होकर ही महसूस किया न होने के फ़लसफ़े को और यह भी कि तुम आवेग के आगे प्रेम के आगे अपनी मतलब परस्ती के बाद टूंट की गूँज के बाद बिना किसी अपराध बोध के जब कभी फ़िर चाहोगी तो वो सब पुराना पहले से कंही जादा नया और चटक होकर मिलेगा फ़िर तुम्हें बिना किसी शिकायत के तुम में डूबा हुआ तुमसे ही पूरा हुआ वो सब जो बिखरा पड़ा है टूटा और बेकार सा उसी किसी कोने में जहाँ कि तुम लौटो कभी या कि फ़िर पल दो पल चाहो रुकना खेलना तोड़ना या डूबना ताकि उबर सको मुस्कुरा सको और कह सको कि तुम्हें ज़रुरत तो नहीं थी पर कुछ था कि जो हो जाता तो बेहतर था । सोचता हूँ यह क्या था ? यह क्या है ? जो मेरे अंदर तुम्हारे होने न होने से परे है लेकिन है तुम्हारे लिये ही जब कि तुम्हें ज़रूरत नहीं है और कोई शिकायत भी नहीं । डॉ मनीष कुमार मिश्रा
हिन्दी साहित्य, भाषा-विज्ञान, समाज-विज्ञान, भारतीय संस्कृति और सिनेमा पर प्रामाणिक शोधपरक आलेख। संपादक: डॉ. मनीष कुमार मिश्रा।