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INTERNATIONAL CONFERENCE ON REGIONAL CINEMA OF INDIA

हरियाणवी लोकनृत्य-- 'तेरे बीरे की मऱोड मेरे ठोसे म्ह' Folk Songs from Ha...

9. विरुद्धों का सामंजस्य ।

हमारे सोचने और होने की विच्छिन्नता हमारी दरिद्रीकृत अवस्था का प्रमाण है । अपनी विभूतिवत्ता को लिथाड़कर परंपरागत शब्दावली के कवच में मज़हबी पूर्वाग्रहों के साथ हम बिलबिला गये हैं । संपूर्ण नकारवाद और अपनी निरपेक्षता की पर्याप्तता के अर्थहीन दावों के बीच हम दिव्य और पावन किसी भी अवतरण की संभावना को लगातार ख़ारिज कर रहे हैं । समाज की अंतरात्मा जैसे चराचरवादी भाष्य कर्म अवधारणात्मक वशीकरण अभियान में भुला दिये गए हैं । हे समशील !! हमारी बनावट में ही विरुद्धों के सामंजस्य का मूलमंत्र है समग्र और साक्षी चेतना के लिए चेतना का संघर्ष ही जीवन है । यह संघर्ष ही वह अच्युता अवस्था है जिसकी कृतार्थता हमारे अस्तित्व के साथ बद्धमूल है । वह सर्वोत्कृष्ट प्रभासिक्त मानवी मध्यवर्ती चेतना की अग्नि का अलभ्य वरदान विश्व की नींव है । -- डॉ. मनीष कुमार मिश्रा । ( वरिष्ठ विद्वान श्री रमेश चंद्र शाह के व्याख्यान "पावनता का पुनर्वास" सुनने के बाद । )

8. ग़लीज़ दिनों की माशूक़ ।

उन दिनों आवारा बदचलन रातें गलीज़ दिनों की माशूक़ थीं  शायद वह समय सबकुछ ख़त्म होने का था । ये वही दिन थे जब सारी अफ़वाहें लगभग सच होतीं आधी रात के बाद भी आसमान बिना सितारों का होता मुसीबतों से स्याह मग़र चुप । ऐसे समय में न कोई हमसुखन न हमजुबांन इश्क़ ओ अदब पर मानों कर्बला का साया हो सारंगी पर सिर्फ़ वह फ़कीर सुनाता तहजीब-ओ-अदब की आख़री बात । तीख़ी घृणा के बीच वीभत्स हत्याओं का ज़श्न यादें मिटाती नफ़रतें इंसानियत लाचारी की हद तक बीमार लिजलिजी और असहाय । ऐसे खोये हुए समय में सब के सब खेलने भर के खिलौनें थे यह कोई देखा हुआ स्वप्न था या फ़िर हमारी आत्मकेंद्रियता की खोह में छुपा सचमुच कोई वक्त !!!! डॉ. मनीष कुमार मिश्रा ।

7. झूठ के चटक रंग ।

रस्मी तौर पर ही सही ख़यालों की किसी अंधी गुफ़ा में ख़ुद को नजरबंद करके मैं तथाकथित इंसानों औऱ उनकी बस्तियों से दूर अपनी जिंदगी का इकलौता आशिक रहा । इस आशिक़ी में कोई तेज़ नशा था बेमतलब प्रार्थनाओं से दूर सीधे मौत से दो-दो हाँथ मंजिलों से दूर लंबे सफ़र का तलबगार जितना ही लूटते जाऊं उतना ही सुकून । सभ्य समाज में यकीनन हम जैसे लोग शक के क़ाबिल थे इसलिए हमारी पैबंद लगी झोली भी व्यवस्था के आँख की किरकिरी रही । क्या सच ? क्या झूठ ? बात तो शब्दों को छानने-घोटने भर की है हाँ मुझे इसमें थोड़ी महारत है इसलिए इतना बता सकता हूँ कि झूठ के रंग अधिक चटकदार होते हैं औऱ जिंदगी सुर्ख़ रंगों की बहुत बड़ी दीवानी । --------- डॉ. मनीष कुमार मिश्रा ।

6 . रंजिशों का रंज ।

हमारी संवादहीनता का अंतराल शब्दों से पटा है  औऱ हम सूनी पड़ी किसी वीणा की तरह बस छू लेने भर से झंकृत होने को तैयार । अपनी तटस्थता पर हम दुःखी हैं औऱ इंतज़ार में हैं इंतज़ार के अंतिम पल के रंजिशों का यह रंज कितना अजीब है ? लोच इश्क़ की रूह है यह दर्द की राह पर सुर्ख़ होती है फ़िर सर्द रातों की ठंड हवाओं सी यह हमारी रूह से लिपटती है । इश्क़ में ग़ाफ़िल होकर ही जान पाया कि इश्क़ में अकेलापन कभी भी किसी को भी नसीब ही नहीं होता । ----- डॉ. मनीष कुमार मिश्रा ।