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भ्रम है प्यार का या वेदना चाह की

भ्रम है  प्यार का या वेदना चाह की,   नीरवता की सकल कमाई या स्वप्न मधुमास की , सहज क्षितिज की विकल रागिनी या प्रतिध्वनी स्मृति के विवश प्रवाह की , चाहत  की पीड़ा या ह्रदय की क्रीडा , मंत्रमुग्ध नयन झर झर करता या अपलक आखों  का स्वर कुछ कहता /

खफा रहते हो

खफा  रहते हो , रुसवा करते हो , तल्खी जब बढ जाती है तो अदा कहते हो / गम से गुरेज नहीं तब्बसुम से परहेज नहीं साथ गर मिले तेरा तो काटों से भी बैर नहीं

जिंदगी तू ही बता तू है क्या चाहती ,

जिंदगी तू ही बता तू है क्या चाहती , अहसास नहीं आभास नहीं मृतप्राय  जीवन क्यूँ चाहती बंधन नहीं हो उलझन नहीं हो क्या तू है मांगती ऐ जिंदगी तू ही बता तू क्या है चाहती , भाव में है प्यार लेकिन  कहाँ मांग रहा इकरार तेरा जिंदगी कटी  अभाव से  माँगा कब अहसान तेरा झुरमुट हो उत्पीडन  का या घोर  समुद्र हो जीवन का कब प्यार है छूटा श्रद्धा छोड़ी कब रास्ता छोड़ा प्रियतम का ऐ जिंदगी तू ही बता तू क्या है चाहती , ना रुठती ना है मनाती ना राह करती साथ का ना विफरती ना अकड़ती साथ करती हमेशा दुस्वार का ना सिमटती ना बहकती  ना कोई अधिकार छोड़े प्यार का दूरियां भाती नहीं नजदीकियां जमती नहीं क्या कहे इस साथ का ऐ जिंदगी तू ही बता तू क्या है चाहती

ढूंढ़ रहे हैं अहसास उन अहसासों की गरिमा को ,

ढूंढ़ रहे हैं अहसास उन अहसासों की गरिमा को , तड़प रही है मेरी प्यास प्यास तेरी गरिमा को , दिल उद्विग्न मन आच्छादित काली घटा के साये से , विरह वेदना विचलित बंधन गुह्य प्यार क्रंदित तन से असमंजित भाव विकल ध्यान अनुसंशित सामाजिक मानो से दृग से आंसू धड़कन कम्पित विपन्न बना मन आशों से ढूंढ़ रहे हैं अहसास उन अहसासों की गरिमा को , तड़प रही है मेरी प्यास प्यास तेरी गरिमा को ,

सहमे पत्ते खिले फूल हैं

सहमे पत्ते खिले फूल हैं महका गुलशन  मौसम नम  खिलता चेहरा आखें रिक्त  रुंधा गला बातों मे सख्त  थाली सजी पूजा के फूल  सुखा  पत्ता पैर की धुल खुशियों का मौसम  गम की चिंगारी सीने में सिमटी  बाहें वो प्यारी सहमे पत्ते खिले फूल हैं महका गुलशन मौसम नम

side effects of non-systematic working :-

A Moralist Story For All Employees. (Fine Print - Especially for newly promoted Chief's going to join at (in)convenient and exotic places of posting! ) ---------------- A story told by an IIM professor regarding the side effects of non-systematic working :- After completion of Lanka War Hanumanji was enjoying LTA with his friends. He got an email on his laptop from Accounts requesting him to clear his dues before 31st March - dues related to his tour for bring Sanjivani Booti for Laxmanji. He ignored the first mail. But after 3 - 4 reminders in two days time & receiving a call on CUG Mobile from Accounts Dept., he had to fly to Ayodhya canceling his leave. He submitted - TA, DA Bill, Bills of Sushen Vaidya, Hospital Charges incurred for Bharatji when met with an accident during his travel, Cost of Sanjeevani Booti for Laxmanji, (Transport charges) (1) Where is your tour sanction report ? Asked the HR & ADMIN Dept. Hanumanji got it done sting to concerned offici...