Saturday, 17 January 2026

अमरकांत जन्मशती पर के एम अग्रवाल महाविद्यालय में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न ।


अमरकांत जन्मशती पर  के एम अग्रवाल महाविद्यालय में दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी संपन्न ।

 

कल्याण (पश्चिम) स्थित के. एम. अग्रवाल महाविद्यालय में हिन्दी विभाग, महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी तथा भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद,(आई.सी.सी.आर.),नई दिल्ली  के संयुक्त  तत्वावधान में 16–17 जनवरी 2026 को आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी अत्यंत सफलतापूर्वक सम्पन्न हुई। संगोष्ठी में देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों से पधारे प्रतिष्ठित विद्वानों, शिक्षकों, शोधार्थियों एवं विद्यार्थियों ने सक्रिय सहभागिता की।संगोष्ठी का उद्घाटन सत्र महाविद्यालय के अध्यक्ष डॉ. विजय नारायण पंडित के मार्गदर्शन में सम्पन्न हुआ।

उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी के पूर्व अध्यक्ष  प्रो. शीतला प्रसाद दुबे ने की। बीज वक्तव्य बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी से आए  प्रो. मनोज सिंह (बी.एच.यू.) द्वारा दिया गया, जिसमें हिन्दी साहित्य और समकालीन विमर्श के विविध पक्षों पर गहन विचार प्रस्तुत किए गए। मुख्य अतिथियों के रूप में  श्रीमती रेनू पृथियानी (ज़ोनल डायरेक्टर आई.सी.सी.आर., मुंबई) की गरिमामयी उपस्थिति रही। स्वागताध्यक्ष श्री ओम प्रकाश (मुन्ना) पाण्डेय (सचिव, के. एम. अग्रवाल महाविद्यालय) ने अतिथियों का स्वागत किया। प्रस्ताविकी डॉ. अनिता मन्ना (प्राचार्या, के. एम. अग्रवाल महाविद्यालय) द्वारा प्रस्तुत की गई, जिसमें संगोष्ठी के उद्देश्य, वैचारिक पृष्ठभूमि एवं अकादमिक महत्व को रेखांकित किया गया। इस अवसर पर महाविद्यालय प्रबंधन समिति के श्री कांतिलाल जैन, श्री अनिल पंडित, डॉ सुजीत सिंह एवं श्री विजय तिवारी जी उपस्थित थे ।

उद्घाटन सत्र में कुल चार पुस्तकों का लोकार्पण भी हुआ जिसमें अमरकांत पर लिखे लेखों का संग्रह, मध्य एशिया में हिन्दी से जुड़े लेखों का संग्रह, पंडित विद्यानिवास मिश्र पर केन्द्रित समीचीन पत्रिका के अंक के साथ साथ डॉ विजय नारायण पंडित का नवीनतम कहानी संग्रह बड़े भाग मानुष तन पायो प्रमुखता से शामिल रहा । दो दिनों में कुल पाँच अकादमिक सत्रों का आयोजन किया गया, जिनमें हिन्दी साहित्य, आलोचना, संस्कृति, समकालीन विमर्श और शोध की नवीन प्रवृत्तियों पर गहन चर्चा हुई। प्रत्येक सत्र में देशभर से आए विद्वत् संदर्भ-वक्ताओं ने अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए। सत्रों की अध्यक्षता एवं संचालन प्रख्यात शिक्षाविदों द्वारा किया गया, जिससे संगोष्ठी का अकादमिक स्तर अत्यंत समृद्ध रहा।

 

 प्रथम अकादमिक सत्र की अध्यक्षता प्रो. दिलीप मेहरा (आचार्य एवं अध्यक्ष, स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग, सरदार पटेल विश्वविद्यालय, आणंद, गुजरात) ने की। इस सत्र में अतिथि विशेष के रूप में प्रो. सारिका कालरा (प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, लेडी श्री राम कॉलेज फॉर विमेन, नई दिल्ली), डॉ. सचिन गपाट (प्राध्यापक, हिन्दी विभाग, मुंबई विश्वविद्यालय, मुंबई) तथा डॉ. महात्मा पाण्डेय (एसोसिएट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय, दिल्ली) की गरिमामयी उपस्थिति रही।सत्र में देश के प्रतिष्ठित विद्वानों ने विद्वत् संदर्भ-वक्ता के रूप में अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए। इनमें, डॉ. उषा आलोक दुबे (सहायक प्राध्यापिका, हिन्दी विभाग, एम.डी. महाविद्यालय, परेल, मुंबई) तथा श्रीमती पूर्णिमा पाण्डेय (शोध छात्रा, एम.डी. कॉलेज, मुंबई) शामिल रहे। वक्ताओं ने अपने शोधपत्रों के माध्यम से हिन्दी साहित्य के विविध समकालीन, आलोचनात्मक एवं सांस्कृतिक पक्षों पर गहन विमर्श प्रस्तुत किया।

 

इस सत्र का कुशल एवं प्रभावी संचालन डॉ. तेज बहादुर सिंह (प्राध्यापक, हिन्दी विभाग, आर.जे. कॉलेज, घाटकोपर) द्वारा किया गया। सत्र के संयोजक के रूप में डॉ. अनघा राणे (उप-प्राचार्या, के. एम. अग्रवाल महाविद्यालय, कल्याण पश्चिम) ने आयोजन को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह सत्र विद्वत् संवाद, वैचारिक गहराई और अकादमिक गंभीरता के लिए विशेष रूप से सराहनीय रहा।

 

द्वितीय अकादमिक सत्र की अध्यक्षता प्रो. सतीश पाण्डेय (पूर्व अधिष्ठाता, सोमैया विश्वविद्यालय, विद्याविहार, मुंबई) ने की। इस सत्र में अतिथि विशेष के रूप में  प्रो. पुरुषोत्तम कुंदे (प्राचार्य, न्यू आर्ट्स, कॉमर्स एंड साइंस कॉलेज, शेवगाव, अहिल्यानगर) की गरिमामयी उपस्थिति रही। सत्र में विद्वत् संदर्भ-वक्ताओं के रूप में प्रो. श्यामसुंदर पाण्डेय (प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, बी.के. बिर्ला महाविद्यालय, कल्याण पश्चिम), डॉ. रीना सिंह (एसोसिएट प्राध्यापिका, हिन्दी विभाग, आर.के.टी. महाविद्यालय, उल्हासनगर), डॉ. मनोज दुबे (अध्यक्ष, आधुनिक विभाग, सनातन धर्म आदर्श संस्कृत महाविद्यालय, हरियाणा) तथा श्रीमती किरण गोस्वामी (शोध छात्रा, एम.डी. कॉलेज, परेल) ने अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए। वक्ताओं ने हिन्दी साहित्य के समकालीन परिदृश्य, तुलनात्मक साहित्य, आलोचना तथा सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों पर विचारोत्तेजक विमर्श प्रस्तुत किया।इस सत्र का प्रभावी एवं संतुलित संचालन एवं  संयोजन डॉ. संतोष कुलकर्णी (उप-प्राचार्य, के. एम. अग्रवाल महाविद्यालय, कल्याण पश्चिम) ने की। यह सत्र अकादमिक गंभीरता, वैचारिक विविधता और समृद्ध संवाद के लिए विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा।

 

तृतीय अकादमिक सत्र की अध्यक्षता प्रो. ईश्वर पवार (अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, सी.टी. बोरा महाविद्यालय, शिरुर) ने की। इस सत्र में अतिथि विशेष के रूप में प्रो. संतोष मोटवानी (अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, आर.के.टी. महाविद्यालय, उल्हासनगर) की गरिमामयी उपस्थिति रही। सत्र में विद्वत् संदर्भ-वक्ताओं के रूप में देश के विभिन्न राज्यों से पधारे विद्वानों ने अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए। इनमें डॉ. नीलाभ (सहायक प्राध्यापक, हिन्दी विभाग, स्वामी आत्मानंद शासकीय अंग्रेज़ी माध्यम आदर्श महाविद्यालय, अंबिकापुर, छत्तीसगढ़), डॉ. कुंजन आचार्य (सहायक प्राध्यापक, पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग, मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर, राजस्थान), तथा डॉ. गीता यादव (एसोसिएट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग, एस.एम.आर.के.–बी.के.–ए.के. महिला महाविद्यालय, नाशिक) शामिल रहीं। वक्ताओं ने हिन्दी साहित्य, मीडिया-अध्ययन, समकालीन विमर्श एवं अंतर्विषयक अध्ययन के विविध पक्षों पर गंभीर और विचारोत्तेजक प्रस्तुति दी। इस सत्र का सुचारु एवं प्रभावी संचालन एवं संयोजन डॉ. बी.के. महाजन (वरिष्ठ प्राध्यापक, भूगोल विभाग, के. एम. अग्रवाल महाविद्यालय, कल्याण पश्चिम) ने की। यह सत्र विषयवस्तु की विविधता, राष्ट्रीय सहभागिता और अकादमिक गहनता के लिए विशेष रूप से उल्लेखनीय रहा।

 

 चतुर्थ अकादमिक सत्र की अध्यक्षता प्रो. मिथलेश शर्मा (अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, आर.जे. महाविद्यालय, घाटकोपर, मुंबई) ने की। इस सत्र में अतिथि विशेष के रूप में प्रो. बालकवि सुरंजे (अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, बी.के. बिर्ला महाविद्यालय, कल्याण पश्चिम) तथा डॉ. ईश्वर आहिर (कार्यकारी अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, श्री गोविंद गुरु विश्वविद्यालय, गोधरा, गुजरात) की गरिमामयी उपस्थिति रही। सत्र में विद्वत् संदर्भ-वक्ताओं के रूप में  डॉ. भावना रोचलानी (सहायक प्राध्यापिका, हिन्दी विभाग, सी.एच.एम. कॉलेज, उल्हासनगर), श्रीमती सुप्रिया शशिकांत माने (सहायक प्राध्यापक, स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग, एस.एन.डी.टी. महिला विश्वविद्यालय, मुंबई), डॉ. ममता माली (प्राध्यापिका, सोमैया डी.एड. कॉलेज, घाटकोपर, मुंबई) तथा नंदिनी अरुण कुमार शुक्ला (प्राध्यापिका, हिन्दी विभाग, विल्सन महाविद्यालय, मुंबई) ने अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए। प्रस्तुतियों में हिन्दी साहित्य के समकालीन प्रश्नों, स्त्री-विमर्श, शिक्षण पद्धतियों तथा सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों पर गहन और सार्थक विमर्श हुआ। इस सत्र का सुचारु एवं संतुलित संचालन डॉ. कंचन यादव (प्राध्यापिका, हिन्दी विभाग, एस.पी.एन.डी. विमेन्स कॉलेज, मुंबई) द्वारा किया गया। सत्र के संयोजक के रूप में प्रो. मुनीष पाण्डेय (प्रोफेसर, भौतिकी विभाग, के. एम. अग्रवाल महाविद्यालय, कल्याण पश्चिम) ने आयोजन के समन्वय एवं व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह सत्र विचार-विविधता, अकादमिक अनुशासन और संवादपरकता के लिए विशेष रूप से सराहनीय रहा।

 

पंचम अकादमिक सत्र की अध्यक्षता डॉ सतीश पाण्डेय जी ने की। इस सत्र में अतिथि विशेष के रूप में डॉ. रीना थॉमस (अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, संत ऐलोयसिस कॉलेज (स्वायत्त), जबलपुर, मध्यप्रदेश) तथा डॉ. सुनीता कुजूर (सहायक प्राध्यापिका, हिन्दी विभाग, शासकीय महाविद्यालय, बरगी, जबलपुर, मध्यप्रदेश) की गरिमामयी उपस्थिति रही। सत्र में विद्वत् संदर्भ-वक्ताओं के रूप में डॉ. सत्यवती चौबे (अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, विल्सन महाविद्यालय, मुंबई), डॉ. प्रवीण चंद्र बिष्ट (अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, रामनारण रूइया स्वायत्त महाविद्यालय, मुंबई), डॉ. सुनीता क्षीरसागर (सहायक प्राध्यापिका, हिन्दी विभाग, सी.एच.एम. कॉलेज, उल्हासनगर) तथा डॉ. ममता माली (प्राध्यापिका, सोमैया डी.एड. कॉलेज, घाटकोपर, मुंबई) ने अपने शोधपत्र प्रस्तुत किए। वक्ताओं ने हिन्दी साहित्य के समकालीन विमर्श, अकादमिक नेतृत्व, संस्थागत भूमिका तथा सामाजिक-सांस्कृतिक सरोकारों पर गहन और विचारोत्तेजक प्रस्तुतियाँ दीं। इस सत्र का सुसंगत एवं प्रभावी संचालन डॉ. गीतांजलि त्रिपाठी (प्राध्यापिका, हिन्दी विभाग, एस.पी.एन.डी. विमेन्स कॉलेज, मुंबई) द्वारा किया गया। सत्र ने राष्ट्रीय संगोष्ठी को वैचारिक ऊँचाई प्रदान करते हुए अकादमिक संवाद को समृद्ध किया तथा समापन की ओर एक सशक्त बौद्धिक आधार निर्मित किया।

 

 समापन सत्र में प्रतिभागियों ने संगोष्ठी को अत्यंत उपयोगी, शोधोन्मुखी और संवादपरक बताया। समापन सत्र की अध्यक्षता डॉ. अनिता मन्ना ने की। इस अवसर पर प्रो. ईश्वर पवार तथा प्रो. पुरुषोत्तम कुंदे विशेष अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। अंत में प्रतिभागियों को प्रमाणपत्र वितरित किए गए। पूरे कार्यक्रम का कुशल संचालन एवं आभार प्रदर्शन डॉ. मनीष कुमार मिश्रा (हिन्दी विभाग) द्वारा किया गया। संगोष्ठी की सफलता ने महाविद्यालय को राष्ट्रीय अकादमिक मानचित्र पर एक सशक्त पहचान प्रदान की।इस आयोजन को सफल बनाने में प्राध्यापक उदय सिंह के प्रयासों को सराहते हुए संगोष्ठी संयोजक डॉ मनीष कुमार ने उनका सम्मान किया । अंत में राष्ट्रगान के साथ इस संगोष्ठी की समाप्ति की औपचारिक घोषणा हुई ।

Thursday, 25 December 2025

अमरकांत जन्मशती पर दो दिवसीय राष्ट्रीय परिसंवाद

 अमरकांत जन्मशती के उपलक्ष्य में दिनांक 16-17 जनवरी 2026 को दो दिवसीय राष्ट्रीय परिसंवाद का आयोजन ICSSR एवं महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी के सहयोग से के एम अग्रवाल महाविद्यालय, कल्याण पश्चिम, महाराष्ट्र में किया जा रहा है।



Tuesday, 21 October 2025

राहत इंदौरी के 20 चुनिंदा शेर...

 राहत इंदौरी के 20 चुनिंदा शेर...


1.तूफ़ानों से आँख मिलाओ, सैलाबों पर वार करो

मल्लाहों का चक्कर छोड़ो, तैर के दरिया पार करो


2.गुलाब, ख़्वाब, दवा, ज़हर, जाम क्या क्या है

मैं आ गया हूं बता इंतज़ाम क्या क्या है


3.अपने हाकिम की फकीरी पे तरस आता है

जो गरीबों से पसीने की कमाई मांगे


4.जुबां तो खोल, नजर तो मिला, जवाब तो दे

मैं कितनी बार लुटा हूँ, हिसाब तो दे


5.फूलों की दुकानें खोलो, खुशबू का व्यापार करो

इश्क़ खता है तो, ये खता एक बार नहीं, सौ बार करो


6.आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो

ज़िंदा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो


7.उस आदमी को बस इक धुन सवार रहती है

बहुत हसीन है दुनिया इसे ख़राब करूं


8.बहुत ग़ुरूर है दरिया को अपने होने पर

जो मेरी प्यास से उलझे तो धज्जियां उड़ जाएं


9.किसने दस्तक दी, दिल पे, ये कौन है

आप तो अन्दर हैं, बाहर कौन है


10.ये हादसा तो किसी दिन गुजरने वाला था

मैं बच भी जाता तो एक रोज मरने वाला था


11.मेरा नसीब, मेरे हाथ कट गए वरना

मैं तेरी माँग में सिन्दूर भरने वाला था


12.अंदर का ज़हर चूम लिया धुल के आ गए

कितने शरीफ़ लोग थे सब खुल के आ गए


13.कॉलेज के सब बच्चे चुप हैं काग़ज़ की इक नाव लिए

चारों तरफ़ दरिया की सूरत फैली हुई बेकारी है


14.कहीं अकेले में मिल कर झिंझोड़ दूँगा उसे

जहाँ जहाँ से वो टूटा है जोड़ दूँगा उसे


15.रोज़ तारों को नुमाइश में ख़लल पड़ता है

चाँद पागल है अँधेरे में निकल पड़ता है


16.हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे

कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते


17.मोड़ होता है जवानी का सँभलने के लिए

और सब लोग यहीं आ के फिसलते क्यूं हैं


18.नींद से मेरा ताल्लुक़ ही नहीं बरसों से

ख़्वाब आ आ के मेरी छत पे टहलते क्यूं हैं


19.एक चिंगारी नज़र आई थी बस्ती में उसे

वो अलग हट गया आँधी को इशारा कर के


20.इन रातों से अपना रिश्ता जाने कैसा रिश्ता है

नींदें कमरों में जागी हैं ख़्वाब छतों पर बिखरे हैं

Thursday, 9 October 2025

लास्लो क्रास्नाहोर्काई : 2025 के नोबेल पुरस्कार विजेता हंगेरियाई लेखक

 लास्लो क्रास्नाहोर्काई : 2025 के नोबेल पुरस्कार विजेता हंगेरियाई लेखक 

बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में जब विश्व साहित्य ने उत्तर-आधुनिक युग में प्रवेश किया, तब मनुष्य की आत्मा में भय, असुरक्षा और अविश्वास की गहरी परछाइयाँ उतर आईं। सभ्यता का तीव्र तकनीकी विकास, राजनीतिक विफलताएँ और आध्यात्मिक शून्यता ने लेखक को एक ऐसे द्वंद्व में खड़ा कर दिया जहाँ अर्थ, आस्था और अस्तित्व—तीनों अस्थिर थे। इस विघटनशील युग में लास्लो क्रास्नाहोर्काई (László Krasznahorkai) का लेखन एक अद्भुत बौद्धिक और कलात्मक हस्तक्षेप के रूप में उभरता है।

2025 का नोबेल पुरस्कार जब उन्हें इस टिप्पणी के साथ दिया गया कि “उन्होंने अपनी सृजनात्मक और दूरदर्शी रचनाओं के माध्यम से, प्रलय के आतंक के बीच भी कला की शक्ति को पुनः प्रमाणित किया,” तो यह केवल एक लेखक का सम्मान नहीं था, बल्कि उस दृष्टि का उत्सव था जो अंधकार के बीच भी कला में मनुष्यत्व की संभावना खोजती है।

क्रास्नाहोर्काई का साहित्य “प्रलय का सौन्दर्यशास्त्र” रचता है—जहाँ पतन और प्रतीक्षा के बीच एक सूक्ष्म करुणा जन्म लेती है। वे हमें सिखाते हैं कि जब इतिहास ठहर जाता है और भाषा थक जाती है, तब भी कथा मनुष्य के भीतर अपनी लय खोज लेती है।

लास्लो क्रास्नाहोर्काई का जन्म 1954 में हंगरी के छोटे नगर ज्यूला (Gyula) में हुआ। यह वह भू-क्षेत्र है जो रोमानिया की सीमा से सटा हुआ है—एक सांस्कृतिक मिश्रण वाला इलाका जहाँ मध्य यूरोपीय इतिहास की अस्थिरता सदैव उपस्थित रही। साम्यवादी शासन, नियंत्रण और सामाजिक गिरावट का जो वातावरण उनके युवावस्था में था, वही उनकी रचनाओं के भीतर नैतिक पतन, प्रतीक्षा और भय के रूप में बार-बार प्रतिध्वनित होता है।

विश्वविद्यालय शिक्षा के दौरान उन्होंने पश्चिमी दार्शनिकों—विशेषतः नीत्शे, काफ्का, और बेकट—का गहन अध्ययन किया। इनसे उन्हें यह दृष्टि मिली कि मनुष्य का अस्तित्व केवल सामाजिक नहीं, बल्कि दार्शनिक संघर्ष भी है। उनके लेखन में यही संघर्ष एक व्यापक रूपक के रूप में प्रकट होता है।1985 में प्रकाशित क्रास्नाहोर्काई का पहला उपन्यास सातांतांगो हंगेरियाई साहित्य में एक मील का पत्थर साबित हुआ। यह कथा एक उजड़े हुए सामूहिक खेत (Collective Farm) की है जहाँ कुछ लोग बच गए हैं—भ्रमित, थके, और प्रतीक्षा में डूबे हुए। वे मानते हैं कि जीवन का अर्थ खो चुका है ।

( इंटरनेट से उपलब्ध सामग्री)



Thursday, 28 August 2025

Two days online international Conference

 International Institute of Central Asian Studies (IICAS), Samarkand, Uzbekistan

(by UNESCO Silk Road Programme )

Alfraganus University, Tashkent, Uzbekistan

and

Hindi Department, K.M.Agarwal Arts, Commerce and Science College, Kalyan (West)

Maharashtra, India

jointly organising

Two Day Online International Conference

*Central Asia: Literary, Cultural Scenario and Hindi*

(Date : *Saturday-Sunday 20-21 September, 2025)*

https://forms.gle/a1LppLVbiwF4JsbH8


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Tuesday, 26 August 2025

ताशकंद – एक शहर रहमतों का” : सांस्कृतिक संवाद और काव्य-दृष्टि का आलोचनात्मक अध्ययन

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