Friday, 1 May 2026

'इस बार तुम्हारे शहर में' कविता के माध्यम से

 

'इस बार तेरे शहर में'

‘’संवेदनाएँ

जहाँ असहाय हों

वहाँ

उन्हें दुलराने को

उपस्थित हों सकें

मेरी भी

कविताओं के शब्द।‘’

'इस बार तेरे शहर में'  काव्य-संग्रह साहित्य-सृजन के माध्यम से प्रकृति सौंदर्य, मानवीय संवेदनाओं, दुनियाई        तानों-बानों एवम् मनुष्य के सामाजिक सरोकारों की सुंदर अभिव्यक्ति करता है। जीवन के विविध रूपों में नारी की उपस्थिति, चाहे वह माँ हो या प्रेयसी हो, उसका महत्व एवम् सार्थकता को पूरी गहराई के साथ चित्रित किया गया है।

इन घाटों का तट

तृष्णाओं की तृषिता है।

तने हुए तन का

अंतिम पड़ाव तो

भरे हुए मन का

सम्मोहन केंद्र।

संग्रह में प्रकृति के अनुपम सौंदर्य को, बनारस शहर की स्मृतियों को जीवंत रूप से उकेरा गया है। शहर की गलियाँ, उसके घाट, दुकानें और विविध किरदारो से जुड़े हुए अनुभव ध्यानाकर्षित करते हैं।

लेकिन

हम भूल गए थे कि

कैमरा

यादों को कैद कर सकता है

लौटा नहीं सकता।

कई आधुनिक प्रतीकों जैसे चाय का कप, मोबाईल, नेल पॉलिश, कैमरा, पेन, नेलकटर, जूते, विजिटिंग कार्ड इत्यादि का नये संदर्भों में प्रयोग किया गया है।

जीवन के तीस बसंत बाद

जब पीछे मुड़कर देखता हूँ

तो कई मुस्कुराते चेहरों को पाता हूँ

लगभग हर आँख में

अपने लिए प्यार पाता हूँ

अपने लिए इंतजार पाता हूँ।

 

यह काव्य-संग्रह कवि के पिछले तीस सालों का लेखा-जोखा है और उन सभी के प्रति आभार प्रदर्शन भी है जिन्होंने उनका स्वरूप गढ़ने में सहायता की। कवि दिखावे में नहीं अपितु सच्चाई की सहज प्रतिक्रिया में विश्वास करता है।

इस बार

जब तुम्हारे शहर में था

तब

तुम नहीं मिली

और

नहीं मिला

तुम्हारे शहर का

वह मौसम भी

कि जिसका मैं दीवाना हूँ।

'इस बार तुम्हारे शहर में' कविता के माध्यम से जीवन की सच्चाई बतलाई गई है कि आनंद बाहरी नहीं अपितु आंतरिक तत्त्व है हृदय जब एकाकी, दुःखी और प्रियविहीन हो तो सारे बाहरी उपक्रम बेमानी लगते हैं। अभिव्यक्ति की ताजगी और भाषा का सटीक प्रयोग पाठकों को बांधे रखता है।

डॉ. श्रीमती रीना थॉमस                                                                                                                                           सहायक प्राध्यापक हिन्दी                                                                                                               संत अलॉयसियस स्वशासी महाविद्यालय                                                                                                                                                        जबलपुर (.प्र.)

 

मनीष : अस्तित्व की क्षणिकता व जीवन की नश्वरता में भावों व अनुभूति की शाश्वतता के कवि

 

मनीष : अस्तित्व की क्षणिकता व जीवन की नश्वरता में भावों व अनुभूति की शाश्वतता के कवि

 

 

वर्तमान कविता जटिल जगत की यथार्थता तथा मानव की अनुभूतिजन्य आवश्यकता के मध्य संघर्ष कर रही है। त्रासदीपूर्ण विडंबना के दौर में अपने जीवन और साहित्य को लहूलुहान कर रहा है। ऐसे में कुछ कविताएं मूल्यों की रक्षा के लिए संजीवनली दे रही है तथा संबंधों को सहज बनाने का प्रयास कर रही है। वर्तमान युग के भाव बोध को समझने और रंजीत करने की क्षमता जिन कवियों में नजर आती है उनमें से एक युवा कवि मनीष हैं।

हाल ही में उनकी दो रचनाएं ‘इस बार तेरे शहर में (2018)’ और ‘अक्टूबर उस साल (2019)’ प्रकाशित हुई हैं। दोनों रचना संग्रह भाव प्रवणता, विषय वैविध्य तथा प्रस्तुति योजना और शब्द शक्ति की दृष्टि से प्रशंसनीय हैं। इनमें जटिल यथार्थ को समेटने की शक्ति भी दिखाई पड़ती है।

कविताओं के शब्द’ कविता में कविता की भाषा के संवर्धन के महत्त्व व कवि की इस संदर्भ में दृष्टि स्पष्ट है। कवि काव्य की भाषा की उपयोगिता तथा संवेदनशीलता से भलीभांति परिचित है। स्त्री-पुरुष के यांत्रिक समानता के स्थान पर यथोचित समता व व्यक्तिनिष्ठता को महत्त्व दे कर स्त्रीत्व को पढ़ा गया है। ‘दुबली-पतली और उजली-सी लड़की’ ‘उसका मन’ ‘उसके संकल्पों का संगीत’ तुम जो सुलझाती हो’ यह निर्मला पुतुल के पठन के आग्रह को पूरा करने का प्रयास नजर आता है कि (तन के भूगोल से परे, स्त्री के मन की गाँठे खोल कर, पढ़ा है कभी तुमने उसके भीतर का खौलता इतिहास..)।

युवाकवि मनीष की दोनों रचनाओं में स्त्री-पुरुष संबंधों की जटिलता तथा उसके उलझे सूत्रों को स्पर्श किया गया है। प्रेम और आकर्षण के कार्यव्यापार में उद्दीपन व प्रतिकर्षण के पहलू प्रकाशित होते हैं। ‘तुम्हारे ही पास’, ‘तृषिता’, ‘कही अनकही’, ‘चांॅदनी पीते हुए’, ‘गांठा की गठरी’,‘बचना चाहता हूँ’ इत्यादि में प्रेम के प्रति जैविक व सामाजिक अंतर को उद्दात्ततापूर्वक परोसा गया है। संबंधों के प्रति ‘दूरी की छटपटाहट’ तथा ‘निकटता के अनछुएपन’ को आत्मीयतापूर्वक प्रस्तुत किया गया है। ‘मैं नहीं चाहता था’ में प्रेम के कलंकित विजय व गौरवपूर्ण पराजय को व्यंजित किया गया है। कई स्थानों पर प्रेम श्रद्धा के स्तर छूता प्रतीत होता है। अस्तित्व की क्षणिकता व जीवन की नश्वरता में भावों व अनुभूति की शाश्वतता को कवि, ‘कि तुम जरूर रजना’ में उकेरने का सार्थक प्रयास करता है। ‘अनगिनत मेरी प्रार्थनाएं’,‘चाय का कप’ में कवि संबंधों की बुनियाद व उसके कोमलता व कांतता को प्रतिष्ठित करता है। ‘कही-अनकही’ में व्यिंतव की भिन्नता के बावजूद स्नेहशक्ति से दृढबंधित मनुष्य की विनम्र अपेक्षा झलकती है।

आधुनिक जीवन की जटिलताओं में प्रमुख है एक साथ कई भूमिकाओं को निभाना या उसमें अनुकूलतम उपलब्धि प्राप्त कर ल्ोना, कवि मनीष में ‘मौन प्रार्थना के साथ’ निष्पक्षतापूर्वक इसे समेटने और पाठकों में सहृदयता भर देने की प्रखर क्षमता है। सामाजिक आलोचनापरकता तथा व्यक्ति का इसमें उलझाव चिन्तनीय है। जो रचना संग्रह में कई बार उभर कर सामने आता है। आधुनिक जीवन का अजनबीपन, विसंगति बोध व रिक्त हृदय के त्रास में कवि ने ‘रिक्त स्थानों की पूर्ति’ जैसी रचनाएं भी हैं।

मनीष जी की कई रचनाओं में स्त्री सौंदर्यबोध व प्रेमदृष्टि छायावादी प्रतीत होती है विश्ोषकर पंत जी काव्य जैसी (सरल भौहों में था आकाश, हास में श्ौशव का संसार...)। स्निग्ध कोमल गात वर्णन व भावप्रवणता का स्तर मात्रात्मक दृष्टि से निःसन्देह कम होते हुए भी समान है परंतु ध्यातव्य है कि ‘जीवनराग’ जैसी कुछेक कविताओं को छोड़ दे तो अभिजात्यता की जगह मानक भाषा ही मिलती है। यह श्रद्धामूलक झुकाव ‘सवालों में बंधी’, ‘प्यार के किस्सों’ तथा ‘जीवन यात्रा’ में भावनात्मक पदचिन्ह छोड़ता चला जाता है।

अच्छा बिस्तर नींद की गारंटी नहीं है न ही धन सुख का है। कवि कई दैनिक जीवन की वस्तुओं जैसे ‘कैमरा’ से याद ‘पेन’ द्वारा नवीनता तथा ‘विजिटिंग कार्ड’ द्वारा मतलबी संबंधों पर व्यंग्य करते हैं।

आधुनिक साहित्य पर्यावरण चिंताओं व सतर्कतावों से भरा चिंतन बन गया है परन्तु ‘हे देवभूमि’ व ‘वह गीली चिड़िया’ में पर्यावरण भावभूमि पर समांगीकरण का प्रयास करता है। ‘अक्टूबर उस साल में’ कई कविताएं जैसे ‘मतवाल करुणामय पावस’, ‘बसंत का खाब कबीला’ में प्रकृति वर्णन व आयागमत विविधता की दृष्टि से श्रेष्ठ है। ‘भूली-भूली जनश्रुतियों ने’ में भी प्रकृति के प्रतीक बंद प्रतीत नहीं होते हैं।

अधिकांश कवियों के आरंभिक संग्रहों में स्वच्छंद भाववमन अधिक प्रदर्शित होता है परन्तु मनीष जी के संग्रह इससे भिन्न हैं जहाँ सहज भावनाओं का उच्छलन है। बावजूद इसके इसमें भाषाई साफगोई, तार्किकता व अनुभूति की विशिष्टता साहित्यिक संस्कारों से युक्त बना देती है जैसे ‘जब कोई किसी को याद करता है’, ‘जीवन के तीस बसंत’, ‘तुम मिलती तो बताता’, ‘यह पीला स्वेटर’, ‘कच्चे से इश्क’ आदि। प्रेम में अस्तित्व की अंतर्निभरता जो विलय तक पहुंचती है कहीं-हीं अचानक प्रखर हो उठती है जैसे ‘हे मेरी तुम’ रचना में हुई है।

इन काव्य संग्रहों में अन्तर्जगत की सिक्तता, मरुता और ग्रंथियाँ लंबे प्रवास पर निकल चुकी प्रतीत होती है। ‘आज मेरे अंदर की रुकी हुई नदी’, ‘विकलता के स्वप्न’,‘कृतघ्न यातना’ में कवि के उद्वेलन व संघर्ष के ताने-बाने बनते बिगड़ते गतिमान है।

मानवीय संबंधों की अनुभूती चेतना कई कविताओं में सहजता पूर्वक प्रवाहित होती गई है जो पाठकों के लिए कथ्य व कथन के अंतराल की नगण्यता के कारण अतिग्राह्य है, ‘मुझे आदत थी’ व ‘उस साल अक्टूबर’ जैसी कविताएं इस दिशा में आगे ल्ो जाती है।

कवि कलाकार होता है यह रंगरेज पाठकों के हृदय पृष्ठ पर शब्द तूलिका से मर्मस्पर्शी चित्र बनाता है। मनीष जी जैसा कवि हो और विषय बनारस जैसा शहर हो तो बस कहना ही क्या? लगता है जैसे ‘इस बार तेरे शहर में’, ‘बनारस के घाट’ देख ही आएं क्या? ‘लंकेटिंग’ फीलिंग भला कविताओं में कहाँ तक समाए? बहरहाल ‘अयोध्या’ ओर ‘मणिकर्णिका’ जैसी कविताएं पाठकों में जीवनमूल्यों के प्रति यह गहरी समझ विकसित करती है की जीवन नश्वर है और परंपरा का प्रवाह शाश्वत है।

हिन्दी प्रदेश में भाषाई क्ष्ोत्रवाद की स्थिति विचित्र है यह एक साथ जोड़ती व बाँटती है। ‘मैंने कुछ गालियाँ सीखी है’ में रचनाकार ने पाठकों को इस स्थिति में डाल दिया है जहाँ वह यथ्ोष्ट की तलाश में बेचैन हो उठता है। भाषाई तमीज हाशिए पर लटक रही है।

वर्तमान काव्य प्रवृत्तियों में प्रमुख है उत्तर छायावाद जहाँ मानव जीवन में असंगति बढ़ी है तथा गुंथ्ो हुए यथार्थ को पकड़ने की सतर्कता काव्य में भी विद्यमान है। ‘आत्मीयता’ में स्थिर मान्यताओं से जुड़ा धोखा उद्धाटित होता है। कवि मनीष ने स्थितप्रज्ञ हो इस चुनौती को स्वीकार किया है। भावना व संवेदना भी बाजारवाद से बच नहीं सकी है तथा यह भी समय व वनज के घ्ोरे में आ गया है - ‘स्थगित संवेदनाएं’ में कवि ने त्रासद मानवीय स्थिति को व्यंजित किया है। कवि हृदय की आत्मीयता व प्रेम रिश्तों की गरमाहट ‘वो संतरा’ जैसी कविताओं में दिखाई देती हैं जहाँ आत्मपरकता तथा अभिव्यंजनात्मकता दोनों ही प्रखर हैं।

बाह्य व आंतरिक स्थिति लगातर सुसंगत होने तथा एकात्मकता का आनंद उठाने के बारे में कविताओं विश्ोषकर ‘अक्टूबर उस साल’ संग्रह तथा कविता ‘वह साल वह अक्टूबर’ में उत्कृष्ट स्तर को प्राप्त करती है। जो शब्द चयन में सटीकता, संगीतात्मकता तथा वातावरण की गतिशीलता पाठकों को आकर्षित करती है। ऋतु सौंदर्य व मौसमी बहार साहित्य के लिए लम्बे समय से कच्चा माल रहा है परन्तु यहाँ यह भावों के साथ आंदोलित होता है।

स्त्री-पुरुष प्रेम व्यापार इन रचना संग्रहों में पाठकों को अधिक संस्कारित करता है तथा प्रतिशोध आधारित त्रुटि की संभावना को कम करता है। ‘बहुत कठिन होता है’ में कवि प्रेम के यथार्थ बिम्ब को प्रस्तुत करता है जहाँ एकान्तिक ठहराव मिलता है।

परिवर्तन ही शाश्वत है, हर पीढ़ी अपने संक्रमण तथा उसकी पीड़ा को ल्ोकर सजग, उत्सुक पर शिकायती रही है। ‘कुछ उदास परम्पराएं’ में परम्पराओं से विचलन तथा नई व्यवस्था के साथ सामंजस्य की कमी दिखाई पड़ती है।

भाषा अभिव्यक्ति का सर्वाधिक मान्य माध्यम है ल्ोकिन इसमें भाषाई आवरण में अपने मंतव्य छिपा ल्ोना तथा कलात्मकता का दुरूपयोग भी नया नहीं है। भाषा कई बार विनम्रतापूर्वक अन्याय को पोषित करती है तथा उस पर प्रश्न नहीं खड़ा करती परंतु कवि भाषा के लिबास में अभिव्यक्ति की सुगमता तथा खतरे से भिज्ञ है जैसे (दरख्तों को, कुल्हाड़ी के नाखूनों पर भरोसा है)।

सभ्यता के इतिहास में अन्याय आधारित प्रथाओं को उद्दात प्रभाव प्रदान किया गया है, इसके परतों को उध्ोड़ना साहित्य का कर्तव्य है। कवि मनीष कई कविताओं में इस दिशा में प्रगतिशील प्रतीत होते हैं। वर्जनाओं व सीमाओं की लकीर पर गुणा-गणित करने के बजाए इसके औचित्य पर तार्किक विचार करते हैं। साहित्य में सत्य की पड़ताल की दीर्घ परंपरा रही है, कवि मनीष ने दर्शन के वैचारिक वाद-विवाद की जगह अनुभूतिजन्य सत्य को अधिक समीचीन माना है। ‘इतिहास मेरे साथ’ कविता में सत्य के प्रति समझौता हो जाने की संभावना को उद््घाटित किया गया है। ‘गंभीर चिंताओं की परिधि में’ कवि ने वैयक्तिक चेतना को साध्य माना है। वे मनुष्य और समाज को प्रयोग शाला बना देने के पक्षधर नही हैं।

अक्टूबर उस साल’ की कुछ रचनाएं भविष्य में नारा बन जाने की संभावनाओं से युक्त हैं। समाज की लंबी कुलबुलाहट के बाद दबी चेतना को जैसे ही अभिव्यक्ति मिलती है वह समाज द्वारा हाथों-हाथ ली जाती है। ऐसा दुष्यंत कुमार की रचनाओं में सिद्ध भी हो चुका है। कवि मनीष जी की रचनाओं में ‘यूंतो संकीर्णताओं को’ (वहन कर रहा हूं), ‘दौर-ए-निजाम’ जैसी कविताएं वर्तमान विडम्बनापूर्ण सामाजिक स्थिति पर सटीकता से जनता का पक्ष रखती हैं तथा बाजार व सत्ता के कुचक्र में निस्सहाय व्यक्ति के सामग्री या दर्शक बन जाने की अभिशप्तता को उचित रूप में रखती हैं।

सिद्ध बहुरूपिये भूमण्डलीय बाजार ने व्यक्ति की इच्छाओं, वासनाओं व सुगमताओं को अधिक कठोरतापूर्वक परिभाषित कर लिया है, तंत्र द्वारा अव्यवस्था के प्रति व्यक्ति की सहनशीलता की सीमा को बढ़ा दिया गया है। तंत्र की जटिलता व अन्यायपरकता को समझते हुए भी व्यक्ति अभिशप्त है। इन संग्रहों में न्यूनतम शब्दों में अनुभव व चिंतन सहजतापूर्वक व्यक्त हुआ है। उर्दू, फारसी और अंग्रेजी के शब्दों का प्रयोग लोक प्रचलन के अनुपात में ही प्रयोग किया गया है। अर्थों के स्तर पर पर लय व तुर्कों का सृजनात्मक रूप् उभर कर सामने आया है। बहुअर्थी प्रतीक और उपमानों की ताजगी रचना संग्रह की आकर्षक विश्ोषता है। अलक्षित, संश्र्लिष्ट व गतिशील बिम्बों का प्रयोग हुआ है जो सामग्री की ताजगी बरकरार रखती है।

इस बार तुम्हारे शहर में - समीक्षा

 

इस बार तुम्हारे शहर में समीक्षा

मनुष्य की भावनाओं को व्यक्त करने के लिए कविता सर्वोत्तम माध्यम है। व्यक्ति जब भी अकेले रहता है, तो उसके मन में कई विचारों का आवागमन चलता रहता है। विचारों को सुंदर तरीके से समाज के सामने रखना ऐसी कला सबके पास नहीं होती है, किंतु डॉ मनीष मिश्रा ने बड़ी ही तल्लीनता से अपने भावों को रसात्मक तरीके से व्यक्त किया है।  आचार्य विश्वनाथ के अनुसार "वाक्यां रसात्मक काव्यं" को कवि अपनी कविताओं के माध्यम से चरितार्थ करने का पूरी शिद्धत के साथ से प्रयास किया हैं।  मनीष की कविताओं में भावतत्व की प्रधानता स्पष्ट रूप से झलकती है।

इनकी कविताओं में सिर्फ स्त्री- पुरुष प्रेम ही नहीं बल्कि समय और समाज के तमाम छोटे-बड़े सवालों या परिस्थितियों को आंखों के सामने खड़ा करती हैं।  कवि की कविता "मैंने कुछ गालियां सीखी है" यह दर्शाता है कि मनुष्य को जहां रहना है, उसे सिर्फ उस प्रदेश या राज्य की केवल सकारात्मक चीजों को नहीं बल्कि समाज के हिसाब से गलत समझी जाने वाली चीजों को भी सीखना पड़ता है। जहां हम निवास करते हैं वहां सिर्फ अच्छाइयों को नहीं बल्कि कुछ गलत चीजों को भी अपनाना पड़ता है, और जरूरत पड़ने पर उसका उपयोग भी करना पड़ता है। तभी आप वहां के अपने कहलाने लगते हो। कवि  अपनी कविता में कहते हैं कि"

"यहां अब देश नहीं

प्रादेशिकता महत्वपूर्ण होने लगी है।

प्रादेशिक भाषा में

गाली देने से ही

हम अपने सम्मान की

रक्षा कर पाते हैं

पराए नहीं

अपने समझे जाते हैं

इस देश के

कई प्रदेशों में

आत्म सम्मान से

जीने के लिए

अब गालियां जरूरी है"।१

इन पंक्तियों की अर्थव्याप्ति इतनी अधिक है कि इसे जिस तरह से भी व्याख्यायित करें कम ही रहेगी।  कवि ने इस कविता में हमारे समग्र सामाजिक परिवेश को यथार्थपरक रखा है। यहाँ व्यक्ति नहीं बल्कि प्रादेशिकता महत्वपूर्ण हो गई है।

प्रकृति अपने आप में ही सुंदर है काव्य की सुंदरता बढ़ाने के लिए कवि अपनी कविताओं में प्रकृति का मनोहर रूप का वर्णन करते है।  कवि अपनी कविता के माध्यम से केवल देवभूमि की सुंदरता ही नहीं बल्कि अपनी श्रद्धा को अर्पित करते हुए नमन करते हैं। कहते हैं कि

"हे देवभूमि

यह तुझ पर

कोई कविता नहीं

तेरे प्रति कृतज्ञता ज्ञापन है

मनुष्य की  कृतघनताओं के लिए

क्षमा याचना है"।२

कवि देव भूमि को अपनी श्रद्धा अर्पित करते हुए अपने आदर्शों तथा संस्कृति का परिचय देते हैं।

कवि प्रकृति को अपने आप में ही एक सुंदर महाकाव्य बताते हुए कहते हैं कि

"इन पहाड़ों में

मानो बाचती  हो

साजती हो

रचती हो

सौंदर्य का कोई महाकाव्य"।३

यहां पर सौंदर्य का संबंध केवल बाह्य जगत की अपेक्षा आंतरिक सत्ता से अधिक है कवि ने प्रकृति को बड़े ही खूबसूरत ढंग से मानवीकरण किया है।

कवि ने अपनी कविताओं को गहरे प्रेम से रचा है इस प्रेम में एक मित्र, प्रेयसी या उसकी कल्पना भी हो सकती है। जब कोई व्यक्ति अपनों को किसी अधिकारवस किसी भी तरह से संबोधित करता है, तो यह संबोधन उस रिश्ते या अपनत्व की पराकाष्ठा को बताता है।

कविता "चुड़ैल" में कवि कहते हैं कि

"जब कहता हूं तुम्हें

चुड़ैल तो

यह मानता हूं कि

तुम हँसोगी  

क्योंकि तुम जानती हो

तुम हो मेरे लिए

दुनिया की सबसे सुंदर लड़की

जिसकी आलोचना

किसी भी तारीफ से

मुझे कहीं ज्यादा

अच्छी लगती है"।४

यह संबोधन ही उसकी मित्र या प्रेमिका को उसके अपनत्व का एहसास दिलाती होगी।

कविता अक्सर अपने जिए हुये पलों तथा रूमानियत के सहारे लिखी जाती है। कवि अपनी रचना के इन्हीं दोनों पक्षों का सहारा लेते हुए अपनी रचना धर्मिता की अनुभूतियों को पिरोता जाता है।  कवि मनीष की कविता सादगी से परिपूर्ण सरल और जीवंत कविता है जिससे हर एक पाठक वर्ग इन कविताओं को पढ़ते हुए अपने आप ही जुड़ता चला जाएगा  है।

 

 

                                           डॉ. उषा दुबे

                                      एम डी कॉलेज

                                         परेल, मुंबई

 

 

संदर्भ ग्रंथ

1) इस बार तुम्हारे शहर में पृष्ठ ६३

२) इस बार तुम्हारे शहर में पृष्ठ ४१

३) इस बार तुम्हारे शहर में पृष्ठ ४०

३) इस बार तुम्हारे शहर में पृष्ठ ४४

           

Friday, 17 April 2026

चिरोयली कहानी

 चिरोयली



       मैं ताशकंद, उज़्बेकिस्तान में सन 2024 की फ़रवरी के पहले सप्ताह में पहुंचा था, ताशकंद स्टेट यूनिवर्सिटी के विजिटिंग प्रोफ़ेसर के रूप में ।  मुझे यहाँ लगभग डेढ़ साल का समय बिताना था । एक अजनबी देश में अकेले इतना लंबा समय बिताने का यह पहला अनुभव था ।  मन में कई तरह के विचार थे जो परेशान किए हुए थे। ताशकंद मेरे लिए एक नई किताब जैसा था, जिसके पृष्ठों को मुझे इन डेढ़ सालों में धीरे-धीरे पलटने थे। लाल बहादुर शास्त्री भारतीय संस्कृति केंद्र के निदेशक भाई सितेश कुमार ने बताया था कि ड्राइवर शाहरुख मुझे एयरपोर्ट पर मिलेंगे और उन्हें अंग्रेज़ी बोलने आती है। अपना  सामान लेकर जैसे ही मैं एयरपोर्ट से बाहर निकला ठंडी हवा के तेज़ झोके से मेरी रूह कांप गयी । अभी ओवर कोट पहन ही रहा था कि एक लंबे चौड़े व्यक्ति ने मुझसे पूछा " प्रोफ़ेसर मनीष फ़ॉर्म इंडिया ?"  मैंने हां में सिर हिलाते हुए कहा " यस,बट हाऊ यू हैव रिकॉग्नाइज्ड मी ?"


        उसने मुस्कुराते हुए कहा," मिस्टर सितेश कुमार हैज गिवेन मी योर फ़ोटो। कैन वी गो?" इतना कहकर उन्होंने समान की ट्राली पकड़ ली और मुझे अपने पीछे आने का इशारा किया। मैं पहली बार किसी अजनबी देश की मिट्टी पर उतरा था। कदमों के नीचे की बर्फ़ चरमरा रही थी, जैसे कोई अनकही भाषा स्वागत कर रही हो। शाहरुख ने सामान कार में रखा और हम मेरे नए आशियाने की तरफ़ निकल पड़े । वह आशियाना जिसे मैं खुद पहली बार देखनेवाला था । इस नए परिंदे के लिए ताशकंद में आशियाना और आबोदाना सुनिश्चित थे,बस आगाज़ और अंज़ाम बाकी था । 


       बाहर हल्की बर्फ़ गिर रही थी, नर्म रुई की फ़ाहों की तरह । गिरती हुई बर्फ़ कई बार शिमला में देख चुका था लेकिन वो मौसम किसी के संग-साथ वाला था । लेकिन यहाँ मैं अकेला था । संग-साथ की स्मृतियाँ और वर्तमान की निःसंगता  के बीच कार धीरे-धीरे मेरे नए आशियाने यक्का चिनार, मीराबाद की ओर बढ़ रही थी । ऐसा लग रहा था कि समय के धूसर पल धीरे-धीरे मेरे भीतर उतर रहे हों। कार के अंदर की ऊष्मा और बाहर की ठंड के बीच मैं फँसा हुआ था, जैसे स्मृतियों और वर्तमान के बीच कोई अदृश्य दरार थोड़ी और चौड़ी हो गई हो। वह पूरा शहर जैसे बर्फ़ की चादर में लिपटा हुआ था। दूर-दूर तक सफ़ेद परतें, जैसे किसी ने धरती को नए सिरे से रंग दिया हो । इस धरती के हर पत्थर, हर पेड़, हर बर्फ़ के कण को मुझे अब धीरे-धीरे पहचानना था, आख़िर कितने दिन अजनबी रहूंगा ? ताशकंद की वह ढलती हुई साँझ चुपचाप बर्फ़ में लिपटी थी। और मैं, उसकी बाहों में एक नए सफ़र की शुरुआत करने जा रहा था।


         अभी कोई पाँच, साढ़े पाँच ही बजे थे पर शहर जैसे सोया हुआ था। सड़कें शांत थीं, पर मुझे महसूस हो रहा था कि यह नींद अस्थायी है। यह शहर सुबह होते ही अपना सुर्ख़ चेहरा दिखाएगा, और मैं उसकी आँखों में झाँक सकूँगा। एयरपोर्ट से यक्का सराय की दूरी मुश्किल से 20 मिनट की रही होगी । अली शेर नवाई पार्क की परिक्रमा कर के हम अपने गंतव्य पर पहुँचते हैं और शाहरुख कार रोक देता  है। वह इमारत, जहाँ मुझे ठहरना था, वह नौ मंजिला इमारत अब मेरे सामने  थी। चारों ओर बर्फ़ की चादर, और बीच में पीली रोशनी से जगमगाता लोहे का मुख्य दरवाज़ा। दरवाजा नंबर कोड से शाहरुख ने खोला और हम लिफ्ट से नौवीं मंज़िल के 65 नंबर फ्लैट के सामने आ गए  । फ्लैट का दरवाज़ा खोलकर शाहरुख ने सामान एक तरफ़ रखा और मुझे फ्लैट दिखाने लगा । 


          पानी कैसे आयेगा, गैस कैसे चालू होगी, दरवाज़ा बंद कैसे होगा, रूम हीटिंग, मुख्य दरवाजे का कोड, वाईफाई कोड इत्यादि । मैंने सब कुछ ध्यान से सुना। एक-एक बात मानो जीवन की डोर से बँधी हुई थी। नए देश में रहना केवल भाषा और लोगों से परिचित होना नहीं होता, बल्कि हर छोटे यंत्र, हर साधन, हर कोड को समझना भी ज़रूरी हो जाता है। यही वे सूत्र होते हैं जो किसी अनजान घर को ‘अपना’ बनाने की ओर पहला कदम होते हैं । अपार्टमेंट के नीचे ही ‘फिश लैंड’ और ‘जाहिद कबाब’ नाम के दो होटल थे । ‘स्मार्ट सेंटर’ नाम की एक बड़ी दुकान भी जहां सब्जियां, फल, दूध और किराने का लगभग सब सामान मिल जाता था। मेडिकल स्टोर, कॉस्मेटिक, चौबीस घंटे खुली रहनेवाली दो वाइन शॉप,  हॉस्पिटल और अली शेर नवाई पार्क भी पास ही था । नया आशियाना मुझे पसंद आया। मुझे ज़रूरी सारी बातें नोट करा और मोबाइल के लिए यूसेल नामक कंपनी का नया उज़्बेकी सिम्कार्ड देकर, शाहरुख रूखसत हुए ।


         शाहरुख के जाने के बाद उस फ्लैट में एक गहरी चुप्पी फैल गई। फ्लैट मानो अचानक अपनी साँस रोककर खामोश हो गया हो । मैं अकेला था, बर्फ़ के शहर में, एक नए घर में, अनजान दीवारों के बीच। उस चुप्पी और उस घर को अब मेरी स्मृतियों का हिस्सा बनना था। बाहर बर्फ़ अब भी गिर रही थी, पर भीतर का कमरा धीरे-धीरे गर्म हो रहा था। सेंट्रल हीटिंग की बहुत हल्की-सी गुनगुनाहट मुझे यह एहसास दिला रही थी कि अब मैं सुरक्षित हूँ। तभी याद आया कि रात के खाने का क्या ? शाम के सवा छ  ही तो हुए थे फ़िर बाहर ही तो होटल था, पर भीतर एक झिझक थी । क्या अभी बाहर जाना चाहिए? क्या मैं राह भटक जाऊँगा? भाषा न समझ पाने पर क्या होगा? उज़्बेकी के कुछ शब्द सीखे थे लेकिन क्या उनसे काम बन जाएगा ? थोड़ा विचार करने के बाद मैंने धीरे से कोट उठाया, दस्ताने चढ़ाए और दरवाज़े का कोड दोहराया, ताकि लौटते वक्त भूल न जाऊँ। पहले ही दिन अधिक रात को बाहर जाने से अभी चले जाना मुझे उचित निर्णय लगा । 


         ‘फिश लैंड” होटल पहुँचकर भीतर मैं एक मेज़ पर बैठा, थोड़ी-सी थकान, थोड़ी-सी भूख और अजनबीपन की मिलीजुली बेचैनी के साथ। मेनू उज़्बेकी के साथ अंग्रेजी में भी उपलब्ध था । उस  होटल में एक ग्रिल सैंडविच और तुर्की चाय से काम बन गया। शाकाहारी लोगों के लिए अधिक कुछ वहां था नहीं । वैसे भी परदेश में रहते हुए अपनी आदतों, अपने स्वादों को बार-बार समझौते की आग में झोंकना ही पड़ता है। लगभग एक लाख सोम का बिल चुका मैं वहां से चलता बना । खाने का इतना बड़ा बिल चुकाकर हंसी आ रही थी। वहां एक भारतीय रुपया लगभग डेढ़ सौ उज़्बेकी सोम के बराबर था। वहाँ पैसे का भारतीय मुद्रा में हिसाब का मेरा फार्मूला था कि आप सोम में जितना भुगतान करें उसमें से दो शून्य पहले निकाल दीजिये । जैसे एक लाख सोम में से दो शून्य निकालने के बाद होंगे एक हजार फ़िर जो बचे उसमें से भी तीस प्रतिशत कम कर दीजिये । अब जो राशि हुई वह लगभग वह भारतीय रुपए के बराबर होगी । इस हिसाब से मैंने लगभग सात सौ रुपये खर्च किए थे । 


        वहां से अपार्टमेंट वापस आने के लिए अली शेर नवाई पार्क की बाहरी सड़क से आना होता था , जिसके बायीं तरफ़ पुरानी किताबों की दर्जनों दुकाने थीं । वहां अधिकांश किताबें उज़्बेकी और रूसी में ही थीं, पर आदतन किताबें देखकर रुक गया । सजी हुईं वे  किताबें किसी बर्फ़ीले  बियाबान में खिले फूलों जैसी लगीं, सुंदर पर समझी न जा सकने वाली । उस समय यह यक़ीन हो गया कि भाषा ज्ञान से अधिक संपर्क की चीज़ है । किसी अक्षर को समझना, उसकी धड़कन को छू लेने जैसा है। फ़िर वह अक्षर केवल भाषा नहीं, बल्कि मनुष्य, संस्कृति और स्मृति का भी प्रतीक बन जाता है। अक्षर का धड़कन होना यह बताता है कि भाषा वाक प्रतीकों या निर्जीव चिह्नों की शृंखला भर नहीं, बल्कि एक जीवित प्राणी की तरह है,जिसके भीतर संवेदनाएँ बहती हैं जो हमें अनकही निकटताओं से जोड़ देती है। ठंड बढ़ रही थी तो मैं ने भी आगे बढ़ना ठीक समझा । सेंट्रल पैलेस होटल से बायी तरफ़ मुड़कर मैं सीधे स्मार्ट सेंटर नामक दुकान में दाखिल हुआ । शेल्फ़ पर सजी बोतलों और पैकेटों के बीच मैं ऐसे घूम रहा था, जैसे किसी अनजान भाषा की किताब पढ़ रहा हूँ । सारी चीजें उज़्बेकी या रूसी में लिखी थीं। फ़िर भी  दूध, ब्रेड, कुछ फल और पानी का ज़ार लेने में मुझे कोई कठिनाई नहीं हुई । वैसे भी उज़्बेक संस्कृति में आत्मीय भाव से मिलना, सहायता के लिए तत्पर रहना जैसी बातें सहज थीं । अंततः मैं सारा सामान लेकर फ़्लैट पर वापस आ गया, बिना किसी परेशानी के फ़्लैट पर पहुंच कर लगा जैसे कोई बहुत बड़ी जंग जीत कर लौटा हूं।


            यात्रा की थकान तो थी लेकिन आंखों में नींद नहीं थी । बंद कांच की खिड़की से ‘ताशकंद सिटी’ की नीली ईमारत ऐसे जगमगा रही थी मानो बर्फ़ की इस विशाल निस्तब्धता में वह अकेली सांस ले रही हो । बर्फबारी बंद हो चुकी थी लेकिन उसके आगोश में सारा शहर था । किसी तरह का कहीं कोई शोर नहीं, बस बर्फ़ और पसरी हुई शांति चारों तरफ। उस मौन में फ्लैट के भीतर चुपचाप लेटे हुए मैं अपने भीतर की धड़कन सुन पा रहा था। शायद उसी धड़कन की लय पर, जाने कब, आँखें धीरे-धीरे बोझिल हुईं और नींद एक अनकहे सपने की तरह उतर आई। सुबह 6 बजे का अलार्म बजा तो नींद खुली । मैं उठकर खिड़की के पास गया और परदे को सरकाया। सामने का दृश्य देखकर मन जैसे ठिठक गया । पूरा शहर बर्फ़ से ढका हुआ था। पेड़-पौधे, सड़कें, छतें सब पर सफ़ेद चादर बिछी हुई। धूप अभी पूरी तरह निकली नहीं थी, लेकिन आसमान पर की हल्की गुलाबी और सुनहरी किरणें नीचे बर्फ़ को चमका रही थीं। कमरे के भीतर तो गर्माहट थी, लेकिन खिड़की खोलते ही ठंडी हवा का एक झोंका अंदर आया और चेहरे को छू गया। उस स्पर्श में ठंडक तो थी, मगर साथ ही एक ताजगी भी।  


          उस क्षण मुझे ख़्याल आया कि आख़िर ऐसे मौसम में कोई काम पर कैसे जाता होगा ? ये कोई काम पर जाने का मौसम है ?  फिर याद आया कि मुझे भी नौ बजे विश्वविद्यालय पहुंचना है जो कि मेरे अपार्टमेंट के करीब ही था, कोई एक या डेढ़ किलोमीटर की दूरी थी  । अतः मैं तैयार होकर साढ़े आठ तक अपार्टमेंट के नीचे आ गया। अपार्टमेंट के मुख्य गेट से बाहर निकलते ही बर्फ़ की ठंडी हवा चेहरे से टकरायी, ऐसा लगा कि यह शहर अपने मौन और श्वेत विस्तार से मेरा स्वागत कर रहा है।आज पहला दिन था ऊपर से बर्फ़, इसीलिए पैदल जाने की बजाय यनडेक्स से कैब बुला ली । यनडेक्स ताशकंद में वैसी ही सेवा है जैसी भारत में ओला या उबर की है । अभी तीन चार मिनट ही बीते थे कि एक सुंदर सी चमचमाती हुई काले रंग की कार मेरे पास आकर रुकी । मैंने कार का नंबर देख कंफर्म किया कि वो मेरे लिए ही आयी थी ।


                 मैंने आदतन आगे की ओर बायीं तरफ़ का दरवाज़ा खोला तो दंग रह गया। वह ड्राइवर सीट थी और उस पर सत्ताईस-अट्ठाईस साल की सुंदर सम्भ्रांत उज़्बेकी लड़की बैठी हुई थी। क्षणभर को लगा कि शायद मैंने किसी की निजी कार का दरवाज़ा खोल दिया है । लेकिन फ़िर ध्यान आ गया कि  उज्बेकिस्तान में  गाड़ियाँ दायीं ओर चलती हैं इसलिए यहाँ ड्राइवर की सीट बायीं तरफ होती है। हल्के से झेंपते हुए मैंने चुपचाप पीछे वाली सीट का दरवाज़ा खोला और बैठ गया। मुझे देखकर वह उज़्बेकी सुंदरी हल्के से मुस्कुराई। उसकी मुस्कान वैसी थी जैसे बर्फ़ से ढकी शाख़ों के बीच अचानक धूप का एक टुकड़ा उतर आया हो। उसकी कत्थई आँखें गहरी और चमकती हुईं । नाक नक्श एकदम तराशे हुए । उसके  गालों पर हल्की लाली थी, गोया  गुलाब की पंखुड़ियों ने  उसे अपना रंग उधार दे दिया हो। वह सुंदर युवती मुझे इस अजनबी देश की जीवंत प्रतीक सी लगी ।  संस्कृति और इतिहास की तरह सम्मोहक, और वर्तमान की तरह सहज। अतः इतिहास के ख़ून खराबे से सीख़ लेते हुए मैंने भी वर्तमान में सहज़ रहना ही ठीक समझा । 


          सोच ही नहीं सकता था कि ताशकंद में कैब ड्राइवर ऐसे भी हो सकते हैं । भारत में ओला-उबर वाले ड्राइवर प्रायः ‘भैया’ या ‘चचा’ ही मिलते हैं। और यहाँ ताशकंद में सुबह-सुबह ही बर्फ़ की सफ़ेदी के बीच एक परी जैसी ड्राइवर मिल गई। लगता है, ये शहर मुझे कुछ ज़्यादा ही पसंद आयेगा। जैसे ही कार चली, मैं सोच ही रहा था कि अब क्या बात करूँ? कुछ कहूँ या बस चुपचाप खिड़की से बाहर देखता रहूँ? लेकिन उसकी आँखों में वो चमक थी कि चुप्पी बोझिल हो जाती। इसके पहले मैं कुछ बोलता उसके ओंठो से शब्द फूट पड़े। उसने पूछा," हिंदुस्तान ?" मैंने कहा,"यस, हिंदुस्तान । फ़्रोम मुंबई।" मुंबई का नाम सुनते ही वो बच्चों की तरह चहक गई और बोली," शाहरुख खान, सलमान खान, अमिताभ बच्चन, प्रीती ज़िंटा!!" उसके मुस्कुराते हुए चेहरे पर वो खुशी, वो बचपना देख बहुत अच्छा लगा। लगा जैसे कि उसकी आँखों में बॉलीवुड की रंगीनियाँ चमक रही थीं, और होंठों पर कोई हिन्दी गीत बस सजने ही वाला हो। इतने में उसने "कुछ कुछ होता है" गाना बजाते हुए फ़िर पूछा," यू लाईक इट ?" मैंने कहा," यस, थैंक्स ।" ज़बाब में उसने रहमत कहा और गाड़ी धीरे धीरे बढ़ाती रही ।

      

        मकतब 110 के पास ट्रैफिक अधिक थी सो गाड़ी वहाँ देर तक रोकनी पड़ी । जीवन में पहली बार ट्रैफ़िक में गाड़ी रुकी रहने पर कोई खीझ नहीं बल्कि प्रसन्नता का अनुभव हो रहा था । जैसे ठहराव भी अपने भीतर कोई संगीत रखता हो। उस समय बाहर बर्फ़ की सफ़ेदी थी, भीतर संवाद की हल्की-सी गरमी। बाहर रुकावट थी, भीतर प्रवाह ।यह भी समझ आया कि सारे मौसम बाहर नहीं कुछ हमारे अंदर भी होते हैं । बातचीत के सिलसिले को आगे बढ़ाने के लिए मैंने पूछा,” डू यू नो हिन्दी ?” यह सवाल केवल भाषा के ज्ञान का नहीं, बल्कि एक पुल बनाने का था, मेरे भीतर और उसकी दुनिया के बीच। थोड़ा रुककर उसने ज़वाब दिया,” नो, उज़्बेक एंड रूसी । इंग्लिश लिटिल ।” इतना कहकर उसने फ़िर अपनी वही जादूई मुस्कान बिखेर दी। “ यू उज़्बेकी, रूसी ?” उसने मासूमियत से पूछा । “ नो, हिन्दी, इंग्लिश। उज़्बेकी लिटिल।” मैंने उसी की तरह ज़बाब दिया, और हम दोनों ही खिलखिला पड़े । 


        उस हँसी से जैसे दो अलग-अलग धुनें अचानक एक संगति में बदल गईं । हमारी खिलखिलाहट ने उज़्बेक, रूसी, हिन्दी और अंग्रेज़ी की दीवारों को पार कर दिया। दो अनजाने लोग, दो अलग दुनिया, दो अलग संस्कृतियाँ, केवल कुछ शब्दों और मुस्कान के माध्यम से एक दूसरे के अनुभवों के भीतर प्रवेश कर रहे थे। बाहर ट्रैफिक और बर्फ़ की ठंडक ने जैसे समय को ठहराकर हर चीज़ को स्थिर कर दिया था। सड़कें ठंडी, शहर सुन्न, और गाड़ियाँ स्थिर थीं। पर गाड़ी के भीतर, इस हँसी के कारण समय बह रहा था, धीमा, मधुर और सुखद प्रवाह की तरह । यह हँसी बाहरी स्थिरता और भीतर की गतिशीलता के बीच एक सेतु का काम कर रही थी। मैं चाहता था कि कुछ और बोलूं ,इतने में कार फ़िर चल पड़ी । 


      हम सरकारी संग्रहालय  के पास पहुंचे तो मैंने अनुमान लगा लिया कि हम यूनिवर्सिटी के पास ही हैं। गूगल लोकेशन से मैंने यह सरकारी संग्रहालय देखा था ।  अचानक कार नीले रंग की बील्डिंग के सामने रुक गई। हम ताशकंद स्टेट यूनिवर्सिटी ऑफ ओरिएंटल स्टडीज के गेट पर थे । मैंने सोचा काश ! यह रास्ता थोड़ा और लंबा होता… क्योंकि उसके साथ की बातें समय की तरह नहीं, किसी गाने की धुन की तरह लग रही थीं, जिसे कोई खत्म करना न चाहे। उसके साथ का हर क्षण धड़कन की एक लय में तब्दील हो चुका था । इतने में उसने फिर पूछा," टूरिस्ट?" मैंने कहा," नो, उस्ताद । हिन्दी टिल्ली/ भाषा उस्ताद ।" मेरे इतना बोलते ही उसकी आँखें बड़ी हो गईं। जैसे किसी बंद खिड़की पर अचानक उजाले का पर्दा खींच दिया जाए। अपनी आँखें नचाते हुए उसने कहा," ओह! उस्ताद, सुपर । सी यू अगेन। रहमत, नमस्ते ।" यह उसका पहला वाक्य था जिसमें एक से अधिक शब्द थे । 


        मन तो कर रहा था कि उसके साथ कुछ और बातें करूं, थोड़ा और समय बिताऊं लेकिन भाषा की समस्या थी और परदेश में पहले ही दिन कोई अनधिकृत पाठ्यक्रम पढ़ाना शुरू करना उस्ताद को सही नहीं लगा । फ़िर भी चलते चलते मैने कहा," थैंक यू । रहमत । योर गुड नेम ?" वो चिरपरिचित मुस्कान बिखेरते हुए बोली," नेम, माय नेम दिलरुह, बाय ।"  यह नाम मुझे उस रहस्य का प्रतीक सा लगा, जो इंसान को उसकी सीमाओं से परे ले जाकर किसी अनजानी रोशनी तक पहुँचा देता है। 


       " बाय दिलरुह, यू आर चिरोयली ।" मेरे यह कहते ही उसकी मुस्कान उसके कानों तक फैल गई। उसने एक ख़ास अदा से मेरी ओर देखा, जैसे कोई रहस्य अपनी आँखों से कह रही हो, शब्दों से नहीं। उसने कहा," हुम.. चिरोयली, थैंक यू उस्ताद, रहमत ।" और उसकी कार धीरे से आगे बढ़ गई। जैसे कोई सपना धीरे-धीरे आँखों से ओझल हो जाए, पर स्मृतियों के आकाश में हमेशा चमकता रहे। या फिर  किसी कविता की अंतिम पंक्ति ,जो पढ़ने के बाद भी समाप्त नहीं होती, बल्कि भीतर गूँजती रहती है। उसे हिन्दी नहीं आती थी और मुझे उज़्बेकी, सिवाय कुछ शब्दों के। थोड़ी अंग्रेजी, थोड़ी उज़्बेकी के साथ काम चल गया लेकिन उसके चेहरे पर खिली मुस्कान किसी भी भाषा से ज़्यादा स्पष्ट थी ।


        दिलरुह से  वह छोटी सी मुलाकात पहली और आख़िरी रही । मैं लगभग डेढ़ साल ताशकंद रहा पर वह दुबारा कभी नहीं मिली । लेकिन उसकी मुस्कान अब भी मेरे भीतर कहीं बर्फ़ की तरह जमी है । उसकी आँखों का झील-सा विस्तार हर बार स्मृति में लौट आता है । शायद जीवन की सबसे कीमती मुलाक़ातें अक्सर अधूरी होती हैं। जीवन की सबसे सुंदर अर्थात चिरोयली स्मृति के रूप में। 


डॉ. मनीष कुमार मिश्रा 

प्रभारी- हिन्दी विभाग 

के.एम.अग्रवाल महाविद्यालय 

कल्याण पश्चिम – 421301

महाराष्ट्र । 

manishmuntazir@gmail.com 


महुआ