जाता हुआ साल
किसी पुराने कैलेंडर की तरह
दीवार से उतर रहा है
और कीलों पर
हमारी उम्मीदें टँगी रह जाती हैं।
नया वर्ष
आ गया है पर तुम मेंरे
गए नहीं
पर मिट्टी अब भी
बीजों की नींद सँभाले हुए है
कुछ प्रश्न
उत्तर बनने से पहले
आदत बन गए—
जैसे शाम की थकान,
जिसे हम
नाम नहीं देते।
धीरे से आदतें बदलीं—
यही उसका सबसे
गहरा हस्तक्षेप था।
Dr Manish Kumar Mishra
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