तुम्हारी एक मुस्कान के लिए कितना बेचैन रहता ? मन का बसंत मनुहारों की लंबी श्रृंखलाओं में समर्पित होते न जाने कितने ही निर्मल,निश्छल भाव । तुम्हारी एक मुस्कान के लिए गाता अनुरागों का राग बुनता सपनों का संसार और छेड़ता तुम्हारे हृदय के तार । तुम्हारी एक मुस्कान के लिए अनगिनत शब्दों से रचता रहता महाकाव्य अपनी चाहत को देता रहता धार । तुम्हारी एक मुस्कान के लिए जनवरी में भी हुई झमाझम बारिश और अक्टूबर में ही खेला गया फ़ाग । तुम्हारी एक मुस्कान के लिए उतर जाता इतना गहरा कि डूब जाता उस रंग में जिसमें कि निखर जाता है प्यार । तुम्हारी हर एक मुस्कान मानों प्रमाणित करती मेरे किसी कार्य को ईश्वर के हस्ताक्षर के रूप में । तुम्हारी एक मुस्कान के लिए मेरे अंतिम शब्दों में भी एक प्रार्थना होगी जो तुम सुन सकोगी अपने ही भीतर मौन के उस पर्व में जब तुम खुद से मिलोगी कभी जब अकेले में । --------- मनीष कुमार मिश्रा
हिन्दी साहित्य, भाषा-विज्ञान, समाज-विज्ञान, भारतीय संस्कृति और सिनेमा पर प्रामाणिक शोधपरक आलेख। संपादक: डॉ. मनीष कुमार मिश्रा।