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संदेश

कुछ था कि जो

होकर ही महसूस किया न होने के फ़लसफ़े को और यह भी कि तुम आवेग के आगे प्रेम के आगे  अपनी मतलब परस्ती के बाद टूंट की गूँज के बाद बिना किसी अपराध बोध के जब कभी फ़िर चाहोगी तो वो सब पुराना पहले से कंही जादा नया और चटक होकर मिलेगा फ़िर तुम्हें बिना किसी शिकायत के तुम में डूबा हुआ तुमसे ही पूरा हुआ वो सब जो बिखरा पड़ा है टूटा और बेकार सा उसी किसी कोने में जहाँ कि तुम लौटो कभी या कि फ़िर पल दो पल चाहो रुकना खेलना तोड़ना या डूबना ताकि उबर सको मुस्कुरा सको और कह सको कि तुम्हें ज़रुरत तो नहीं थी पर कुछ था कि जो हो जाता तो बेहतर था । सोचता हूँ यह क्या था ? यह क्या है ? जो मेरे अंदर तुम्हारे होने न होने से परे है लेकिन है तुम्हारे लिये ही जब कि तुम्हें ज़रूरत नहीं है और कोई शिकायत भी नहीं । डॉ मनीष कुमार मिश्रा

होकर औरत ही

धूप सी सुनहली  गर्म और बिखरी हुई  सर्दियों सी कपकपाती  ठिठुरती और सिमटी हुई  बारिश की बूंदों सी टिपटिपाती बरसती और भिगोती हुई रात सी ख़ामोश दिन के कोलाहल से भरी हुई सीधी और सरल सी नरम गरम और पथराई हुई ज़िन्दगी सी उलझी हुई तुम जो सुलझाती हो वो गाँठें ख़ुद को बांधे इतने बंधनों में इतने जतन से सालों शताब्दियों सहस्त्राब्दियों से तुम औरत होकर भी नहीं नहीं तुम औरत हो और होकर औरत ही तुम कर सकती हो वह सब जिनके होने से ही होने का कुछ अर्थ है अन्यथा जो भी है सब का सब व्यर्थ है । ----- मनीष

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मुझे मेरी तलाश है लेकिन

मुझे मेरी तलाश है लेकिन लोग कहते हैं नासमझ हूँ ।                     डॉ मनीष कुमार मिश्रा ।

नाटककार दयाप्रकाश सिन्हा - हर्षा त्रिवेदी पुस्तक आप सभी के लिये उपलब्ध है

होली के हुडदंग का

भंग छान सब मस्त रहें काशी में शिव संग । होली के हुडदंग का  यहाँ अनोखा रंग । शाहन का भी शाह फकीरा फ़िरे घाट होइ झंट । बम बम बोल भक्त यहाँ ठेउने पर पाखंड । बोल कबीरा के बोले और झूमें तुलसी संग । हरफन मौला,छोड़ झमेला यही बनारसी ढंग । रोम रोम पुलकित हो जाये जब भी देखूं पावन गंग । बड़े बड़े बकैत यहाँ अड़ीबाज हो करते जंग । पान चबाकर कुर्ता झारकर बातों से करते दंग । लंकेटिंग की बात निराली जादा तर अड्बंग । बना रहे ये रंग बनारस हो ना टस से मस । सांड सुशोभित गलियों में बच्चे फिरते नंग धडंग । मुर्दों का मेला ठेला दाह हो रहे अंग । इच्छाओं को दाह कर मुस्काते हैं मलंग । काशी की है बात निराली अर्धचंद्र इसका अलंग । अड़ी खड़ी भोले त्रिशूल पर उनको भी अति प्रिय । ---------- डॉ मनीषकुमार सी. मिश्रा

यह जो बनारस है

ये जो बनारस है धर्म कर्म और मर्म की धरा है जिंदा ही नहीं मुर्दों का भी जिंदादिल शहर है धारा के विपरीत  यही यहाँ की रीत है । यह जो बनारस है कबीर को मानता है तुलसी संग झूमता है अड्बंगी बाबा का धाम यह सब को अपनाता है । यह जो बनारस है खण्ड खण्ड पाखंड यहाँ गंजेड़ी भंगेड़ी मदमस्त यहाँ अनिश्चितताओं को सौंप ज़िन्दगी बाबा जी निश्चिंत यहाँ । यह जो बनारस है रामलीला की नगरी घाटों और गंगा की नगरी मालवीय जी के प्रताप से सर्व विद्या की राजधानी भी है । यह जो बनारस है अपनी साड़ियों के लिए मशहूर है हाँ इनदिनों बुनकर बेहाल है मगर सपनों में उम्मीद बाकी है यह शहर उम्मीद के सपनों का शहर है । यह जो बनारस है बडबोला इसका मिजाज है पान यहाँ का रिवाज है ठंडी के दिनों की मलईया का गजब का स्वाद है । यह जो बनारस है माँ अन्नपूर्णा यहाँ संकट मोचन यहाँ कोई क्या बिगाड़ेगा इसका यहाँ स्वयं महादेव का वास है । डॉ मनीषकुमार सी. मिश्रा