Wednesday, 22 July 2026

How to use AI in Hindi Teaching



AI can be used in Hindi teaching as a teaching assistant, practice partner, content creator, and assessment aid. It works especially well when the teacher remains responsible for accuracy, pedagogy, and final evaluation.

Practical uses in a Hindi classroom

  1. Lesson planning: Create level-appropriate lesson plans, learning outcomes, activities, and homework for साहित्य, व्याकरण, भाषा-कौशल, and communication.

  2. Personalized learning: Generate अलग-अलग स्तर के अभ्यास for कमजोर, औसत, and advanced learners from the same topic.

  3. Grammar practice: Create exercises on लिंग, वचन, कारक, काल, संधि, समास, मुहावरे, वाक्य-शुद्धि, and punctuation, with explanations and answer keys.

  4. Reading and literature: Simplify difficult passages, explain संदर्भ-प्रसंग, identify themes and शैली, and create discussion questions. Students can also compare an AI interpretation with their own critical reading.

  5. Writing skills: Use AI to help students brainstorm and revise essays, stories, reports, letters, poems, and research abstracts. A useful method is student draft → AI feedback → student revision → teacher review, rather than submitting AI-generated work directly.

  6. Speaking and conversation: Students can practice interviews, role-play, dialogues, debates, and everyday Hindi conversations with an AI chatbot.

  7. Translation: Compare Hindi–English translations and discuss why literal translation may fail. This can develop vocabulary and intercultural understanding.

  8. Assessment: Generate question banks, MCQs, quizzes, worksheets, rubrics, and differentiated assignments. Teachers should verify factual answers and साहित्यिक interpretations before use.

Example prompt

“FYBA स्तर के विद्यार्थियों के लिए प्रेमचंद की कहानी पर 45 मिनट की हिन्दी कक्षा की योजना बनाइए। इसमें learning outcomes, पूर्वज्ञान, classroom activities, पाँच discussion questions और एक short assessment शामिल करें।”

The most effective model is AI-assisted teaching, not AI-dependent teaching. Students should also learn AI literacy: fact-checking, detecting bias and hallucinations, proper acknowledgement of AI use, copyright awareness, and responsible use in assignments.

Monday, 20 July 2026

Artificial intelligence



 

INDIAN CINEMA IN CENTRAL ASIA

 CALL FOR RESEARCH ARTICLES / BOOK CHAPTERS

INDIAN CINEMA IN CENTRAL ASIA

History, Culture and Cultural Diplomacy

मध्य एशिया में भारतीय सिनेमा

इतिहास, संस्कृति और सांस्कृतिक कूटनीति






Original and unpublished research articles/book chapters are invited from academicians, researchers, film scholars and research students for the proposed edited volume Indian Cinema in Central Asia. The volume seeks to explore the historical presence, cultural reception, social and cultural influence, and role of Indian cinema in cultural diplomacy across Central Asia.

प्रस्तावित संपादित पुस्तक ‘मध्य एशिया में भारतीय सिनेमा’ के लिए शिक्षकों, शोधकर्ताओं, सिनेमा अध्येताओं एवं शोधार्थियों से मौलिक एवं अप्रकाशित शोध आलेख आमंत्रित हैं। पुस्तक का उद्देश्य मध्य एशिया में भारतीय सिनेमा की ऐतिहासिक उपस्थिति, लोकप्रियता, सामाजिक-सांस्कृतिक प्रभाव तथा सांस्कृतिक कूटनीति में उसकी भूमिका का बहुआयामी अध्ययन प्रस्तुत करना है।

SUGGESTED AREAS / संभावित विषय

History of Indian Cinema in Central Asia / मध्य एशिया में भारतीय सिनेमा का इतिहास

Indian Cinema during the Soviet Era / सोवियत काल में भारतीय सिनेमा

Raj Kapoor and the Popularity of Indian Cinema / राज कपूर और भारतीय सिनेमा की लोकप्रियता

Indian Cinema in Uzbekistan, Kazakhstan, Kyrgyzstan, Tajikistan and Turkmenistan

Bollywood and Central Asian Popular Culture

Indian Film Music, Dance and Cultural Memory

Reception and Audiences of Indian Films in Central Asia

Translation and Dubbing of Indian Films

Representation of India through Cinema

Cinema and India–Central Asia Cultural Relations

Indian Cinema as Soft Power and Cultural Diplomacy

Women, Gender and Society in Indian and Central Asian Cinematic Perspectives

Digital Platforms and the New Reception of Indian Cinema

Comparative Studies of Indian and Central Asian Cinema

Contemporary Indian Cinema in Central Asia

SUBMISSION GUIDELINES / आलेख संबंधी निर्देश

Language: Hindi or English

Length: Preferably 4,000–6,000 words

Requirements: Original and unpublished work, abstract, keywords, author affiliation and complete references

Citation Style: MLA Style

Submission Deadline: 30 October 2026

Email for Submission: manishmuntazir@gmail.com

EDITED BY / संपादक

Dr. Manish Kumar Mishra

Associate Professor, Department of Hindi

K. M. Agrawal College of Arts, Commerce & Science

Kalyan (West), Maharashtra, India

Scholars and researchers are warmly invited to contribute and share 

this call within academic networks.

शब्द, संस्कृति और सरहदों के बीच एक अकादमिक यात्री : डॉ. मनीष कुमार मिश्रा

 


शब्द, संस्कृति और सरहदों के बीच एक अकादमिक यात्री : डॉ. मनीष कुमार मिश्रा

हिन्दी साहित्य, शोध, सिनेमा, संपादन और भारत–मध्य एशिया सांस्कृतिक संवाद के विविध आयामों में सक्रिय एक बहुआयामी व्यक्तित्व । कुछ लोग अपने समय में केवल अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं, कुछ अपने कार्यों से एक पहचान अर्जित करते हैं और कुछ ऐसे भी होते हैं जो अपनी निरंतर सक्रियता से अलग-अलग दिशाओं के बीच सेतु निर्मित करते चलते हैं। उनके लिए जीवन किसी एक पद, एक संस्था, एक पुस्तक अथवा एक उपलब्धि में सीमित नहीं होता। उनका जीवन निरंतर यात्रा है—ज्ञान से सृजन तक, कक्षा से शोध तक, साहित्य से सिनेमा तक और अपनी भाषा की स्थानीय भूमि से विश्व-संवाद के विस्तृत आकाश तक। डॉ. मनीष कुमार मिश्रा का अकादमिक और साहित्यिक व्यक्तित्व इसी बहुआयामी यात्रा का प्रतिनिधित्व करता है।

उनके व्यक्तित्व को किसी एक परिचय में बाँधना सहज नहीं है। वे शिक्षक हैं, लेकिन उनका अध्यापन केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं है; वे शोधकर्ता हैं, लेकिन उनका शोध पुस्तकालयों की अलमारियों में बंद विषयों तक सीमित नहीं; वे साहित्यकार हैं, लेकिन साहित्य उनके लिए केवल आत्माभिव्यक्ति का माध्यम नहीं; वे संपादक हैं, लेकिन संपादन उनके लिए केवल सामग्री का संकलन नहीं; और वे सांस्कृतिक अध्येता हैं, जिनकी दृष्टि भारत की सीमाओं से निकलकर मध्य एशिया तक जाती है। उनके अध्ययन और शोध के प्रमुख क्षेत्रों में हिन्दी भाषा और साहित्य, आधुनिक हिन्दी कथा और कविता, भारतीय सिनेमा, तुलनात्मक साहित्य, अनुवाद, मीडिया, सांस्कृतिक अध्ययन, डिजिटल ह्यूमैनिटीज़, भारतीय ज्ञान परंपरा तथा भारत–मध्य एशिया अध्ययन जैसे विविध अनुशासन शामिल हैं। 

उनकी यात्रा को समझना दरअसल उस भारतीय अध्यापक की यात्रा को समझना है, जो अपनी कक्षा में भाषा पढ़ाते-पढ़ाते एक दिन यह अनुभव करता है कि भाषा केवल व्याकरण और साहित्य की वस्तु नहीं, बल्कि सभ्यताओं के बीच संवाद की सबसे सशक्त संभावना भी है।

शिक्षा से शुरू हुई एक लंबी यात्रा : 

किसी भी अध्यापक का वास्तविक निर्माण उसकी डिग्रियों से अधिक उस जिज्ञासा से होता है, जो उसे निरंतर सीखते रहने के लिए प्रेरित करती है। डॉ. मनीष कुमार मिश्रा की शैक्षणिक यात्रा में यह निरंतरता स्पष्ट दिखाई देती है। मुंबई विश्वविद्यालय से हिन्दी में एम.ए. करते हुए स्वर्ण पदक प्राप्त करना उनकी अकादमिक प्रतिभा की प्रारंभिक महत्वपूर्ण उपलब्धियों में रहा। इसके बाद उन्होंने हिन्दी साहित्य में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। साथ ही बी.एड., मानव संसाधन प्रबंधन में एमबीए और अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. जैसी अलग-अलग शैक्षणिक उपलब्धियाँ उनके अध्ययन की बहुविषयी प्रवृत्ति को रेखांकित करती हैं।  

हिन्दी साहित्य के विद्यार्थी का मानव संसाधन प्रबंधन तक पहुँचना और फिर अंग्रेज़ी साहित्य की ओर लौटना पहली दृष्टि में अलग-अलग दिशाओं की यात्रा लग सकती है। किंतु डॉ. मिश्रा के समग्र व्यक्तित्व को देखें तो यही विविधता उनकी अकादमिक दृष्टि की विशेषता बन जाती है। साहित्य उन्हें मनुष्य को समझने की दृष्टि देता है, प्रबंधन संस्थागत कार्य-संस्कृति को समझने की क्षमता और अंग्रेज़ी साहित्य तुलनात्मक एवं वैश्विक संदर्भों से जुड़ने का अवसर।उनके लिए शिक्षा कभी पूर्ण हो जाने वाली प्रक्रिया नहीं रही। शायद इसीलिए उनके अध्ययन और कार्य में एक साथ परंपरा और आधुनिकता, साहित्य और मीडिया, कविता और सिनेमा, हिन्दी और विश्व, भारत और मध्य एशिया उपस्थित दिखाई देते हैं।

अध्यापन : पेशा नहीं, बौद्धिक उत्तरदायित्व : 

डॉ. मनीष कुमार मिश्रा की व्यावसायिक यात्रा का सबसे स्थायी आधार अध्यापन रहा है। वर्ष 2003 से आरंभ हुई उनकी शिक्षकीय यात्रा विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों से गुजरते हुए वर्ष 2010 में के. एम. अग्रवाल कला, वाणिज्य एवं विज्ञान महाविद्यालय, कल्याण तक पहुँची। जनवरी 2026 से वे इसी संस्थान के हिन्दी विभाग में असोसिएट प्रोफ़ेसर के रूप में कार्यरत हैं। उनके अकादमिक जीवन में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में 2014 से 2016 तक UGC Research Awardee के रूप में बिताया गया समय और 2024–2025 में उज़्बेकिस्तान में ICCR हिन्दी चेयर के रूप में किया गया कार्य विशेष महत्त्व रखता है। 

दो दशकों से अधिक की इस यात्रा में उन्होंने विद्यार्थियों की कई पीढ़ियों को पढ़ाया है। हिन्दी भाषा और साहित्य के साथ साहित्यिक आलोचना, शोध-पद्धति, अनुवाद, तुलनात्मक साहित्य, भारतीय सिनेमा और सांस्कृतिक अध्ययन उनके अध्यापन के प्रमुख क्षेत्र रहे हैं। विदेशी विद्यार्थियों को हिन्दी पढ़ाने का उनका अनुभव इस यात्रा को अंतरराष्ट्रीय विस्तार प्रदान करता है। 

एक अच्छे शिक्षक की पहचान केवल इस बात से नहीं होती कि उसने कितने वर्षों तक पढ़ाया। उसकी वास्तविक पहचान यह है कि उसने अपने विषय को समय के बदलते प्रश्नों से कितना जोड़ा। डॉ. मिश्रा की अकादमिक यात्रा में हिन्दी केवल पाठ्यक्रम का विषय नहीं रहती। वह कभी ब्लॉग और वेब मीडिया से संवाद करती है, कभी सिनेमा से, कभी अनुवाद से और कभी सांस्कृतिक कूटनीति से।

यह दृष्टि आज हिन्दी अध्ययन के लिए विशेष महत्त्व रखती है। किसी भाषा का भविष्य केवल उसकी महान साहित्यिक परंपरा से सुरक्षित नहीं होता; वह इस बात पर भी निर्भर करता है कि वह अपने समय की नई ज्ञान-प्रणालियों, तकनीकों और वैश्विक संवादों के साथ कितनी सक्रियता से जुड़ती है। डॉ. मिश्रा की अकादमिक सक्रियता इसी बदलते हुए हिन्दी-बोध की अभिव्यक्ति है।

शोध की दुनिया : परंपरागत सीमाओं से बाहर : 

डॉ. मनीष कुमार मिश्रा की शोध-यात्रा की सबसे उल्लेखनीय विशेषता विषयों की विविधता है। उन्होंने हिन्दी ब्लॉगिंग और वेब मीडिया जैसे उस समय अपेक्षाकृत नए विषयों पर कार्य किया, जब हिन्दी का अकादमिक संसार डिजिटल माध्यमों को गंभीर अध्ययन-विषय के रूप में पूरी तरह स्वीकार करने की प्रक्रिया में था।

उनकी शोध परियोजनाओं में हिन्दी ब्लॉगिंग के माध्यम से हिन्दी के वैश्विक प्रचार-प्रसार, वेब मीडिया, किशोरियों की तस्करी, लोककविता और सामाजिक चेतना तथा मालेगाँव सिनेमा जैसे विविध विषय शामिल रहे हैं। ICSSR–IMPRESS के अंतर्गत मालेगाँव सिनेमा से संबंधित परियोजना के लिए चार लाख रुपये के अनुदान का उल्लेख भी उनके अकादमिक जीवन-वृत्त में मिलता है। यह विषय-विविधता आकस्मिक नहीं है। इसके पीछे समाज और संस्कृति को बदलते माध्यमों में पढ़ने की इच्छा दिखाई देती है।

हिन्दी के पारंपरिक शोध में लंबे समय तक लेखक-केंद्रित और कृति-केंद्रित अध्ययन प्रमुख रहे। डॉ. मिश्रा का आरंभिक अकादमिक संस्कार भी साहित्य से जुड़ा है, किंतु उन्होंने अपनी शोध-दृष्टि को वहीं स्थिर नहीं होने दिया। वे साहित्य से इंटरनेट की ओर गए, इंटरनेट से मीडिया की ओर, मीडिया से सिनेमा की ओर और सिनेमा से सांस्कृतिक इतिहास तथा अंतरराष्ट्रीय संबंधों की ओर।इस यात्रा में विषय बदलते हैं, लेकिन एक केंद्रीय चिंता बनी रहती है—मनुष्य, समाज और संस्कृति के बीच बदलते संबंधों को समझना।

हिन्दी ब्लॉगिंग और डिजिटल दुनिया की प्रारंभिक आहट:

आज डिजिटल ह्यूमैनिटीज़ और सोशल मीडिया अध्ययन विश्वविद्यालयों में स्थापित अकादमिक क्षेत्रों के रूप में दिखाई देते हैं। लेकिन हिन्दी में इंटरनेट के शुरुआती विस्तार के दौर में ब्लॉगिंग को गंभीर अकादमिक विमर्श से जोड़ना अपने समय से संवाद करने का एक नया प्रयास था।

डॉ. मिश्रा द्वारा संपादित पुस्तक हिन्दी ब्लॉगिंग : स्वरूप, व्याप्ति और संभावनाएँ वर्ष 2011 में प्रकाशित हुई। उनके अकादमिक जीवन-वृत्त में इसके बाद वेबमीडिया और हिन्दी का वैश्विक परिदृश्य, वेबमीडिया और अभिव्यक्ति के खतरे तथा वैकल्पिक पत्रकारिता और सामाजिक सरोकार जैसे संपादित विषयों का उल्लेख मिलता है। 

इन शीर्षकों को एक क्रम में पढ़ें तो हिन्दी के डिजिटल विकास का एक वैचारिक मानचित्र दिखाई देता है। पहले ब्लॉगिंग की संभावनाएँ, फिर हिन्दी का वैश्विक डिजिटल परिदृश्य, उसके बाद डिजिटल अभिव्यक्ति के संकट और अंततः वैकल्पिक पत्रकारिता के सामाजिक सरोकार।

यह क्रम बताता है कि डॉ. मिश्रा तकनीक को केवल उत्सव की दृष्टि से नहीं देखते। वे उसकी संभावनाओं के साथ उसके संकटों को भी समझने का प्रयास करते हैं।यहीआलोचनात्मक संतुलन किसी गंभीर अध्येता की पहचान है।

साहित्य : शोध का विषय भी, जीवन का संवेदनात्मक आधार भी : 

डॉ. मनीष कुमार मिश्रा के व्यक्तित्व में शोधकर्ता और रचनाकार एक-दूसरे से अलग नहीं हैं। उनकी प्रकाशित रचनात्मक और आलोचनात्मक पुस्तकों में अमरकांत को पढ़ते हुए, अक्टूबर उस साल, इस बार तुम्हारे शहर में, अमलतास के गालों पर और कहानी-संग्रह स्मृतियाँ का उल्लेख मिलता है। इन शीर्षकों में ही एक संवेदनात्मक संसार मौजूद है।

‘अक्टूबर’, ‘शहर’, ‘अमलतास’, ‘स्मृतियाँ’—ये केवल शब्द नहीं, बल्कि अनुभवों के भूगोल हैं। अकादमिक लेखन प्रायः तर्क और तथ्य की माँग करता है, जबकि कविता स्मृति और संवेदना की। डॉ. मिश्रा के व्यक्तित्व में ये दोनों धाराएँ समानांतर चलती दिखाई देती हैं।शायद यही कारण है कि उनके अकादमिक विषय भी अक्सर केवल शुष्क सैद्धांतिक संरचनाएँ नहीं रहते। उनमें समाज, लोक, संस्कृति, सिनेमा, संगीत, स्मृति और मनुष्य की उपस्थिति बनी रहती है।साहित्य उनके लिए केवल पढ़ने-पढ़ाने की वस्तु नहीं, जीवन को देखने की दृष्टि है।

संपादन : अकेले लिखने से सामूहिक बौद्धिकता तक

एक लेखक अपनी आवाज़ में बोलता है, लेकिन एक संपादक अनेक आवाज़ों के लिए मंच तैयार करता है। डॉ. मनीष कुमार मिश्रा के अकादमिक जीवन में संपादन की भूमिका इसी अर्थ में विशेष है।

उनके संपादित प्रकाशनों के विषयों पर दृष्टि डालें तो एक विस्तृत बौद्धिक संसार सामने आता है—हिन्दी ब्लॉगिंग, वेब मीडिया, वैकल्पिक पत्रकारिता, क्षेत्रीय सिनेमा, शोध, फणीश्वरनाथ रेणु, कव्वाली और सूफ़ी परंपरा, सरदार वल्लभभाई पटेल, राजस्थानी सिनेमा और मध्य एशिया इनमें शोध विविधा, कव्वाली और सूफ़ी परंपरा, राष्ट्रनायक सरदार वल्लभभाई पटेल : व्यक्तित्व और कृतित्व, राजस्थानी सिनेमा का इतिहास तथा Central Asia: Literary, Cultural Scenario and Hindi जैसे ग्रंथ उनके संपादकीय कार्य के विस्तृत दायरे को सामने रखते हैं। 

संपादन उनके लिए संभवतः किसी एक अनुशासन की सीमा में रहने का उपक्रम नहीं रहा। उनके द्वारा चुने गए विषयों में एक तरह की गतिशीलता है। वे कभी डिजिटल संस्कृति को देखते हैं, कभी राष्ट्र और इतिहास को, कभी सिनेमा को, कभी सूफ़ी संगीत को और कभी मध्य एशिया को। यह विविधता उस अकादमिक मन का संकेत है जो ज्ञान को बंद कमरों में विभाजित करके नहीं देखता।

सिनेमा : लोकप्रिय संस्कृति से अकादमिक विमर्श तक : 

डॉ. मिश्रा के शोध और संपादन में भारतीय सिनेमा एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र के रूप में उभरता है। भारतीय क्षेत्रीय सिनेमा से लेकर राजस्थानी सिनेमा और मालेगाँव की स्थानीय फिल्म-संस्कृति तक उनकी रुचि लोकप्रिय संस्कृति के उन क्षेत्रों को अकादमिक विमर्श में लाने का प्रयास करती है जिन्हें लंबे समय तक साहित्य-केंद्रित हिन्दी अध्ययन में अपेक्षित स्थान नहीं मिला। सिनेमा उनके लिए केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है। वह समाज की स्मृति है, आकांक्षाओं का दृश्य संसार है और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का शक्तिशाली माध्यम भी।यही दृष्टि आगे चलकर उनके भारत–मध्य एशिया संबंधी अध्ययनों से जुड़ती दिखाई देती है।

भारतीय सिनेमा, विशेष रूप से हिन्दी सिनेमा, ने सोवियत संघ और मध्य एशिया में भारत की एक भावनात्मक छवि निर्मित की। राज कपूर से लेकर बाद की पीढ़ियों तक भारतीय फिल्मों ने उन समाजों में भारत को केवल एक देश नहीं, बल्कि गीत, संगीत, परिवार, प्रेम और भावनाओं के सांस्कृतिक संसार के रूप में उपस्थित किया। डॉ. मिश्रा की हाल की शोध-दिशाओं में उज़्बेकिस्तान और मध्य एशिया में हिन्दी सिनेमा तथा भारत–उज़्बेकिस्तान सांस्कृतिक संबंधों का अध्ययन इसी व्यापक दृष्टि से जुड़ा हुआ है। उनके जीवन-वृत्त में भी हिन्दी सिनेमा, भारत–उज़्बेकिस्तान संबंध, अनुवाद और सांस्कृतिक कूटनीति को उनकी हाल की प्रमुख शोध-दिशाओं के रूप में दर्ज किया गया है। 

ताशकंद : जहाँ अध्यापक सांस्कृतिक दूत बन जाता है:

डॉ. मनीष कुमार मिश्रा की अकादमिक यात्रा का सबसे विशिष्ट अध्याय उज़्बेकिस्तान से जुड़ता है। 2024–2025 के दौरान ताशकंद स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ ओरिएंटल स्टडीज़ में ICCR हिन्दी चेयर एवं विज़िटिंग प्रोफ़ेसर के रूप में उनका कार्य केवल एक विदेशी विश्वविद्यालय में अध्यापन की नियुक्ति नहीं था। ऐसी भूमिकाओं का अर्थ कहीं अधिक व्यापक होता है।

जब कोई भारतीय अध्यापक विदेश में हिन्दी पढ़ाता है तो वह केवल वर्णमाला, व्याकरण या साहित्य नहीं पढ़ाता। उसके माध्यम से विद्यार्थी भारत की सभ्यता, इतिहास, स्मृति, लोकजीवन और आधुनिक समाज से परिचित होते हैं। एक अर्थ में भाषा का अध्यापक वहाँ संस्कृति का अनौपचारिक राजदूत बन जाता है।

डॉ. मिश्रा ने इस अवधि में विदेशी विद्यार्थियों को हिन्दी पढ़ाने के साथ भारतीय साहित्य और संस्कृति, अनुवाद, भारतीय सिनेमा तथा सांस्कृतिक अध्ययन से संबंधित गतिविधियों में योगदान दिया। उनके अकादमिक जीवन-वृत्त के अनुसार इस अंतरराष्ट्रीय भूमिका में शिक्षण, व्याख्यान, कार्यशालाएँ, सम्मेलन, अनुवादोन्मुख गतिविधियाँ और अकादमिक सहयोग उनके कार्य के प्रमुख आयाम रहे। ताशकंद का यह अनुभव उनके अकादमिक व्यक्तित्व को एक नई दिशा देता है।अब मध्य एशिया उनके लिए केवल मानचित्र का एक भूभाग नहीं रहता; वह अनुभव का हिस्सा बन जाता है। यहीं से उनकी रुचि भारत और उज़्बेकिस्तान के सांस्कृतिक संबंधों, हिन्दी सिनेमा, अनुवाद, साहित्यिक संपर्क और सांस्कृतिक कूटनीति की ओर अधिक गहराई से बढ़ती दिखाई देती है।

भारत और मध्य एशिया : इतिहास से भविष्य तक: 

भारत और मध्य एशिया के संबंध नए नहीं हैं। इनकी जड़ें सदियों पुराने व्यापारिक मार्गों, यात्राओं, सूफ़ी परंपराओं, भाषाई आदान-प्रदान और सांस्कृतिक संपर्कों में फैली हुई हैं। आधुनिक राष्ट्र-राज्यों की सीमाओं से बहुत पहले विचार, संगीत, कथाएँ, शब्द और मनुष्य इन भूभागों के बीच यात्रा करते रहे हैं।

डॉ. मनीष कुमार मिश्रा के हाल के अकादमिक कार्यों में इसी ऐतिहासिक संवाद को समकालीन संदर्भ में पुनः देखने की कोशिश दिखाई देती है।उनके संपादन में प्रकाशित Central Asia: Literary, Cultural Scenario and Hindi इसी दिशा का महत्त्वपूर्ण पड़ाव है। उनके शोध की नई दिशाओं में मध्य एशिया, भारत–उज़्बेकिस्तान संबंध, हिन्दी सिनेमा, अनुवाद और सांस्कृतिक कूटनीति प्रमुखता से सामने आते हैं।यहाँ उनका कार्य हिन्दी अध्ययन को एक व्यापक अंतरराष्ट्रीय संदर्भ प्रदान करता है।हिन्दी को यदि विश्वभाषा के रूप में विकसित होना है तो केवल प्रवासी भारतीय समुदायों तक सीमित दृष्टि पर्याप्त नहीं होगी। उन देशों और समाजों को भी समझना होगा जहाँ हिन्दी के प्रति रुचि भारतीय फिल्मों, संगीत, योग, साहित्य, इतिहास अथवा भारत के प्रति सांस्कृतिक आकर्षण से उत्पन्न हुई है। मध्य एशिया ऐसा ही एक क्षेत्र है।डॉ. मिश्रा की अकादमिक सक्रियता इस संभावना की ओर संकेत करती है कि हिन्दी अध्ययन भविष्य में सांस्कृतिक कूटनीति का एक प्रभावी माध्यम बन सकता है।

नवरोज़ : साझा सांस्कृतिक स्मृतियों की खोज: 

डॉ. मिश्रा के अंतरराष्ट्रीय अकादमिक लेखन का एक उल्लेखनीय पक्ष नवरोज़ पर उनका अध्ययन है। उनके जीवन-वृत्त में “Nowruz in India: Representation of the Pluralistic Indian Soul” शीर्षक अध्याय का उल्लेख एक अंतरराष्ट्रीय विद्वत् प्रकाशन के संदर्भ में किया गया है। नवरोज़ को भारत के बहुलतावादी सांस्कृतिक स्वरूप के संदर्भ में देखना स्वयं में महत्त्वपूर्ण दृष्टि है।

भारत की संस्कृति की शक्ति उसकी एकरूपता में नहीं, बल्कि अनेक परंपराओं को आत्मसात करने की क्षमता में रही है। यहाँ आने वाली सांस्कृतिक धाराएँ अक्सर अपनी मूल पहचान बनाए रखते हुए भारतीय जीवन के विशाल प्रवाह का हिस्सा बन जाती हैं।नवरोज़ इसी सांस्कृतिक बहुलता का एक सुंदर उदाहरण है। इस विषय पर कार्य करते हुए डॉ. मिश्रा की दृष्टि साहित्यिक अध्ययन से आगे बढ़कर सांस्कृतिक इतिहास और साझा विरासत तक पहुँचती है। यही वह बिंदु है जहाँ उनका अध्येता-व्यक्तित्व और अंतरराष्ट्रीय अनुभव एक-दूसरे से मिलते हैं।

सम्मेलन : विचारों के सार्वजनिक मंच: 

अकादमिक संसार में शोध केवल लिखे हुए आलेखों और पुस्तकों से आगे बढ़ता है। सम्मेलन और संगोष्ठियाँ ज्ञान को संवाद में बदलती हैं। डॉ. मनीष कुमार मिश्रा के अकादमिक जीवन में सम्मेलन आयोजन एक महत्त्वपूर्ण गतिविधि रही है। हिन्दी ब्लॉगिंग पर राष्ट्रीय सम्मेलन से लेकर वेब मीडिया, वैकल्पिक पत्रकारिता, क्षेत्रीय सिनेमा, सूफ़ीवाद और कव्वाली तथा मध्य एशिया जैसे विषयों तक उनकी सम्मेलन-संबंधी सक्रियता का उल्लेख उनके जीवन-वृत्त में मिलता है। 

इन आयोजनों की विषय-सूची स्वयं उनके बौद्धिक विकास की कहानी कहती है।

पहले हिन्दी और इंटरनेट।

फिर मीडिया और अभिव्यक्ति।

फिर समाज और वैकल्पिक पत्रकारिता।

फिर सिनेमा।

फिर संगीत और सूफ़ी संस्कृति।

और अंततः मध्य एशिया तथा अंतरराष्ट्रीय सांस्कृतिक संवाद।

यह यात्रा बताती है कि उनके लिए सम्मेलन केवल अकादमिक औपचारिकता नहीं, बल्कि नए विमर्श निर्मित करने का माध्यम रहे हैं।

संस्था के भीतर एक सक्रिय अकादमिक भूमिका: 

किसी शिक्षक के कार्य का मूल्यांकन केवल उसके शोध-प्रकाशनों से करना अधूरा होगा। विश्वविद्यालय और महाविद्यालय का जीवन अनेक प्रशासनिक तथा शैक्षणिक उत्तरदायित्वों से निर्मित होता है। डॉ. मिश्रा ने अपने संस्थान में IQAC, परीक्षा समिति, आंतरिक अकादमिक ऑडिट, महाविद्यालयीन पत्रिका तथा नैतिकता और बौद्धिक संपदा से संबंधित गतिविधियों में उत्तरदायित्व निभाए हैं। अकादमिक योजना, विद्यार्थी मार्गदर्शन और शोध-प्रोत्साहन भी उनके संस्थागत कार्य के हिस्से रहे हैं। 

यह पक्ष विशेष उल्लेखनीय है, क्योंकि सृजनात्मक और शोधपरक सक्रियता के साथ प्रशासनिक दायित्वों का संतुलन आसान नहीं होता। एक ओर कविता की संवेदना है, दूसरी ओर परीक्षा और समितियों की प्रशासनिक संरचना; एक ओर अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन हैं, दूसरी ओर विद्यार्थियों की दैनिक शैक्षणिक आवश्यकताएँ। इन सबके बीच सक्रिय रहना ही एक शिक्षक के वास्तविक संस्थागत जीवन की कहानी है।

सम्मान और उपलब्धियाँ : यात्रा के पड़ाव: 

डॉ. मनीष कुमार मिश्रा की अकादमिक यात्रा को विभिन्न अवसरों पर सम्मान और मान्यता भी प्राप्त हुई है। उनके जीवन-वृत्त में एम.ए. हिन्दी का स्वर्ण पदक, UGC Research Award, भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान शिमला से एसोसिएटशिप तथा विभिन्न साहित्यिक और शैक्षणिक सम्मानों का उल्लेख है। 

सम्मान किसी व्यक्ति के कार्य का अंतिम मूल्यांकन नहीं होते, लेकिन वे उसकी यात्रा के महत्त्वपूर्ण पड़ाव अवश्य होते हैं । उनका वास्तविक महत्त्व तब बढ़ता है जब सम्मान प्राप्त करने वाला व्यक्ति उन्हें विश्राम का कारण न बनाकर आगे बढ़ने की प्रेरणा बनाए। डॉ. मिश्रा की निरंतर अकादमिक सक्रियता इसी प्रवृत्ति की ओर संकेत करती है।

एक शिक्षक, जो लगातार अपना विषय विस्तृत करता रहा : 

डॉ. मनीष कुमार मिश्रा की पूरी यात्रा को देखें तो एक विशेष प्रवृत्ति बार-बार दिखाई देती है—अपने विषय की सीमाओं का निरंतर विस्तार। उन्होंने हिन्दी साहित्य से शुरुआत की, लेकिन हिन्दी साहित्य में बंद नहीं रहे।

उन्होंने आलोचना की, फिर कविता लिखी।

उन्होंने ब्लॉगिंग का अध्ययन किया, फिर वेब मीडिया तक गए।

मीडिया से सिनेमा की ओर बढ़े।

सिनेमा से संस्कृति की ओर।

संस्कृति से मध्य एशिया की ओर।

और मध्य एशिया से सांस्कृतिक कूटनीति की ओर।

यह विस्तार आज के अंतर्विषयी अकादमिक संसार की आवश्यकता भी है।

इक्कीसवीं सदी में ज्ञान की पुरानी सीमाएँ तेजी से बदल रही हैं। साहित्य को इतिहास से अलग करके नहीं समझा जा सकता; इतिहास को संस्कृति से; संस्कृति को मीडिया से; और मीडिया को तकनीक से। डॉ. मिश्रा का अकादमिक कार्य इसी अंतर्संबंध को अपने ढंग से व्यक्त करता है।

कविता और अकादमिकता के बीच: 

किसी अकादमिक व्यक्ति के भीतर कवि का होना उसे एक अतिरिक्त संवेदनात्मक दृष्टि देता है।

शोध तथ्य खोजता है।

कविता अर्थ खोजती है।

शोध प्रमाण माँगता है।

कविता अनुभव की उन परतों को छूती है जिनका हमेशा प्रमाण नहीं होता।

डॉ. मिश्रा के व्यक्तित्व में इन दोनों का सह-अस्तित्व उनके लेखन और विषय-चयन को विशिष्ट बनाता है। उनके रचनात्मक साहित्य के शीर्षक स्मृति, शहर, प्रकृति और मनुष्य के निजी अनुभवों की ओर संकेत करते हैं, जबकि उनका अकादमिक संसार मीडिया, सिनेमा, संस्कृति और अंतरराष्ट्रीय संबंधों तक फैला हुआ है। इन दोनों के बीच कोई विरोध नहीं है। बल्कि शायद उनका कवि ही उन्हें संस्कृतियों के बीच छिपी हुई आत्मीयताओं को देखने की दृष्टि देता है।एक प्रशासनिक दस्तावेज़ भारत और उज़्बेकिस्तान को दो देशों के रूप में देखता है। एक इतिहासकार उन्हें संपर्कों के क्रम में पढ़ता है। लेकिन एक कवि उन दोनों के बीच साझा गीत, स्मृति, चेहरा, मौसम और मनुष्य भी खोजता है। यही संवेदनात्मक दृष्टि सांस्कृतिक कूटनीति को सरकारी औपचारिकता से निकालकर मानवीय संवाद में बदल सकती है।

हिन्दी का वैश्विक क्षितिज: 

डॉ. मनीष कुमार मिश्रा की यात्रा का एक केंद्रीय सूत्र हिन्दी का वैश्विक विस्तार है। यह विस्तार केवल इस अर्थ में नहीं कि दुनिया में कितने लोग हिन्दी बोलते हैं। वास्तविक वैश्विकता तब आती है जब कोई भाषा अन्य भाषाओं और संस्कृतियों के साथ बराबरी के स्तर पर संवाद करती है।

ताशकंद में हिन्दी पढ़ाने का अनुभव, विदेशी विद्यार्थियों के साथ संवाद, मध्य एशिया पर शोध, अनुवाद में रुचि और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों की सक्रियता इसी दिशा के अलग-अलग आयाम हैं। हिन्दी के अध्यापक की भूमिका यहाँ बदल जाती है। वह केवल हिन्दी का प्रतिनिधि नहीं रहता; वह भारत की बहुलतावादी संस्कृति का प्रतिनिधि बन जाता है। इस भूमिका के लिए भाषा-ज्ञान के साथ सांस्कृतिक संवेदनशीलता आवश्यक है। दूसरी संस्कृति को केवल अपनी दृष्टि से देखना पर्याप्त नहीं। उसके इतिहास, भाषा, स्मृतियों और आत्मसम्मान को समझना भी आवश्यक है। डॉ. मिश्रा का मध्य एशिया की ओर बढ़ता अकादमिक झुकाव इस परस्परता की संभावना को रेखांकित करता है।

परंपरा में जड़ें, विश्व की ओर दृष्टि: 

डॉ. मनीष कुमार मिश्रा के अकादमिक पोस्टर पर अंकित भाव—भारतीय परंपरा में जड़ें और विश्व से संवाद—उनकी यात्रा को संक्षेप में व्यक्त करने वाला सूत्र माना जा सकता है।

उनका आधार हिन्दी है।

लेकिन उनकी दृष्टि केवल हिन्दी तक सीमित नहीं।

उनकी जड़ें भारतीय साहित्य और संस्कृति में हैं।

लेकिन उनकी जिज्ञासा मध्य एशिया तक जाती है।

वे कक्षा में अध्यापक हैं।

पुस्तक में लेखक।

शोध में अध्येता।

सम्मेलन में संयोजक।

और अंतरराष्ट्रीय संदर्भ में सांस्कृतिक संवादकर्ता।

यही बहुआयामिता उनके परिचय को विशिष्ट बनाती है।

उपलब्धियों से अधिक संभावनाओं का व्यक्तित्व

किसी सक्रिय व्यक्ति का परिचय लिखते समय सबसे बड़ी कठिनाई यह होती है कि उसकी यात्रा अभी जारी होती है। इसलिए उसका मूल्यांकन निष्कर्ष की भाषा में नहीं किया जा सकता।डॉ. मनीष कुमार मिश्रा के संदर्भ में भी यही बात लागू होती है।

उनकी अब तक की अकादमिक यात्रा में दो दशकों से अधिक का अध्यापन, साहित्यिक लेखन, शोध परियोजनाएँ, पुस्तक-संपादन, सम्मेलन आयोजन, संस्थागत दायित्व और अंतरराष्ट्रीय अध्यापन जैसे अनेक आयाम शामिल हैं। लेकिन उनके हाल के शोध-विषयों को देखते हुए यह यात्रा एक नए चरण में प्रवेश करती दिखाई देती है।

भारत और मध्य एशिया के संबंधों में हिन्दी की भूमिका क्या रही है?

भारतीय सिनेमा ने मध्य एशियाई समाज में भारत की कैसी छवि निर्मित की?

उज़्बेक भाषा में भारतीय साहित्य के अनुवाद का इतिहास क्या है?

हिन्दी शिक्षण सांस्कृतिक कूटनीति का माध्यम कैसे बन सकता है?

साझा सांस्कृतिक विरासत को नए अकादमिक विमर्शों में किस प्रकार समझा जा सकता है?

ये प्रश्न भविष्य में उनके शोध की संभावित दिशाओं को और व्यापक बना सकते हैं।

एक लंबी यात्रा का वर्तमान पड़ाव: 

अंततः डॉ. मनीष कुमार मिश्रा का परिचय किसी पदनाम से पूरा नहीं होता। ‘असोसिएट प्रोफ़ेसर’ उनका वर्तमान संस्थागत पद है, लेकिन उनका वास्तविक परिचय इससे अधिक विस्तृत है। उनका परिचय उस विद्यार्थी में है जिसने हिन्दी में स्वर्ण पदक प्राप्त करने के बाद सीखना बंद नहीं किया। उस अध्यापक में है जिसने कक्षा को अपनी अंतिम सीमा नहीं माना।उस शोधकर्ता में है जिसने साहित्य के साथ ब्लॉग, मीडिया और सिनेमा को भी अध्ययन की गंभीर सामग्री माना।उस संपादक में है जिसने अनेक विषयों और विद्वानों को साझा मंच प्रदान किया। उस कवि में है जो अकादमिक व्यस्तताओं के बीच भी स्मृतियों, शहरों, प्रकृति और मनुष्य के लिए शब्द बचाए रखता है। और उस भारतीय अध्यापक में है जो ताशकंद जाकर अनुभव करता है कि भाषा सीमाओं को पार करती है तो केवल शब्द नहीं ले जाती—वह अपने साथ एक पूरी सभ्यता की स्मृतियाँ लेकर जाती है।

डॉ. मनीष कुमार मिश्रा की अब तक की यात्रा को यदि एक वाक्य में समझना हो तो कहा जा सकता है कि यह शब्द से संसार तक पहुँचने की यात्रा है। यह यात्रा हिन्दी की कक्षा से आरंभ होती है, साहित्य के गलियारों से गुजरती है, डिजिटल दुनिया से संवाद करती है, सिनेमा के पर्दे पर समाज को खोजती है, सूफ़ी संगीत की सांस्कृतिक स्मृतियों को सुनती है और अंततः मध्य एशिया की धरती पर भारत की भाषा और संस्कृति के लिए नए संवाद तलाशती है।

ऐसे समय में, जब दुनिया राजनीतिक सीमाओं के कारण बार-बार विभाजित दिखाई देती है, भाषा, साहित्य और संस्कृति से जुड़े लोगों का दायित्व और बढ़ जाता है। वे हमें याद दिलाते हैं कि सभ्यताओं के वास्तविक संबंध केवल समझौतों से नहीं बनते; वे कहानियों, कविताओं, गीतों, अनुवादों, फिल्मों और मनुष्यों के बीच होने वाले संवादों से बनते हैं।

डॉ. मनीष कुमार मिश्रा की अकादमिक यात्रा इसी संवाद की एक सतत कोशिश के रूप में देखी जा सकती है। उनके लिए हिन्दी केवल आजीविका की भाषा नहीं है—वह पहचान भी है, शोध भी, सृजन भी और दुनिया तक पहुँचने का माध्यम भी।शायद इसीलिए उनके व्यक्तित्व के लिए सबसे उपयुक्त परिचय यही हो सकता है—

एक शिक्षक, जो शोध की ओर चलता रहा;एक शोधकर्ता, जिसने साहित्य को नहीं छोड़ा;एक साहित्यकार, जिसने अपने समय के नए माध्यमों से संवाद किया;और एक भारतीय अध्यापक, जिसने भाषा को संस्कृतियों के बीच पुल बनाने का माध्यम बनाया।

उनकी यात्रा अभी जारी है। और किसी सृजनशील व्यक्ति के जीवन में इससे अधिक आश्वस्त करने वाली बात दूसरी क्या हो सकती है कि उसकी सबसे महत्त्वपूर्ण पुस्तक, उसका सबसे व्यापक शोध और उसका सबसे अर्थवान सांस्कृतिक संवाद शायद अभी लिखा जाना बाकी हो।


डॉ गरिमा जोशी

 गोधरा,  गुजरात ।

















Dr. ManishKumar Mishra poster profile


 

Academic Biography of Dr. Manish Kumar Mishra

 Academic Biography of Dr. Manish Kumar Mishra 











Born on 9 February 1981, Dr. Manish Kumar Mishra developed an early interest in literature, language, and education that evolved into a distinguished academic career. He completed his higher education at the University of Mumbai, earning an M.A. in Hindi (Gold Medal), a Ph.D. in Hindi, an M.A. in English, and a B.Ed. He also completed an MBA in Human Resource Management, reflecting his interdisciplinary academic outlook.

Beginning his teaching career in 2003, he has served in junior and senior college education and has continuously contributed to teaching, research, publication, and academic administration. Over the years, he has undertaken funded research projects, edited interdisciplinary books, organized national and international conferences, and participated actively in quality assurance and institutional development.

His appointment as ICCR Hindi Chair in Uzbekistan marked a significant international phase in his career, enabling him to contribute to Hindi language promotion and India–Central Asia academic cooperation. Through lectures, seminars, translation activities, and collaborative research, he helped strengthen educational and cultural engagement between the two regions.

Dr. Mishra's academic work reflects a commitment to intellectual rigor, cultural dialogue, and socially relevant scholarship. His publications, research projects, and international collaborations demonstrate a sustained effort to expand the horizons of Hindi studies in both national and global contexts.

Dr. Manish Kumar Mishra is an accomplished Indian academic, researcher, author, editor, translator, and academic administrator whose career spans more than two decades in higher education. His scholarship combines classical literary inquiry with contemporary interdisciplinary research in Hindi language and literature, Indian cinema, translation studies, comparative literature, media studies, cultural diplomacy, and India–Central Asia relations.

Currently serving as Associate Professor in the Department of Hindi at K.M. Agrawal College of Arts, Commerce & Science, Maharashtra, he has made sustained contributions to teaching, curriculum development, research supervision, academic administration, and institutional quality enhancement.

A defining milestone in his career was his appointment as the ICCR Hindi Chair and Visiting Professor at Tashkent State University of Oriental Studies, Uzbekistan (2024–2025). During this tenure, he represented Indian higher education internationally by teaching Hindi language and literature, promoting Indian culture, developing academic collaborations, organizing international conferences and workshops, and strengthening educational and cultural ties between India and Central Asia.

Dr. Mishra has authored and edited numerous scholarly books and has contributed book chapters and research papers published by reputed academic publishers and journals. His research addresses modern Hindi literature, Indian cinema, translation studies, digital humanities, cultural studies, Indian Knowledge Systems, and comparative literary traditions.

Beyond scholarship, he has played a significant role in academic leadership through curriculum development, quality assurance initiatives, conference organization, editorial work, and collaborative research. His commitment to advancing Hindi studies extends to mentoring young researchers, promoting interdisciplinary scholarship, and fostering international academic dialogue.

His academic vision is to establish Hindi as a dynamic global language of research, cultural exchange, and intellectual engagement while contributing to the internationalization of Indian knowledge traditions.

Core Areas of Expertise

Hindi Language and Literature

Modern Hindi Fiction and Poetry

Indian Cinema Studies

Comparative Literature

Translation Studies

Cultural Studies

Media and Communication

Digital Humanities

Indian Knowledge Systems

India–Central Asia Studies

Academic Leadership and Curriculum Development

Research Methodology

Dr. Shama 


Saturday, 18 July 2026

Food Politics in Language, Literature and Cinema

 Food Politics in Language, Literature and Cinema


शोध आलेख आमंत्रित | Call for Research Papers

Food Politics in Language, Literature and Cinema(भाषा, साहित्य और सिनेमा में भोजन की राजनीति)

भोजन केवल पोषण का साधन नहीं, बल्कि संस्कृति, पहचान, सत्ता, स्मृति, जाति, वर्ग, लिंग और सामाजिक संबंधों का एक महत्त्वपूर्ण विमर्श है। इसी बहुआयामी विषय पर मौलिक एवं अप्रकाशित शोध आलेख आमंत्रित हैं।

📌 आलेख हिन्दी अथवा अंग्रेज़ी—दोनों में से किसी भी भाषा में भेजे जा सकते हैं।

प्रमुख विषयों में शामिल हैं:• Food and Cultural Identity• Food and Language• Food in Literature and Cinema• Food, Power and Politics• Food and Gender• Food and Religion• Food, Memory and Migration• Food and Sustainability• तथा अन्य संबंधित विषय।

📅 आलेख भेजने की अंतिम तिथि: 15 अगस्त 2026

📧 ई-मेल: manishmuntazir@gmail.com

संपादक

डॉ. मनीष कुमार मिश्रा

असोसिएट प्रोफ़ेसर, हिन्दी विभाग

के. एम. अग्रवाल महाविद्यालय,

 कल्याण (पश्चिम), महाराष्ट्र


📢 Call for Research Papers

Food Politics in Language, Literature and Cinema

Food is much more than nourishment—it is deeply connected with culture, identity, memory, power, gender, class, caste, religion, and social relations. Original and unpublished research papers are invited for an edited academic volume on this interdisciplinary theme.

✅ Papers may be submitted in either Hindi or English.

📅 Submission Deadline: 15 August 2026

📧 Email: manishmuntazir@gmail.com

We warmly invite scholars, researchers, faculty members, and research students from Language, Literature, Cultural Studies, Film Studies, Media Studies, Sociology, Anthropology, and related disciplines to contribute to this scholarly initiative.

#CallForPapers #FoodPolitics #Language #Literature #Cinema #Hindi #English #CulturalStudies #FilmStudies #Research #AcademicWriting #EditedBook #InterdisciplinaryResearch









Solid serial number Note


 

Call for Research Papers

 शोध आलेख आमंत्रित | Call for Research Papers

Food Politics in Language, Literature and Cinema(भाषा, साहित्य और सिनेमा में भोजन की राजनीति)

भोजन केवल पोषण का साधन नहीं, बल्कि संस्कृति, पहचान, सत्ता, स्मृति, जाति, वर्ग, लिंग और सामाजिक संबंधों का एक महत्त्वपूर्ण विमर्श है। इसी बहुआयामी विषय पर मौलिक एवं अप्रकाशित शोध आलेख आमंत्रित हैं।

📌 आलेख हिन्दी अथवा अंग्रेज़ी—दोनों में से किसी भी भाषा में भेजे जा सकते हैं।

प्रमुख विषयों में शामिल हैं:• Food and Cultural Identity• Food and Language• Food in Literature and Cinema• Food, Power and Politics• Food and Gender• Food and Religion• Food, Memory and Migration• Food and Sustainability• तथा अन्य संबंधित विषय।

📅 आलेख भेजने की अंतिम तिथि: 15 अगस्त 2026

📧 ई-मेल: manishmuntazir@gmail.com

संपादक

डॉ. मनीष कुमार मिश्रा

असोसिएट प्रोफ़ेसर, हिन्दी विभाग

के. एम. अग्रवाल महाविद्यालय,

 कल्याण (पश्चिम), महाराष्ट्र


📢 Call for Research Papers

Food Politics in Language, Literature and Cinema

Food is much more than nourishment—it is deeply connected with culture, identity, memory, power, gender, class, caste, religion, and social relations. Original and unpublished research papers are invited for an edited academic volume on this interdisciplinary theme.

✅ Papers may be submitted in either Hindi or English.

📅 Submission Deadline: 15 August 2026

📧 Email: manishmuntazir@gmail.com

We warmly invite scholars, researchers, faculty members, and research students from Language, Literature, Cultural Studies, Film Studies, Media Studies, Sociology, Anthropology, and related disciplines to contribute to this scholarly initiative.

#CallForPapers #FoodPolitics #Language #Literature #Cinema #Hindi #English #CulturalStudies #FilmStudies #Research #AcademicWriting #EditedBook #InterdisciplinaryResearch



Thursday, 16 July 2026

अहमद फ़राज़ के बेस्ट 20 शेर

 अहमद फ़राज़ के बेस्ट 20 शेर


1.ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो

नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें


2.कुछ तो मिरे पिंदार-ए-मोहब्बत का भरम रख

तू भी तो कभी मुझ को मनाने के लिए आ


3.डूबते डूबते कश्ती को उछाला दे दूँ

मैं नहीं कोई तो साहिल पे उतर जाएगा


4.जुदाइयाँ तो मुक़द्दर हैं फिर भी जान-ए-सफ़र

कुछ और दूर ज़रा साथ चल के देखते हैं


5.इस ज़िंदगी में इतनी फ़राग़त किसे नसीब

इतना न याद आ कि तुझे भूल जाएँ हम


6.ज़िंदगी से यही गिला है मुझे

तू बहुत देर से मिला है मुझे


7.यूँही मौसम की अदा देख के याद आया है

किस क़दर जल्द बदल जाते हैं इंसाँ जानाँ


8.कितना आसाँ था तिरे हिज्र में मरना जानाँ

फिर भी इक उम्र लगी जान से जाते जाते


9.ये ख़्वाब है ख़ुशबू है कि झोंका है कि पल है

ये धुँद है बादल है कि साया है कि तुम हो


10.जब भी दिल खोल के रोए होंगे

लोग आराम से सोए होंगे


11.ये कौन फिर से उन्हीं रास्तों में छोड़ गया

अभी अभी तो अज़ाब-ए-सफ़र से निकला था


12.तेरी बातें ही सुनाने आए

दोस्त भी दिल ही दुखाने आए


13.कैसा मौसम है कुछ नहीं खुलता

बूँदा-बाँदी भी धूप भी है अभी


14.ख़ुश हो ऐ दिल कि मोहब्बत तो निभा दी तू ने

लोग उजड़ जाते हैं अंजाम से पहले पहले


15.हम कि दुख ओढ़ के ख़ल्वत में पड़े रहते हैं

हम ने बाज़ार में ज़ख़्मों की नुमाइश नहीं की


16.यूँही मर मर के जिएँ वक़्त गुज़ारे जाएँ

ज़िंदगी हम तिरे हाथों से न मारे जाएँ


17.जिन के हम मुंतज़िर रहे उन को

मिल गए और हम-सफ़र शायद


18.लोग हर बात का अफ़्साना बना देते हैं

ये तो दुनिया है मिरी जाँ कई दुश्मन कई दोस्त


19.किसे ख़बर वो मोहब्बत थी या रक़ाबत थी

बहुत से लोग तुझे देख कर हमारे हुए


20.क्या लोग थे कि जान से बढ़ कर अज़ीज़ थे

अब दिल से महव नाम भी अक्सर के हो गए

उज़्बेकी कहानियों में माँ, स्मृति और मानवीय करुणा का संसार

  उज़्बेकी कहानियों में माँ, स्मृति और मानवीय करुणा का संसार चयनित कहानियों के संदर्भ में एक समीक्षात्मक अध्ययन प्रस्तावना साहित्य में माँ क...

Popular Posts