Sunday, 27 June 2010

मेरे अपने यूँ मुझे संवारते रहे /

कमियां तलाशते रहे ,गलतियाँ निकालते रहे ,

थे वो मेरे अपने जों मेरी बखिया उखाड़ते रहे /

कभी कुछ अच्छा कहा हो याद नहीं ,

मेरे अपने यूँ मुझे संवारते रहे /

दिग्भ्रमित हैं या वे किसी हीनता से ग्रस्त हैं ,

न जान पाया आज तक क्यूँ मेरे पर काटते रहे ;

न अपनापन , दुलार , न अहसास , संबल औ विश्वास दे सके ,

फिर क्यूँ मुझसे आहत होने का आडम्बर बांटते रहे ;

कमियां तलाशते रहे ,गलतियाँ निकालते रहे ,
थे वो मेरे अपने जों मेरी बखिया उखाड़ते रहे /

न उत्साह दिया न साहस न उनके होने का बल ,

पर अपनी विफलताओं का सेहरा मेरे सर बाँधते रहे ;

थे मेरे अपने जों मेरे पैरों तले की जमीं काटते रहे ;

मेरा अच्छा किया हो याद नहीं ,मेरे अपने यूँ ही मुझे संवारते रहे /

कमियां तलाशते रहे ,गलतियाँ निकालते रहे ,

थे वो मेरे अपने जों मेरी राहों में कांटे बिझाते रहे /

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