीय समुदायों के बीच व्यवहार। तीसरा, साहित्यिक स्तर—कौन-सी भाषा प्रतिष्ठित होती है, किसकी वाणी ग्रंथ में स्थान पाती है, कौन-सा पात्र आध्यात्मिक अधिकार प्राप्त करता है। भक्ति साहित्य में निम्न माने गए समुदायों के संतों, स्त्रियों और लोकभाषाओं की उपस्थिति साहित्यिक समावेशन का रूप है, भले ही वास्तविक समाज तत्काल समान न हुआ हो।
तुलसीदास की पंक्ति “परहित सरिस धरम नहि भाई। परपीड़ा सम नहि अधमाई” [उद्धरण 15] धर्म को दूसरे के हित और पीड़ा के नैतिक मानदंड से जोड़ती है। इसे समूचे ग्रंथ का एकमात्र सामाजिक निष्कर्ष मानना उचित नहीं, पर यह लोकनैतिकता का शक्तिशाली सूत्र है। इसी तरह कबीर, रैदास और दादू की वाणी सामाजिक पदानुक्रम से असहमति के विभिन्न रूप प्रकट करती है। वैष्णव वार्ताएँ समुदाय की सीमा भी बनाती हैं और विविध सामाजिक पृष्ठभूमियों से आए भक्तों को साझा कथा में स्थान भी देती हैं। समावेशन इसलिए निष्कलंक उपलब्धि नहीं, सतत विवाद और बातचीत की प्रक्रिया है।
बाबुरी काल का साहित्यिक अध्ययन यह भी दिखा सकता है कि सत्ता की भाषा और समाज की भाषा अलग होते हुए संवाद करती हैं। फ़ारसी प्रशासन और इतिहासलेखन की प्रमुख भाषा थी; तुर्की बाबर की आत्म-अभिव्यक्ति की भाषा थी; संस्कृत की शास्त्रीय परंपरा कायम थी; अवधी, ब्रज, पंजाबी, राजस्थानी और अन्य भाषाएँ साहित्य और लोकजीवन में सक्रिय थीं। अनुवाद-परियोजनाएँ, दरबारी संरक्षण, सूफी खानकाहें, मंदिर और तीर्थ, संप्रदाय तथा गायन-परंपराएँ अलग संस्थागत मार्ग थे। इस बहुकेन्द्रीयता को समझे बिना ‘मुगल काल’ या ‘भक्ति काल’ दोनों एकरेखीय हो जाते हैं। मुखिबोवा की शोध-दृष्टि का महत्त्व इसी संभावित बहुकेन्द्रीय पठन में है।
11 भारतीय और मध्य एशियाई दृष्टियों का संवाद
भारतीय अध्येता भक्ति साहित्य को अपने सांस्कृतिक परिवेश की परिचित सामग्री मान सकता है; मध्य एशियाई अध्येता के लिए वही सामग्री तुलनात्मक प्रश्न खोलती है। सूफी प्रेम, गुरु-मुरीद संबंध, स्मरण, संगीत, विरह और ईश्वर से निजी संबोधन जैसी संरचनाएँ कुछ समानताएँ प्रस्तुत करती हैं। पर समानता का अर्थ अभिन्नता नहीं। भक्ति और सूफी परंपराओं की दार्शनिक, संस्थागत और भाषिक विशिष्टताएँ हैं। तुलनात्मक अध्ययन तभी फलदायी है जब वह सतही ‘दोनों प्रेम सिखाते हैं’ से आगे जाकर शब्द, अभ्यास, इतिहास और समुदाय के अंतर भी देखे।
उज़्बेक साहित्य में अलीशेर नवोई की प्रतिष्ठा, फ़ारसी-तुर्की काव्य परंपरा, सूफी संकेत और बहुभाषिक लेखन का इतिहास भारतीय भक्ति को ग्रहण करने के लिए समृद्ध तुलनात्मक धरातल देता है। ब्रजभाषा की साहित्यिक प्रतिष्ठा की तुलना चगताई तुर्की के सांस्कृतिक उत्थान से की जा सकती है, यद्यपि दोनों की ऐतिहासिक परिस्थितियाँ भिन्न हैं। एक क्षेत्रीय भाषारूप किस प्रकार व्यापक साहित्यिक संसार बनाता है, कैसे धार्मिक और दरबारी आश्रय उसके विकास को प्रभावित करते हैं, और अनुवाद में सांस्कृतिक स्मृति कैसे स्थानांतरित होती है—ये साझा प्रश्न हैं।
मुखिबोवा की विद्वत्ता का अंतरराष्ट्रीय महत्त्व इसी मध्यस्थ स्थिति से उपजता है। वे भारतीय साहित्य को उज़्बेक पाठक के लिए समझाती हैं, किंतु साथ ही भारतीय अध्येता को यह देखने का अवसर देती हैं कि उसका साहित्य बाहर से कैसा पढ़ा जाता है। बाहरी दृष्टि अपरिचित प्रश्न उठा सकती है: भारतीय साहित्येतिहास ने बाबरवंशीय मध्य एशियाई संबंधों को कितना स्थान दिया? भक्ति के अनुवाद में भारतीय विद्वान कौन-से सांस्कृतिक अर्थ स्वतः मान लेते हैं? ब्रज गद्य की व्याख्या आधुनिक मानक हिन्दी के प्रभुत्व से कैसे प्रभावित होती है? इस प्रकार विदेशी भारतविद्या केवल भारतीय ज्ञान का उपभोग नहीं, उसकी आलोचनात्मक पुनर्रचना भी है।
12 अकादमिक मार्गदर्शन की परंपरा
ताशकंद विश्वविद्यालय की सम्मेलन-विज्ञप्ति का विषय “Bridging Generations through Scholarly Legacy: The Tradition of Academic Mentorship” [उद्धरण 16] है। यह शीर्षक जीवनी से अधिक एक संस्थागत प्रश्न उठाता है: विद्वान का ज्ञान अगली पीढ़ी तक कैसे पहुँचता है? अकादमिक मार्गदर्शन केवल शोध-प्रबंध पर हस्ताक्षर या प्रशासनिक पर्यवेक्षण नहीं। उसमें विषय-चयन, स्रोत-पहचान, भाषा-प्रशिक्षण, पद्धतिगत अनुशासन, लेखन-संशोधन, प्रकाशन-नीति, नैतिकता और पेशेवर आत्मविश्वास का निर्माण शामिल है।
मुखिबोवा के संदर्भ में मार्गदर्शन की पहली परत विषय-परंपरा है। वार्ता, ब्रजभाषा और भक्ति पर काम करने वाला वरिष्ठ विद्वान विद्यार्थियों को दुर्लभ या कठिन पाठों की ओर ले जाता है। इससे शोध केवल समकालीन लोकप्रिय विषयों तक सीमित नहीं रहता। दूसरी परत भाषिक है। उज़्बेक विद्यार्थी को हिन्दी के साथ ब्रज, अवधी, संतभाषा, संस्कृत पदावली और कभी-कभी फ़ारसी-अरबी शब्दों का प्रशिक्षण चाहिए। तीसरी परत तुलनात्मक है। विद्यार्थी को भारतीय स्रोत का उज़्बेक संदर्भ में अर्थ समझाना पड़ता है। चौथी परत प्रकाशन और प्रस्तुति की है—शोध को लेख, सम्मेलन-पत्र, पाठ्यपुस्तक या अनुवाद के रूप में सार्वजनिक करना।
आधिकारिक विज्ञप्ति में भारतीय साहित्य अध्ययन के विकास और युवा विशेषज्ञों के प्रशिक्षण में उनके योगदान का स्पष्ट उल्लेख है। उपलब्ध परिचय में पाँच पाठ्यपुस्तक/प्रशिक्षण मैनुअल का दावा भी इसी दिशा का संकेत देता है। पाठ्यपुस्तक अकादमिक उत्तराधिकार का महत्त्वपूर्ण माध्यम है क्योंकि वह शिक्षक की कक्षा से बाहर भी पद्धति और सामग्री को स्थिर करती है। विदेशी भाषा-परिस्थिति में अच्छी पाठ्यसामग्री विशेष रूप से जरूरी है; वह लिपि, व्याकरण, शब्दार्थ, सांस्कृतिक टिप्पणी और अभ्यास को विद्यार्थी की क्रमिक क्षमता के अनुसार व्यवस्थित करती है।
मार्गदर्शन का एक मानवीय पक्ष भी है, पर उसे प्रमाण के बिना भावुक आख्यान नहीं बनाना चाहिए। डॉ. मनीष कुमार सी. मिश्रा ने 2024–25 में ICCR हिन्दी चेयर के विजिटिंग प्रोफेसर के रूप में उसी विश्वविद्यालय में कार्य करते हुए मुखिबोवा के साथ अकादमिक सहकार्य किया और उनका साक्षात्कार लिया। यह सहकार्य भारतीय और उज़्बेक अध्यापकों के बीच ज्ञान-विनिमय का प्रत्यक्ष उदाहरण है। साक्षात्कार का सार्वजनिक प्रकाशन मार्गदर्शन की मौखिक परंपरा को डिजिटल अभिलेख में बदलता है। वरिष्ठ विदुषी का जीवन और शोध केवल स्थानीय स्मृति में नहीं रहता; हिन्दी जगत के विद्यार्थी और शोधकर्ता उसे सुन सकते हैं।
यह डिजिटल आयाम भविष्य में और विकसित किया जा सकता है। साक्षात्कार की प्रमाणित प्रतिलिपि, विषय-सूची और समय-चिह्न तैयार हों; प्रमुख पुस्तकों की द्विभाषी ग्रंथसूची बने; शोधार्थियों और सहकर्मियों की तथ्य-जाँची स्मृतियाँ संकलित हों; तथा वार्ता और भक्ति पर उनके पाठ्य-व्याख्यान संरक्षित किए जाएँ। ऐसा कार्य अभिनंदन से आगे जाकर शोध-अवसंरचना बनाएगा। 70वीं जन्म-जयंती पर प्रस्तावित स्मृति-संकलन इसी दिशा में उपयोगी हो सकता है, बशर्ते प्रत्येक प्रविष्टि के साथ प्रकाशन-विवरण और प्रमाण दिया जाए।
13 शोध और शिक्षण की परस्परता
मुखिबोवा की उपलब्ध शोध-दिशाओं में एक स्पष्ट शिक्षण-तर्क है। ब्रज गद्य का व्याकरणिक और शैलीगत अध्ययन भाषा-अध्यापन को ऐतिहासिक गहराई देता है। बाबुरी कालीन भक्ति का अध्ययन साहित्य को इतिहास और संस्कृति से जोड़ता है। भक्ति-कविता के अनुवाद की समस्या विद्यार्थी को तुलनात्मक भाषा-विज्ञान और काव्यशास्त्र से परिचित कराती है। उज़्बेकिस्तान में हिन्दी भाषा और साहित्य पर लेख स्थानीय संस्थागत इतिहास को दर्ज करता है। इस प्रकार शोध और पाठ्यचर्या एक-दूसरे को पोषित करते हैं।
भक्ति पढ़ाने की प्रभावी पद्धति में केवल कवि-परिचय और भावार्थ पर्याप्त नहीं। पहला चरण ऐतिहासिक मानचित्र हो सकता है—कवि, क्षेत्र, भाषा, संप्रदाय और काल। दूसरा चरण मूल पाठ का शुद्ध वाचन और रूप-विच्छेद। तीसरा चरण सांस्कृतिक शब्दावली। चौथा चरण विभिन्न पाठांतर और अनुवादों की तुलना। पाँचवाँ चरण सामाजिक और दार्शनिक प्रश्न। छठा चरण विद्यार्थी द्वारा उज़्बेक अनुवाद या लघु शोध। ऐसी क्रमिक पद्धति से विद्यार्थी पाठ को रटता नहीं, उसके अर्थ-निर्माण में भाग लेता है। मुखिबोवा की भाषाशास्त्रीय और साहित्यिक रुचियों का संयोजन इस प्रकार की शिक्षण संरचना का आधार बन सकता है।
वार्ता साहित्य विशेष रूप से परियोजना-आधारित अध्ययन के लिए उपयुक्त है। शोधार्थी किसी एक वार्ता का शब्दकोश बना सकता है, कथानक-रचना देख सकता है, सामाजिक संबोधनों का विश्लेषण कर सकता है, स्त्री पात्रों की भूमिका परख सकता है या उज़्बेक अनुवाद में सांस्कृतिक टिप्पणियाँ तैयार कर सकता है। बाबुरी काल के लिए समयरेखा, भाषिक मानचित्र और प्राथमिक स्रोतों की तुलनात्मक सूची बनाई जा सकती है। ऐसी गतिविधियाँ अकादमिक मार्गदर्शन को सक्रिय अभ्यास बनाती हैं।
14 अनुवाद एक नैतिक और आलोचनात्मक कर्म
अनुवाद में सबसे बड़ी त्रुटि यह मानना है कि एक शब्द का दूसरी भाषा में स्थायी समतुल्य मिल जाता है। ‘भक्ति’ को devotion कहना सुविधाजनक है, पर devotion के यूरोपीय ईसाई अर्थ-संदर्भ और भारतीय भक्ति की विविध परंपराएँ पूरी तरह समान नहीं। उज़्बेक में चुना गया धार्मिक शब्द इस्लामी-सूफी संकेत सक्रिय कर सकता है। यह सक्रियता दोष नहीं; अनुवाद का स्वाभाविक सांस्कृतिक प्रभाव है। दोष तब है जब अनुवादक इन अर्थांतरों से अनभिज्ञ रहे।
कबीर के ‘राम’ को केवल रामायण के अयोध्या-नरेश के रूप में अनूदित करना निर्गुण प्रयोग को सीमित कर सकता है; मीरा के ‘गिरधर’ को बिना कृष्ण-संदर्भ के सामान्य ईश्वर कहना पद की लीला-स्मृति मिटा सकता है; सूर के वात्सल्य में बालकृष्ण की सांस्कृतिक छवि के बिना केवल child-god कहना भाव की घनता घटा सकता है। इसी प्रकार ‘दर्शन’, ‘प्रसाद’, ‘सेवा’, ‘लीला’ और ‘विरह’ के लिए व्याख्यात्मक रणनीति चाहिए। मुखिबोवा द्वारा भक्ति कविता के अनुवाद की समस्याओं पर काम करना इसलिए साहित्यिक ही नहीं, ज्ञानमीमांसात्मक महत्त्व रखता है।
अनुवादक को पाठांतर के प्रति भी उत्तरदायी होना चाहिए। भक्तिपद मौखिक गायन, पांडुलिपि और संप्रदाय के रास्ते आए हैं; लोकप्रिय मंच पर प्रचलित पंक्ति आलोचनात्मक संस्करण से भिन्न हो सकती है। शोध-प्रकाशन में संस्करण बताना, भिन्न पाठ हो तो टिप्पणी देना और इंटरनेट पर मिली अनाम पंक्ति को तुरंत कवि के नाम से न जोड़ना आवश्यक है। वर्तमान आलेख में भी उद्धरणों के साथ ग्रंथ या मान्य संस्करण का संकेत दिया गया है। यही ‘नो फेक इन्फॉर्मेशन’ का व्यावहारिक अर्थ है—तथ्य की सीमा स्वीकार करना, न कि रिक्त स्थान को आकर्षक अनुमान से भरना।
15 आलोचनात्मक मूल्यांकन
उपलब्ध प्रमाणों से मुखिबोवा के योगदान की पाँच प्रमुख उपलब्धियाँ चिन्हित की जा सकती हैं। पहली, उन्होंने ब्रजभाषा के गद्य को शोध का केंद्र बनाकर हिन्दी गद्य-इतिहास की अपेक्षाकृत कम चर्चित सामग्री पर ध्यान दिया। दूसरी, उन्होंने बाबुरी काल और भक्ति साहित्य को साथ रखकर राजनीति और साहित्य के अंतःसंबंध का प्रश्न उठाया। तीसरी, समावेशी नीति की अवधारणा के माध्यम से साहित्य को धार्मिक सहअस्तित्व और सामाजिक भागीदारी से जोड़ा। चौथी, भक्ति-कविता के अनुवाद को स्वतंत्र समस्या मानकर तुलनात्मक भारतविद्या का व्यावहारिक पक्ष विकसित किया। पाँचवीं, दीर्घ अध्यापन और प्रशिक्षण के माध्यम से शोध को संस्थागत निरंतरता दी।
इन उपलब्धियों के साथ कुछ शोध-आवश्यकताएँ भी हैं। उनके सभी प्रकाशनों की सत्यापित, बहुलिपि ग्रंथसूची तैयार की जानी चाहिए, जिसमें उज़्बेक सिरिलिक, उज़्बेक लैटिन, रूसी, देवनागरी और रोमन वर्तनी एक साथ हों। मोनोग्राफ और पाठ्यपुस्तकों की प्रतियों का डिजिटल संरक्षण आवश्यक है। 1995 के शोध और 2015 के डॉक्टरेट के विषय-सूची, सार, पद्धति और निष्कर्ष उपलब्ध कराए जाएँ। 2017 और 2022 के लेखों के पूर्ण पाठ का प्रामाणिक संग्रह बने। पुरस्कारों के नाम, संस्था, वर्ष और आधिकारिक प्रमाण अलग से सत्यापित किए जाएँ; अस्पष्ट अनुवादित नामों को पुनरावृत्त न किया जाए।
उनके शोध पर आगे की आलोचना तीन प्रश्न उठा सकती है। पहला, ‘समावेशी नीति’ की अवधारणा में सत्ता की सीमाएँ, संघर्ष और असमानताएँ किस तरह समाहित हैं? दूसरा, ‘भक्ति साहित्य’ की एकता स्वीकारते हुए क्षेत्रीय, जातिगत, लैंगिक और संप्रदायगत भेदों को कितना स्थान मिलता है? तीसरा, उज़्बेक अनुवाद में कौन-सी रणनीतियाँ अपनाई गईं और पाठक की ग्रहणशीलता कैसे जाँची गई? ये प्रश्न उनके योगदान को कम नहीं करते; वे उसके आधार पर नए शोध की दिशा बनाते हैं। किसी विद्वान की विरासत तभी जीवित रहती है जब अगली पीढ़ी केवल निष्कर्ष दोहराती नहीं, उनसे नए प्रश्न विकसित करती है।
16 सांस्कृतिक कूटनीति और हिन्दी का वैश्विक परिप्रेक्ष्य
भारत और उज़्बेकिस्तान के संबंधों में साहित्य और भाषा की भूमिका औपचारिक कूटनीति से अलग, किंतु पूरक है। एक उज़्बेक विद्यार्थी जब कबीर या मीरा पढ़ता है, वह भारत को केवल समकालीन राजनीति, पर्यटन या सिनेमा से नहीं, उसकी ऐतिहासिक आत्म-अभिव्यक्ति से समझता है। भारतीय विद्यार्थी जब उज़्बेक भारतविद के शोध को पढ़ता है, उसे अपनी परंपरा का एक वैकल्पिक दर्पण मिलता है। यह पारस्परिकता सांस्कृतिक कूटनीति की स्थायी नींव है क्योंकि वह सरकारी कार्यक्रम समाप्त होने के बाद भी पाठ्यपुस्तक, अनुवाद, शोधार्थी और स्मृति में बनी रहती है।
ICCR हिन्दी चेयर जैसी व्यवस्था इस संवाद में प्रत्यक्ष मानवीय संपर्क जोड़ती है। 2024–25 में भारतीय विजिटिंग प्रोफेसर और स्थानीय विद्वानों का सहकार्य कक्षा, व्याख्यान, साक्षात्कार और शोध-संवाद के अवसर बनाता है। किंतु किसी चेयर की सफलता केवल कार्यक्रमों की संख्या से नहीं, स्थायी परिणामों से मापी जानी चाहिए—संयुक्त प्रकाशन, प्रमाणित डिजिटल अभिलेख, द्विभाषी शब्दावली, सह-निर्देशित शोध, अनुवाद और विद्यार्थी विनिमय। प्रोफेसर मुखिबोवा की दीर्घ स्थानीय विशेषज्ञता और भारतीय अध्यापकों की आवधिक उपस्थिति मिलकर ऐसी संरचना बना सकती है।
हिन्दी के वैश्विक विस्तार का अर्थ केवल वक्ताओं की संख्या बढ़ाना नहीं। वास्तविक विस्तार तब होता है जब दूसरी भाषाओं के विद्वान हिन्दी में मौलिक प्रश्न उठाएँ, अपने समाज की तुलना करें और हिन्दी साहित्य को अपनी अकादमिक परंपरा में स्थान दें। मुखिबोवा का कार्य इसी गहरे वैश्वीकरण का उदाहरण है। उन्होंने भारतीय साहित्य को उज़्बेकिस्तान में अध्ययन की वस्तु बनाया, पर उससे अधिक महत्त्वपूर्ण यह है कि उसे स्थानीय शोध, अनुवाद और अध्यापन की प्रक्रिया में रूपांतरित किया।
17 निष्कर्ष
प्रोफेसर उल्फतख़ोन मुखिबोवा की विद्वत्ता का प्रमाण-आधारित मूल्यांकन बताता है कि उनका केंद्रीय योगदान मध्यकालीन हिन्दी साहित्य की सूक्ष्म पाठकीय समझ और मध्य एशियाई भारतविद्या की संस्थागत आवश्यकता के संयोजन में है। 1995 का वार्ता-गद्य संबंधी शोध भाषा, विधा और संप्रदाय की इकाइयों को जोड़ता है। 2015 का बाबुरी कालीन भक्ति साहित्य संबंधी डॉक्टरेट इस आधार को व्यापक इतिहास, संस्कृति और साहित्यिक बहुलता तक फैलाता है। 2017 का समावेशन-केंद्रित लेख और 2022 की हिन्दी-अध्ययन तथा अनुवाद संबंधी प्रविष्टियाँ बताती हैं कि यह रुचि एक बंद शोध-प्रबंध नहीं रही, बल्कि आगे विकसित होती रही।
भक्ति उनके अध्ययन में केवल धार्मिक विषय नहीं, बहुभाषिक समाज की सांस्कृतिक प्रक्रिया है। कबीर का अनुभव-आधारित ज्ञान, रैदास की दुःख-मुक्त नगरी, मीरा की एकनिष्ठ आत्मवाणी, सूर की अकथ अनुभूति, तुलसी की सर्वव्याप्ति और परहित की नैतिकता तथा रहीम का प्रेम-सूत्र—ये सभी बाबुरी काल के जटिल सामाजिक संसार में वैकल्पिक मनुष्यता के रूप प्रस्तुत करते हैं। इन पाठों को उज़्बेक भाषा और कक्षा तक पहुँचाना शब्दांतरण से अधिक सांस्कृतिक व्याख्या की माँग करता है। मुखिबोवा की शोध-दिशा इसी व्याख्यात्मक श्रम को प्रतिष्ठा देती है।
उनकी अकादमिक विरासत का दूसरा पक्ष मार्गदर्शन है। चालीस वर्ष से अधिक का शिक्षण, पाठ्यसामग्री, शोध और युवा विशेषज्ञों का प्रशिक्षण ज्ञान को पीढ़ियों के बीच ले जाता है। डॉ. मनीष कुमार सी. मिश्रा द्वारा लिया गया साक्षात्कार और 2024–25 का सहकार्य इस विरासत के अंतरराष्ट्रीय और डिजिटल विस्तार का भाग है। भविष्य का आवश्यक कार्य उनकी संपूर्ण सत्यापित ग्रंथसूची, शोध-सारों, अनुवादों, व्याख्यानों और साक्षात्कारों का बहुभाषी डिजिटल अभिलेख बनाना है। यही सम्मान का सबसे अकादमिक रूप होगा—व्यक्ति की प्रशंसा को प्रमाणित ज्ञान-संपदा में बदलना।
अंततः मुखिबोवा का कार्य यह सिखाता है कि भारतीय साहित्य का वैश्विक जीवन अनुवाद, अध्यापन और दीर्घकालीन मानवीय संबंधों से बनता है। भक्ति परंपरा स्वयं प्रेम, संवाद और आंतरिक परिवर्तन की परंपरा है; उसका अध्ययन भी तभी सार्थक होता है जब वह भाषाओं, देशों और पीढ़ियों के बीच संवाद रचे। प्रोफेसर उल्फतख़ोन मुखिबोवा ने ताशकंद में इसी संवाद के लिए महत्त्वपूर्ण आधार निर्मित किया है।
क्रमांकित उद्धरण और उनके स्रोत
1. “more than 40 years.” स्रोत: Tashkent State University of Oriental Studies, 70वीं जन्म-जयंती सम्मेलन की आधिकारिक विज्ञप्ति, 2026। यह वाक्यांश उनके भारतीय साहित्य, विशेषतः मध्यकालीन साहित्य और भक्ति परंपरा पर शोध की अवधि के संदर्भ में है।
2. “17वीं शताब्दी के ब्रज साहित्य में गद्य शैली ‘वार्ता’” तथा “बाबुरी काल का भक्ति साहित्य।” स्रोत: “उज़्बेकिस्तान के हिन्दी उस्ताद”, उपलब्ध परिचय-संकलन, प्रोफेसर उल्फत मुहिबोवा संबंधी प्रविष्टि।
3. “Inclusive Policy in Baburid Reign for Bhakti Literature and Culture: A Study through Literary Perspective.” स्रोत: M. U. Uchkunovna and J. Ambrewadikar, Journal of Exclusion Studies, 7(1), 2017, pp. 151–162।
4. “Uzbekistan me Hindi bhasha aur sahitya.” स्रोत: U. Mukhibova, Pustak Bharati Research Journal, 2022, pp. 28–34; Google Scholar ग्रंथसूची प्रविष्टि।
5. “БҲАКТИ ШЕЪРИЯТИ ТАРЖИМАСИДАГИ МУАММОЛАР।” स्रोत: U. Muhibova, Oriental Renaissance: Innovative, Educational, Natural and Social Sciences, 2022; Google Scholar ग्रंथसूची प्रविष्टि। शीर्षक का आशय भक्ति-कविता के अनुवाद की समस्याएँ है।
6. “सा त्वस्मिन् परमप्रेमरूपा।” स्रोत: नारद भक्ति सूत्र, सूत्र 2।
7. “समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः।” स्रोत: श्रीमद्भगवद्गीता, अध्याय 9, श्लोक 29।
8. “अहैतुक्यप्रतिहता ययात्मा सुप्रसीदति।” स्रोत: श्रीमद्भागवत महापुराण, 1.2.6।
9. “रहिमन धागा प्रेम का मत तोरो चटकाय; टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ पड़ जाय।” स्रोत: अब्दुर्रहीम खानखाना, रहीम दोहावली, प्रेम संबंधी दोहा।
10. “पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय; ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।” स्रोत: कबीर ग्रंथावली, संपा. श्यामसुंदर दास, साखी खंड।
11. “बेगमपुरा सहर को नाउ। दूखु अंदोहु नहीं तिहि ठाउ।” स्रोत: गुरु ग्रंथ साहिब, भगत रविदास की बाणी, राग गौड़ी, अंग 345।
12. “मेरे तो गिरधर गोपाल, दूसरो न कोई।” स्रोत: मीराबाई की पदावली, संपा. परशुराम चतुर्वेदी, प्रचलित आरंभिक पद।
13. “अविगत गति कछु कहत न आवै।” स्रोत: सूरदास, सूरसागर, अविगत विषयक पद।
14. “सियाराममय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी।” स्रोत: गोस्वामी तुलसीदास, रामचरितमानस, बालकाण्ड।
15. “परहित सरिस धरम नहि भाई। परपीड़ा सम नहि अधमाई।” स्रोत: गोस्वामी तुलसीदास, रामचरितमानस, उत्तरकाण्ड।
16. “Bridging Generations through Scholarly Legacy: The Tradition of Academic Mentorship.” स्रोत: Tashkent State University of Oriental Studies, प्रोफेसर Ulpatkhon Mukhibova की 70वीं जन्म-जयंती सम्मेलन की आधिकारिक विज्ञप्ति, 2026।
संदर्भ सूची
1. Tashkent State University of Oriental Studies. “Bridging Generations through Scholarly Legacy: The Tradition of Academic Mentorship.” प्रोफेसर Ulpatkhon Mukhibova की 70वीं जन्म-जयंती हेतु सम्मेलन-विज्ञप्ति, सम्मेलन तिथि 13 नवंबर 2026।
2. “उज़्बेकिस्तान के हिन्दी उस्ताद।” उपलब्ध अप्रकाशित/परिचयात्मक संकलन, प्रोफेसर उल्फत मुहिबोवा उचकुनोव्ना संबंधी प्रविष्टि, 2024।
3. मिश्रा, मनीष कुमार सी. “भक्ति साहित्य की विद्वान प्रोफ़ेसर उल्फत मुहिबोवा उचकुनोव्ना का साक्षात्कार।” Hindi Language and Literature YouTube चैनल, 24 जनवरी 2025, अवधि 36:54। https://www.youtube.com/watch?v=_8hX-ZbwK4E
4. Мухибова, Ульпатхон Учкуновна. Бобурийлар даври бҳакти адабиёти: докторлик диссертацияси автореферати. 2015. Google Books bibliographic record: https://books.google.com/books?id=fKXFuQEACAAJ
5. Uchkunovna, M. U., and J. Ambrewadikar. “Inclusive Policy in Baburid Reign for Bhakti Literature and Cultur
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