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न महकते बागों के मंजर का शौक रखा ,

न महकते बागों के मंजर का शौक रखा , न तूफानी समंदर का शौक रखा , शौक तो बस इतना था तुझे जी भर के देखूं , तुने की शिकायत तो बंद आखों का शौक रखा /

रूह जलती रही मेरी सर शैया पे

न गम की बरसात होती है ,न ख़ुशी भी साथ होती है , जिंदगी बीत रही कुछ ऐसी ,दिन भी रात होती है / . न मुलाकात की मैंने ,न कोई शुरुवात की तुने , रूह जलती रही मेरी सर शैया पे , मेरी राख को न आग दी तुने /

सोच सोच के सोच रहा था ,

सोच सोच के सोच रहा था , क्या मै सोचूं सोच रहा था ; . सोच न पाया सोचूं कैसे , सोच सोच के सोचूं कैसे ; सोच सोच किस सोच को सोचूं , क्या मै सोचूं कैसे सोचूं ; . सोच सोच के सोच रहा था , सोच है क्या मै सोच रहा था ; . सोच को सोचा सोचा सोच , सोच न पाया सोचा सोच ; सोचा सोच न समझा सोच , सोच की उलझन में उलझा सोच , . सोच सोच के सोच रहा था , क्या है ये सोच सोच रहा था ; . सोच सोच के सोच रहा था , कैसे मै सोचूं सोच रहा था /

मिला बड़े शौक से किसी से,

बड़ा रुलाया तेरी बातों ने रह रह कर , सब कुछ कहा तुने मोहब्बत ना कह कर ; . मिला बड़े शौक से किसी से, किसी से बढ -चढ़ कर ; लगा किसी के गले ,मिला किसी से दौड़ कर ; किसी को देख मुस्काया,खिलखिलाया किसी से मिलकर ; बैठा किसी के पास रुक कर , सुना किसी की बात दिल भर कर ; . सुना किसी के भाव भी, देखा किसी की आखों में चाह भी ; इनायत कर दी किसी पे मिलकर, शिकायत भी सुन ली किसी की छुप कर ; कहा किसी से बात दिल की , सुना किसी की बात मन की ; . सबसे मुलाकात कर ली , मन की चाह कर ली ; जिनको न परवाह थी खुशिओं की ; उनका भी साथ कर ली ; . खुशियाँ तेरी इसी में थी शायद , शायद तेरा यही ठौर था , न मुझसे मिलने की चाह की , शायद मै अकेला गैर था / . तरसता रहा मै पल- पल , जलता रहा मै हर पल , सोया नहीं हूँ अब भी , तड़पता रहा मै हर पल / . मेरे भावों से उसे क्या , मेरी राहों से किसे क्या , जब तू ही नहीं हुयी तेरी , गैरों की चाहत का मुझे क्या / .

किन संग वक़्त गुजरता तेरा किन संग तू दिन भर रहता है /

मोहक मुस्कान में तेरी मैंने खुद को खोया था , याद नहीं तुझको वो लम्हे जब तू मेरी बाँहों में सोया था ; क्यूँ मैं जानू अब तू किनके सपनों में रहता है , किनसे बातें किसका साथ किसकी खुसबू से तू महकता है ; आज तुझे कौन है प्रिय क्या करना है मुझे प्रिये ; किससे मिलना तुझको प्यारा क्यूँ मै जानू आज प्रिये ; अब भी याद मुझे वो दिन है जब तुझसे मै लड़ता था , क्या जानता है तू मै रातों में कितना रोया karata   था ; आखं वही है, ह्रदय वही है मेरे दिल के जजबात वही है , प्यास वही है ,आस वही है ,मेरे मन के हालात वही है , क्यूँ मैं जानू किन संग तू रमता है कौन तेरे भावों में रहता है , किन संग वक़्त गुजरता तेरा किन संग तू दिन भर रहता है /

मेरी आखों को नम बनाये रखा /

बुलाये रखा , उलझाये रखा , मेरे दिल के जख्मों को सलीके से ताज़ा बनाये रखा ; मुस्कराया भी मुझको हँसाया भी , पर मेरे भावों को तुने पराया रखा ,मुझको सताए रखा ; मरहम लगता हर बार तू एक नए अंदाज से , पर रिसते घावों में कांटा चुभाये रखा ; फूलों की खुसबू को मेरे पास बनाये रखा ; बड़ी खूबसूरती से तुने मुझे अपनी जिंदगी के किनारे लगाये रखा ; मेरे ओठों पे अपना नाम बनाये रखा ; मेरी आखों को नम बनाये रखा /

फितरत नहीं थी वैसा बना डाला ,

------------------------------------------ ------------------------------------------ न फितरत बदली न चाहत बदली , बदलते वक़्त ने करवट न बदली ; . न व्यवहार बदला न संस्कार बदला , बदला वक़्त ने सिर्फ अभाव बदला ; ------------------------------------------ ------------------------------------------ . फितरत नहीं थी वैसा बना डाला , मोहब्बत ने न जाने कैसा बना डाला ; . सहज मासूम से ख्वाब थे मेरे , उन्हें आखों से बहता काजल बना डाला ; चल रही थी जिंदगी जों सहज अंदाज से , तेरी इनायतों ने उसे हलाहल बना डाला ; . फितरत नहीं थी वैसा बना डाला , मोहब्बत ने न जाने कैसा बना डाला / ----------------------------------------- -----------------------------------------