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मनीष : अस्तित्व की क्षणिकता व जीवन की नश्वरता में भावों व अनुभूति की शाश्वतता के कवि

  मनीष : अस्तित्व की क्षणिकता व जीवन की नश्वरता में भावों व अनुभूति की शाश्वतता के कवि     वर्तमान कविता जटिल जगत की यथार्थता तथा मानव की अनुभूतिजन्य आवश्यकता के मध्य संघर्ष कर रही है। त्रासदीपूर्ण विडंबना के दौर में अपने जीवन और साहित्य को लहूलुहान कर रहा है। ऐसे में कुछ कविताएं मूल्यों की रक्षा के लिए संजीवनली दे रही है तथा संबंधों को सहज बनाने का प्रयास कर रही है। वर्तमान युग के भाव बोध को समझने और रंजीत करने की क्षमता जिन कवियों में नजर आती है उनमें से एक युवा कवि मनीष हैं। हाल ही में उनकी दो रचनाएं ‘इस बार तेरे शहर में ( 2018)’ और ‘अक्टूबर उस साल ( 2019)’ प्रकाशित हुई हैं। दोनों रचना संग्रह भाव प्रवणता , विषय वैविध्य तथा प्रस्तुति योजना और शब्द शक्ति की दृष्टि से प्रशंसनीय हैं। इनमें जटिल यथार्थ को समेटने की शक्ति भी दिखाई पड़ती है। ‘ कविताओं के शब्द’ कविता में कविता की भाषा के संवर्धन के महत्त्व व कवि की इस संदर्भ में दृष्टि स्पष्ट है। कवि काव्य की भाषा की उपयोगिता तथा संवेदनशीलता से भलीभांति परिचित है। स्त्री-पुरुष के यांत्रिक समानता के स्थान पर यथोचित समत...

इस बार तुम्हारे शहर में - समीक्षा

  इस बार तुम्हारे शहर में समीक्षा मनुष्य की भावनाओं को व्यक्त करने के लिए कविता सर्वोत्तम माध्यम है। व्यक्ति जब भी अकेले रहता है , तो उसके मन में कई विचारों का आवागमन चलता रहता है। विचारों को सुंदर तरीके से समाज के सामने रखना ऐसी कला सबके पास नहीं होती है , किंतु डॉ मनीष मिश्रा ने बड़ी ही तल्लीनता से अपने भावों को रसात्मक तरीके से व्यक्त किया है।   आचार्य विश्वनाथ के अनुसार "वाक्यां रसात्मक काव्यं" को कवि अपनी कविताओं के माध्यम से चरितार्थ करने का पूरी शिद्धत के साथ से प्रयास किया हैं।   मनीष की कविताओं में भावतत्व की प्रधानता स्पष्ट रूप से झलकती है। इनकी कविताओं में सिर्फ स्त्री- पुरुष प्रेम ही नहीं बल्कि समय और समाज के तमाम छोटे-बड़े सवालों या परिस्थितियों को आंखों के सामने खड़ा करती हैं।   कवि की कविता "मैंने कुछ गालियां सीखी है" यह दर्शाता है कि मनुष्य को जहां रहना है , उसे सिर्फ उस प्रदेश या राज्य की केवल सकारात्मक चीजों को नहीं बल्कि समाज के हिसाब से गलत समझी जाने वाली चीजों को भी सीखना पड़ता है। जहां हम निवास करते हैं वहां सिर्फ अच्छाइयों को नहीं बल्कि...

चिरोयली कहानी

 चिरोयली        मैं ताशकंद, उज़्बेकिस्तान में सन 2024 की फ़रवरी के पहले सप्ताह में पहुंचा था, ताशकंद स्टेट यूनिवर्सिटी के विजिटिंग प्रोफ़ेसर के रूप में ।  मुझे यहाँ लगभग डेढ़ साल का समय बिताना था । एक अजनबी देश में अकेले इतना लंबा समय बिताने का यह पहला अनुभव था ।  मन में कई तरह के विचार थे जो परेशान किए हुए थे। ताशकंद मेरे लिए एक नई किताब जैसा था, जिसके पृष्ठों को मुझे इन डेढ़ सालों में धीरे-धीरे पलटने थे। लाल बहादुर शास्त्री भारतीय संस्कृति केंद्र के निदेशक भाई सितेश कुमार ने बताया था कि ड्राइवर शाहरुख मुझे एयरपोर्ट पर मिलेंगे और उन्हें अंग्रेज़ी बोलने आती है। अपना  सामान लेकर जैसे ही मैं एयरपोर्ट से बाहर निकला ठंडी हवा के तेज़ झोके से मेरी रूह कांप गयी । अभी ओवर कोट पहन ही रहा था कि एक लंबे चौड़े व्यक्ति ने मुझसे पूछा " प्रोफ़ेसर मनीष फ़ॉर्म इंडिया ?"  मैंने हां में सिर हिलाते हुए कहा " यस,बट हाऊ यू हैव रिकॉग्नाइज्ड मी ?"         उसने मुस्कुराते हुए कहा," मिस्टर सितेश कुमार हैज गिवेन मी योर फ़ोटो। कैन वी गो?" इतना कहकर उन्हो...

उज़्बेकिस्तान के महान कवि अली शेर नवाई पर एक आलेख।

 

स्वच्छंदतावाद की संकल्पना

  1. भूमिका : स्वच्छंदतावाद की संकल्पना स्वच्छंदतावाद (Romanticism) अठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में विकसित एक सशक्त साहित्यिक, कलात्मक और बौद्धिक आंदोलन था। यह आंदोलन प्रबोधन युग (Enlightenment) और नवशास्त्रवाद (Classicism) की कठोर नियमबद्धता, तर्कप्रधानता तथा कृत्रिमता के विरुद्ध एक सृजनात्मक प्रतिक्रिया के रूप में उभरा। ‘रोमांटिक’ शब्द की उत्पत्ति ‘रोमांस’ से हुई, जो मध्यकालीन वीरगाथाओं, प्रेम-कथाओं, साहसिक यात्राओं और अलौकिक घटनाओं से संबंधित था। प्रारंभ में इसका अर्थ काल्पनिक, विचित्र या असंभावित माना जाता था, परंतु कालांतर में यह शब्द प्रकृति–प्रेम, कल्पनाशीलता, व्यक्तिवाद और भावनात्मक स्वतंत्रता का पर्याय बन गया। 2. रोमांटिसिज़्म के अर्थ और परिभाषाएँ आधुनिक अंग्रेज़ी प्रयोग में रोमांटिसिज़्म के चार प्रमुख अर्थ माने गए हैं— सामान्य के विपरीत – कल्पनाशील और आदर्शवादी प्रवृत्ति अपेक्षित के विपरीत – असाधारण या स्वप्निल अनुभूति शाब्दिक के विपरीत – प्रतीकात्मक और रहस्यमय अभिव्यक्ति परंपरागत के विपरीत – उग्र, भावनापूर्ण और चित्रात्मक शैली आलोचक W. J. Long ...

भारतीय ज्ञान परम्परा और पर्यावरण चिंतन '

 🕉️ *सादर अभिवादन* 🙏 दिनांक 24 फरवरी, 2026 को हिंदी विभाग ,इंदिरा गांधी विश्वविद्यालय मीरपुर, रेवाड़ी (हरियाणा)द्वारा आयोजित *एक दिवसीय*  बहुविषयक राष्ट्रीय संगोष्ठी ( *हाइब्रिड मोड़* ) में सहभागिता के लिए सादर आमंत्रित किया जाता है। 👉 संगोष्ठी का मुख्य विषय :           *'भारतीय ज्ञान परम्परा और पर्यावरण चिंतन '*  👉 संगोष्ठी के विचारणीय *उपविषय* इस प्रकार होंगे– 1.​भारतीय ज्ञान परंपरा की समकालीन प्रासंगिकता 2.​वेद, उपनिषद और दर्शन : पर्यावरण चेतना 3.​पुराण, भगवद्गीता, रामायण, महाभारत : पर्यावरण चेतना 4.​बौद्ध और जैन साहित्य में पर्यावरण चेतना 5.​भारतीय ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक संरक्षण 6.​भारतीय ज्ञान परंपरा का वर्तमान में पर्यावरण, शांति और सतत विकास में योगदान 7.​भारतीय ज्ञान परंपरा और भक्ति साहित्य में पर्यावरण चिंतन 8.​कथा साहित्य, हिंदी कविता, उपन्यास, नाट्य साहित्य, ​कथेतर साहित्य में पर्यावरण चिंतन 9.​भारतीय ज्ञान परंपरा: पर्यावरण, योग, वैश्विक चिंतन 10.​भारतीय ज्ञान परंपरा: प्राकृतिक चिकित्सा और आयुर्वेद 11.​भारतीय ज्ञान परंपरा औ...