हमारे सोचने और होने की विच्छिन्नता हमारी दरिद्रीकृत अवस्था का प्रमाण है । अपनी विभूतिवत्ता को लिथाड़कर परंपरागत शब्दावली के कवच में मज़हबी पूर्वाग्रहों के साथ हम बिलबिला गये हैं । संपूर्ण नकारवाद और अपनी निरपेक्षता की पर्याप्तता के अर्थहीन दावों के बीच हम दिव्य और पावन किसी भी अवतरण की संभावना को लगातार ख़ारिज कर रहे हैं । समाज की अंतरात्मा जैसे चराचरवादी भाष्य कर्म अवधारणात्मक वशीकरण अभियान में भुला दिये गए हैं । हे समशील !! हमारी बनावट में ही विरुद्धों के सामंजस्य का मूलमंत्र है समग्र और साक्षी चेतना के लिए चेतना का संघर्ष ही जीवन है । यह संघर्ष ही वह अच्युता अवस्था है जिसकी कृतार्थता हमारे अस्तित्व के साथ बद्धमूल है । वह सर्वोत्कृष्ट प्रभासिक्त मानवी मध्यवर्ती चेतना की अग्नि का अलभ्य वरदान विश्व की नींव है । -- डॉ. मनीष कुमार मिश्रा । ( वरिष्ठ विद्वान श्री रमेश चंद्र शाह के व्याख्यान "पावनता का पुनर्वास" सुनने के बाद । )